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CAA पर नेहरू का हवाला कॉन्ग्रेस को नहीं आया रास, केरल के गवर्नर को न्योता देकर कहा- अब मत आना

ऐसा लगता है कि बात-बात में नेहरू की कसमें खाने वाले कॉन्ग्रेसियों को अब देश के पहले प्रधानमंत्री का नाम सुनना भी अच्छा नहीं लग रहा है। केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का समर्थन करते हुए बीते दिनों कहा था कि इसके जरिए मोदी सरकार ने महात्मा गॉंधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस द्वारा किए गए वादे को पूरा किया है। अब खबर आ रही है कि कॉन्ग्रेस ने खान से उस कार्यक्रम में नहीं आने को कहा है, जिसमें शामिल होने के लिए कुछ दिन पहले ही उसने गवर्नर को न्योता दिया था।

इसकी जानकारी खुद गवर्नर खान ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल के जरिए दी है। ट्विटर पर एक पत्र शेयर करते हुए उन्होंने लिखा है कि 23 दिसंबर को केरल के पूर्व मुख्यमंत्री एवं कॉन्ग्रेस नेता रहे करुणाकरण के स्मारक उद्घाटन में शामिल होने के लिए विपक्षी दल के नेता रमेश चेन्निथला ने उन्हें आमंत्रित किया था। लेकिन कार्यक्रम से ठीक पहले उनके दफ्तर में फोन करके आग्रह किया गया कि वे इस कार्यक्रम में शामिल न हों।

इस पत्र में राज्यपाल को कार्यक्रम में आने के लिए सहमति देने पर कॉन्ग्रेस नेता ने धन्यवाद भी दिया है। बाद में अनिश्चित कारणों (UNEXPECTED DEVELOPMENT) का हवाला दे कहा गया कि राज्यपाल का इस समारोह में होना सही नहीं रहेगा। इसमें कहा गया है कि विपक्ष के नेता को भी लगता है कि यह बेहतर रहेगा कि आप इस कार्यक्रम में न शामिल हों।

गौरतलब है कि कार्यक्रम में शामिल न होने के लिए विपक्षी दल के नेताओं द्वारा राज्यपाल को ये पत्र उसी दिन भेजा गया, जिस दिन कार्यक्रम की तारीख और समय निर्धारित था। इसका मतलब है कि आमंत्रण रद्द करने का फैसला आखिरी क्षणों में किया गया।

हालाँकि, गवर्नर को भेजे गए पत्र में ‘अनिश्चित कारणों’ (UNEXPECTED DEVELOPMENT) के बारे में खुलकर नहीं बताया गया। लेकिन इस बात का अंदाजा सरल ही लगाया जा सकता है कि एक ओर कॉन्ग्रेस नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ मार्च कर रही हैं और दूसरी ओर तीन दिन पहले ही आरिफ मोहम्मद खान ने इसके समर्थन में अपनी राय रखी है। साफ है कि कॉन्ग्रेस पार्टी नहीं चाहती थी कि कोई भी ऐसा व्यक्ति कार्यक्रम में सम्मलित हो जो सीएए के पक्ष में राय रखे।

कॉन्ग्रेस के पूर्व नेता और वर्तमान में केरल के राज्यपाल ने तीन दिन पहले नागरिकता संशोधन अधिनियम पर सरकार का खुलकर पक्ष लिया था। उन्होंने कहा था कि मोदी सरकार ने महात्मा गाँधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और कॉन्ग्रेस द्वारा किया गया वो वादा पूरा किया है जो उन्होंने पाकिस्तान में प्रताड़ित किए गए लोगों से किए थे। उन्होंने कहा कि इस अधिनियम की नींव साल 1985 और 2003 में रख दी गई थी। सरकार ने इस अधिनियम को केवल कानूनी रूप दिया है। 

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सऊदी अरब में यौन उत्पीड़न के सवाल पर सोनम कपूर का ‘पाखंड’ आया सामने

सऊदी अरब के रियाद में होने वाले MDL Beast Festival में भाग लेने के लिए एक ‘प्रभावशाली’ हस्ती के रूप में सोनम कपूर भी वहाँ मौजूद थीं। लेकिन वहाँ मौजूद महिलाओं के यौन उत्पीड़न की बात सामने आने पर माहौल में थोड़ी कड़वाहट आ गई। जिसके बाद इस उत्सव में भाग लेने और इसे बढ़ावा देने के लिए जिन हस्तियों को आमंत्रित किया गया था उन्हें कई निगेटिव कमेंट से लेकर जनता का आक्रोश झेलना पड़ा।

फैशन और संस्कृति कमेंट्री इंस्टाग्राम अकाउंट Diet_Prada ने सार्वजनिक रूप से बॉलीवुड की सोनम कपूर समेत कई हस्तियों से उनके पाखंड के लिए सवाल किया।

