एनसीपी अध्यक्ष एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार से भीमा-कोरेगाँव हिंसा मामले में पूछताछ होगी। हिंसा की जाँच कर रहे कमीशन ने उन्हें इस संबंध में नोटिस भेजा है। कमीशन की ओर से भेजे गए नोटिस में पवार को 4 अप्रैल को पेश होने के लिए कहा गया है। पैनल के वकील आशीष सातपुते ने बुधवार को इसकी जानकारी दी।
सातपुते ने बताया कि आयोग ने तत्कालीन एसपी (पुणे ग्रामीण) सुवेज हक, तत्कालीन अतिरिक्त एसपी संदीप पाखले, तत्कालीन अतिरिक्त आयुक्त, पुणे रवींद्र सेंगांवकर और तत्कालीन जिलाधीश सौरभ राव को भी सम्मन किया है।
Bhima Koregaon Commission has summoned Nationalist Congress Party Chief Sharad Pawar to appear before the Commission on 4th April.
The Commission is inquiring into the reasons which led to the 2018 Bhima Koregaon violence in Maharashtra. (File pic) pic.twitter.com/tLJqmHjUBs
इससे पूर्व महाराष्ट्र के एक सामाजिक संगठन ने जाँच आयोग के सदस्यों से शरद पवार से पूछताछ करने की माँग की थी। समूह विवेक विचार मंच के सदस्य सागर शिंदे ने आयोग के समक्ष अर्जी दायर कर 2018 की हिंसा के बारे में मीडिया में पवार द्वारा दिए गए कुछ बयानों को लेकर उन्हें सम्मन भेजे जाने का अनुरोध किया था।
सामाजिक समूह विवेक विचार मंच के सदस्यों ने जाँच आयोग को ये अनुरोध पत्र देते हुए कहा था कि 18 फरवरी को अपनी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में शरद पवार ने भीमा-कोरेगाँव की हिंसा को लेकर तमाम बातें कही थीं। इस दौरान उन्होंने पुणे के पुलिस कमिश्नर की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाया था। ऐसे में इन तमाम विषयों पर पवार से पूछताछ की आवश्यकता है।
याचिकाकर्ता संगठन ने यह भी कहा था कि भीमा-कोरेगाँव के केस में पवार से व्यक्तिगत रूप में गवाही देने और उनके पास मौजूद जानकारियों को उपलब्ध कराने के लिए निजी रूप से पूछताछ की जानी चाहिए। इस याचिका के कुछ वक्त बाद ही अब जाँच आयोग ने पवार को नोटिस जारी किया है।
गौरतलब है कि भीमा-कोरेगाँव युद्ध की 200वीं वर्षगाँठ के मौके पर 1 जनवरी 2018 को हिंसा भड़क उठी थी। पुणे पुलिस ने आरोप लगाया कि 31 दिसंबर 2017 को ‘एल्गार परिषद सम्मेलन’ में दिए ‘‘उकसावे” वाले भाषणों से हिंसा भड़की। पुलिस के अनुसार, एल्गार परिषद सम्मेलन के आयोजकों के माओवादियों से संपर्क थे।
उद्धव ठाकरे ने बीते दिनों एल्गार परिषद की जाँच NIA को सौंपने को मँजूरी दी थी। इसका विरोध उनकी सरकार में शामिल एनसीपी ने किया था। खुद पवार ने उद्धव के फैसले की कड़ी आलोचना की थी। उन्होंने एनआईए एक्ट की धारा 10 का हवाला देते हुए यह माँग की थी कि एनआईए जाँच के अलावा राज्य सरकार एल्गार परिषद केस की समानांतर जाँच कराए। ऐसे में पवार को समन से फिर से महाविकास अघाड़ी सरकार के बीच मतभेद गहराने के आसार दिख रहे हैं। गौरतलब है कि शिवसेना ने बीजेपी के साथ गठबंधन तोड़ कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ सरकार बनाई थी। सरकार गठन के बाद से ही साझेदार दलों के मतभेद हर मसले पर सामने आते रहते हैं।
तमिलनाडु में कोरोना को लेकर हाइकोर्ट के आदेश के ख़िलाफ़ इस्लामिक संगठन तौहिद जमात ने सीएए-एनआरसी-एनपीआर के ख़िलाफ़ अपना प्रदर्शन जारी रखा। ये प्रदर्शन चेन्नई में मद्रास हाइकोर्ट के पास हुआ।
Chennai: People including Tamil Nadu Thowheed Jamath members continue their protest against CAA, NRC and NPR near Madras High Court. pic.twitter.com/VdjRGIuRbx
यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि एक ओर जहाँ कोरोना वायरस के चलते देशभर में ज्यादा संख्या में लोगों के एक साथ इकट्ठा होने पर रोक लगाई जा रही है। प्रशासन इसे लेकर निर्देश लागू कर रहे हैं। बावजूद चेन्नई में सीएए प्रदर्शन में भारी संख्या में लोग पहुँचे।
गौरतलब है कि इससे पहले तमिलनाडु के तौहीद जमात ग्रुप ने अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी विरोध किया था और मार्च निकाला था। इस दौरान करीब 2000 से ज्यादा लोग चेन्नई की सड़कों पर बैनर लेकर उतरे थे और उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के ख़िलाफ़ नारे लगाए थे।
इस बार भी इस संगठन की मनमानी देखकर लग रहा है कि जनस्वास्थ्य सुरक्षा से उसके कोई वास्ता नहीं है। अभी कल शाहीन बाग में महिला प्रदर्शनकारियों ने अपना धरना खत्म करने से मना कर दिया था। हालाँकि अगले दिन से प्रदर्शनस्थल खाली दिखने लगा। मगर, जानकारी के मुताबिक वहाँ बैठी महिलाओं ने इसे न गंभीरता से लिया था और न ही इस पर कोई जवाब देना उचित समझा था।
बता दें, भारतीय प्रशासन एक ओर जहाँ इस घातक वायरस को फैलने से रोकने के लिए सार्वजनिक स्थलों पर लोगों को जाने से रोक रही है। वहीं शाहीन बाग जैसे प्रदर्शनस्थल और तौहीद जमात जैसे इस्लामिक संगठन इसे बढ़ावा देने के लिए निर्देशों की गैरफरमानी करते देखे जा रहे हैं और ऐसी बेफिक्री का क्या नतीजा होता है, हम इटली और स्पेन में देख सकते हैं। जहाँ कोरोना के कारण हजारों लोग संक्रमित हो चुके हैं।
एक ओर जहाँ भारतीय मीडिया और तथाकथित लिबरल वर्ग गाय और गोमूत्र पर चुटकुले बनाते हुए देखा जाता है, वहीं कोरोना के इलाज के लिए माबुद अली नाम का एक मुस्लिम युवक चुपचाप देश के एक कोने में गोमूत्र बेचकर अपनी आजीविका चलाने का काम कर रहा है। हालाँकि ‘बिजनेस इनसाइडर’ की एक रिपोर्ट के अनुसार बताया जा रहा है कि उसे गिरफ्तार कर लिया गया है।
