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बांग्लादेश में फिर इस्लामी कट्टरपंथियों ने 3 मंदिरों को बनाया निशाना, 8 मूर्तियाँ तोड़ीं: विदेश मंत्रालय ने बताया- 2024 में हिन्दुओं पर हुए 2200 हमले

बांग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा थम नहीं रही है। हिन्दू और उनके मंदिर निशाने पर लिए जा रहे हैं। बीते 4 दिनों के भीतर बांग्लादेश के अलग-अलग इलाकों में 8 मूर्तियाँ तोड़ी गईं। इन हमलों में मात्र एक व्यक्ति की गिरफ्तारी हो पाई जबकि बाकी हमलावरों का पता तक नहीं लगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बांग्लादेश के मैमेनसिंह जिले के हलुआघाट उपजिला में में बुधवार-गुरुवार (19 दिसम्बर, 2024) को दो हिन्दू मंदिर में तीन मूर्तियाँ तोड़ी गईं। यहाँ के बन्दरपुरा में स्थित एक मंदिर में दो मूर्तियाँ तोड़ी गई। मूर्ति तोड़ने वालों का कोई पता नहीं लग पाया है और इस संबंध में पुलिस खाली हाथ है।

वहीं हलुआघाट के ही पोलाशकांडा इलाके में स्थित एक काली मंदिर में भी एक मूर्ति को तोड़ दिया गया। इस मामले में मंदिर समिति ने पुलिस के पास शिकायत दर्ज करवाई है। पुलिस ने दूसरी घटना में अलाल उद्दीन को पकड़ा है। इससे पहले बांग्लादेश के दिनाजपुर में स्थित झरबारी काली मंदिर पर भी हमला हुआ।

इस मंदिर में स्थापित 5 मूर्तियों को तोड़ दिया गया। इस हमले के आरोप इस्लामी कट्टरपंथी संगठन जमात-ए-इस्लामी के युवकों पर लगाया गया है। इस हमले के बाद क्षतिग्रस्त मूर्तियों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हैं। इस मामले में किसी की गिरफ्तारी की सूचना नहीं है।

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के बाद से लगातार हिन्दुओं पर हमले हो रहे हैं। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार हिन्दुओं के खिलाफ हमले रोकने में असफल रही है। उसने इस हिंसा पर आँखे बंद कर ली हैं। कई बार तो उसने हिंसा की घटनाओं को सिरे से नकार दिया है।

इसी के चलते 2024 में बांग्लादेश में हिन्दुओं को हजारों हमले झेलने पड़े हैं। विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार (20 दिसम्बर, 2024) को राज्यसभा में एक जवाब में बताया है कि 2024 में बांग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ 2200 हिंसक घटनाएँ हुई हैं। इन घटनाओं में 2024 में 700% से अधिक की वृद्धि हुई है।

विदेश मंत्रालय ने बताया कि 2022 में बांग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा की 47 जबकि 2023 में 300 घटनाएँ हुई थी। पाकिस्तान में 2024 में हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा के 112 मामले सामने आए हैं। 2023 में पाकिस्तान में 103 जबकि 2022 में 241 मामले सामने आए थे।

गौरतलब है कि अगस्त, 2024 में बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना को इस्लामी कट्टरपंथियों की हिंसा के चलते सत्ता छोड़नी पड़ी थी। इसके बाद बांग्लादेश में हिन्दू निशाने पर हैं। इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिन्दू पुलिसकर्मियों को निशाना बनाया है और कई जगह मंदिरों पर हमला किया है। बांग्लादेश की सरकार ने हिन्दुओ के हक़ में बोलने वाले संत चिन्मय कृष्ण दास को गिरफ्तार कर लिया है। इस्लामी कट्टरपंथी बांग्लादेश में इस्कॉन की शाखाओं को निशाना बना रहे हैं।

सऊदी के आतंकी ने जर्मनी के क्रिसमस मार्केट में BMW से लोगों को रौंदा… 2 की मौत, 60+ घायल: डॉक्टर तालेब गिरफ्तार, वीडियोज सामने आईं

