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शाहीन बाग़ प्रदर्शनकारियों के कारण दिल के मरीज की मौत, तीन बेटियाँ हुईं अनाथ

शाहीन बाग़ के लोग प्रदर्शन स्थल से हटने को तैयार नहीं हैं, जिसके कारण कोरोना वायरस के फैलने का ख़तरा और बढ़ गया है। पुलिस द्वारा लाख समझाने के बावजूद उपद्रवी वहाँ से हटने को तैयार नहीं हैं। वो लोग दिल्ली सरकार के उस आदेश को भी मानने से इनकार कर रहे हैं, जिसमें एक जगह 50 से अधिक लोगों के न जमा होने की बात कही गई है। यहाँ तक कि विशेषज्ञों और डॉक्टरों की सलाह को भी धता बता कर अन्य लोगों को खतरे में डाला जा रहा है। अब इन उपद्रवियों के कारण एक व्यक्ति की मौत हो गई है।

‘न्यूज़ नेशन’ के पत्रकार दीपक चौरसिया ने भी आरोप लगाया कि शाहीन बाग़ ने एक व्यक्ति की जान ले ली, जिनका नाम सुरेंद्र था। 55 वर्षीय सुरेंद्र को सोमवार (मार्च 16, 2020) को हार्ट अटैक आया था। घरवालों ने आनन-फानन में एक ऑटो हायर करके सफदरगंज अस्पताल की ओर जाने लगे। रास्ते में शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों ने भारी जाम लगा रखा था। वो लोग वहाँ से हटने को तैयार नहीं थे। प्रदर्शनकारियों के कारण सुरेंद्र सही समय पर अस्पताल नहीं पहुँच पाए और उनकी मौत हो गई।

सुरेंद्र मदनपुर खादर के रहने वाले थे। उनके परिजनों ने कहा है कि वो इन प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ हत्या का मामला दर्ज कराएँगे। उनकी पत्नी और तीन बेटियाँ हैं, जो अनाथ हो गईं। सुरेंद्र का सफदरगंज अस्पताल में पहले से ही इलाज चल रहा था। उन्हें रात के क़रीब 11 बजे हार्ट अटैक आया था। उन्हें अस्पताल ले जाते समय कालिंदी कुञ्ज मार्ग पूरी तरह बंद था। पीड़ित की हालत और बिगड़ने से उन्हें नजदीकी अपोलो हॉस्पिटल ले जाया गया लेकिन वहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।

डॉक्टरों ने बताया कि अगर सुरेंद्र को 20 मिनट पहले अस्पताल पहुँचाया जाता तो उनकी जान बचने की संभावना थी। हार्ट केयर फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉक्टर केके अग्रवाल ने भी इस बात की पुष्टि की और बताया कि मरीज को हार्ट अटैक आने के आधे घंटे के भीतर अस्पताल पहुँचा दिया जाना चाहिए। ऐसे मामलों में जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, वैसे-वैसे मरीज की टेबियार और बिगड़ती जाती है और इलाज मुश्किल हो जाता है।

ये योगी का उत्तर प्रदेश है, यहाँ गुंडागिरी नहीं चलती: कारगर है दंगों से निपटने का ‘योगी मॉडल’

गोरक्षधाम के महंत योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के पहले ऐसे भाजपा नेता हैं, जिन्होंने बतौर मुख्यमंत्री राज्य में 3 साल का कार्यकाल पूरा किया है। इसमें कोई शक नहीं कि वो पूरे 5 साल राज करेंगे लेकिन इस दौरान उन्होंने जो सबसे अच्छे कार्य किए, उनमें से एक है क़ानून-व्यवस्था का राज़ स्थापित करना। यूपी में हुए ताबड़तोड़ एनकाउंटर्स में कई अपराधी मारे गए, कई राज्य से ही भाग खड़े हुए और कइयों ने सरेंडर किया। लेकिन, बुद्धिजीवियों का एक वर्ग लगातार लोगों को उकसा कर माहौल बिगाड़ने में लगा रहता है, जैसा दिल्ली में किया गया।

उत्तर प्रदेश में मुस्लिमों की जनसंख्या 20% के आसपास है। यानी लिबरलों व मीडिया के गिरोह विशेष के पास वहाँ के मुस्लिमों को भड़काने के ज्यादा मौके थे और इसके लिए पूरा प्रयास किया गया। शाहीन बाग़ की तर्ज पर लखनऊ और वाराणसी में महिलाओं को बिठाया गया। इमरान प्रतापगढ़ी और शरजील इमाम से भड़काऊ व आपत्तिजनक भाषण दिलाए गए। जेएनयू और जामिया के तर्ज पर एएमयू को सुलगाने का प्रयास किया गया। मजहबी युवकों को पत्थरबाजी में लगाया गया। पुलिस पर हमले किए गए। लेकिन, कुछ ही दिनों में सब शांत हो गया और नापाक मंसूबे वाले नाकामयाब रहे।

ऐसा क्यों हुआ? पूरे मीडिया गिरोह, लिबरल गैंग और कथित बुद्धिजीवियों की राह में एक ही रोड़ा था- यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ, गोरक्षधाम पीठ के महंत। इस महंत ने एक के बाद एक देश के टुकड़े-टुकड़े करने वालों के मंसूबों पर पानी फेर दिया। न तो मीडिया उन्हें चुप करा सकता है और न ही वो फर्जी बुद्धिजीवियों के दबाव में आते हैं। और हाँ, हिंसा की वारदातों को शांत कराने का अनुभव तो उन्हें गोरखपुर से ही है। सब कुछ क़ानून सम्मत हुए, लेकिन कैसे? यहाँ दिल्ली हिंसा के बीच हम शांति के यूपी मॉडल की बात करेंगे।

दंगाइयों से पाई-पाई वसूलने वाला नियम

उत्तर प्रदेश में दंगाइयों और उपद्रवियों पर अन्य कार्रवाई से ज्यादा जोर इस बात पर है कि उनकी करतूतों से जो सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई की जाए। जैसे, रामपुर जिले में 28 लोगों को आरोपित बनाया गया और पुलिस के 9 डंडे व 3 हेलमेट तक के रुपए वसूल लिए गए। भले ही वो एक कंगाल व्यक्ति हो या कोई धन्नासेठ, अगर उसने सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का काम किया है तो उससे वसूली की है। पुलिस की जीप पर पत्थरबाजी हुई तो उसे बनवाने के लिए रुपए भी दंगाइयों से ही वसूले गए।

बता दें कि ‘सार्वजनिक संपत्ति नुकसान रोकथाम अधिनियम 1984’ पहले से मौजूद है। इसके प्रावधानों के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति सरकारी या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का दोषी साबित होता है तो उसे 5 साल तक की सजा हो सकती है। इसमें जुर्माने का भी प्रावधान है। ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने पर सजा और जुर्माना दोनों हो सकता है। यानी, क़ानून तो पहले से है लेकिन इसका सही तरीके से उपयोग योगी सरकार ने किया। लखनऊ से लेकर अलीगढ़ तक दंगाइयों से पाई-पाई वसूला गया। सीधा मतलब है, जब किसी को अपनी संपत्ति जाने का भय होगा तो वो जनता की संपत्ति को नुकसान पहुँचाएगा ही नहीं।