माबुद अली नाम का यह व्यक्ति दिल्ली और कोलकाता को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 19 पर टेबल पर गोबर के पैकेट और जार में गौमूत्र रखकर बेच रहा था। हालाँकि, अगर दी क्विंट जैसे हिन्दुफोबिया से ग्रसित प्रोपेगेंडा वेबसाइट की मानें तो माबुद अली का कहना है कि उसे यह विचार दिल्ली में हिन्दू महासभा द्वारा आयोजित गौमूत्र पार्टी से मिला है।
ऐसे समय में यह देखना जरूरी है कि जब कोरोना वायरस कि महामारी से लोग अपनी जान गँवा रहे हैं, दी क्विंट जैसे संस्थान हिन्दुओं के उपहास के अपने एजेंडा के साथ कोई समझौता नहीं कर रहे हैं। माबुद अली महामारी के दौरान अफवाह और गलत जानकारी शेयर कर जिस अपराध को कर रहा है, क्विंट उसका श्रेय हिन्दुओं को देने का प्रयास कर रहा है।
दरअसल, हाल ही में चक्रपाणि महाराज नाम के एक व्यक्ति ने खुद को हिन्दू महासभा का अध्यक्ष बताते हुए कोरोना से निपटने के लिए गोमूत्र पार्टी का आयोजन करवाया था। सोशल मीडिया पर चक्रपाणि महाराज पर यह भी आरोप लगाए गए कि उसे किसी हिन्दू विरोधी दल द्वारा ऐसा करने के लिए उकसाया जा रहा है और उसकी मदद कि जा रही है और उसका हिन्दू महासभा से कोई लेना-देना नहीं है। काशी विद्वत परिषद ने भी ऑपइंडिया से बातचीत में चक्रपाणि महाराज नाम के इस व्यक्ति के हिन्दू विरोधी राजनीति का मोहरा होने की बात स्वीकारी है।
माबुद अली ने अपनी टेबल पर एक पोस्टर चिपकाया है, जिस पर लिखा है, “गौमूत्र पिएँ और कोरोना वायरस से बचें।” मीडिया के अनुसार, अली ने कहा, “मेरे पास दो गायें हैं, एक भारतीय और दूसरी जर्सी। मैं अपना जीवन-यापन दूध बेचकर करता हूँ। जब मैंने टीवी पर गौमूत्र पार्टी देखी तो मुझे लगा कि मैं भी गौमूत्र और गोबर बेचकर पैसे कमा सकता हूँ। अब मैं गाय के हर हिस्से का उपयोग अपने बिजनेस में कर सकता हूँ।” मीडिया कि मानें तो माबुद अली ने यह भी कहा कि जर्सी गाय भारतीय गाय की तरह शुद्ध नस्ल नहीं है, इसलिए उसके मूत्र का ज्यादा डिमांड नहीं है।
टीवी-अखबार हर जगह कोरोना देखने और सुनने के बाद कल ही गाँव से एक बुजुर्ग ने हाल-चाल पूछने के लिए फोन पर बातचीत करते हुए मुझसे ‘सेनिटाइजर्स’, हर बार हाथ धुलने और मास्क पहनने जैसी सलाहें दी। उस समय यह सिर्फ मजाक लगा लेकिन कुछ देर बाद मैंने महसूस किया कि सफाई जैसी बेहद मामूली और बुनियादी आवश्यकताओं के प्रति जागरूकता के लिए कोरोना जैसी भयावह महामारी का उदय हुआ। एक ऐसे बुजुर्ग जिन्होंने कभी खाना खाने से पहले हाथ नहीं धुले, वो महानगर में रह रहे नौजवान को सफाई का महत्व समझाते नजर आए।
चीन से शुरू हुआ कोरोना वायरस देखते ही देखते पूरे विश्व के लिए सदी कि सबसे बड़ी आपदा बनने जा रहा है। कोरोना वायरस के संक्रमण से निपटने के लिए अन्य देशों द्वारा की गई तैयारियों के मुकाबले भारत की तैयारियों की खासा वाह-वाही देखी जा सकती है। खासकर पीएम मोदी द्वारा बिना देर किए तुरंत सार्क देशों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और COVID- डिप्लोमेसी के अंतर्गत दस मिलियन अमेरिकी डॉलर की सहायता ने तो सरकार के कोरोना से लड़ने के उनके इरादे स्पष्ट कर दिए।
सोशल मीडिया पर भी कोरोना वायरस के संक्रमण से पीड़ित कुछ लोगों ने बताया है कि भारत सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय किस तत्परता से उनकी देखभाल में लगे हुए हैं। पहली बार हमारे देश में ‘हाइजिन’ और साफ़-सफाई के प्रति लोगों को जागरूकता से बात करते हुए देखा जा रहा है। यह आश्चर्यजनक इसलिए भी था क्योंकि भारत जैसे देश में हाइजिन को ‘विशेषाधिकार’ के रूप में देखा जाता रहा है। हमारे दिमाग के किसी कोने में यह बात जरुर है कि साफ़-सफाई और निजी स्वच्छता आम आदमी का नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ सभ्रांत वर्ग का अधिकार है।
सबसे बड़ा सवाल यही सबके मन में उठ रहा है कि भारत की तैयारियाँ कोरोना जैसी किसी आपदा से निपटने के लिए क्या थीं? या भविष्य में क्या हो सकती हैं? लोगों ने सोशल मीडिया पर यह भी माँग की कि उन्हें सेनीटाइज़र्स से लेकर मास्क तक सरकार द्वारा उपलब्ध करवाए जाने चाहिए। आपदा के वक्त इस प्रकार की माँग जायज भी मानी जा सकती हैं। क्योंकि इंसान का स्वास्थ्य उसका मौलिक अधिकार होना ही चाहिए।
यूरोप महाद्वीप के कई देशों में स्वास्थ्य मौलिक अधिकार है और हर छह माह में सरकार द्वारा आम आदमी के स्वास्थ्य परिक्षण का आयोजन करवाया जाता है। भारत के ग्रामीण वर्ग में अब जाकर सरकारी अस्पताल स्वास्थ्य शिविर आयोजित करवाते देखे जाते हैं। हमने अपने सामने वह बदलाव देखा है, जिसके लिए अलग उत्तराखंड राज्य की स्थापना आवश्यक थी। वरना स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के चलते होने वाली भयानक मौतें बचपन के कुछ बुरे स्वप्नों में से एक हैं।
लेकिन स्वास्थ्य और बेहतर जीवन के मौलिक अधिकार की जरूरत दिल्ली जैसे राज्यों में, जहाँ लगभग हर समय एक आम आदमी को शुद्ध हवा के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले मास्क की आवश्यकता होने लगी है, नितांत आवश्यक है। दिल्ली जैसे महानगरों में, जो हर समय कोरोना जैसे ही अन्य संक्रमण के साए से घिरे होते हैं, में कल्याणकारी राज्य की स्थापना के लिए अब यह बुनियादी जरूरत बन चुका है। हालाँकि, अरविन्द केजरीवाल जैसे नेताओं के पास तब भी इसकी जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर थोपकर इससे बच निकलने का रास्ता खुला रहता है।