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What’s worse than an all white @revolve influencer trip? Cashing big fat checks in exchange for #content creation (aka propaganda) to rehabilitate the image of Saudi Arabia, a country said to be causing “the world’s worst humanitarian crisis”, according to the United Nations. According to anonymous sources, six-figure sums were offered for attendance and geo-tagged posts. ⠀⠀⠀⠀⠀⠀⠀⠀⠀ Following the government’s pre-meditated murder of journalist Jamal Kashoggi in October 2018 , the arrest of women’s rights activist Loujain al-Hathloul in May 2018, the outing of a gay Saudi journalist and his partner who began receiving death threats from their families (homosexuality is a crime in Saudi Arabia and punishable by death), and countless other human rights abuses, a bevy of supermodels, influencers, celebrities, and musicians convened in Riyadh for the inaugural @mdlbeast . According to @hypebeast , the electronic music festival is “one of the most significant musical events the region has ever seen”. ⠀⠀⠀⠀⠀⠀⠀⠀⠀ Saudi Arabia has been spending billions to change its image in the west, but this is sure to be the most expensive campaign yet. In a series of Instagram stories posted by transgender model @teddy_quinlivan , it was revealed that fellow model @emrata had turned down the trip, evidently aware of the country’s human rights crisis. “It is very important to me to make clear my support for the rights of women, the LGBTQ community, freedom of expression and the right to a free press. I hope coming forward on this brings more attention to the injustices happening there”, said Ratajkowski in a statement to Diet Prada. ⠀⠀⠀⠀⠀⠀⠀⠀⠀ Unfortunately, not all shared the same sentiments. There are simply too many attendees to name. Dieters, feel free to tag any attendees you know of… just in case they haven’t been reading the news. • #propoganda #jamalkashoggi #humanrights #humanrightsabuse #lgbtq #lgbtqrights #freespeech #journalism #independent #womensrights #mdlbeast #edm #electronicmusic #supermodel #influencer #content #riyadh #emrata #emilyratajkowski #teddyquinlivan #model #celebrity #dj #electronicmusic #musicfestival #wtf #smh #government #corruption #dietprada

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Diet_Prada ने कहा, “मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामले में सऊदी अरब की छवि सबसे ख़राब है जिसे फिर से क़ायम करने के लिए इन मशहूर हस्तियों को कंटेट क्रिएशन (एक तरह का प्रोपेगेंडा) के बदले में बड़ी मोटी रक़म का भुगतान किया गया था, खासतौर से मानवाधिकार के मामले में, लेकिन इसके बावजूद भी इस कॉन्सर्ट में उपस्थित महिलाओं ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए।”

उस कॉन्सर्ट में उपस्थित महिलाओं में से एक ने यह भी कहा कि हिजाब में भी लड़कियों को कैसे परेशान किया गया था। वहीं, बॉलीवुड की स्टारकास्ट सोनम कपूर, जिनकी एक्टिंग स्किल भी उनके पाखंड का ही यह एक नमूना है, उन्होंने महिलाओं के उत्पीड़न के मुद्दे को खारिज कर करते हुए कहा कि ये सब गलत है बल्कि वहाँ मेरा सम्मान “एक हिन्दू ब्राउन अभिनेत्री” के रूप में हुआ था।


Sonam Kapoor’s tone-deaf response to sexual harassment concerns at Saudi Arabia’s MDL Beast festival

सोनम कपूर इस बात को बड़ी आसानी से भूल गईं कि अगर वो ‘ब्राउन हिन्दू अभिनेत्री’ हैं, तब भी वह एक अभिनेत्री ही थीं। भले ही वो एक इस्लामी देश में अल्पसंख्यक के तौर पर मौजूद थीं, लेकिन वो वहाँ आयोजकों द्वारा आमंत्रित की गई सेलिब्रिटी थीं। Diet_Prada ने अपने पोस्टों में सोनम कपूर के कई और पाखंड की भी आलोचना की।


Diet Prada calls out Sonam Kapoor’s hypocrisy.

Diet_Prada ने सोनम कपूर से सऊदी अरब जैसे मानवाधिकारों के उल्लंघनकर्ता देश को बढ़ावा देने पर भी सवाल उठाया है। एक ऐसा देश जहाँ समलैंगिकता पर मृत्युदंड की सजा है, जबकि वो ख़ुद एलजीबीटी समुदाय की मुखर समर्थक हैं। तो ऐसे में एक ऐसे देश का समर्थन करना जो समलैंगिकों को मृत्युदंड की सजा देता हो उनका एक और पाखंड ही है। सोनम कपूर पर कटाक्ष करते हुए, Diet_Prada ने कहा कि जो पैसा उन्हें मानवाधिकार के उल्लंघनकर्ता देश से उन्हें उसकी छवि चमकाने के लिए प्राप्त हुआ। उन्हें वो पैसा LGBTQ समूहों दान में दे देना चाहिए।

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अनुराग कश्यप ने फिर फैलाया झूठ: नरेंद्र मोदी के शब्दों को बताया हिटलर की पंक्ति, पर्दाफाश

नागरिकता संशोधन कानून के नाम पर देश भर में आगजनी और पत्थरबाजी की घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है। विरोध के नाम पर दंगे भड़काए जा रहे हैं। तरह-तरह से प्रधानमंत्री की छवि को धूमिल करने की कोशिश की जा रही है। इसी कड़ी में अनुराग कश्यप ने एक बार फिर अपना नया प्रोपगेंडा फैलाने का प्रयास किया है।

