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कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता को भारी पड़ा प्रियंका को स्कूटी पर बैठा कर फर्राटे भरना, कटा ₹6100 का चालान

उत्तर प्रदेश में शनिवार (दिसंबर 28, 2019) को प्रियंका गाँधी का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वो एक कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता के साथ स्कूटी पर बैठ कर जाती हुई दिख रही हैं। इस दौरान लखनऊ में प्रियंका और उनके साथियों ने एक महिला पुलिसकर्मी को धक्का भी दिया। हालाँकि, बाद में कॉन्ग्रेस ने आरोप लगाया कि महिला पुलिसकर्मी अर्चना सिंह ने इन आरोपों को नकार दिया और कहा कि वो बस अपनी ड्यूटी कर रही थीं। अर्चना ने बताया कि प्रियंका का फ्लीट इंचार्ज होने के कारण वो उनके सुरक्षा काफिले में शामिल रहीं लेकिन अचानक से प्रियंका वहाँ जाने लगी, जहाँ का उनका कार्यक्रम तय नहीं था।

अब यूपी ट्रैफिक पुलिस ने उस कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता पर जुर्माना लगाया है, जो प्रियंका गाँधी को स्कूटी पर बिठा कर फर्राटे भर रहा था। सीएए विरोधी रैली में उपद्रव मचाने वाले पूर्व आईपीएस अधिकारी एसआर दारापुरी के परिजनों से मिलने के लिए प्रियंका ने यूपी पुलिस को चकमा दिया था। उस दौरान उन्होंने एक कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता के स्कूटी के पीछे बैठ कर अपनी यात्रा तय की थी। चूँकि कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता ने हेलमेट नहीं पहना हुआ था, पुलिस ने उसका 6100 रुपए का चालान काटा है।

प्रियंका गाँधी को जब पुलिस ने रोका, तो उन्होंने पैदल चलना शुरू कर दिया। एक कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता ने बताया कि प्रियंका ने लगभग 3-4 किलोमीटर पैदल चल कर पुलिस को चकमा दिया। प्रियंका गाँधी के कारण उस क्षेत्र में ट्रैफिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई और घंटों जाम लगा रहा। प्रियंका ने इसके लिए पुलिस को जिम्मेदार ठहराया। प्रियंका गाँधी ने कहा कि अगर सरकार उन्हें गिरफ़्तार करना चाहती हैं तो वो इसके लिए तैयार हैं।

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फीका ही रहा मोरहाबादी का मेला, उद्धव की तरह हेमंत सोरेन भी नहीं जमा सके कर्नाटक जैसा रंग

झारखंड में विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तो इस राज्य की सत्ता भाजपा से छिटक कर विपक्षी झामुमो-कॉन्ग्रेस-राजद गठबंधन की झोली में जाकर गिर गया। नतीजों के बाद सोशल मीडिया में भारत का वह नक्शा जमकर शेयर किया गया जो बता रहा था कि देश में भाजपा शासित राज्यों की संख्या कम हो रही है। लेकिन, रविवार (29 दिसंबर 2019) को रॉंची के मोरहाबादी मैदान में जब हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो विपक्ष वैसा रंग नहीं जमा पाया, जैसा कर्नाटक में मई 2018 में एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में दिखा था।

इसके कारण क्या हैं? क्या विपक्ष अब भी लोकसभा चुनाव की करारी शिकस्त के सदमे से उबर नहीं पाया है? क्या मोदी मैजिक के और गाढ़ा होने के डर अब विपक्ष एक मंच पर जुटने की भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है? उसे डर सता रहा है कि मंच से विपक्षी एकता का हुंकार भरने वाले क्षेत्रीय क्षत्रप मंच से उतरते ही फिर उसी तरह अपनी-अपनी राह पकड़ लेंगे जैसा उन्होंने कुमारस्वामी के शपथ लेने के बाद किया था?

जवाब तलाशने से पहले कर्नाटक के उस प्रकरण को फिर से याद करते हैं। विधानसभा चुनावों में भाजपा सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी थी। लेकिन बहुमत से थोड़ा दूर रह गई थी। एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले जनता दल (एस) और कॉन्ग्रेस ने सत्ता के लिए गठजोड़ कर लिया। ठीक वैसे ही जैसे अभी हाल में हमने महाराष्ट्र में देखा है। जनता दल (एस) के कुमारस्वामी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उन्हें शपथ लेते देखने के लिए सोनिया गॉंधी, मायावती, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, राहुल गॉंधी, शरद पवार, अरविंद केजरीवाल, सीताराम येचुरी, चंद्रबाबू नायडू, नारायणसामी, पिनरई विजयन जैसे विपक्षी खेमे के नेता जुटे। माया का हाथ पकड़े सोनिया की तस्वीर पर तो पूरा लिबरल गिरोह ही निहाल हो गया था। इस तस्वीर को दिखाकर मोदी की विदाई का दंभ भरने वालों की कमी न थी।

लेकिन, आम चुनावों के नतीजों ने साबित किया कि ऐसे जमावड़ों से मोदी मैजिक और गहरा हो जाता है। यही कारण है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तो रॉंची पहुॅंच गईं, लेकिन सोनिया और मायावती ​नजर नहीं आईं। सोनिया को शपथ ग्रहण में शामिल होने का न्योता खुद हेमंत सोरेन 10 जनपथ आकर दे गए थे। इसी तरह दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल भी नहीं दिखे। उनके प्रतिनिधि के तौर राज्यसभा के सांसद संजय सिंह दिखे। वापमंथी खेमे से न माकपा महासचिव येचुरी थे और न केरल के सीएम विजयन। भाकपा के डीराजा जरूर दिखे। लालू यादव रॉंची के ही जेल में बंद हैं। हेमंत के साथ राजद के एकमात्र विधायक को भी शपथ लेनी थी तो राजद नेता और बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को आना ही था और वे आए भी। साथ में शरद यादव भी थे। दक्षिण की भागीदारी के नाम पर डीएमके नेता स्टालिन की मौजूदगी दिखी जो कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण में नहीं आए थे।

विपक्षी नेताओं के जुटान का हेमंत का प्रयास उद्धव ठाकरे के शपथ ग्रहण से भी फीका हो जाता यदि कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी नहीं आते। उनके साथ कॉन्ग्रेस शासित दो राज्यों राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल भी थे। उल्लेखनीय है कि उद्धव के शपथ ग्रहण में राहुल गॉंधी नहीं पहुॅंचे थे।

