Home Blog Page 4982

‘पुलिस वाले भैया’ को धन्यवाद: बेसहारों का सहारा बनी पुलिस, भूखों में बाँटें भोजन के पैकेट्स

वैश्विक महामारी कोरोना से लड़ने के लिए 24 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी, अगले 21 दिनों के लिए देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा कर चुके हैं। विषय के जानकारों के अनुसार कोरोना के घातक संक्रमण से बचने के लिए लॉकडाउन करना ही वर्तमान परिस्थितियों में सर्वोत्तम विकल्प है, जो यदि ठीक तरह से कार्यान्वित हो सका तो भारत बगैर किसी बड़े नुक्सान से इस महामारी से बच निकलने में कामयाब हो सकता है। एक तरफ कोरोना से बचने के लिए उठाए गए इस अहम कदम ने देशवासियों को आशान्वित किया है कि हम जल्दी ही इस वैश्विक समस्या से निजात पा सकेंगे तो वहीं दूसरी तरफ देश के उस हिस्से के लिए भी हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है, जिसके पास इस लॉकडाउन में एक वक्त का भोजन भी मौजूद नहीं है।

देश का एक बड़ा हिस्सा ऐसे ही निर्धनतम श्रेणी के दिहाड़ी कामगारों से अटा पड़ा है। 24 मार्च मंगलवार रात को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा के 48 घंटे बाद ही देश की राजधानी दिल्ली के अलग-अलग स्लम इलाकों से ऐसी तस्वीरें आईं, जिनमें मजदूरों और उनके परिवार के लोग भूख से बिलखते दिखाई पड़ते हैं। बच्चों को भूख के चलते बार-बार माँ-बाप से खाने के बारे में पूछते देखे जाने के वीडियो, तस्वीरें आनी शुरू हो गईं थीं। इन तस्वीरों ने हमारी आशंका को मजबूती दी कि कहीं ऐसा न हो जाए कि देश में कोरोना से मरने वालों की संख्या तो न बढ़े लेकिन भूख से मरने वालों की लाशों का ढेर लग जाए।

ऐसा ही एक ट्वीट एएनआई ने किया, जिसमें जंतर-मंतर के पास फुटपाथ पर जिंदगी बिताने वाले संजय और सपना गुरुवार को रोते-बिलखते देखे गए। संजय ने बताया, “मेरी पत्नी को आठ माह का गर्भ है। बंदी के चलते हमारे पास कोई काम नहीं है, हम भूखे हैं। पता नहीं आगे क्या होगा। मेरा दर्द सुनने वाला कोई नहीं है।”

लेकिन देश की सरकारें और प्रशासन इन दिहाड़ी मजदूरों, रोज के कमाने-खाने वालों के लिए भोजन की तैयारी पहले से कर के बैठे थे। जिसकी झलक आज दोपहर देखने को मिली, जब दिल्ली के स्लम इलाकों में दिल्ली पुलिस और प्रशासन के कई कर्मचारी भोजन का पैकेट बाँटते देखे गए। न्यूज एजेंसी एएनआई की ओर से जारी वीडियो और तस्वीरों में साफ़ दिख रहा है कि मजदूर और उनके परिवार किस बेसब्री से इन खाने के पैकेटों का इंतजार कर रहे थे। फ़ूड पैकेट्स लेते हुए लोग ‘पुलिस वाले भैया’ को धन्यवाद कहना भी नहीं भूले।

पुलिस और स्थानीय प्रशासन की इस दरियादिली और सभी देशवासियों के प्रति अपनी जिम्मेदारी का यह भाव लखनऊ में भी देखने में आया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार चारबाग रेलवे स्टेशन के पास रिक्शे वाले, भिखारियों, दिहाड़ी मजदूरों आदि की लम्बी-लम्बी पंक्तियाँ मौजूद हैं, जिनके पास खाने को कुछ नहीं। यूपी पुलिस ने अब इन लोगों को दोनों वक्त का खाना खिलाने की जिम्मेदारी ले ली है। मीडिया के अनुसार लखनऊ ईस्ट के एसीपी चिरंजीव नाथ सिन्हा ने बताया, “यह 21 दिन तक रहेगा। इनका पहले हैंड सैनिटाइज कराया गया है। दूरियाँ बना दी गई हैं, ताकि सुरक्षित रहें। साथ ही इन लोगों को एक-एक पानी की बोतल और एक-एक साबुन भी दिया गया है ताकि ये जब भी खाना खाएँ, पहले अपना हाथ धोएँ। ये व्यवस्था 21 दिनों तक रहेगी।

मामले के जानकारों के अनुसार पुलिस की तरफ से कोशिश की जा रही है कि हर पुलिस चौकी क्षेत्र में उस इलाके के पुलिसवाले कुछ गरीब और बेसहारा लोगों को खाना खिलाएँ। लखनऊ ईस्ट के डीसीपी दिनेश सिंह ने इस बारे में बताया कि हमसे जो हो पा रहा है, हम प्रयास कर रहे हैं, साथ ही कुछ संस्थाओं ने भी हमें इस कार्य में हाथ बँटाने का प्रस्ताव रखा है।

ग्लोबल लीडर बनने का चायनीज षड्यंत्र: हजारों मौत के बाद का प्रोपेगेंडा, कई देश आए वामपंथी लपेटे में!

“हालाँकि चीन के वुहान शहर से कोरोना संक्रमण का पहला मरीज सामने आया था, लेकिन यह इस बात का साक्ष्य नहीं माना जा सकता कि चीन ही कोरोना संक्रमण COVID-19 का स्रोत है।”

उपरोक्त प्रेस रिलीज दिल्ली स्थित चीनी दूतावास ने बुधवार की शाम को जारी की। यह प्रेस रिलीज इस दृष्टिकोण की पुष्टि करता है कि जहाँ एक तरफ सम्पूर्ण विश्व कोरोना महामारी से जीवन-मृत्यु के संघर्ष में उलझा है, वहीं चीन अपने हुबेई प्रॉविन्स से प्रतिबंधों को ढिला कर रहा है, जिससे अब कोरोना संक्रमण के नए मामले अपेक्षाकृत कम संख्या में सामने आ रहे हैं। इसके साथ ही बीजिंग अपने इस पाप से बचने के लिए, एक नैरेटिव गढ़ने की फ़िराक में जुटा हुआ है। इसके लिए वह पूरी दुनिया में एक आक्रामक प्रोपेगेंडा चला रहा है।

चीनी राष्ट्रपति के वुहान दौरे के बाद से ही चीनी प्रोपेगेंडा चैनल इस बात पर लगातार जोर देते रहे हैं कि कोरोना वायरस शायद चीन में पैदा ही नहीं हुआ। 27 फरवरी को चीन के प्रसिद्ध epidemiologist (यानी बीमारियों के पैदा होने, उनके उपचार, और रोकथाम जैसी मेडिसिन की शाखा से जुड़े) झॉंग नानशान जो अभी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य हैं, कहते हैं – “हालाँकि SARS-CoV-2 नामक बीमारी सबसे पहले चीन में ही खोजी गई थी लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह पैदा भी चीन में हुई।”