दरअसल, रविवार को रामलीला मैदान में भाषण देते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने विरोध प्रदर्शन के नाम पर जान-माल को नुकसान पहुँचा रहे लोगों से कहा था- “मुझसे नफरत करनी है करो, लेकिन भारत से नफरत मत करो।”

हालाँकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ये शब्द परिस्थितियों के अनुसार एकदम सटीक थे। लेकिन अनुराग कश्यप ने इसे जर्मनी, नाजी, हिटलर से जोड़कर अपने ट्विटर पर शेयर किया। साथ ही ये दिखाने का प्रयास किया कि प्रधानमंत्री के शब्द और हिटलर के शब्दों में खासा फर्क नहीं हैं। क्योंकि प्रधानमंत्री ने ये पंक्ति हिटलर के भाषण से ही ली है।

अपनी बात को साबित करने के लिए अनुराग ने अपने ट्वीट पर हिटलर की एक वीडियो शेयर की। जिसमें लिखे टेक्ट के मुताबिक वो जर्मनी के लोगों से कहता नजर आ रहा है, “मुझे मालूम है मुझे कौन नफरत कर रहा है। तुम चाहते हो तो मुझे नफरत करो, लेकिन जर्मनी से नफरत मत करो।”

अब, ये वीडियो अनुराग कश्यप ने क्यों शेयर की और किस उद्देश्य से शेयर की…ये बिलकुल स्पष्ट था। लेकिन सवाल ये था कि जिस वीडियो को टेक्ट सहित उन्होंने शेयर किया, उसका मतलब जर्मनी में वही है या एक बार फिर प्रोपगेंडा फैलाने का तरीका है।

अब चूँकि भाषण जर्मन में था, इसलिए हमारे लिए उसका मतलब समझना थोड़ा कठिन था। लेकिन जर्मन लेखक मारिया वर्थ के लिए नहीं। जिनकी जड़ें भारत से जुड़ी हैं और पिछले 3 दशकों से वो भारत में हैं।

मारिया ने फौरन अनुराग के इस ट्वीट का जवाब दिया और स्पष्ट किया कि जो अनुवाद वीडियो में टेक्स्ट के माध्यम से दिखाया जा रहा है, वो न केवल बिलकुल गलत है, बल्कि पूरे मुद्दे से बिलकुल अलग है। उन्होंने साफ किया कि इस वीडियो का उन शब्दों से कोई लेना देना नहीं है जिन्हें नरेंद्र मोदी ने रैली में इस्तेमाल किए। बल्कि इसमें तो हिटलर लोगों के बीच जाकर उनकी बार-बार मदद करने की बात कह रहे हैं।

इसके अलावा ऑपइंडिया से बातचीत में भी मारिया ने इस बात की पुष्टि की कि अनुराग कश्यप द्वारा शेयर की गई वीडियो में अनुवाद बिलकुल गलत हैं और उसका उन शब्दों से कोई वास्ता नहीं है जिन्हें प्रधानमंत्री ने कहा।

मारिया से बात करने के बाद ऑपइंडिया ने इसपर थोड़ी रिसर्च की। हालाँकि थोड़ा मुश्किल हुआ कि आखिर ये स्पीच की क्लिप अनुराग ने ली कहाँ से है। लेकिन, काफी कोशिशों के बाद हमें वो वेबसाइट मिली। जिसपर हिटलर की ये स्पीच, तारीख और जगह के साथ मौजूद थी। जहाँ नोट के साथ लिखा था कि हिटलर अपने कार्यकर्ताओं और अधिकारियों के साथ जर्मनी के बर्लिन में रैली कर रहे हैं।

वेबसाइट पर दावा किया गया कि स्पीच हिटलर ने 5 अक्टूबर 1937 को दी। इसलिए इसके बाद हमने इसका अंग्रजी अनुवाद खोजा और मारिया वर्थ से इसके बारे में पूछा।

1937 में हिटलर द्वारा दी स्पीच का अनुवाद

साथ ही कई अनुवाद भी खोजे। हमने हिटलर की न केवल 1936-37 में दिए गए भाषणों को चेक किया। बल्कि 1922-45 तक के सभी भाषणों को देखा। लेकिन ‘हेट-मी’ शब्द का प्रयोग सिर्फ़ एक बार किया पाया। जाहिर है वो भी बिलकुल अलग संदर्भ में।

आखिरकार स्पष्ट हुआ कि अनुराग कश्यप द्वारा शेयर की गई वीडियो का मतलब वो बिलकुल नहीं था, जो उन्होंने लोगों को बताने की कोशिश की।

खैर ये पहली बार नहीं था, जब अनुराग कश्यप और उनके जैसे लिबरल किस्म के लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी की छवि को धूमिल करने के लिए ऐसे घटिया प्रयोग किए और उनका पर्दाफाश हुआ। इससे पहले भी कई बार वे कई उदाहरणों के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिटलर से जोड़कर और भारत की वर्तमान स्थिति को जर्मनी के हालातों से जोड़कर दिखाते रहे हैं।

