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‘मैं कोरोना हूँ, पूरे मोहल्ले में फैलाऊँगा’: घरों के सामने 10-10 रुपए के नोट के साथ मिला कागज का टुकड़ा

पूरी दुनिया में कोरोना महामारी के हाहाकार मचा हुआ। एक तरफ जहाँ डॉक्टर, पुलिस सहित आम जनता की सेवा में लगे रहने वाले लोग कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं, वहीं इस संवेदनशील समय में भी असामाजिक तत्व अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। कोरोना महामारी से जंग के बीच अफवाहों का दौर भी चरम पर है। कहीं थूक लगे हुए नोट मिल रहे हैं तो वहीं कहीं पर नोट के साथ पर्ची मिल रही है।

ताजा मामला उत्तर प्रदेश के बलिया का है। जहाँ पर इन असामाजिक तत्वों ने कई जगहों पर 10-10 रुपए के नोट के साथ पर्ची फेंकी है। इस पर्ची पर लिखा है, “मैं कोरोना हूँ, पूरे मोहल्ले में फैलाऊँगा।” इसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

बता दें कि चितबड़ागाँव थाना अंतर्गत नगर पंचायत के के वार्ड नंबर-13 जयप्रकाश नगर स्थित पोस्ट ऑफिस के पूरब स्थित गली में कई दरवाजों के बाहर 10 रुपए की नोट और कागज के कुछ टुकड़े बिखरे पड़े मिले। जिन पर लिखा था, “मैं कोरोना हूँ, पूरे मोहल्ले में फैलाऊँगा।” ग्रामीणों ने इसकी सूचना पुलिस को दी। सूचना मिलते ही मौके पर पहुँची पुलिस ने इसे गंभीरता से लेते हुए सभी नोटों और कागज के टुकड़ों को सुरक्षित तरीके से जब्त कर लिया है।

वहीं इस पूरे मामले पर बलिया पहुँचे आजमगढ़ के डीआईजी ने कहा कि इस घटना की जाँच कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। साथ ही अफवाह फैलाने वालों के खिलाफ बड़ा एक्शन लिया जाएगा। उनका कहना है कि शुरुआती जाँच में यह किसी की शरारत लग रही है। हालाँकि इसके पीछे की सच्चाई क्या है, यह जाँच के बाद स्पष्ट होगा। पुलिस इसकी जाँच करेगी। जाँच के क्रम में जो भी चीजें निकल कर सामने आएँगी, उसके आधार पर उचित कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

इसी तरह झारखंड के गढ़वा के लगमा खजूरी गाँव में 10-10 रुपए कई नोट फेंके मिलने के बाद इलाके में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। लोग तरह-तरह की बातें करने लगे। यह नोट किसने और कब फेंका, लोगों को पता नहीं चल पा रहा है। पुलिस के मुताबिक इन 10 रुपए वाली नोटों की कीमत लगभग सात से आठ हजार रुपए हैं। ऐसा लग रहा है कि किसी से गलती से गिर गया है। फिलहाल इसकी जाँच की जा रही है।

‘बिन लॉकडाउन दिल्ली में और बढ़ जाते कोरोना मामले, आँकड़े पहुँचते 50 हजार से 1 लाख’

देश में कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए लागू किए गए देशव्यापी लॉकडाउन पर कई बुद्धिजीवियों ने सवाल उठाए। ऐसे में केंद्र सरकार बार-बार बोलती रही कि इसके अलावा कोई चारा शेष नहीं था। लेकिन गिरोह के लोग नहीं माने। अब इसी मुद्दे पर दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने अपना बयान दिया। साथ ही बताया कि राष्ट्रीय राजधानी के लिए लॉकडाउन कितना आवश्यक था और अगर इसे लागू नहीं किया जाता तो दिल्ली में अब तक संक्रमितों की संख्या 1 लाख तक पहुँचने की संभावना थी। इसके अलावा सत्येंद्र जैन ने स्वास्थ्यकर्मियों के लिए उपलब्ध कराए जाने वाले सुरक्षा उपकरणों पर जानकारी दी और आने वाले समय में कोरोना जाँच के लिए निर्धारित लक्ष्य को भी बताया।

इंडिया टुडे को दिए साक्षात्कार में दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि अगर समय से पहले लॉकडाउन का फैसला नहीं लिया जाता तो फिर दिल्ली में अब तक संक्रमितों की संख्या 50 हजार से लेकर 1 लाख तक की होती। इतना ही नहीं, उन्होंने ये भी कहा कि दो हफ्तों के लिए लागू होने वाला लॉकडाउन कोरोना को फैलने से रोकने में काफी मददगार होगा।

उन्होंने इस बातचीत में बताया कि राष्ट्रीय राजधानी में अब तक 12000 लोगों का टेस्ट किया जा चुका है। जबकि आने वाले हफ्ते में उनका लक्ष्य 10 हजार लोगों का टेस्ट करना है। दिल्ली स्वास्थ्य मंत्री के अनुसार, कोरोना से लड़ने के लिए उनके पास पर्याप्त टीमें हैं, लेकिन वे रैपिड टेस्ट किट का इंतजार कर रही हैं। जिनमें बहुत जल्दी रिजल्ट आना मुमकिन होगा। ये प्रक्रिया सिर्फ़ 24 से 36 घंटे लेगी।

गौरतलब है कि कोरोना महामारी के मद्देनजर दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार एक साथ मिलकर काम करने से गुरेज नहीं कर रहे है। आप नेता ने स्वास्थ्यकर्मियों के लिए सुरक्षा उपकरण मुहैया कराने के मामले में बताया, “वर्तमान में हमारे पास 13,500 पीपीई किट हैं। हमने केंद्र से 37,000 पीपीई किट माँगी हैं, जो हमें अगले दो दिनों में मिलेंगी। इसके अलावा दिल्ली सरकार पीपीई किट भी बाजार से खरीद रही है। सरकार के पास अब केवल सात दिन का स्टॉक है। हमें अधिक पीपीई किट की आवश्यकता है, इसलिए हमने केंद्र से 2 लाख पीपीई किट की माँग की है। सरकार ने अलग से 1,40,000 पीपीई किट के ऑर्डर भी रखे हैं।”

बता दें कि भारत में इस समय कोरोना के मरीजों का आँकड़ा 8,988 तक पहुँच गया है। लेकिन फिर सवाल उठाने वाले लॉकडाउन की महत्ता को मानने से न केवल इंकार कर रहे हैं। बल्कि उसके ख़िलाफ़ बोलते हुए एक अलग ही लीक पर चल रहे हैं। बीते दिनों की बात करें तो मीडिया गिरोह के बुजुर्ग सदस्य विनोद दुआ ने सारी स्थिति को जानते समझते-परखते हुए लॉकडाउन पर सवाल उठाए थे। उन्होंने अपनी वीडियोज में लॉकडाउन का उल्लंघन करने वालों के प्रति दिखाए रवैये को अमानवीय बताया था। साथ ही उन्हें जल्लाद कहा था। उन्होंने देश की सरकार को संवेदन हीन बताया था और जनता को लॉकडाउन के ख़िलाफ़ सिविल नाफरमानी का विकल्प दिया था। साथ ही जनता को उकसाने के लिए ये पूछा था कि आखिर कब तक लोग सरकार व एनजीओ के दिए खाने को खाएँगे।

कहीं फ्रिज में पड़ा था चिकन तो कहीं हो रही थी मछली फ्राई: वो 7 मौके जब लोगों ने झूठ बोल कर मँगाया राशन

लॉकडाउन के बीच कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिनका काम सरकार और प्रशासन को परेशान करना है। वो ऐसा कर के न सिर्फ़ ज़रूरतमंदों का हक़ मार रहे हैं बल्कि संवेदनहीनता का परिचय भी दे रहे हैं। हम बात कर रहे हैं ऐसे लोगों की, जो अपने घर में पर्याप्त राशन होते हुए भी प्रशासन के सामने झूठ बोल कर फायदा उठाना चाहते हैं। जब कोरोना आपदा के बीच ऐसे लोगों को उनकी मदद करनी चाहिए जो सही में ज़रूरतमंद हैं, ये लोग ख़ुद ही सरकारी माल हजम करने की फ़िराक़ में हैं।