जर्मनी के मैगडेबर्ग में एक क्रिसमस मार्केट की चहल-पहल शुक्रवार को अचानक चीख-पुकार में बदल गई। तेज रफ्तार बीएमडब्ल्यू कार ने भीड़ पर चढ़ाई कर दी, जिससे दो लोगों की मौत हो गई और 60 से अधिक लोग घायल हो गए। मरने वालों में एक बच्चा भी शामिल है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, हमलावर की पहचान सऊदी अरब के 50 वर्षीय डॉक्टर तालेब के रूप में हुई, जिसने किराए की बीएमडब्ल्यू का इस्तेमाल कर इस वारदात को अंजाम दिया। पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए डॉक्टर को गिरफ्तार कर लिया। शुरुआती जाँच में पाया गया कि वह करीब 20 साल से जर्मनी में स्थायी निवासी के रूप में रह रहा था। हमलावर के कार में डेटोनेटर भी मिला है, हालाँकि किसी तरह का अन्य विस्फोटक नहीं मिला। जर्मन पुलिस ने हमलावर को पकड़ने का वीडियो भी जारी किया है।

हमलाकर को गिरफ्तार करती जर्मन पुलिस (फोटो साभार: German news agency dpa)

घटना के प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि कार सीधे भीड़भाड़ वाले बाजार में घुस गई और टाउन हॉल की ओर बढ़ी। चंद सेकंड में बाजार में खून और चीखों का मंजर छा गया। सोशल मीडिया पर घटना की तस्वीरें और वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिन्हें एलन मस्क ने भी साझा किया।

11 मौतों की अफवाह, 2 की पुष्टि

शुरुआती रिपोर्ट्स में 11 लोगों की मौत की बात कही गई थी, लेकिन अधिकारियों ने बाद में स्पष्ट किया कि मृतकों की संख्या सिर्फ दो है। हालाँकि, घायलों में से 15 की हालत गंभीर बताई जा रही है।

हमले के बाद बाजार में अफरा-तफरी मच गई। सुरक्षा बलों और आपातकालीन सेवाओं ने तुरंत मौके पर पहुँचकर घायलों को अस्पताल पहुँचाया। पुलिस ने घटनास्थल पर तैनाती बढ़ा दी और बाजार को खाली कराया।

2016 की याद दिलाता हमला

यह घटना 2016 में बर्लिन के क्रिसमस मार्केट पर हुए आतंकवादी हमले की भयावह यादें ताजा कर देती है, जब एक ट्रक ने भीड़ पर चढ़ाई कर 12 लोगों की जान ले ली थी। हालाँकि, मैगडेबर्ग की घटना में पुलिस ने इसे सिर्फ एक आतंकी का हमला बताया है और आगे किसी खतरे से इनकार किया है।

जर्मनी के चांसलर ओलाफ शोल्ज़ ने घटना पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “मेरी संवेदनाएँ पीड़ितों और उनके परिवारों के साथ हैं। हम मैगडेबर्ग के लोगों के साथ खड़े हैं।”

सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय ने इस घटना की निंदा करते हुए पीड़ितों और उनके परिवारों के प्रति संवेदनाएँ व्यक्त कीं। बयान में कहा गया कि “सउदी हिंसा की हर घटना की निंदा करता है और घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करता है।”

हिंदू लड़के के प्यार में मुस्लिम लड़की, घर छोड़ आ गई साथ रहने… अब मिल रही धमकी: बॉम्बे हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को दिया सुरक्षा और सेफ हाउस देने का आदेश

महाराष्ट्र सरकार के गृह विभाग द्वारा अंतरधार्मिक और अंतरजातीय जोड़ों के लिए ‘सेफ हाउस’ बनाने का आदेश जारी करने के एक दिन बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया। बॉम्बे हाई कोर्ट ने सरकार को हिंदू-मुस्लिम जोड़े की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उन्हें सेफ हाउस मुहैया कराने का आदेश दिया। इस दौरान कोर्ट में खाप पंचायत का भी जिक्र हुआ।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जस्टिस रेवती मोहिते डेरे और जस्टिस पी.के. चव्हाण की बेंच ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि मुंबई के उपनगरों में जोड़े की पसंद के अनुसार उन्हें एक सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराया जाए। कोर्ट ने कहा, “अब जब आपने सेफ हाउस बनाए हैं, तो उन्हें एक सेफ हाउस दें।”

करीब 23 साल की उम्र का ये जोड़ा साल 2021 में कॉलेज की पढ़ाई के दौरान मिला था और इसके बाद रिश्ते में आ गए। जब हिंदू युवक ने मुस्लिम युवती से शादी की इच्छा जताई, तो दोनों के परिवारों से उन्हें धमकियाँ मिलने लगीं। इन हालातों के चलते युवती ने अपनी नौकरी छोड़ दी और दोनों ने अपने घर छोड़ दिए। उन्होंने इसी हफ्ते शादी के रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन किया और अपनी सुरक्षा के लिए कोर्ट से मदद माँगी।

