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वो इस्लामिक देश जो पहले दे रहा था धमकी, अब कोरोना पर भारत से माँग रहा मदद की भीख

दिल्ली में हुए दंगों पर भारत सरकार एवं हिंदुओं के ख़िलाफ़ बयान देने वाला इस्लामिक देश ईरान इन दिनों कोरोना वायरस से लड़ने के लिए भारत से मदद की गुहार लगा रहा है। ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखकर कोरोना से बदहाल हुए अपने देश के हालातों की जानकारी दी है। साथ ही अपने पत्र में जोर देकर कहा कि कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई के लिए संयुक्त अंतरराष्ट्रीय उपायों की आवश्यकता है। उन्होंने पत्र में इस महामारी से निपटने के लिए ठोस रणनीति बनाने पर जोर दिया।

बता दें, ईरान पश्चिम एशिया में कोरोना वायरस का केंद्र बना हुआ है। वहाँ इस वायरस से संक्रमित 12, 700 मामले सामने आए हैं। धीरे-धीरे ये आंकडा 13,000 की ओर बढ़ रहा है। इस समय ईरान की हालत इतनी गंभीर है कि वहाँ के बड़े नेताओं को भी कोरोना पॉजिटिव पाया गया है। इनमें वहाँ के सर्वोच्च धार्मिक नेता खोमैनी के सलाहकार भी शामिल हैं।

ऐसे में ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर स्पष्ट तौर पर मदद माँगी है और कहा है कि उसे अमेरिकी प्रतिबंधों में ढील दिलवाई जाए। इस आवश्यकता की अनिवार्यता हेतु रूहानी ने कोविड-19 के खतरे के बीच अमेरिका द्वारा लगाए प्रतिबंध को अमानवीय कहा है।

रूहानी ने मदद का यह पत्र और भी कुछ वैश्विक नेताओं को लिखा है और कहा है कि ईरान को कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई के लिए संयुक्त अंतरराष्ट्रीय उपायों की आवश्यकता है।

ईरान के विदेश मंत्री जावेद जरीफ ने भी रविवार को बताया कि राष्ट्रपति हसन रूहानी ने दुनिया भर के अपने समकक्षों को एक ख़त लिखकर बताया है कि ईरान ने कैसे कोरोना से लड़ने का काम किया है। हालाँकि, अमेरिका के लगाए आर्थिक प्रतिबंध इन अभियानों की राह में लगातार रोड़ा बन रहे है। ये अमानवीय है कि किसी की धौंस के चलते निर्दोष लोगों की जान जा रही है। ये वायरस राजनीति और भूगोल नहीं समझता है, और ऐसे वक़्त पर हमें भी ये सब नहीं देखना चाहिए। इसके अलावा एक अन्य ट्वीट में जारिफ ने दवाई की कमियों और संसाधनों की कमियों को उजागर किया है, जिनका सामना इस समय ईरान को करना पड़ रहा है।

ईरानी मीडिया में आई खबरों के मुताबिक, ईरानी राष्ट्रपति ने विश्व नेताओं को लिखे अपने पत्र में कहा है कि उनके देश ने दो साल के व्यापक और अवैध प्रतिबंधों से उत्पन्न गंभीर बाधाओं और प्रतिबंधों का सामना किया है। इसके बावजूद अमेरिका कोरोना वायरस का प्रकोप शुरू होने के बाद भी ईरान पर दबाव बनाने से बाज नहीं आ रहा। अमेरिका के विदेश मंत्री ने ‘बेशर्मी’ से देशों से आग्रह किया कि वे तेहरान को मानवीय सहायता तभी भेजें जब वॉशिंगटन की ‘नासमझ और अमानवीय’ माँगें पूरी हो।

संयुक्त राष्ट्र में ईरान के दूत ने भी प्रतिबंधों को हटाने के लिए अमेरिका को फोन किया और कोरोना वायरस प्रकोप से संबंधित प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए इस मामले को राजनीति से परे रखने का आग्रह किया। संयुक्त राष्ट्र में ईरानी दूत माजिद तख्त रवांची ने एक ट्वीट में लिखा है कि ऐसी दर्दनाक परिस्थिति में अमेरिका को राजनीति से ऊपर उठकर प्रतिबंधों में ढील देनी चाहिए और मानवीय प्रयासों को आगे बढ़ाना चाहिए।

इन सबके बीच आपको बता दें कि ईरान में कोरोना वायरस के खौफ में जी रहे 234 भारतीयों को मोदी सरकार वापस स्वदेश लौटा लाने में कामयाब रही है। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बताया है कि इन भारतीयों में 131 स्टूडेंट और 103 श्रद्धालु शामिल हैं, जो ईरान में फँसे हुए थे। जिनकी वापसी के बाद भारतीय विदेश मंत्री ने इसके लिए ईरान के अधिकारियों को धन्यवाद भी दिया है।

दिल्ली में 50 से ज्यादा लोगों के एकत्र होने पर रोक, शाहीन बाग पर भी होगा लागू ये फैसला: केजरीवाल

कोरोना वायरस से निपटने के लिए दिल्ली सरकार ने सोमवार (मार्च 16, 2020) टास्क फोर्स की बैठक की। इस बैठक के बाद उन्होंने बताया कि अब जिम, नाइट क्लब, स्पा को भी 31 मार्च तक बंद करने के आदेश दिए गए हैं। सभी तरह की सभाएँ जिसमें 50 से ज्यादा लोग शामिल होंगे, उनकी मंजूरी नहीं दी जाएगी। शादी को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। उन्होंने कहा कि शादियों के लिए भी हम अनुरोध करते हैं कि अगर उन्हें स्थगित किया जा सकता है तो कृपया ऐसा करें। अगर बहुत जरूरी हो तो ही शादी करें, वरना तारीख आगे बढ़ा दें।

