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तबलीगी जमात पर सांप्रदायिक नफरत फैला रहा मीडिया, रोक लगाएँ: SC ने कहा- प्रेस पर नहीं लगाएँगे पाबंदी

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (अप्रैल 13, 2020) को तबलीगी जमात से संबंधित मीडिया कवरेज को लेकर दायर याचिका पर कोई अंतरिम निर्णय देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि वह प्रेस का गला नहीं घोंटेगा। दो सप्ताह बाद कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई की जाएगी। 

मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे, न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति एमएम शांतनगौडर की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने एक मजहबी संगठन की याचिका पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई की और उससे कहा कि इस मामले में भारतीय प्रेस परिषद को भी एक पक्षकार बनाए। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने कहा, “हम प्रेस को रोक नहीं सकते। हम अंतरिम आदेश/निर्देश पारित नहीं करेंगे।”

दरअसल, कोरोना वायरस महामारी फैलने को हालिया निजामुद्दीन मरकज की घटना से जोड़कर कथित रूप से सांप्रदायिक नफरत और धर्मान्धता फैलाने से मीडिया के एक वर्ग को रोकने के लिए संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिन्द ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। 

याचिकाकर्ता के वकील ने जब यह दावा किया कि मीडिया की खबरों की वजह से लोगों पर हमला हुआ है तो पीठ ने टिप्पणी की, “हम खबरों के बारे में ठोस दीर्घकालीन उपाय करना चाहते हैं। एक बार जब हम संज्ञान लेंगे तो लोग समझेंगे। यदि यह हत्या करने या बदनाम करने का मसला है तो आपको राहत के लिए कहीं और जाना होगा। लेकिन अगर यह व्यापक रिपोर्टिंग का मामला है तो प्रेस परिषद को पक्षकार बनाना होगा।”

याचिकाकर्ता ने इस याचिका में आरोप लगाया है कि मीडिया का एक वर्ग दिल्ली में पिछले महीने आयोजित तबलीगी जमात के कार्यक्रम को लेकर सांप्रदायिक नफरत फैला रहा है। जमीयत उलेमा-ए-हिन्द ने अपनी याचिका में फर्जी खबरों को रोकने और इसके लिए जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने का निर्देश केंद्र को देने का अनुरोध किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि तबलीगी जमात की दुर्भाग्यपूर्ण घटना का इस्तेमाल सारे समुदाय को दोषी ठहराने के लिए किया जा रहा है। 

जमीयत उलेमा-ए-हिन्द की तरफ से दी गई दलीलों में कहा गया है कि मीडिया के कुछ वर्ग ‘सांप्रदायिक सुर्खियों’ और ‘कट्टर बयानों’ का इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि देश भर में जान-बूझकर कोरोना वायरस फैलाने के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराया जा सके, जिससे लोगों के जीवन को खतरा है।

इसके साथ ही याचिका में आरोप लगाया गया कि सोशल मीडिया भी गलत सूचना और फर्जी खबरों से भरा हुआ है, जिसका उद्देश्य पूरी कोरोना वायरस की घटना को सांप्रदायिक आवाज देना और तबलीगी जमात के बारे में ‘साजिश के सिद्धांतों’ को देश भर में जान-बूझकर फैलाना है।

बता दें कि दिल्ली के पश्चिमी निजामुद्दीन इलाके में स्थित तबलीगी जमात के मुख्यालय में पिछले महीने हुए मजहबी कार्यक्रम में करीब नौ हजार लोगों ने शिरकत की थी और यह कार्यक्रम ही भारत में कोरोना वायरस महामारी का संक्रमण फैलने का एक मुख्य स्त्रोत बन गया क्योंकि इसमें हिस्सा लेने वाले अधिकांश व्यक्ति अपने मजहबी कार्यों के सिलसिले में देश के विभिन्न हिस्सों में गए जहाँ वे अन्य लोगों के संपर्क में आए।

महाराष्ट्र के मंत्री जितेंद्र आव्हाड से जुड़े 16 लोग कोरोना पॉजिटिव, 5 पुलिसकर्मी सहित रसोइया भी शामिल

महाराष्ट्र के हाउसिंग मिनिस्टर जितेंद्र आव्हाड के सुरक्षाकर्मी के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद हड़कंप मच गया। हालाँकि, इस खबर की सूचना होते ही एनसीपी नेता ने खुद को क्वारंटाइन कर लिया। लेकिन शाम तक खबर आई कि कैबिनेट मंत्री का केवल सुरक्षाकर्मी ही नहीं, बल्कि उनसे जुड़े 16 अन्य लोग भी कोरोना पॉजिटिव हैं। इन 16 लोगों की सूची में जितेंद्र आव्हाड की सुरक्षा में तैनात 5 पुलिसकर्मी हैं, कार्यरत रसोइया है, सफाई कामगार हैं, बंगले पर कार्यरत स्टाफ और अन्य कर्मचारी हैं। इनके अलावा पॉजिटिव लोगों की सूची में ठाणे मनपा का एक पूर्व नगरसेवक का नाम भी बताया जा रहा है। 

मीडिया में प्रकाशित जानकारी के मुताबिक, एनसीपी नेता पिछले कुछ दिनों से अपने विधानसभा क्षेत्र कलवा और मुंब्रा में बहुत सक्रिय थे। कोरोना महामारी के बीच वे तमाम लोगों को भोजन का वितरण खुद करते थे। ऐसे में मुंब्रा और कलवा पुलिसकर्मियों के अलावा उनकी सुरक्षा में लगे पुलिसकर्मी और उनके स्टाफ से जुड़े कुछ लोग उनके साथ रहते थे। इसलिए आशंका है कि पुलिसकर्मियों के संपर्क में आने से लोग भी संक्रमित हुए हों।