सड़क पर दादागिरी नहीं चलेगी: प्रदर्शन अलग कीजिए

इसे लखनऊ के घंटाघर पर चल रहे विरोध प्रदर्शन से समझिए। वहाँ महिलाओं को बड़ी तादाद में बिठा दिया गया था। योगी सरकार ने प्रदर्शन के लिए कभी किसी को नहीं रोका क्योंकि लोकतंत्र में इसके लिए जनता को अधिकार है। लेकिन, ‘अवैध तौर-तरीकों’ से चल रहे प्रदर्शन से ज़रूर उसी हिसाब से निपटा गया। घंटाघर पार्क में प्रदर्शनकारियों ने ज्यादतियाँ की। कुछ लोगों ने वहाँ रस्से और डंडे से घेरा बनाकर शीट लगाया था जिसे लगाने से प्रशासन द्वारा मना किया गया था। वहाँ कम्बल वितरित किया जा रहा था, जिसे लेने के लिए आसपास के लोग आ रहे थे और अराजकता फ़ैल रही थी।

पुलिस ने तुरंत जाकर कम्बलों को वहाँ से हटाया। हालाँकि, अफवाह भी फैलाई गई कि पुलिस कम्बल छीन रही है। कम्बल वितरित करने वाले संगठनों के लोगों को भी वहाँ से भगाया गया। बिना अनुमति लगाए गए टेंट्स को जब्त कर लिया गया। जिन्होंने भड़काने की कोशिश की, उन पर सीधा चालान लगाया गया। हज़ारों महिलाएँ वहाँ जमा थीं लेकिन जिन चीजों को वहाँ ले जाने की अनुमति नहीं थी, पुलिस ने उस एक-एक चीज को जब्त किया। दिल्ली में भी योगी का यही मॉडल ज़रूरी है, जो विपक्षी नेताओं और मीडिया की परवाह न करते हुए क़ानून-सम्मत कार्रवाई करे।

पुलिस के साथ खड़ी रही सरकार: दी गई खुली छूट

आपको याद होगा कि मेरठ के एसपी ने आपत्तिजनक पाकिस्तान समर्थित नारे लगाने वाले उपद्रवियों की बस्ती में घुस कर उनके परिवार वालों को समझाया। एसपी ने स्पष्ट कहा कि जिन्हें ये सब करना है, वो पाकिस्तान चले जाएँ। उन्होंने उपद्रवियों से कहा– “इस गली को मैं ठीक कर दूँगा।” एसपी अखिलेश नारायण का वीडियो वायरल कर के उन्हें ख़ूब बदनाम करने का प्रयास किया गया। लेकिन, यूपी सरकार अपने पुलिस अधिकारी के साथ मजबूती खड़ी रही, पूरे दुष्प्रचार के बावजूद। यूपी सरकार के मंत्री मोहसिन रजा ने एसपी का समर्थन किया।

यहाँ तक कि दंगाइयों के होर्डिंग लगाने का मामला हाईकोर्ट में भी गया और वहाँ इस पर रोक लगा दी गई लेकिन योगी सरकार उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट गई। वहाँ अपील करने के बाद एक अध्यादेश पास कर के दंगाइयों के पोस्टर लगाने और उनका ‘नेम व शेम’ करने की योजना का मार्ग प्रशस्त किया गया। इसका असर भी दिख रहा है और कई शहरों में दंगाइयों द्वारा सरकार को चेक सौंप कर नुकसान की भरपाई की जा रही है।

सरकार से मास्क और सेनिटायजर माँगने वाले शाहीन बाग में चौकी तो है, लोग नहीं

सीएए विरोध के नाम पर पिछले तीन महीने से चल रहे दिल्ली के शाहीन बाग धरने में कोरोना के डर ने प्रवेश कर दिया है, यही कारण है कि धरने पर हर रोज प्रदर्शनकारियों की संख्या घटती चली जा रही है। हालाँकि, महिलाओं का सीएए के खिलाफ धरना प्रदर्शन अभी जारी है और वह किसी भी कीमत पर धरने से उठने को तैयार नहीं हैं।

बुधवार दोपहर को शाहीन बाग धरना स्थल पर प्रदर्शनकारियों की संख्या बेहद कम हो गई। तस्वीर में साफ देखा जा सकता है कि धरना स्थल पर कुछ मीटरों की दूरी पर जगह-जगह रहे तख्त पर इक्का-दुक्का महिलाएँ बैठी हुई दिखाई दे रही हैं। वहीं कुछ अधिंकाश प्रदर्शनकारी मुँह पर मास्क पहने दिखाई दिए, लेकिन दिल्ली सरकार द्वारा कोरोना के खतरे को देखते हुए 50 से अधिक लोगों के एक स्थान पर एकत्र न होने की चेतावनी शाहीन बाग के काम नहीं आई। शाहीन बाग पर बैठी महिला प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वह अपनी माँगों को लेकर अडिग हैं हम तब तक धरना समाप्त नहीं करेंगे जब तक कि मोदी जी इस काले कानून को वापस नहीं ले लेते।

वहीं केजरीवाल सरकार की अपील के बाद मंगलवार को धरने पर पहुँचे दिल्ली पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों की प्रदर्शनकारियों से धरना समाप्त कराने को लेकर तीखी बहस हो गई थी। दरअसल, अधिकारियों ने वायरस के खतरे को देखते हुए प्रदर्शन को खत्म करने की अपील की। उन्होंने कहा कि भीड़ से संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। यह प्रदर्शनकारियों के साथ-साथ आम नागरिकों के जीवन के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है। इस पर प्रदर्शनकारी भड़क उठे और बोले धरना जारी रहेगा। बातचीत विफल होने के बाद अधिकारी मौके से वापस चले गए थे।

गौरतलब हो कि दिल्ली सरकार ने 31 मार्च तक सभी स्कूलों और सिनेमा घरों को बंद कर दिया है साथ ही दिल्ली सरकार ने राजधानी में 50 से अधिक लोगों के एकत्रित होने पर रोक लगा दी है। वहीं दिल्ली सरकार ने कोरोना वायरस के खतरे को देखते हुए लोगों से भीड़-भाड़ वाली इलाकों में नहीं जाने की भी अपील की गई है। लेकिन सरकार की इस एडवाइजरी को धता बताते हुए शाहीन बाग में प्रदर्शनकारी किसी भी कीमत पर प्रदर्शन से हटने को तैयार नहीं हैं।

COVID-19: दुनियाभर में 2 लाख से अधिक संक्रमित, स्पेन में एक ही दिन में 190 मौतें, भारत में 14 हो चुके हैं रिकवर

चीन के वुहान से शुरू हुए कोरोना वायरस को धीरे-धीरे पूरे विश्व के मानचित्र पर अपने पैर पसारते देखा जा रहा है। हालाँकि, कोरोना के संक्रमण से पॉजिटिव पाए गए केस में से काफी लोगों को क्वारंटाइन कर सफलतापूर्वक रिकवर भी किया गया है।

यदि आँकड़ों को देखें तो भारत में कोरोना वायरस मरीजों की संख्या बढ़कर 152 हो गई है। इनमें से 14 को सफलतापूर्वक रिकवर भी कर लिया जा चुका है। जबकि इस वायरस के चपेट में आने के कारण भारत में अब तक कुल तीन लोगों की मौत हो चुकी है। आज ही नोएडा में एक और व्यक्ति को भी कोरोना पॉजिटिव पाया गया है। जबकि अभी तक इसके अलावा कर्नाटक में दो और तेलंगाना में एक नया मामला सामने आया है।

दुनियाभर में बसे हुए भारतीयों की यदि बात करें तो कुल 276 भारतीय अभी तक कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए हैं। भारत सरकार निरंतर ऐसे मामलों पर संज्ञान ले रही है और उन्हें रेस्क्यू करने का प्रयास कर रही है। लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में विदेश मंत्रालय ने कहा कि 276 भारतीय विदेश में कोरोना वायरस से संक्रमित हैं, जिनमें ईरान में 255, यूएई में 12, इटली में 5, और हांगकांग, कुवैत, रवांडा और श्रीलंका में 1-1 शामिल हैं।