मोरहाबादी मैदान में चंद्रबाबू नायडू का न होना तो समझ में आता है। जब कुमारस्वामी ने शपथ लिया था उस वक्त वे एनडीए से बाहर निकल आए थे। विपक्ष को एक कुनबे की बॉंधने की कोशिश में थे। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। अब उनकी राजनीतिक हैसियत ही वह नहीं रही कि वे विपक्षी एकता का दंभ भर सकें। लेकिन, महाराष्ट्र में भाजपा को सत्ता से दूर रखकर विपक्ष की आँखों के तारे बने कथित किंगमेकर शरद पवार भी झारखंड के जमावड़े से दूर ही रहे।

लेकिन सबसे ज्यादा चौंकाने वाली गैर मौजूदगी थी कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गॉंधी की। वे उद्धव के शपथ ग्रहण में भी नहीं पहुॅंची थीं। उस समय उन्हें न्योता देने के लिए उद्धव ठाकरे ने अपने विधायक बेटे आदित्य ठाकरे को 10 जनपथ भेजा था। बावजूद इसके उनके मुंबई नहीं पहुॅंचने के कारणों को समझना मुश्किल नहीं था। असल में कॉन्ग्रेस और शिवसेना विचारधारा के स्तर पर दो विपरीत ध्रुव पर खड़े थे। ऐसे में वहॉं सोनिया का न होना असहज करने वाले मुश्किल सवालों को टालने की रणनीति हो सकती है।

लेकिन, झारखंड में उनके साथ ऐसी दुविधा न थी। हेमंत सोरेन की पार्टी झामुमो के साथ कॉन्ग्रेस पहले भी मिलकर चुनाव लड़ चुकी है। दोनों दल केंद्र और राज्य की सरकार में साथ भी रहे हैं। हेमंत सोरेन के पिता शिबू सोरेन तो मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में मंत्री भी हुआ करते थे। इतना ही नहीं इस बार के विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस ने झारखंड में 16 सीटें जीती है। अलग राज्य बनने के बाद से हुए विधानसभा चुनावों में उसका यह अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन है।

बावजूद इसके सोनिया का नहीं पहुॅंचना बताता है कि कर्नाटक के अनुभव और आम चुनावों के नतीजे उन्हें विपक्षी एकता का संदेश देने से रोक रहे हैं। वे जानती हैं कि ऐसी एक और कोशिश मोदी के रंग को और गहरा कर देगा। मतदाताओं को उनके साथ और मजबूती से खड़ा करेगा। अगले कुछ महीनों में दिल्ली में भी विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में केजरीवाल के साथ मंच साझा करना दिल्ली में दोनों दलों को असहज कर सकता था। बंगाल में भी टीएमसी, वाम दलों और कॉन्ग्रेस के एक साथ आने की सूरत नहीं दिख रही।

लेकिन, इस फीके रंग ने भी भाजपा को तंज कसने का मौका दे दिया है। शपथ ग्रहण के बाद बिहार के स्वास्थ्य मंत्री और बीजेपी नेता मंगल पांडे ने ट्वीट किया, “झारखंड में हुए आज शपथ ग्रहण समारोह में पूरब से चिटफंड पहुॅंचा था तो दक्षिण से 2G। वही उत्तर से चारा घोटाला तो मध्य से नेशनल हेराल्ड। रही-सही कसर मुख्यमंत्री जी के पिता जी के कोयला घोटाला ने पूरी कर दी।”

यानी, मंच पर विपक्ष का रंग भले न जम पाया हो भाजपा को बैठे-बिठाए एक मुद्दा जरूर मिल गया है, जिसका शोर बिहार के विधानसभा चुनावों में भी अगले साल सुनाई पड़ सकता है।

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धर्मान्तरण कराने पहुँचा था ईसाई मिशनरी, बौद्ध भिक्षु ने मारा ज़ोरदार थप्पड़, वीडियो वायरल

दुनिया भर में ईसाई मिशनरियों द्वारा दूसरे धर्म के लोगों का धर्मान्तरण कराए जाने की बातें सामने आती रहती हैं। ख़ासकर ऐसे लोगों को ज़्यादा निशाना बनाया जाता है, जो आर्थिक रूप से पिछड़े इलाक़ों में रहते हैं या फिर मुख्यधारा से दूर हैं। तरह-तरह के प्रलोभन देकर और ईसाई मजहब को सबसे श्रेष्ठ बता कर ऐसी करतूतों को अंजाम दिया जाता है। ऐसे ही एक मिशनरी को एक बौद्ध भिक्षु ने करारा सबक सिखाया। श्रीलंका के पूर्वी क्षेत्र में स्थित बट्टीकलोआ में बौद्ध भिक्षु सुमनरत्ना थेरो ने एक ईसाई मिशनरी को खींच कर चाटा मारा।

ईसाई मिशनरी भोले-भाले लोगों को प्रलोभन दे रहा था और अपने मजहब की श्रेष्ठता का बखान कर रहा था। तभी वहाँ पहुँचे बौद्ध भिक्षु सुमनरत्ना ने उसे ऐसा चाटा मारा कि उसका चश्मा ज़मीन पर जा गिरा और वो व्यक्ति कुछ क़दम पीछे जा खड़ा हुआ। इस घटना के समय वहाँ कई अन्य बौद्ध भिक्षु और स्थानीय लोग भी उपस्थित थे। नीचे संलग्न किए गए वीडियो में आप देख सकते हैं:

इसके बाद बौद्ध भिक्षु ने वहाँ के पुलिस अधिकारियों की भी क्लास लगाई। सुमनरत्ना थेरो ने पुलिसकर्मियों को जम कर फटकारा और पूछा कि वो अपने क्षेत्रों में ईसाई धर्मान्तरण को रोकने में विफल क्यों साबित हो रहे हैं? सुमनरत्ना ने एक अन्य क्रिस्चियन मिशनरी को उसकी बाइक रोक कर उसे फटकार लगाई। कई लिबरल लोगों ने जहाँ इस घटना को लेकर कहा कि अगर ग़लत हो रहा था तो क़ानून को कार्रवाई करनी चाहिए थी, वहीं आम लोगों ने बौद्ध भिक्षु की सराहना की।