कोर्ट ने उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य पुलिस को निर्देश दिया कि शाम तक जोड़े को सुरक्षित स्थान पर ले जाया जाए। इसके साथ ही, पुलिस को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया कि युवक को अपने कार्यस्थल तक सुरक्षित यात्रा के लिए पर्याप्त सुरक्षा मिले। हालाँकि सेफ हाउस में फिलहाल केवल एक कॉन्स्टेबल की सुरक्षा है, कोर्ट ने स्थानीय पुलिस को निर्देश दिया कि वे जोड़े की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त इंतजाम करें।

इससे पहले, एक अन्य अंतरधार्मिक जोड़े के मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने राज्य को सुझाव दिया था कि जिलों में राज्य के गेस्ट हाउस के कमरों का उपयोग सेफ हाउस के रूप में किया जा सकता है।

याचिकाकर्ताओं के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता मिहिर देसाई ने तब यह मुद्दा उठाया था कि राज्य ने सेफ हाउस और विशेष सेल्स की जानकारी नहीं दी थी। कोर्ट के निर्देश पर 18 दिसंबर 2024 को एक सर्कुलर जारी किया गया, जिसमें महाराष्ट्र में स्थापित सेफ हाउस और विशेष सेल्स की जानकारी दी गई। हालाँकि, याचिकाकर्ता ने आज आपत्ति जताते हुए कहा कि चंडीगढ़ और दिल्ली में अपनाए गए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) के उनके सुझावों पर विचार नहीं किया गया।

इस पर कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “चंडीगढ़ और दिल्ली के उदाहरण मत दीजिए… वहाँ खाप पंचायतें हैं। हमारे यहाँ खाप पंचायतें नहीं हैं। यह सब हमारे समाज की परिस्थितियों के अनुसार किया जाना चाहिए।” कोर्ट इस मामले की अगली सुनवाई 6 जनवरी को करेगी।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मिहिर देसाई के साथ अधिवक्ता लारा जेसानी और ऋषिका अग्रवाल पेश हुए। राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक पी.पी. शिंदे उपस्थित रहे।

दाल में काला है या पूरी दाल ही काली है: सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी की सरकार को लताड़ा, कहा- शिक्षक भर्ती में गड़बड़ी का पता चला तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई

पश्चिम बंगाल के 25,000 शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की भर्ती से संबंधित ‘घोटाले’ में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (19 दिसंबर 2024) को कहा कि उम्मीदवारों के चयन में बहुत सारी खामियाँ हैं। बंगाल सरकार और भर्ती करने वाली SSC को लताड़ लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब भर्ती में गड़बड़ी का पता राज्य सरकार को चल चुका था तो शिक्षकों की अतिरिक्त पद पर नियुक्ति क्यों की गई।

यह घोटाला सामने आने के बाद कलकत्ता हाई कोर्ट ने शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्ति रद्द करने का आदेश दिया था। इस आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी। मामले पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट ने इस आधार पर भर्ती रद्द कर दी थी, क्योंकि दागी और बेदाग उम्मीदवारों को अलग नहीं किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट में यह मामला एक साल से अधिक समय तक लंबित रहने के बाद सुनवाई शुरू हुई। शीर्ष न्यायालय की खंडपीठ ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की नेतृत्व वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस की सरकार से पूछा, “अतिरिक्त पद बनाने का उद्देश्य क्या था? गड़बड़ी का पता लगने के बावजूद आपने दागी उम्मीदवारों को बाहर क्यों नहीं किया? दाल में कुछ काला है या सब कुछ काला है?”

पीठ ने कहा कि दागी उम्मीदवारों को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। जैसे कि अयोग्य या जिनके रैंक में हेरफेर करके उन्हें चयन सूची में लाया गया, जिनके अंकों में हेरफेर करके उन्हें योग्य उम्मीदवारों से आगे कर दिया गया, ओएमआर में हेरफेर (जिनमें से कुछ खाली थे) और जो मेरिट सूची में नहीं थे उन्हें नियुक्त किया गया आदि।