राजस्थान के अजमेर स्थित खानपुरा क्षेत्र में चाँद मोहम्मद नाम के शख्स ने प्रशासन से फोन करके भूख से मरने की बात कही। फिर उसने दोबारा फोन करके कहा कि वो भूख से मर रहा है। प्रशासन ने उसकी बातों को गंभीरता से लिया और आनन-फानन में अधिकारी राशन सामग्री एवं तैयार भोजन के पैकेट लेकर गए। मगर वहाँ का नजारा देखकर अधिकारी सन्न रह गए। चाँद मोहम्मद के घर में ना सिर्फ पर्याप्त मात्रा में आटा-चावल और अन्य सामग्रियाँ भरी हुई थी, बल्कि उसका फ्रिज भी चिकन से भरा हुआ था। इसके बावजूद उसने भूख से मरने का झूठ बोला। इसके बाद जिला प्रशासन ने चाँद के खिलाफ कानूनी कर्रवाई की बात करते हुए उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया। राजस्थान के ही खाजूवाला में भी एक युवक ने फोन कर के गुमराह किया।

इसी तरह देहरादून स्थित केशवपुरी बस्ती डोईवाला में झूठ बोलकर राशन माँगने वाले व्यक्ति को पुलिस ने गिरफ्तार किया था बता दें कि अजरुन पांडे ने 112 नंबर पर फोन करके बताया कि उसके यहाँ राशन नहीं है। उसने ख़ुद के भूखे होने की बात कही। सूचना मिलने के बाद पुलिस उक्त व्यक्ति के घर राशन लेकर पहुँची। जब उससे पूछताछ की तो वह घबरा गया। उसके बाद उसके कमरे की जाँच की गई तो वहाँ पर छोटे ड्रमों में काफी राशन भरा था। ऐसा उसने पहली बार नहीं किया था बल्कि वो बार-बार ऐसे ही झूठ बोल कर अपने घर में लगातार बड़ी मात्रा में सरकारी राशन भरे जा रहे था।

राजस्थान के हनुमानगढ़ में ओम प्रकाश नेहरू की पुत्री नीतू ने राजस्थान संपर्क पोर्टल 181 पर शिकायत दर्ज करवाई कि उनके घर राशन खत्म हो गया है। साथ ही उसने दावा किया कि उसके घर में कमाने वाला भी कोई नहीं है। प्रशासन ने जब कर्मचारियों के साथ मौके पर जाकर जाँच की तो पाया कि घर में पर्याप्त मात्रा में खाद्य सामग्री उपलब्ध थी। शिकायतकर्ता बीपीएल परिवार पाया गया। यानी, परिवार को पहले से ही राज्य सरकार द्वारा सारी सुविधाएँ निःशुल्क उपलब्ध करवाई जाती है। इसके बाद इस घटना की पूरी रिपोर्ट बना कर डीएम को भेजी गई।

ऐसी ही एक घटना हरियाणा के झज्जर में हुई, जहाँ एक व्यक्ति ने कण्ट्रोल रूम फोन कर के बिलखते हुए बताया कि वह किला कॉलनी में रहता है और उसे राशन की सख्त ज़रूरत है। साथ ही उसने दावा किया कि उसके परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी ख़राब है कि वो ख़ुद जाकर राशन ख़रीद भी नहीं सकता है और घर में खाने को कुछ बचा ही नहीं है। एसडीएम ने एक अधिकारी को तुरंत राशन लेकर वहाँ भेजा। वहाँ उसके रसोई में काफ़ी मात्रा में राशन पाया गया और पता चला कि उसने प्रशासन को गुमराह किया था। बाद में उसने माफ़ी माँगी और अपनी ग़लती स्वीकार की। प्रशासन को ऐसे लोगों के कारण परेशानी हो रही है।

मध्य प्रदेश के ग्वालियर में भी एक महिला ने ऐसा ही किया। उसने बताया कि घर में उसके पति और तीन बच्चे हैं और खाने का कोई भी सामान नहीं है। राशन लेकर पहुँची प्रशासन की टीम ने पाया कि उक्त परिवार ग़रीब नहीं है और उनके किचेन में राशन का पर्याप्त सामान पाया गया। महिला को समझाया गया कि वो दोबारा ऐसा न करें, ताकि ज़रूरतमंदों को राशन मुहैया कराया जा सके। पुलिस ने महिला को समझाया कि वो उन गरीबों के पेट पर लात न मारें, जिनके पास आटा तक नहीं है। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जहाँ पुलिस महिला को समझाती हुई दिख रही है।

इसी तरह हिमाचल प्रदेश के नालागढ़ स्थित दत्तोवाल में एक व्यक्ति ने प्रशासन को कई बार फोन कर के मदद की गुहार लगाई और साथ ही कहा कि वो भूख से मर रहा है। जब अधिकारीगण वहाँ पर पहुँचे तो उसके घर में 30 किलो राशन पहले से ही था। उसकी रसोई राशन से भरी पड़ी थी। सामान इतना था कि वो दूसरों की मदद भी कर सकता था लेकिन उसने प्रशासन से ही धूर्तता करने की ठानी। उसके ख़िलाफ़ धारा-177 और 188 के तहत मामला दर्ज किया गया।

इसी तरह का मामला बिलासपुर में सामने आया, जहाँ कुछ प्रवासी मजदूरों ने ही जनसेवा में लगी संस्थाओं के साथ मजाक किया। दुर्गा मंदिर के पास रह रहे इन लोगों ने रेडक्रॉस सोसाइटी में बार-बार कॉल कर के राशन न होने की बात कही। जब सहायता देने वाली वैन वहाँ पर पहुँची तो पाया कि उनके पास राशन की कोई कमी नहीं थी और घर में मछली फ्राई हो रही थी। डब्बों में कच्चा राशन भरा पड़ा था। इसके बाद उनलोगों के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई गई।

ऐसे लोग इस तरह की हरकतें करके उन स्वयंसेवी संस्थाओं के काम में भी बाधा डाल रहे हैं, जो निःस्वार्थ भाव से राहत-कार्य में लगी हुई हैं। अगर घर में महीने भर से भी ज्यादा का राशन पड़ा है तो दूसरों की मदद न करें तो न सही, कम से कम ऐसे लोगों को तो उन ग़रीबों का हक़ नहीं मारना चाहिए जिनके रोजगार पर ग्रहण लगने के कारण इस स्थिति में खाने के भी लाले पड़े हैं। जब किसी के पास चावल तक नहीं हो, ऐसे समय में चायपत्ती के लिए हंगामा करना उचित तो नहीं ही है।

10 दिन से हत्यारे फरार, प्रशासन ने पैसा खाया है: मधुबनी पीड़िता के पुत्र ने लगाई मदद की गुहार

“हम गरीब हैं तो क्या हमारे जान की कीमत नहीं है, हमें इंसाफ नहीं मिलना चाहिए” ये कहना है मधुबनी की 70 वर्षीय मृतक दलित महिला के बेटे सुरेंद्र मंडल का। बिहार के मधुबनी में 5 अप्रैल की रात सुलेमान नदाफ, मलील नदाफ और शरीफ नदाफ ने 70 वर्षीय दलित महिला काला देवी (उर्फ कैली देवी) की हत्या कर दी। हत्या की रात से ही तीनों आरोपित फरार हैं।

घटना को आज 10 दिन हो गए हैं। मगर अभी तक प्रशासन उन तक नहीं पहुँच पाई है। हत्यारे अभी भी कानून की गिरफ्त से बाहर आजाद घूम रहे हैं। मृतक महिला के परिजन प्रशासन से मदद की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन उन्हें उनकी तरफ से कोई सहयोग नहीं मिल रहा है। 42 वर्षीय सुरेंद्र मंडल ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने आरोपित से पैसा लिया है, इसलिए गिरफ्तार नहीं कर रहा है। 

जब हमने जानना चाहा कि उन्हें प्रशासन की तरफ से किस तरह की मदद मिल पा रही और जब वो पुलिस स्टेशन जाते हैं तो उनसे क्या कहा जाता है? इस बात पर सुरेंद्र मंडल ने लगभग बिफरते हुए कहा, “जब भी हम वहाँ (पुलिस स्टेशन) जाते हैं तो बड़ा बाबू कहते हैं- दूर हटो, दूर रहकर बात करो। जब हम केस के बारे में बात करते हैं तो कहते हैं कि हाँ, हम केस बनाने की सोच रहे हैं।”

आगे उन्होंने कहा, “10 दिन बीत जाने के बाद भी अगर वो उन आरोपितों को नहीं पकड़ पाए हैं, तो इसका मतलब है कि रहिका थाना प्रशासन ने उससे पैसा खाया है, वरना इतनी बड़ी घटना के बाद उसके नहीं पकड़े जाने का सवाल ही नहीं है। मतलब साफ है कि उन्होंने पैसा लिया है, इसलिए केस में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। हम गरीब हैं तो क्या हमारे जान की कीमत नहीं है? हमें इंसाफ नहीं मिलना चाहिए?”