जानकारी के अनुसार, सभी पहलुओं को देखते हुए मुंब्रा पुलिस से जुड़े 35 पुलिसकर्मियों को क्वारंटाइन किया गया है। वहीं केंद्रीय मंत्री ने भी खुद के क्वारंटाइन में जाने की बात सबको बताई है। उन्होंने कहा, “कोरोना वायरस से संक्रमित एक पुलिस अधिकारी के संपर्क के आने के कारण मैंने आइसोलेशन में रहने का फैसला किया है।”

उन्होंने एक संदेश में कहा कि पहली जाँच में वह कोरोना वायरस से संक्रमित नहीं पाए गए लेकिन उन्होंने 14 दिन क्वारंटाइन रहने का फैसला किया है। उनका कहना है कि 8 दिन बाद उनकी फिर से जाँच होगी और उन्हें उम्मीद है कि इसमें भी उनके नतीजे नेगेटिव ही आएँगे। एनसीपी नेता ने आगे कहा कि संक्रमण की पुष्टि नहीं होने और क्वारंटाइन अवधि पूरी करने के बाद वह लोगों की सेवा करने के लिए फिर से निकलेंगे। 

उल्लेखनीय है कि आव्हाड ठाणे जिले के कलवा-मुंब्रा विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और यहाँ पिछले कुछ सप्ताह में कई लोग वायरस से संक्रमित पाए गए हैं। उन्होंने कुछ दिन पहले लोगों से घर में रहने की अपील करते हुए कहा था कि ऐसा नहीं करने पर इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। आव्हाड खुद को क्वारंटाइन करने वाले राज्य के पहले मंत्री हैं। बता दें कि देश में कोरोना वायरस से सबसे अधिक प्रभावित राज्य महाराष्ट्र है। यहाँ अब तक लगभग 2000 से अधिक कोरोना पॉजिटिव मामले आ चुके हैं। जबकि 120 लोग ऐसे हैं, जिनकी इस कारण मौत हुई।

लेफ्टिस्ट प्रोपेगेंडा वेबसाइट The Quint ने अपने 45 एम्प्लॉई को अनिश्चितकाल के लिए बिना वेतन के छुट्टी पर भेजा

चरमपंथी लेफ्टिस्ट प्रोपोगंडा वेबसाइट The Quint ने अपने 45 एम्प्लॉई को वुहान कोरोना वायरस के चलते अनिश्चित काल तक के लिए अवैतनिक अवकाश पर भेज दिया है। प्रोपोगंडा वेबसाइट ने जिन जिन को अवैतनिक अवकाश पर भेजा है उनमें रिपोर्टर्स हैं, कॉपी एडिटर्स हैं, एक ब्यूरो चीफ है, प्रॉडक्शन स्टॉफ है और पूरी टेक्नोलॉजी टीम है।

टीम को इस बात की सूचना ईमेल के जरिए सोमवार को दी गई, जो OpIndia के पास है। इन एम्प्लॉई को 15th अप्रैल से ‘फरलो’ पर अनिश्चित काल तक के लिए भेज दिया गया है।

ईमेल कहती है, “अगले कुछ हफ्तों में भारत इस कोरोना COVID-19 महामारी के खिलाफ लड़ाई में बहुत बुरा प्रदर्शन करने वाला है या चमत्कारिक ढंग से बच निकलेगा, अभी कोई नहीं कह सकता। दूसरी बात कोरोना महामारी के चलते जिस तरह से शट डाउन है लॉकडाउन है इसने एक आर्थिक तूफान के केंद्र में हमें ला दिया है। यह एक अप्रत्याशित दोहरी मार के समान है।”

“हमने कभी ऐसा विश्व नहीं देखा जहाँ उपभोक्ता व्यय 50% कम हो गई हो, जहाँ सालों में बने एसेट्स की वैल्यू कुछ दिनों में मिट्टी में मिल जाती हो। हमें बिलकुल नहीं पता यह सब कहाँ खत्म होगा।

ईमेल आगे जोड़ती है, “इन स्थितियों में यह साफ़ है कि अगले 3-4 महीनों के दौरान हमारे राजस्व स्रोत बेहद दबाव में होंगे। इस समय किसी के लिए भी प्राथमिक उद्देश्य होने चाहिए- a. सभी स्वस्थ रहें। b. आपके इस तरुण संगठन को इस दौरान बचाये रखना जिससे, भविष्य में लड़ाई लड़ी जा सके।”

“यह सिर्फ तभी हो सकता है जब हम इमरजेंसी एक्शन लें और ऐसे कदम उठाएँ जो सिर्फ ‘rarest of rare’ परिस्थितियों में उठाए जाते हैं, ऐसे कदम जो शायद हमें संकुचित करने वाले हों, पर इस कठिन समय में वो हमारे सर्वाइवल के लिए मददगार हो सकतें हैं।”

The Quint ने दावा किया कि वह अपने एम्प्लॉई को अनिश्चितकाल के लिए अवैतनिक अवकाश पर भेज कर खुश नहीं है, और वह अपने इन एम्प्लॉई की हमेशा शुक्रगुजार रहेगी। The Quint के अलावा दूसरे मीडिया संगठनों से भी कोरोना वायरस के चलते फरलो और नौकरी से निकाले जाने की खबरें आ रहीं हैं।

बहुत सारे लोगों ने इस महामारी के चलते अपनी नौकरियाँ गँवाईं हैं और आशंका है कि जैसे-जैसे ये संकट बढ़ेगा और लोग भी नौकरियाँ खो सकते हैं।

राहुल की चेतावनी पर 23 मार्च तक क्या कर रहे थे कमलनाथ: मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान

देश एक तरफ कोरोना संक्रमण के खिलाफ लड़ रहा है वहीं मध्य प्रदेश में इस दौरान भी राजनीति थमने का नाम नहीं ले रही। पहले जहाँ मध्य प्रदेश के हाल फिलहाल तक मुख्यमंत्री रहे कमलनाथ ने राहुल गाँधी की चेतावनी का हवाला देते हुए, राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर निशाना साधा था। आज सोमवार को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने उन्हें उसी भाषा में पलट कर जवाब दिया है।