सर्च इंजन ‘बिंग’ और ‘वर्ड मीटर डॉट इन्फो’ द्वारा जारी कोरोना के डाटा के आधार पर दुनिया भर में अभी तक क्रमशः कुल 2,03,401 और 2,04,037 लोगों के इस वायरस में चपेट में होने की बात कही जा रही है। जिनमें से 112,517 लोग संक्रमित बताए जा रहे हैं, इनमें से कुल संक्रमित का कुल छह प्रतिशत यानी, 6,434 लोग वो हैं जो वायरस के प्रभाव से गंभीर रूप से संक्रमित हैं। जबकि 8,211 (बिंग) 8,229 (वर्ड मीटर डॉट इन्फो) लोगों की मौत हो चुकी है।

वहीं यूरोपीय देश स्पेन में अभी तक एक ही दिन में 190 मौत होने से मामला बेहद गंभीर हो चुका है। स्पेन में पिछले 24 घंटे में 191 लोगों की मौत हो गई और कुल आँकड़ा 598 तक पहुँच गया। जबकि स्पेन में अब तक कुल 12,037 लोग संक्रमित हैं।

चीन के बाद इस भयानक वायरस का कहर यूरोप में टूट रहा है। आँकड़ों के अनुसार, कोरोना के कारण सबसे ज्यादा मौत चीन (3,237) के बाद अभी तक इटली (2,503) में हुई हैं और ईरान (1,135) तीसरे नम्बर पर है। वहीं, अमेरिका में कोरोना से 26 और लोगों की मौत के बाद आँकड़ा 112 तक पहुँच गया है।

भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान कि स्थिति भी प्रतिदिन दयनीय नजर आ रही है और वहाँ पर अभी तक कुल 254 संक्रमितों मामलों में से एक की मौत हो चुकी है। हालाँकि रूस इस वायरस से निपटने में अभी तक काफी कामयाब देखा जा सकता है क्योंकि इस वायरस का संक्रमण वहाँ पर अन्य पड़ोसी देशीं के मुकाबले कम है। रूस में कुल 147 मामले सामने आए हैं जिनमें से एक भी मौत नहीं हुई है।

एक नजर सर्च इंजन ‘बिंग’ द्वारा जारी विश्व के मानचित्र पर कोरोना वायरस से प्रभावित देशों पर-

सब कुछ सरकार पर नहीं छोड़ सकते: सुप्रीम कोर्ट

कोरोना वायरस पर सुनवाई करते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायलय ने कहा है कि सब कुछ सरकार पर नहीं छोड़ सकते। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने कहा, “ये महामारी हर 100 साल में आती है। कलयुग में वायरस से हम फाइट नहीं कर सकते। आप सभी हथियारों को तैयार कर सकते हैं। लेकिन, आप इस वायरस से नहीं लड़ सकते। हमें अपने स्तर पर इससे लड़ना होगा।”

चीन पर अल्लाह का अजाब है कोरोना, मस्जिदें बंद की इसलिए आया: मेरठ का काजी

दुनिया के करीब 150 देशों को चपेट में ले चुके कोरोना वायरस का संक्रमण चीन के वुहान से शुरू हुआ था। इस महामारी पर काबू पाने के लिए तरह-तरह के कदम उठाएँ जा रहे हैं। लेकिन, इसके साथ-साथ बेतुके बयानों का सिलसिला भी जारी है। इसी कड़ी में मेरठ के शहर काजी की तरफ से कहा गया है कि चीन ने मस्जिदों को बंद किया, जिसकी वजह से कोरोना वायरस आया।

मेरठ के नायब शहर काजी की मानें तो चीन में मस्जिद बंद करने से कोरोना वायरस आया है। काजी जैनुर राशिदीन ने कहा है कि कोरोना वायरस अल्लाह का अजाब है। चीन में मस्जिदों को बंद कर दिया गया था। इसलिए वहाँ अल्लाह का अजाब बीमारी की सूरत में आया और सरकार को दोबारा मस्जिदें खुलवानी पड़ीं। उन्होंने कहा कि इसका असर अब हिंदुस्तान में भी दिखाई दे रहा है। इस अजाब से बचने के लिए हमें अल्लाह की इबादत करनी चाहिए। पाँच वक्त की नमाज पढ़ें और जो डॉक्टर बता रहे हैं, उन पर अमल करें।

जमीयत उलेमा हिंद मेरठ शाखा के अध्यक्ष और नायब शहर काजी ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए कहा है कि लोग पाँचों वक्त नमाज और कुरान पढ़ें। नमाज में अल्लाह से रो-रोकर दुआएँ और अपने गुनाहों की माफी माँगें। गरीब और बेसहारा लोगों की मदद करें। बयान में उन्होंने आगे कहा, “जब-जब दुनिया में लोग अल्लाह की नाफरमानी करते हैं, अल्लाह के बताए रास्ते पर नहीं चलते, नमाज, रोजा, कुरान से दूर जाते हैं, जुल्म-ज्यादती ज्यादा होती है, लोगों को सताया जाता है, छोटे-बड़ों का आदर खत्म हो जाता है और बेशर्मी बढ़ जाती है तो अल्लाह अपना असर दिखाते हैं। जैसे सूरज ग्रहण, चाँद ग्रहण, आँधी-तूफान, जलजले (भूकंप) और ऐसी बीमारियाँ फैलाता है जो लाइलाज हों। कोरोना वायरस भी इसी तरह के अजाबों में से एक है।”

काजी ने इस वायरस से बचने के भी कई उपाय बताते हुए कहा कि अपने घरों में लोबान, गंधक और आजवायन आदि की धूनी देकर इस अजाब से बचा जा सकता है। साथ ही बाहर से आने पर साबुन से हाथ-मुँह धोएँ। घबराने की जरूरत नहीं है।

आपको बता दें कि इससे पहले एक इस्लामी धर्मगुरु इलियास शराफुद्दीन ने कहा था कि उइगरों से क्रूरता करने के कारण अल्लाह ने चीन पर इस वायरस का कहर भरपाया है और उन्हें दंडित किया है। एक वायरल ऑडियो में धर्मगुरु को कहते सुना गया था कि याद करो कैसे उन्होंने मुस्लिमों को धमकी दी थी और दो करोड़ मुस्लिमों की जिंदगी बर्बाद करने की कोशिश की। मुस्लिमों को शराब पीने के लिए मजबूर किया गया, उनकी मस्जिदों को तोड़ दिया गया और उनकी पवित्र पुस्तकों को जला दिया गया। उन्होंने कहा था कि चीन ने सोचा कि कोई भी उन्हें चुनौती नहीं दे सकता, लेकिन अल्लाह सबसे शक्तिशाली है, अल्लाह ने चीन को सजा दी।

इराक मूल के ईरान में रहने वाले इस्लामिक नेता अयातुल्ला सैयद हादी-अल-मुदारिसी ने भी 28 फरवरी को MEMRI-TV पर दिए एक वीडियो संदेश में चीन पर निशाना साधते हुए कहा था कि- नि:संदेह अल्लाह ने चीन को ये सज़ा दी है, चीन के उन कारनामों के लिए, जिसमें वो मुस्लिम औऱ इस्लाम के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं। उन्होंने कहा था कि जाहिर सी बात है कि ये कोरोना वायरस चीन पर अल्लाह का अज़ाब है। बाद में मुदारिसी के भी इससे संक्रमित होने की खबरें सामने आई थी।

भूख हड़ताल, हिरासत के बाद दिग्विजय सिंह को डबल झटका: HC ने नहीं सुनी, बीजेपी EC पहुॅंची