बेंच ने कहा कि भर्ती में ‘घोटाले’ का पता जस्टिस रंजीत कुमार बाग आयोग ने लगाया था और सीबीआई ने इसकी पुष्टि की थी। यहाँ तक ​​कि एसएससी ने भी अनियमितताओं को स्वीकार किया था। 25,000 पदों के लिए 22 लाख उम्मीदवारों ने हिस्सा लिया था, लेकिन साल 2020 में एसएससी ने उन सबकी उत्तर पुस्तिकाएँ नष्ट कर दी थीं। इस आधार पर हाई कोर्ट ने नियुक्तियों को रद्द किया था।

एसएससी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप गुप्ता ने कहा कि सीबीआई ने दागी उम्मीदवारों की पहचान की है और यह संख्या एसएससी द्वारा पहचाने गए उम्मीदवारों से कमोबेश मेल खाती है। उन्होंने तर्क दिया कि दागी उम्मीदवारों की नियुक्तियों को रद्द किया जा सकता है। अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि हजारों शिक्षकों की नियुक्ति रद्द करने से कक्षा 9 से 12 तक के छात्रों की पढ़ाई पर असर पड़ेगा।

इस तर्क को सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने खारिज कर दिया और कहा, “हम ऐसी दलीलें स्वीकार नहीं करेंगे।” हालाँकि, पीठ ने यह भी कहा कि वह उन विभागीय उम्मीदवारों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करेगी जो बेदाग हैं और इस भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से शिक्षक के रूप में नियुक्त होने से पहले लंबे समय तक काम कर चुके हैं। कोर्ट ने कहा, “हम उन्हें पहले के कैडर में वापस जाने की अनुमति देने पर विचार करेंगे।”

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 7 जनवरी 2025 को करने का आदेश दिया है। कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय ने ‘घोटाले’ की पहचान करते हुए न्यायमूर्ति बाग आयोग के माध्यम से जाँच कराई थी। न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय ने बाद में जज के पद से इस्तीफा देकर भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और सांसद बन गए।

दरअसल, साल 2016 में पश्चिम बंगाल के स्कूल सेवा आयोग की शिक्षक भर्ती में गड़बड़ी के आरोप लगे थे। कहा गया था कि 5 लाख से 15 लाख रुपए तक घूस लेकर नौकरी दी गई। इस मामले में CBI ने राज्य के पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी, उनकी करीबी मॉडल अर्पिता मुखर्जी और SSC के कुछ अधिकारियों को गिरफ्तार किया था। इनके ठिकानों पर ED ने छापेमारी भी की थी।

कलकत्ता हाईकोर्ट ने 22 अप्रैल को राज्य सरकार और सहायता प्राप्त स्कूलों में 25,753 शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्ति रद्द कर दी थी। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिका डाली गई। सुप्रीम कोर्ट ने 29 अप्रैल को हटाए गए शिक्षकों के खिलाफ CBI जाँच पर रोक लगा दी थी।

संभल में जहाँ प्राचीन कुआँ, वहाँ चारों तरफ दफन है मुस्लिमों की लाश: SDM ने कराया निरीक्षण, कब्रिस्तान के पास ही 68 तीर्थों में से एक गोपंच तीर्थ जर्जर हालत में

संभल में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की चार-सदस्यीय टीम ने प्राचीन कार्तिकेय मंदिर और आसपास के क्षेत्रों का गुप्त तरीके से सर्वेक्षण और कार्बन डेटिंग की है। टीम ने शुक्रवार (20 दिसंबर 2024) को 5 तीर्थ स्थलों और 19 प्राचीन कूपों का निरीक्षण किया।

जिलाधिकारी राजेंद्र पेंसिया ने बताया कि मंदिर का सर्वेक्षण और कार्बन डेटिंग सफलतापूर्वक और सुरक्षित तरीके से संपन्न की गई है। सुरक्षा कारणों से इस प्रक्रिया को गुप्त रखा गया, ताकि किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति न बने। क्षेत्र में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है ताकि सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

जानकारी के अनुसार, कार्तिकेय मंदिर 46 सालों से बंद था। 14 दिसंबर को पुलिस ने उपद्रवियों की तलाश के दौरान दीपा राय इलाके में मंदिर की खोज की थी। यह मंदिर सपा सांसद जिया उर्रहमान बर्क के घर से लगभग 200 मीटर की दूरी पर स्थित है। मंदिर को खुलने के बाद 15 दिसंबर को पूजा-अर्चना शुरू की गई और उसी दौरान मंदिर परिसर में प्राचीन खंडित मूर्तियों और कूपों की जानकारी मिली।