 
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज कहा कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि ऐसे संकट के समय में भी इस प्रकार की गंदी राजनीति होगी। उन्होंने कहा, “कमलनाथ ने कहा था कि राहुल गाँधी ने इसे लेकर (#COVID19) 12 फरवरी को ही चेताया था। उस समय सीएम कौन था? 23 मार्च तक उन्होंने आखिर क्या किया? क्या कोई इतना स्वार्थी हो सकता है कि वह अब काम करना सिर्फ इसलिए बंद कर दे क्योंकि वह अब मुख्यमंत्री नहीं है।”

इससे पहले 12 अप्रैल को कमलनाथ ने केंद्र की भाजपा सरकार पर जोरदार हमला बोलते हुए, केंद्र सरकार पर आरोप लगाया था कि उसने एमपी की कॉन्ग्रेस सरकार को गिराने के लिए कोरोना महामारी के खिलाफ एक्शन लेने में कोताही दिखाई।

कमलनाथ ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मीडिया से बात करते हुए आरोप लगाया कि भाजपा ही इस कोरोना संक्रमण से पैदा हुई स्थिति के लिए जिम्मेदार है, क्योंकि उसने संसद को इस दौरान भी चलाये रखा जिससे मध्य प्रदेश विधानसभा भी चलती रहे और उनकी सरकार गिराई जा सके।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार घटनाओं की क्रोनोलॉजी समझाते हुए उन्होंने कहा कि फरवरी तक कोरोना संक्रमण COVID-19 के सिर्फ तीन केस थे, सरकार ने लॉकडाउन लगाने में देर की और कोरोना वायरस केसेस की संख्या 175 गुना बढ़कर 536 हो गई। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कमलनाथ ने यह भी कहा कि आने वाले कुछ ही दिनों में भाजपा और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच उनकी सरकार गिराने के बदले जो डील हुई है वह भी सामने आ जाएगी। कमलनाथ ने साथ ही दावा किया कि जिन 24 सीटों पर उपचुनाव होने वाले हैं वो आसान नहीं होंगे।

5 बच्चों की लाश पर फैलाया प्रोपेगंडा: सलीम सिद्दीकी और हंसराज मीणा समेत कई अन्य पत्रकारों के खिलाफ FIR

उत्तर प्रदेश के भदोही में 5 बच्चों की मौत की खबर को गलत तरीके से पेश करने के आरोप में हंसराज मीणा, जनवाणी के पत्रकार सलीम अख्तर सिद्दीकी, IANS के संपादक व रिपोर्टर और ‘बिजनेस इनसाइडर’ के संपादक व रिपोर्टर के विरुद्ध भदोही पुलिस स्टेशन नें धारा 188, 505(1)(b) IPC, धारा 51,54 DM ACT के अंतर्गत एफआईआर पंजीकृत कराया गया है। ये एफआईआर अधिवक्ता प्रशांत पटेल उमराव ने दर्ज कराया है। उन्होंने ख़ुद सोशल मीडिया के माध्यम से इस बात की जानकारी दी और एफआईआर की पुष्टि की।

बता दें कि रविवार (अप्रैल 12, 2020) की सुबह एक खबर आई कि उत्तर प्रदेश के भदोही में एक महिला मंजू देवी ने अपने पाँच बच्चों को नदी में डुबाकर मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद प्रोपेगेंडा फैलाने वालों का समूह सक्रिय हो गया और उन्होंने इसे लॉकडाउन की विफलता घोषित कर दिया। बिना सच्चाई को जाने सरकार का अंध विरोध करना तो इनका जैसे रोज का काम है। इसी कड़ी में इन्होंने एक बार फिर से इस घटना पर ‘दुख’ व्यक्त किया, साथ ही महिला को गरीब बताते हुए उनके प्रति अपनी ‘सहानुभूति’ दिखाई। इस मामले पर आगे समझने से पहले देखें एफआईआर की कॉपी:

भदोही थाने में प्रपंच फैलाने वालों के ख़िलाफ़ एफआईआर

सीरियल फर्जी न्यूज पेडलर, आम आदमी पार्टी के पूर्व सदस्य और सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने आउटलुक की एक खबर शेयर करते हुए दावा किया कि महिला ने उत्तर प्रदेश की गंगा में अपने पाँच बच्चों को इसलिए डुबा दिया क्योंकि लॉकडाउन की वजह से उसका काम छीन गया था और इस कारण वे अपने बच्चों को खाना नहीं खिला पा रही थी। इसलिए तंग आकर उसने इस वारदात को अंजाम दिया।

हालाँकि, सच इनके प्रोपेगेंडा से कोसों दूर है। महिला ने अब खुद इस वारदात को अंजाम देने के पीछे की वजह बताते हुए लिबरलों की बोलती बंद कर दी है। महिला से जब पूछा गया कि उसने ऐसा कदम क्यों उठाया तो उसने कहा कि उसका पति से किसी बात को लेकर झगड़ा हुआ था। आए दिन वे मारते पीटते थे। जिसके चलते उसने ऐसा निर्णय लिया। इससे पहले पुलिस अधीक्षक राम बदन सिंह ने भी कहा था कि मंजू ने उन्हें बताया कि उसने अपने पाँचों बच्चों को इसलिए गंगा में डुबोकर मार डाला, क्योंकि उसका पति कई साल से उससे हर रोज झगड़ा करता था। 

प्रशांत पटेल उमराव ने दर्ज कराया एफआईआर

इसके अलावा भदोही पुलिस ने भी इस बारे में महिला के बयान का वीडियो ट्वीट करते हुए लिखा, “मंजू देवी ने अपने 5 बच्चों को भूखमरी के कारण गंगा नदी में नहीं डुबाया है। अन्य कारण द्वारा घटना को अंजाम दिया गया है। मंजू देवी के बयान से स्पष्ट है कि भूखमरी के कारण बच्चों को नदी में नहीं डुबाया गया है।”भदोही पुलिस अधीक्षक ने बताया कि मंजू देवी अपने पति के विवाद एवं मानसिक तनाव के कारण अपने पाँचों बच्चों को गंगा नदी में डुबो दिया।