नोट: यह लेख इंग्लिश में किए गए विस्तृत फैक्ट चेक का संक्षिप्त सारांश है।

झारखंड में नोटा से भी पीछे रही आम आदमी पार्टी: अधिकांश उम्मीदवारों की जमानत जब्त

झारखंड विधानसभा चुनावों की मतगणना के सोमवार शाम 6:40 बजे तक मिले रुझानों के अनुसार आम आदमी पार्टी की राज्य में स्थिति नोटा से भी ख़राब रही। नतीजे देखकर साफ पता चल गया कि आप के उम्मीदवार एक बार फिर अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए।

उल्लेखनीय है कि राज्य में पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ने वाली आम आदमी पार्टी के वोट शेयर NOTA से कम है। चुनाव आयोग की वेबसाइट के मुताबिक शाम 6:40 बजे तक की गिनती के मुताबिक आम आदमी पार्टी को सिर्फ 33637 वोट मिले हैं जबकि NOTA के तहत 189792 वोट पड़ चुके है। हालँकि, बता दें ‘आप’ ने इन चुनावों में केवल 26 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था।

वोट शेयर

गौरतलब है कि इससे पहले साल 2018 में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में तीसरी शक्ति बनने का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी को करारी हाल मिली थी। इस बार की तरह ही आप के अधिकतर प्रत्याशी तब भी अपनी जमानत नहीं बचा पाए थे। इसके अलावा तीनों राज्यों में तब भी आम आदमी का वोट शेयर झारखंड की तरह ही नोटा से भी कम था।

बता दें झारखंड के इन विधानसभा चुनावों में नोटा से हारने वाली 14 पार्टियाँ हैं। इनमें से आम आदमी पार्टी को 0.23 फीसदी, तृणमूल कॉन्ग्रेस को 0.30 फीसदी, बीएलएसपी को 0.01 फीसदी, भाकपा को 0.45 फीसदी, माकपा को 0.34 फीसदी, आइयूएमएल को 0.02 फीसदी, जेडीएस को 0.01 फीसदी, जदयू को 0.79 फीसदी, लोजपा को 0.26 फीसदी, एनसीपी को 0.45 फीसदी और एनपीइपी को 0.01 फीसदी वोट मिले। सभी 14 दलों को संयुक्त रूप से 5.29 फीसदी वोट मिले। जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआइ) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआइ एम) और ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक (एआइएफबी) मिलकर एक फीसदी वोट भी नहीं पा सकी। वामदलों से बेहतर प्रदर्शन तो असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने किया। जिसे 1 फीसद से ज्यादा वोट मिले और उससे भी बेहतर बसपा ने जिसे 1.38 फीसदी वोट मिले। लेकिन सभी पार्टियाँ मिलकर भी नोटा से आगे नहीं निकल पाईं, क्योंकि 1.43 फीसदी मतदाताओं ने नोटा (NOTA) का विकल्प चुना।

दरियागंज हिंसा: कोर्ट ने खारिज की 15 आरोपितों की बेल याचिका, भेजा 14 दिन की न्यायिक हिरासत में

नागरिकता संशोधन एक्ट के खिलाफ दिल्ली के दरियागंज में प्रदर्शन के नाम पर हुई हिंसा और आगजनी करने के आरोप में गिरफ्तार किए गए 15 आरोपितों को दिल्ली पुलिस ने आज (दिसंबर 23, 2019) तीस हजारी कोर्ट में पेश किया। जहाँ इनकी बेल याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया। साथ ही अदालत ने सभी 15 आरोपितों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। इसके अलावा कोर्ट ने कहा कि आरोपितों के वकील बेल को लेकर सेशंस कोर्ट में भी अपील कर सकते हैं।

मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट कपिल कुमार ने जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि आरोपितों को राहत देने के लिए उनके पास पर्याप्त आधार नहीं है। जिसके कारण उन्हें बेल नहीं दी जा सकती है।

वहीं, कोर्ट में आरोपितों की गिरफ्तारी का कारण पूछने पर पुलिस ने बताया कि आरोपितों ने उस दिन पथराव किया। जिससे पुलिस उपायुक्त सहित कई लोग घायल हो गए। साथ ही कहा गया कि अगर वे इन लोगों को गिरफ्तार नहीं करते तो ये सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचा सकते थे। पुलिस के अनुसार अभी इनके अलावा अन्य कुछ और लोगों को भी वीडियो के जरिए पहचाना जा रहा है।

गौरतलब है कि शुक्रवार को नागरिकता संशोधन एक्ट के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन में हिंसा भड़कने के बाद प्रदर्शनकारियों ने गाड़ियों में आग लगा दी थी, साथ ही पुलिस पर पत्थरबाजी भी की थी। पुलिस ने इन्हीं आरोपों में 15 आरोपितों को गिरफ्तार किया था। साथ ही कुछ नाबालिगों को पुलिस द्वारा हिरासत में भी लिया गया था। लेकिन बाद में पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया।

बता दें दिल्ली के कई इलाकों में नागरिकता संशोधन एक्ट के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुआ है, लेकिन जामिया नगर, सीलमपुर, दरियागंज कुछ ऐसे इलाके हैं जहाँ इन्हें लेकर पत्थरबाजी और हिंसा दोनों की खबरें आईं।

नागरिकता (संशोधन) कानून की आवश्यकता क्यों?

