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जिसे हर सरकार ने नकारा, उस पूर्वोत्तर में खोले विकास के नए द्वार: एक्ट ईस्ट पॉलिसी का दिखने लगा असर

दक्षिण पूर्व एशिया के साथ भारत की साझी ऐतिहासिक विरासत, भौगोलिक निकटता और हाल के वर्षों में क्रमशः बढ़ते सामाजिक-सांस्कृतिक संबंध भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र को इस साझेदारी की अनिवार्य धुरी बनाते हैं। भारत का उत्तर-पूर्वी क्षेत्र 5,300 किलोमीटर की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से घिरा हुआ है तथा एक संकरे गलियारे (चिकेन नेक/सिलीगुड़ी कॉरिडोर) से शेष भारत से जुड़ता है। यह क्षेत्र पिछले काफी समय से उपेक्षा का शिकार रहा है, जिसके कारण यहाँ अलागाववाद भी क्रमशः बढ़ता गया है। जल, जमीन, वनस्पति, जैव विविधता और हाइड्रोकार्बन जैसे प्राकृतिक और अन्यान्य खनिज संसाधनों का असीम भण्डार होने के बावजूद यह क्षेत्र अविकसित रहा है। अतः बुनियादी ढॉंचे की स्थापना के साथ इस उपेक्षित क्षेत्र में विकास की महती आवश्यकता रही है, जिसके लिए बड़ा निवेश भी अपेक्षित था।

मई 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी ने पूर्वोत्तर भारत की 35 से अधिक यात्राएँ की हैं। पूर्वोत्तर की ओर दिए गए उनके व्यक्तिगत ध्यान ने विकास की सभी गतिविधियों को तेजी प्रदान की है। उनकी प्राथमिकता न केवल पूर्वोत्तर को शेष भारत के करीब लाने की है, बल्कि शेष भारत को भी पूर्वोत्तर के निकट ले जाने की है। फलस्वरूप, सरकार द्वारा ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ से कई कदम आगे बढ़कर ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के माध्यम से पूर्वोत्तर में समग्र और समावेशी विकास की अनेक परियोजनाएँ प्रारंभ की गईं हैं।

दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के लिए भारत के इस ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ का उद्देश्य एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ बहुपक्षीय जुड़ाव के माध्यम से आर्थिक सहयोग एवं सांस्कृतिक संबंधों को निरंतर बढ़ावा देना और वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में भारत की प्रभावी भूमिका को सुनिश्चित करना है। ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्र को पूर्वी देशों के “प्रवेश द्वार” के रूप में महत्व देती है। यह क्षेत्र सम्पूर्ण भारत की प्रगति और समृद्धि के लिए एक विस्तारित गलियारा है। इसलिए इस नीति में उत्तर-पूर्व क्षेत्र के विकास को प्राथमिकता दी गई है।

पूर्वोत्तर में भौतिक ढॉंचे (सड़क, हवाई अड्डे, दूरसंचार, विमानपत्तन, जल/बिजली संयंत्र आदि) को विकसित करते हुए आसियान क्षेत्र के साथ उसके संबधों और संपर्क को सुदृढ़ करने के लिए निरंतर प्रयास किया जा रहा है। क्षेत्रीय स्तर पर व्यापारिक-सांस्कृतिक संबंध और संपर्क को बढ़ाया जा रहा है। ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ की तीन प्रमुख विशेषताएँ- संपर्क, संस्कृति और वाणिज्य ही हैं। इसके माध्यम से लोगों की क्षमताओं और कौशल का विकास करते हुए प्रगति और समृद्धि में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है। पूर्वोत्तर में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित विकास को बढ़ावा दिया गया है। यह क्षेत्र पहाड़, जंगल और नदियों वाला है। इसलिए जलविद्युत की उत्पादकता को बढ़ाने के अतिरिक्त पर्यटन, कृषि से सम्बद्ध उद्योग, देशज कौशल-शिक्षा, कीटपालन तथा नैसर्गिक संसाधनों पर आधारित अवसंरचना में भारी निवेश किया जा रहा है।

पूर्वोत्तर के लिए अपर्याप्त परिवहन सुविधा एक ऐसी गम्भीर समस्या रही है, जिसने लम्बे समय तक इस क्षेत्र के विकास को बाधित किया है। किसी भी क्षेत्र के सम्पूर्ण विकास के लिए आधारभूत ढाँचे का सुदृढ़ होना बहुत आवश्यक है। इससे नागरिकों को मूलभूत सुविधाएँ तथा कच्चे माल और उत्पादों की आवाजाही सुनिश्चित होती है। परिवहन-व्यवस्था बुनियादी भौतिक ढाँचे की मेरुदंड होती है। केंद्र सरकार द्वारा आधारभूत सुविधाओं के साथ-साथ परिवहन के सभी साधनों (रेल, सड़क, उड्डयन, जलपत्तन आदि) में भारी निवेश कर कनेक्टिविटी की कमी को मिटाते हुए पूर्वोत्तर के विकास की मुख्य बाधा को समाप्त किया जा रहा है।

केंद्र सरकार ने पूर्वोत्तर में 900 किलोमीटर रेल पटरियों को ब्रॉड गेज में परिवर्तित कर दिया है और इस क्षेत्र के सभी आठ राज्यों की राजधानी को रेल संपर्क प्रदान करने के प्रयास चल रहे हैं। इसके लिए लगभग 50,000 करोड़ रुपए की लागत से 15 नई रेल लाइनों पर काम शुरू हुआ है। पूर्वोत्तर के दूर-दराज क्षेत्रों का हवाई संपर्क होने से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और निवेश को भी गति मिलेगी। अत: केंद्र सरकार की ‘उड़ान योजना’ के तहत, पूर्वोत्तर में 5 नए हवाई अड्डों का निर्माण किया गया है। इस योजना में एक विमानन जनशक्ति प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना, रूपसी हवाई अड्डे का विकास, दीमापुर में हवाई सुविधा का विस्तार आदि भी शामिल हैं। सिक्किम में पाक्योंग हवाई अड्डे का निर्माण पूरा हो गया है। अरुणाचल में ज़ीरो, पासीघाट, विजय नगर, मेचुका, टीट्यूटिंग और तेजू में छह हवाई पट्टियों का नवनिर्माण किया गया है। गुवाहाटी को ड्रुक एयर फ़्लाइट (भूटान – गुवाहाटी – सिंगापुर फ़्लाइट) के माध्यम से भूटान और सिंगापुर से सीधे जोड़ा गया है। इसके अतिरिक्त सरकार द्वारा उड्डयन क्षेत्र में कुछ ऐसी समावेशी परियोजनाओं का क्रियान्वयन किया गया है जिनसे पूर्वोत्तर को शेष भारत के साथ पर्याप्त प्रवेश द्वार मिल सकें।

मोदी सरकार द्वारा 32,000 करोड़ रुपए के निवेश के साथ 4,000 किलोमीटर से अधिक राष्ट्रीय राजमार्गों को मॅंजूरी दी गई है, और क्षेत्र में लगभग 1,200 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया गया है। अरुणाचल में होलोंगी- ईटानगर 4 लेन राष्ट्रीय राजमार्ग तथा मेघालय में शिलांग-तुरा (271 किलोमीटर) राजमार्ग का निर्माण किया गया है। भारत-म्यांमार-थाईलैंड (1,360 किलोमीटर लंबे) त्रिपक्षीय राजमार्ग का निर्माण किया जा रहा है, जो पूर्वोत्तर भारत को आसियान देशों के साथ जोड़ देगा। इससे बड़े पैमाने पर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा।