पिछले 14 दिनों से 15 राज्यों के 25 जिलों से कोरोना का कोई नया केस नहीं: स्वास्थ्य मंत्रालय

जमातियों द्वारा देश के कोने-कोने में कोरोना महामारी फैलाते जाने की भयावह और दुखद खबरों के बीच आज एक अच्छी खबर आई है। स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने आज सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेन्स में जानकारी दी कि 15 राज्यों के 25 जिलों में कोरोना का कोई नया केस सामने नहीं आया है। ये वैसे 25 जिले हैं, जिनमें कोरोना संक्रमित केस पाए गए थे।

पिछले दो हफ्तों से इन जिलों से कोई नया केस सामने न आना दर्शाता है कि यदि कोरोना के खिलाफ इन जिलों में यूँ ही सतर्कता बरती जाती रही तो उम्मीद है कि ये 25 जिले कोरोना के खिलाफ जंग में जीत हासिल कर लेंगे। लव अग्रवाल ने यह भी बताया कि इन जिलों में आगे कोई नया केस नहीं आए इसके लिए सारे कदम उठाए जा रहे हैं।

स्वास्थ्य मंत्रालय के जॉइंट सेक्रेटरी लव अग्रवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इन जिलों के नाम गिनाते हुए कहा (जिले के नामों की सूची अंत में है), “जब यहाँ कोरोना पॉजिटिव केस आए तो जिला प्रशासन ने कंटेनमेंट स्ट्रैटिजी के अनुसार काम किया। जिसके परिणाम हमें दिखने लगे हैं लेकिन अभी भी आवश्यकता है कि हम अपनी विजिलेंस उसी एनर्जी के साथ बनाए रखें। हम यह सुनिश्चित करें कि आनेवाले दिनों में इन जिलों में पॉजिटिव केस ना आएँ।”

संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेन्स में आगे कहा कि हम हर स्तर पर अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं और तकनीकी की मदद से लाइव केस ट्रैकिंग, केस प्रबंधन और उसको रोकने के कन्टेनमेंट प्लान को लागू करने के साथ-साथ उसकी मॉनिटरिंग भी कर रहे हैं।’

इस प्रेस कॉन्फ्रेन्स में लव अग्रवाल ने देश में कोरोना से संबंधित नवीनतम आँकड़ा भी सामने रखा। उन्होंने बताया कि देश में अबतक कोरोना संक्रमित कुल मामलों की संख्या 9352 हो गई है जिसमें से 980 ठीक हो चुके हैं जबकि 8048 एक्टिव केसेस हैं। इसके अलावा देश में अबतक कोरोना संक्रमण से मरने वालों की संख्या 324 हो चुकी है। लव अग्रवाल ने बताया कि पिछले 24 घंटों में कोरोना संक्रमित 905 नए मामले सामने आए हैं जबकि 51 मौतें हुईं हैं।

देश में कोरोना वायरस से निपटने और लॉकडाउन की स्थिति को लेकर सोमवार को हुई स्‍वास्‍थ्‍य और गृह मंत्रालय की संयुक्‍त प्रेस कांफ्रेंस में यह भी बताया गया कि कोरोना के खिलाफ इस लड़ाई में नेशनल कैडेट कोर्ड की भी मदद ली जा रही है। इसमें अब तक 50 हजार से ज्यादा लोगों ने वॉलंटियर किया है। इन सबके अतिरिक्त अब तक 30 करोड़ से अधिक लोगों को 28256 करोड़ रुपए की आर्थिक मदद भी दी गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार गृह मंत्रालय की संयुक्‍त सचिव पुण्‍य सलिला श्रीवावास्‍तव ने यह भी जानकारी दी कि ट्रकों और गुड्स कैरियर की इंटर स्टेट या इंट्रा स्टेट की आवाजाही पर कोई रोक नहीं है। आवश्यक वस्तुओं के साथ-साथ सभी प्रकार का सामान ट्रांसपोर्ट हो रहा हो। ट्रक में ड्राइवर के अलावा एक और व्यक्ति की छूट है।

पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने बताया कि लॉकडाउन उपायों को अच्छे ढंग से लागू करने के लिए सभी राज्य लगातार काम कर रहे हैं। जिसमें सेवानिवृत्त कर्मी, एनएसएस (राष्ट्रीय सेवा योजना), एनसीसी कैडेट और अन्य डिपो के अधिकारी भी पुलिस की सहायता कर रहे हैं।

इस दौरान मौजूद रहे भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के रमन आर गंगाखेडकर ने बताया कि कल तक हमने कोरोना वायरस यानी COVID-19 के 2,06,212 टेस्‍ट किए हैं और जिस प्रकार से हम टेस्‍ट कर रहे हैं, हमें इस संबंध में चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके अलावा उन्होंने बताया कि अभी भारत के पास अगले 6 हफ्ते तक के लिए टेस्टिंग का पर्याप्त स्टॉक है तथा चीन से भेजी गई COVID-19 किट की पहली खेप भी 15 अप्रैल तक भारत आ जाएगी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ये हैं वो 25 जिले जिन में 14 दिनों से कोरोना संक्रमण का कोई नया केस सामने नहीं आया- गोंदिया-महाराष्ट्र, राजनांदगांव, दुर्ग और विलासपुर- छत्तीसगढ़, देवनगिरि, उडुपी, तुमकुरु और कोडगू- कर्नाटक, वायनाड और कोट्टायम- केरल, वेस्ट इम्फॉल- मणिपुर, साउथ गोवा-गोवा, राजौरी- जम्मू-कश्मीर, आइजोल वेस्ट-मिजोरम, माहे-पुडुचेरी, एसबीएस नगर-पंजाब, पटना, नालंदा, मुगेर-बिहार, प्रतापगढ़- राजस्थान, पानीपत, रोहतक, सिरसा-हरियाणा, पौड़ी गढ़वाल- उत्तराखंड, भद्राद्रि कोट्टागुड़म- तेलंगाना