शाहीन बाग के सवाल पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि कोरोना के कारण 50 से ज्यादा लोगों के इक्ट्ठा होने का आदेश शाहीन बाग पर भी लागू होगा। हम 50 लोगों से अधिक के किसी भी कार्यक्रम की इजाजत नहीं देंगे, चाहे प्रोटेस्ट हो या कुछ और। यह नियम सभी जगह पर लागू होगा। उपजिलाधिकारी के पास कार्रवाई का पॉवर है। वह पुलिस के साथ जाकर कार्रवाई करें। वैसे सरकार इस पर नजर रख रही है। बता दें कि नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और एनआरसी के खिलाफ 16 दिसंबर से दिल्ली के शाहीन बाग में प्रदर्शनकारी बैठे हैं।

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली में अब तक कोरोना के सात केस सामने आए हैं, जिनमें से एक की मौत हो गई है। दो लोग ठीक होकर घर जा चुके हैं। चार लोगों का इलाज चल रहा है और जल्द ही वह सही होकर घर चले जाएँगे। मरीजों को जहाँ-जहाँ आइसोलेट करने की जरूरत है, हम वहाँ कर रहे हैं। साथ ही उन लोगों पर नजर बनाए हुए हैं, जिन्हें घर में ही आइसोलेशन में रखा गया है।

इसके अलावा कोरोना से निपटने के लिए पूरी दिल्ली में हाथ धोने के लिए डिस्पेंसिंग मशीन लगाई जाएगी। सभी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट और एसडीएम अपने इलाकों में 100 डिस्पेंसिंग मशीन लगाएँगे। नगर निगम के डिप्टी कमिश्नर अपने इलाकों में 300 डिस्पेंसिंग मशीन लगाएँगे। मार्केट, बस डिपो, बस स्टैंड, ऑटो स्टैंड और हर भीड़-भाड़ वाली जगह पर हाथ धोने के लिए डिस्पेंसर लगाए जाएँगे। सार्वजनिक स्थल पर हैंड सैनिटाइजर रखे जाएँगे।

केजरीवाल ने कहा कि किसी भी धार्मिक, सांस्कृतिक, प्रदर्शन में 50 से ज्यादा लोग एकत्र नहीं हो सकते। नियम तोड़ने पर एसडीएम और डीएम उचित एक्शन ले सकते हैं। केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली में 31 मार्च तक 50 से अधिक लोगों वाले धार्मिक, सामाजिक सांस्कृतिक कार्यक्रम, राजनीतिक बैठक नहीं होंगी। प्रेस कॉन्फ्रेंस में केजरीवाल ने जनता से तीन चीजों का पालन करने को कहा। उन्होंने कहा कि हाथ मिलाना बंद कर दें। दूसरा हाथों को बार-बार धोते रहें। तीसरा अपने हाथों को आँख, नाक, मुँह पर टच न करें।

बता दें कि दिल्ली में स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी, थियेटर समेत कई चीजें पहले से बंद हैं। लेकिन, मॉल्स फिलहाल खुले हए हैं। मॉल्स के बंद किए जाने के सवाल पर केजरीवाल ने कहा कि अगर इसे भी बंद करने की जरूरत पड़ी तो करेंगे और यह एक दो दिन में हो सकता है।

India Fights Corona: PM मोदी ने जानें लोगों के विचार, कहा- इससे निपटने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेंगे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोरोना वायरस के खतरे से निपटने को गंभीर नज़र आ रहे हैं। न सिर्फ़ वो जनता को सावधानी व बचाव के उपायों से अवगत करा रहे हैं बल्कि उनकी सरकार भी विभिन्न माध्यमों से इस खतनाक वायरस के प्रसार को रोकने में जुटी है। ख़ुद मोदी दक्षिण एशियाई देशों सहित अन्य राष्ट्रों के साथ तालमेल बिठा कर काम करने में लगे हुए हैं। इसी क्रम में उन्होंने सोशल मीडिया पर बताया कि भारत किस तरह कोरोना से लड़ रहा है। उन्होंने कहा कि लोगों जिस तरह से अपने अनुभव शेयर कर रहे हैं, उससे डॉक्टरों, नर्सों, कर्मचारियों और एयरपोर्ट स्टाफों को अपना काम करने के लिए और प्रोत्साहन मिलेगा।

अंशु नामक ट्विटर यूजर ने बताया कि उन्होंने अपनी सारी बैठकें रद्द कर दी हैं और बिजनेस के सिलसिले में यात्रा करना भी बंद कर दिया है। पीएम मोदी ने इसे बुद्धिमता भरा निर्णय बताया। उन्होंने कहा कि भीड़भाड़ से जितना बच कर रहें, उतना अच्छा है।

सिंगापुर से लौटे हेमंत राठी ने बताया कि उनके घर पर मेडिकल अधिकारियों ने आकर उनका चेकअप किया। उन्होंने बताया कि माइग्रेशन के दौरान भरे जाने वाले फॉर्म्स को ही विदेश से लौटने वालों की पहचान और मेडिकल चेकअप के लिए प्रयोग किया जा रहा है। पीएम मोदी ने उनका जवाब देते हुए लिखा कि लोगों को स्वस्थ रखने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है, विभिन्न अधिकारी लगातार इस काम में लगे हुए हैं ताकि COVID-19 न फैले।