इसके अतिरिक्त, वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास, विशेष रूप से अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढॉंचे के विकास पर जोर दिया जा रहा है। असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच संपर्क बढ़ाने और सीमा पर सेना की आवाजाही को आसान बनाने के लिए दो बड़े पुलों का भी उद्घाटन किया गया है। असम और अरुणाचल प्रदेश को जोड़ने वाले ये दो पुल- लोहित का ढोला सदिया पुल (जो भारत का सबसे लंबा पुल है) और ब्रह्मपुत्र का रेलपुल- बोगीबील पुल (जो भारत का सबसे लंबा रेल-सह-सड़क पुल है और असम में डिब्रूगढ़ और धेमाजी को जोड़ता है) हैं। ये बेहद सामरिक और सैन्य महत्व के पुल हैं। इनसे सशस्त्र बलों और युद्ध उपकरणों की त्वरित आवाजाही हो सकेगी और राष्ट्रीय सुरक्षा-व्यवस्था सुदृढ़ होगी।

मिजोरम में 1302 करोड़ रुपए की लागत की 60 मेगावॉट की ट्युरिअल जलविद्युत परियोजना को पूरा किया जा चुका है। यह परियोजना मिजोरम में स्थापित सबसे बड़ी परियोजना है। इससे उत्पादित बिजली राज्य को ही दी जाएगी। इससे राज्य में सबको सातों दिन चौबीसों घंटे किफायती और प्रदूषणमुक्त ऊर्जा देकर राज्य का चहुँमुखी विकास किया जा सकेगा। परियोजना से अतिरिक्त 60 मेगावाट बिजली प्राप्‍त होने के साथ ही मिजोरम अब सिक्किम और त्रिपुरा के बाद पूर्वोत्‍तर भारत का तीसरा सरप्लस बिजली वाला राज्य बन जाएगा।

शिक्षा, सूचना-प्रौद्योगिकी, कला-कौशल,शिल्प, खेल, पर्यटन तथा स्वास्थ्य जैसी सामाजिक बुनियादी संरचना एवं सुविधाएँ उस क्षेत्र के मानव विकास और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अतः खेल प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने के लिए केंद्र सरकार ने मणिपुर में प्रथम राष्ट्रीय खेल विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी है तथा भारत की बेहतरीन खिलाड़ियों में से एक मैरीकॉम को राज्यसभा का नामित सदस्य बनाया है। पूर्वोत्तर भारत गिरते स्वास्थ-स्तर और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण हमेशा खबरों में रहा है। आयुष्मान भारत ने इस परिदृश्य को बदलने में मदद की है। जन-जन तक स्वास्थ्य सुविधाओं को पहुँचाने के लिए असम के चांगसारी में AIIMS तथा लखीमपुर, डुबरी, दीफू, नौगॉंव में 4 नए मेडिकल कॉलेज और तिनसुकिया, कोकराझार, करीमगंज और नलबाड़ी में भी 4 मेडिकल कॉलेज खोलने का काम शुरू हुआ है।

उत्तर-पूर्व की अर्थव्यवस्था के लिए बाँस महत्वपूर्ण है। वहाँ की अर्थव्यवस्था में इसके अत्यधिक महत्व के कारण ही इसे “हरा सोना” कहा जाता है। सरकार ने बाँस को पेड़ों की सूची से हटा कर उसे काटने, लाने-ले जाने और इसके उपयोग सम्बन्धी नियमों से 90 वर्ष पुरानी पाबंदियों को हटा दिया है। 50 करोड़ रुपए की लागत से 75 हेक्टेयर क्षेत्र में असम के दीमा हसाओ जिले के मंडेरदिसा में एक बाँस औद्योगिक पार्क की भी स्थापना की जा रही है। यह कदम बाँस आधारित हस्तकला को बढ़ावा देते हुए असंख्य स्थानीय लोगों को रोजगार देगा। इसके अतिरिक्त अरुणाचल प्रदेश में नॉर्थ ईस्ट रीजन टेक्सटाइल प्रमोशन स्कीम (एनईआरटीपीएस) के तहत बड़े पैमाने पर ईरी फार्मिंग शुरू की गई है। इसके अंतर्गत 4000 लाभार्थियों को वित्तीय सहायता की घोषणा तथा एरी रेशम किसानों और बुनकरों के कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की गई है।

भारत सरकार की प्रतिबद्धता को देखते जापान ने भी पूर्वोत्‍तर भारत के विभिन्‍न राज्‍यों में कुछ वर्तमान और कुछ नई परियोजनाओं में 205.784 अरब येन (13,000 करोड़ रुपए) की धनराशि निवेश करने का फैसला किया है। इससे असम में गुवाहाटी जलापूर्ति परियोजना और गुवाहाटी सीवेज़ परियोजना, असम और मेघालय की पूर्वोत्‍तर सड़क संजाल संपर्क सुधार परियोजना, सिक्किम में जैव-विविधता संरक्षण और वन-प्रबंधन परियोजना, त्रिपुरा में सतत वन प्रबंधन परियोजना, मिजोरम में निरंतर कृषि और सिंचाई के लिए तकनीकी सहयोग परियोजना, नगालैंड में वन प्रबंधन परियोजना आदि को पूरा किया जा सकेगा।

इन नवीन विकास योजनाओं के माध्यम से पूर्वोत्तर में समावेशी संवृद्धि और समृद्धि लाने और मूलभूत सेवाओं के क्रियान्वयन के लिए स्थानीय समुदाय के समर्थन और सहयोग को सुनिश्चित करना भी परम आवश्यक है। अतः सरकार ने समग्र विकास के लिए त्रिपुरा में वर्षों से चल रहे अलगाववाद तथा उग्रता का अपनी समावेशी नीतियों से शमन किया है। पूर्वोत्तर के समग्र विकास के लिए विभिन्न विद्रोही/उग्रवादी समूहों के साथ संकल्प और संवेदनशीलता के साथ संवाद करते हुए वर्षों से लंबित समस्याओं का समाधान करते हेतु ब्रू समझौता, बोडो समझौता तथा नागा समझौतों के माध्यम से शांति और विकास की आधारभूमि निर्मित की है।

वास्तव में, उत्तर-पूर्व के रहवासियों की समृद्धि भारत के विकास की धुरी है। यह भारत की एकता, अखण्डता, शांति और सुरक्षा की आधारशिला है। विगत कुछ वर्षों से पूर्वोत्तर में बुनियादी अवसंरचना, समावेशी विकास और शान्ति-वार्ता के स्तर पर तीव्र परिवर्तन दिखाई दे रहा है। यहाँ की भौगोलिक दुर्गमताओं और कठिनतम जीवन-स्थितियों को प्राकृतिक संसाधनों और जनांकीय-क्षमताओं की पहचान तथा दूरगामी एवं समावेशी विकास योजनाओं द्वारा सरल किया जा रहा है। वस्तुतः ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ भारत की विश्वशक्ति बनने की महत्वाकांक्षी परियोजना की सकर्मक आयोजना है जो निश्चय ही फलीभूत भी होगी।