इस बीच जिस एक चीज ने सबका ध्यान आखिरकार अपनी ओर आकर्षित किया है, वह है 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद उनकी स्वास्थ्य सम्बन्धी योजनाएँ! आपको याद होगा कि पहली बार किसी सरकार ने गरीब लोगों के लिए एक के बाद एक हेल्थ इंश्योरेंस यानी, स्वास्थ्य बीमा जैसी योजनाएँ लेकर आई थी। इसके बाद देश का आदर्श लिबरल गैंग, जिसमें कि लिबरल मीडिया का भी एक बड़ा वर्ग शामिल था, सरकार से यह सवाल करते हुए देखा जा रहा था कि सरकार आखिर स्वास्थ्य बीमा की ओर इतनी ऊर्जा किसलिए लगा रही है।
मीडिया के इस वर्ग में सबसे ज्यादा वो लोग थे जो आलिशान बंगलों के मालिक हैं और ऑफिस में उनके शानदार स्टूडियो हैं, इस कारण गरीब जनता की जरूरतों से शायद ही किसी तरह से वाकिफ हों। एक इंटरव्यू के दौरान तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जवाब में कहा था कि क्या मीडिया स्वास्थ्य बीमा और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी अन्य स्कीम्स के खिलाफ हैं? इसके जवाब में पत्रकार महोदय ने कोई जवाब भी नहीं दिया था।
एक सच्चाई यह भी है और यह दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि भारत जैसे विकासशील देशों में आज भी किसी बड़े पुनर्जागरण के लिए कई जिंदगियाँ दाँव पर लगानी होती हैं। स्वच्छता और बेहतर हाइजिन जैसे मुद्दों को हर गली-गाँव और अखबारों की हेडलाइन बनने तक चाइनीज वायरस कोरोना एक बड़े वर्ग को प्रभावित कर चुका था। लेकिन देर से ही सही, लोग इस ओर जागरूक हुए और शायद इसके बाद इन सब बातों का महत्व समझना शुरू कर देंगे।
कोरोना के कहर ने लोगों की आँखें सिर्फ स्वास्थ्य जैसी चीजों पर ही नहीं बल्कि भारत सरकार के काम करने के तरीकों और उस पर अनावश्यक रूप से बनाए गए दबाव का भी खुलासा कर दिया है। इसमें मीडिया के आदर्श लिबरल वर्ग ने केंद्र की दक्षिणपंथी भाजपा सरकार पर अक्सर मीडिया को मौन करने का भी आरोप लगाया है।
तानाशाही के आधार पर चल रहे चीन ने यूँ तो अपने देश को स्वतंत्र मीडिया कभी उपलब्ध ही नहीं करवाया। लेकिन, कोरोना के लिए जिम्मेदार इस देश ने सोशल मीडिया से लेकर बाहरी देशों की मीडिया पर जिस सख्ती से अंकुश लगाया है, उसे भारतीय मीडिया के लिबरल वर्ग को जरूर देखना चाहिए। चीन ने वुहान में हुई मौतों को छुपाने के साथ ही अब चीन के विदेश मंत्रालय ने न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट और वॉल स्ट्रीट जर्नल के पत्रकारों को 10 दिनों के अंदर अपने मीडिया पास वापस करने के आदेश दिए हैं।
यह एक बड़ा संदेश है। जो पत्रकार भारत सरकार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर इसकी कल्याणकारी योजनाओं में कांस्पीरेसी थ्योरी गढ़ने के प्रयास करते आए हैं, यह कोरोना का संक्रमण उनकी आँखें खोलने के लिए काफी है। फिर भी, अपनी व्यक्तिगत विचारधारा के पोषण के लिए वो सत्य का कौन सा हिस्सा चुनते हैं, यह तब भी उन्हीं पर निर्भर करेगा।
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा के सदस्य के तौर पर नामित किया है। इसके बाद से ही कथित लिबरल और सेक्युलर गिरोह उनके पीछे पड़ा हुआ। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कण्डेय काटजू को तो यह इतना नागवार गुजरा है कि पूर्व सीजेआई की आलोचना करते हुए वे भाषाई मर्यादा का भी ध्यान नहीं रख पाए।
बकौल काटजू, मैं 20 साल तक वकील और 20 साल जज रहा हूॅं। मैंने कई अच्छे और कई बुरे जजों को देखा है। लेकिन मैं भारतीय न्यायपालिका में किसी भी न्यायाधीश को इस यौन विकृत रंजन गोगोई जितना बेशर्म और अपमानजनक नहीं मानता। शायद ही कोई दोष है, जो इस आदमी में नहीं था।
ऐसा नहीं है कि पूर्व सुप्रीम कोर्ट जजों में सिर्फ़ काटजू ने ही जस्टिस (रिटायर्ड) गोगोई को राज्यसभा भेजे जाने की आलोचना की है। मदन लोकुर और कुरियन जोसेफ जैसे जजों ने भी उन पर निशाना साधा है। लोकुर और जोसेफ उन चार जजों में शामिल थे जिन्होंने 2018 में सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार प्रेस कॉन्फ्रेंस किया था। दो अन्य जज गोगोई और चेलमेश्वर थे।
काटजू पहले भी अपने बयानों के कारण विवादों में रहे हैं। उन्होंने पूर्व सीजेआई गोगोई के लिए आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करते ‘बेशर्म’, ‘बेइज्जत’ और ‘यौन विकृत’ बताया है। काटजू ने तो यहाँ तक दावा किया कि शायद ही ऐसी कोई बुराई हो, जो रंजन गोगोई में न हो।
I have been a lawyer for 20 yrs and a judge for another 20. I hv known many good judges & many bad judges. But I have never known any judge in the Indian judiciary as shameless & disgraceful as this sexual pervert Ranjan Gogoi. There was hardly any vice which was not in this man
हालाँकि, ये पहला मौका नहीं है जब काटजू ने गोगोई पर हमला किया हो। इससे पहले जब एक महिला ने तत्कालीन सीजेआई पर आरोप लगाए थे, तब काटजू ने दावा किया था कि गोगोई ने उक्त महिला का यौन शोषण किया है। तब उन्होंने रंजन गोगोई को ‘बेहूदा और कपटी’ बताया था। हालाँकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट की एक कमिटी ने जस्टिस (रिटायर्ड) गोगोई को क्लीनचिट दे दी थी। काटजू ने चर्चित सौम्या दुष्कर्म एवं हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी सवाल उठाया था। उस समय इस मामले में फैसला देने वाली पीठ में भी गोगोई शामिल थे। तब शीर्ष अदालत ने इसको लेकर काटजू को अदालत में तलब कर लिया था।