संभल में ASI की टीम ने भद्रकाश्रम, स्वर्गदीप, चक्रपाणि तीर्थ और प्राचीन श्मशान मंदिर जैसे स्थानों का निरीक्षण किया। इसके अलावा, 19 प्राचीन कूपों की स्थिति और ऐतिहासिक महत्व का भी गहन अध्ययन किया गया। इन सभी कूपों और तीर्थों का अध्ययन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को समझने के लिए किया गया। बताया जा रहा है कि इस निरीक्षण से इतिहास के नए पहलुओं पर रोशनी डालने की उम्मीद है।

विशेषज्ञ टीम ने सभी प्रक्रियाएँ गुप्त तरीके से संपन्न की और इसकी रिपोर्ट को सुरक्षा कारणों से गुप्त रखा गया है। ASI ने प्रशासन से अनुरोध किया था कि सर्वेक्षण प्रक्रिया को मीडिया कवरेज से दूर रखा जाए, जिससे किसी भी तरह की तनावपूर्ण स्थिति उत्पन्न न हो।

कब्रिस्तान के पीछे मिला प्राचीन कुआँ, पास में गोपंच तीर्थ

इस बीच, संभल में हयातनगर थाने के पीछे कबिस्तान में एक प्राचीन कुआँ भी मिला है। मौके पर एसडीएम वंदना मिश्रा और सीओ अनुज चौधरी पहुँचे और कर्मचारियों को बुलाकर कुएँ का निरीक्षण कराया। बताया जा रहा है कि कब्रिस्तान के पास ही संभल के 68 तीर्थों में से एक गोपंच तीर्थ है, जोकि बेहद जर्जर हालत में है। अब अधिकारी गोपंच तीर्थ के बारे में भी जानकारी जुटा रहे हैं।

संभल में यह सर्वे ऐसे समय हुआ है जब वहाँ मंदिर मिलने का मुद्दा गरमाया हुआ है। हिंसा के बाद प्रशासन ने उपद्रवियों की तलाश में सर्च ऑपरेशन चलाया, जिसके दौरान यह मंदिर मिला और बिजली चोरी का मामला भी सामने आया। संभल क्षेत्र अपने प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के लिए जाना जाता है। यह उम्मीद की जा रही है कि ASI की इस गतिविधि से मंदिर और अन्य स्थलों के ऐतिहासिक महत्व को समझने में मदद मिलेगी और इस क्षेत्र के इतिहास के बारे में नई जानकारी मिलेगी।

नेहरू ने लगाया था अंबेडकर पर अंग्रेज के साथ मिल ‘गद्दारी’ करने का आरोप: 1946 का पत्र आया सामने, कॉन्ग्रेस के ढोंग की खुली पोल

पिछले कुछ दिनों से कॉन्ग्रेस अपना प्रेम बाबा साहेब अंबेडकर के प्रति दिखाने की हर संभव कोशिश कर रही है और ऐसा जता रही है कि उनके अतिरिक्त कोई बाबा साहेब को सम्मान नहीं देता…।

वो गृहमंत्री अमित शाह की आधी-अधूरी क्लिप को साझा करके अपना प्रोपगेंडा फैला रहे थे लेकिन इसी बीच जवाहर लाल नेहरू का एक पत्र सामने आया जो बताता है कि कॉन्ग्रेस शुरुआती समय से बाबा साहेब के लिए कैसी विचार रखती थी।

ये पत्र जवाहरलाल नेहरू ने 20 जनवरी 1946 को अमृत कौर के नाम लिखा था। इसे वैसे तो nehruselectedworks.com पर पढ़ा जा सकता है लेकिन आज इसका स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर भी वायरल है।

इस पत्र में जवाहर लाल नेहरू ने बाबा साहेब के बारे में बात करते हुए कहा था “…मुझसे पूछा गया कि आखिर कॉन्ग्रेस क्यों अंबेडकर के पास नहीं जाती और उनसे सुलह कर लेती। मैंने उनसे कहा कि कॉन्ग्रेस ऐसा कुछ नहीं करने वाली। अंबेडकर ने लगातार कॉन्ग्रेस और कॉन्ग्रेस नेताओं का अपमान किया है। जब तक वह माफी नहीं माँगते तब तक कॉन्ग्रेस का उनसे लेना-देना नहीं है। मैंने निश्चित तौर पर ये नहीं कहा कि अनुसूतिच जाति के लोगों को पूना पैक्ट के तहत राजनैतिक लाभ नहीं मिलेंगे। लेकिन मेरा पूरा जोर इस बात पर था कि अंबेडकर ने ब्रिटिश सरकार के साथ गठजोड़ किया था और कॉन्ग्रेस के खिलाफ थे। हम उनसे डील नहीं कर सकते।”