यही लाइन दक्षिण अफ्रीका में चीन के राजदूत, लींग सॉन्गतियन ने भी 7 मार्च को अपने ट्विटर पोस्ट के जरिए दोहराई। चीनी विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता लीजियन झाओ ने 12 मार्च को किए एक ट्वीट में वुहान में फैले इस घातक वायरस संक्रमण के लिए सीधे-सीधे अमेरिकी आर्मी को जिम्मेदार ठहराया। उसने अपने ट्वीट में लिखा, “यह हो सकता है कि अमेरिकी आर्मी इस कोरोना महामारी को वुहान लाई हो।” उसने अपने ट्वीट में यह भी दावा किया कि अमेरिका को इस संबंध में चीन को स्पष्टीकरण देना चाहिए। झाओ की यह टिप्पणी, अमेरिका के सेंट फैट्रिक स्थित संक्रामक बीमारी से संबंधित लेबोरेट्री के कामकाज को अचानक से ठप्प किए जाने के संबंध में देखी जा रही है। मैरीलैंड स्थित यह लेबोरेट्री जुलाई 2019 में अचानक से तब बंद कर दी गई थी जब अमेरिका के ‘डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन सेंटर’ ने इस लैब को बंद करने का आदेश दिया था।

चीनी प्रोपेगेंडा मशीनरी इस कोरोना महामारी के उद्भव को लेकर अपने नैरेटिव को गढ़ने के लिए पिछले साल अक्टूबर में अमेरिका में हुए ‘इवेंट 201 पैंडेमिक रिहर्सल’ पर भी ऊँगली उठाने में लगी है। इस इवेंट के समय ही वुहान में हुए विश्व मिलिट्री गेम्स में अमेरिकी सेना की तरफ से भी 300 सैनिकों का एक दल गया था। चीनी प्रोपेगेंडा मशीनरी अपने नैरेटिव को सेट करने के लिए इन दोनों को एक साथ मिला कर ‘कच्चे माल’ की तरह प्रयोग करने में लगी हुई है। इसके साथ ही कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने विश्व भर में स्थित अपने दूतावासों को यह संदेश भेजा हुआ है कि वो सभी चीन के प्रति झुकाव रखने वालों को इस बात के लिए राजी कर लें कि वे कभी इस बात का जिक्र न करें कि कोरोना वायरस का उद्भव चीन में हुआ है। साथ ही इस बात पर जोर दें कि इस वायरस की उत्पत्ति अभी अज्ञात है।

मंगलवार को बीजिंग ने भारत से प्रार्थना की कि वह इस नोबल वायरस के संबंध में चीन का नाम न ले क्योंकि इससे चीन की छवि खराब होगी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग में बाधा पड़ेगी। इसके अलावा चीन अब उन देशों को मदद भी कर रहा है, जो इस कोरोना महामारी से बदहाल हैं। उसने अब तक अपनी कई मेडिकल टीमों को ईरान, इराक और इटली में इस महामारी से निपटने के लिए भेजा है। जब इटली की मदद के लिए कोई यूरोपीय देश सामने नहीं आया, चीन ने 31 टन मेडिकल सामग्री इटली भेजी। इसमें 1000 वेंटिलेटर्स, 2 मिलियन मास्क, 1 लाख रेस्पिरेटर्स, 20000 बचाव सूट और 50000 टेस्ट किट शामिल हैं। चीन ने 250000 मास्क और अपनी मेडिकल टीमों को ईरान भी भेजा। सर्बिया के राष्ट्रपति ने तो यूरोपीय सहयोग और बंधुत्व को महज एक ‘दिवास्वप्न’ करार देते हुए कहा कि सिर्फ चीन ही था, जिसने उनकी मदद की।

चीन को अच्छे से पता है कि यदि वह इस कोरोना महामारी के दौरान विश्व स्तर पर यह संदेश देने में कामयाब हो गया कि उसने इस संकट के समय वैश्विक स्तर पर एक सकारात्मक भूमिका निभाई है जो कि ट्रम्प का अमेरिका नहीं कर सका, तो ऐसे में 21 वीं सदी के वैश्विक नेता की दौड़ में चीन बाकियों से कहीं आगे खड़ा हो सकता है। इस प्रकार जहाँ एक तरफ चीनी प्रोपेगेंडा मशीनरी इस वायरस के उद्भव में चीन का नाम न लिया जाए – इस बात के लिए पूरी मशक्क्त से लगी हुई है, वहीं दूसरी तरफ चीन ने इस पर कितनी जल्दी काबू पाया और कैसे अब वह अपनी इस काबिलियत का फायदा दुनिया भर के पीड़ित देशों तक पहुँचा रहा है, इस नैरेटिव को सेट कर रहा है। जहाँ पूरी दुनिया में रोजाना हजारों मौतें इस घातक महामारी के चलते हो रही, वहीं चीन इस दुर्भाग्यपूर्ण समय को खुद के लिए एक अवसर के तौर पर देख रहा है, जो उसे 21वीं सदी की और मान्य वैश्विक नेता के तौर पर स्थापित कर सकता है। चीन के इस पहलू को वैश्विक शक्तियों तथा चीन के क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी भारत को बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

COVID 19: DMRC का बड़ा फैसला, अब 14 अप्रैल तक नहीं चलेगी दिल्ली मेट्रो

21 दिन के सम्पूर्ण लॉकडाउन के मद्देनजर दिल्ली मेट्रो ने आज गुरूवार को एक ट्वीट के जरिए इस बात की घोषणा कर दी कि दिल्ली मेट्रो अब 14 अप्रैल तक बंद रखी जाएगी। दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन की यह घोषणा अपेक्षित ही थी। याद रहे कि इसके पहले दिल्ली मेट्रो कॉर्पोरेशन ने 22 मार्च के जनता कर्फ्यू वाले दिन मेट्रो सेवाओं को बंद रखने के बाद, दिल्ली मेट्रो सेवा को 31 मार्च तक बंद रखने का ऐलान किया था।

वैश्विक महामारी कोरोना से लड़ने के लिए एक के बाद एक देशों के लॉकडाउन होते जाने के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने बीते मंगलवार को ही भारत में 21 दिनों के सम्पूर्ण लॉकडाउन की घोषणा की थी। उन्होंने देश के नाम अपने सम्बोधन में सभी से अपने अपने घरों में बने रहने और घर की सीमा को ही लक्ष्मण रेखा मानने का निवेदन किया था।