गौरतलब है कि रंजन गोगोई ने कहा है कि उन्होंने राज्यसभा जाने का निर्णय इसीलिए लिया, ताकि वो न्यायपालिका के पक्ष को संसद में रख पाएँ। उन्होंने कहा है कि वो एक तरह से न्यायपालिका की बातों को कार्यपलिका के समक्ष उठाने के लिए राज्यसभा जा रहे हैं।
आज बात करेंगे ‘द टेलिग्राफ’ के हेडलाइन्स की और ऐसी कई हेडलाइन की जिन्हें अक्सर टेलिग्राफ के मुख्य पृष्ठ पर देखा तो जाता है, लेकिन पूरी खबर के अंदर उस शब्द का जिक्र तक नहीं मिलता, जिसका इस्तेमाल अक्सर हेडलाइन में नजर आता है। ‘द टेलिग्राफ’ नाम का अखबार एबीपी ग्रुप का ही एक अखबार है, जिसे एक पूरे परिवार द्वारा संचालित किया जाता है। खैर, 17 मार्च को अखबार ने अपने पहले पेज पर एक खबर लगाई, जो कि बीजेपी द्वारा राज्यसभा के लिए नामित किए गए पूर्व चीफ जस्टिस रहे रंजन गोगोई को लेकर थी। अखबार ने हेडलाइन में लिखा ‘कोविंद, नोट कॉविड, डिड इट’ मतलब कि रंजन गोगोई कोरोना वायरस के कारण नहीं बल्कि रामनाथ कोविंद के कारण राज्यसभा पहुँचे हैं। इतना ही नहीं नीचे खबर में राफेल और अयोध्या मामले को टारगेट करके गोगोई की खबर को लिखा गया।
अब ऐसे में सवाल यह खड़ा होता है कि एक देश के सम्मानित पद पर बैठे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का नाम को कोरोना वायरस से क्यों जोड़ा गया? दरअसल अखबार का यही अजेंडा है कि किसी भी तरह से अपने से अलग विचारधारा वाले लोगों, पार्टियों और विचारकों पर मुखर हो कर, नीचता से हमला करे। इसी कड़ी में राष्ट्रपति कोविंद भी आते हैं जो बीजेपी की ओर से राष्ट्रपति बने और आरएसएस की विचारधारा से हैं। इसीलिए उनको अखबार ने अपना निशाना बनाया और कोरोना वायरस से उनकी तुलना की। वैसे भी इन वामपंथी लम्पट गिरोह को हिन्दू धर्म से, भाजपा से, संघ से और हर गैर-वामपंथी विचारधारा से हमेशा घृणा रही है।
रामनाथ कोविंद के सामाजिक और राजनैतिक जीवन के बारे में तो अधिकांश लोगों को यही पता होता है कि वह राष्ट्रपति बनने से पहले बिहार के राज्यपाल भी थे, लेकिन बड़ी बात यह नहीं बल्कि यह है कि वह पहले बीजेपी द्वारा भेजे गए ऐसे राष्ट्रपति है, जो पिछड़ी जाति से आते हैं और आरएसएस से भी जुड़े रहे हैं। इनका जन्म एक मिट्टी के छोटे से घर में हुआ जो कि बाद में गिर गया था। इसके बाद, जब कोविंद पाँच वर्ष के थे तब उनकी माता जी का देहांत फूस की छत वाले घर में आग लगने के कारण हो गया। इसके बाद बड़े हुए तो हर रोज आठ किलोमीटर पैदर चलकर पढ़ाई करने के लिए जाते थे। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि एक छोटे से घर से निकले हुए व्यक्ति ने देश के सर्वोच्च पद तक पहुँचने में कितनी मेहनत की होगी। जाहे फिर वह उनका राजनीतिक जीवन हो या फिर सामाजिक जीवन हो।
‘द टेलिग्राफ’ की हेडलाइन में शब्दों से खेलने की रही है फितरत
अब आप जरा ‘द टेलिग्राफ’ द्वारा हर रोज हेडिंग में एक प्रोपेगेंडा के तहत नए शब्दों को डालने की फितरत भी जान लीजिए। दरअसल इनका खबरों से अधिक हेडलाइन पर पूरा फोकस रहता है कि आखिर हेडलाइन में शब्दों के साथ कैसे खेला जाए और आश्चर्य की बात यह है कि पूरी खबर में उस हेडलाइन से जुड़ा कोई शब्द नहीं मिलेगा और न ही खबर में कोई रेफरेंस होगा। यहाँ तक कि ये लोग खुद पूरी खबर में भी बता नहीं पाते कि यह जो हेडलाइन बनाई गई है आखिर वह शब्द यहाँ क्यों लाए गए हैं।
आश्चर्य की बात यह कि ममता के बंगाल से छपने वाले इस अखबार में बंगाल के मजहबी दंगे दिखाई नहीं देते, बीजेपी और आरएसएस के कार्यकर्ताओं की आए दिन होती हत्याएँ नहीं दिखतीं, लेकिन दलितों को एक वायरस से तुलना करते हुए, राष्ट्रपति पर निशाना साधा जाता है, क्योंकि वो भाजपा-संघ से जुड़े हुए रहे हैं। यही अजेंडा इनकी घटिया जातिवादी सोच को और गाँधी परिवार की चापलूसी को दर्शाता है इस बात का अंदाजा आप खुद अखबार में छपी हेडिंग को पड़कर लगा सकते हैं।
नीचे के विडियो में मैंने इस प्रपंची अखबार के 15 मुखपृष्ठों की लीड पर बात की है:
चीन के वुहान से कोरोना वायरस का संक्रमण शुरू हुआ था। दुनिया के करीब 150 देश इसकी चपेट में हैं। 5900 के करीब जानें जा चुकी हैं। इस वैश्विक महामारी से अब तक जिस तरीके से भारत निपटा है उसकी दुनिया भर में तारीफ हो रही है। लेकिन, एक वर्ग ऐसा भी है जो इस बात से निराश है कि कोरोना अब तक भारत में तबाही क्यों नहीं मचा पाया। इस वर्ग में न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे कुछेक मीडिया संस्थान भी हैं। मोदी घृणा से सने इस संस्थान को कोरोना का प्रसार रोकने के लिए भारत सरकार की ओर से उठाए गए कदमों में कुछ नहीं दिखता। उसे तो यह रहस्य लगता है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश में संक्रमण बेहद सीमित क्यों है।
न्यूयॉर्क टाइम्स के एक लेख के अनुसार भारत कोरोना वायरस के ख़तरे से निपटने के लिए संघर्षशील है। अब तक उसके प्रयासों का परिणाम अच्छा रहा है। वो लिखता है कि अब तक भारत में कोरोना वायरस के महज सवा सौ केस ही आए हैं और ये एक रहस्य ही है कि 130 करोड़ की जनसंख्या वाला देश अब तक इस खतरे से अछूता ही रहा है। वो भी तब, जब इसके पूर्व और पश्चिम में हाहाकार मचा हुआ है। ऑस्ट्रेलिया और चीन इससे ज्यादा दूर नहीं हैं।