उत्तर प्रदेश: कोरोना से दिहाड़ी मजदूरों के नुकसान की भरपाई करेगी योगी सरकार, खाते मैं पैसा भेजेगी

देश में बढ़ते कोरोना के प्रभाव से कई लोगों के काम ठप्प हैं। इस श्रेणी में एक वर्ग मजदूरों का भी है जिनका ख्याल रखते हुए यूपी की योगी सरकार ने बड़ा फैसला किया है। इस फैसले के तहत कोरोना के कारण मजदूरों को हुए नुकसान की भरपाई सरकार करेगी और उनकी आर्थिक मदद करते हुए कुछ पैसे सीधे उनके खाते में भेजेगी।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में मंगलवार को कैबिनेट की बैठक के बाद दिहाड़ी मजदूरों के लिए ये बड़ा ऐलान किया गया। इसमें बताया गया कि मजदूरों के भरण-पोषण के लिए निश्चित धनराशि मुहैया करवाई जाएगी। इसके लिए वित्त मंत्री, कृषि मंत्री और श्रम मंत्री की कमेटी बनाई गई है।

ये कमेटी रोज कमाने खाने वाले लोगों पर तीन दिन के अंदर रिपोर्ट देगी। इसके बाद उनको अलग से आरटीजीएस के द्वारा पैसे दिए जाएँगे। इसके साथ सरकारी कर्मचारियों को घर से काम करने की सुविधा दी गई। इसके लिए चीफ सेकेट्री की अध्यक्षता में कमेटी बनेगी। 

योगी आदित्यनाथ ने ट्वीट कर कहा है,“कोरोना वायरस के दुष्प्रभाव के चलते दिहाड़ी मजदूर भाई-बहनों को परिवार के भरण-पोषण में समस्या न हो, इस हेतु प्रदेश सरकार ने एक तय धनराशि मजदूर भाई-बहनों के बैंक खाते में प्रदान करने का निर्णय लिया है। इस संबंध में वित्तमंत्री की अध्यक्षता में गठित समिति 3 दिन में रिपोर्ट सौंपेगी।”

इसके अलावा योगी सरकार ने प्रदेश में कोरोना वायरस से संक्रमित होने वालों की जाँच और इलाज मुफ्त में करने का ऐलान किया है। साथ ही यह भी तय किया गया है कि इलाज हेतु लिए गए अवकाश के दौरान उनके वेतन में कोई कटौती नहीं की जाएगी।

गौरतलब है कि मंगलवार को हुई इस बैठक में यूपी के सभी पर्यटक स्थल 31 मार्च तक बंद करने का आदेश दिया गया है। इस दौरान कहा गया कि पर्यटक स्थल सिर्फ साफ-सफाई के लिए खुलेंगे। तहसील दिवस व जनता दर्शन भी 2 अप्रैल तक नहीं होंगे। सभी स्कूल-कॉलेजों और मल्टीप्लेक्स 2 अप्रैल तक बंद कर दिए गए हैं। इसके अलावा सभी स्कूल-कॉलेजों में चल रही परीक्षाओं को स्थगित करने का आदेश जारी हुआ है। बता दें, इस समय उत्तर प्रदेश में कोरोना के पीड़ित मरीजों की संख्या 13 है जिसमें से 12 भारतीय और 1 विदेशी नागरिक हैं। हालाँकि इसमें से चार लोग कोरोना से पूरी तरह ठीक हो चुके हैं।

कॉन्ग्रेस, लेफ्ट, ममता: नहीं बदला बंगाल, 46 साल में भी पूरी नहीं हुई 110 किमी की परियोजना

कॉन्ग्रेस के बाद पश्चिम बंगाल ने वाम मोर्चे का लंबा राज देखा। करीब 9 साल से राज्य में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कॉन्ग्रेस की सरकार चल रही है। लेकिन, बंगाल में जो नहीं बदला वह है सरकार के कामकाज का तरीका। विकास कार्यों के प्रति उदासीन रुख। राजनीतिक हिंसा।

राजनीतिक हिंसा के लिए तो बंगाल कुख्यात रहा है। बीजेपी समर्थकों को निशाना बनाने की घटनाएँ आए दिन सामने रहती है। अब राज्यसभा में रेल मंत्री पीयूष गोयल की ओर से रखे एक तथ्य से यह बात भी सामने आई है कि राज्य सरकार विकास परियोजनाओं को पूरा करने को लेकर भी उत्साहित नहीं है। राज्य में 1974 में 110 किमी लंबी एक रेल परियोजना शुरू हुई। आप जानकर हैरत में रह जाएँगे कि 46 साल में यह परियोजना महज 42 किमी ही पूरी हो पाई है।

इसके लटके होने का कारण है जमीन अधिग्रहण। इन 46 साल के दौरान राज्य में कॉन्ग्रेस, लेफ्ट फ्रंट और टीएमसी तीनों दलों की सरकारें रहीं, पर किसी ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई। मुख्यमंत्री बनने से पहले दो साल तक ममता बनर्जी केंद्र सरकार में रेल मंत्री भी रहीं थी। लेकिन, इस परियोजना का हाल देखकर लगता है कि सीएम बनते ही उन्होंने रेलवे की योजनाओं को अपने राज्य में भी बिसरा दिया।

अब सुनिए पीयूष गोयल ने संसद के उच्च सदन में क्या कहा। इसका विडियो उन्होंने खुद ट्वीट किया है।

विडियो में पीयूष गोयल को इस प्रोजेक्ट का जिक्र करते सुना जा सकता है। वे कहते हैं कि जिस समय 1974 में इस परियोजना का कार्य शुरू हुआ उस समय वह 10 साल के थे। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि मेरी दिली इच्छी है कि राज्य सरकार जमीन अधिग्रहण में सहयोग करें और मेरे जीते जी यह प्रोजेक्ट पूरा हो जाए।

उन्होंने राज्यसभा में बोलते हुए कहा कि आगामी वर्षो में सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा आदि के जरिए लगभग 20,000 मेगावाट बिजली उत्पादन कर भारतीय रेलवे का 100 फीसदी विद्युतीकरण किया जाएगा। इससे कार्बन उत्सर्जन की मात्रा शून्य होगी और भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा की बचत होगी जिसे अभी कच्चे तेलों के आयात पर खर्च किया जाता है। इसके साथ ही रुपया मजबूत होगा और महँगाई घटेगी। इससे देश को 13 से 16 हजार करोड़ रुपए की सालाना बचत होगी।

रेल मंत्री पीयूष गोयल ने इस दौरान राज्यसभा में ये भी साफ कर दिया कि भारतीय रेलवे देश की जनता की है और सरकार के पास इसके निजीकरण की कोई योजना नहीं है। दरअसल, कई विपक्षी सदस्यों की ओर से इस पर संदेह जताए जाने के बाद रेल मंत्री की ओर से ये यह बात कही गई।