1.25 लाख लोगों को भोजन, 30000 परिवारों की मदद: दूसरे मजहबों के लिए भी फरिश्ता बन कर आया RSS

मुंबई में ग़रीबों के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ फरिश्ता बन कर आया है। ताबड़तोड़ राहत-कार्य चलाया जा रहा है। वैश्विक महामारी की आपदा के बीच संघ के स्वयंसेवक सड़कों पर ज़रूरतमंदों की मदद कर रहे हैं। यहाँ तक कि मजहब विशेष और ईसाइयों को भी संघ से ख़ूब मदद मिल रही है। मुंबई कोरोना से सबसे ज्यादा ग्रस्त महानगर है। यहाँ जितने मामले अकेले हैं, उतने किसी अन्य राज्य में भी नहीं हैं। ऐसे में संघ ने लॉकडाउन के पहले ही दिन 30 कम्युनिटी किचेन बना कर जनसेवा का कार्य शुरू कर दिया था।

रोज 1 लाख पैकेट से भी ज्यादा भोजन बाँटा जा रहा है। ग्रोसरी के भी 28000 से अधिक पैकेट रोज बाँटे जा रहे हैं। ख़ासकर मुंबई के ट्राइबल क्षेत्रों में आरएसएस ज्यादा ध्यान दे रही है। पूरे मुंबई में कुल 120 डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर्स बनाए गए हैं। अब तक संघ 1.25 लाख लोगों तक अपनी सेवाएँ दे चुका है। कुल 30 हज़ार परिवारों को मदद दी गई है। 2000 से भी अधिक संघ स्वयंसेवक सड़कों पर राहत-कार्य में जुटे हुए हैं। यहाँ तक कि रोज 18,000 लोगों के नाश्ते और चाय का भी प्रबंध किया जा रहा है।

संघ उनका भी ख्याल रख रहा है, जो कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई में फ्रंटलाइन पर हैं। ट्रैफिक पुलिस, बेस्ट के बस कर्मचारियों और बीएमसी के कर्मचारियों के बीच 12,000 से भी अधिक मास्क और सैनिटाइजर बाँटे। काफ़ी सारे अस्पतालों के डॉक्टरों को भी भोजन मुहैया कराने का काम संघ ने किया है। रोगियों के लिए ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था की गई है। 1500 से भी अधिक घरों और मंदिरों को सैनिटाइज किया गया है। 205 लोगों ने ब्लड डोनेशन भी किया है। वरिष्ठ नागरिकों का संघ ख़ास ख्याल रख रहा है। आरएसएस की जन-कल्याण समिति ने ऑन-ड्यूटी कर्मचारियों की देखरेख का जिम्मा उठाया हुआ है।

संघ मुंबई के कई एनजीओ के साथ मिल कर काम कर रहा है। ट्राइबल क्षेत्रों में बेघर लोगों और ग़रीबों पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। मजहब विशेष और ईसाईयों की भी मदद की जा रही। कुल मिला कर देखें तो बिना मजहब और ऊँच-नीच का भेद किए संघ लगातार सबकी सेवा में तत्पर है। विश्व हिन्दू परिषद् सहित कई संगठन इस काम में संघ की लगातार मदद कर रहे हैं। अब तक ब्लड डोनेशन के बाद 205 बोतल ब्लड भी रोगियों के लिए रखे गए हैं। ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों की भी मदद की जा रही है।

हिन्दू घृणा से सने कॉन्ग्रेसी मुखपत्र नेशनल हेराल्ड ने तबलीगी जमात का बचाव करते हुए हिन्दुओं के खिलाफ कीं भौंडी टिप्पणी

कॉन्ग्रेस के मुखपत्र नेशनल हेराल्ड ने जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सोशल मेडिसिन एंड कम्युनिटी हेल्थ में असिस्टेंट प्रोफेसर विकास वाजपेयी द्वारा लिखा एक लेख प्रकाशित किया है। इसमें तबलीगी जमात को उसके सारे अपराधों से मुक्त करते हुए, राजनीतिक पार्टियों पर उन्हें बदनाम करने और अपनी नाकामियों का ठीकरा तबलीगी जमात के सिर फोड़ने का आरोप लगाया गया है।

सिर्फ यहीं न रुक कर लेखक हिन्दू समुदाय पर भी हमला करने से नहीं चूका, इस पूरे लेख के दौरान जहाँ वह अपनी हिन्दूफ़ोबिक मानसिकता का भौंडा प्रदर्शन करता नजर आता है वहीं इस्लामिक मिशनरी संगठन का बचाव करता दिखता है।

यह आर्टिकल वुहान वायरस संक्रमण के लिए पूरी तरह से सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए, दावा करता नजर आता है कि इसके लिए निजामुद्दीन मरकज में हुए तबलीगी जमात कार्यक्रम को दोषी ठहराना अन्याय होगा। यह कहने की जरूरत नहीं कि हालाँकि इस आर्टिकल की हेडलाइन “तबलीगी जमात पर पैदा किया गया उन्माद, उल्टा पड़ा” है लेकिन यह आर्टिकल कहीं भी इस हेडलाइन के पक्ष में सही तर्क प्रस्तुत करता नजर नहीं आता।

स्रोत: तबलीगी जमात का बचाव और हिन्दुओं पर हमलावर होता, कॉन्ग्रेस मुखपत्र नेशनल हेराल्ड

लेख में दावा किया गया- तबलीगी जमात पर दोषारोपण करना जितना आसान है कि उसने 13 मार्च से 15 मार्च के बीच मरकज में धार्मिक कार्यक्रम क्यों आयोजित किया, उतना ही आसान है यह भूल जाना कि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने 13 मार्च को ऑन रिकॉर्ड यह कहा था कि देश में कोरोना वायरस न ही हेल्थ इमरजेंसी है न ही राष्ट्रीय इमरजेंसी। मरकज में शामिल होने वालों पर आरोप लगाना आसान है कि उन्होंने 15 मार्च के बाद जलसे को छोड़ा क्यों नहीं, और यह भूल जाना और भी आसान कि उस समय सरकार कितने अलग-अलग प्रकार की दुविधा भरी भाषा में बोल रही थी, कितनी अव्यवस्था का माहौल था।