एनवाइटी के इस लेख की बात करने से पहले प्रमुख ऑस्ट्रेलियाई मीडिया संस्थान एबीसी के दक्षिण एशियाई कॉरस्पोंडेंट जेम्स ओटेन के कहे पर गौर करिए। उन्हीं की बातों में एनवाइटी के दर्द का कारण छिपा हुआ है। उन्होंने एबीसी के एक लेख के माध्यम से बताया है कि वो भारत में अपने देश ऑस्ट्रेलिया से ज्यादा सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। मार्च की शुरुआत में जब देश में कोरोना वायरस के मात्र 6 मामले आए थे, तभी भारत ने जापान, दक्षिण कोरिया, इटली और ईरान के लिए अपनी सीमाओं को बंद कर दिया था। 12 मार्च को जैसे ही मरीजों की संख्या 70 हुई, सभी देशों से आने वाले नागरिकों के वीजा को अस्थायी रूप से निष्प्रभावी कर दिया गया।
India has reported around 125 cases of the coronavirus, and it is a bit of a mystery how the world’s second-most-populous nation, with 1.3 billion people, has remained relatively unscathed while the number of cases explodes to its east and west https://t.co/6eCRkS3V2r
जेम्स लिखते हैं कि जब ऑस्ट्रेलिया ‘मास गैदरिंग’ के लिए निर्णय लेने में माथापच्ची कर रहा था, तभी भारत ने एक जगह पर भीड़ न जुटने को लेकर सलाह दी और आदेश जारी कर दिया। दिल्ली सहित कई बड़े शहरों में स्कूल और सिनेमा हॉल्स में ताले जड़ दिए गए। हाँ, भारत को पता था कि इससे देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान हो सकता है लेकिन लोगों की जान बचाने के लिए मोदी सरकार ने स्वास्थ्य को अर्थ से ऊपर रखा। जेम्स ने याद दिलाया है कि कैसे क्रिकेट के प्रति भारत में इतना पागलपन और लेकर जूनून होने के बावजूद लोकप्रिय टी-20 लीग की तारीख आगे बढ़ा दी गई।
जेम्स की बातों से पता चलता है कि NYT जैसे पश्चिमी मीडिया में इतनी जलन की भावना क्यों है। दरअसल, वे चाहते थे कि भारत में कोरोना वायरस तेज़ी से फैले, ताकि वो मोदी सरकार को कोस सकें। भारत का मजाक बना सकें। बता सकें कि यहाँ किस कदर अराजकता फैली हुई है और लोग जानवरों की भाँति मर रहे हैं। उन्हें ये मौका नहीं मिलने का अफ़सोस है।
इसी बहाने उन्हें होली को गालियाँ देने का मौका मिल जाता और वो एक हिन्दू त्यौहार के बहाने पूरे हिंदुत्व को मानवता के लिए ख़तरा बताने से बाज नहीं आते। हाँ, इस पर वो ज़रूर चुप हैं कि दक्षिण कोरिया में शिनचियोंजी चर्च के कारण जो कोरोना वायरस से पूरा देश तबाह हुआ है, उसकी जवाबदेही कौन लेगा? कई ऐसी मस्जिदें हैं, जिन्हें अभी भी बंद नहीं किया गया है। विदेशी प्रोपेगेंडा पोर्टलों को भारत सरकार और भारत को गाली देने का मौका नहीं मिल पाया। एबीसी ने अपने लेख में बताया है कि किस तरह लोगों ने सावधानी से होली खेली और वायरस भी नहीं फैला।
यहाँ कुछ सनकी लोगों द्वारा गोमूत्र की पार्टी की गई, जिनका जुड़ाव समाजवादी पार्टी जैसे दलों से रहा है। उन्हें पूरी भारत का चेहरा बता कर पेश किया जा रहा है। क्योंकि मीडिया के इस वर्ग के पास अब गाली देने के लिए कुछ बचा नहीं है। शाहीन बाग़ का महिमामंडन करते-करते अब वो थक चुके हैं। दंगों में निर्दोष हिन्दुओं के कत्लेआम की बात लोगों की जुबान पर हैं। इस असफलता से बौखलाए एनवाइटी जैसे संस्थानों को ये भी पता चल गया है कि कोरोना वायरस को लेकर विशेषज्ञों की सलाहों को सबसे ज्यादा यही प्रदर्शनकारी धता बता रहे हैं।
India knows prevention is better than a cure. It’s an approach that’s left me pretty calm (so far) during the coronavirus outbreak.
दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास वो क्षमता है, जिससे वो किसी साधारण से कार्य को भी जनांदोलन में परिवर्तित करने की क्षमता रखते हैं। जब उन्होंने झाड़ू पकड़ी तो स्वच्छता अभियान घर-घर में आंदोलन की तरह बन गया। इसी तरह जब उन्होंने अपने सोशल मीडिया हैंडल्स के जरिए जागरूकता फैलानी शुरू की तो लोगो ने बचाव व सावधानी के लिए बताए गए उन उपायों पर अमल किया। विदेश में फँसे भारतीय नागरिकों को वापस वतन लाने में विदेश मंत्रालय ने तो तत्परता दिखाई, उससे भी विदेशी मीडिया का ये वर्ग ख़ासा नाराज़ है।
‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ दबे जबान से मानता है कि जल्दी से प्रभावी कार्रवाई करने के कारण भारत में कोरोना वायरस के कम मामले हो सकते हैं, लेकिन साथ ही कथित विशेषज्ञों के हवाले से ये भी दावा करना नहीं भूलता कि इतनी कम संख्या तो डिटेक्ट हुए मामलों की है। कई मामले ऐसे होंगे जो टेस्टिंग सेंटर तक पहुँचे ही नहीं। लेकिन, ऐसे केस तो सभी देशों में हो सकते हैं? जब बात तुलनात्मक रूप से की जा रही है फिर पक्षपात क्यों? यूरोप के कई देशों के अस्पतालों में बिस्तर कम पड़ रहे हैं और कई लोगों को लौटा दिया गया, जबकि वहाँ हेल्थकेयर सिस्टम सबसे अच्छा माना जाता रहा है।
दिक्कत ये है कि भारत सरकार के प्रयासों ने इन प्रोपेगेंडा संस्थानों को चित कर दिया है। अब तक सब सही है और आगे भी आशा है कि सब ठीक ही रहेगा। इसके बाद तमाम भौगोलिक और वैज्ञानिक कारण के नाम पर बकैती की जाएगी कि भारत में कोरोना क्यों नहीं फैला? देश की तैयारियों को कमतर करने के लिए अलग-अलग तकनीकी टर्म्स गढ़े जाएँगे। ये निराश मीडिया संस्थान चुप नहीं बैठेंगे, तैयार रहिए।
भारतीय प्रेस परिषद ने बंगाल से छपने वाले वामी अखबार ‘द टेलीग्राफ’ को कारण बताओ नोटिस जारी किया। द टेलीग्राफ को ये नोटिस राष्ट्रपति के नाम की तुलना कोरोना वायरस के साथ करने के कारण दिया गया। मंगलवार (मार्च 17, 2020) को जारी प्रेस रिलीज के अनुसार परिषद ने 17 मार्च 2020 को अखबार में प्रकाशित हुई एक हेडलाइन पर संज्ञान लेते हुए ये एक्शन लिया।
इस हेडलाइन में वामी समाचार पत्र ने ‘व्यंग्यात्मक’ शैली का इस्तेमाल करते हुए नियमों का उल्लंघन किया था। जिसके बाद पत्रकारिता नियमों के उल्लंघन के आरोप में ये नोटिस जारी किया गया।