नागरिकता संशोधन विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित होने बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से एक कानून बन गया है। अब पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के धार्मिक प्रताड़ित अल्पसंख्यक भारतीय नागरिकता हासिल कर सकते है। हालाँकि, यह सुविधा कानूनी तौर पर पहले से ही मौजूद थी लेकिन उसमें अड़चने अधिक थीं। अब वर्तमान केंद्र सरकार ने उन्हें नागरिकता देने की प्रक्रिया को सरल बना दिया है। इस कानून की जरूरत पिछले कई सालों से महसूस की जा रही थी। यह एक मानवाधिकार संबंधी मामला था। विश्व भर के नेता और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ भी इन तीन देशों में गैर-मुस्लिमों के उत्पीड़न पर चिंता व्यक्त कर चुकी हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश विभाग ने 2007 में अफगानिस्तान पर इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसमें वहाँ के अल्पसंख्यक लोगों के लगातार विस्थापन पर चर्चा की गई थी। रिपोर्ट के अनुसार, “यहाँ मुश्किल से 3,000 हिन्दू और सिख रहते हैं। कुछ सालों पहले तक हिन्दू, सिख, यहूदी, और ईसाई धर्मों के लोग यहाँ बसे हुए थे, लेकिन तालिबान शासन और गृह युद्ध के बाद अधिकतर लोग पलायन कर चुके है। अब इनकी कुल जनसंख्या में हिस्सेदारी एक प्रतिशत से भी कम है। सालों के संघर्ष में लगभग 50,000 हिंदू और सिख लोग शरण के लिए दूसरे देशों में विस्थापित हो गए हैं।”

‘द टेलीग्राफ’ के अनुसार अफगानिस्तान विश्व का सबसे असहिष्णु देश है। अखबार ने इस सूची में पाकिस्तान को अठारहवें स्थान पर रखा है। बांग्लादेश में भी गैर-मुस्लिमों का जीवन दूभर हो चुका है। इन देशों में अल्पसंख्यकों की जमीनों पर जबरन कब्जा, हमला, अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन, मंदिर तोड़ना, बलात्कार और हत्या एवं नरसंहार जैसी घटनाएँ सामने आती रहती हैं। इसका कारण सरकारों का अलोकतांत्रिक रवैया और न्यायिक प्रक्रिया का कमजोर होना है। पाकिस्तान में कई सालों तक तानाशाही रही जबकि अफगानिस्तान ने लोकतंत्र देखा ही नही है। दूसरा, इन देशों के संविधान से भी कई बार छेड़खानी हो चुकी है, जिसे कट्टर धार्मिक आकार दिया गया है। इसलिए इन देशों की पूरी व्यवस्था को धर्मतंत्र ने जकड़ लिया है।

पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश आधिकारिक तौर पर इस्लामिक देश है। यहाँ राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्राध्यक्ष का मुस्लिम होना जरूरी है। सभी अधिकारियों को इस्लाम के नियमों पर आधारित शपथ की बाध्यता है। राजनैतिक दल चरमपंथी उलेमाओं की सलाह के बिना एक कदम नही उठा सकते अथवा उनके खिलाफ नही जा सकते। अमेरिका के एक अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थान पीआरसी ने 39 इस्लामिक देशों में एक सर्वेक्षण किया था। उन्होंने मुस्लिमों से पूछा कि क्या वे अपने देश को शरियत कानून के अनुसार चलाना चाहते है? जवाब में अफगानिस्तान के सभी लोगों (99 प्रतिशत), पाकिस्तान के 84 प्रतिशत और बांग्लादेश में 82 प्रतिशत लोगों ने माना कि उनके यहाँ आधिकारिक कानून शरियत ही होना चाहिए।

एक अन्य सर्वेक्षण में जब पीआरसी ने सवाल किया कि ISIS के बारे में मुस्लिमों का क्या सोचना है? इसके नतीजे भी चौकाने वाले थे। अधिकतर देशों ने हिंसा को जायज बताया जिसमें सबसे ज्यादा संख्या अफगानिस्तान में 39% थी। बांग्लादेश में ऐसे लोग 26 प्रतिशत और पाकिस्तान लगभग 13% थे। ISIS एक आतंकवादी संगठन है जोकि गैर-मुस्लिमों के खिलाफ क्रूर हिंसा के लिए बदनाम है। यह आँकडें बताते है कि इन देशों में गैर-मुस्लिमों का बहिष्कार किया जाता है, जिसे राजनैतिक समर्थन हासिल है।

ग्लोबल ह्यूमन राइट्स डिफेंस एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है जोकि मानवाधिकारों के लिए कार्य करती है। इस संस्था ने 22 सितम्बर, 2018 को सयुंक्त राष्ट्र संघ के जिनेवा स्थित मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन किया। जिसका उद्देश्य पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के उत्पीड़न पर अंतरराष्ट्रीय जागरूकता पैदा करनी थी। सैकड़ों शांतिपूर्ण लोगों ने इस प्रदर्शन में हिस्सा लिया था। उन्होंने जोर दिया कि संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ और दूसरी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को पाकिस्तान के धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर ध्यान देने की तत्काल आवश्यकता है।