आज बृहस्पतिवार को दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने राजधानी में कोरोना संक्रमण की स्थिति के बारे में बताया। केजरीवाल ने कहा कि अब तक दिल्ली में कोरोना वायरस के कुल 36 केस सामने आए हैं, जिनमें से 26 लोग विदेश से आए थे। और, इन्हीं के कारण 10 और लोगों में कोरोना का संक्रमण फैला। ध्यातव्य है कि स्वास्थ्य मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार अब तक भारत में कोरोना के कुल मामलों की संख्या बढ़कर 606 हो गई है, जिनमें 43 ऐसे मामले भी शामिल हैं, जो ठीक हो चुके हैं और 14 लोग ऐसे हैं, जो इसके संक्रमण में आने के कारण दम तोड़ चुके हैं। इसी वजह से कोरोना की रोकथाम के लिए केन्द्र सरकार ने भारत में 21 दिनों के लिए लॉकडाउन की घोषणा की है। जिस दौरान प्रधानमंत्री ने लोगों को अपने घरों में ही बने रहने को कहा है।

कोरोना एक चीनी वैज्ञानिक प्रयोग का नतीजा? चमगादड़ से मनुष्य तक वायरस के सफर का पोस्टमॉर्टम

21वीं सदी में, यानी जेनेटिक इंजीनियरिंग, रोबोटिक्स और आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस के इस अति वैज्ञानिक युग में किसी देश में Covid-19 जैसे वायरस का संक्रमण सम्भवतः एक वैज्ञानिक भूल से निर्मित अविष्कार होता है। लेकिन बीते साल के दिसम्बर माह में चीन के वुहान प्रांत से शुरू हुए इस वायरस के उद्गम और प्रभाव पर अब कई समानांतर थ्योरी भी सामने आ रही हैं। इसकी उत्पत्ति को लेकर बायो टेरेरिज्म जैसे विभिन्न विवादास्पद सिद्धान्त सामने आना स्वाभाविक भी है। खासकर संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के इसे चायनीज वायरस नाम देने से इस महामारी के प्रति लोग सतर्क होते नजर आ रहे हैं।

जहाँ एक ओर रूस, अरब, सीरिया, जैसे देश चीन में फैले कोरोना वायरस के लिए अमेरिका और इजरायल को दोष दे रहे हैं वहीं अमेरिका खुद चीन को ही कोरोना का जनक बता रहा है। इस बीच सबसे दिलचस्प बात यह है कि अपने बयानों को साबित करने के साक्ष्य किसी के पास नही हैं, लेकिन अपने-अपने तर्क सभी के पास हैं।

इससे पहले रूस 1980 के शीत युद्ध के दौर में एचआईवी के संक्रमण के लिए भी अमेरिका को जिम्मेदार बता चुका है। जबकि अरबी मीडिया का कहना है कि अमेरिका और इजरायल ने चीन के खिलाफ मनोवैज्ञानिक और आर्थिक युद्ध के उद्देश्य से इस जैविक हथियार का प्रयोग किया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस कोरोना वायरस की उत्पत्ति चीनी शहर वुहान के समुद्री जीवों को बेचने वाले बाज़ार से हुई है। ये बाज़ार जंगली जीवों, जैसे- साँप, रैकून और साही के अवैध व्यापार के लिए चर्चित था।

सार्स, Covid-19, नोवेल कोरोना वायरस, आदि शब्द आम जनता के लिए नए हो सकते हैं, लेकिन विज्ञान के क्षेत्र से जुड़े और विज्ञान में दिलचस्पी रखने वाले लोग जानते हैं कि कोरोना वायरस कोई नया शब्द नहीं है। वर्ष 2002 से 2003 के बीच जिस तरह से सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिन्ड्रोम (सार्स, SARS) ने तबाही मचाई थी, उससे कहीं ज्यादा बड़ी महामारी बनकर अब नोवेल कोरोना वायरस उभरकर सामने आया है।

16-17 मई 2003 को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) SARS की महामारी पर पहली ग्लोबल बैठक का जिनेवा, स्विट्जरलैंड में आयोजन किया। इस बैठक के 2 प्रमुख उद्देश्य थे:

  • 1- इस वायरस द्वारा जनित महामारी पर तत्कालीन सेन्सस डॉक्यूमेंट तैयार करना।
  • 2- अतिरिक्त किसी महामारी पर शोध की प्लानिंग और जानकारी में मौजूद खामियों को तलाशना।

एक अध्ययन में बताया गया है कि अभी तक मौजूद जानकारी के अनुसार इस वायरस की एक बड़ी फैमिली है, जिसमें से केवल छह वायरस ही इंसान को संक्रमित कर सकते हैं। माना जा रहा है कि इंसानों में बीमारी फैलाने वाला कोरोना वायरस इस फैमिली का सातवाँ सदस्य है। SARS-CoV, MERS-CoV and SARS-CoV-2 गंभीर रोग पैदा कर सकते हैं, जबकि HKU1, NL63, OC43 और 229E में हल्के लक्षण देखे जा सकते हैं।

इसमें बताया गया है कि कुछ देशों के दावों के विपरीत SARS-CoV-2 को किसी प्रयोगशाला में नहीं बनाया जा सकता है, ना ही इसे किसी जैविक युद्ध के उद्देश्य से तैयार किया जा सकता है और यह हर हाल में एक पशुजन्य रोग ही है। SARS-CoV-2 बीटा CoVs केटेगरी से सम्बंधित है और अन्य CoVs की तरह ही, यह अल्ट्रावायलेट किरणों और गर्मी के प्रति संवेदनशील है।

वैज्ञानिकों ने पाया कि SARS-CoV-2 स्पाइक प्रोटीन का RBD हिस्सा मानव कोशिकाओं के उस बाहरी हिस्से के मोलिक्युलर ढाँचे को प्रभावित करने के लिए विकसित हुआ था, जिसे ACE2 कहा जाता है। यह रक्त प्रेशर को नियंत्रित करने में सहयोगी एक रिसेप्टर है। SARS-CoV-2 स्पाइक प्रोटीन मानव कोशिकाओं को बाँधने में इतना प्रभावी था कि वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला कि यह प्राकृतिक चयन का परिणाम था, न कि किसी आनुवांशिक इंजीनियरिंग का।

क्योंकि CoVID-19 बीमारी के पहले मामलों को वुहान के हुआनन सीफूड होलसेल मार्केट के सीधे संपर्क से जोड़ा गया था, इसलिए पशु-से-मानव संचरण को इसके संक्रमण का प्रमुख तंत्र माना गया था। फिर भी, बाद के मामले इस प्रकार के संचरण तंत्र से जुड़े नहीं थे। इसलिए, यह निष्कर्ष निकाला गया कि वायरस को मानव-से-मानव में भी प्रेषित किया जा सकता है, और कोरोना वायरस से संक्रमित लोग ही COVID-19 के प्रसार का सबसे बड़ा स्रोत हैं।