इसके साथ ही सुरेंद्र ने ये भी आरोप लगाया कि ये सब कुछ राजद विधायक फैयाज अहमद और सरपंच फकरे आलम के कहने पर हो रहा है। उन्होंने कहा, “राजद विधायक फैयाज अहमद का फिलहाल नाम नहीं आया है, लेकिन हम जानते हैं कि ये सब कुछ उसके कहने पर ही हो रहा है, क्योंकि उसका दायाँ हाथ सरपंच फकरे आलम है और पुलिस प्रशासन फकरे आलम से मिली हुई है। हम तो बस प्रधानमंत्री के कहने पर दीया जला रहे थे। क्या प्रधानमंत्री की बात का पालन करना इतना बड़ा गुनाह है कि हमारी माँ की हत्या कर दी जाएगी? और प्रशासन भी हाथ पर हाथ धरे बैठा है।” 

इतना ही नहीं दूसरे समुदाय द्वारा अफवाह भी फैला दी जाती है कि हमने पैसा लेकर केस को रफा-दफा कर दिया है। हम किस-किसको स्पष्टीकरण दें? उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रशासन ने उनके दो-तीन गवाहों का बयान भी नहीं लिया।

सुरेंद्र ने कहा, “हम थाने का घेराव करेंगे। ये काम हम बहुत पहले ही करते, लेकिन हमने प्रशासन पर भरोसा जताया। मगर हमें वहाँ से निराशा ही हाथ लगी। हमने लॉकडाउन की वजह से भी ये नहीं किया। हालाँकि, लॉकडाउन अभी भी है, लेकिन हम क्या करें? हम मजबूर हैं, प्रशासन अपराधियों के साथ मिली है। वो हमारा साथ नहीं दे रही है। आखिर हम इंसाफ के लिए जाएँ तो जाएँ कहाँ? प्रशासन की इसी सुस्ती और लापरवाही की वजह से अपराधियों को सह मिलती है।”

उल्लेखनीय है कि 5 अप्रैल की रात दीप जलाने के बाद सुरेंद्र की माँ काला देवी घर के बाहर ही बेंच पर बैठी हुईं थीं। इस दौरान सुलेमान नदाफ का बेटा मलीन नदाफ ने काला देवी के सिर पर दो-तीन बार मारा। इसके बाद बाद इतनी जोर से उनका गला दबाया कि वह बेंच पर से नीचे गिर गईं। जिसके बाद उन्हें आँगन में लाया गया, जहाँ काला देवी ने दो बार हिचकी ली और फिर वहीं पर दम तोड़ दिया। इससे पहले शरीफ नदाफ ने गाली-गलौज की थी। भद्दी और गंदी गालियाँ देने के साथ ही उसने कहा था कि इस मुहल्ले में कोई भी बच्चा हिंदू का नहीं है।

सोचने वाली बात तो यह भी है कि किसी हिंदू की हत्या की जाती है, तो असहिष्णुता का राग अलापने वाले ये झंडाबरदारों द्वारा चुप्पी साध ली जाती है। स्क्रीन काली कर डालने वाले, हर चीज में ‘मजहब विशेष पर अत्याचार’ ढूँढ़ने वाले मीडिया के एक खास वर्ग के लिए यह खबर नहीं होती। सेकुलरिज्म का चश्मा लगाए चैनलों पर बहस करने वाले पत्रकार ऐसी घटनाओं पर खामोश हो जाते हैं। कथित बुद्धिजीवी दलीलें देते हैं कि मामले को साम्प्रदायिक नजरिए से न देखा जाए। मगर जैसे ही किसी दूसरे मजहब के व्यक्ति की मौत होती है, मामले को तूल देकर ऐसा रंग दिया जाता है, जिससे लगे कि देश में ‘कथित अल्पसंख्यकों पर अत्याचार’ हो रहे हैं। यही है इस समाज की कड़वी सच्चाई।

पाकिस्तान कोरोना संकट के दौरान हिंदुओं व ईसाइयों के साथ खाद्य सामग्री बाँटने में कर रहा धार्मिक भेदभाव, USCIRF ने जताई नाराज़गी

कोरोना वायरस के कारण पूरे विश्व में हड़कंप मचा हुआ है। हर ओर सभी देश अपने नागरिकों को बचाने की जद्दोजहद में जुटे हैं। लेकिन पाकिस्तान से लगातार ऐसी खबरें आई हैं जिनसे मालूम पड़ा कि पाकिस्तान प्रशासन अल्पसंख्यकों को राशन देने से न केवल मना कर रहा है बल्कि राशन के लिए उनपर धर्मांतरण का दबाव भी बना रहा है। अब इन्हीं खबरों के आधार पर पाकिस्तान की आलोचना विश्व का हर देश करने लगा है। इसी कड़ी में दुनियाभर के धार्मिक मसलों पर राय देने वाले अमेरिकी आयोग ने भी पाकिस्तान से आ रही इन खबरों की निंदा की है और इस समय इमरान सरकार को ये धार्मिक भेदभाव छोड़ मानवता के लिए काम करने की सलाह दी है।

सोमवार को विभाग की ओर जारी बयान में कहा गया कि कोरोना वायरस का संकट फैलता जा रहा है, ऐसे में पाकिस्तान में जिन लोगों को भोजन की समस्या आ रही है, वह काफी निंदनीय है। सरकार का कर्तव्य हर किसी को भोजन देना है, ऐसे में उस वक्त किसी के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। इसलिए वे पाकिस्तानी सरकार से अपील करते हैं कि हर धर्म के लोगों को भोजन मुहैया करवाया जाए।

USCIRF कमिश्नर अनुरीमा भार्गव ने इस संबंध में बयान देते हुए कहा, “ये हरकतें निंदनीय हैं। जैसा कि कोविड-19 का प्रसार जारी है। पाकिस्तान में लोग अपने परिवारों को सुरक्षित और स्वस्थ रखने के लिए भूख से लड़ रहे हैं और किसी एक के (धार्मिक) विश्वास के कारण खाद्य सहायता से इनकार नहीं किया जाना चाहिए। हम पाकिस्तानी सरकार से यह सुनिश्चित करने का अनुरोध करते हैं कि खाद्य सहायता हिंदुओं, ईसाइयों और अन्य धर्मों के अल्पसंख्यकों के साथ समान रूप से वितरित की जाए।”

वहीं, USCIRF के कमिश्नर जॉनी मूर ने पाक से कहा कि प्रधानमंत्री इमरान खान द्वारा हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को दिए गए एक संबोधन में उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला था कि विकासशील देश कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने की कोशिश करते हुए भी लोगों को भूख से मरने से बचाएँ। प्रधानमंत्री इमरान खान की सरकार के पास नेतृत्व करने का अवसर है लेकिन उन्हें धार्मिक अल्पसंख्यकों को पीछे नहीं छोड़ना चाहिए। अन्यथा वे धार्मिक भेदभाव और अंतर-सांप्रदायिक संघर्ष द्वारा निर्मित एक और संकट खड़ा कर लेंगे।

USCIRF कमिश्नर जॉनी मूर के मुताबिक, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने बीते दिनों एक साथ इस लड़ाई में हिस्सेदारी की बात कही थी। ऐसे में अब अवसर है कि वह अपने देशवासियों को एक राह दिखाएँ और लोगों से किसी तरह का भेदभाव ना करने की अपील करें।

गौरतलब है कि पिछले दिनों पाकिस्तान के कराची व सिंध प्रांत से कुछ ऐसी रिपोर्ट आई थी जिसमें एनजीओ व सरकारी अधिकारी हिंदू व ईसाई समुदाय के लोगों को भोजन देने से मना कर रहे थे और पूछे जाने पर जवाब दे रहे थे कि भोजन मुस्लिम लोगों के लिए हैं।

बता दें, ऐसे वाकयों को लेकर पिछले दिनों  एक स्थानीय ईसाई महिला का बयान भी आया था। बयान में महिला ने बताया था कि प्रशासन ने उन्हें राशन नहीं दिया। जब इसके पीछे वजह पूछी गई तो कहा कि राशन तभी मिलेगा जब आप ‘ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुन रसूलुल्लाह’ पढ़ेंगे। इसके बाद जब उन लोगों ने इससे मना कर दिया तो उन्होंने राशन देने से इनकार करते हुए चले जाने को कह दिया।

इसके अलावा एक व्यक्ति की भी वीडियो पाकिस्तान से वायरल हुई थी। वायरल वीडियो में व्यक्ति कह रहा था,  ”हम भी यहीं के बाशिंदे हैं। हम भी पाकिस्तानी हैं। तो हमारा भी ख्याल करना चाहिए। जैसे सब लोगों के साथ कॉपरेट करते हैं। हमारे साथ भी करना चाहिए। हमारे पास भी छोटे-छोटे बच्चे हैं। हम भी गरीब लोग हैं। यहाँ के रहने वाले। मगर फिर हमारे साथ कोई कॉपरेट क्यों नहीं करता। दूसरे लोगों को दिया जाता है। हमें नहीं दिया जाता। ये गलत है न!”