पत्रकार कुषाण मित्रा ने बताया कि उनके एक मित्र शताब्दी एक्सप्रेस से यात्रा कर रहे थे। उन्हें तुरंत अधिकारियों का मैसेज आया कि वो जल्द से जल्द अपना मेडिकल चेकअप कराएँ। पीएम मोदी ने इस ट्वीट के जवाब में एक जिम्मेदार नागरिक के कर्तव्यों को उल्लेखित करते हुए आशा जताई कि कोई भी ऐसा कोई कार्य नहीं करेगा, जिससे दूसरे लोगों की जान संकट में पड़े। इसी तरह पालकी शर्मा ने अपने कुछ दोस्तों के अनुभव शेयर किए, जिन्होंने बताया था कि कोरोना वायरस से निपटने के लिए भारत में काफ़ी तैयारी है और सरकार लगातार प्रयास कर रही है।

आरके मिश्रा ने बताया कि किस तरह से न्यू जर्सी से दिल्ली लौटे एक व्यक्ति ने देखा कि वहाँ एयरपोर्ट पर जाँच की पूरी सुविधा थी और ऐरोप्लेन के दरवाजे पर ही सारे यात्रियों का सिलसिलेवार तरीके से चेकअप किया जा रहा था। इस ट्वीट का जवाब देते हुए पीएम मोदी ने लिखा कि उनकी सरकार लगातार प्रयासरत है कि सभी स्वस्थ रहें और जिनमें जरा भी इस वायरस के लक्षण दिखें, उनका तुरंत इलाज हो। इसी तरह श्रीलंका से लौटे संदीप नेगी ने बताया कि एयरपोर्ट के कोने-कोने पर सैनिटाइजर रखा हुआ है और स्क्रीनिंग के लिए पूरी व्यवस्था है। पीएम मोदी ने कहा कि सबके साझा प्रयासों से ये सब संभव हो पाया है।

इसी तरह पीएम मोदी ने लोगों के अनुभवों को जाना और अपनी राय रखी। उनका प्रमुख रूप से ये कहना था कि डॉक्टर, नर्स, सरकारी कर्मचारी और एयरपोर्ट स्टाफ मिल कर कोरोना वायरस से लड़ने और बचाव के लिए प्रयास कर रहे हैं, उसमें जनता का सहयोग भी होना चाहिए और पब्लिक को अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए, ताकि दूसरो की जान पर संकट न आए। पीएम मोदी ने सार्क देशों के प्रमुखों के साथ बैठक कर के भी एक-दूसरे के विचार साझा किए थे।

हरिद्वार में गंगा स्नान कर बोले पाक हिंदू श्रद्धालु: हम वापस नहीं जाएँगे, उस देश में होता है क्रूर उत्पीड़न, बेटियों का धर्मांतरण

पिछले सप्ताह पाकिस्तान से आए 56 हिंदू तीर्थयात्रियों का एक समूह अब वापस अपने देश नहीं जाना चाहता है। इन तीर्थयात्रियों का कहना है कि वे भारत सरकार से अनुरोध करेंगे कि वे उनके वीजा की अवधि एक महीने के लिए बढ़ा दें और नागरिकता संशोधन कानून, 2019 के तहत उन्हें नागरिकता प्रदान करें। पाकिस्तान से लगभग एक माह के लिए यात्रा वीजा पर आए 56 हिन्दू श्रद्धालुओं के जत्थे ने शनिवार को हरिद्वार में गंगा स्नान किया। इसके बाद पाकिस्तान के श्रद्धालु अहमदाबाद के लिए निकल गए।

कराची के बाडेन क्षेत्र के एक तीर्थयात्री नारायण दास ने इस बाबत बात करते हुए कहा, “हम वापस जाने की स्थिति में नहीं हैं। पाकिस्तानी अधिकारियों ने हमें पर्याप्त धन लाने की अनुमति नहीं दी क्योंकि वे सोचते हैं कि हम वापस नहीं जाएँगे। हम उस देश में क्रूर उत्पीड़न का सामना करते हैं। हमसे सब कुछ छीन लिया गया। हमने भारत सरकार से हमें आश्रय देने की गुहार लगाई है।”

जानकारी के मुताबिक समूह के लोगों की दयनीय हालत देख स्थानीय नेता और लोगों ने आपस में रुपए, कपड़े और अन्य आवश्यक वस्तुएँ एकत्र कर उन्हें दिया, ताकि वो अहमदाबाद की यात्रा कर सकें। उन्होंने समूह के अहमदाबाद जाने के लिए बस और खाने की व्यवस्था भी की। पाकिस्तान की एक अन्य तीर्थयात्री हीरा बाई ने कहा, “हमारे परिवार के सदस्यों को मार दिया गया है, बेटियों का धार्मिक रुपांतरण करा दिया और संपत्तियाँ छीन ली गई है। वहाँ पर जिंदगी मौत से भी बदतर है। हमें भारत सरकार द्वारा बनाए गए नए कानून के तहत कुछ उम्मीद है।”

हालाँकि, राज्य सरकार के अधिकारियों ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, लेकिन नाम न छापने की शर्त पर कहा कि वे स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। राज्य के गृह विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि एक बार आवेदन दाखिल हो जाने के बाद ही राज्य सरकार कुछ कर सकती है।

इससे पहले इस साल जनवरी में, राज्य सरकार ने पाकिस्तान से कुल 200 हिंदू शरणार्थियों की पहचान की है, जिन्हें नव पारित नागरिकता संशोधन कानून के तहत नागरिकता दी जाएगी। इनमें से ज्यादातर हरिद्वार, देहरादून और उधमसिंह नगर जिलों में रहते हैं। ये लोग जीवित रहने के लिए कठिन से कठिन जॉब करते हैं और कुछ तो भीख माँग कर गुजारा करते हैं। इन्हें उम्मीद है कि वे इस देश के नागरिक बन जाएँगे और इससे उन्हें सम्मान की जिंदगी जीने में मदद मिलेगी। वे नौकरियों के लिए आवेदन कर सकते हैं और अपना खुद का व्यवसाय शुरू कर सकते हैं।