ह्यूमन कोरोना वायरस (HCoV) की पहचान पहली बार 1960 के दशक में हुई थी। 2003 के बाद पाँच नए प्रकार के मानव कोरोना वायरस खोजे जा चुके हैं। किन्तु 2003 के बाद से चीन से SARS का प्रसार आरम्भ हुआ। इस SARS वायरस फैमिली का पुराने किसी प्रकार के कोरोना वायरस से सम्बन्ध नहीं था, जिस कारण इसे तीसरा कोरोना परिवार माना गया। 2002-03 में कुल 8,098 लोग SARS कोरोना वायरस से संक्रमित हुए, जिनमें से 774 लोग संक्रमण के कारण मारे गए। उसके कारणों की पूरी जाँच आज तक भी नहीं हो सकी किन्तु चीन के जंगली पशुओं के मांस के व्यापार से उसका सम्बन्ध जरूर स्थापित हो चुका है। वर्तमान में जो महामारी पूरे विश्व में फैली है, वह बिल्कुल नए प्रकार का कोरोना वायरस है जिसका प्रचलित नाम COVID-19 है।

हॉर्सशू चमगादड़ से मानव तक SARC वायरस के संक्रमण का सफर

एक अन्य अध्ययन में बताया गया है कि ये नया कोरोना वायरस चीनी हॉर्सशू चमगादड़ में मिलने वाले वायरस से मिलता जुलता है। हालाँकि, इस पर अभी तक भी आखिरी राय नहीं बन पाई है कि आज जिस स्थिति से चीन के बाद पूरा विश्व जूझ रहा है, उसके लिए यही चमगादड़ ज़िम्मेदार है। लेकिन यह सम्भव है कि इन चमगादड़ों के शरीर से वायरस दूसरे जानवर के शरीर में आया हो।

सबसे पहले जब इस वायरस के संक्रमण की ख़बर मिली तो वैज्ञानिकों का कहना था कि ये इंसानों से इंसानों में नहीं फैलता लेकिन बाद में पता चला है कि इस वायरस से संक्रमित एक व्यक्ति 1.4 से लेकर 2.5 लोगों को संक्रमित कर सकता है। यही वजह है कि जब तक शोधकर्ता किसी निर्णय तक पहुँचते कि शहरों को पूरी तरह ठप कर के ही इसके संक्रमण को रोका जा सकता है। तब तक यह कई देशों में फैल चुका था।

1 दिसम्बर 2017 को नेचर में प्रकाशित एक लेख में बताया गया है कि चीन भर में चलाए गए खोजी अभियान के बाद, आखिरकार घातक सार्स वायरस की उत्पत्ति को ढूँढ लिया था। चीन के युन्नान प्रांत की एक दूरस्थ गुफा में, विषाणु विज्ञानियों ने ‘हॉर्सशू चमगादड़ों’ की एक एकल आबादी की पहचान की, जिसने कि वर्ष 2002 में मनुष्यों में भी पैर पसार लिए थे और तकरीबन 800 लोगों की मौत का कारण बना। शोधकर्ताओं ने कहा था कि मौत के लिए जिम्मेदार यह वायरस आसानी से चमगादड़ों की ऐसी आबादी से ही आया होगा।

उन्होंने आगाह किया था कि ऐसी ही कोई बिमारी भविष्य में भी जन्म ले सकती है। 2002 के उत्तरार्ध में, एक रहस्यमयी निमोनिया जैसी बीमारी के मामले दक्षिण-पूर्वी चीन के गुआंगडोंग प्रांत में सामने आने लगे। इस बीमारी को SARS नाम दिया गया, जिसने उस समय भी वैश्विक आपातकाल को जन्म दिया। वर्ष 2003 में यह देखते ही देखते दुनिया भर में फैल गया, जिससे हजारों लोग संक्रमित हुए।

वैज्ञानिकों ने इसके लिए जिम्मेदार कोरोना वायरस को ढूँढ निकाला और उसी के जैसे जैनेटिकली सामान वायरस गुआंगडोंग प्रांत के पशु बाजार में बिकने वाले उदबिलाव (Paguma larvata) में भी पाया। कोरोना वायरस के वाहक की तलाश वैज्ञानिक निरंतर करते आए हैं, इस बार कोरोना वायरस के मानव तक संक्रमण के लिए पेंगोलिनो को जिम्मेदार बताया जा रहा है। कुछ चीनी वैज्ञानिकों ने करीब हजार जानवरों पर परीक्षण करके इस निष्कर्ष तक पहुँचें थे।

2003 की महामारी के बाद किए गए सर्वेक्षणों में बताया गया कि SARS संबंधित कोरोनो वायरस बड़ी संख्या में चीन के हॉर्सशू चमगादड़ (राइनोफस-2) में संचरण कर रहे थे। साथ ही यह सुझाव दिया कि संभवतः चमगादड़ों से ही यह घातक रोग उत्पन्न हुआ था, और बाद में उदबिलाव के माध्यम से यह मनुष्यों तक पहुँचा। लेकिन महत्वपूर्ण जीन, जो कि एक वायरस को कोशिकाओं को संक्रमित करने और संक्रमित करने की अनुमति देता है, मानव और ज्ञात चमगादड़, दोनों में अलग थे, जिस कारण से यह इस परिकल्पना पर संदेह के लिए थोड़ा सा जगह छोड़ता है।

इसके बाद इन चमगादड़ों की खोज के लिए अभियान चलाए गए, इसमें सबसे मुश्किल काम सुदूर जगहों और गुफाओं को लोकेट करना था। दक्षिण-पश्चिमी चीन के युन्नान में एक विशेष गुफा को खोजने के बाद, जिसमें कोरोनो वायरस के लक्षण मानव संस्करणों के समान दिखते थे। शोधकर्ताओं ने वहाँ पाँच साल बिताए और वहाँ मौजूद चमगादड़ों की निगरानी की।

उनके लिए आश्चर्य का विषय अब यह था कि युन्नान प्रान्त में किसी भी मनुष्य को प्रभावित किए बिना मानव आबादी से हजारों किलोमीटर दूर रहने वाले चमगादड़ों से SARC वायरस आखिर उन तक पहुँचा कैसे? लेकिन उन्होंने अनुमान लगाया कि शायद ऐसे ही चमगादड़ों की कोई बड़ी आबादी किसी अन्य कस्बे के निकट मौजूद रही होगी। उन्होंने इसके बाद सतर्क किया था कि 2003 की ही भाँती यह वायरस आगे भी कोई बड़ी आपदा पैदा कर सकता है।

मस्जिद से निकलती भीड़ को पुलिस ने दौड़ा-दौड़ा कर मारा, भागते समय भी जूते-चप्पल समेटने पर था ध्यान