मध्य प्रदेश में कमलनाथ के नेतृत्व में चल रही कॉन्ग्रेस सरकार भविष्य पर पैदा संकट की एक बड़ी वजह पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह बताए जाते हैं। कहा जा रहा है कि उनके ही इशारों पर कमलनाथ ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों की लगातार उपेक्षा कर रहे थे। इसके बाद राज्यसभा की उम्मीदवारी में दिग्विजय को तरजीह मिलता देख सिंधिया ने बीजेपी का दामन थाम लिया और उनके समर्थक विधायकों ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद से मध्य प्रदेश का सियासी ड्रामा थमने का नाम नहीं ले रहा। सुप्रीम कोर्ट तक यह मसला पहुॅंच चुका है।

गुरुवार को इस सियासी ड्रामे में सबसे पहले खबर आई कि दिग्विजय सिंह बागी विधायकों से मिलने की मॉंग को लेकर बेंगलुरु के एक होटल के बाहर भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं। इस होटल में वे बागी विधायक ठहरे हुए हैं जिनका इस्तीफा मध्य प्रदेश विधानसभा के स्पीकर स्वीकार नहीं कर रहे हैं। इन विधायकों के दावे के इतर कॉन्ग्रेस उन्हें बंधक बनाने का आरोप बीजेपी पर लगा रही है। दिग्विजय सिंह को धरने पर बैठने के बाद पुलिस ने हिरासत में ले लिया। इसके बाद दिग्विजय ने कहा कि अब वे थाने में भूख हड़ताल करेंगे।

फिर उन्होंने कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अपनी याचिका में उन्होंने बागी विधायकों से मिलने की अनुमति देने की अपील की थी। लेकिन, अदालत ने ऐसा कोई भी आदेश देने से इनकार करते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी। दूसरी ओर, उनके खिलाफ बीजेपी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखा है। पत्र में कहा गया है कि दिग्विजय सिंह राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवार हैं। बावजूद इसके अन्य नेताओं के साथ बेंगलुरु के एक होटल में जाकर उन्होंने उन्होंने 16 विधायकों पर अपने पक्ष में वोट डालने के लिए दबाव डालने की कोशिश की। यह चुनाव अचार संहिता का उल्लंघन है। पत्र में दिग्विजय सिंह के खिलाफ उचित कार्रवाई की मॉंग की गई है।

गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस के 22 विधायकों ने पिछले दिनों इस्तीफा दे दिया था। इनमें से 6 का इस्तीफा स्वीकार किया जा चुका है। अन्य के इस्तीफे स्पीकर ने अब तक स्वीकार नहीं किए हैं। राज्यपाल ने कमलनाथ सरकार को सोमवार को विधानसभा में बहुमत साबित करने को कहा था। लेकिन, स्पीकर ने कार्यवाही स्थगित कर दी थी। इसके खिलाफ बीजेपी के कई नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है। बुधवार को सुनवाई में शीर्ष अदालत ने स्पीकर से पूछा कि वे विधायकों के इस्तीफे पर कब तक फैसला लेंगे। स्पीकर ने गुरुवार को इसका जवाब देने की बात कही है।

दंगों में मारे गए हिन्दुओं के परिवारों की मदद करना भी पाप है क्या? कपिल मिश्रा से बौखलाया गुप्ता जी का ‘द प्रिंट’

कपिल मिश्रा निशाना हैं। कपिल मिश्रा तब से निशाना हैं, जब से उन्होंने दिल्ली में माहौल खराब करने वाले उपद्रवियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। शाहीन बाग़ में प्रदर्शन पर बैठे उपद्रवियों के कारण कई बड़ी सड़कों पर महीनों जाम का माहौल रहा, बच्चों और ऑफिस जाने-आने वालों को प्रतिदिन परेशानी हुई और स्थानीय लोगों का जीना मुश्किल हो गया। शाहीन बाग़ की तर्ज पर पूरी दिल्ली को बंधक बनाने की योजना थी लेकिन कपिल मिश्रा ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि इस तरह से लोगों को बंधक नहीं बनाया जा सकता और सड़कें खाली कराई जाएँ, वरना वो इसके विरोध में सड़क पर उतरेंगे।

सम्पूर्ण दिल्ली की मनोदशा बयाँ करने की सज़ा उन्हें बदनाम करने की कोशिशों के रूप में मिली। हालाँकि, दिल्ली में दंगे भड़कने उनके बयान से पहले ही शुरू हो गए थे लेकिन उन्हें जबरदस्ती ‘बलि का बकरा’ बनाने का प्रयास किया गया। ऑपइंडिया ने भी एक वीडियो के जरिए इसका पर्दाफाश किया कि किस तरह उनके बयान से पहले ही मजहबी दंगाई भीड़ द्वारा पत्थरबाजी और राह चलते लोगों की पिटाई शुरू कर दी गई थी। लेकिन, वामपंथी गैंग ने एक सुर में दंगों के लिए कपिल मिश्रा को बदनाम करना शुरू कर दिया।

भारत के टुकड़े करने की बात की शरजील इमाम ने। हिन्दुओं को धमकाया वारिस पठान ने। शाहीन बाग़ के हिन्दुत्वविरोधी प्रदर्शनों में भाषण दिया अमानतुल्लाह खान ने। दंगों में हिन्दुओं का कत्लेआम किया ताहिर हुसैन ने। लेकिन, दोषी कौन? कपिल मिश्रा। दंगाई भीड़ द्वारा मार डाले गए हिन्दुओं को छोड़ दिया गया। न तो कोई मीडिया वाला उनकी खोज-ख़बर लेने गया और न ही किसी ने ये चिंता जताई कि आखिर मृत हिन्दुओं के परिवारों का भरण-पोषण कैसे होगा? ऐसे समय में कपिल मिश्रा आगे आए और उन्होंने क्राउडफंडिंग की पहल कर के सभी पीड़ित परिवारों से मिलना-जुलना शुरू किया और उनकी मदद के लिए हाथ बढ़ाया।

कपिल मिश्रा भले ही हालिया दिल्ली विधानसभा चुनावों में हार गए हों लेकिन दंगों के बाद जनता की मदद करने के लिए जब दिल्ली सरकार का कोई मंत्री-विधायक नहीं पहुँचा तो कपिल मिश्रा ने ये बीड़ा उठाया। कुल 1 करोड़ रुपए जमा करने का लक्ष्य रखा गया था, जो पूरा हो चुका है। अब वो और डोनेशन नहीं लेंगे। इन रुपयों में से कई लोगों की मदद की गई है, औरों की की जा रही है। मिश्रा सोशल मीडिया के माध्यम से लगातार अपडेट कर रहे हैं कि इन रुपयों में से किसे कितना दिया जा रहा है। जनता के धन में से एक-एक पैसे का हिसाब उन्हें दिया जा रहा है।

कपिल मिश्रा के इस प्रयास से ‘द प्रिंट’ खफा हो गया है। शेखर गुप्ता के प्रोपेगंडा पोर्टल को इस बात से भी दिक्कत है कि एक-एक रुपया देने वाले लोगों के ट्वीट्स को भी कपिल मिश्रा रीट्वीट क्यों कर रहे हैं। उसने लिखा है कि ‘दंगे भड़काने के आरोपित’ कपिल मिश्रा क्राउडफंडिंग कर रहे हैं। अगर ऐसा है तो ताहिर हुसैन पुलिस कस्टडी में किस बात के लिए है? समाजसेवा के लिए? अंकित शर्मा की हत्या करने वाले कौन लोग थे? कॉन्सटेबल रतन लाल की हत्या किसने की? और हाँ, दिल्ली दंगा शुरू होने के समय हाथ में पिस्तौल लहराते हुए पुलिस पर गोलीबारी कर रहा शाहरुख़ कौन था? क्या इन सबको बचाने के लिए कपिल मिश्रा का नाम बार-बार दोहराया जा रहा है?