रेल मंत्री ने सदस्यों का संदेह दूर करते हुए दो टूक कहा है कि, “मैं यह पूरी तरह से साफ कर देना चाहता हूँ कि भारतीय रेलवे के निजीकरण का कोई प्रस्ताव या योजना नहीं है, ऐसा नहीं होगा। भारतीय रेलवे इस देश के लोगों की है और यह उसी के पास रहेगी।” हालाँकि यहाँ पर उन्होंने ये बात भी बताई कि रेलवे के विकास के लिए सरकार कुछ सेवाएँ निजी क्षेत्रों को दे सकती है, जिससे कि यात्रियों को बेहतर से बेहतर सुविधाएँ मुहैया कराई जा सके।

इस दौरान उन्होंने कहा कि अगले 12 वर्षो में रेल की विभिन्न परियोजनाओं को पूरा करने के लिए लगभग 50 लाख करोड़ रुपए के निवेश की आवश्यकता होगी जिसमें सभी अंशधारकों से मदद मिलने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि हम इस देश की जनता को भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बनने का मौक़ा देंगे।

रेलवे के लंबित परियोजनाओं के मुद्दे पर भाजपा की ओर से सांसद रूपा गाँगुली ने भी अपने क्षेत्र की माँग रखी। रूपा गांगुली ने रेलवे की डिमांड ग्रांट का जिक्र करते हुए कहा कि संघीय व्यवस्था के सम्मान की कमी की बात कही। उन्होंने अपने क्षेत्र के कसाई हाल्ट के मुद्दे को रखा।

इस दौरान बता दें, गोयल ने विपक्षी सदस्यों की ओर से रेलवे में कार्य की धीमी प्रगति पर पूछे गए वालों का भी जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि 2014-15 में कैपिटल एक्सपेंडिचर 58,000 करोड़ रुपए था, जो कि इस साल 1.61 लाख करोड़ रुपए रहने वाला है। उन्होंने दावा किया कि इतनी बड़ी मात्रा में निवेश से कार्यों में बड़ी प्रगति देखने को मिलेगी। रेलवे में काम को तेजी से पूरा करने के लिए केंद्र सरकार ने राज्यों से जमीन दिलाने में सहयोग की भी अपील की है। उन्होंने रेलवे की उपलब्धि बताते हुए कहा है कि रायबरेली रेल कोच फैक्ट्री से इस साल 2,000 कोच बनकर निकलेंगे।

इस चर्चा में जब रेल राज्यमंत्री सुरेश अंगाडी ने रेलवे जमीन के अतिक्रमण का मामला उठाया, तो पीयूष गोयल ने इसका भी जवाब दिया। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल के हाल के दौरे में उन्होंने पाया कि रेलवे की जमीन के अतिक्रमण का ज्यादातर मामला पश्चिम बंगाल में (ही) है। राज्य सरकार की ओर से इसे खाली कराने की दिशा में कोई सक्रिय पहल नहीं दिखी। उन्होंने कहा कि संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) के विरोध प्रदर्शन के दौरान ज्यादातर ऐसी जगहों पर संपत्ति को नुकसान पहुँचा।

मैं सरकार को कोसता था, लेकिन मोदी सरकार पिता के साए जैसी: इटली से लौटी युवती के पिता

कोरोना वायरस का प्रसार रोकने के लिए भारत की तैयारियों और प्रभावित देशों से अपने नागरिकों को लाने की केंद्र सरकार की कोशिशों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना हो रही है। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी भले इस वैश्विक महामारी को मोदी सरकार पर हमले के मौके की तरह तलाश कर रहे हैं, लेकिन सोशल मीडिया में सरकार की तारीफ करते हुए कुछ लोगों ने जो आपबीती शेयर की है वह बेहद मार्मिक है। इटली से लाई गई एक युवती के पिता ने अपनी भावना साझा करते हुए कहा है कि वो सालों से सरकार की आलोचना कर रहे थे। लेकिन, अब उन्हें एहसास हो रहा है कि मोदी सरकार पिता के साए (fatherly figure) जैसी है। विदेश से लाए गए एक युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय मुल्कों में भी नहीं देखी है।

टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार रोहन दुआ ने इटली से लौटी युवती के पिता का पत्र शेयर किया है। इस पत्र में उन्होंने इंडियन एंबेसी, भारत सरकार और विशेषत: नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया है। पिता के मुताबिक उनकी बेटी मास्टर की पढ़ाई करने इटली के मिलान गई थी। वहॉं हालात बिगड़ने पर उसे वापस लौटने को कहा। जब वह लौटने लगी तो उससे भारत वापस जाने का सर्टिफिकेट माँगा गया। न्होंने खुद इंडियन एंबेसी को संपर्क करने की कोशिश की। मगर मिलान में एंबेसी का कार्यालय बंद होने के कारण ऐसा नहीं हो पाया। उन्होंने इंडियन एंबेसी के अन्य लोगों को मेल के जरिए संपर्क किया और रात के 10:30 बजे उनकी बेटी ने फोन पर बताया कि उसकी बात दूतावास में हो गई है और वह अगली फ्लाइट से भारत लौट रही है।

पिता के मुताबिक, वे सालों से भारतीय सरकार को कोस रहे थे। लेकिन मोदी सरकार में पिता का चेहरा है। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी 15 मार्च को भारत आई और आईटीबीपी अस्पताल में उसकी स्वास्थ्य संबंधी, खान-पान संबंधी सभी जरूरतों का ख्याल रखा गया। गौरतलब है कि इटली उन देशों में शामिल है जो कोरोना संक्रमण से सर्वाधिक प्रभावित हैं।

गौरतलब है कि भारत सरकार इन दिनों लगातार विदेशों से लौटने वाले अपने नागरिकों को स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध करवाने में प्रयासरत है। सोशल मीडिया में वायरल हुए एक विडियो में विदेश से लौटा शख्स मिली सुविधाओं के बारे में बता रहा है। इस विडियो को रेल मंत्री पीयूष गोयल ने भी शेयर किया था। इसमें व्यक्ति बता रहा है कि सरकार ने करीब 70 किलोमीटर दूर सभी पैसेंजर को कोरोन्टाइन किया है। बिल्डिंग को लगातार सैनेटाइज किया जा रहा है। बड़े-बड़े अधिकारी मौक़े पर तैनात हैं। उन्हें 24 घंटे की देखरेख में रखा है। साथ ही जहाँ उन्हें रखा गया है वहाँ सरकार ने बहुत अच्छी व्यवस्था की है। सबको अलग से रूम मिले हैं। इसमें उन्हें पानी, चप्पल, बेड, खाना, नई तौलिया सब मुहैया कराया जा रहा है। इसलिए वे नरेंद्र मोदी, स्वास्थ्य मंत्री समेत पुलिस प्रशासन और डॉक्टरों का धन्यवाद करते हैं।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कोरोना वायरस के संक्रमण से निबटने के लिए सरकार ने 400 बेड का कोरोन्टाइन वार्ड तैयार करवाया है। यहाँ विदेश से लौटने वालों को सीधे दिल्ली एयरपोर्ट से लेकर जाया जाएगा। यहाँ इन सभी लोगों की 14 तक की निगरानी होगी और अगर इनमें कोरोना के लक्षण मिलते हैं तो इन्हें आइसोलेट कर छोड़ा जाएगा। ये कोरोन्टाइन वार्ड नोयडा के सेक्टर 39 में स्थित जिला अस्पताल की नई बिल्डिंग में बना है। यहाँ पर्याप्त संख्या में पैरामेडिकल स्टॉफ तैनात हैं।