धर्म आस्था का विषय है, व्यक्तिगत विषय है। लेकिन शायद सबके लिए नहीं! कर्नाटक के बेलगाम (Belgaum) में एक मस्जिद में गई भीड़ के लिए तो बिल्कुल भी नहीं। इस भीड़ के लिए नमाज पढ़ने से ज्यादा मस्जिद में नमाज पढ़ना जरूरी है। इस भीड़ के लिए जरूरी यह भी है कि देश अगर संकट के दौर से गुजर रहा हो तो भी अंधभक्ति को प्राथमिकता देना है।

संपूर्ण देश में लॉकडाउन का उल्लंघन कर कई लोग बेलगाम की मस्जिद में नमाज के लिए पहुँच गए। स्थानीय पुलिस ने ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए नमाज के बाद मस्जिद से निकलते समय डंडे से पिटाई की। कुछ लोग इस विडियो को “कर्नाटक में पुलिस की बर्बरता” कह कर शेयर कर रहे हैं। उनके लिए यह जानना जरूरी है कि लॉकडाउन के दौरान मंदिर-मस्जिद में भी जाना प्रतिबंधित है।

मामला सिर्फ बेलगाम की मस्जिद तक सीमित नहीं है। देहरादून के भी कुछ कट्टरपंथियों ने मस्जिद में जमा होकर नमाज पढ़ने की जिद ठान ली थी। पुलिस जब पहुँची तो डर कर भागे। उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में तो हद ही कर दिया कट्टरपंथियों ने। लॉकडाउन के बाद भी भीड़ नमाज के लिए जुट गई। और तो और, समझाने पहुँची पुलिस से भी वहाँ की मस्जिद में जुटे नमाजी भिड़ गए।

लॉकडाउन के बाद भी मैनपुरी की मस्जिद में जुटे नमाजी, मौके पर पहुँची पुलिस से भिड़े

लॉकडाउन के बाद भी देहरादून की मस्जिद में जमा हुए नमाजी, पुलिस को देखते ही हुए फरार

65 साल की राबिया का कोरोना से मौत: जहाँ गई थी CAA विरोध-प्रदर्शन में, वहाँ हिस्सा लेने वाले हर लोग खौफ में!

क्या अफगान-तालिबान शांतिवार्ता की घुटन का परिणाम है ISIS द्वारा गुरूद्वारे पर हमला, भारत में लिबरल-वामपंथी गिरोह की चुप्पी के मायने?

इस बीच चाइनीज़ लोगों के खाने-पीने की गलत आदतों से फैले वुहान वायरस से पूरी दुनिया संकटग्रस्त है और उधर अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट के मुजाहिदों ने काबुल के शोरबाज़ार इलाके के अकेले गुरूद्वारे में आत्मघाती हमला कर 27 सिख श्रद्धालु की कायरतापूर्ण हत्या कर दी। इस संकट की घड़ी में इस्लामिक स्टेट के धार्मिक रूप से संकटग्रस्त सिख-हिन्दू लोगों पर हमले ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया हैl इस हमले के बाद ऐसा लगता है कि इराक और सीरिया में इस्लामिक स्टेट की कमर टूटने में कोई कसर बाकि रह गई थी। इस कारण इसके आतंकी अपनी आदतों से बाज नहीं आ रहे हैं। इस्लामिक स्टेट का भले ही इराक-सीरिया से खात्मा हो रहा है लेकिन भारत में इसके ब्रीडिंग ग्राउंड अभी भी मौजूद हैं। अभी हाल ही में पश्चिम बंगाल से इसके एक मॉड्यूल का खुलासा हुआ है। जो भारत में किसी बड़ी साजिश की ओर इशारा कर रहा है।  

गौरतलब है कि कल यानी 25 मार्च को जब ये हमला हुआ उस वक़्त अरदास के लिए गुरुद्वारे में कई छोटे-छोटे बच्चे भी मौजूद थे। हमले के बाद हर तरफ चीख-पुकार मची हुई थी। सुरक्षाकर्मियों ने जब उन्हें बाहर निकाला, तब उनके चेहरे पर खौफ साफ दिखाई दे रहा था।

हमले के समय का चुनाव 

सिखों पर इस हमले का चुनाव इस्लामिक स्टेट के मुजाहिद उस वक्त किए जब अफगानिस्तान के गिने-चुने हिन्दू और सिख वैशाख का पर्व मनाते हैं। इस पर्व को अफगानिस्तान के हिन्दू और सिख बहुत ही उत्साह से मनाते हैं। हालाँकि, यह अफगानिस्तान के सिखों और हिन्दुओं पर कोई पहला हमला नहीं है। इसके पूर्व वर्ष 2018 में इसी तरह से इस्लामिक स्टेट के मुजाहिदों ने अफगानी राष्ट्रपति से मिलने जा रहे हिन्दू और सिखों से भरे हुए बस को बम से उड़ाकर 20 लोगों की जघन्य हत्या कर दी थी।  

इस हत्या का मकसद बेशक जिहाद तो है ही लेकिन इसका एक मायना यह भी है कि इस्लामिक स्टेट के जिहादी इस बात से खफा हैं कि अफगान सरकार और तालिबान के बीच चल रहे शांति समझौते के लिए सरकार ने इस्लामिक स्टेट को क्यों नहीं आमंत्रित किया।

पाठकों की सहूलियत के लिए एक बात का जिक्र कर दूँ कि मुजाहिद और तालिबानियों में अंतर है– मुजाहिद वो हैं जिसने रूस की लाल सेना के विरुद्ध अमरीका और पाकिस्तान के संरक्षण में जंग किया था। मुजाहिद का निर्माण कोई नया नहीं है। मुजाहिद, जिहाद के लिए लड़ने वाले लड़ाके होते हैं। ब्रिटिश काल में ये अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला लड़ाई करते थे। अफगानिस्तान के प्रसिद्ध इतिहासकार फैज मोहम्मद कितब हजारा मुजाहिदों के बारे में लिखते हैं कि मुजाहिद अफगानी सरदारों के लड़ाके होते थे जो कि लूट, बलात्कार और हत्याओं के लिए कुख्यात थे। इसलिए उनका निशाना हमेशा काबुल रहा क्योंकि काबुल में पर्याप्त धन संपदा थी।