यहाँ सवाल ये है कि जब पूरा मीडिया हिन्दुओं के दुःख-दर्द को छिपाने में लगा हुआ है और दंगाइयों के कुकृत्यों को ढकने में प्रयासरत है, कोई एक व्यक्ति यदि पीड़ितों के हित के लिए उठ खड़ा हुआ है तो इन प्रोपेगंडा पोर्टलों को पच क्यों नहीं रहा? किसी कथित अल्पसंख्यक को एक झापड़ लगने वाले आरोप को किसी हिन्दू को सैकड़ों बार चाकू गोद कर मार डालने से तुलना करने वाले इन पोर्टलों की ये पुरानी आदत है। ‘द प्रिंट’ इस बात के लिए भी खफा है कि कपिल मिश्रा ने उसके पत्रकारों से बात क्यों नहीं की। मिश्रा ने उन्हें पहले ही लताड़ लगाते हुए बता दिया था कि वो फेक न्यूज़ और प्रोपेगंडा फैलाने वालों से बात नहीं करेंगे। उन्होंने कहा था:

“तुम्हारा न्यूज़ पोर्टल ‘द प्रिंट’ एक पक्षपाती फेक न्यूज़ फैक्ट्री है। बावजूद इसके कि तुमलोग मेरे ख़िलाफ़ लगातार एक घृणास्पद अभियान चला रहे हो, मुझे चारों ओर से भारी समर्थन मिल रहा है। ज़मीन पर तुम जहाँ भी लोगों से बात करोगे वहाँ से मेरे लिए समर्थन आएगा लेकिन ‘द प्रिंट’ जैसी फेक न्यूज़ फैक्ट्री को ये पसंद नहीं। मुझे ज़रूरत ही नहीं है कि अपना समर्थन साबित करने के लिए तुम्हारे पोर्टल में लेख प्रकाशित करवाऊँ। दिल्ली की जनता ने तुम्हारे प्रोपेगेंडा को नकार दिया है। तुम जाकर इस पर लेख लिखो कि मोहम्मद शाहरुख़ बचपन में कितना क्यूट था। तुम लिखो कि कैसे ‘बुरे हिन्दुओं’ ने ताहिर हुसैन को एक आतंकवादी बनने के लिए मजबूर कर दिया।”

ये पूरा गिरोह बार-बार हिन्दुओं को पीड़ित मानने की जगह ‘दोनों ही तरफ के लोग मरते हैं’ वाला राग अलाप रहा है। जबकि सत्य यह है कि मजहबी भीड़ ने दंगों की अच्छी-खासी तैयारी की थी। अगर कोई अपने समुदाय को ले कर कुछ करना चाहता है तो समस्या क्या है? क्या फंड जुटाना गुनाह है? क्योंकि पहले तो दंगे का पीड़ित ही इन्हें नहीं मान रहे थे, अब लाशें सामने हैं तो नए गीत रचे जा रहे हैं। पीड़ितों के लिए पैसा इकट्ठा करना अमानवीय और विभाजनकारी कैसे है? चूँकि चार चम्पुओं से बयान ले लिए गए कि ये अनैतिक है, मानवीय मूल्यों के खिलाफ है, भेदभाव करता है, उससे ये साबित नहीं हो जाता कि मरने वाले हिन्दू परिवारों को लोगों की हत्या नहीं हुई है। जिनके बच्चे मरे, जिनकी बेटियों को नग्न करके दुराचार किया गया, जिनकी शादी में सिलिंडरों को उड़ाने की योजना थी, जिनके बच्चों को छः कट्टरपंथियों ने दो-दो घंटे चाकू मारे… उन्हें अब आर्थिक मदद से भी महरूम किया जाएगा?

दिलबर नेगी का हाथ-पाँव काट कर उसी दुकान में लगाई आग में जिन्दा झोंक दिया गया, जिसमें वो काम करते थे। विवेक अपनी दुकान में बैठे थे, तभी वहाँ दंगाई भीड़ ने हमला किया और उनके सिर में ड्रिल कर डाला। दिनेश खटीक अपने बच्चों के लिए दूध लेने निकले थे, उन्हें गोली मार दी गई सिर में। इसी तरह आलोक तिवारी भोजन खा कर टहलने निकले, उन्हें मार डाला गया। उनके अंतिम संस्कार के लिए भी परिवार के पास रुपए नहीं थे। ताहिर हुसैन की ईमारत में जमा सैकड़ों गुंडों ने कई हिन्दुओं को मार डाला और कइयों के घरों को तबाह कर दिया। मंदिरों तक को नहीं बख्शा गया। क्या इन सबको मदद नहीं दी जानी चाहिए?

दिक्कत ये है कि पीड़ितों की मदद ‘द प्रिंट’ से इसीलिए देखी नहीं जा रही है क्योंकि इससे लोगों को पता चल रहा है कि कहाँ किस हिन्दू को किस तरह से दंगाई भीड़ ने मारा। इससे उस गुट के सभी मीडिया संस्थानों की पोल खुल रही है, जिन्होंने हिन्दुओं की मौतों को छिपाया क्योंकि इसके बाद उन्हें बताना पड़ता कि किसकी मौत कैसे हुई। फिर दंगाइयों की पहचान बतानी पड़ती, जो उनके प्रोपेगंडा में फिट नहीं बैठता। इसीलिए, आज कोई व्यक्ति पीड़ितों, मार डाले गए हिन्दुओं के परिवारों और बच्चों के लिए खड़ा हुआ है तो उनसे देखा नहीं जा रहा। कपिल मिश्रा भी इन पोर्टलों को भाव नहीं दे रहे। उनका कहना है- “ये जितनी गाली दे रहे हैं, उससे जनता उतनी ज्यादा जागरूक होकर डोनेट कर रही है।“

विधायकों के इस्तीफे पर फैसला कब? SC में गुरुवार को बताएँगे स्पीकर: कमलनाथ को फिर मोहलत

फ्लोर टेस्ट से बच रही मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार को एक और दिन की मोहलत मिल गई है। सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को इस संबंध में सुनवाई हुई। शीर्ष अदालत ने पूछा कि विधायकों के इस्तीफे पर स्पीकर कब तक फैसला लेंगे। स्पीकर के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने इसका जवाब देने के लिए गुरुवार तक का वक्त मॉंगा। सुप्रीम कोर्ट में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और 9 भाजपा विधायकों ने याचिका दायर कर रखी है। सोमवार को बिना फ्लोर टेस्ट कराए विधानसभा की कार्यवाही स्थगित किए जाने के बाद याचिका दायर की गई थी।

सुनवाई के दौरान कॉन्ग्रेस, भाजपा और राज्यपाल की ओर से कोर्ट में दलीलें पेश की गईं। कॉन्ग्रेस ने कहा कि बागी विधायकों का इस्तीफा भाजपा की साजिश है। इसकी जाँच होनी चाहिए। साथ ही कॉन्ग्रेस ने प्रदेश में सियासी संकट पैदा होने के पीछे भी भाजपा को जिम्मेदार बताया। कॉन्ग्रेस ने कहा कि बहुमत परीक्षण के लिए रातोंरात मुख्यमंत्री और स्पीकर को आदेश देना राज्यपाल का काम नहीं है। स्पीकर इस मामले में सबसे ऊपर हैं, राज्यपाल उन पर हावी हो रहे हैं। कॉन्ग्रेस ने विधायकों के इस्तीफे से खाली हुई सीटों पर उपचुनाव होने तक फ्लोर टेस्ट नहीं कराने की माँग की और कहा कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो आसमान नहीं फटेगा। वहीं भाजपा ने इसका विरोध किया।