‘द लायर’ ने पैदा किए ‘मुस्लिम पीड़ित’, बिना सबूत कहा ‘जय श्री राम’ कहने वालों ने किया मोलेस्ट

दिल्ली दंगों के बाद से लेफ्टिस्ट मीडिया बौखलाया हुआ है क्योंकि आज तक वह ये साबित नहीं कर पाया कि दिल्ली दंगों में हिंदुओं का हाथ है, क्योंकि आप से निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन की छत से हिंदुओं के खिलाफ मुस्लिमों द्वारा महीनों से की जा रही तैयारी दुनियाँ के सामने आ गई। इसके बाद जिस खबर को ऑपइंडिया ने ग्राउंड जीरो से एक्सक्लूसिव दिया था उसी खबर को ‘द वायर’ ने अपने प्रोपेगेंडा के तहत उल्टा चला दिया।

प्रोपगेंडा फैलाने में कुख्यात पोर्टल ने अपनी रिपोर्ट में खुद को भी पाक साफ रखते हुए बड़ी ही आसानी से अंत की एक लाइन में बता दिया कि सभी पीड़ितों के नाम काल्पनिक हैं और किसी का भी बयान ऑडियो या वीडियो में रिकॉर्ड नहीं किया गया है।

इस खबर में हिदुओं के ऊपर वहीं परदा डाल रहे हैं, जो गली नंबर 5-6 की महिलाओं ने हमसे बात करते हुए बताया था। ऑपइंडिया ने दंगाइयों की नीचता का खुलासा करते हुए ग्राउंड जीरो से लिखा था- ‘हमारी बेटियों को नंगा करके भेजा दंगाइयों ने, कपड़े उतारकर अश्लील हरकतें की’– करावल नगर ग्राउंड रिपोर्ट। इसके बाद ‘द वायर’ ने इस खबर के उलट एक रिपोर्ट बनाई, जिसमें दंगाइयों को दंगा पीड़ित बताते हुए हिंदुओं को दंगाई बताया गया।

चौंकाने वाली बात यह कि ‘द वायर’ की टीम पूरी खबर को लिखते हुए चाँदबाग से लेकर शिव विहार तक पहुँच गई, लेकिन उसे कोई भी दंगों का असली पीड़ित नहीं मिला, जो भी मिला वह दंगाइयों के घर से था, जिनमें से किसी का नाम आफरीन था, किसी का रेशमा, किसी का तरन्नुम तो किसी का शबाना था।

हमने दंगाइयों के घर से इसलिए कहा कि दिल्ली दंगों में न सिर्फ मुस्लिम युवक शामिल थे बल्कि, उसमें जवान से लेकर बूढ़े और महिलाओं से लेकर बच्चों तक समुदाय के सभी लोग शामिल थे। इतना ही नहीं घर के मुखिया अपनी बहन-बेटियों और अपनी बीबियों को हाथों में ईंट-पत्थर और लाठी-डंडे देकर कह रहे थे कि चलो सभी घरों से बाहर निकलो।

दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों की आग

आगे ‘द वायर’ की रिपोर्ट में गौर करने वाली बात यह है कि खबर में हर एक तथाकथित दंगा पीड़िता की आपबीती में इस तरह की भूमिका बना दी गई कि उन्होंने (तथाकथित दंगा पीड़ित ने) हमें पहले ही मना कर दिया या फिर इस शर्त पर ही बयान दिया कि वह इसे न तो ऑडियो और न ही वीडियो के रूप में रिकार्ड करेंगे और इसी के साथ अपना एजेंडा भी चला दिया और कोई सबूत भी नहीं।

इसके उलट ऑपइंडिया ने न सिर्फ सबसे पहले दंगाइयों की करतूतों को लोगों के सामने रखा बल्कि पीड़ित महिलाओं के दुख-दर्द भरे बयानों को सबूत के तौर पर अपने पास रिकार्ड भी किया, लेकिन जब दंगाइयों की पोल खुली तो द वायर जैसे पोर्टल दंगाइयों के हितैशी बनकर सामने आए और उनको (दंगाइयों को) पीड़ित बताने में भी कोई देरी नहीं की।

‘द वायर’ ने आगे अपनी रिपोर्ट में काल्पनिक नाम के तौर पर रेशमा नाम का प्रयोग किया और उसके हवाले से लिखा सुबह से ही खबरें मिल रहीं थीं। गौर करने वाली बात यह कि उसने यह नहीं बताया कि खबरें कहाँ और किस रूप में मिल रहीं थीं। इस बात का खुलासा पहले ही ऑपइंडिया ने अपनी खबरों में किया था कि दंगाई महीनों से हिंदुओं पर हमले की योजना बना रहे थे।

इसके लिए दंगाइयों ने न सिर्फ ईंट-पत्थरों, पेट्रोल बम को छतों पर पहुँचाया बल्कि मस्जिद से ऐलान भी कर दिया गया था। वहीं खबर में आगे लिखा है कि घर में पेट्रोल बम फेंके जा रहे थे, लेकिन खबर में यह नहीं बताया गया कि पेट्रोल बम कहाँ पाए गए और कहाँ से फेंके जा रहे थे, क्योंकि दिल्ली पुलिस को अभी तक किसी भी हिंदू के घर में पेट्रोल बम नहीं मिले।

‘द वायर’ के प्रोपेगेंडा वाली खबर की कटिंग

‘द वायर’ की खबर में तथाकथित पीड़ित मुस्लिम महिला ने ये तो बता दिया कि उसको पहले से कुछ पता था कि इलाके में कुछ होने वाला है, लेकिन द वायर ने ये नहीं पूछा कि ऐसा क्या देखा कि हिंदू उन पर हमला करने वाले हैं। आश्चर्य की बात यह कि इस आशंका के चलते मुस्लिम महिला ने अपनी बेटियों को कुछ उसी तरह से अपने रिश्तेदारों के यहाँ सुरक्षित भेज दिया, जैसे कि मुस्लिमों ने दंगों से पहले अपने कीमती सामनों को बाहर निकाल लिया था। बृजपुरी में मुस्लिम ने अपने शोरूम से बाइकों को पहले ही निकाल लिया था और फिर खुद ही तोड़-फोड़ कर उसमें आग लगा दी, जिससे कि केजरीवाल से मुआवजे और कंपनी से बीमा मिल सके।

खबर के अंत में लिखे गए एक पेराग्राफ को पढ़कर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि किस तरह से ‘जय श्री राम’ के प्रयोग से हिंदुओं को न सिर्फ दंगाई बताया गया बल्कि सारी हदों को पार कर खबर में अश्लीलता भी परोसी गई कि हिंदुओं ने ही मुस्लिम महिलाओं के सामने अपने पैंट उतारे और उनको अपना लिंग दिखाया।

‘द वायर’ द्वारा हिंदुओं को दंगे का आरोपित साबित करने के लिए ‘जय श्री राम’ का किया गया प्रयोग