‘कोलोंबो टेलीग्राफ’ के अनुसार, श्रीलंका में राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे के सत्ता में आने के बाद से ही क्रिस्चियन मिशनरियों व इस्लामिक कट्टरपंथियों के ख़िलाफ़ लोग आवाज़ उठा रहे हैं। श्रीलंका की सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि ये सिंहला प्रभुत्व वाली सरकार है और तमिलों को उनका हक़ नहीं मिल रहा। हाल ही में भारत दौरे पर आए राष्ट्रपति राजपक्षे ने ऐसे किसी भेदभाव से इनकार किया था। लेकिन, इस्लामिक आतंकवाद और कटवारपंथ को लेकर उन्होंने कड़े तेवर दिखाए थे।

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शिव मंदिर में फेंके प्रतिबंधित मांस के टुकड़े, बीफ के कारण पहले भी इस इलाके में हुआ था बवाल

झारखण्ड के धनबाद और जामताड़ा जिले की सीमा पर स्थित करमदाहा में रविवार (दिसंबर 29, 2019) को सुबह हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएँ भड़काने के लिए मंदिर के पास प्रतिबंधित माँस का टुकड़ा फेंका गया। ये घटना दुखिया महादेव मंदिर के समीप हुई। पुलिस ने कहा है कि ये कुछ शरारती तत्वों की करतूत है। इस मामले में अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज की गई है। मंदिर में मांस की खबर सुन आक्रोशित स्थानीय लोगों ने क़रीब 6 घंटे तक सड़क को जाम रखा। पुलिस ने समझा-बुझा कर स्थिति को शांत कराया।

इस सम्बन्ध में ऑपइंडिया ने दैनिक जागरण के स्थानीय पत्रकार प्रमोद चौधरी से बातचीत की, जिन्होंने बताया कि मुस्लिम-बहुल आबादी के कारण यह इलाक़ा पहले से ही संवेदनशील रहा है। चौधरी ने बताया कि यहाँ हिन्दू-मुस्लिम तनाव का पुराना इतिहास रहा है। स्थानीय लोगों और पुलिस में इस घटना के कारण झड़प भी हुई। जब पुलिस ने दोषियों की तुरंत गिरफ़्तारी का आश्वासन दिया, तब जाकर लोग शांत हुए। ऑपइंडिया ने एसडीपीओ अरविन्द उपाध्याय से भी कॉन्टैक्ट करने की कोशिश की लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी।

आक्रोशित लोगों ने दोषियों की त्वरित गिरफ़्तारी की माँग की

ये घटना जहाँ पर हुई, वो इलाक़ा अक्सर सुनसान रहता है। उक्त मंदिर बराकर नदी के घाट पर स्थित है। गोविंदपुर से साहिबगंज जाने वाली सड़क इसी आसपास से होकर गुजरती है, जिसे आक्रोशित लोगों ने 6 घंटे तक जाम रखा। जामताड़ा के विधायक व कॉन्ग्रेस नेता इरफ़ान अंसारी ने इस घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा:

“जामताड़ा की जनता ने मुझे प्रचंड बहुमत से जिताया है। मैं भरोसा दिलाता हूँ कि दोषियों को नहीं बख्शा जाएगा। जिन्होंने आग लगाई है, वो भी जेल जाएँगे। जिन्होंने मंदिर में मांस का टुकड़ा फेंका है, उन्हें भी पकड़ कर जेल भेजा जाएगा। मैं यहाँ चकमाबाजी और धोखाधड़ी नहीं चलने दूँगा। दहशतगर्द जल्द ही पुलिस के शिकंजे में होंगे। आप मेरे पर भरोसा रखिए।”

स्थानीय कॉन्ग्रेस विधायक इरफ़ान अंसारी का बयान

बता दें कि ये वही इलाक़ा है, जहाँ एक वर्ष पूर्व मिन्हाज अंसारी नामक व्यक्ति ने बीफ की फोटो शेयर की था। बाद में पुलिस की हिरासत में उसकी मौत हो गई थी, जिसके बाद काफ़ी बवाल हुआ था। 22 वर्षीय मिन्हाज ने कटी हुई गाय का फोटो व्हाट्सप्प पर शेयर किया था और साथ में भड़काऊ बयानों को भी आगे बढ़ाया था। बाद में उसके परिजनों ने आरोप लगाया था कि उसे पुलिस ने प्रताड़ित किया और फिर मार डाला। पुलिस के अनुसार, कस्टडी में ही उसकी हालत बिगड़ गई, जिसके बाद उसे रिम्स में भर्ती कराया गया था। वहाँ उसकी मौत हो गई थी।

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‘पैगंबर मुहम्मद ने 19 महिलाओं से निक़ाह क्यों किया?’ – सवाल पूछने पर मुस्लिम लड़की को सरेआम फाँसी की माँग

पाकिस्तान की अनीला एहसान ने पैगंबर मुहम्मद पर सवाल उठाकर वहाँ के कट्टरपंथियों को बैठे-बिठाए एक मुद्दा दे दिया। अब उन्हें इस्लामिक क़ानून के अनुसार, मज़हब के ख़िलाफ़ ‘ईशनिंदा’ के आरोप का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, पाकिस्तानी यूज़र्स ट्विटर पर उनकी गिरफ़्तारी और फाँसी की माँग करते हुए हैशटैग ट्रेंड करा रहे हैं।

अनीला ने ट्वीट के ज़रिए पैगंबर मुहम्मद की निक़ाह से संबंधित सवाल उठाया और पूछा था कि उन्होंने (पैगंबर) खदीजा के अलावा 18 महिलाओं से निक़ाह क्यों किया था? इसी सवाल के जवाब में, पाकिस्तानियों ने अपने ट्वीट में अपने प्रधानमंत्री इमरान खान को टैग करते हुए अनीला को सार्वजनिक तौर पर फाँसी देने की माँग की।

हालाँकि, कुछ लोग चाहते हैं कि उन्हें ट्रायल के बाद मौत के घाट उतारा जाए। किसी भी इस्लामिक राज्य में ईशनिंदा की सज़ा मौत होती है। साथ ही नबी के अपमान को निन्दा के सबसे ख़राब रूपों में से एक माना जाता है।

कुछ लोग कह रहे हैं कि अनीला अपने ट्वीट्स के कारण ‘इस्लाम-विरोधी और चरमपंथी’ प्रतीत हो रही हैं। वे चाहते हैं कि अधिकारी इस बात की जाँच करें कि वह इस तरह के चरमपंथी एजेंडे पर काम क्यों कर रही हैं?