प्रेस रिलीज
जानकारी के अनुसार, प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस चंद्रमौली कुमार प्रसाद ने इस मुद्दे पर संज्ञान लिया था और पत्रकारिता आचरण के मानदंडों का उल्लंघन करने के लिए द टेलीग्राफ के संपादक को नोटिस भेजा।
प्रेस काउंसिल ने लिखा कि देश के प्रथम नागरिक (राष्ट्रपति कोविंद) पर व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ, उपहास और उन्हें नीचा दिखाने की बात गैरजरूरी होने के साथ-साथ पत्रकारिता के उचित प्रतिमानों के विपरीत जाती हैं।
गौरतलब है राष्ट्रपति कोविंद ने सोमवार को पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए नामित किया था। जिसके बाद वामपंथियों में हलचल मच गई और वे पूर्व सीजेआई के फैसलों को इससे जोड़कर देखने लगे। इस बीच कल मंगलवार को नफरत की हर सीमा पार करते हुए द टेलीग्राफ ने पत्रकारिता की गरिमा को ताक पर रख दिया और प्रथम नागरिक राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को ही वायरस कह दिया।
हालाँकि, इस हेडलाइन को देखने के बाद कई सोशल मीडिया यूजर्स भड़क गए। उन्होंने इसे दलित समुदाय का अपमान बताया और राष्ट्रपति कोविंद को अपना दलित नेता। लोगों ने लिखा लिबरलों को दलित से इतनी घृणा है कि राष्ट्रपति की तुलना वायरस से कर सकते हैं तो फिर दलितों के लिए इनकी सोच क्या होगी। एक ने लिखा कि सिर्फ लिबरल ही राष्ट्रपति की तुलना घातक वायरस से कर सकते हैं।
इसके बाद इस मामले ने कल बहुत तूल पकड़े रखा और अंत में प्रेस परिषद के संज्ञान में ये मामला आया। प्रेस परिषद ने इस प्रयोग के लिए द टेलीग्राफ को फटकार लगाई और उससे ऐसी हरकत करने के पीछे की वजह को पूछा।
बीजेपी नेता डॉ. बीएस तोमर की हत्या की साजिश रचने के आरोप में गाजियाबाद पुलिस ने सपा के एक नेता को गिरफ्तार किया है। उसका नाम मेहताब कुरैशी है। उसे पेरिफेरल एक्सप्रेसवे के पास से पुलिस ने दबोचा। तोमर की बीते साल उनके क्लीनिक के पास ही गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार शुरुआत में इस मामले को एक किशोरी से जोड़कर देखा गया था। लेकिन डासना चेयरमैन के पति की गिरफ्तारी के बाद राजनीतिक रंजिश की बात सामने आई। इस मामले में कुरैशी का नाम करीब आठ महीने पहले सामने आया था। एआईएमआईएम के पश्चिमी यूपी के प्रभारी आरिफ की गिरफ्तारी के बाद उसकी भूमिका उजागर हुई। लेकिन, वह फरार हो गया।
#Ghaziabad – सपा नेता मेहताब कुरैशी गिरफ्तार, भाजपा नेता की हत्या में कुरैशी गिरफ्तार, बीएस तोमर की हत्या की साजिश का आरोप, लंबे समय से फरार चल रहा था मेहताब कुरैशी, जुलाई 2019 में हुई थी भाजपा नेता की हत्या, मसूरी पुलिस ने मेहताब कुरैशी को किया अरेस्ट।
इस मामले में पुलिस अब तक 11 आरोपितों को गिरफ्तार कर चुकी है। थाना प्रभारी उमेश पवांर ने बताया कि मेहताब कुरैशी की एक समय डासना क्षेत्र में अच्छी पैठ थी। इस बीच बीजेपी नेता बीएस तोमर का भी प्रभाव बढ़ने के चलते उनका भी क्षेत्र के अधिकांश मुद्दों में दखल बढ़ने लगा था। इतना ही नहीं तोमर की पकड़ समाज में कुछ इस तरह से बन गई थी कि लोग अपनी समस्याओं को लेकर उनके पास ही जाते थे। इससे मेहताब का क्षेत्र में लगातार वर्चस्व कम होता जा रहा था। इससे वह काफी परेशान रहने लगा था। इसी को लेकर उसने आरिफ के साथ मिलकर बीएस तोमर की हत्या की प्लानिंग की और किशोरी के परिवार को इसके लिए तैयार किया।
गौरतलब है कि मसूरी के दूधिया पीपल में पिछले वर्ष 20 जुलाई की रात नौ बजे तोमर क्लीनिक बंद कर निकले ही थे कि हमलावरों ने उन्हें गोलियों से भून दिया था। उनके सिर व पीठ में दो और पसलियों में एक गोली लगी थी। उनको 5 गोली मारी गई थी। जिस जगह उन्हें गोली मारी गई थी वहॉं से पुलिस चौकी महज 50 मीटर की दूरी पर है। हमलावर जिस स्कूटी से आए थे उसे मौके पर ही छोड़ फरार हो गए थे। जाँच से पता चला कि स्कूटी डासना निवासी शाहरुख की थी। बता दें कि बीएस तोमर के पास बीजेपी मंडल अध्यक्ष की जिम्मेदारी थी।
अंत्योदय के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था कि ‘हमारी सोच और हमारे सिद्धांत ये हैं कि गरीब और अशिक्षित लोग हमारे ईश्वर हैं, यही हमारा सामाजिक और मानवीय धर्म है।’ इसी विचार को आत्मसात कर लोक कल्याण के लिए कार्य कर रही उत्तर प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने तीन वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। मुझे यह कहते हुए हार्दिक प्रसन्नता हो रही है कि हमारी सरकार के ये तीन वर्ष अंतिम पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति के उदय के थे।
चुनौतियाँ
इस दौरान हमारी सरकार को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। मसलन सपा-बसपा के कार्यकाल में प्रदेश की जर्जर हो चुकी स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करना, नकल माफियाओं पर अंकुश लगाकर गुणवत्तापरक शिक्षा की बहाली और सबसे अहम कार्य प्रदेश की चौपट हो चुकी कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाना था। जिसमें हम सफल भी रहे।
आज विकास, विश्वास और सुशासन के साथ देश के समक्ष नया उत्तर प्रदेश खड़ा है। निरोगी प्रदेश के संकल्प को मूर्त रूप प्रदान करने के लिए “कु-व्यवस्था” के वायरस से संक्रमित आईसीयू में पड़ी स्वास्थ्य व्यवस्था को सुशासन की “प्राण वायु” प्रदान करना आवश्यक था।