समय-समय पर इन मुजाहिदों ने अफगानिस्तान के हिन्दू और सिखों को निशाना बनाया क्योंकि हिन्दू और सिख बहुत धनवान थे l इन पर हमला करके इनको मालो-असबाब तो मिलता ही था, साथ ही साथ काफिरों की हत्या का मजहबी लुत्फ़ उठाकर ये जन्नत की गारंटी भी ले लेते थे। हिन्दू और सिखों पर इन मुजाहिदों के इन लगातार मजहबी हमले का ये असर हुआ कि जहाँ 1970 तक काबुल और उसके आसपास के क्षेत्रों में 7 लाख के आसपास हिन्दू और सिख बिरादरी रहते थे। अफगान वार के ख़त्म होते होते-यानि 1990 तक इनकी आबादी महज कुछ हजारों में सिमट गई। मुजाहिदों के इस बेरहम हमले से सिख और हिन्दू बिरादरियों के मंदिर और गुरूद्वारे बुरी तरह तबाह हो गए और ज्यादातर हिन्दू और सिख अफगानिस्तान के अपने कारोबार समेट कर दूसरे मुल्कों का रुख कर लिए। 

इसके उलट तालिबानी मुजाहिद अफगानिस्तान में शरिया लागू करने के पक्षधर हैं। हालाँकि, इनका विचार भी मुजाहिदों की ही तरह है लेकिन सर्वहारा विचारों की वकालत करने वाले तालिबानियों ने काबुल की जगह अपना ठिकाना कंधार को बनाया। कंधार अफगानिस्तान का एक पिछड़ा इलाका है। कंधार को अपना केंद्र बनाने के पीछे तालिबानियों का इस्लाम की तरफ ज्यादा झुकाव को दर्शाना और व्यापक जनसमर्थन हासिल करना है। साथ-साथ तालिबानी,  इन बर्बर मुजाहिदों से इस रूप में भी अलग है कि तालिबानी अपने विरोधियों पर हमला करने के बाद उनकी प्रॉपर्टी नहीं लूटते हैं। उनकी खबातीनों को आपस में बाँट कर उनका बलात्कार नहीं करते हैं। इसलिए इन तालिबानियों के शासन में बचे हुए सिखों और हिन्दुओं को थोड़ी राहत भी मिली क्योंकि इन लोगों ने काबुल में रह रहे हिन्दू-सिख सहित अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना कम बनाया।

तालिबानियों के इसी शासनकाल में हिन्दुओं और सिखों को अपने घर और बदन पर पीला कपड़ा बाँधने को कहा गया था। जिसका मौलिक कारण हिन्दू-सिखों की धार्मिक पहचान हो सके और नमाज या अन्य इस्लामिक मूल्यों की अवमानना करने वाले मुस्लिमों को दंड देते वक्त हिन्दू और सिख को इससे अलग किया जा सके। हालाँकि, बाद में इस प्रथा का ब्रिटेन और अमरीका में विरोध भी हुआ लेकिन यह प्रथा वहाँ निर्बाध रूप से जारी है। वर्त्तमान में इस्लामिक स्टेट के खतरे कम नहीं हुए हैं आज ये मुजाहिदीन भारत और अफगानिस्तान के खिलाफ पाकिस्तान का प्रॉक्सी वार लड़ रहे हैं।  

इन हमलों के मायने क्या हैं? 

अफगानिस्तान में भारत के विकास कार्यों में अभूतपूर्व योगदान से पाकिस्तान तिलमिलाया हुआ है। आज बड़ी संख्या में अफगानी छात्र भारत में आकर पढ़ाई करते हैं। किसी भी अन्य मुल्कों के मुकाबले अफगानी भारत के लोगों को बहुत मोहब्बत करते हैं। अफगानी भारतीय फिल्मों के दीवाने हैं और अभी भी भारतीय फिल्मों के पुराने गाने वहाँ के लोग बड़े मोहब्बत से गुनगुनाते हैं। इसके उलट पाकिस्तान के प्रति इस देश में वो लगाव नहीं है। पाकिस्तान भी अफगानियों के बीच संबंधों को ऑर्गेनिक करने के लिए भारत की नकल करता है लेकिन वो उसमें कभी सफल नहीं रहा। अभी तालिबान और अफगान सरकार के बीच चल रहे शांति वार्ता से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है। जिसके कारण वो अफगान में अल्पसंख्यक धार्मिक समूहों को निशाना बना रहा है। बेशक इस्लामिक स्टेट पाकिस्तान का प्रॉक्सी है। पाकिस्तान भले ही अपनी धृष्टता लोगों से छुपाता रहा हो लेकिन भारत सहित अन्य शांतिप्रिय देश पाकिस्तान के मुजाहिदों के इस हरकत को नज़रंदाज़ नहीं करेगा।  

कल गुरूद्वारे पर हमले के बाद पूरा अफगानिस्तान अपने सिख-हिन्दू भाइयों के लिए उमड़ पड़ा और अपनी सहानुभूति व्यक्त कर उसके साथ खड़े होने की दृढ़ता दिखाई। इस हमले पर अभी तक तालिबान की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। इस्लामिक स्टेट ने इसकी जिम्मेदारी लेकर एक बार फिर अपना घिनौना चेहरा दुनिया के सामने रख दिया। इधर भारत में लिबरल-वामपंथी गिरोह इसको लेकर चुप्पी साधे हुए है। जैसे उसने सुकमा में नक्सली हमले के वक्त साधा था। भारत के वामपंथियों का एक धड़ा अभी जिनपिंग सरकार को डिफेंड करने में लगा है, और एक धड़ा (रसिया समर्थक) जी जिनपिंग को उखाड़ फेंकने की बात कर रहा है। खैर वक्त सबका हिसाब करता है।

नोट : यहाँ सिख-हिन्दू का अर्थ अफगानिस्तान और पाकिस्तान के लिए एक इकाई की तरह है, क्योंकि इन मुल्कों में धार्मिक स्थलों के विनाश, शिक्षा से वंचना और उत्पीड़न दोनों समुदायों के मामूली धार्मिक विभेद को ख़त्म कर दिया है और ये कमोबेश धार्मिक स्थल और पर्व को आपस में शेयर करते हैं।

65 साल की राबिया की कोरोना से मौत: जहाँ गई थी CAA विरोध-प्रदर्शन में, वहाँ हिस्सा लेने वाले हर लोग खौफ में!