अमेरिका की कॉन्ग्रेस के समक्ष भी यह मुद्दा कई बार उठाया जा चुका है। पिछले साल यानि 25 जुलाई, 2018 को कैलिफोर्निया से डेमोक्रेटिक सदस्य, एडम शिफ ने सदन में अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा, “मैं पाकिस्तान के सिंध प्रांत में मानवाधिकारों के हनन पर सदन का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। सालों से, सिंध में राजनैतिक कार्यकर्ताओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों को प्रतिदिन जबरन धर्म परिवर्तन, सुरक्षा बलों द्वारा अपहरण और हत्या के खतरों का सामना करना पड़ता है।”

हवाई से अमेरिकी संसद की सदस्य और वहाँ राष्ट्रपति उम्मीदवार की दौड़ में शामिल, तुलसी गबार्ड भी 21 अप्रैल, 2016 को बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति का खुलासा कर चुकी है। उन्होंने सदन में कहा, “दुर्भाग्य से, बांग्लादेश में नास्तिक, धर्म निरपेक्षतावादियों, हिन्दू, बौद्ध, और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव और घातक हिंसा नियमित घटनाएँ हो चुकी हैं।”

पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न दशकों से हो रहा है। इसलिए, यह लोग भारत में शरण लेने को मजबूर हो गए। पाकिस्तान के सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबार ‘द डॉन’ ने 20 मार्च, 2015 को एक खबर के अनुसार, “पिछले साल पाकिस्तान में हिंदू लड़कियों से जबरन धर्म परिवर्तन के 265 मामले सामने आए थे, और भारतीय दूतावास के पास विस्थापन के करीब 3,000 आवेदन लंबित है।

यह आँकड़ा आधिकारिक है लेकिन वास्तविक विस्थापितों की संख्या लाखों में है। एक सच्चाई यह भी है कि इन पीड़ितों को दुनिया के किसी भी देश में आश्रय नहीं मिल सकता, क्योंकि उन देशों के अपने कानूनी प्रतिबंध है। उनकी एकमात्र उम्मीद भारत से है क्योंकि इन तीन देशों के साथ हमारे ऐतिहासिक सांस्कृतिक और सामाजिक संबंध रहे है। इसलिए, यह भारत की नैतिक जिम्मेदारी है कि इन विस्थापितों को सम्मान और गर्व के साथ जीवन जीने का अधिकार मिले, जिसके यह लोग हकदार हैं।

‘अगर पाकिस्तान के मुस्लिम भारत आकर रहेंगे, तो विभाजन का क्या मतलब, पूरे को हिन्दुस्तान घोषित कर दो’

नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ हो रहे देशभर में हिंसात्मक विरोध-प्रदर्शन जारी हैं। इस दौरान ऐसे कई और वीडियो और ख़बरे सामने आईं हैं जहाँ पुलिस पर हमलावर हुई उग्र भीड़ ने तेज़ाब और पेट्रोल बम से हमले किए तो कहीं, सार्वजनिक सम्पति को इस क़दर क्षति पहुँचाई कि यूपी के मुख्यमंत्री को यह कहना पड़ा कि सभी सार्वजनिक क्षति की भरपाई दंगाइयों की सम्पत्ति की कुर्की करके की जाएगी।

इसी बीच एक ऐसा वीडियो भी वायरल हो रहा है जिसमें एक बुज़ुर्ग भारतीय मुस्लिम कह रहे हैं कि अगर पाकिस्तान के मुस्लिम भारतीय नागरिक बन जाएँगे तो फिर विभाजन का क्या मतलब रह जाएगा। उन्होंने तल्ख़ अंदाज़ में कहा, “पाकिस्तान से जब मुस्लिम ही यहाँ आकर बसने लगेंगे, तो उनको रहने के लिए पाकिस्तान क्यों दे रहे हो, फिर उसे (पाकिस्तान को) हिन्दुस्तान में शामिल कर लो।” उन्होंने कहा कि अगर अफ़ग़ानिस्तान से आकर सब भारत की नागरिकता लेंगे तो पूरे को हिन्दुस्तान घोषित कर दो।

इसके अलावा उन्होंने कहा कि नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर जो मुस्लिम भ्रमित हैं, असल में वो ग़लती उनकी नहीं है बल्कि हमारे रहनुमाओं (नेताओं) की है। असल में दोषी वही हैं जो मुस्लिमों को उकसा रहे हैं, उनकी वजह से भारत के मुस्लिम आवेश में हैं। उन्होंने इस बात को भी स्वीकार किया कि कि हमारे मुस्लिमों में उतना पढ़ा-लिखा समाज नहीं है। इसके आगे उन्होंने कहा कि मुस्लिम गुमराह हैं और इसलिए वो विरोध-प्रदर्शनों का हिस्सा बन जाते हैं और हाथ में हथियार उठा लेते हैं।