खुद के झूठी रिपोर्ट की वजह से फँसने के डर से वायर ने खबर के अंत में एक लाइन में लिख दिया कि सभी नाम काल्पनिक हैं। अब हम ये भी नहीं कह सकते कि ऐसा नहीं हुआ होगा, लेकिन द वायर के साथ-साथ ऐसे लोगों की आपबीती अपने आप में संदेह पैदा करती है, जिनकी घर की छतों पर पत्थर जमा हो और पूरा समुदाय आगजनी, पेट्रोल बम और तेजाब की बोलतें फेंककर हिंदुओं पर हमला कर रहा हो।

द वायर की खबर का क्रॉस चेक करने के बाद कुछ तो आप को साफ हो ही गया होगा, लेकिन इसके बाद भी सैकड़ों सवाल खड़े होते हैं कि द वायर को कोई भी हिंदू दंगा पीड़ित क्यों नहीं मिला, क्या द वायर को ताहिर हुसैन और राजधानी स्कूल नहीं मिला, जिसे दंगाइयों ने हिदुओं को आसानी से निशाना बनाने के लिए अपना केन्द्र बनाया। या वायर को मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं पर हमले की महीनों से की जा रही तैयारी नहीं दिखी।

क्या उसे मुस्लिमों की छतों पर लगी गुलेल दिखाई नहीं दी, क्या उसे ताहिर की छत पर रखे पेट्रोल बम और वहाँ से फेंके गए ईंट-पत्थर दिखाई नहीं दिए। ये सभी वो सवाल हैं जो दंगाइयों पर नहीं बल्कि दंगाइयों को अपना अनुसांगिक संगठन के सदस्य के रूप में मानने वाले मीडिया गिरोह पर खड़े होते हैं। अब आपको यह भी बता दें कि द वायर वालों का ट्रैक रिकॉर्ड प्रोपगेंडा फैलाने में बहुत ही खराब रहा है। खासतौर पर दिल्ली दंगों की रिपोर्ट को लेकर, क्योंकि ये लोग अभी तक ताहिर या फैसल की प्रॉपर्टी को लेकर कोई लेख लिखना तो दूर ये तक नहीं बता पाए हैं कि ताहिर हुसैन की छत और मकान से क्या-क्या मिला था और हाँ दिल्ली हिंसा पर जो भी लिखा है, वहाँ उनके पक्ष में जरूर खड़े ही दिखाई दिए हैं। खैर, अब आप खुद ही तय करें कि ये हिंदू विरोधी साजिश की कड़ी कहाँ से- कहाँ तक जाती है।

JNU में फिर से लगा ‘वीर सावरकर मार्ग’ का बोर्ड: वामपंथियों ने लगा दी थी जिन्ना की तस्वीर

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में ‘विनायक दामोदर सावरकर मार्ग’ वाले बोर्ड को फिर से ठीक कर दिया गया है, जिसके साथ वामपंथियों ने आपत्तिजनक हरकतें की थी। तब तक इस मार्ग का सिर्फ़ मौख़िक रूप से विरोध होता दिख रहा था। लेकिन रात भर में ये मामला ओछी हरकतों पर पहुँच गया। पहले मालूम चला कि इस मार्ग के बैनर पर जहाँ वीर सावरकर मार्ग लिखा था, वहाँ उनका नाम छिपाकर उसके ऊपर बड़ा-बड़ा बीआर अंबेडकर लिख दिया गया और बाद में उस पर भी कालिख पोत दी गई और वहाँ सीधे जिन्ना की तस्वीर चस्पा दी गई। जिस पर मोहम्मद अली जिन्ना मार्ग लिखा था।

दरअसल, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सुबनसर हॉस्टल के नजदीक एक सड़क का नाम बदलकर वीर सावरकर मार्ग कर दिया गया था। इसे देखने के बाद जेएनयू के वामपंथी छात्र काफी नाराज हुए थे। वामपंथी छात्रों के संघ ने इस कदम को शर्मनाक कहा था। साथ ही सावरकर के नाम पर मार्ग का नाम रखे जाने की निंदा की थी।

जेएनयूसएसयू की अध्यक्ष आइशी घोष ने अपने ट्विटर हैंडल से इसकी एक तस्वीर शेयर की थी और इस तस्वीर में साफ दिखा था कि सुबनसर हॉस्टल को जाने वाली सड़क को वीडी सावरकर मार्ग नाम दिया गया है।

आइशी घोष ने इसी पर अपना गुस्सा जाहिर करते हुए लिखा था, “ये जेएनयू की विरासत के लिए शर्म की बात है कि इस आदमी का नाम इस विश्वविद्यालय में रखा गया है। सावरकर और उनके लोगों के लिए विश्वविद्यालय के पास न कभी जगह थी और न ही कभी होगी।”

आइशी द्वारा शेयर की गई तस्वीर में जिन्ना की चस्पा हुई तस्वीरें नहीं थीं। लेकिन सोशल मीडिया पर बोर्ड पर चिपकी जिन्ना वाली तस्वीरें तेजी से शेयर की जा रही थीं। यूजर्स का कहना था कि JNUSU में बैठे जिन्ना के वंशजों ने वीर दामोदर सावरकर मार्ग बोर्ड को छतिग्रस्त कर जिन्ना अली मार्ग का पोस्टर लगा दिया था। अभिव्यक्ति की आड़ में पाकिस्तान परस्ति अब खुल कर सामने आने लगी है।

ब्राह्मणों और जाटों से दूर रहेगा कोरोना? ये तस्वीर इतनी फेक है कि ‘ऑल्ट न्यूज’ ने भी फैक्टचेक नहीं किया

सोशल मीडिया पर कोरोना वायरस को लेकर तरह-तरह की अफवाहें उड़ाई जा रही हैं। इसी क्रम में फैक्ट-चेक का वायरस ‘ऑल्टन्यूज़’ जनता के लगतार अनुरोध के बाद भी उन तस्वीरों का फैक्ट-चेक नहीं कर रहा है, जो अफवाह फैला रहे हैं। ऐसी ही एक तस्वीर वायरल हुई है, जिसे आजतक न्यूज़ चैनल की ख़बर के रूप में दिखाया गया है। इसमें कहा जा रहा है कि जाटों का ख़ून इतना गर्म होता है कि उन्हें कोरोना वायरस का कोई खतरा नहीं है। इस ट्वीट के रिप्लाई में जाट की जगह ब्राह्मणों का ख़ून गर्म होने की बात कही गई और ऐसी ही तस्वीर शेयर की गई।

चूँकि ‘फॉल्ट न्यूज़’ के एक व्यक्ति ने इसके फैक्ट-चेक का बीड़ा उठाया। उसने ‘ऑल्ट न्यूज़’ से फैक्ट-चेक के लिए रिवर्स सर्च की तकनीक माँगी, ताकि ये पता लगाया जा सके ये फोटो सबसे पहले किसने शेयर किया था और इसे पहली बार कब शेयर किया गया था। हालाँकि, उक्त व्यक्ति ने ऑपइंडिया से बातचीत करते हुए बताया कि जैसे ही उसने ‘ऑल्टन्यूज़’ की रिवर्स सर्च एप्लीकेशन में इस फोटो को डाला, उसके बाद जो परिणाम आया वो चौंकाने वाला था। दरअसल, उस ऐप ने फोटो के दाहिने हिस्से को बाएँ और बाएँ किस्से को दाहिने भेज दिया था। हो गया रिसर्च।