कोरोना का कहर पूरे देश में जारी है। हर कोई इसकी रोकथाम के लिए तरह-तरह के उपाय कर रहा है। इसी बीच मध्य प्रदेश से एक खबर आई है, जहाँ 65 वर्षीय महिला की कोरोना की चपेट में आने से मौत हो गई। इसी के साथ मध्य प्रदेश में कोरोना से मौत का पहला मामला सामने आया है, जबकि भारत में इससे मौत का आँकड़ा 14 हो गया है। वहीं बताया जा रहा है कि कोरोना से मृतक 65 वर्षीय महिला ने मध्य प्रदेश में आयोजित सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में भाग लिया था। इस खबर के बाद से स्वास्थ्य विभाग में और उन लोगों में हड़कंप मच गया है, जिन्होंने सीएए विरोध के धरने में हिस्सा लिया था।

दरअसल मध्य प्रदेश में बुधवार को कोरोना पीड़ित उज्जैन के जानसापुरा निवासी 65 वर्षीय महिला ने इंदौर के एक अस्पताल दम तोड़ दिया। 22 मार्च को बीमार हुई महिला को शुरुआत में उज्जैन के एक धर्मार्थ अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ उसकी हालत में सुधार नहीं होने पर इंदौर के सरकारी अस्पताल महाराजा यशवंतराव में भर्ती कराया गया, लेकिन महिला ने बुधवार शाम करीब 5.30 बजे दम तोड़ दिया।

जिलाधिकारी (इंदौर) लोकेश कुमार जाटव ने मीडिया को बताया कि महिला को कोरोना पॉजीटिव था। इसके साथ ही महिला मधुमेह और साँस जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित थी। शुरुआत में महिला को सर्दी और खाँसी के साथ साँस लेने में तकलीफ थी। लक्षणों को देखते हुए डॉक्टरों ने राबिया को इंदौर के एमवाई अस्पताल में भेज दिया, जहाँ हुई जाँच में उसे कोरोना पॉजीटिव पाया गया। हालाँकि मृतक महिला राबिया ने कोई विदेश की यात्रा नहीं की थी। हाँ, उसने उज्जैन में आयोजित सीएए विरोध में हिस्सा जरूर लिया था साथ ही इंदौर में एक शादी में भाग लिया था। इसके बाद उन लोगों में हड़कंप मच गया है, जिन लोगों ने सीएए विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था या महिला से किसी न किसी रूप से करीब आए थे।

वहीं महिला की मौत के बाद प्रशासन ने उज्जैन और इंदौर शहर में कर्फ्यू लगा दिया है। साथ ही जहाँ महिला रहती थी, उसके निवास की सभी सीमाओं को सील कर दिया गया है। महिला की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग ने 40 लोगों की जाँच की है जो किसी न किसी तरह से महिला के संपर्क में आए थे। इस बीच महिला के 11 परिवार के सदस्यों की भी स्क्रीनिंग की गई, जिनमें से महिला की बहू और बेटे के साथ पाँच परिवार के सदस्य भी कोरोना संक्रमित पाए गए हैं।

आपको बता दें कि इससे पहले मध्य प्रदेश के भोपाल निवासी एक पत्रकार की बेटी को कोरोना पॉजीटिव पाया गया। प्रोफेसर कॉलोनी निवासी पीड़ित लड़की के 55 वर्षीय पिता एक पत्रकार हैं, जिन्होंने पूर्व सीए कमलनाथ की आखिरी प्रेस कॉन्फेंस में हिस्सा लिया था। इस खुलासे के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद सभी लोगों को क्वारंटाइन किया गया है, इसमें पूर्व सीएम कमलनाथ भी शामिल हैं।

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के मुताबिक मध्य प्रदेश में कोरोना से पहली मौत हुई है। साथ ही प्रदेश में इससे संक्रमित लोगों की संख्या बढ़कर 20 हो गई है। इंदौर में दस, जबलपुर में छह, भोपाल में दो, ग्वालियर और शिवपुरी में एक-एक मरीज मिले हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, भारत में कोरोना के कुल मामलों की संख्या बढ़कर 606 हो गई है, जिनमें 43 ऐसे मामले भी शामिल हैं, जो ठीक हो चुके हैं और 14 लोग ऐसे हैं, जो इसके संक्रमण में आने के कारण दम तोड़ चुके हैं। गौरतलब है कि कोरोना की रोकथाम के लिए केन्द्र सरकार ने भारत में 21 दिनों के लिए लॉकडाउन की घोषणा की है। साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोगों से घरों से न निकलने की अपील की है।

मालेगाँव में MLA मौलाना मुफ़्ती इस्माइल और उसके गुंडों ने डॉक्टर को पीटा, हॉस्पिटल स्टाफ धरने पर

कोरोना महामारी से लड़ने के लिए लॉकडाउन किए जा चुके भारत में एक तरफ जहाँ सभी अपने-अपने स्तर पर इस घातक वायरस से होते संक्रमण को रोकने का प्रयास कर रहे हैं, देश का हर व्यक्ति कोरोना संक्रमित मेडिकल स्टॉफ के प्रति आभार जता रहा है, वहीं कुछ लोग इन्हीं डॉक्टर्स से बदसलूकी करने से बाज नहीं आ रहे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ओवैसी की एआईएमआईएम पार्टी से विधायक मौलाना मुफ़्ती इस्माइल ने अपने समर्थकों के साथ मालेगाँव अस्पताल पहुँचे और अस्पताल के स्टॉफ के साथ बदतमीजी और मारपीट करने लगे। रिपोर्ट्स के अनुसार यह सारा मामला तब शुरू हुआ जब डॉक्टर किशोर डांगे ने विधायक का फोन नहीं उठाया।

अपनी धौंस दिखाते हुए विधायक मुफ़्ती मोहम्मद इस्माइल अपने 20-25 कार्यकर्ताओं के साथ अस्पताल में घुस कर डॉक्टर किशोर डांगे से बहस और गाली-गलौज करने लगे, अस्पताल प्रशासन को धमकाने लगे। डॉक्टर को गालियाँ देता विधायक एएनआई के इस ट्वीट में साफ़ तौर पर देखा जा सकता है।

गौरतलब है कि इस साल के शुरुआत में दो संदिग्धों ने एआईएमआईएम पार्टी लीडर रिजवान खान के मालेगाँव स्थित घर पर गोलीबारी की थी। उन्हीं में से एक उस गोलीबारी में घायल हो गया था, जिसका कोर्ट के आदेश पर कथित तौर पर अस्पताल में इलाज चल रहा था। एक टीवी न्यूज़ चैनल की रिपोर्ट के अनुसार एआईएमआईएम के विधायक मुफ़्ती इस बात से नाराज थे कि उपरोक्त संदिग्ध को बगैर किसी पर्याप्त कागज के अस्पताल में बनाए रखा गया है।

कोरोना वायरस से संक्रमण के इस दौर में विधायक डॉक्टरों और मेडिकल स्टॉफ को अपनी ड्यूटी सही ढंग से न निभाने और गैर जिम्मेदाराना बर्ताव का आरोप लगाकर गाली-गलौज करता हुआ साफ देखा जा सकता है। एआईएमआईएम का विधायक खुद ही कह रहा है कि उसका फोन क्यों नहीं उठाया गया। इस घटना के बाद वीडियो वायरल से विधायक और उसके बदमाशों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने की माँग को लेकर अस्पताल का समूचा स्टाफ अस्पताल के बाहर धरने पर बैठ गया है। हालाँकि, कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों और एमरजेंसी चिकित्सा सुविधाएँ चालू रखी गई हैं।

‘इनका कसूर सिर्फ इतना है कि ये सिख हैं, ये उस मजहब के नहीं जिससे आतंकी आते हैं’