सुनवाई के दौरान कॉन्ग्रेस के वकील की ओर से दलील दी गई है कि अभी दुनिया मानवता के सबसे बड़े संकट कोरोना से जूझ रही है, ऐसे में क्या इस वक्त बहुमत परीक्षण कराना जरूरी है? कॉन्ग्रेस की ओर से अदालत में बताया गया कि राज्यपाल सिर्फ मीडिया रिपोर्ट्स पर भरोसा कर रहे हैं और मान कर बैठे हैं कि कमलनाथ सरकार के पास बहुमत नहीं है। कॉन्ग्रेस के वकील ने अदालत से मामले की सुनवाई टालने के अपील करते हुए कहा कि ऐसा हुआ तो आसमान नहीं फट जाएगा। हमारी राज्य सरकार के पास बहुमत था, लेकिन विधायकों को किडनैप किया गया।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में फ्लोर टेस्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आज फैसला आने के आसार थे। मगर, कोर्ट ने विधानसभा स्पीकर से सवाल किया कि आखिर आपने विधायकों के इस्तीफे पर अभी तक फैसला क्यों नहीं लिया? क्या ये विधायक अपने आप अयोग्य नहीं हो जाएँगे? अगर आप संतुष्ट नहीं हैं, तो आप विधायकों के इस्तीफे को अस्वीकार कर सकते हैं। आपने 16 मार्च को बजट सत्र को टाल दिया? अगर आप बजट को पास नहीं करेंगे, तो राज्य सरकार का कामकाज कैसे चलेगा?

पीठ ने क्या कहा?

पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा- हम कैसे तय करें कि विधायकों के हलफनामे मर्जी से दिए गए या नहीं? यह संवैधानिक कोर्ट है। हम संविधान के दायरे में कर्तव्यों का निर्वहन करेंगे। टीवी पर कुछ देखकर तय नहीं कर सकते। 16 बागी विधायक फ्लोर टेस्ट में शामिल हों या नहीं, लेकिन उन्हें बंधक नहीं रखा जा सकता। अब साफ हो चुका है कि वे कोई एक रास्ता चुनेंगे। उन्होंने जो किया उसके लिए स्वतंत्र प्रक्रिया होनी चाहिए। इसके साथ ही अदालत ने वकीलों से सलाह माँगी कि कैसे विधानसभा में बेरोकटोक आने-जाने और किसी एक का चयन सुनिश्चित हो।

भाजपा का पक्ष

इसके बाद मुकुल रोहतगी की ओर से अदालत में कहा गया कि अगर अदालत चाहे तो वह 16 बागी विधायकों को जज के चैंबर में या रजिस्ट्रार के सामने पेश कर सकते हैं। हालाँकि, जज ने इसके लिए मना किया और कहा कि वो ऐसा आदेश जारी नहीं कर सकते। वहीं रोहतगी ने कहा आप विकल्प के तौर पर कर्नाटक हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को गुरुवार को विधायकों के पास भेजकर वीडियो रिकॉर्डिंग करा सकते हैं। कॉन्ग्रेस चाहती है कि विधायक भोपाल आएँ ताकि उन्हें प्रभावित कर खरीद-फरोख्त की जा सके। विधायक उनसे मिलना ही नहीं चाहते तो कॉन्ग्रेस क्यों इस पर जोर दे रही है।

इस मामले में शिवराज सिंह ने भी कहा कि विधायकों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बता दिया है कि वह अपनी इच्छा से बेंगलुरु में हैं और वे सबूत के तौर पर कोर्ट में सीडी पेश करने के लिए तैयार हैं। इस्तीफा देना उनका संवैधानिक अधिकार है, उन्होंने वैचारिक मतभेद के चलते इस्तीफे दिए। इन्हें मंजूर करना स्पीकर का कर्तव्य है। वह फैसले को लंबे वक्त तक लटका नहीं सकते हैं। क्या स्पीकर इसे लेकर सेलेक्टिव हो सकते हैं, कि कुछ पर फैसला लेंगे, कुछ इस्तीफे पर नहीं। जब विधायक भोपाल आकर कॉन्ग्रेस से मिलना ही नहीं चाहते तो हमे इसके लिए कैसे मज़बूर किया जा सकता है। कोर्ट स्पीकर को इस्तीफे स्वीकार करने के लिए निर्देश दे। हमारा भी मानना है कि सरकार बहुमत खो चुकी है। इसलिए तुरंत फ्लोर टेस्ट होना चाहिए।

सियायी हालात

बता दें मध्यप्रदेश में इस समय कमलनाथ सरकार के गिरने का संकट मंडरा रहा है। स्पीकर द्वारा 22 कॉन्ग्रेस विधायकों में से 6 विधायकों के इस्तीफे स्वीकार करने के बाद पार्टी के विधायकों की संख्या कम होकर 108 हो गई है। अभी 16 बाकी विधायकों के इस्तीफे स्वीकार होने बाकी है। यदि उनके इस्तीफे स्वीकार कर लिए जाते हैं तो पार्टी के विधायकों की संख्या 92 हो जाएगी। सदन में बीजेपी के विधायकों की संख्या 107 है।

रंजन गोगोई तो बहाना है, राम मंदिर निशाना है: पूर्व CJI को राज्यसभा भेजे जाने से खफा BBC ने रोया ‘सिद्धांतों’ का रोना

बीबीसी या उसे ‘बिग बीसी’ कह लीजिए। इस ब्रिटिश प्रोपेगंडा मीडिया संस्थान को आज भी लगता है कि भारत उसके आकाओं का गुलाम है। वो आज भी 1947 से पहले के ज़माने में जी रहा है, जब उसके ही देश के तथाकथित जज सफ़ेद बालों वाली विग लगा कर कोर्ट में बैठते थे कठघड़े में खड़े किसी निर्दोष और मासूम भारतीय की ओर इशारा कर के कहते थे- ‘हैंग हिम’। बीबीसी आज भी उसी मुद्रा में है और वो चाहता है कि भारत की न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका ठीक उसी तरह काम करे, जैसा वो चाहता है। उसका ताज़ा निशाना पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई हैं।

पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राज्यसभा सांसद के रूप में मनोनीत किया है। नियमानुसार राज्यसभा में 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नॉमिनेट किए जाते हैं और रंजन गोगोई को भी किया गया। कहानी शुरू होती है जनवरी 2018 से जब रंजन गोगोई सहित तब सुप्रीम कोर्ट के 4 सबसे वरिष्ठ जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मोदी सरकार पर गम्भीर आरोप लगाए थे। शेखर कपूर सरीखे पत्रकार उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में बढ़-चढ़ कर मौजूद रहे थे। उस घटना के बाद से गोगोई मीडिया के वर्ग विशेष के प्यारे बन गए थे। बीबीसी जैसे संस्थानों ने इसे बढ़-चढ़ कर चलाया था।

तो फिर रंजन गोगोई अचानक से गिरोह विशेष के दुश्मन कैसे बन गए? 2019 के चुनाव में राफेल मुद्दा हावी था और अपनी हर रैली में राहुल गाँधी आँकड़े बदल-बदल कर बताते थे कि घोटाला हुआ है। ‘द हिन्दू’ के नेतृत्व में बीबीसी जैसे संस्थानों ने प्रोपेगंडा पोर्टल्स के साथ मिल कर राफेल मामले में एक से बढ़ कर एक फिक्शन गढ़े। मुद्दा फ्लॉप हो गया और चुनाव में भाजपा की प्रचंड जीत के बाद इस पर बातें होनी भी बंद हो गईं। सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने सरकार को क्लीन चिट दी।

इसके बाद आया राम मंदिर मामला। दशकों से अटके इस मामले में तत्कालीन सीजेआई गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने फ़ास्ट-ट्रैक सुनवाई कर के निपटाया। बस, यही वो मौका था जब वो मीडिया के सबसे बड़े दुश्मन बन गए क्योंकि उन्होंने राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया। यहाँ सवाल उठता है कि अगर बीबीसी को दोष ही देना है तो सिर्फ़ रंजन गोगोई को ही क्यों? राफेल मामले में तो उनके साथ जस्टिस एसके कॉल और जस्टिस केएम जोसफ भी थे। केएम जोसफ भी उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल थे, जिसमें मोदी सरकार पर निशाना साधा गया था। फिर बीबीसी केवल गोगोई को ही क्यों निशाना बना रहा है?