ट्रेन हो या प्लेन… रुकेगा कुछ भी नहीं: 3 मई तक सिर्फ यात्रा स्थगित, आवश्यक माल ढुलाई जारी

कोरोना वायरस के चलते देश में 21 दिनों से लागू लॉकडाउन को आज 3 मई तक और बढ़ाए जाने के बाद रेल यात्राओं व हवाई यात्राओं को लेकर भी बड़ा ऐलान हुआ। रेलवे के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि लॉकडाउन बढ़ने के साथ रेलवे यात्राएँ निलंबित रहने की अवधि को भी 3 मई तक बढ़ा दिया गया है। वही, नागर विमानन महानिदेशालय ने भी ट्वीट करके जानकारी दी कि सभी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय एयरलाइनों के संचालन को 3 मई तक निलंबित रखा जाएगा।

DGCA द्वारा जारी किया गया सर्कुल

इसके अलावा DGCA की ओर से जारी सर्कुलर में इस बात का भी उल्लेख किया गया कि यह प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय कार्गो संचालन और उन उड़ानों पर लागू नहीं होगा, जिन्हें विशेष रूप से DGCA ने अप्रुवल दिया है।

बता दें कि रेलवे मंत्रालय के यात्राएँ रद्द होने की जानकारी देते हुए बताया, “प्रीमियम ट्रेन, मेल/एक्सप्रेस ट्रेन, पैसेंजर ट्रेन, उपनगरीय ट्रेन, कोलकाता मेट्रो रेल, कोंकण रेलवे आदि सहित भारतीय रेलवे की सभी यात्री ट्रेन सेवाएँ 3 मई तक 24 घंटे निलंबित रहेंगी।”

इसके अलावा भारतीय रेलवे की ओर से रेलवे मंत्रालय के एक्सक्यूटिव डायरेक्टर राजेश दत्त बाजपेयी ने इस संबंध में अहम जानकारी भी दी। भारतीय रेलवे द्वारा जारी की गई प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक देश के विभिन्न हिस्सों में आवश्यक आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए माल और पार्सल गाड़ियों की आवाजाही बनी रहेगी। लेकिन यात्री टिकट बुकिंग 3 मई तक के लिए बंद कर दी गई है। रेलवे स्टेशनों और रेलवे स्टेशन परिसर में आरक्षित/अनारक्षित यात्रा के लिए रेल यात्रा टिकटों की बुकिंग के लिए सभी काउंटर 3 मई 2020 तक बंद रहेंगे। 

गौरतलब है कि देश में सख्ती बरतने के बाद भी कोरोना वायरस के मामलों की संख्या कम नहीं हो रही है। ताजा अपडेट के मुताबिक अब तक कोरोना से 8988 एक्टिव केस आ चुके हैं और 339 लोगों की इससे मृत्यु हुई है। इन्ही हालातों को देखते हुए पीएम मोदी ने आज देश को संबोधित किया और 3 मई तक लॉकडाउन बढ़ा दिया।

पीएम मोदी ने कहा, “साथियों, सारे सुझावों को ध्यान में रखते हुए ये तय किया गया है कि भारत में लॉकडाउन को अब 3 मई तक और बढ़ाना पड़ेगा। यानी 3 मई तक हम सभी को, हर देशवासी को लॉकडाउन में ही रहना होगा। इस दौरान हमें अनुशासन का उसी तरह पालन करना है, जैसे हम करते आ रहे हैं। मेरी सभी देशवासियों से ये प्रार्थना है कि अब कोरोना को हमें किसी भी कीमत पर नए क्षेत्रों में फैलने नहीं देना है। स्थानीय स्तर पर अब एक भी मरीज बढ़ता है तो ये हमारे लिए चिंता का विषय होना चाहिए।”

लॉकडाउन 2 को लेकर तैयार हैं ये 9 राज्य: कुछ छूट के साथ होगा लागू, जरूरी चीज व कामगार हैं प्राथमिकता

कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए लागू किए गए लॉकडाउन से न सिर्फ अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है, बल्कि आम जनजीवन भी पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुका है। बताया जा रहा है कि इसको ध्यान में रखते हुए लॉकडाउन 2 में कुछ रियायतें दी जा सकती है। जो संकेत हैं उसके मुताबिक लॉकडाउन के दूसरे चरण में भी किसानों को छूट जारी रहेगी। इस लॉकडाउन में सरकार यह पक्का करेगी कि फसल की उपज और खरीद में किसी तरह की दिक्कत न हो।

इसके अलावा कामगारों और मजदूरों की हालत सुधारने और उनकी जीविका के लिए उनके हाथ में पैसा देने के लिए छोटे और मध्यम कारखानों को चालू कराया जा सकता है। मीडिया रिपोर्टें के मुताबिक सुझाव यह है कि कारखानों में मजदूरों को अंदर ही रहकर काम कराया जाए और इस दौरान सोशल डिस्टेंसिंग और साफ-सफाई का खास ध्यान रखा जाए। कई राज्यों ने तो अपने स्तर पर इसे दो सप्ताह और बढ़ा दिया है और इसकी तैयारी भी कर ली है। इनमें राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पंजाब का नाम शामिल है।

जिन राज्यों ने जिन-जिन स्तरों पर इसकी तैयारी की है

बिहार: बिहार सरकार लॉकडाउन के नियमों को ज्यादा सख्त करने जा रही है। कार या बाइक से निकलने पर रोक होगी। परिवहन विभाग जल्द ही नई गाइडलाइन जारी करेगा। इसके साथ ही अगर लॉकडाउन बढ़ता है तो पटना पुलिस जिले की सीमा को सील करेगी। इसकी तैयारी में जुट गई है। इसके लिए जिले के बॉर्डर पर और भीतर चेकिंग प्वाइंट भी बना दिए गए हैं। जिले के बॉर्डर पर 78 पोस्ट और भीतर 71 पुलिस चेकपोस्ट पर काम भी कर रही हैं। पुलिस प्रशासन ने चौक-चौराहों पर चौकसी बढ़ाने के साथ ही 21 QRT (Quick Response Team) तैनात की है। यह थानों के साथ मुख्य चौराहों पर मौजूद रहती है। साथ ही सौ से अधिक बाइक सवार पुलिसकर्मी लगातार मुख्य मार्ग से लेकर शहर की गलियों में भ्रमण कर रहे हैं।

मध्य प्रदेश: लॉकडाउन से गरीबों की रोजी-रोटी पर आए संकट को देखते हुए मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार अब अप्रैल से जून तक का राशन भी नि:शुल्क देगी। आर्थिक गतिविधियों को गति देने के लिए सरकार कुछ उद्योगों को काम शुरू करने की शर्तों के साथ छूट दे सकती है। दवा, खाद्य प्रसंस्करण, बेकरी, ईंट-भट्टे और निर्माण उद्योग के लिए रोडमैप तैयार किया जा चुका है। 

एक-दो दिन में इसकी घोषणा हो जाएगी। प्रदेश सरकार लॉकडाउन बढ़ाने की पक्षधर है पर जिन जिलों में कोरोना का संक्रमण नहीं पहुँचा है, वहाँ सावधानियाँ बरतते हुए उद्योगों को शुरू करने की छूट दी जा सकती है। इसके अलावा शिवराज सरकार ने दूसरे राज्यों के मध्य प्रदेश में फँसे सात हजार श्रमिकों के खातों में भी 70 लाख रुपए जमा करा दिए हैं। इसमें बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, ओडिशा, आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़ सहित अन्य राज्यों के निर्माण क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिक शामिल हैं। इंदौर और उज्जैन छोड़कर प्रदेश में 15 अप्रैल से समर्थन मूल्य पर रबी की फसल की खरीदी शुरू हो जाएगी। प्रदेश में 790 केंद्र बनाए गए हैं और इन केंद्रों में एक बार में 10-12 किसानों को बुलाया जाएगा। इसके साथ ही सभी किराना दुकान खोलने के निर्देश दिए गए हैं।

उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश में लॉकडाउन एक्सटेंशन लगभग तय है। इस बार ‘जान भी, जहान भी’ की तर्ज पर लॉकडाउन आगे बढ़ेगा। केंद्र सरकार की गाइडलाइन के मुताबिक उत्तर प्रदेश में पिछले तीन सप्ताह से ठप पड़ी गतिविधियाँ पटरी पर लाने की कोशिश की जाएगी। उत्तर प्रदेश सरकार 75 जिलों के किसानों से 15 अप्रैल से 5500 खरीद केंद्रों के माध्यम से 1925 रुपए प्रति क्विंटल गेहूँ खरीद का काम शुरू करेगी। प्रदेश सरकार ने तैयारियाँ पूरी कर ली है। एक अप्रैल से शुरू होने वाले गेहूँ खरीद लॉकडाउन की वजह से 15 दिन की देरी पर शुरू हुआ है। एक सरकारी बयान में कहा गया है कि प्रदेश में गेहूँ खरीद का लक्ष्य 55 लाख टन रखा गया है। 

राजस्थान: राज्य में गहलोत सरकार ने संकेत दिए कि राजस्थान में मॉडिफाई लॉकडाउन लागू किया जाएगा। इसके तहत चिकित्सा, कृषि और कपड़ा जैसे कुछ क्षेत्रों को कुछ शर्तों के साथ शुरू करने दी छूट दी जा सकती है। इसके अलावा मोबाइल शॉप और होम डिलीवरी के रेस्टॉरेंट खोलने की भी योजना है। शादी समारोह में 20 से ज्यादा लोगों के शामिल होने पर प्रतिबंध रहेगा। बिना मास्क के कोई भी व्यक्ति अपने घर से बाहर नहीं निकल पाएगा। साथ ही सोशल डिस्टेंसिंग का भी सभी को पालन करना ही होगा। 

महाराष्ट्र: कोरोना वायरस का संक्रमण रोकने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में कर्फ्यू की घोषणा कर दी है। सीएम उद्धव ठाकरे ने कहा कि राज्य की सीमाएँ सील कर दी गई है। इसके अलावा जिले की सीमा पर चौकसी बरती जा रही है और समूह में लोगों को कही नहीं जाने दिया जा रहा है। उद्धव ठाकरे ने कहा कि राज्य के अंदर आने वाले सभी धार्मिक स्थान बंद कर दिए गए हैं। इन धार्मिक स्थानों पर सिर्फ धर्मगुरु पूजा करेंगे। ऐसे धार्मिक स्थानों को पब्लिक के लिए पूरी तरह से बंद कर दिया गया है। बता दें कि महाराष्ट्र में कोरोना वायरस से हालात काफी बिगड़े हुए हैं।

हरियाणा: कोरोना वायरस को हराने के लिए हरियाणा में भी लॉकडाउन को 30 अप्रैल तक बढ़ाया जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ शनिवार को हुई मुख्यमंत्रियों की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के बाद हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने यह संकेत दिए। लॉकडाउन बढ़ाने के साथ ही कोरोना संक्रमण और मरीजों की संख्या के आधार पर जिलों को जोन में बाँटा जाएगा। मुख्यमंत्री ने बताया कि ऐसे क्षेत्र जहाँ कोरोना वायरस के संक्रमण का प्रकोप सबसे ज्यादा है, उसे रेड जोन (Red Zone) में रखा जाएगा। वहीं, ऐसे क्षेत्र जहाँ कोरोना वायरस के संक्रमण का प्रकोप कम है, उसे ऑरेंज जोन (Orange Zone) में रखा जाएगा। सीएम ने कहा कि कोरोना से बचाव के लिए फेस मास्क लगाना बहुत जरूरी है, सभी लोग इसका पालन करें। लॉकडाउन के दौरान मिल रहीं ऑवर चार्जिंग और कालाबाजारी की शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे लोग सुधरे नहीं तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी।

झारखंड: हेमंत सोरेन कैबिनेट की बैठक में सभी मंत्रियों ने राज्य में लॉकडाउन बढ़ाने की सहमति दी है। इससे यह तो तय हो गया है राज्य में लॉकडाउन की अवधि बढ़ाई जाएगी, लेकिन इसकी आधिकारिक घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंगलवार को होने वाले देश के नाम संबोधन के बाद की जाएगी। हालाँकि इस बीच कई चीजों में छूट देने की भी सरकार की मंशा है। बताया जा रहा है कि निर्माण कार्य, ईंट भट्ठा और मिठाई दुकानों को छूट दी जा सकती है। लॉकडाउन बढ़ाने का फैसला मुख्यमंत्री ही लेंगे। किसान-मजदूर अपने खेतों में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए काम कर सकेंगे। बीड़ी मजदूरों को भी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए काम करने की छूट मिलेगी।

छत्तीसगढ़: राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार ने सोमवार से लोगों को राहत देने का ऐलान। उद्योग, प्राइवेट अस्पताल और नर्सिंग होम खुलेंगे। रियायतें केंद्र सरकार की गाइडलाइन के आधार पर दी जाएँगी। राज्य सरकार ने 10 या उससे कम मजदूरों वाले उद्योगों को शुरू करने के लिए सशर्त अनुमति दी है। निजी अस्पताल व नर्सिंग होम ओपीडी शुरू करेंगे। सभी महापौर, पालिका और पंचायत के अध्यक्षों और पार्षदों को उनकी निधि से जरूरतमंदों के लिए सामान खरीदने की अनुमति दी गई है।

पंजाब: सरकार लॉकडाउन से दो दिन पहले लगाए गए कर्फ्यू को 30 अप्रैल तक बढ़ा चुकी है। पंजाब सरकार गेहूँ की कटाई के लिए राज्य के किसानों को लॉकडाउन से थोड़ी राहत देगी। मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि गेहूँ की कटाई के लिए किसानों को लॉकडाउन से अस्थाई राहत दी जाएगी और ये राहत जिलेवार तरीके से दी जाएगी न कि एक बार। सिर्फ किसानों को लॉकडाउन में छूट देंगे, क्योंकि इस बार अच्छी फसल हुई है। कोरोना के कारण आँकड़े भयावह हैं। चीजें अच्छी नहीं हैं और लोगों को सुरक्षित रखना हमारा कर्तव्य है। अभी लॉकडाउन हटाना सही नहीं होगा।

कोरोना मरीज को लाने गई मेडिकल टीम पर कुर्बान चौक के पास ईंट-पत्थरों से हमला, बैरंग लौटे DC-SP

राँची के हिंदपीढ़ी से कोरोना संदिग्धों को लाने गई स्वास्थ्य विभाग की टीम पर हमला किया गया। लोगों ने एंबुलेंस में भी तोड़-फोड़ की। स्थानीय लोगों को समझाने गए डीसी और एसपी को भी बैरंग लौटना पड़ा।

दरअसल सोमवार (अप्रैल 13, 2020) को हिंदपीढ़ी के तीन और लोग कोरोना पॉजिटिव मिले थे। उन्हीं लोगों के संपर्क में आए लोगों को लाने के लिए स्वास्थ्य विभाग की टीम हिंदपीढ़ी गई थी। जिसका स्थानीय लोगों ने विरोध किया।

विरोध इतना बढ़ गया कि लोगों ने देखते ही देखते कोरोना संदिग्धों को लाने गई चार एंबुलेंस और उसकी सुरक्षा में कई पीसीआर वैन और स्वास्थ्य कर्मियों पर ईंट-पत्थरों से हमला करना शुरू कर दिया। एक एंबुलेंस को तोड़ दिया गया। हिंदपीढ़ी के लोगों का आक्रामक रूप देख कर एंबुलेंस ड्राइवर अनिल और भेंगरा ने थाने में जाकर अपनी जान बचाई। वहीं, पुलिस बल को भी अपने कदम पीछे खींचने पड़े।

जानकारी के मुताबिक इस घटना को हिंदपीढ़ी के कुर्बान चौक के पास अंजाम दिया गया। वहँ के लोगों ने लाइट बुझाकर कोरोना संक्रमितों को अस्पताल पहुँचाने के लिए गई टीम पर हमला बोला। स्थानीय लोगों का कहना था कि स्वास्थ्य विभाग की टीम रात के वक्त संदिग्ध को ले जाने क्यों आई है। इसके लिए कोई वक्त निर्धारित होना चाहिए। हिंदपीढ़ी में रात भर माहौल तनावपूर्ण रहा। घटना के बाद इलाके में भारी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दी गई है।