अन्य लोगों ने अनीला पर “नफ़रत फैलाने” का आरोप लगाया और कहा कि वे अलीना के कुछ ही ट्वीट्स पढ़ सके उससे अधिक वो नहीं पढ़ सकते थे क्योंकि उन ट्वीट्स में “खुले तौर पर ईशनिन्दा” की गई है।

पाकिस्तान में ईशनिन्दा के लिए एक बड़ी सज़ा है, यहाँ तक ​​कि इसके लिए फाँसी की सज़ा भी हो सकती है। इतना ही नहीं जो लोग ईशनिंदा करने वालों का समर्थन करते देखे जाते हैं, उनके जीवन पर भी ख़तरा मँडराने लगता है। पाकिस्तान में ईशनिंदा क़ानूनों से छुटकारा पाना असंभव है और अधिकारी ईशनिंदा को बहुत गंभीरता से लेते हैं क्योंकि ऐसा करने में विफल होने से क़ानून-व्यवस्था पर संकट आ सकता है। यदि अधिकारियों ने कोई कार्रवाई नहीं की, तो मौलाना वर्ग एक उन्मादी भीड़ को इकट्ठा कर उत्पात मचाएगा। इस तरह की उन्मादी भीड़ सैन्य पकड़ को अस्थिर करने की पूरी क्षमता रखती है।

इस बात को भी याद रखना होगा कि पाकिस्तान में ईशनिंदा क़ानूनों को खत्म करने के पैरवी करने वाले सलमान तासीर की हत्या की गई थी। इतना ही नहीं हत्यारे को पाकिस्तानी समाज ने नायक के रूप में सम्मानित भी किया था।

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‘अगस्त में बच्चे मरते ही हैं’ और ‘बच्चों की मौत कोई नई बात नहीं’ के बीच मीडिया की नंगी सच्चाई

प्रदेश के हर अस्पताल में प्रत्येक दिन 3-4 मौतें होती हैं। यह कोई नई बात नहीं है। इस साल पिछले 6 सालों के मुकाबले सबसे कम मौतें हुई हैं। मेरे पास इसके आँकड़े हैं। इस साल केवल 900 मौतें हुई हैं। एक भी बच्चे की मौत दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन इससे पहले तक़रीबन 1400 और 1500 मौतें भी हुई हैं। 900 भी क्यों हुई हैं, वह भी नहीं होनी चाहिए। मैंने जाँच कराई है। एक्शन भी लिया है। अपनी सरकार के पिछले टर्म में भी मैंने अस्पतालों के ऑपरेशन थिएटर को लंबे अंतराल के बाद अपग्रेड कराया था।

ये बयान है उस व्यक्ति था, जिस पर देश के सबसे बड़े राज्य का दारोमदार है। अशोक गहलोत कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं, जो तीसरी बार राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में काम कर रहे हैं। अब तक वो 11 साल इस कुर्सी पर बीता चुके हैं। और उनके पास अपने पिछले (2008-13) या उससे भी पिछले (1998-03) कार्यकाल की उपलब्धियों को गिनाने के नाम पर यही है कि उन्होंने ऑपरेशन थिएटरों को अपग्रेड कराया है। अशोक गहलोत के लिए 900 बच्चों की जान जाना कोई ‘नई बात’ नहीं है। इसके पीछे उनका तर्क ये है कि पहले इससे भी ज़्यादा मौतें हुई हैं।

अगर इससे पहले भी ज़्यादा मौतें हुई हैं तो क्या इसके लिए अशोक गहलोत ज़िम्मेदार नहीं है, जो इससे पहले मुख्यमंत्री के रूप में 2 बार अपना कार्यकाल पूरा कर चुके हैं? राज्य में बसपा विधायक दल को 2 बार पूरा का पूरा तोड़ देने वाले गहलोत राजनीति में सिद्धहस्त माने जाते हैं लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में उनका ये बयान बताता है कि वो एक प्रशासक के रूप में विफल रहे हैं। ये वही गहलोत हैं, जो बिहार के मुजफ्फरपुर में इंसेफ्लाइटिस से बच्चों की मौत पर दुःख जता रहे थे। दुःख जताना अच्छी बात है लेकिन किसी घटना से न सीखना और उस पर राजनीति करना सही नहीं है। आज यही गहलोत दूसरों पर अफवाह फैलाने का आरोप मढ़ रहे हैं।

दरअसल, मामला राजस्थान के कोटा में 1 महीने में 77 बच्चों की मौत का है। शुक्रवार (दिसंबर 27, 2019) तक सिर्फ़ एक सप्ताह में 12 बच्चों की जानें जा चुकी थीं। जेके लोन हॉस्पिटल ने बताया है कि इस साल बच्चों की मौत का आँकड़ा 940 है। अस्पताल प्रशासन कह रहा है कि ये असामान्य घटना है जबकि राज्य के मुख्यमंत्री कहते हैं कि नई बात नहीं है। जब मामला हाथ से बाहर हो गया, तब राज्य के गृह सचिव को वस्तुस्थिति का जायजा लेने भेजा गया। कोटा के सांसद और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी राज्य सरकार को इस मामले में संवेदनशीलता से कार्य करने की सलाह दी है।

मुख्यमंत्री का बयान संवेदनहीन है क्योंकि राजस्थान के गृह सचिव वैभव गालरिया ने प्रारंभिक जाँच में पाया है कि हॉस्पिटल के सिस्टम में, इंफ्रास्ट्रक्चर में काफ़ी गड़बड़ियाँ हैं। हॉस्पिटल के नवजात शिशु वाले आईसीयू में ऑक्सीजन सप्लाई सही नहीं है। संक्रमण से बचने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है और ज़रूरी दवाओं का अभाव है। साफ़ ज़ाहिर होता है कि मुख्यमंत्री अपनी सरकार की विफलताओं पर पर्दा डालने के लिए ऐसे बयान दे रहे हैं। अफ़सोस ये कि मुजफ्फरपुर की तरह (जहाँ सत्ताधीशों से ज़्यादा डॉक्टरों से सवाल-जवाब किया गया) यहाँ सवाल पूछने के लिए मीडिया का आभाव है।