राम मंदिर फैसले में भी जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अब्दुल नज़ीर शामिल थे। जस्टिस बोबडे फ़िलहाल देश के सीजेआई हैं। तो फिर रंजन गोगोई पर ही निशाना क्यों? क्या पहले किसी जज ने रिटायरमेंट के बाद कोई पद स्वीकारा ही नहीं है या फिर सब कुछ एकदम नया हो रहा है? या मोदी सरकार ने जस्टिस गोगोई को राज्यसभा भेज कर क़ानून और नियमों की अवहेलना की है। इन सभी चीजों की पड़ताल हम करेंगे लेकिन सबसे पहले जानते हैं कि आखिर बीबीसी ने लिखा क्या है?

‘बिग बीसी’ की खुन्नस: रंजन गोगोई पर साधा निशाना

बीबीसी लिखता है कि जजों से उम्मीद की जाती है कि वो कुछ ‘अलिखित सिद्धांतों’ का पालन करें। हालाँकि, अलिखित कहने से स्पष्ट है कि इसका कहीं कोई जिक्र संविधान में नहीं है लेकिन बीबीसी ने अपने हिसाब से जो भी सही मान लिया, वही सिद्धांत सब पर लागू होना चाहिए। बीबीसी यह याद कराना नहीं भूलता कि जिस ज़मीन पर पहले ‘बाबरी मस्जिद हुआ करती थी’, वहाँ राम मंदिर के निर्माण का फ़ैसला सुनाया गया। अगर वहाँ पहले बाबरी मस्जिद हुआ करती थी तो फिर उस बाबरी मस्जिद का निर्माण कब और कैसे हुआ था और उससे पहले वहाँ क्या हुआ करता था, इस पर बीबीसी ने चुप्पी साध रखी है। ये बताने से प्रोपेगंडा ध्वस्त हो जाएगा।

साथ ही बीबीसी लिखता है कि राफेल मामले में कोर्ट के निर्णय के बाद कई ‘ज़रूरी सवाल’ के जवाब नहीं मिले। किसने तय किया कि कौन सा सवाल ज़रूरी है? उन्हीं राहुल गाँधी ने, जिनके आँकड़े हर बार बदल जाते थे? सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट लम्बा-चौड़ा था और उसे बिना पढ़े अगर बीबीसी ऐसे दावे कर रहा तो उसका कुछ नहीं किया जा सकता। चीजें ‘मीडिया ट्रायल’ से नहीं चलती। जनता ने चुनावों में राफेल मुद्दे को नकार दिया, सुप्रीम कोर्ट ने विपक्ष को झटका दिया सो अलग। क्या अब बीबीसी जनता और न्यायपालिका से ऊपर जाकर ये तय करेगा कि कौन से सवाल ज़रूरी हैं और कौन से नहीं?

इसके अलावा रंजन गोगोई पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने सीजेआई रहते भाजपा के घोषणापत्र के आधार पर काम किया। असम में एनआरसी लागू किए जाने को इसके अगले उदाहरण के रूप में दिखाया गया है। एनआरसी वाला निर्णय जिस बेंच ने सुनाया, उसमें जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन भी शामिल थे। लेकिन, बीबीसी का निशाना सिर्फ़ रंजन गोगोई ही हैं। जस्टिस नरीमन 2011 में भारत के सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किए गए थे। तब केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए-2 की सरकार चल रही थी, जिसे रिमोट कंट्रोल से सोनिया गाँधी चला रही थी।

इसके बाद बीबीसी के लेख में जस्टिस (रंजन गोगोई) पर सीजेआई रहते लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों की बात की गई है। बता दें कि वर्तमान सीजेआई जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता में एक सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक समिति ने इस मामले की जाँच की थी और रंजन गोगोई को क्लीन-चिट दिया था। बीबीसी को इस जाँच पर भी भरोसा नहीं। यानी, सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले और जाँच पर कोई भरोसा नहीं और मोदी सरकार तो ग़लत है ही, ऐसा इनका सोचना है।

क्या पहले ऐसा नहीं हुआ? सब कुछ नया है?

ज्यादा पहले न जाएँ तो 1998 में जस्टिस रंगनाथ मिश्रा को कॉन्ग्रेस सरकार ने रिटायरमेंट के बाद ओडिशा से राज्यसभा भेजा था। वो 2004 तक राज्यसभा सांसद रहे थे और अपना कार्यकाल पूरा किया था। जस्टिस रंगनाथ मिश्रा के बारे में तो यहाँ तक कहा जाता रहा है कि उन्होंने 1984 सिख दंगा मामले में कॉन्ग्रेस को एक तरह से क्लीन-चिट दे दी थी। ऐसा इन दंगों पर पुस्तक लिखने वाले मिट्टा का ही मानना है। आज उस दंगे के कई आरोपित जेल में हैं, जिनका कॉन्ग्रेस से लंबा जुड़ाव रहा है।

इसी तरह बहरुल इस्लाम भी सुप्रीम कोर्ट के जज थे, जिन्होंने राज्यसभा की शोभा बढ़ाई थी। वे जब सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते थे, तब उन्हें 1962 में पहली बार असम से कॉन्ग्रेस पार्टी ने राज्यसभा भेजा। उसके बाद दूसरी बार 1968 में उन्हें राज्यसभा भेजा गया लेकिन इसके पहले कि वो 6 साल का अपना कार्यकाल पूरा कर पाते, उन्हें तब के असम और नागालैंड हाईकोर्ट (आज के गुवाहाटी हाईकोर्ट) का जज बनाया गया। जब वो रिटायर हुए, उसके बाद फिर से कॉन्ग्रेस ने उन्हें राज्यसभा भेजा। तो फिर अब रंजन गोगोई पर हंगामा क्यों?

वकीलों और जजों को रिटायरमेंट के बाद विभिन्न जाँच समितियों का अध्यक्ष बनाना, किसी आयोग वगैरह के अध्यक्ष का पद देना या सदस्य के रूप में शामिल करना या फिर किसी संवैधानिक संस्था में कोई पद देना- कोई आज की रीत नहीं है। मुद्दा ये है कि रंजन गोगोई पर सवाल उठाने वालों के पास कोई तर्क ही नहीं है, जिससे वो उनके मनोनयन को ग़लत ठहरा सकें। इसीलिए बीबीसी ‘अलिखित सिद्धांतों’ और दुनिया-जहाँ का रोना रो रहा है। गोगोई तो मनोनीत किए गए हैं, बहरुल इस्लाम और रंगनाथ मिश्रा तो कॉन्ग्रेस से राज्यसभा गए थे।

क्या गोगोई को मनोनीत करना संविधान की अवहेलना है?