लेखक ने केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार पर हमला करने के लिए बराबर मौके तलाशे लेकिन तबलीगी जमात की घृणात्मक कारगुजारियों पर चुप्पी साध गया।

इस पूरे लेख में लेखक ‘गोदी मीडिया’ और ‘गोबर पॉलिटिक्स’ कहते नहीं अघाता, हालाँकि, एक बार भी उसके मुँह से यह न फूटा कि ऑथॉरिटीज से बचने के लिए तबलीगी जमात के लोगों से जो कुछ भी बन सकता था, उन्होंने वो सब किया। यह बड़ा उलझाने वाला है कि किस प्रकार लेखक हिन्दू समुदाय पर भौंड़े कमेंट करते हुए भी इस्लामिक मिशनरी संगठन के सारे पापों को धोता हुआ नजर आता है। लेखक के कट्टर साम्प्रदायिक वर्ल्ड व्यू का उदाहरण इस बात से मिलता है कि वह इस पूरे मामले में हिंदू समुदाय को भी घसीट लाता है जिससे हिन्दू समुदाय का कोई संबंध ही नहीं। ऐसा लगता है कि पंथनिरपेक्षता को बनाए रखने के लिए मुस्लिम कट्टरपंथियों का बचाव करने के साथ-साथ हिन्दू समाज को जलील करना अनिवार्य शर्त है।

लेखक ने इस तथ्य को रेखांकित करना जरूरी नहीं समझा कि जमातियों ने स्वास्थ्य कर्मियों से बिलकुल भी सहयोग नहीं किया और कुछ जगहों पर वे महिला स्टॉफ तथा नर्सों के प्रति यौनिक हमलावर की भूमिका में देखे गए। वो नखरे दिखाते और इस कोरोना वायरस को फैलाने की मंशा से थूकते भी देखे गए। सरकारी दिशा-निर्देशों की धज्जियाँ उड़ाते हुए एक बड़ी भारी संख्या में इकट्ठे होना इनके आपराधिक कारगुजारियों की फेहरिश्त में पहली कड़ी ही थी। जमातियों की क्रियाविधि तबसे बदतर ही होती गई है।

लेख दावा करता है कि वहाँ ‘बेहद कमी’ है PPE की, जबकि सरकार लगातार स्पष्टीकरण देती घूम रही कि अभी वर्तमान में किसी भी मेडिकल उपकरण आदि की कोई कमी नहीं है। वो लिखता है, “कैसे हमने सोच लिया कि तबलीगी जमात के लोग और माइग्रेंट खुद से सरकार के सामने आएंगे जबकि उन्हें अस्पताल में और बीमार हो जाने का भय हो? उन्हें सरकारी एजेंसियों ने जिस तरह से विलेन के रूप में पेश किया है इसके बाद तो दूसरों को भी इनकी चिंता होना शुरू हो गई है।”

यहाँ यह बताने की आवश्यकता है कि माइग्रेंट्स ने कभी भी खुद को सरकारी एजेंसियों से छुपाने की कोशिश नहीं की। सच तो यह है कि वे बड़ी मुश्किल में हैं इसलिए वो हर जगह खुद से सामने आए, जिनकी सहायता में राज्य और केंद्र सभी सरकारों ने वो सभी प्रकार की सहायता उन्हें मुहैया कराई जिसकी उन्हें जरूरत थी। इस प्रकार से जमातियों को माइग्रेंट्स के साथ एक खाने में रखना बदनीयती के अलावा कुछ नहीं समझा जाना चाहिए।

इसके अतिरिक्त जमाती सरकारी एजेंसियों से भी सहयोग नहीं कर रहे। जमातियों के कारनामों के लिए सरकार और मीडिया को दोषी ठहराना, जानबूझकर साजिशन इस्लामिक मिशनरी संगठन के साम्प्रदायिक विचारों से हमारा ध्यान हटाने भर की कोशिश है। निज़ामुद्दीन मरकज का मौलाना साद लगातार यह संदेश देता रहा कि वुहान कोरोना वायरस इस्लाम के खिलाफ साजिश है और सोशल डिस्टेंसिंग की जरूरत के समय शारीरिक निकटता की जरुरत पर बल देता रहा। जाहिल मौलाना सिखाता रहा कि यदि 70,000 देवदूत मिलकर मुस्लिमों को नहीं बचा सकते तो फिर डॉक्टर क्या बचाएंगे?

इस स्थिति में सरकार और मीडिया को दोषी ठहराना सफेद झूठ के सिवाय कुछ नहीं। लेखक यह भी दावा करता है- अगर आधिकारिक आँकड़ों पर भरोसा किया जाए तो कोरोना महामारी के चलते आई आपदा में भारत अभी उन देशों से बहुत पीछे है जो इस महामारी से बेहाल हैं जबकि भारत की आबादी कोरोना महामारी से बर्बाद बेहाल हुए देशों की अपेक्षा कहीं ज्यादा है, सिवाय चीन के अपवाद को छोड़कर। हालाँकि, किसी देश में मरीजों को दोषी नहीं ठहराया गया जैसे कि भारत में हो रहा। यहाँ लेखक बड़ी चालाकी से दक्षिण कोरिया का नाम भूल जाता है जिसने एक ईसाई ग्रुप को कोरोना वायरस संक्रमण के लिए दोषी ठहराया है।