हालाँकि, ‘फॉल्ट न्यूज़’ के एक इंटर्न ने दावा किया कि उनके संस्थान में इसी ऐप के जरिए सारे फैक्ट-चेक किए जाते हैं। साथ ही उसने यह भी बताया कि कभी-कभी ये ऐप रिवर्स सर्च के नाम पर ‘सिन्हा’ को ‘भालू’ और ‘भालू’ को ‘सिन्हा’ बना देता है। फैक्ट-चेक करने का प्रयास करने वाला व्यक्ति ऑपइंडिया से अपनी बात रखने के बाद कोमा में चला गया है क्योंकि उसे गहरा शॉक लगा है। उसने बताया कि उसने ‘एक्स्ट्रा ज़ूम’ वाली तकनीक भी ‘भालू’ से उधार में ली थी, लेकिन जैसे ही उसमें एक पत्थर की इमेज डाली, वो ज़ूम होकर पर्स बन गया।

इधर फैक्ट-चेक के नाम पर लगातार बकैती कर रहे ‘फॉल्ट न्यूज़’ के बारे में ये भी पता चला है कि कोरोना वायरस का ख़तरा बढ़ने के बाद उसे फैक्ट-चेक के लिए कोई ख़बर मिल ही नहीं रही थी। इसीलिए, 2 इंटर्न को इस बात की जिम्मेदारी दी गई वो अपना पाँच-पाँच फेक ट्विटर हैंडल बना कर एक ‘फेक न्यूज़’ को ट्वीट करें, जिसे बाद में ‘वायरल’ करार देकर उसका फैक्ट-चेक कर दिया जाएगा। अंदेशा जताया गया है कि उन्हीं इंटर्न्स में से किसी ने जाट और ब्राह्मण का ख़ून गर्म होने की बात ट्वीट कर दी। इसके बाद ‘सिन्हा’ ने अपने इंटर्न को ट्रेनिंग देने के लिए बुलाया है, जहाँ उन्हें पर्स और पत्थर में फर्क न करने की हिदायत दी जा रही है।

कथित फैक्ट-चेकर को आजकल ज्यादा मशक्कत इसीलिए करनी पड़ रही है क्योंकि पीएम मोदी लगातार लोगों को कोरोना वायरस से सावधान व सचेत रहने के तौर-तरीके बता कर उन्हें जागरूक कर रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने एक ट्वीट कर साबुन से हाथ धोने के लाभ बताए। ये ट्वीट देखते ही ‘भालू’ ने अपने एक इंटर्न को एक कोरोना वायरस खोज कर उसका बयान लाने को कहा है। बयान ये होना चाहिए कि कोरोना साबुन से नहीं डरते। अन्य ख़बरों में दावा किया गया है कि उक्त इंटर्न मीडिया की नौकरी छोड़ कर सन्यस्थ हो गया है। जाते-जाते बता दें कि ये फोटो फर्जी है, इसे ऐसे ही किसी तथाकथित फैक्ट-चेकर ने फैलाया है।

डिस्क्लेमर: ट्यूबलाइट श्रेणी के लोगों के लिए ये साफ़ किया जाता है कि ये व्यंग्य है, कटाक्ष है, इसे उसी तरह पढ़ें।

इस्लामी तीर्थयात्रा पर ईरान गए कई भारतीय नागरिक हुए कोरोना वायरस के शिकार: मीडिया रिपोर्ट्स में किया जा रहा दावा

ईरान में महजबी तीर्थयात्रा पर गए 234 भारतीय नागरिकों के कोरोना वायरस से संक्रमित होने की ख़बर आ रही है। अब उन्हें मेडिकल टेस्ट के बाद ईरान में ही रोका गया है और जब वो पूरी तरह ठीक हो जाएँगे, उसके बाद उन्हें वापस भारत लेकर आया जाएगा। बता दें कि ईरान में कोरोना वायरस के ख़तरे ने महामारी का रूप ले लिया है और वहाँ अब तक 724 लोग इससे संक्रमित होकर अपनी जान गँवा चुके हैं। वहाँ कोरोना वायरस के मरीजों की संख्या 15 हजार के पार बताई जा रही है।

मीडिया में ईरान में फँसे भारतीय नागरिकों में कोरोना वायरस से पीड़ितों की संख्या 250 के पार बताई जा रही है। ऑपइंडिया फ़िलहाल इसकी पुष्टि नहीं करता। हालाँकि, अभी तक कोई आधिकारिक आँकड़ा जारी नहीं किया गया है लेकिन शीर्ष अधिकारियों से बातचीत के आधार पर ‘आईएएनएस’ ने दावा किया है कि इस्लामिक तीर्थयात्रा पर गए भारतीय नागरिकों में अधिकतर वरिष्ठ नागरिक थे, जिन्हें इस वायरस द्वारा ज्यादा नुकसान पहुँचाए जाने की संभावना रहती है। फ़िलहाल वो सभी ईरान में ही रहेंगे, जहाँ उनका इलाज किया जाएगा। कोरोना वायरस पीड़ितों के लिए ‘इंटरनेशनल स्टैण्डर्ड प्रोटोकॉल’ के हिसाब से इन सभी को ‘क्वारंटाइन सेंटर’ में रखा जाएगा।

ईरान में अभी भी 6000 के आसपास भारतीय नागरिक फँसे हुए हैं, जो वहाँ के विभिन्न प्रांतों में रह रहे थे। इनमें से अधिकतर इस्लामी तीर्थयात्रा पर गए थे और अधिकांश लद्दाख और जम्मू कश्मीर से हैं। कई छात्र भी फँसे हुए हैं। केरल, तमिलनाडु और गुजरात के 1000 मछुआरे भी वहाँ रह रहे थे। वो वहाँ रह कर कमाई करते हैं और साथ ही इस्लामिक अध्ययन भी करते हैं। भारतीय अधिकारी लगातार उन फँसे हुए नागरिकों से मुलाक़ात कर रहे हैं। इनमें से कइयों को वापस भी लाया गया है। जिनका मेडिकल रिपोर्ट नेगेटिव आ रहे है, उन्हें तुरंत निकालने की व्यवस्था की जा रही है। भारत ने इसके लिए प्रशिक्षित मेडिकल टीम को वहाँ भेजा है।

अब तक ईरान से 389 भारतीय नागरिकों को वापस लाया जा चुका है। सोमवार (मार्च 16, 2020) को 53 भारतीय नागरिकों का चौथा जत्था ईरान से भारत पहुँचा। केंद्रीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ट्वीट कर के इस सम्बन्ध में जानकारी दी।

कोरोना से बचने के लिए अत्यधिक गोमूत्र पीकर बीमार हुए बाबा रामदेव? कट्टरपंथियों के दावे का फैक्ट-चेक

इन दिनों सोशल मीडिया पर अस्पताल में भर्ती बाबा रामदेव की एक तस्वीर को इस दावे के साथ शेयर किया जा रहा है कि अधिक मात्रा में गोमूत्र का सेवन करने के बाद योग गुरु को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। हालाँकि ऐसा कुछ भी नहीं है। यह बाबा रामदेव की पुरानी तस्वीर है, जिसे गोमूत्र का मजाक उड़ाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। ये जिहादी आतंकवादियों और इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं का मजाक उड़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला पसंदीदा हथियार है।