2017 में यूपी में भी कुछ ऐसा हुआ था। तब राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने कहा था कि हर साल अगस्त में बच्चों के मरने की संख्या बढ़ जाती है। इसे रोकने का जिम्मा किसके पास होता है? सरकार के पास। अगर सिर्फ आँकड़ों की ही बात की जाए तो भाजपा नेता और गहलोत, दोनों के बयान सच हैं, लेकिन संवेदनशीलता की कसौटी पर ये बयान निष्ठुर और संवेदनहीन ही कहे जाएँगे। ऐसा नहीं है कि उन बच्चों का मरना जरूरी है, बल्कि सरकारों का काम है मृत्यु दर घटाना।

सारी बात यह है कि मीडिया के लिए हमेशा की तरह मुद्दा ‘बच्चों की मौत’ की जगह, ‘भाजपा सरकार में बच्चों की मौत’ और ‘भाजपा नेता का संवेदनहीन बयान’ है। इसी सेलेक्टिव आउटरेज का कारण है कि जब एक राज्य में ऐसी घटना होती है तो दूसरा राज्य उससे सीखने की चेष्टा नहीं करता बल्कि सोचता है कि जब ‘होगा तो देखा जाएगा’।

मेनस्ट्रीम मीडिया और कथित संवेदनशील बुद्धिजीवी तथा लिबरल गिरोह जो किसी माँ के हाथ में बच्चे की नाक में लगी ऑक्सीजन पाइप वाली तस्वीर दिखा कर संवेदना दिखा रहा था, आज वो चुप हैं क्योंकि कॉन्ग्रेस के सरकार में बच्चों का इस संख्या में मरना जायज है। इस देश के मीडिया की दुर्गति यही है कि जब तक ‘भाजपा’ वाला धनिया का पत्ता न छिड़का गया हो, इन्हें न तो दलित की मौत पर कुछ कहना है, न बड़ी संख्या में नवजात शिशुओं की मृत्यु पर इन्हें वो ज़ायक़ा मिल पाता है।

कुल मिला कर ये लोग भाजपा सरकारों में नकारात्मक खबरों के लिए प्रार्थना करते हैं, जबकि गैर-भाजपा सरकार में बंगाल जले, मध्य प्रदेश में लोन माफी या बेरोजगारी भत्ता न मिले, राजस्थान में बच्चे मरें, नौकरियों पर सवाल हों, ये बस चुप रहते हैं। जिस तरह मुजफ्फरपुर और गोरखपुर में बच्चों की मौत को लेकर मीडिया रिपोर्टिंग हुई, उसी तरह कोटा मामले में भी होनी चाहिए। चाहे वो योगी सरकार हो, नीतीश सरकार हो या गहलोत की, इतनी बड़ी संख्या में अगर बच्चों की मौत को मीडिया भाजपा और गैर-भाजपा के चश्मे से देखता है तो यह एक भयावह ट्रेंड है।

जहाँ तक मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की बात है, उनका ट्विटर हैंडल चेक करने पर आपको उत्तर प्रदेश में सीएए के ख़िलाफ़ आगजनी और हिंसा करने वालों की बातें दिखेंगी। उनके बचाव में योगी की आलोचना है। योगी को क्या करना चाहिए था, ऐसे कुछ सलाह हैं। प्रियंका गाँधी के साथ यूपी में दुर्वव्यवहार किए जाने का आरोप है। उस पर तो पूरा का पूरा बयान है, वीडियो के माध्यम से। बच्चों की मौत के बीच गहलोत झारखण्ड भी पहुँचे, जहाँ उन्होंने हेमंत सोरेन के शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लिया। बच्चों की मौत को लेकर भी उनके बयान हैं ट्विटर हैंडल पर, जरा गौर कीजिए:

“हम स्वास्थ्य के क्षेत्र में राजस्थान को सिरमौर बनाने के लिए लगे हुए हैं”

48 घंटों में 10, एक महीने में 77 बच्चों की मौत: राजस्थान के डॉ कह रहे – सब मौतें सामान्य, अस्पताल की लापरवाही नहीं

RSS की किस शाखा में जाते हो? राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार ने कर्मचारियों से पूछा

सर्वे रिपोर्ट: मोदी-राज में एक साल में 10% घटी रिश्वतखोरी, बिहार-राजस्थान टॉप पर

प्रियंका गाँधी के सामने जिस लेडी अफसर से हुई धक्का-मुक्की, सुबह ही हुई थी उनके भाई की मौत

पिछले दिनों हमने देखा था कि कैसे मीडिया गिरोह ने सुलेमान को हीरो बनाने की कोशिश की थी। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में यूपी के बिजनौर में हुई हिंसा के दौरान वह मारा गया था। सुलेमान को हीरो बनाने के लिए बताया गया कि वह यूपीएससी की तैयारी करता था। सरकारी अधिकारी बनने के सपने देखा करता था। इसकी आड़ में यह सच्चाई छिपाने की कोशिश की गई कि सुलेमान देशी कट्टा लेकर हिंसा करने पहुॅंचा था। उसने कांस्टेबल मोहित के पेट में गोली मारी थी। आत्मरक्षा में मोहित ने गोली चलाई जिससे सुलेमान मारा गया। सुलेमान को हीरो बनाने की कोशिश करने वालों ने न मोहित की सुध लेने की कोशिश की और न उसके परिवार वालों का हाल जाना। शायद इसलिए क्योंकि मोहित हिंदू था। वह ऐसे प्रदेश की पुलिस सेवा में था जहॉं भाजपा की सरकार है।

इसी तरह शनिवार 28 दिसंबर 2019 को जब कॉन्ग्रेस की महासचिव प्रियंका गॉंधी ने अपनी लखनऊ यात्रा को सुर्खियों में लाने के लिए एक महिला अधिकारी पर गला दबाने का आरोप मढ़ दिया तो मीडिया गिरोह अचानक से सक्रिय हो गया। योगी की पुलिस पर अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटने का आरोप लगाया। लेकिन, अपने दावे के समर्थन में प्रियंका कोई सबूत नहीं पेश कर पाई। यहॉं तक कि कॉन्ग्रेस ने जो वीडियो शेयर किया उसमें भी प्रियंका के साथ खड़े लोग ही महिला अधिकारी के साथ धक्का-मुक्की करते नजर आए। बाद में प्रियंका गॉंधी भी गला दबाने की बात से पलट गई।