इसी पत्र के अंश को हाईलाइट करके अब सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस से सवाल हो रहे हैं। भाजपा नेता अमित मालवीय ने लिखा, ” ये सोच से भी परे है कि नेहरू ने अमृत कौर को लिखे पत्र में बाबा साहेब को ‘गद्दार’ कहा और उनपर ब्रिटिशों के साथ गठजोड़ करने का आरोप लगाया… संविधान के रचयिता बाबा साहेब और दलित समुदाय की इससे बड़ी बेइज्जती नहीं हो सकती।”

अमिताभ चौधरी लिखते हैं, “1946 में अमृत कौर को लिखे गए पत्र में नेहरू ने अंबेडकर को ‘गद्दार’ कहा था और उनपर ब्रिटिशों के साथ गठजोड़ करने का आरोप लगाया था। आज उन्हीं का खून राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस के लोग वीर सावरकर को भी ब्रिटिश एजेंट बोलते हैं।”

इस पत्र के साथ सोशल मीडिया पर लोग ये सवाल भी कर रहे हैं कि कॉन्ग्रेस आज जितना प्यार बाबा साहेब के लिए दिखा रही है, तो उन्हें ये भी बताना चाहिए कि क्या बाबा साहेब ने नेहरू के रवैये से तंग आकर 1951 में कानून मंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया था? क्या जब बाबा साहेब देश के पहले कानून मंत्री बने थे उस समय उन्हें रक्षा संबंधी, विदेश संबंधी और वित्त संबंधी हर प्रमुख निर्णय लेने में शामिल करने की बजाय, किनारे नहीं किया गया था? क्या नेहरू ने उनपर ब्रिटिशों के साथ गठबंधन करने का आरोप लगाकर गद्दार नहीं कहा गया था?

कौन जज क्या फैसला सुना रहे, नहीं छापे मीडिया: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की अपील, दिया ‘संवेदनशील’ मामले का उदाहरण

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने मीडिया से अपील की है कि कोर्ट की सुनवाई, आदेश और फैसलों की रिपोर्टिंग के दौरान जजों के नाम प्रकाशित न किए जाएँ, यह अपील विशेष रूप से संवेदनशील मामलों को ध्यान में रखते हुए की गई है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने एक लिखित पत्र के माध्यम से इस अपील को पत्रकारों तक पहुँचाया है। इस पत्र में कहा गया है कि, “हाईकोर्ट के माननीय जजों की सुरक्षा के मद्देनजर, रिपोर्टिंग करते समय उनके नाम प्रकाशित न किए जाएँ।”

यह कदम हाल ही में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में हुई एक घटना के बाद उठाया गया है। जहाँ सितंबर में व्यक्ति ने हाईकोर्ट के एक जज के निजी सुरक्षा अधिकारी (पीएसओ) से हथियार छीनकर आत्महत्या कर ली थी। इस घटना के बाद हाईकोर्ट ने खुद इस मामले का संज्ञान लेते हुए एक स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) मामला शुरू किया था।

चीफ जस्टिस शील नागू और जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल की बेंच ने उस घटना के बाद संबंधित जज की सुरक्षा को बढ़ाने और पंजाब पुलिस को उनकी सुरक्षा व्यवस्था से हटाने का आदेश दिया था।

हालाँकि, यह स्पष्ट नहीं है कि मीडिया को यह निर्देश उस घटना के मद्देनजर जारी किया गया है या किसी अन्य कारण से। हाईकोर्ट ने इस अपील को जजों की सुरक्षा के लिए जरूरी बताया है, खासतौर पर संवेदनशील मामलों में जहाँ जजों की जान को खतरा हो सकता है। मीडिया से उम्मीद की गई है कि वह इस अपील का सम्मान करते हुए न्यायिक प्रक्रिया और जजों की गोपनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।

बांग्लादेश से कोलकाता आओ, भारतीय पासपोर्ट बनवाओ… सिर्फ 3 लाख रुपए में: 30000 बांग्लादेशी ऐसे ही बने भारत के नागरिक, गिरोह का हुआ पर्दाफाश