यहाँ यह जानना दिलचस्प है कि प्रदेश में देश के स्वतन्त्र होने के 76 साल तक केवल 12 मेडिकल कॉलेज अस्तित्व में थे। अतएव हमने सहज, सुव्यवस्थित और साधन सम्पन्न चिकित्सकीय सुविधाओं हेतु मात्र 03 वर्षों में ही 07 नए मेडिकल कॉलेज स्थापित कर उनमें एमबीबीएस की कक्षाएँ प्रारम्भ करा दीं। इसके साथ ही 13 नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना की स्वीकृति भी केंद्र सरकार से प्राप्त की। इस प्रकार कुल 28 मेडिकल कॉलेजों की सेवाएँ उत्तर प्रदेश को प्राप्त होंगी। यही नहीं गोरखपुर और रायबरेली में एम्स अपना प्रस्तावित आकार प्राप्त कर रहा है।
स्वास्थ्य सेवाएँ
यह स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी एवं स्वच्छ भारत अभियान की सक्रियता का परिणाम है कि पूर्वी यूपी में 4 दशकों से बच्चों में महामारी के रूप में जानी जाने वाली इंसेफ्लाइटस रोगियों की संख्या में 56 प्रतिशत की कमी हुई है तथा 90 प्रतिशत मृत्यु में कमी आई है। प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में आम जन की आस्था सरकारी चिकित्सा व्यवस्था पर बढ़ी है। सरकारी अस्पतालों में फिर भीड़ दिखाई पड़ने लगी है। हमने प्रदेश को निरोगी बनाने के संकल्प में एक और रचनात्मक प्रयोग करते हुए संवेदित, सक्रिय और संवर्धित चिकित्सकीय सेवाओं के लिए प्रत्येक रविवार को प्रत्येक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पर “मुख्यमंत्री आरोग्य मेला” का आयोजन प्रारम्भ किया है।
साभार :ट्विटर
2 फरवरी से प्रारम्भ हुई इस योजना में लाखों की संख्या में आमजन निःशुल्क सुविधाएँ प्राप्त कर रहे हैं। आज प्रदेश में कोरोना वायरस संक्रमण जैसी किसी भी आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए हमारा स्वास्थ्य विभाग पूर्णतः तैयार है। जन जागरण के बिगुल से लेकर आइसोलेशन वार्ड तक, सरहदी क्षेत्रों की नाकेबंदी से लेकर थर्मल एनालाइजर तक की स्थापना तक, कोई भी प्रयास हमारे सामर्थ्य से बाहर नहीं है। शिक्षा के आलोक में ही कोई भी समाज उन्नति-पथ पर गति कर सकता है। तो सबसे पहले हमने नकल माफियों के चंगुल से शिक्षा को मुक्त कराया।
कृषि
उत्तरप्रदेश में भाजपा सरकार के समक्ष सबसे चुनौतिपूर्ण कार्य किसानों के चेहरे पर खुशी वापस लाना था। गन्ने की खेती करने वाले किसान लंबे समय से इंतजार कर रहे थे कि कोई उनकी परेशानी को समझे। भाजपा के आते ही उनकी परेशानियों का समाधान हुआ और आज उत्तर प्रदेश देश में गन्ना और चीनी उत्पादन में लगातार दूसरी बार प्रथम स्थान पर है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना के तहत 12 हजार करोड़ रुपए सीधे किसानों के खातों में भेजे गए। साथ ही किसानों का 36 हजार करोड़ रुपए का ऋण माफ किया और ऐसे करके हमने किसानों से किए अपने वादों को पूरा किया है।
शिक्षा
“ऑपरेशन कायाकल्प” के माध्यम से 92 हजार से अधिक प्राइमरी पाठशालाओं को आधारभूत सुविधाएँ जैसे बाउंड्रीवाल, शौचालय, पेयजल, विद्युतीकरण आदि से संपन्न किया है। इन विद्यालयों में 45,383 शिक्षकों की भर्ती की गई है तथा 69,000 शिक्षकों की भर्ती अंतिम चरण में है। इसी प्रकार माध्यमिक शिक्षा में भी 55 नए सरकारी इंटर कॉलेज की स्वीकृति दी गई है। यही नहीं वंचना के दंश से पीड़ित श्रमिकों के बच्चों एवं अनाथ बच्चों के जीवन में ज्ञान के आलोक को विस्तारित करने हेतु प्रत्येक मण्डल मुख्यालय में अटल आवासीय विद्यालयों की स्थापना की कार्रवाई को आगे बढ़ाया है।
सदियों से हाशिए पर पड़े वनटांगिया, कोल, मुसहर एवं थारू जनजातियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के संकल्प के क्रम में उनके सभी ग्रामों को राजस्व ग्राम घोषित कर सरकार द्वारा संचालित समस्त जन कल्याणकारी योजनाओं से आच्छादित किया। उन्हें मतदान का अधिकार प्राप्त कराया।
नारी सशक्तिकरण
महिला सशक्तिकरण के लिए भी हमारी सरकार ने बेहतर कार्य किया है। ‘मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना’ के तहत 01 लाख से अधिक गरीब कन्याओं को 51 हजार रुपए प्रति लाभार्थी देते हुए योजना से लाभान्वित किया गया। ‘ऐंटी रोमियो स्क्वाड’ की स्थापना कर पुलिस के द्वारा मनचलों के विरूद्ध प्रभावी कार्यवाही की गई। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान के तहत प्रदेश में अच्छा कार्य हुआ है। ‘मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना’ लागू की गई। स्वास्थ्य विभाग और महिला कल्याण विभाग के कार्यक्रमों को प्रभावशाली ढंग से क्रियान्वित किए जाने का परिणाम यह है कि प्रदेश के जनपदों में लिंगानुपात में काफी सुधार हुआ है। निराश्रित महिला पेंशन योजना में लाभार्थियों की संख्या मे काफी वृद्धि हुई है। लखनऊ, बदायूँ व गोरखपुर में महिला पीएसी बटालियन की स्थापना की जा रही है। ‘पिंक बस सेवा’ की शुरुआत की गई है। इन बसों में महिला कंडक्टर के साथ सुरक्षाकर्मी की तैनाती की जा रही है तथा इन बसों में सीसीटीवी कैमरे भी लगाए जा रहे है।
कानून-व्यवस्था
कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर हमें विरासत में अपराधियों के सम्मुख बेबस पुलिस मिली थी। जो “सेफ जोन” होना चाहिए था वो स्थान अपराधियों के “सफारी जोन” थे। फिर हमारी सरकार ने कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कठोरतम प्रयास किए। परिणामतः आज अपराधी प्रदेश छोड़ कर भाग रहे हैं या जेलों में कैद हैं। बेहतर पुलिसिंग के लिए प्रदेश में 41 नए थाने, 13 नई चौकियाँ स्थापित की गई। 1.7 लाख पुलिसकर्मियों की भर्ती की गई। लखनऊ तथा गौतमबुद्ध नगर में पुलिस कमिश्नरी प्रणाली को लागू किया गया।