महि​ला अधिकारी ने बताया कि कैसे प्रियंका पहले से तय रास्ते को छोड़कर दूसरे मार्ग से निकलने लगी तो अपनी ड्यूटी निभाते हुए उन्होंने उन्हें रोक कर इस संबंध में बात की। कॉन्ग्रेस ने जो वीडियो शेयर किया है उसमें भी यही दिख रहा है। इस महिला अधिकारी का नाम डॉ. अर्चना सिंह है। उन्होंने बताया, “इन आरोपों में कोई सच्चाई नहीं है। मैं उनकी (प्रियंका गाँधी) फ्लीट इंचार्ज थी। उनके साथ किसी ने भी अभद्रता नहीं की। मैंने सिर्फ अपनी ड्यूटी की। इस घटना के दौरान मेरे साथ धक्का-मुक्की की गई थी।” इस घटना को लेकर उन्होंने वरीय अधिकारियों को जो रिपोर्ट भेजी उसे आप नीचे पढ़ सकते हैं।

मूल रूप से बस्ती की रहने वाली डॉ. सिंह मॉडर्न कंट्रोल रूम में सीओ हैं। वे 2008 बैच की पीपीएस अधिकारी हैं। पीपीएस के लिए उनका चयन पहले ही प्रयास में हो गया था। उनके पति प्रमोद सिंह प्रोफेसर हैं। एक बेटा और एक बेटी है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार जिस दिन डॉ. सिंह की तैनाती प्रियंका गॉंधी के फ्लीट में की गई थी उसी दिन सुबह उनके भाई की मौत हुई थी। वह छुट्टी चाहती थीं। नहीं मिलीं। लेकिन, टूटी नहीं और अपनी ड्यूटी निभाने निकल पड़ीं।

दैनिक जागरण के लखनऊ संस्करण में प्रकाशित खबर

बताया जाता है कि डॉ. सिंह के चचेरे भाई को पीलिया हो गया था। इसके कारण उनके शरीर में संक्रमण हो गया। दिल्ली के एक अस्पताल में वे कई दिनों से जिंदगी और मौत से लड़ रहे थे। शनिवार सुबह उनकी मौत की खबर आई। लेकिन, वीवीआईपी ड्यूटी की वजह से डॉ. सिंह को छुट्टी नहीं मिली। इसके बाद अपनी भावनाओं को परे रखकर वे यह सुनिश्चित करने में जुट गईं कि प्रियंका गॉंधी की सुरक्षा में कोई सेंध न लगे। लेकिन, तब उन्होंने शायद सोचा भी नहीं होगा कि ऐसा करते वक्त एक वीवीआईपी उन पर एक घटिया आरोप लगा देगा और उसके साथ चल रहे लोग उनसे ही बदतमीजी पर उतर आएँगे। खाकी का यह एक ऐसा पक्ष है जिसे शायद ही CAA विरोध के नाम पर हिंसा को उकसाने वाले कॉन्ग्रेसी कभी समझ पाएँगे!

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‘…जो पाकिस्‍तान के समर्थन में नारे लगा रहे थे, उनके लिए था मेरठ SP का बयान, यह ग़लत नहीं’

उत्तर प्रदेश में मेरठ ज़िले के एसपी सिटी अखिलेश नारायण सिंह का वायरल वीडियो अभी भी विवाद का कारण बना हुआ है। इस मुद्दे पर सिंह ने स्पष्टीकरण भी दिया था कि CAA के ख़िलाफ़ हुए विरोध-प्रदर्शन में उन्होंने पाकिस्तान के पक्ष में नारे लगाने वाले उपद्रवियों को वहाँ से भगाया था, वहीं एडीजी प्रशांत कुमार ने भी कहा था कि पुलिसकर्मियों की तरफ़ से किसी भी तरह की गोलीबारी नहीं की गई थी, बावजूद इसके एसपी का वीडियो चर्चा का विषय बना हुआ है।

इस मामले पर यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने कहा, “उन्‍होंने (एसपी ने) सभी मुस्लिमों के बारे में यह नहीं कहा था। जो लोग पत्‍थरबाजी के दौरान पाकिस्‍तान के समर्थन में नारे लगा रहे थे, उन्‍हें कहा था। जो लोग इस तरह की गतिविधि में शामिल हैं, उनके लिए एसपी सिटी का बयान ग़लत नहीं है।”

इससे पहले, एडीजी प्रशांत कुमार ने बताया था कि वायरल हुआ वीडियो बीते 20 दिसंबर को मेरठ शहर में हुए उपद्रव के बाद का है। उन्होंने बताया कि इसमें तथ्य यह है कि वहाँ भारत-विरोधी और दुश्मन देश (पाकिस्तान) ज़िंदाबाद के नारे लगाए जा रहे थे और कुछ लोग पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI) और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया (SDPI) के आपत्त्तिजनक पर्चे बाँट रहे थे। उन्होंने उक्त युवाओं के ख़िलाफ़ देशद्रोह की धाराओं के तहत मामला दर्ज करने की बात भी कही थी।

इस बीच राज्य सरकार के प्रवक्ता शलभ मणि त्रिपाठी ने मेरठ के पुलिस अधीक्षक (नगर) अखिलेश नारायण सिंह के वायरल हुए व‍ीडियो की प्रशंसा की। उन्होंने ट्वीट किया, “सैल्यूट है मेरठ के सिटी एसपी अखिलेश नारायण सिंह को, पाकिस्तान ज़िंदाबाद और भारत मुर्दाबाद के नारे लगा रहे उपद्रवियों को करारा जवाब देने के लिए। अब कुछ तथाकथित प्रबुद्धों को अफ़सोस है कि भारत मुर्दाबाद और पाकिस्तान ज़िंदाबाद बोलने वाले गद्दारों को पाकिस्तान जाने को क्यों कहा।”