गौरतलब है कि सोमवार (दिसंबर 9, 2019) को लोकसभा में नागरिकता संशोधन बिल पास होने के बाद पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों में खुशी की लहर दौड़ गई थी। दिल्ली में बसे पाकिस्तान से आए हिन्दू शरणार्थियों ने जमकर जश्न मनाया था। इन लोगों ने पीएम नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह जिंदाबाद के नारे, ‘जय श्री राम’ के नारे भी लगाए थे।

वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध कर रही विपक्षी पार्टियों को स्पष्ट सन्देश देते हुए कहा था कि सरकार इस पर पीछे नहीं हटेगी। शाह ने कहा था कि चाहे कॉन्ग्रेस व अन्य सीएए विरोधी पार्टियाँ कितना भी विरोध प्रदर्शन कर लें, पाकिस्तान से आए एक-एक शरणार्थी को नागरिकता दिए बिना भाजपा सरकार चुप नहीं बैठेगी। उन्होंने कहा कि भारत पर यहाँ के लोगों का उतना ही हक़ है, जितना पाकिस्तान से प्रताड़ना झेल कर आए शरणार्थियों का।

पाकिस्तान से आए हिंदूओं में से कुछ ने वहाँ हो रही ज्यादतियों के बारे में बात करते हुए कहा कि ‘चाहे जान ले लो, मगर वापस जाने के लिए न कहो।’ पाकिस्तान से आए लोगों का कहना था, “वहाँ बच्चियों को सरेआम उठाकर ले जाने की धमकियाँ मिलती रहती हैं। अब हम वापस पाकिस्तान नहीं लौटना चाहते।” एक लड़की ने कहा है कि अब हम अपने देश में आ गए हैं। एक पाकिस्तानी हिंदू महिला ने कहा था, “हम पाकिस्तान में सुरक्षित नहीं महसूस करते। हमारी लड़कियों को हमेशा डर लगा रहता है कि कोई कट्टरपंथी उनका अपहरण कर लेगा। पुलिस मूक दर्शक बनी देखती रहती है। हमारी लड़कियाँ पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में आजादी से चल भी नहीं सकती हैं।”

दुबई से लौटे 11 संदिग्ध मरीज, चकमा देकर अस्पताल से फरार: 1 की रिपोर्ट +VE, अस्पताल लौटना बेहद जरूरी

भारत में कोरोना वायरस के मरीजों की संख्या का आँकड़ा 109 पहुँच गया है। सबसे ज्यादा 32 मामले महाराष्ट्र से हैं। और इसी बीच ताजा जानकारी आई है कि महाराष्ट्र में 11 संदिग्ध मरीज अस्पताल से भाग गए हैं। टाइम्स नॉऊ की खबर के अनुसार अस्पताल से भागे इन संदिग्धों का दुबई यात्रा का इतिहास है। इन्हें हॉस्पिटल के आइसोलेशन वार्ड में रखा गया था। इनकी जाँच हो चुकी थी, मगर रिपोर्ट आनी बाकी थी।

जानकारी के अनुसार, ये लोग दुबई क्रिकेट खेलने गए थे। इन्हें भारत लौटने के 2 घंटे बाद आइसोलेशन रूम में भेज दिया गया था। लेकिन ये लोग सुरक्षाकर्मियों को चकमा देकर मौके से फरार हो गए। इसके बाद नवी मुंबई म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन और स्थानीय पुलिस एक्शन में आई और इन्हें ढूँढने के लिए तलाशी अभियान शुरू हुआ।

यहाँ बता दें कि इन 11 लोगों में एक की रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई है और चूँकि पूरी टीम उसके साथ थी, तो उनकी भी रिपोर्ट पॉजिटिव आने के आसार हैं। इसलिए इन लोगों को वापस अस्पताल लौटना बेहद जरूरी है।

गौरतलब है कि ये पहला मामला नहीं है जब कोरोना सस्पेक्टेड द्वारा इस प्रकार का लापरवाही वाला रवैया दिखाया गया हो। इससे पहले नागपुर में भी मामला सामने आया था। वहाँ कुछ संदिग्धों को आइसोलेशन वार्ड में रखा गया था। बाद में 5 में से 3 संदिग्ध वापस आ गए थे। उस समय कहा गया था कि पुलिस बाहर तैनात रहेगी। इसके अलावा बिहार के दरभंगा से भी ऐसा मामला सामने आया था। जहाँ संदिग्ध मरीज अस्पताल से भाग गया था।

वहीं कर्नाटक में भी दुबई से लौटे 4 मुस्लिम लोगों ने स्वास्थ्य अधिकारियों को धमकाया था और कोरोना वायरस का टेस्ट करवाने से मना कर दिया था। इन चारों युवकों ने इस मनाही के पीछे इस्लाम को वजह बताया था और कहा था कि इस्लाम उन्हें मेडिकल टेस्ट करवाने की इजाजत नहीं देता।

‘हमें कोरोना नहीं होगा, मोदी को होगा, हमारे साथ अल्लाह है’ – जामिया प्रदर्शन पर बैठी बुजुर्ग महिला

‘इस्लाम इजाजत नहीं देता’: दुबई से लौटे 4 युवकों का कोरोना टेस्ट से इनकार, कर्नाटक में ही हुई थी पहली मौत

भारतीय मुस्लिमों के पूर्वज हिन्दू ही थे: अंत समय में नेहरू ने बयाँ की थी ‘सच्चाई’

देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की अक्सर आलोचना होती रही है कि उन्होंने जम्मू कश्मीर के मुद्दे को अटका दिया, पाकिस्तान व चीन पर ढुलमुल रवैया अपनाया, सावरकर-राजर्षि-बोस जैसे बड़े स्वतंत्रता सेनानियों से उनकी नहीं पटी और सत्ता के लिए उन्होंने हर तिकड़म आजमाई। हालाँकि, नेहरू ख़ुद कई बार सही बात बोल जाते थे, जिन्हें आज न सिर्फ़ उनके अनुयायियों बल्कि कॉन्ग्रेस के लोगों को भी जानना चाहिए। ये जवाहरलाल नेहरू का अंतिम इंटरव्यू था। हो सकता है उस समय तक उन्हें चीजें समझ आ गई हों लेकिन उनके पास उन्हें ठीक करने का समय न रहा हो।

ये इंटरव्यू मई 1964 का है। इसी महीने की 27 तारीख को वो चल बसे थे। ऐसे में उनकी कुछ अंतिम वाक्यों की ओर आपका ध्यान दिलाना आवश्यक है। उन इंटरव्यू में हिन्दुओं के बारे में तत्कालीन पीएम नेहरू ने स्वीकार किया था कि ये एक धर्मान्तरण करने वाली प्रजाति नहीं है। नेहरू ने कहा था कि हिन्दू समाज में धर्मान्तरण का कॉन्सेप्ट नहीं रहा है। उन्होंने माना था कि हिन्दुओं को धर्मान्तरण से कोई मतलब नहीं था लेकिन ‘दूसरे पक्ष’ को था। मुस्लिमों के बारे में हमारे प्रथम प्रधानमंत्री ने कहा था कि वो धर्मान्तरण कराने या किसी का धर्म बदलवाने के हमेशा से इच्छुक रहे थे।

एक और बात की चर्चा होती रही है कि क्या भारत में जितने भी मुस्लिम हैं, वो सब बाहर अरब से आए हैं? अधिकांश ऐसा ही दावा करते हैं। जबकि सच्चाई ये है कि इस्लामी आक्रांताओं ने सैकड़ों सालों तक भारत में धर्मान्तरण का कार्य जारी रखा। इसके लिए प्रलोभन दिए गए या फिर क्रूरता अपनाई गई। हिन्दुओं को काफिर समझ कर काटा गया। पंडित जवाहरलाल नेहरू एक इतिहासकार भी थे। ऐसे में इन कथनों पर भी उनकी राय इसी इंटरव्यू में सामने आई थी। नेहरू ने इस बात से साफ़ इनकार कर दिया था कि भारत में जितने भी मुस्लिम रहते हैं, वो सभी बाहर से ही आए हुए हैं।

जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि, वो सभी हिन्दुओं के ही वंशज हैं। इन मुस्लिमों के पूर्वज हिन्दू ही थे। उन्होंने स्वीकार किया था कि बाहर से तो काफ़ी कम संख्या में मुस्लिम आकर यहाँ बसे थे। नेहरू की मानें तो मुट्ठी भर विदेशी मुस्लिम ही यहाँ आकर बसे थे। इस इंटरव्यू में भारत विभाजन को लेकर भी नेहरू ने अपने विचार रखे थे। उन्होंने कहा था कि मुस्लिम लीग की स्थापना ही भारत में विभाजन पैदा करने के लिए हुई थी। हालाँकि, उन्होंने ये भी कहा था कि महात्मा गाँधी या वो भारत-पाकिस्तान विभाजन के पक्ष में नहीं थे लेकिन अंत में उन्होंने निर्णय लिया कि लगातार परेशानी झेलने से अच्छा है कि विभाजन का फ़ैसला स्वीकार कर लिया जाए।

हिन्दू धर्मान्तरण नहीं करते: देखें 17.00 के बाद

दरअसल, नेहरू से सवाल पूछा गया था कि भारत में तो सालों से आपसी भाईचारे और सद्भाव का माहौल रहा है, ऐसे में वो इस इतिहास को कैसे देखते हैं? इसके जवाब में ही उन्होंने ये बातें कही थीं। उन्होंने पाकिस्तान पर भी गंभीर आरोप लगाए थे। जम्मू कश्मीर को लेकर उन्होंने पाकिस्तान पर वहाँ नियमों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया था।

मस्जिद में था मजहबी कार्यक्रम, हिस्सा लेने गए 16000 लोग, लौटे तो 243 लोग हुए कोरोना वायरस से संक्रमित

कोरोना के कहर से मलेशिया भी अछूता नहीं रहा है। मलेशिया में रविवार (मार्च 15, 2020) को 190 नए संक्रमित मामले सामने आए हैं। इनमें सबसे अधिक संक्रमण तब्लीगी इज्तेमा से जुड़े हुए समुदाय में हुआ। यह मस्जिद में एक इस्लामिक कार्यक्रम था, जिसमें कई देशों के 16,000 से अधिक लोग शामिल हुए थे। बता दें कि इज्तेमा इस समुदाय की एक धर्मसभा है, जो तब्लीगी जमात का एक अनिवार्य हिस्सा है। अक्सर समुदाय की ताकत दिखाने के लिए इस तरह का 3 दिन का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। 

जानकारी के मुताबिक मस्जिद से आने के बाद 243 लोगों को कोरोना वायरस से संक्रमित पाया गया। इसमें से 9 लोगों को गंभीर रूप से बीमार माना जा रहा है। उन्हें निगरानी में रखा गया है। मलेशिया के स्वास्थ्य अधिकारियों ने कहा कि इस्लामिक इवेंट में शामिल होने वाले सभी प्रतिभागियों और उनके करीबियों को 14 दिनों के लिए अनिवार्य रूप से आइसोलेसन वार्ड में रखा जाएगा।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि मलेशिया में कुल 428 संक्रमित मामले सामने आ चुके हैं। मलेशियाई स्वास्थ्य अधिकारियों ने बताया कि 27 फरवरी से 1 मार्च के बीच कुआलालंपुर की एक मस्जिद में आयोजित धार्मिक सभा में लगभग 16,000 लोग शामिल हुए। प्रतिभागियों में से लगभग 14,500 लोग मलेशियाई हैं।