अपराध के प्रति जीरो टालरेंस की नीति अपनाते हुए पुलिस-व्यवस्था में व्यापक सुधार हुआ। अपराध के आँकड़ों में बहुत गिरावट आई। डकैती के मामलों में वर्ष 2016 की तुलना में वर्ष 2019 में 59.70 प्रतिशत सुधार हुआ, तो वहीं इसी अवधि में हत्या के मामलों में 47.09 प्रतिशत की कमी आई। कश्मीर में धारा 370 के निर्मूलन के आदेश के समय, अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि विवाद मामले में निर्णय के समय प्रशासन और पुलिस के प्रभावी नियन्त्रण का ही परिणाम था, कि पूरे प्रदेश में एक भी हिंसात्मक घटना नहीं हुई।
नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में कुछ अराजक तत्वों ने सुनियोजित तरीके से कानून-व्यवस्था को खराब करने का असफल प्रयास किया, किन्तु बाद में इसे भी प्रभावी और परिणामदायक ढंग से नियंत्रित कर लिया गया। उपद्रवियों को चिह्नित कर उनके द्वारा नष्ट की गई सम्पत्तियों की क्षतिपूर्ति उपद्रवियों से ही की गई, तो उप्र शासन के इस प्रयास को पूरे देश में व्यापक समर्थन भी मिला। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने प्रदेश की बेहतर कानून-व्यवस्था को सराहा और कहा कि उप्र की तर्ज पर अपराधियों के खिलाफ कड़ा कानून लागू किया जाए। यह उपद्रवियों व उनके रहनुमाओं पर बड़ी चोट थी।
यह कुशल नियोजन व अनुशासित व्यवस्था का ही सुफल है कि प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय की दर में अनवरत वृद्धि हो रही है। आँकड़ों में कहें तो 2014-15 में प्रति व्यक्ति आय 42,267 रुपए थी जो वर्तमान में बढ़कर 70,419 रुपए हो गई है। यह हमारी पारदर्शी व्यवस्था की उपलब्धि ही कही जाएगी कि विगत तीन वर्षों में प्रदेश सरकार द्वारा 03 लाख लोगों को प्रदान की गईं सरकारी नौकरियाँ, विवाद मुक्त हैं। मेरे लिए यह निजी संतुष्टि का विषय है कि इन तीन वर्षों में प्रदेश कई क्षेत्रों में देश में शीर्ष पर पहुँचा है। कौशल विकास नीति, राज्य स्वास्थ्य नीति लागू कर एवं मानव-वन्य जीव संघर्ष को आपदा घोषित करने में उत्तर प्रदेश, देश का पहला राज्य बना। ई-मार्केट (जेम) के अंतर्गत सर्वाधिक खरीददारी करने में भी टॉप वायर पुरस्कार हासिल कर देश में पहला स्थान प्राप्त किया।
प्रधानमंत्री आवास योजना में 09, मनरेगा में 07, रूर्बन मिशन में 02, आजीविका मिशन में 01, ग्राम स्वराज अभियान में 01 और एनआईआरडीपी में 01 पुरस्कार प्राप्त हुए। तीन वर्ष में ही मातृ मृत्यु दर में सबसे अधिक 30 प्रतिशत गिरावट आई। पोषण माह के लिए सर्वोच्च पुरस्कार मिला। स्वच्छता सर्वेक्षण में प्रदेश के 14 निकाय सम्मानित हुए एवं सर्वाधिक तिलहन उत्पादन के लिए कृषि कर्मण पुरस्कार मिला। द मिलियन फार्मर्स स्कूल (किसान पाठशाला) योजना जैसे अभिनव प्रयोग को देश-विदेश में लागू करने की अनुशंसा की गई तो ‘एक जनपद-एक उत्पाद योजना’ को भारत सरकार ने देश के हर जनपद में लागू करने योग्य योजना कहा।
अन्य उपलब्धियाँ
महिला सशक्तिकरण के तहत वन स्टॉप सेंटर स्थापित करने के लिए नारी शक्ति पुरस्कार, डिजिटल भूमि प्रणाली के लिए राष्ट्रीय ई-गवर्नेस पुरस्कार, अधिक विद्युत संयोजन के लिए सौभाग्य योजना पुरस्कार, दिव्यांगजन सशक्तिकरण के लिए तीन राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले।
दुग्ध, चीनी, गन्ना, खाद्य उत्पादन में भी प्रदेश प्रथम स्थान पर है। देश में सबसे ज्यादा चिकित्सा संस्थानों की स्थापना एवं संचालन में भी प्रदेश अग्रणी है। यह पुरस्कार हमें नित नया अभिनव करने को प्रोत्साहित करते हैं। इन सबसे प्रदेश की पहचान विकसित प्रदेश के रूप में हो रही है। गाँव, गरीब, किसान, महिला, मजदूर, नौजवान सहित सभी के हित-कल्याण के लिए हम प्रतिबद्ध हैं। 23 करोड़ लोगों की विशाल आबादी वाला उत्तर प्रदेश सकारात्मक उत्पादक परिवर्तन लाते हुए माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की भावनानुरूप वन ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी बनने की ओर अग्रसर है।
निवेश एवं आधारिक संरचना
अंत्योदय से राष्ट्रोदय की संकल्पना को मूर्तरूप प्रदान करती हमारी वैचारिक दृष्टि अवध के मन, पूर्वांचल की आशा, बुंदेलखण्ड की अपेक्षा और पश्चिमांचल की अभिलाषा को संतुष्ट करने के क्रम में अनवरत प्रयत्नशील है। भ्रष्टाचार और कदाचार में लिप्त प्रत्येक व्यक्ति पर हमारी व्यवस्था द्वारा जीरो टालरेंस के तहत की जा रही कार्यवाहियाँ, प्रदेश में “बदली हुई व्यवस्था” का संदेश देने में सफल हुई हैं। और यही संदेश हमारी पूँजी है। बजट, योजनाओं का वित्तीय ढाँचा होता है। देश के सबसे बड़े प्रदेश उप्र के समावेशी विकास के लिये हमने इस वर्ष 05 लाख 12 हजार 860 करोड़ 72 लाख रुपए का बजट प्रस्तुत किया, जो प्रदेश के इतिहास का सबसे बड़ा बजट है।
युवाओं को समर्पित इस ऐतिहासिक बजट में मुख्यमंत्री शिक्षुता प्रोत्साहन योजना (APPRENTICESHIP) तथा युवा उद्यमिता विकास अभियान (YUVA) जैसी योजनाएँ स्वरोजगार और स्वावलंबन के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होंगी। जाति, मत और मजहब से ऊपर उठकर सभी वर्गों का ख्याल रखते हुए हमारी सरकार ने प्रदेश में सुशासन का राज स्थापित किया है। अपराधमुक्त, भयमुक्त और अन्यायमुक्त वातावरण से प्रदेश का चतुर्दिक विकास हो रहा है। प्रदेश की जनता का सरकार पर भरोसा लौटा है। उत्तर प्रदेश को पुराना गौरव वापस दिलाने के लिए हमारी सरकार कृति संकल्पित है। आदरणीय प्रधानमंत्री जी की प्रेरणा से शेष दो वर्ष में उत्तर प्रदेश प्रगति नए आयाम लिखेगा।