दरअसल, सोशल मीडिया पर 20 दिसंबर का एक वीडियो वायरल हो रहा है। इसमें एडीएम सिटी अजय तिवारी और एसपी सिटी अखिलेश नारायण सिंह हिंसा के दौरान गली के अंदर भाग रहे कुछ उपद्रवियों से कहा था कि जहाँ जाओगे, चले जाओ। हम ठीक कर देंगे। काली पट्टी बांधकर विरोध जता रहे हो, खाओगे यहाँ और गाओगे वहाँ का। एसपी का ये बयान वायरल होने के बाद मेरठ पुलिस ने दावा किया कि कुछ उपद्रवियों ने काली पट्टी बाँधकर पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाए थे।

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जामिया की इस्लामी कट्टरपंथी आयशा पर टूट पड़े वामपंथी: CM विजयन पर आरोप लगाते ही घेर लिया और…

जामिया मिलिया इस्लामिया की इस्लामी कट्टरपंथी छात्रा आयशा रेना अपने साथियों की रिहाई की माँग लिए केरल पहुँच गई हैं। केरल में वामपंथी नेताओं ने आयशा का कड़ा विरोध किया। बता दें कि जामिया हिंसा के कारण गिरफ़्तार किए गए उपद्रवियों की रिहाई के लिए आयशा लगातार विरोध प्रदर्शन में लगी हुई हैं। उनकी माँग है कि भीम आर्मी के चंद्रशेखर उर्फ़ रावण को जेल से रिहा किया जाए। लेकिन, जगह-जगह घूम-घूम कर विरोध प्रदर्शन करने वाली आयशा को अपनी ही दवा का स्वाद तब चखना पड़ा, जब केरल में सीपीएम के कार्यकर्ताओं ने उनका ही विरोध किया।

दरअसल, आयशा ने केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन पर गंभीर आरोप लगाए थे। आतंकी याकूब मेमन की समर्थक आयशा ने केरल के मलप्पुरम में प्रदर्शनकारियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि वो देश में अल्पसंख्यक राजनीति को उभरते हुए देखना चाहती हैं। उन्होंने अल्पसंख्यक राजनीति का अर्थ समझाते हुए बताया कि इसका आशय ‘मुस्लिम-बहुजन पॉलिटिक्स’ से है। उन्होंने माँग करते हुए कहा कि भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद को तुरंत रिहा किया जाए।

इस दौरान आयशा ने मुख्यमंत्री विजयन को लपेटे में लेते हुए कहा कि पिछले 2 हफ़्तों में केरल की सीपीएम सरकार ने बड़ी संख्या में जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया है। उन्होंने केरल पुलिस पर भी आरोप लगाया। आयशा ने कहा कि वो इन सभी छात्रों को रिहा किए जाने की माँग करती हैं। आयशा के इस बयान से भड़के सीपीएम कार्यकर्ताओं ने विरोध में नारेबाजी की और माफ़ी माँगने को कहा। सीपीएम कार्यकर्ताओं ने आयशा को घेर कर नारेबाजी की।

बता दें कि आयशा और लदीदा वही युवतियाँ हैं, जिन्हें जामिया हिंसा के दौरान पोस्टर गर्ल बना कर उभारने की कोशिश की गई थी। बरखा दत्त सहित कई पत्रकारों ने उन दोनों को हाइलाइट किया था। इसके लिए पूरा का पूरा ड्रामा रचा गया था, जिसमें एक उपद्रवी को बसाने के लिए दोनों युवतियों ने पुलिस से झड़प की थी। पूरी घटना को हाई क्वालिटी के कैमरे से शूट किया गया था।

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कॉन्ग्रेस व विपक्ष की दंगाइयों, घुसपैठियों के साथ खड़े होने की क्या मजबूरी है?

— जो कानून पीड़ितों को नागरिकता देने के लिए बनाया गया है, उसे कॉन्ग्रेस व उसके सहयोगी दल नागरिकता छीनने का भय दिखाकर देश की जनता को गुमराह कर रहे हैं। आखिर इतना बड़ा झूठ और प्रपंच किस लिए?
— सीएए, एनआरसी और एनपीआर का घालमेल कर और झूठी कपोल-कल्पित तस्वीर दिखाकर समुदाय विशेष के लोगों को भड़काने और प्रायोजित हिंसा, प्रदर्शन, तोड़फोड़, आगजनी, गोलीबारी को शह देने की घटनाएँ राजनीति के लिए देशहित ताक पर रखने की कॉन्ग्रेस की पुरानी प्रवृत्ति

विपक्ष के दुष्प्रचार, अफवाह और दिग्भ्रमित करने वाली राजनीति तथा जनता पर पड़ने वाले इसके दुष्प्रभावों की बानगी देखनी हो तो नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएए), राष्ट्रीय जनसंख्या पंजिका (एनपीआर)और राष्ट्रीय नागरिक पंजिका (एनआरसी) पर गुरिल्ला शैली की नकारात्मक राजनीति में देखी जा सकती है। सर्वविदित है कि नागरिकता संशोधन कानून पर जिस तरह विपक्षी दलों की बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में धार्मिक आधार पर सताए गए हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनों, पारसियों व ईसाइयों को नागरिकता देकर मानवता को बचाने के लिए लाया गया है। सीएए का धर्म से कुछ लेना देना नहीं है और न ही यह किसी की नागरिकता छीनता है। यह कानून पीड़ितों को नागरिकता देने के लिए है।

इन तीनों देशों में लाखों की संख्या में हिंदुओं का नरसंहार, हत्या, बलात्कार, जबरन धर्मांतरण, बहू-बेटियों को उठा ले जाने की घटनाएँ हुई हैं, हो रही हैं। मई 2014 में पाकिस्तान के प्रमुख समाचार पत्र डाउन (dawn.com) ने वहाँ की नेशनल असेम्बली द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर छापा था कि प्रति वर्ष 5000 हिन्दू अपनी जान बचाने के लिए भारत में जाकर शरण ले रहे हैं। अभी दो दिन पहले ही पाकिस्तान के क्रिकेटर शोएब अख्तर ने कहा है कि उनके देश में हिन्दू, सिखों के साथ किस तरह अत्याचार होता है। पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के प्रमुख खिलाड़ी रहे हिन्दू समुदाय के दानिश कनेरिया तक को अत्याचार सहना पड़ा। पाकिस्तानी खिलाड़ी दानिश कनेरिया को अछूत मानते हुए उनके साथ खाना तक नहीं खाते थे। कल्पना कीजिए कि इन देशों के साधारण हिन्दू के साथ कितना अमानवीय बर्ताव होता होगा।