इस घटना को लेकर राँची के सिविल सर्जन वीबी प्रसाद का कहना है कि राज्य में 13 अप्रैल को 5 नए कोरोना संक्रमित मिले थे, जिसमें से 3 हिंदपीढ़ी इलाके के थे। इस बात का पताल चलने के बाद स्वास्थ्य विभाग की टीम प्रशासन की सुरक्षा में हिंदपीढ़ी गई थी, जहाँ असामाजिक तत्वों ने उन पर हमला बोल दिया, जिसमें एक एंबुलेंस को भी क्षति पहुँची है। उन्होंने आगे बताया कि 3 पॉजिटिव लोगों में से एक ही फिलहाल अस्पताल पहुँच सका है। जबकि 2 अभी भी हिंदपीढ़ी में ही है। 14 अप्रैल की सुबह दोनों पॉजिटिव मरीजो और जो लोग इनके संपर्क में आए हैं, उन्हें हॉस्पिटल और आइसोलेशन वार्ड में भेजा जाएगा।

गौरतलब है कि इससे पहले भी राँची के हिंदपीढ़ी इलाके में स्वास्थ्यकर्मियों के ऊपर हमला किया जा चुका है। पिछले दिनों राँची में मलेशिया की एक महिला कोरोना पॉजिटिव पाई गई थी। जिस घर से महिला मिली, उसके आसपास के घरों में रहने वालों के स्वास्थ्य की जाँच के लिए जिला प्रशासन ने स्वास्थ्य कर्मियों की एक टीम को वहाँ भेजा। टीम जैसै ही लोगों की जाँच करने पहुँची तो स्थानीय लोगों ने इनका विरोध किया। उन पर हमला करना शुरू कर दिया। उस समय भी स्वास्थ्य टीम को बैरंग ही लौटना पड़ा था। कोरोना संक्रमित मरीजों की बढ़ती संख्या के चलते पिछले तीन दिनों से पूरे हिंदपीढ़ी को सील कर दिया गया है।

‘क्रीमी लेयर’ और सामाजिक न्याय का अपहरण

सन् 1990 ई. में मंडल कमीशन लागू होने के बाद सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में पिछड़ी जातियों के लिए 27% आरक्षण का प्रावधान किया गया था। यह समावेशी विकास और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना की दिशा में की गई एक महत्वपूर्ण पहल थी। समाज की पिछड़ी जातियों के लिए किए गए इस संवैधानिक प्रावधान में ‘पिछड़ेपन’ के निर्धारण के लिए तीन आयामों को आधार बनाया गया था- सामाजिक पिछड़ापन, आर्थिक पिछड़ापन और शैक्षणिक पिछड़ापन। ये तीनों ही मानदंड समय-समय पर पुनरीक्षित होते रहे हैं। इसीलिए पिछड़े वर्गों की सूची में नई-नई जातियाँ शामिल होती रही हैं।

सामाजिक न्याय की अवधारणा से उद्भूत आरक्षण का प्रावधान डॉ. भीमराव अम्बेडकर की सामाजिक न्याय-बुद्धि की संवेदनशील आयोजना है। समाज एक स्थिर या जड़ इकाई नहीं है। वह निरंतर गतिशील और विकसनशील सरणि है। इस आयोजना को फलीभूत करने के लिए समय-समय पर इसके प्राप्य और संभाव्य का आकलन किया जाना चाहिए। साथ ही, आरक्षण के उद्देश्यों और आधारों की भी समीक्षा की जानी चाहिए। ‘हम कौन थे, क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी’ जैसी समीक्षात्मक दृष्टि ही राष्ट्रीय विकास-योजनाओं में सबकी भागीदारी सुनिश्चित कर सकती है।

‘पिछड़ेपन’ के निर्धारण में भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय का 8 सितंबर, 1993 का कार्यालय ज्ञापन महत्वपूर्ण आधार-सरणि है। इस कार्यालय ज्ञापन में स्पष्ट किया गया है कि किन सरकारी और संवैधानिक पदों पर बैठे हुए और किस आयवर्ग के लोग ‘पिछड़ेपन’ के दायरे में नहीं आते हैं। यह कार्यालय ज्ञापन पिछड़ेपन के दायरे में न आने वाले “क्रीमी लेयर” व्यक्तियों के बारे में स्पष्ट निर्देश देता है।

इस ज्ञापन के बिंदु क्रमांक VI के अनुसार कुल 1 लाख रुपए वार्षिक से अधिक आय (कृषि आय को छोड़ कर) वाले व्यक्ति क्रीमी लेयर माने जाएँगे और वे आरक्षण लाभ की परिधि से बाहर होंगे। अभी यह आय-सीमा 8 लाख रुपए वार्षिक है। इस कार्यालय ज्ञापन के इसी बिंदु की भेदभावपूर्ण व्याख्या की गयी। और केंद्र/राज्य सरकारों के विभागों में कार्यरत व्यक्तियों और पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स एवं बैंक, विश्वविद्यालय आदि स्वायत्त निकायों में कार्यरत व्यक्तियों के वेतन को क्रीमी लेयर की आय गणना में शामिल करने को लेकर भेदभाव किया गया है।

अभी पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग और स्वायत्त निकायों में छोटे-बड़े सभी पदों पर कार्यरत व्यक्तियों के वेतन को क्रीमी लेयर के लिए निर्धारित आय-सीमा में जोड़ा जाता है। जबकि क्रीमी लेयर के लिए निर्धारित आय-सीमा में राज्य और केंद्र सरकार में कार्यरत व्यक्तियों के वेतन को नहीं जोड़ा जाता है। सरकारी नौकरियों के समूह क और समूह ख (जोकि उपरोक्त कार्यालय ज्ञापन के बिंदु क्रमांक IIA और II B के अनुसार क्रीमी लेयर माने गए हैं) की तरह पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग में पदक्रम की स्पष्टता नहीं होती और वेतनमान और भत्तों आदि के मामले में सरकारी नौकरियों से उनकी समरूपता या समानता (Equivalence) भी नहीं होती।

इसी कार्यालय ज्ञापन के बिंदु क्रमांक II C के अनुसार यथाशीघ्र तमाम बैंकों, विश्वविद्यालयों और भेल, गेल जैसे नवरत्नों के कर्मियों के वेतनमान और भत्तों आदि की सरकारी कर्मचारियों के साथ समानता या समरूपता की जानी चाहिए थी, जोकि नहीं की गई। विभिन्न प्रतिष्ठानों,संस्थानों और सरकारों में कार्यरत व्यक्तियों के वेतन को क्रीमी लेयर के लिए निर्धारित आय सीमा में शामिल करने को लेकर अस्पष्टता से ‘भेदभाव’ की स्थिति बनी हुई थी।

इस तथ्य को समझते हुए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से परामर्श के आधार पर वर्तमान केंद्र सरकार ने एक कानून बनाने का निर्णय किया है। इस कानून द्वारा सभी नौकरी पेशा व्यक्तियों की वेतन सहित सभी स्रोतों से आय (कृषि आय को छोड़कर) को क्रीमी लेयर के लिए निर्धारित आय की गणना में जोड़ा जाएगा। इससे अब तक चला आ रहा उपरोक्त भेदभाव मिट सकेगा। साथ ही, अपेक्षाकृत समर्थ और संपन्न लोग क्रीमी लेयर में आने के कारण आरक्षण की परिधि से बाहर हो जाएँगे। इससे आरक्षण जैसे संवैधानिक प्रावधान का लाभ अधिक जरूरतमंद और वास्तविक हकदार अभ्यर्थियों तक पहुँच सकेगा।

लेकिन कुछ मलाईमार लोगों द्वारा सरकार की इस सुचिंतित और न्यायपूर्ण पहल का विरोध किया जा रहा है। इनमें समूह क और ख के अलावा सरकारी नौकरियों में लगे हुए लोग सर्वाधिक हैं। उनका यह विरोध अत्यंत दुःखद और निराशाजनक है। निश्चय ही, यह विरोध स्वार्थ-प्रेरित है। विरोध करने वालों का तर्क यह है कि जब तक पिछड़े वर्गों के लिए निर्धारित 27% पदों को विभिन्न विभागों में भरा नहीं जाता, तब तक “क्रीमी लेयर की आय-गणना” के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए।