भारत में अवैध रूप से घुसकर बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिमों ने फर्जी पासपोर्ट बनवाए और यूरोपीय देशों तक पहुँच गए। इनमें इटली, फ्रांस सहित कई विकसित देश शामिल हैं। ऐसे लोगों की संख्या हजारों में तक बताई जा रही है। इस बात की जानकारी कोलकाता पुलिस ने विदेश मंत्रालय को भी दी है। इस बात का खुलासा हाल ही में फर्जी पासपोर्ट बनाने वाले गिरोह के पर्दाफाश से हुआ है।

कोलकाता पुलिस ने पिछले कुछ दिनों में ऐसे पाँच लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें डाकघर के दो संविदा कर्मचारी- दीपंकर दास और दूसरा दीपक मंडल भी शामिल हैं। इस गिरोह का सरगना समरेश बिश्वास और उसका बेटा रिपन बिश्वास है। दोनों फिलहाल पुलिस की गिरफ्त में हैं। वहीं, जाँच एजेंसियाँ इस मामले में कई डाकघरों के साथ-साथ पासपोर्ट सेवा केंद्रों की भूमिका की भी जाँच कर रही है।

पुलिस का अनुमान है कि इस पूरे फर्जीवाड़े में कई और लोग शामिल हो सकते हैं। एजेंसियों को आशंका है कि संविदा कर्मचारियों के अलावा भारतीय डाक विभाग के कुछ स्थायी कर्मचारियों भी इस रैकेट का हिस्सा हो सकते हैं। खास करके बांग्लादेश के साथ राज्य की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से सटे गाँवों से संचालित होने वाले डाक विभाग के केंद्र ज्यादा निगाह पर हैं। 

पुलिस को पता चला है कि पिछले कुछ महीनों में फर्जी पासपोर्ट गिरोह के सदस्यों ने बांग्लादेशियों को भारतीय बताकर 121 पासपोर्ट बनाए हैं। इनमें से 73 पासपोर्ट क्षेत्रीय पासपोर्ट प्राधिकरण द्वारा जारी किए गए हैं। बाकी 48 पासपोर्ट के बनने का इंतजार था। हालाँकि, अब इन आवेदनों को खारिज कर दिया गया है। यहाँ स्थिति ऐसी है कि आतंकी भी आसानी से पासपोर्ट बनवा सकते हैं।

दरअसल, यह गिरोह भारत में अवैध रूप से आने वाले बांग्लादेशियों का सबसे पहले फर्जी दस्तावेज बनाते थे। इनमें बांग्लादेशियों के नाम पर नकली मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड आदि प्रमुख दस्तावेज हैं। इन दस्तावेजों के आधार पर अन्य जरूरी दस्तावेज हासिल करते थे और उसे कोलकाता के विभिन्न क्षेत्रों में फर्जी पते से पासपोर्ट के लिए आवेदन करते थे।

गिरोह का सरगना समरेश बिश्वास एक पासपोर्ट के लिए इन बांग्लादेशियों से दो से पाँच लाख रुपए तक लेता था। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक, कोलकाता से गिरफ्तार पोस्ट ऑफिस पासपोर्ट सेवा केंद्र के संविदा कर्मचारी दीपंकर दास ने गैजेट से जानकारी मिली कि गिरोह ने लगभग 30,000 व्यक्तियों (मुख्य रूप से बांग्लादेशी) के जाली पासपोर्ट तैयार किए थे। उन सबके नाम मिले हैं।

दरअसल, मालदा जिले में लोगों के भारी संख्या में पासपोर्ट बनने के बाद खुफिया एजेंसियों के कान खड़े हो गए। इस बीच जानकारी मिली कि मालदा में पिछले एक साल में ही 16,000 से अधिक पासपोर्ट बने हैं। पता चला कि मालदा के वैष्णवनगर, कालियाचक, हबीबपुर में भारत-बांग्लादेश सीमा पार करके कई बांग्लादेशी भारतीय पासपोर्ट बनवा रहे हैं।

दरअसल, पश्चिमी देशों में बांग्लादेशियों को आसानी से वीजा नहीं मिलता। इसलिए बांग्लादेशी भारतीय पासपोर्ट बनवाते हैं, ताकि वीसा के साथ-साथ वहाँ आसानी से नौकरी भी मिल जाए। गिरोह का खुलासा होने के बाद अब राज्य खुफिया विभाग पासपोर्ट के आवेदकों से 1971 के पहले के दस्तावेज दिखाने की माँग कर रहा है।