लेकिन जिस प्रकार से कॉन्ग्रेस की अगुवाई में विपक्षी दलों द्वारा सीएए, एनआरसी और एनपीआर का घालमेल और झूठी कपोल-कल्पित तस्वीर दिखाकर समुदाय विशेष के लोगों को भड़काने का षड्यंत्र हुआ और देश के विभिन्न हिस्सों में विपक्षी दलों की शह पर प्रायोजित हिंसा, प्रदर्शन, तोड़फोड़, आगजनी, गोलीबारी हुई, वह सत्ता के लिए राजनीति के अपराधीकरण और वोटबैंक की राजनीति के लिए देशहित ताक पर रखने की कॉन्ग्रेस की पुरानी प्रवृत्ति को दर्शाती है।

ऐसी विध्वंसात्मक राजनीति करने वाली कॉन्ग्रेस, सपा, बसपा, राजद आदि विपक्षी दलों से प्रश्न है कि क्यों उन्हें उन करोड़ों हिन्दुओं की पीड़ा नहीं दिखती, जिन बेचारों के पास न तो आजीविका है और न ही शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएँ। आखिर ये दल वोट और तुष्टिकरण की राजनीति के लिए भारतीय संविधान की निर्देशिका, भारतीय संस्कृति के मूल्यों एवं महात्मा गाँधी की इच्छा के विरुद्ध क्यों हैं? गाँधी जी ने 26 सितंबर 1947 को प्रार्थना सभा में कहा था, ”पाकिस्तान के जो हिन्दू और सिख वहाँ नहीं रहना चाहते, भारत आना चाहते हैं, उनकी आजीविका, नागरिकता और सुविधाओं की व्यवस्था करना भारत सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।”

देश का विभाजन कराने वाली कॉन्ग्रेस फिर से देश को बाँटना चाहती है। कॉन्ग्रेस का चरित्र साम्प्रदायिक मुस्लिम लीग की तरह हो गया है। कॉन्ग्रेस और उसके पिछलग्गू दल उन अवैध बांग्लादेशी मुस्लिम और रोहिंग्याओं के साथ खड़े हैं, जो न केवल भारत के लोगों का अधिकार व संसाधन छीन रहे हैं, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं, जबकि यही विपक्षी दल पीड़ित हिंदू शरणार्थियों का विरोध कर रहे हैं। कॉन्ग्रेस वोट के लिए अवैध बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों के खतरे को पालती पोसती आई है, देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बने रोहिंग्याओं को भारत में बसाने के लिए कॉन्ग्रेस और विपक्ष के नेता सुप्रीम कोर्ट तक गुहार लगाने चले जाते हैं। क्या कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगी दलों के पास इस बात का जवाब है कि अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश तीनों इस्लामी देशों में एनआरसी पहले से लागू है तो वे भारत में एनआरसी का विरोध करके क्या करना चाहते हैं, क्या कॉन्ग्रेस व विपक्षी दल यह मानते हैं कि उन्हें भारत को धर्मशाला बनाकर राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ करने की छूट मिलनी चाहिए।

पिछले 70 सालों में भारत सरकार और संसद के अनेक ऐसे उदाहरण हैं, जिनसे पता चलता है कि सीएए जैसा कदम भाजपा सरकार से पहले पूर्ववर्ती सरकारों में भी उठाए जा चुके हैं। पहली बार जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमन्त्रित्व काल में कैबिनेट ने असम इमिग्रेंट्स निष्कासन की स्वीकृति देकर घुसपैठियों को असम से निकालने का निर्णय लिया था। फिर उच्चतम न्यायालय के आदेश पर असम में एनआरसी प्रक्रिया कॉन्ग्रेस की यूपीए सरकार के समय ही शुरू हुई, लेकिन जैसा कि कॉन्ग्रेस की अटकाने, लटकाने और भटकाने की आदत है तो उसने ये काम भी ठीक से नहीं किए, ताकि घुसपैठियों को वोटर बनाकर सत्ता में बने रहें। कॉन्ग्रेस का उद्देश्य एक परिवार की सत्ता है, भले ही इसके लिए देश में आग लगाना पड़े, देश को खतरे में डालना पड़े या फिर नागरिकों की सुरक्षा से समझौता करना पड़े।

पूरे देश ने देखा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा राफेल सौदे को पारदर्शी व देश की सुरक्षा के लिए आवश्यक बताने के बावजूद किस तरह राहुल गाँधी और अन्य विपक्षी दलों ने बारबार और लगातार झूठ बोला। राहुल गाँधी को अपने इस झूठ के लिए सुप्रीम कोर्ट में लिखित माफी माँगनी पड़ी। हालाँकि कॉन्ग्रेस तब भी बाज नहीं आती और सुप्रीम कोर्ट सहित देश की संवैधानिक संस्थाओं पर अनर्गल आरोप लगाकर उनकी साख खत्म करने का प्रयास करती है।

इसी प्रकार 2003 में अटल जी की राजग सरकार द्वारा एनपीआर को नोटिफाई किए जाने के बाद 2010 में कॉन्ग्रेस की यूपीए सरकार ने एनपीआर बनवाया था। इसलिए कॉन्ग्रेस को बताना चाहिए कि किस हक़ से मोदी सरकार की नीयत और इरादों पर सवाल उठा रही है? अपने ही कार्यों पर आँख मूंदकर सीएए, एनआरसी और एनपीआर पर सवाल उठाने, वर्ग विशेष में निराधार भय फैलाकर उपद्रव, अराजकता पैदा करने पर कॉन्ग्रेस की नीयत सही कैसे? राज्यसभा में कॉन्ग्रेस के उपनेता आनन्द शर्मा ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी जी को दंगाइयों से संवेदना रखनी चाहिए। आखिर कॉन्ग्रेस की ये कौन सी नीयत व इरादे हैं, जो उन्हें देश विरोधी तत्वों, दंगाइयों, घुसपैठियों के साथ खड़ा होने को मजबूर करती है? ये नकारात्मकता कॉन्ग्रेस और विपक्ष को भारी पड़ेगी क्योंकि सूचना क्रांति और सोशल मीडिया के इस दौर में जनता सत्य और तथ्य दोनों ही जानती है और नीर—क्षीर विवेकी भी है।

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