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के एक गुरुद्वारे पर हुए आतंकी हमले में बुधवार (25 मार्च 2020) को 27 सिख मारे गए थे। हमले की खबर ने सबको झकझोर दिया। सामने आई तस्वीरें दर्दनाक हैं। लगभग 150 सिखों पर उस समय हमला हुआ जब वह दुनिया को कोरोना के प्रकोप से बचाने की अरदास लेकर गुरुद्वारे में इकट्ठा हुए थे। मगर, यहाँ अचानक पाकिस्तान पोषित आतंकियों ने उन पर हमला कर दिया।

सबसे पहले एक फिदायीन हमलावर ने खुद को उड़ा लिया। फिर उसके बंदूकधारी साथियों ने ताबड़तोड़ फायरिंग की। पुलिस के एक्शन लेने के बाद कई लोगों का रेस्क्यू हुआ, लेकिन कुछ को बचाया न जा सका। जो लोग मानवता को बचाते-बचाते खुद शहीद हो गए, उनमें से 25 को आज अंतिम विदाई दी गई। इसका एक विडियो बीबीसी के पत्रकार रविंद्र सिंह रॉबिन ने शेयर की है। विडियो में सभी सिखों के शव को अंतिम संस्कार के लिए एक साथ रखा देखा जा सकता है और साथ ही अपनों को खोने के गम में परिजनों के सिसकने की आवाज भी सुनी जा सकती है।

रविंद्र सिंह रॉबिन वाहे गुरु से मदद माँगते हुए लिखते हैं, “काबुल में अभी 26 में से 25 निर्दोष सिखों का अंतिम संस्कार किया जा रहा है। कल ये सभी जब कोरोना वायरस के बीच दुनिया भर के अच्छे स्वास्थ्य की अरदास करने पहुँचे तब पाक समर्थित आतंकियों ने इन्हें निर्ममता से गोली मार दी। आखिर इनका क्या अपराध था?” पत्रकार रविंद्र सिंह के इस सवाल पर गुरप्रताप सिंह ने लिखा, इनका कसूर सिर्फ ये है कि ये सिख धर्म के अनुयायी हैं। ये उस मजहब से नहीं जिससे आतंकी आते हैं। उनके लिए सिख काफिर हैं और वे इन्हें मारना उचित समझते हैं। सिखों ने शाहीन बाग में लंगर तक बाँटा। लेकिन उनमें से कितनों ने इस हमले की निंदा की? शून्य।

वहीं, एसएस सिंह नाम के यूजर ने लिखा, “ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे भाइयों ने उस देश में अपनी किस्मत को लेकर जाकर छोड़ा, जहाँ उनके जीवन का मूल्य नहीं…। भारत में कुछ लोग इनके प्रवेश का विरोध करते हैं, इन्हें नागरिकता देने की बात पर राजनीति साधते हैं। क्योंकि वे चाहते हैं कि आतंकियों को भी नागरिकता दी जाए ताकि वे यहाँ उनका पालन कर सकें और हत्याएँ को जारी रख सकें।”

गौरतलब है कि कल यानी 25 मार्च को जब ये हमला हुआ उस वक़्त अरदास के लिए गुरुद्वारे में कई छोटे-छोटे बच्चे भी मौजूद थे। हमले के बाद हर तरफ चीख-पुकार मची हुई थी। सुरक्षाकर्मियों ने जब उन्हें बाहर निकाला, तब उनके चेहरे पर खौफ साफ दिखाई दे रहा था।

लॉकडाउन के बाद भी देहरादून की मस्जिद में जमा हुए नमाजी, पुलिस को देखते ही हुए फरार

एक तरफ पूरा देश कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रहा है, तो दूसरी ओर लॉकडाउन घोषित होने के बाद भी मुस्लिम कट्टरपंथी मस्जिद जाने से बाज नहीं आ रहे हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ अब पुलिस ने सख्त कार्रवाई का मन बना लिया है। एक ऐसी ही खबर उत्तराखंड से सामने आई है, जहाँ लॉकडाउन के बाद भी एक मस्जिद में सैकड़ों की नमाज अदा करने के लिए लोग इकट्ठा हो गए। इसकी सूचना जब पुलिस को मिली तो वह मौके पर पहुँच गई। इसके बाद मस्जिद से सभी नमाजी फरार हो गए। पुलिस ने मस्जिद के मौलवी सहित 20-25 नमाजियों के खिलाफ में मुकदमा दर्ज किया है।

दरअसल, पूरे देश में लॉकडाउन घोषित होने के बाद भी बुधवार शाम को उत्तराखंड के सत्तो वाली घाटी में मौजूद मस्जिद में बड़ी संख्या में मु्स्लिम समाज के लोग नमाज के लिए इकट्ठे हो गए। जानकारी मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुँची। पुलिस को मस्जिद की तरफ आते देख नमाज अदा कर रहे लोग अलग- अलग गलियों में घुस गए।

इसके बाद पुलिस को मौके पर कोई नहीं मिला। पुलिस ने सख्ती दिखाते हुए कोरोना वायरस को लेकर लागू धारा 144 उल्लंघन करने के आरोप में मस्जिद के मौलवी अब्दुल मद सहित 20- 25 अज्ञात नमाजियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया।

वहीं कोरोना के लगातार बढ़ते प्रकोप के बीच उत्तराखंड पुलिस ने बुधवार को शहर की सभी मस्जिदों में नमाजियों के आने पर रोक लगा दी। पुलिस ने घर पर ही नमाज अदा करने की अपील की है। इतना ही नहीं पुलिस ने इस संबंध में बुधवार को ही मस्जिदों से ऐलान करा दिया। उत्तराखंड पुलिस ने यह भी साफ किया है कि मस्जिदों में केवल इमाम और मुअज्जिन ही नमाज अदा करेंगे। इस दौरान दोनों को मस्जिद के अंदर ही रहना होगा। वहीं पुलिस की सख्ती के बाद अब मौलवी खुद मस्जिदों से ऐलान कर रहे हैं कि लोग घरों से बाहर न निकलें और ऐसे हालात में अपन-अपने घरों में नमाज अदा करें, क्योंकि पुलिस ने सभी मस्जिदों में नमाजियों के आने पर पाबंदी लगा दी है।

आपको बता दें कि देश में कोरोना वायरस से अब तक 15 मौतें हो चुकी हैं, साथ ही इससे संक्रमित लोगों की संख्या 600 के करीब हो गई है। यही कारण है कि तेजी से बढ़ते कोरोना के प्रकोप की रोकथाम के लिए मोदी सरकार ने भारत में 21 दिनों के लिए लॉकडाउन की घोषणा की है। साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से घरों में ही रहने की अपील की है। लॉकडाउन 14 अप्रैल तक लागू रहेगा।