तब्लीग समूह ने कुआलालंपुर के बाहरी इलाके में मस्जिद जमीक श्री पेटालिंग में एक विशाल सभा आयोजित की गई थी, जिसमें हजारों लोग शामिल थे। इसकी वजह से घातक कोरोना वायरस का काफी प्रसार हुआ। प्रधान मंत्री मुहीदीन यासिन ने शुक्रवार को कहा कि देश संक्रमणों की ‘सेकेंड वेब’ का सामना कर रहा था। इसके साथ ही उन्होंने आर्थिक विकास पर इसके प्रभाव की चेतावनी भी दी।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने रविवार को कहा कि पड़ोसी ब्रुनेई में कुल 50 मामलों में से 45 धार्मिक सभा से जुड़े हुए थे। सिंगापुर ने भी इस कार्यक्रम से जुड़े कुछ संक्रमण मामलों की पुष्टि की। स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा है कि ब्रूनियन और विदेशी निवासियों को कोरोनावायरस के प्रकोप के कारण देश छोड़ने पर रोक है।

बता दें कि घातक कोरोना वायरस की वजह से अब तक 6,000 से अधिक लोगों की जानें जा चुकी है और दुनिया भर में अब तक इसके संक्रमण के 1,59,0000 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं। कोरोना वायरस बीमारी (COVID-19) का प्रकोप सबसे पहले चीन के वुहान से 31 दिसंबर 2019 को हुआ था।

‘मूर्तियों को गिरा दिया जाएगा… केवल अल्लाह का नाम रहेगा’ – फैज की ‘अनुपयुक्त’ शायरी पर IIT कमिटी का ‘हथौड़ा’

पिछले साल नागरिकता संशोधन कानून (CAA) बनने के साथ ही इसके खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गए। विरोध प्रदर्शन के नाम पर कई जगहों पर हिंसा और दंगे हुए। इसी कड़ी में IIT कानपुर के कुछ गिने-चुने छात्रों ने 17 दिसंबर को एक प्रदर्शन का आयोजन किया था। आयोजन में फैज अहमद फैज की एक कविता (लाज़िम है कि हम भी देखेंगे… सब बुत उठवाए जाएँगे… सब तख़्त गिराए जाएँगे… बस नाम रहेगा अल्लाह का) गाई गई।

इसको लेकर काफी विरोध प्रदर्शन हुआ था। जिसके बाद मामले की जाँच के लिए आईआईटी प्रशासन ने 6 सदस्यों की कमिटी का गठन किया था। अब उस पैनल ने अपनी जाँच रिपोर्ट दी है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि फैज की शायरी पढ़ना ‘समय और स्थान के लिहाज से अनुपयुक्त’ था।

इसके साथ ही पैनल ने इस मामले में 5 शिक्षक और 6 छात्रों को भी आरोपित ठहराया। उन्होंने इन संस्थान से आरोपितों की काउंसलिंग करवाने की सिफारिश करते हुए कहा कि जाँच में पाया गया कि इन लोगों ने विरोध-प्रदर्शन में हिस्सा लिया था, जो कि वांछनीय नहीं था।

आईआईटी-कानपुर के अस्थायी शिक्षक वाशी मंत शर्मा ने अपनी शिकायत में दावा किया था कि संस्थान में फैज की शायरी के पाठ से उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँची है। शर्मा ने अपनी शिकायत में दावा किया था कि शायरी की इन दो पंक्तियों से उन्हें ठेस पहुँची है, “जब अरज़-ए-खुदा के काबे से, सब बुत उठवाए जाएँगे, हम अहल-ए-सफा मरदूद-ए-हराम, मनसंद पे बिठाए जाएँगे, सब ताज उछाले जाएँगे, सब तख्त गिराए जाएँगे।”

द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में शर्मा ने कहा था, “वे एक कविता कैसे गा सकते हैं जो कहती है कि मूर्तियों को गिराया जाएगा? यह मुगलों द्वारा भारत के आक्रमण को संदर्भित करता है और मेरी धार्मिक भावनाओं को आहत करता है।” आईआईटी प्रशासन ने समिति को यह जाँच करने का काम सौंपा था कि क्या सभा के दौरान कही गई बातें या सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए वीडियो में “भड़काऊ, अपमानजनक और डराने वाली भाषा” का इस्तेमाल किया गया था या नहीं?

समिति के अध्यक्ष और संस्थान में उप निदेशक मनिंद्र अग्रवाल ने द इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए पुष्टि की कि समिति ने पिछले सप्ताह ही रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है। फैज की शायरी पढ़ने पर उन्होंने कहा, “समिति ने यह पाया कि जब शायरी पढ़ी गई तब शायद, समय और स्थान उपयुक्त नहीं थे। जिस व्यक्ति ने उसका (कविता) पाठ किया, वह इस दृष्टिकोण से सहमत हुआ और उसने एक नोट लिखा कि किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचने पर उसे पछतावा है। तो ऐसे में अब यह मामला बंद हो चुका है।”