ग़ौरतलब है कि विपक्ष के विरोध के बावजूद नागरिकता (संशोधन) विधेयक बुधवार (11 दिसंबर) को राज्यसभा द्वारा और सोमवार (9 दिसंबर) को लोकसभा द्वारा पारित किया गया। मौजूदा क़ानून के मुताबिक किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता लेने के लिए कम से कम 11 साल यहाँ रहना अनिवार्य था। नए कानून में पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों के लिए यह अवधि घटाकर 6 साल कर दी गई है। मौजूदा क़ानून के तहत भारत में अवैध तरीके से दाखिल होने वाले लोगों को नागरिकता नहीं मिल सकती थी और उन्हें वापस उनके देश भेजने या हिरासत में रखने का प्रावधान था।

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मोदी सरकार ने 566 मुस्लिमों को दी नागरिकता: राज्य सभा में अमित शाह

UP में हुए बवाल में सामने आया केरल के कट्टरपंथी संगठन PFI का हाथ: नदीम, वसीम,अश्फाक गिरफ्तार

नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ उत्तरप्रदेश के अधिकांश जिलों में हुई हिंसा के पीछे केरल के कट्टरपंथी समूह पॉपुलर फ्रंट इंडिया का नाम सामने आया है। पुलिस ने जिसकी जाँच में नदीम, वसीम, अश्फाक नामक तीन युवकों को गिरफ्तार भी किया। पुलिस के अनुसार प्रदेश के अन्य जिलों में हुई गिरफ्तारियों में भी इसी संगठन के उपद्रवी पुलिस के हत्थे चढे़ हैं। इसके अलावा सिमी से जुड़े कुछ लोगों को भी गिरफ्तार किया गया है।

गौरतलब है कि उत्तरप्रदेश के कानपुर में हुई हिंसा में सिमी और AIMIM से जुड़े नेताओं का नाम शामिल होने की बात पहले ही सामने आ चुकी थी। लेकिन अब इसमें पीएफआई के नाम खुलासा हुआ है। पीएफआई सिमी का ही लघु संगठन है। जिसके कई लोग पहले सिमी के साथ जुड़े रहे हैं।

प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा भी रविवार को मीडिया से बातचीच में कह चुके हैं कि हिंसा में शामिल लोग प्रतिबंधित संगठन सिमी से जुड़े पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के हैं। जिन्हें पश्चिम के मालदा से गिरफ्तार किया गया है।

यहाँ बता दें कि अभी तक जाँच के आधार पर बताया जा रहा है कि प्रदेश में हिंसा के लिए भीड़ जुटाने और लोगों को भड़काने के लिए 15-20 दिन से काम किया जा रहा था। कई स्लीपर सेल चमनगंज, बेकनगंज, यतीमखाना, बाबूपुरवा, बगाही और ग्वालटोली जैसे क्षेत्रों में खाने-पीने की दुकानों पर कम उम्र के लड़कों और बच्चों को भड़का रहे थे। इनका भरोसा जीतने के लिए सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे भ्रामक पोस्ट के प्रिंट की फोटोकॉपी भी लोगों में बाँटी जा रही थीं। इसीलिए दोनों दिन हुए प्रदर्शनों में ज्यादातर युवकों के पास छपे हुए प्लेकार्ड और पोस्टर्स थे।

इसके अलावा कानपुर के ही एक स्थानीय संगठन ने ही 13 दिसंबर को शुक्रवार के दिन युवकों को इकट्ठा करने के लिए जगह-जगह पोस्टर लगाए थे। लेकिन हिंसक भीड़ का नेतृत्व बाहरी लोगों ने किया था। स्थानीय लोगों ने खुद इस बात को कहा था कि वे उनमें से ज्यादातर को पहचानते ही नहीं थे।

बता दें, प्रदेश में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा को लेकर अब तक 164 मामले दर्ज किए गए हैं। इन मामलों में नामजद 880 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। वहीं 5312 लोगों को हिरासत में लेकर निरोधात्मक कार्रवाई की गई है। इसके अलावा अपनी जाँच में पुलिस बड़े पैमाने पर सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन कैमरे और मोबाइल से ली गई तस्वीरों का इस्तेमाल कर उपद्रवियों की शिनाख्त करने में जुटी है।

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जादवपुर विश्वविद्यालय में राज्यपाल धनखड़ को छात्रों ने घेरा, दिखाए काले झंडे, कहा-BJP कार्यकर्ता वापस जाओ

पश्चिम बंगाल के जादवपुर विश्वविद्यालय में राज्यपाल जगदीप धनखड़ के साथ सोमवार (दिसंबर 23, 2019) को फिर से बदसलूकी की गई। जगदीप धनखड़ विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह को लेकर बुलाई गई बैठक में शामिल होने के लिए पहुँचे थे। राज्यपाल जैसे ही विश्वविद्यालय पहुँचे, छात्रों ने उनकी गाड़ी रोक ली। राज्यपाल की गाड़ी के सामने छात्रों ने विरोध प्रदर्शन करने लगे। गो बैक के नारे लगाए। छात्रों ने उन्हें काले झंडे और पोस्टर्स दिखाए और साथ ही ‘भाजपा कार्यकर्ता जगदीप धनखड़ वापस जाओ’ के नारे भी लगाए।