वे यह भी चाहते हैं कि क्रीमी लेयर की आय-सीमा को भी बढ़ाकर 20 लाख रुपए वार्षिक किया जाना चाहिए, ताकि ज्यादा-से-ज्यादा लोग आरक्षण की परिधि में आ सकें। उनका एक तर्क यह भी है कि इससे (सभी पदों के वेतन को क्रीमी लेयर निर्धारण में शामिल करने से) आरक्षण का आधार सामाजिक न रहकर आर्थिक हो जाएगा। जबकि वास्तविकता यह है कि आय सीमा या आर्थिक स्तर सामाजिक रूप से पिछड़ी जातियों के व्यक्तियों का ही देखा जाएगा। इसलिए आरक्षण का मूल आधार तो सामाजिक पिछड़ापन ही रहेगा। उनकी आशंका यह भी है कि नए बनने वाले कानून से काफी लोग क्रीमी लेयर में आ जाएँगे और पिछड़े वर्ग के लिए निर्धारित पदों के लिए योग्य व्यक्ति नहीं मिल सकेंगे और वे सीटें एनएफएस हो जाया करेंगी। वे इस नए बनने वाले कानून को सामाजिक न्याय की हत्या करने जैसा बता रहे हैं। उनके अनुसार यह कानून आरक्षण के खिलाफ साजिश है।

वास्तव में, इस तर्क की आधारहीनता और अर्थहीनता इस तथ्य से ही स्पष्ट हो जाती है कि आजकल न सिर्फ पिछड़े वर्गों, बल्कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों तक के लिए निर्धारित एक-एक पद के लिए सैकड़ों आवेदक होते हैं। और इन वर्गों के “क्रीमी लेयर” बाजी मार ले जाते हैं और वास्तविक दलित-पिछड़े ताकते रह जाते हैं। वास्तविकता यह है कि आरक्षण का लाभ सर्वाधिक वंचित और पिछड़े लोगों तक नहीं पहुँच पा रहा है। पिछड़े-वंचित तबकों के ही जो अपेक्षाकृत उच्चवर्गीय और समर्थ लोग हैं, खाते-पीते और खुशहाल लोग हैं, वही आरक्षण का लाभ ले रहे हैं। इसीलिए माननीय उच्चतम न्यायालय ने कई बार अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए भी “क्रीमी लेयर” निर्धारित करने की बात की है, ताकि आरक्षण जैसे संवैधानिक प्रावधान का लाभ संबंधित वर्गों और समाजों के लक्षित और अधिकारी व्यक्तियों और समूहों तक पहुँच सके।

उल्लेखनीय है कि कोई भी प्रावधान या उपचार सापेक्षिकता में ही सर्वाधिक प्रभावी हो सकता है। पिछड़ी जातियों और समूहों में सापेक्षिकता के सिद्धांत को लागू करके आरक्षण को भी अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। प्रतियोगिता या प्रतिस्पर्धा में सापेक्षिकता का विशेष महत्त्व है। इसीलिए विभिन्न आयोगों और समितियों की सिफारिशों के आधार पर कई राज्य सरकारों ने सापेक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर अति पिछड़े और अति दलितों की अलग उपश्रेणियाँ बनाकर उनके आंतरिक संरक्षण और समुचित विकास की पहल की है।

महात्मा गाँधी से लेकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय तक भारत के तमाम सामाजिक विचारकों ने ‘पंक्ति में खड़े हुए अंतिम व्यक्ति के हित-चिंतन, विकास और संरक्षण की विचारणा’ दी। आरक्षण का मूल मंतव्य भी अंतिम जन को मुख्यधारा में शामिल करना है। वस्तुतः सरकार की यह पहल सामाजिक न्याय और समावेशी समाज की स्थापना के इसी भावबोध से अभिप्रेरित है। लेकिन इसका विरोध आरक्षित वर्गों की उस “नव-वर्चस्ववादी” मानसिकता द्वारा किया जा रहा है, जो मुखर है और आरक्षण के ऊपर सिर्फ अपनी इजारेदारी बनाए रखना चाहती है।

यह मानसिकता नहीं चाहती कि इन संवैधानिक प्रावधानों का लाभ सर्वाधिक वंचित-उपेक्षित व्यक्तियों और जातियों तक पहुँचे। कुछ जरूरत से ज्यादा अधिकार-सचेत और साधन-संपन्न दलित-पिछड़ों की “नव-वर्चस्ववादी” मानसिकता सामाजिक-आर्थिक विकास के आख़िरी पायदान पर ठिठके अपने ही आरक्षित समुदाय के भाई-बहिनों को हिस्सेदारी नहीं देना चाहती। उनकी यह मानसिकता तथाकथित सवर्णों की उस मानसिकता से तनिक भी अलग नहीं है, जो पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के योग्यतम अभ्यर्थियों को नियुक्ति के समय एनएफएस कर देती है।

आरक्षण को असफल करने में और उसके प्रावधानों का गोलमाल करने में सवर्ण जातियों और सम्पन्न पिछड़ों-दलितों का अद्भुत गठजोड़ है। सवर्ण समाज के लोग दलित-वंचित-पिछड़े समाज के लोगों को उनका हक और हिस्सा नहीं देते और उनके हक को हड़पने की नई-नई तरकीबें खोजते रहते हैं। ठीक इसी प्रकार आरक्षण के खाए-अघाए और अपेक्षाकृत समर्थ-सम्पन्न पिछड़े-दलित अपनी ही जाति/वर्ग के सर्वाधिक वंचितों की सत्ता, नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में भागीदारी नहीं होने देना चाहते। वे इसे अपना एकाधिकार मान बैठे हैं। वे भी इस अधिकार-वंचना के लिए नायाब तर्क ढूँढते रहते हैं।

अपने आरक्षित चरागाहों में अपने भाई-बहनों का प्रवेश उनके लिए असह्य ही है। ये आरक्षित क्षेत्र अघोषित नो एंट्री जोन बना दिए गए हैं। यही पश्चिम प्रेरित पूँजीवादी चरित्र है, जो साधनों-संसाधनों और सुविधाओं पर अपना वर्चस्व और स्थाई स्वामित्व चाहता है। लेकिन समय आ गया है कि अब हमें ‘तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब’, वे चाहे जिसके हों। जिनके पिछड़ेपन, अभाव और वंचना के मद्देनज़र यह प्रावधान किया गया, उन तक इसे पहुँचाना राज्य और नागरिक समाज का संयुक्त दायित्व है।

इसीलिए सरकार द्वारा क्रीमी लेयर निर्धारण में अभी तक चले आ रहे भेदभाव और अन्याय को समाप्त किया जा रहा है। अब वेतन सहित सभी स्रोतों से आय को क्रीमी लेयर निर्धारण का आधार बनाया जा रहा है। इसमें कृषि आय को भी शामिल किया जाना चाहिए। यह कानून सामाजिक न्याय की दिशा में की जा रही एक बड़ी और प्रगतिशील पहल है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए।

सरकार को क्रीमी लेयर के लिए निर्धारित वर्तमान आय सीमा 8 लाख रुपए वार्षिक को भी बहुत अधिक नहीं बढ़ाना चाहिए। इससे समाज के सर्वाधिक वंचित और पिछड़े व्यक्तियों के साथ न्याय सुनिश्चित हो सकेगा। इसके साथ ही, सरकार पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जातियों और जनजातियों में उनके पिछड़ेपन के आधार पर वरीयता क्रम में दो या तीन उपश्रेणियाँ बना सकती है। एक आरक्षित उपश्रेणी में अभ्यर्थी/आवेदक न मिलने की स्थिति में दूसरी आरक्षित उपश्रेणी के अभ्यर्थी/आवेदक को अवसर देने का प्रावधान किया जाना चाहिए ताकि श्रेणी विशेष के लिए आरक्षित पदों पर अनिवार्यतः उसी श्रेणी के लोगों को अवसर मिले और उनके लिए आरक्षित पद अभ्यर्थियों के अभाव में न तो खाली रहें और न ही सामान्य श्रेणी द्वारा लील लिए जाएँ।