तबलीगी जमात का टाइम बम पूरे देश में तब फटा जब मार्च के आखिरी हफ्ते में मरकज निजामुद्दीन और उसके आसपास के इलाकों से कोरोना वायरस के लक्षण वाले करीब 200 लोगों को दिल्ली के अलग अलग अस्पतालों में भर्ती करवाया गया। जिसके बाद मरकज के आसपास का इलाका दिल्ली पुलिस ने सील कर दिया। जल्दी ही पूरे देश से तबलीगी जमात से जुड़े हुए कोरोना संक्रमण के मरीज सामने आने लगे और देश इस जमात के कारण फैले संक्रमण से आतंकित होने लगा। लेकिन इसके बाद भी मीडिया का एक हिस्सा और राजनीतिक धड़ा कुतर्कों का सहारा लेते हुए इस्लामिक मिशनरी संगठन के पापों को धोने में लिप्त है। वहीं नेशनल हेराल्ड जैसों को लगता है कि आगे की राह हिन्दुओं के प्रति घृणा फैलाने से ही तय होने वाली हैं।

43 देशों के लिए फरिश्ता बना भारत, तय की 28000 विदेशी नागरिकों की सकुशल घर वापसी

कोरोना वायरस की आपदा आने के बाद भारत ने न सिर्फ़ देश में रह रहे नागरिकों की सुरक्षा के लिए क़दम उठाए बल्कि विदेश में रह रहे भारतीयों को भी वापस लाने के लिए सब कुछ किया। इसके अलावा भारत में फँसे विदेशियों को भी घर पहुँचाया। आँकड़ों के मुताबिक, अब तक भारत सरकार ने 43 देशों के 28 हज़ार से भी अधिक विदेशी नागरिकों को बाहर निकाल कर वापस उनके घर भेजने में सफलता प्राप्त की है। ये आँकड़े मध्य मार्च से लेकर 11 अप्रैल तक के हैं। साथ ही लॉकडाउन के बीच भी भारत सरकार ने विदेश में फँसे भारतीयों को वापस लाने का काम जारी रखा।

जिन विदेशियों को उनके घर पहुँचाया गया, उनमें 1200 अमेरिकी, 1400 कैनेडियन, 3000 जापानी और 2000 ब्रिटिश शामिल हैं। इसके अलावा यूरोप के भी कई लोगों को सकुशल उनके घर भेजा गया। इसके लिए मोदी सरकार ने चार्टर्ड और स्पेशल फ्लाइट्स की व्यवस्था की। इनमें दूसरे देशों ने भी अपने नागरिकों को निकालने के लिए फ्लाइट्स का इंतजाम किया। गल्फ देशों, यूरेशिया और पड़ोसी देशों के लोगों को निकाला गया। चुनौती यह थी कि अधिकतर विदेशी पर्यटक बड़े शहरों से काफ़ी दूर फँसे हुए थे।

सिंगापुर के 700 लोगों को वापस उनके घर भेजा गया। 3000 मलेशिया के लोगों के सकुशल वापसी की व्यवस्था की गई। बहुत सारे मलेशियन दक्षिण भारत में भी फँसे हुए थे। 400 ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों की वापसी की व्यवस्था की गई। हाल ही में 444 ऑस्ट्रेलियाई लोगों को एक विशेष फ्लाइट से मेलबर्न भेजा गया। इनमें 14 न्यूजीलैंड के लोग भी शामिल थे। क़रीब 6000 ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों ने इंडियन मिशन के पास डिप्लोमैटिक हेल्प के लिए आवेदन किया था।

इजरायल, ब्राजील और अमेरिका के राष्ट्राध्यक्षों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की है क्योंकि उन देशों को कई ज़रूरी चीजें भारत ने मुहैया कराई। इनमें दवाएँ भी शामिल हैं। ‘वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन’ ने भी भारत सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों को सराहा है।

जहाँ हुआ जलियाँवाला नरसंहार, 8 महीने बाद कॉन्ग्रेस ने वहीं क्यों रखा अधिवेशन: 2 फाइल, एक लेटर में छिपा है राज

अखिल भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस का 34वाँ अधिवेशन अमृतसर में बुलाया गया था। पहले दिन यानी 27 दिसंबर, 1919 को मोतीलाल नेहरू ने अध्यक्षीय भाषण दिया, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश शासन की शान में खूब तारीफ की। उस दौरान जॉर्ज फ्रेडेरिक (V) यूनाइटेड किंगडम के राजा और भारत के सम्राट कहे जाते थे। उनके उत्तराधिकारी प्रिंस ऑफ़ वेल्स, एडवर्ड अल्बर्ट (VIII) का 1921 में भारत दौरा प्रस्तावित था। अधिवेशन में मोतीलाल ने सर्वशक्तिमान भगवान से प्रार्थना करते हुए भारत की समृद्धि और संतोष के लिए एडवर्ड की बुद्धिमानी और नेतृत्व की सराहना की। अपने भाषण के माध्यम से वे ब्रिटिश शासन की उदारता और अपनी निष्ठा का भी जिक्र करना नहीं भूले।

अधिवेशन के अलावा उन दिनों अमृतसर सुर्खियों में लगातार बना हुआ था क्योंकि 13 अप्रैल, 1919 को इस शहर में ही जलियाँवाला बाग नरसंहार हुआ था। यह घटना जितनी अमानवीय थी, उससे ज्यादा शर्मनाक भी थी। जब एक तरफ ब्रिटिश साम्राज्य की मोतीलाल स्तुति कर रहे थे तो ब्रिटेन की संसद में डायर को ‘क्षमतावान’ अधिकारी बताया जा रहा था। दरअसल 19 जुलाई, 1920 के ब्रिटिश संसद में एक प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान बताया गया कि डायर ने ‘कुशलता और मानवता के गुणों से अत्यंत प्रभावित किया है’। इससे ज्यादा नृशंस नजरिया क्या हो सकता है, जबकि कॉन्ग्रेस ने इस पूरे मामले पर चुप्पी साध ली।

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ब्रिटिश भारत का यह क्रूरतम अध्याय यहीं खत्म नही होता। भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार की होम पॉलिटिकल विभाग की फ़ाइल संख्या जनवरी 1920/77 के अनुसार कॉन्ग्रेस ने अमृतसर को अपने अधिवेशन के लिए जानबूझकर चुना, जिससे एक खास राजनैतिक मकसद को पूरा किया जा सके। दस्तावेज के अनुसार जवाहरलाल नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस उन खूनी धब्बों से ब्रिटिश सरकार को बचाने का प्रयास कर रही थी, जिनके निशान आजतक अमृतसर में मौजूद हैं।