राज्यपाल धनखड़ जादवपुर यूनिवर्सिटी में चांसलर के तौर पर बैठक में हिस्सा लेने गए थे लेकिन छात्रों ने इसका बहिष्कार किया। छात्रों ने अचानक राज्यपाल की कार घेर ली और नारेबाजी शुरू कर दी। इस दौरान राज्यपाल तकरीबन 45 मिनट अपनी कार में ही बंद रहे। बाद में सुरक्षा गार्ड उन्हें निकाल कर बाहर ले गए।

राज्यपाल धनखड़ ने रविवार (दिसंबर 22, 2019) को एक ट्वीट में लिखा था, “सोमवार को जादवपुर यूनिवर्सिटी के 9वें कोर्ट की 10वीं बैठक होनी है। मैं चांसलर के तौर पर इसकी अध्यक्षता करूँगा। 23 दिसंबर दिन सोमवार को 2 बजे दिन में यूनिवर्सिटी के कमेटी रूम नंबर 1 में बैठक होगी।” सोमवार को अपने पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार राज्यपाल यूनिवर्सिटी पहुँचे लेकिन उनके खिलाफ छात्रों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया।

उल्लेखनीय है कि कुछ महीने पहले विश्वविद्यालय में छात्रों ने केन्द्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो का घेराव किया था। बाबुल सुप्रियो के कहने के बावजूद वाइस चांसलर ने कैंपस में पुलिस बुलाने से इनकार किया था और जब खुद राज्यपाल उन्हें छुड़ाने गए थे तो छात्रों ने उनका भी घेराव किया था। इससे पहले राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने आरोप लगाया था कि कोलकता में दुर्गा पूजा महोत्सव के दौरान उन्हें अपमानित किया गया। उन्होंने कहा था कि ममता बनर्जी की उपस्थिति में उन्हें सरेआम अपमानित किया गया, जिससे वह व्यथित हैं और इसका उन्हें बहुत दुःख हुआ है।

उन्होंने बताया था कि उन्हें पूजा महोत्सव के दौरान न तो मंच पर जगह दी गई और न ही टीवी पर एक सेकंड के लिए भी दिखाया गया। कार्यक्रम में पूरी कोशिश की गई कि उन्हें कैमरा फुटेज न मिले। जबकि, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अन्य नेताओं व अधिकारियों के साथ मंचासीन थीं।

‘गुरुजी के गढ़’ में बेटा आगे और बहू पीछे, दुमका की राजनीति में लम्बे समय बाद शिबू का ‘चौका’

81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा की तस्वीर अगले कुछ घंटों में पूरी तरह साफ हो जाएगी। अब तक के रूझानों में झामुमो-कॉन्ग्रेस-राजद को गठबंधन को भाजपा पर स्पष्ट बढ़त दिख रही है। राज्य की राजनीति के सबसे पुराने धुरंधर पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के घर के हालात जाने बिना इन नतीजों का विश्लेषण अधूरा रह जाएगा। हालाँकि, पिछले कुछ चुनावों की तरह ‘गुरुजी’ इस बार उतने सक्रिय नहीं रहे। उन्होंने कुछेक रैलियॉं ही की। आइए, जानते हैं क्या है ‘गुरुजी के गढ़’ दुमका का चुनावी हालचाल।

दुमका से ख़ुद झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन मैदान में थे। पिछले चुनाव में उन्हें भाजपा की डॉक्टर लुइस मरांडी ने पटखनी दी थी। झारखण्ड भाजपा महिला प्रकोष्ठ की अध्यक्ष रहीं लुइस मरांडी ने रघुवर मंत्रिमंडल में कई अहम मंत्रालय भी सँभाले। दुमका और पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के रिश्ते का अंदाज़ा इसी बात से लगा लीजिए कि वो इस लोकसभा क्षेत्र से 8 बार सांसद रह चुके हैं। 1980 में यहाँ से पहली बार जीतने वाले सोरेन को 2019 में भाजपा के सुनील सोरेन ने चित कर दिया था।

हालाँकि, इससे झारखंड अथवा दुमका की राजनीति में शिबू सोरेन की हस्ती कम नहीं हो जाती। हाँ, उनकी सक्रियता कम होने और स्वास्थ्य ख़राब होने की वजह से उनका प्रभाव ज़रूर धीरे-धीरे कम हो गया। दुमका की सभी 6 विधानसभा सीटों के परिणाम व ट्रेंड्स पर एक नज़र डालिए:

दुमका: झामुमो
शिकारीपाड़ा: झामुमो
नाला: झामुमो
जामताड़ा: कॉन्ग्रेस
सारठ: भाजपा
जामा: भाजपा

जैसा कि आप देख सकते है, 4 सीटों पर झामुमो गठबंधन आगे चल रहा है, वहीं 2 सीटों पर भाजपा बढ़त बनाए हुए है। जामा से हेमंत की भाभी सीता सोरेन काँटे की टक्कर में पीछे चल रही हैं। यहाँ से झामुमो अध्यक्ष शिबू सोरेन की बहू व पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की भाभी सीता सोरेन चुनावी मैदान में थीं। हेमंत सोरेन दुमका के अलावा साहिबगंज के बड़हेट से भी चुनावी ताल ठोक रहे थे।