हमें आरक्षण जैसे संवैधानिक प्रावधान की भावना को समझना चाहिए और उसका सम्मान करना चाहिए। जब सवर्ण समाज के साथ-साथ दलित-पिछड़ा समाज भी आरक्षण जैसे संवैधानिक प्रावधान की सच्ची भावना और उसके वास्तविक उद्देश्य को आत्मसात करेगा, तभी इसके लक्षित फल प्राप्त हो सकेंगे। इधर कुछ वर्षों से आरक्षण सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के उपकरण से कहीं अधिक सामाजिक विद्वेष और विभाजन की वजह बनता जा रहा है। आरक्षण जैसे संवैधानिक प्रावधान का लाभ उसके वास्तविक हकदारों तक पहुँचने पर ही सामाजिक न्याय और समावेशी विकास का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकेगा।

सवर्ण समाज को अपने सदियों से अधिकार-वंचित दलित-पिछड़े भाई-बहनों के प्रति सदाशय, उदार और संवेदनशील होने की आवश्यकता है। साथ ही, दलित और पिछड़े वर्गों के भी अपेक्षाकृत समर्थ और संपन्न लोगों को अपने ही समाज के कहीं अधिक असमर्थ, उपेक्षित, गरीब और वंचित व्यक्तियों और जातियों के प्रति उदार और संवेदनशील होने की भी आवश्यकता है।

विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए आरक्षण सामाजिक सशक्तिकरण और विकास का साधन न होकर ‘वोट बैंक की राजनीति’ का पर्याय है। सरकारों को भी राजनीतिक रूप से संगठित जातियों और दबाव-समूहों के प्रभाव में आकर आरक्षित वर्ग की सूची को निरंतर बढ़ाते नहीं जाना चाहिए। बल्कि उन्हें सुनिश्चित करना चाहिए कि इन वर्गों के लिए निर्धारित आरक्षण ठीक तरह लागू हो और उसका लाभ उसके वास्तविक हक़दार तबकों तक पहुँचे।

सरकारों की यह कोशिश भी होनी चाहिए कि आरक्षित वर्गों और जातियों की सूची लगातार लंबी होने की जगह क्रमशः छोटी होती जाए। इसके लिए आरक्षण का लाभ लेने वाले लाभार्थियों की आगामी पीढ़ियों को आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए। अगर आरक्षण के प्रावधानों से पिछड़ों-दलितों-वंचितों का सशक्तीकरण होता है, तो उन लाभार्थियों की भावी पीढ़ियों को क्रीमी लेयर में शामिल करके भविष्य में आरक्षण लाभ से वंचित क्यों नहीं किया जाना चाहिए? ऐसा करने से ही आरक्षण जैसे संवैधानिक प्रावधान का लाभ त्वरित गति से नीचे तक पहुँचेगा और आरक्षण के क्षेत्र में भी ‘ट्रिकल डाउन’ की सैद्धान्तिकी सचमुच फलीभूत होगी।

भारत जैसे विकासशील देश में सरकारी संस्थान, सेवाएँ, संसाधन और सुविधाएँ सीमित हैं। इसलिए इनका न्यायपूर्ण वितरण कल्याणकारी राज्य का प्राथमिक दायित्व है। समाज के सर्वाधिक वंचित व्यक्ति – दरिद्र नारायण – की हिस्सेदारी सुनिश्चित करके ही राज्य वैधता प्राप्त करता है। ऐसा करने से ही राज्य-व्यवस्था में नागरिकों की आस्था पैदा होती है और विश्वास बरकरार रहता है। इसी से विच्छिन्न और बीमार समाज स्वस्थ, समरस और सौहार्दपूर्ण बनता है।

भारत में 3 मई तक बढ़ा लॉकडाउन, 7 बातों में PM मोदी ने माँगा देश की जनता का साथ

21 दिन तक चले लॉकडाउन के बाद भारत सरकार ने आज देश की स्थिति को देखते हुए इस लॉकडाउन को 3 मई तक आगे बढ़ा दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज जनता को संबोधित करते हुए इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि 20 अप्रैल तक निरीक्षण किया जाएगा, फिर कुछ जरूरी गतिविधियों के लिए छूट दी जाएगी। उन्होंने देश की जनता को न खुद लापरवाही करने की सलाह दी और न ही किसी और को करने देने की बात की। उन्होंने इस दौरान गरीब तबके को सेवा मुहैया कराने की बात की और कहा कि नए गाइडलाइन बनाते हुए भी उन्होंने गरीबों का पूरा ध्यान रखा है।

उन्होंने आश्वस्त किया कि इस समय केंद्र सरकार व राज्य सरकार पूरी कोशिशें कर रही हैं कि जनता को कोई परेशानी न हो। राशन, दूध,सब्जी की कोई दिक्कतें नहीं हैं और 600 से ज्यादा अस्पताल हैं जो सिर्फ़ कोरोना से लड़ने का काम कर रहे हैं। इसके अलावा एक लाख बेडों की व्यवस्था हो गई है। जहाँ पहले कोरोना जाँच की एक लैब थी, उनकी संख्या अब 220 हो गई है। उन्होंने कहा कि भारत में भले ही संसाधन कम है लेकिन उनका भारत के युवा वैज्ञानिकों से विशेष आग्रह है कि विश्व कल्याण के लिए, मानव कल्याण के लिए, आगे आएँ, कोरोना की वैक्सीन बनाने का बीड़ा उठाएँ। इस संबोधन में उन्होंने सबसे धैर्य व विश्वास बनाने की अपील की।

इसके साथ ही अपनी बात को खत्म करते हुए उन्होंने 7 बातों में उनका साथ देने की अपील की।

1.अपने घर के बुजुर्गों का खास ध्यान रखें, खासकर उनका जिन्हें पुरानी बीमारी हो।
2. लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग की लक्ष्मण रेखा का पूरी तरह पालन करें। मास्क व घर में बने मास्क का उपयोग करें।
3.अपनी इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए आयुष मंत्रालय के निर्देशों का पालन करें।
4. कोरोना संक्रमण रोकने के लिए आयोग्य सेतु ऐप जरूर डाउनलोड करें। दूसरो को भी प्रेरित करें।
5. जितना हो सके, गरीब लोगों की देखरेख करें।
6. अपने व्यवसाय में, अपने उद्योग में, आपके साथ काम कर रहे लोगों के प्रति संवेदना रखें। उनका सहयोग करें, किसी को नौकरी से नहीं निकालें।
7. कोरोना योद्धाओं (डॉक्टक, नर्सों, सफाईकर्मी, सुरक्षाकर्मियों आदि) का सम्मान करें व उनका आदर करें।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज लॉकडाउन के आखिरी दिन देश को संबोधित करने आए। उन्होंने भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण का असर रोकने के लिए जनता को आभार व्यक्त किया। उन्होंने लॉकडाउन के दौरान लोगों को आई परेशानी के बारे में बात की। उन्होंने देश के नागरिकों को अनुशासित सिपाही बताया और कहा कि सब अपने कर्तव्य निभा रहे हैं। जिसके लिए वे सबको नमन करते हैं। उन्होंने बीआर अंबेडकर की जन्म जयंती के मौके पर सामूहिक शक्ति का प्रदर्शन को उन्हें दी गई सच्ची श्रद्धांजलि बताया। उन्होंने सभी देशवासियों की तरफ से बाबा साहेब को नमन किया। उन्होंने इस समय देश में होने वाले अलग-अलग त्यौहारों की बात की और कहा कि जिस संयम से लोग अपने घरों में रहकर त्यौहार मना रहे हैं- ये बेहद प्रेरक है।

उन्होंने अपनी बात की शुरुआत में कहा, “आज पूरे विश्व में कोरोना वैश्विक महामारी की जो स्थिति है, आप उसे भली-भाँति जानते हैं। अन्य देशों के मुकाबले, भारत ने कैसे अपने यहाँ संक्रमण को रोकने के प्रयास किए, आप इसके सहभागी भी रहे हैं और साक्षी भी। लॉकडाउन के इस समय में देश के लोग जिस तरह नियमों का पालन कर रहे हैं, जितने संयम से अपने घरों में रहकर त्योहार मना रहे हैं, वो बहुत प्रशंसनीय है।” 

इसके बाद उन्होंने लॉकडाउन के कारण जनता को हुई परेशानी की बात कही। उन्होंने बोला, “मैं जानता हूँ, आपको कितनी दिक्कतें आई हैं। किसी को खाने की परेशानी, किसी को आने-जाने की परेशानी, कोई घर-परिवार से दूर है। कोरोना वैश्विक महामारी के खिलाफ भारत की लड़ाई, बहुत मजबूती के साथ आगे बढ़ रही है। आपकी तपस्या, आपके त्याग की वजह से भारत अब तक, कोरोना से होने वाले नुकसान को काफी हद तक टालने में सफल रहा है।”