यह पूछे जाने पर कि पैनल को ऐसा क्यों लगा कि यह अनुपयुक्त है, उन्होंने कहा, “यह एक विविधतापूर्ण वातावरण था। लोग अलग-अलग भाषा, विचार और संस्कृति से आते हैं। ऐसे में लोगों को ऐसे काम नहीं करने चाहिए, जो दूसरे को उत्तेजित, क्षुब्ध या व्यथित करे। अपनी रोजमर्रा की जिंंदगी में मैं ऐसे बहुत सी चीजें कर सकता हूँ, जो घातक है, लेकिन मुझे नहीं करना चाहिए।” हालाँकि, अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि समिति ‘कविता की व्याख्या’ में नहीं गई थी।

समिति ने 5 शिक्षकों और 6 छात्रों को विशेष रूप से उनके अवांछनीय व्यवहार के लिए दोषी ठहराया है, जिसमें 17 दिसंबर को आईआईटी-कानपुर द्वारा अनुमति वापस लेने के बाद भी विरोध मार्च के साथ आगे बढ़ने का उनका निर्णय शामिल है।

मनिंद्र अग्रवाल ने बताया कि मार्च के आयोजन के लिए जिम्मेदार लोगों को लगभग 11-12 बजे के आस-पास सूचित किया था कि संस्थान द्वारा मार्च की अनुमति वापस ले ली गई। साथ ही यह भी बताया गया था कि शहर में धारा 144 लगा दी गई है। लेकिन फिर भी इस जानकारी को बड़े पैमाने पर छात्रों को सूचित नहीं किया गया था, जो यह मानते रहे कि मार्च दोपहर 2 बजे होने वाला है।

उन्होंने आगे कहा कि कई फैकल्टी मेंबर्स ने यह जानने के बावजूद कि अनुमति वापस ले ली गई थी और धारा 144 लगा दी गई थी, फिर भी आगे बढ़े और मार्च में भाग लिया। कई लोगों ने अप्रिय वीडियो बनाए और सोशल मीडिया पर तथ्यों के भ्रामक चित्रण भी किए। संस्थान द्वारा उन्हें सलाह देने के बाद भी इसे ठीक नहीं किया गया। ये कुछ ऐसी गतिविधियाँ थीं, जो आउट ऑफ लाइन थी और समिति ने इन पर गौर किया है।

‘सभी मूर्तियों को हटा दिया जाएगा… केवल अल्लाह का नाम रहेगा’: IIT कानपुर में हिंदू व देश विरोधी-प्रदर्शन

‘सभी मूर्तियों को हटा दिया जाएगा… केवल अल्लाह का नाम रहेगा’: IIT कानपुर में जाँच कमिटी गठित, 15 दिन में रिपोर्ट

कमल का ‘नाथ’ बना कोरोना: 26 तक विधानसभा स्थगित, उसी दिन राज्यसभा के लिए मतदान

मध्य प्रदेश में आखिरकार वही हुआ, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। कोरोना की वजह से कमलनाथ सरकार को फ्लोर टेस्ट से फिलहाल राहत मिल गई है। स्पीकर ने मध्य प्रदेश विधानसभा को 26 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी है। उसी दिन राज्यसभा के लिए मतदान भी होना है। राज्यपाल के अभिभाषण के बाद विधानसभा 26 मार्च तक के लिए स्थगित हो गई है। यानी कि कुछ दिनों के लिए कमलनाथ सरकार के ऊपर से फ्लोर टेस्ट का खतरा टल गया है। सोमवार (मार्च 16, 2020) को मध्य प्रदेश विधानसभा में कार्यवाही शुरू होने पर राज्यपाल लालजी टंडन ने अभिभाषण दिया। उन्होंने सभी विधायकों से कहा कि वह अपना दायित्व निभाएँ। उन्होंने कहा कि सभी को संविधान के तहत नियमों का पालन करना चाहिए ताकि मध्य प्रदेश की गरिमा संरक्षित रहे।

बता दें कि इससे पहले मुख्यमंत्री कमलनाथ ने रविवार देर रात को राज्यपाल लालजी टंडन से राजभवन में मुलाकात की थी। उसके बाद संवाददाताओं से चर्चा करते हुए कहा था कि विधानसभा में क्या होगा यह तो विधानसभा अध्यक्ष तय करेंगे। सीएम कमलनाथ ने राज्यपाल को चिट्ठी लिखकर फ्लोर टेस्ट रोकने की माँग की थी। पत्र में उन्होंने कहा था कि वर्तमान परिस्थिति में फ्लोर टेस्ट कराना अलोकतांत्रिक होगा। कमलनाथ ने आरोप लगाया कि बीजेपी ने कॉन्ग्रेस के कई विधायकों को कर्नाटक में बंदी बना लिया है। ऐसी स्थिति में फ्लोर टेस्ट कराना अलोकतांत्रिक है।

राज्यपाल से मुलाकात के बाद कमलनाथ ने कहा था, “लालजी टंडन ने फोन पर मुझे मिलने के लिए बुलाया था। वे विधानसभा की कार्यवाही सुचारू रूप से चलने के लिए मुझसे चर्चा करना चाहते थे। मैंने उनसे कहा कि मैं स्पीकर से बात करूँगा। फ्लोर टेस्ट पर फैसला स्पीकर करेंगे। यह मेरा काम नहीं है। मैंने राज्यपाल को बता दिया है कि मैं फ्लोर टेस्ट के लिए तैयार हूँ, पर इससे पहले बेंगलुरु में बंधक बनाए गए विधायकों को रिहा किया जाए।”