जो तस्वीर वायरल की जा रही है, उसमें बाबा रामदेव एक अस्पताल में डॉक्टरों से घिरे हुए दिख रहे हैं। वो काफी कमजोर दिख रहे हैं। एक ट्विटर यूजर (@rehman_5) ने फोटो शेयर करते हुए दावा किया कि बाबा रामदेव ने कोरोना वायरस से बचने के लिए गोमूत्र की प्रतिरोधक क्षमता को दिखाने के लिए अधिक मात्रा में गोमूत्र पी लिया।

इसी तरह के दावे कई अन्य यूजर्स द्वारा भी किए गए, जिनमें ‘अरेबा नूर वज़ीर’ और ‘ब्लीड ग्रीन’ नाम के यूजर्स भी शामिल हैं। ये ट्विटर पर खुदको पाकिस्तानी बताते हैं।

सच क्या है?

फोटोग्राफ का इस्तेमाल कर इंटरनेट पर रिवर्स इमेज सर्च करने पर पता चलता है कि यह तस्वीर 2011 की है, जब बाबा रामदेव की तबीयत भूख हड़ताल के बाद बिगड़ गई थी। यह तस्वीर इंडिया टुडे द्वारा जून 2011 में प्रकाशित की गई थी, जिसमें कहा गया है कि बाबा रामदेव को हरिद्वार स्थित उनके आश्रम में हालत बिगड़ने के बाद शुक्रवार को हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में भर्ती कराया गया था। वह भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दों के खिलाफ विरोध करने के लिए 9 दिनों के उपवास पर थे, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

यह तस्वीर 12 जून, 2011 को ली गई थी, जब बाबा रामदेव ने अस्पताल में दो दिन रहने के बाद अनशन तोड़ा था। उन्होंने आध्यात्मिक नेताओं की अपील पर उपवास तोड़ा था।

5 मार्च को बाबा रामदेव के आधिकारिक प्रवक्ता तिजारावाला एसके ने भ्रामक दावों को खारिज करते हुए कहा, “यह मूर्खतापूर्ण और शर्मनाक है। वह (रामदेव) पूरी तरह से स्वस्थ हैं। पिछले 2 दिनों में कई समाचार चैनलों द्वारा उनका साक्षात्कार लिया गया है। आज वह बेंगलुरु जा रहे हैं।”

इसलिए यह दावा कि बाबा रामदेव को हाल ही में अत्यधिक मात्रा में गोमूत्र का सेवन करने के बाद हॉस्पीटल में भर्ती कराया गया, झूठा है।

आध्यात्मिक नेता अक्सर फेक न्यूज के निशाने पर रहे हैं। इससे पहले, हाल ही में एक एक्टिविस्ट डॉक्टर ने किसी शख्स की गोपनीय मेडिकल रिपोर्ट को पोस्ट करते झूठा दावा किया था कि बाबा रामदेव का सहयोगी गाँजा पीता है। डॉ आनंद राय, जिन्हें मध्य प्रदेश में व्यापम घोटाले के मुखबिर के रूप में जाना जाता है, ने ये झूठा दावा करते हुए अपने वैरिफाइड आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर मेडिकल टेस्ट रिपोर्ट की कॉपी पोस्ट की थी।

डॉ राय कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के करीबी हैं, जो 2018 में कॉन्ग्रेस के टिकट पर मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते थे। उन्होंने ट्विटर पर जो मेडिकल रिपोर्ट पोस्ट की, उसमें मरीज का नाम आचार्य बालगोविंद जी बताया गया है और रिपोर्ट बताती है कि व्यक्ति का मूत्र परीक्षण THC (Tetrahydrocannabinol) पॉजीटिव है, जो गांजा का एक सक्रिय अंश है।

CAA पर केंद्र ने SC को सौंपा 129 पन्नों का जवाब, कहा- नागरिकता देना सरकार का अधिकार, कोर्ट का हस्तक्षेप है सीमित

केंद्र सरकार ने CAA की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर मंगलवार (मार्च 17, 2020) को सर्वोच्च न्यायालय में अपना जवाब दाखिल किया। केंद्र ने कुल 129 पन्नों का हलफनामा कोर्ट को सौंपा। इस हलफनामे में केंद्र ने कहा कि यह कानून किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करता और इससे संवैधानिक नैतिकता का उल्लंघन होने का कोई सवाल नहीं उठता।

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि सीएए केंद्र को मनमानी शक्तियाँ नहीं देता, बल्कि इस कानून के तहत केवल निर्देशित तरीकों से नागरिकता दी जाएगी। केंद्र द्वारा दायर हलफनामे में कहा गया कि देश की संसद ने ये कानून बनाया है। नागरिकता देना सरकार का अधिकार है और इसमें कोर्ट का हस्तक्षेप बहुत सीमित है।

सरकार ने अपने जवाब में कहा कि ये नागरिकता संशोधन कानून भारत की धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक है। सरकार ने कुछ धर्म विशेष के लोगों को भारत की नागरिकता देने का फैसला किया है, जो ऐसे देश में रहते हैं जो किसी ना किसी धर्म के आधार पर चलते है।

केंद्र ने कहा कि CAA कानून धर्म के आधार पर नागरिकता नहीं देता, बल्कि धार्मिक उत्पीड़न के आधार पर है। ये कानून गैरधर्मनिरपेक्ष देशों में रहने वाले लोगों को सुरक्षा प्रदान करता है। ये कानून भारत के किसी भी नागरिक का अधिकार नहीं छीनता।

केंद्र सराकर ने कई आरोपों का जवाब देते हुए कहा की सीएए के अलावा भी भारत की नागरिकता लेने के विकल्प खुले हुए हैं। ये कानून केवल ऐसे देश के लोगों को नागरिकता देता है, जहाँ पर अल्पसंख्यकों को ऐतिहासिक तौर पर सताया गया।

बता दें, सरकार के हलफनामे के बाद सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले में सुनवाई करेगा। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एस ए बोबडे ने कहा है कि अभी संविधान पीठ सबरीमाला के मामले की सुनवाई कर रही है। ये सुनवाई पूरी होने के बाद CAA मामले पर सुनवाई शुरू की जाएगी।

गौरतलब है कि इससे पहले 5 मार्च को नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने मुख्य न्यायाधीश एस ए बोबडे से जल्द सुनवाई की माँग की थी जिस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि वो अंतरिम राहत के लिए जल्द सुनवाई कर सकते हैं।

वहीं इस दौरान केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने अदालत को बताया था कि वह अगले दो दिनों में इस मामले में जवाब दाखिल करेंगे। उन्होंने उस समय सूचित किया था कि जवाब तैयार है वो जल्द हलफनामा दाखिल करेंगे।

बता दें, नागरिकता संशोधन अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में 140 याचिकाएँ दायर की गई हैं। जिनपर सुनवाई करते हुए 22 जनवरी को पीठ ने केंद्र सरकार से चार सप्ताह के भीतर याचिकाओं का जवाब देने को कहा था।