उपरोक्त फ़ाइल में एक पत्र है, जो कॉन्ग्रेस के एक सदस्य ने अमृतसर के उप-आयुक्त को लिखा था। उसमें उन्होंने सुझाव दिया कि अमृतसर में कॉन्ग्रेस का अधिवेशन दोनों (ब्रिटेन और कॉन्ग्रेस) के हितों के लिए जरूरी है। उस कॉन्ग्रेस सदस्य ने लिखा है कि अगर ब्रिटिश सरकार कॉन्ग्रेस को अधिवेशन की अनुमति देती है तो इससे जनता के बीच सरकार की छवि में सुधार होगा।

जलियाँवाला बाग नरसंहार पर ब्रिटिश सरकार ने 1920 में डिसऑर्डर इन्क्वायरी कमिटी की रिपोर्ट प्रकाशित की। जिसमें बताया गया है कि 13 अप्रैल, 1919 को 5,000 से ज्यादा लोग वहाँ मौजूद थे। डायर के साथ 90 लोगों की फौज थी, जिसमें 50 के पास राइफल्स और 40 के पास खुरकियाँ (छोटी तलवारें) थी। वे लगातार, बिना चेतावनी के, 10 मिनट तक गोलियाँ चलाते रहे। इस घटना के बाद डायर ने लिखित में बताया कि जितनी भी गोलियाँ चलाई गईं, वह कम थी। अगर उसके पास पुलिस के जवान ज्यादा होते तो जनहानि भी अधिक होती।

नरसंहार में कितने निर्दोष भारतीयों का बलिदान हुआ, आजतक इसकी कोई ठोस जानकारी नहीं है। हालाँकि, राष्ट्रीय अभिलेखागार में होम पोलिटिकल विभाग की फाइल संख्या 23-1919 में इस संबंध में एक चौकाने वाली जानकारी मिलती है। फाइल के अनुसार एक ब्रिटिश अधिकारी जेपी थॉमसन ने एचडी क्रैक को 10 अगस्त, 1919 को एक पत्र में लिखा, “हम इस स्थिति में नहीं हैं, जिसमें हम बता सकें कि वास्तविकता में जलियाँवाला बाग में कितने लोग मारे गए।”

इस प्रकार के भयावह तथ्यों के बावजूद भी ब्रिटिश भारत में जलियाँवाला बाग नरसंहार का उपयोग कॉन्ग्रेस ने अपने निजी फायदे के लिए किया। बाद में जवाहर लाल नेहरू ने नरसंहार को कॉन्ग्रेस का एक ‘उपक्रम’ बना दिया। विभाजन के बाद जलियाँवाला बाग ट्रस्ट को वैधानिक रूप दिया जाना प्रस्तावित किया गया।

प्रधानमंत्री नेहरू चाहते थे कि इसका विधेयक संसद के समक्ष प्रस्तुत न करके मंत्रिमंडल से ही पारित हो जाए। वे 11 मार्च, 1950 को लिखते हैं, “मैं चाहता हूँ कि इस विधेयक के मसौदे को जलियाँवाला बाग मैनेजिंग कमिटी की बैठक में रखा जाए। उसके बाद, मुझे उसकी प्रति भेज दें। तब विधेयक को मंत्रिमंडल के समक्ष मंजूरी के लिए पेश किया जायेगा। जाहिर है इसे संसद के वर्तमान सेशन में नहीं रखा जा सकता, लेकिन यह मंत्रिमंडल के द्वारा पारित कराया जाएगा।” (भारत का राष्ट्रीय अभिलेखागार, गृह मंत्रालय, 16(11)-51 Judicial)

विधेयक के मसौदे पर एक भ्रम फैलाया जाता है कि इसे डॉ बीआर आंबेडकर ने तैयार किया था। दरअसल इसका मसौदा कॉन्ग्रेस के ही एक सदस्य टेकचंद ने बनाया था। आंबेडकर के पास तो यह समीक्षा के लिए 24 मार्च, 1950 को भेजा गया था। कुछ मामूली सुझावों के साथ उन्होंने इसे वापस भेज दिया।

जलियाँवाला बाग मेमोरियल ट्रस्ट बिल, 1950 में नेहरू के साथ सरदार पटेल भी न्यासी थे। एक्स-ऑफिसियो में पंजाब के राज्यपाल, पंजाब के मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष को रखा गया। इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार द्वारा पहले चार लोगों को नामांकित किया जा सकता था लेकिन अंत में यह संख्या तीन कर दी गई। इसके न्यासी जीवन भर के लिए पदाधिकारी बनाए गए। आखिरकार, संसद के समक्ष 7 दिसंबर, 1950 को विधेयक प्रस्तुत किया गया। तब तक सरदार पटेल बेहद अस्वस्थ हो गए थे। उनके स्थान पर पहले राजकुमारी अमृत कौर के नाम पर विचार किया गया। बाद में नेहरू के सुझाव पर डॉ सैफुद्दीन किचलू को न्यासी बनाया गया।

कॉन्ग्रेस ने इस पूरे मामले में अलोकतांत्रिक रवैया अपनाया और किसी अन्य दल, सामाजिक एवं राजनैतिक व्यक्ति से इस सन्दर्भ में चर्चा तक नहीं की। शुरुआत में विधेयक को संसद में न लाकर मंत्रिमंडल से ही पारित किया जाना था। बाद में प्रधानमंत्री नेहरू ने इसे संसद के समक्ष रखा तो इसमें सभी सदस्य कॉन्ग्रेस के ही थे। नियम तो यहाँ तक था कि कॉन्ग्रेस का जो भी अध्यक्ष होगा, वह ट्रस्ट का सदस्य होगा। यह विधान 1951 में लागू हुआ था, जिसे भारत सरकार ने 2018 में बदल दिया।