कमलनाथ के बयान के बाद शिवराज सिंह ने कहा था, “राज्यपाल ने निर्देश दिए हैं कि सरकार फ्लोर टेस्ट करवाए, लेकिन मुख्यमंत्री कहते हैं कि यह मेरा काम नहीं। वे कह रहे हैं कि यह स्पीकर का काम है। मुख्यमंत्रीजी! सदन में क्या कामकाज होगा, यह सरकार तय करती है। उसे पूरा करवाने के लिए स्पीकर कार्रवाई करते हैं। राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है कि आप विश्वास मत हासिल करें। मुख्यमंत्री फ्लोर टेस्ट की बात नहीं कर रहे। इधर-उधर की बात कर रहे हैं। फ्लोर टेस्ट करवाओ, फैसला हो जाएगा। सरकार डर भी रही है और फ्लोर टेस्ट से भाग रही है। किसी को बंधक नहीं बनाया गया है।”

‘हमें कोरोना नहीं होगा, मोदी को होगा, हमारे साथ अल्लाह है’ – जामिया प्रदर्शन पर बैठी बुजुर्ग महिला

कोरोना वायरस के कहर से देश की जनता को बचाने के लिए जहाँ भारत सरकार और राज्य सरकारें हर मुमकिन प्रयास करने में जुटी हैं, वहीं दिल्ली के ओखला में जामिया के गेट नंबर 7 पर मुस्लिम महिलाओं का सीएए-एनआरसी-एनपीआर के ख़िलाफ़ प्रदर्शन जारी है। इन महिलाओं का कहना है कि इन्हें कोरोना से कोई भय नहीं है। वे यहाँ पर सबसे हाथ मिला रही हैं। नमाज पढ़ रही हैं और आपस में साथ में बैठ रही हैं। इनका कहना है कि इन्हें कोरोना का कोई डर नहीं है क्योंकि कोरोना उन्हें नहीं होगा बल्कि नरेंद्र मोदी को होगा।

जामिया नगर में चल रहे इस प्रोटेस्ट की एक विडियो सोशल मीडिया पर सामने आई है। ये विडियो लाइव टीवी है। विडियो में देख सकते हैं कि बुजुर्ग से लेकर बच्चियाँ तक यहाँ प्रदर्शन में शामिल हैं और जोर जोर से अल्लाह-मौला का नाम लेकर प्रोटेस्ट आदि करने की आजादी माँग रही हैं।

विडियो में सर्वप्रथम एक युवक की बाइट है। जो बताता है कि उसने देश भर के सभी राज्यों का सिलसिलेवार दौरा किया है और देखा है कि शाहीन बाग तथा जामिया की तर्ज पर लोग जगह-जगह अपने घरों से बाहर निकले हैं और प्रदर्शन कर रहे हैं। उनकी माँग सिर्फ़ इतनी है कि सरकार आकर उनकी बात सुने। और कुछ भी नहीं। लेकिन सरकार उनकी बात नहीं सुन रही।

इसके बाद इसमें एक बुजुर्ग महिला की बाइट है। जो कैमरे पर आने के बाद सबसे पहले मोदी सरकार की जमकर आलोचना करती है और कहती है कि मोदी सरकार उन लोगों से आकर मिलें, तभी वह हटेंगे। फिर रिपोर्टर बुजुर्ग महिला से कहता है कि उन लोगों को भटकाने के लिए कोरोना का खौफ फैलाया जा रहा है। तो वो लोग इससे कैसे लड़ेंगी। इस पर बुजुर्ग महिला कहती हैं, “हमें अल्लाह का खौफ है और किसी का खौफ नहीं है। हम हाथ भी खूब मिला रहे हैं और हम आपस में मिलकर बैठ रहे हैं। नमाज पढ़ते हैं। हमें अल्लाह पर भरोसा है। हमें कुछ नहीं होगा। मोदी को होगा। क्योंकि मोदी जाते हैं बाहर। उन्हें डर है। हमें कोई डर नहीं है। हम दिन रात एक साथ हैं सारे… और अल्लाह हमारे साथ है।”

राज्य सरकार के निर्देशों के बावजूद भी इस प्रदर्शन में इस विडियो में सभी महिलाओं को एक साथ बैठे देखा जा सकता है और सुना जा सकता है कि यहाँ मौजूद महिलाओं का कहना है कि उन्हें एनआरसी-सीएए-एनपीआर के बारे में कुछ मालूम नहीं था। उन्हें तो जामिया की बच्चियों ने इंस्पायर किया है और अब वे तब तक यहाँ से नहीं उठेंगी जब तक कि मोदी सरकार लिखित में नहीं देगी कि वे इस कानून को वापस लेंगे।

महिलाओं की बातें और भाषा सुनकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि इनके दिमाग में सिर्फ़ मोदी सरकार के प्रति नफरत भरी गई है। उन्हें तो यह भी नहीं पता कि उनकी तरह सैकड़ों लोगों को ईरान से बचाकर केंद्र सरकार ही लाई है। एक महिला तो यहाँ तक बोलती सुनी जा सकती है कि हिंदुस्तान में मुस्लिमों पर बहुत ज्यादा जुल्म हुआ है और वे केवल हिंदुस्तान की आजादी की माँग कर रही हैं।

सबसे शर्मनाक चीज जो इस विडियो के जरिए मालूम चलती है, वो ये कि एक महिला जिसने कुछ दिन पहले इसी प्रदर्शन के कारण अपने बेटे को खोया, वो एक बार फिर से अपने हाथ में अपना एक और बच्चा लिए इस प्रदर्शन में मौजूद है और जब रिपोर्टर उससे इस संबंध में सवाल करता है तो वह लगातार कहती है कि वो यही चाहती है कि काले कानून को वापस ले लिया जाए।

विडिया के इस भाग में गौर देने वाली ये चीज है कि माँ की लापरवाही से जान गँवाने वाले बच्चे के लिए शहादत का प्रयोग किया जाता रहता है और महिला भी कहती है कि उसे अब ये प्रदर्शन अपने घर जैसे लगने लगा है। वे यहाँ आती है और लोग उसे खूब सपोर्ट करते हैं।