संविधान के अनुच्छेद 80 के अनुसार, राज्यसभा का गठन 250 सदस्यों द्वारा होता है और इनमें से 12 सदस्यों के नाम राष्ट्रपति द्वारा निर्देशित किए जाते हैं। फ़िलहाल, राज्यसभा में 245 सदस्य हैं। ये 12 लोग कौन हो सकते हैं। साहित्य, विज्ञान, कला तथा समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव के आधार पर इन्हें मनोनीत किया जा सकता है। अब कोई मुर्ख ही होगा जो कहेगा कि रंजन गोगोई के पास कोई अनुभव नहीं है। उन्होंने ख़ुद कहा है कि वो राज्यसभा सांसद का पद इसीलिए स्वीकार कर रहे हैं क्योंकि वो संसद में जुडिशरी की आवाज़ बनना चाहते हैं, न्यापालिका की बातों को वहाँ उठाना चाहते हैं।

तो फिर हंगामा क्यों? दरअसल, हंगामे का कारण है राफेल के मुद्दे पर मोदी सरकार को न घेर पाना और राम मंदिर मामले का निपटारा एकदम शांति से हो जाना। हमेशा ख़ून-खराबे की उम्मीद लेकर बैठे ये मीडिया संस्थान इसीलिए भी नाराज़ हैं क्योंकि तीन तलाक़ और अनुच्छेद 370 जैसे निर्णय शांतिपूर्वक सम्पन्न हुए और उन पर अमल भी हुआ। सीएए के बहाने खड़े हुए आंदोलन ने हिन्दू-विरोधी दंगों का रूप लिया और ये फिर से ये बेनकाब हुए। कोरोना वायरस पर सरकार की तैयारियों से ये पहले ही हैरान हैं। ऐसे में मुद्दों के अभाव से जूझ रहे ये मीडिया संस्थान अभी और कितना गिरते हैं, ये देखने वाली बात होगी।

भीम-मीम का नया शिगूफा: जो विशेष मजहब खुद को हिंदुस्तानी नहीं मानते वे आंबेडकरवादी क्या बनेंगे

देश में सीएए लागू हुआ ही था कि देश के अलग-अलग हिस्सों से इसके विरोध के नाम की खबरें आने लगीं। कहीं विरोध को शांति पूर्वक रखा गया तो कहीं इसे हिंसा का रूप दे दिया गया, तो कहीं सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया गया, तो कहीं इसी विरोध के नाम पर हिंदुओं को निशाना बनाया गया। जैसे कि, दिल्ली में सीएए विरोध के नाम पर हुई हिंदू विरोधी हिंसा।

इसे लेकर केंद्रीय मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री और खुद गृहमंत्री अमित शाह ने अपना बयान दिया और कहा कि सीएए देश के किसी भी व्यक्ति की नागरिकता लेता नहीं बल्कि यह नागरिकता देने वाला कानून है। इसके बाद भी आज तक कोई भी प्रदर्शनकारी यह नहीं बता सका कि हम इसका विरोध क्यों कर रहे हैं। अगर आप भी जानना चाहते हैं कि ये लोग विरोध क्यों कर रहे हैं तो आज आप भी जान लीजिए।

बीते दिन क्विटं हिंदी ने अपने पोर्टल पर एक खबर अपलोड की, जिसमें सीएए विरोध करने के चौंका देने वाले सभी कारण आपको मिल जाएँगे और देश को तोड़ने वाली योजनाओं के बारे में भी आपको जानकारी हो जाएगी। लेख में लेखने शाहीन बाग से अपना विचार देने की शुरूआत करते हैं और कहते हैं कि सीएए के खिलाफ शाहीन बाग में जारी धरना लोगों के लिए एक मिशाल बन गया है, जिसमें मुस्लिमों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।

आगे लेखक ने लिखा, “तीन तलाक और राम मंदिर के मुद्दे से मुस्लिम समाज बेहद आहत था, लेकिन उसने प्रतिरोध नहीं किया और फिर उन्हें (मुस्लिमों को) CAA-NRC के मुद्दे पर लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर कर दिया कि वह अपने अस्तित्व की लडाई लड़ें।” अब आपको जानकार हैरानी होगी कि यह लेखक कोई मुस्लिम नहीं बल्कि डॉ उदित राज, पूर्व लोकसभा सांसद और कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैंस जिन्होंने अपने लेख में हिंदुओं और हिदुत्व के खिलाफ जमकर जहर उगला और इसे हवा दी उस पोर्टल क्विंट हिंदी ने जो एक प्रोपेगेंडा के तहत खबरें चलाता है।

सवाल खड़ा होता है जो कानून संसद से पास होकर देश में लागू हुआ हो उसी कानून के खिलाफ वह पूर्व सांसद लोगों को भड़काने में लगे हुए हैं, जिसे जानकारी है कि यह कानून भी संदिवधान के तहत संसद से पास हुआ, लेकिन उनके इस लेख ने उनके चेहरे से नकाब हटा दिया और पूरे लेख में जय भीम जय मीम का राग अलापते रहे। लेखक ने आगे लिखा कि पहली बार ऐसा हुआ कि सीएए विरोध के दौरान अल्पसंख्यक और बुद्धिजीवी समाज में डॉ अम्बेडकर को अपनाया गया। दोनों की दोस्ती जमीन पर पैदा हुई और इसके बड़े राजनैतिक और सामाजिक परिणाम अवश्य होने वाले हैं। लेखक यहीं नहीं रुके और गँभीर परिणाम की ओर इशारा करते हुए लिखा, “CAA-NRC के विध्वंसक परिणाम तो होंगे ही, लेकिन इस सबसे बीच एक अच्छी बात यह हुई है कि मुस्लिम समाज पहली बार अपने लिए इतने दमखम से मैदान में उतरा है। अब जब वह मैदान में उतरा है, तभी तो अपने सही दोस्त और दुश्मन कि पहचान कर पायेगा।”

लेखक उदित राज का आगे दुख भी झलका और लिखा, “दलित-मुस्लिम एकता का प्रयास तो कई बार हुआ लेकिन बात आगे नहीं बढ़ सकी। एकजुटता की पहल अक्सर दलितों की तरफ से होती रही है। मुस्लिम समाज को सब्र से काम लेना होगा क्योंकि वो कभी दलित उत्पीड़न या उसकी लड़ाई में साथ नहीं आए।” वहीं लेख यह लिखना भूल गए कि जो मुस्लिम कभी अपने को भारतीय तक नहीं मानता तो आखिर वही मुस्लिम दलितों के साथ या आंबेडकरवादी कैसे हो सकता है।

खैर, आगे उदित ने एक बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि मुस्लिमों के बाद अगर CAA-NRC के खिलाफ आन्दोलन में कोई समाज सबसे बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी कर रहा है तो वो दलित समाज ही है। उसका कारण भी है, क्योंकि दलित समाज का मानना है कि बीजेपी-संघ मिलकर देश के संविधान को नष्ट करना चाहते हैं। इसके बाद उदित ने खुद को मुस्लिम हितैशी साबित करते हुए कुछ आँसू अपनी हथेली पर गिराए और लिखा, “बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान से प्रताड़ित मुस्लिम भारत में नागरिकता नहीं ले सकते। बाकी शेष अन्य धर्म के लोगों के लिए भारतीय नागरिकता का दरवाजा खुला है। इससे दलित समाज भावुक रूप से आहत हुआ।”

आगे राज ने अपने लेख में यह तो बता दिया कि बाबा साहब डॉ अम्बेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को लाखों लोगों के साथ हिन्दू धर्म छोड़कर के बौध धर्म अपनाया था, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि उन्होंने(बाबा साहब ने) इस्लाम को क्यों स्वीकार नहीं किया। जिसे आज आप जबरन अपने गले लगाना चाहते हैं। इतना ही नहीं बाबा साहब ने यूँ ही नहीं लिखा था मुस्लिमों के लिए, “वतन के बदले क़ुरान के प्रति वफादार हैं मुस्लिम। वो कभी हिन्दुओं को स्वजन नहीं मानेंगे।” वहीं उदित राज ने लेख के अंत में यहाँ तक लिख दिया कि मुस्लिमों के साथ दलितों की भी लड़ाई हिंदुत्व के खिलाफ है।