यूपी ATS ने भी पिछले साल किया था खुलासा

उत्तर प्रदेश ATS ने हिन्दू नाम से भारतीय लोगों के फर्जी दस्तावेज लगाकर बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों को विदेश भेजने वाले रैकेट का नवंबर 2021 को पर्दाफाश किया था। ATS ने इस रैकेट से जुड़े एक आरोपित को सहारनपुर से गिरफ्तार किया है। आरोपित का नाम अजय घिल्डियाल था, जो एयर इंडिया के कस्टमर केयर में काम करता था।

अजय पर अब तक लगभग 40 लोगों को फर्जी दस्तावेजों के सहारे स्पेन, ब्रिटेन सहित अन्य यूरोपीय देशों भेजे जाने का आरोप लगे थे। ATS ने बांग्लादेश और म्यांमार से मुस्लिमों को भारत में हिन्दू नाम से प्रवेश करवाने वाले रैकेट का खुलासा किया था। इस मामले में मानव तस्करी गिरोह का मददगार विक्रम को गाज़ियाबाद और समीर मंडल को भी पश्चिम बंगाल के 24 परगना से गिरफ्तार किया गया था।

समीर मंडल ट्रैवल एजेंसी चलाता था। ये आरोपित बांग्लादेशियों और रोहिंग्या मुसलमानों को भारत की नागरिकता दिलाने का भी काम करते थे। इसी भारतीय नागरिकता के सहारे बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं को विदेश भेजा जाता था। विक्रम से हुई पूछताछ के बाद उसके सहयोगी अजय घिल्डियाल को पकड़ा गया था।

अजय फर्जी दस्तावेजों के सहारे विदेश भेजे जाने वाले हर व्यक्ति पर 15 हजार रुपए लेता था। इस पैसे में कई अन्य कर्मचारी भी हिस्सा बँटवाते थे, जो एयरलाइंस ड्यूटी में तैनात थे। इस मामले में एक अन्य आरोपित गुरप्रीत था, जो लंदन पासपोर्ट ऑफिस में काम करता था। गुरप्रीत आरोपित अजय को फोन पर निर्देश दिया करता था। 

‘धर्मांतरण करके सब पा लिया, लेकिन बेटा खो दिया’: कानपुर में माता-पिता के ईसाई बनने से आहत 17 साल के लड़के ने छोड़ा घर, पत्र में दर्द बयाँ किया

कानपुर के भौंती कस्बे में 17 साल के एक किशोर ने अपने माता-पिता के ईसाई धर्म अपनाने से आहत होकर घर छोड़ दिया। घटना का पता तब चला जब किशोर के परिजनों ने उसके लापता होने पर अपहरण का मामला दर्ज कराया। जाँच के दौरान पुलिस को घर से एक पत्र मिला जिसमें किशोर ने अपना दर्द बयाँ किया है।

माँ-बाप के मतांतरण से नाराज बेटे ने छोड़ा घर

स्थानीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, घर छोड़ते समय किशोर ने एक पत्र लिखकर छोड़ा था, जिसमें लिखा था- “मम्मी-पापा, आपने धर्म बदलकर सब कुछ पा लिया, लेकिन मुझे खो दिया। मैं इस धर्म में नहीं रह सकता।” यह पत्र पुलिस की जाँच में सामने आया, जिससे स्पष्ट हुआ कि किशोर अपने माता-पिता के धर्म परिवर्तन से बेहद परेशान था।

मोहल्ले के लोगों के अनुसार, परिवार ने करीब तीन महीने पहले ईसाई धर्म अपनाया था। हालाँकि माता-पिता ने इस पर कोई बयान नहीं दिया। परिवार मूल रूप से जौनपुर के मड़ियावा क्षेत्र का रहने वाला है और भौंती कस्बे में किराए के मकान में रहता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 14 दिसंबर की सुबह चार बजे किशोर घर से स्कूल का खाली बैग और जैकेट लेकर चला गया। उसके पिता ठेले पर कपड़े बेचते हैं और परिवार में उसकी माँ और 13 साल का छोटा भाई भी है। परिवार ने 16 दिसंबर को अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराई थी।

जाँच के दौरान पुलिस को किशोर का लिखा हुआ पत्र मिला। एसीपी पनकी शिखर ने बताया कि किशोर के पत्र में किसी धर्म का नाम नहीं लिखा गया है, लेकिन जाँच में यह पुष्टि हुई है कि माता-पिता ने ईसाई धर्म अपनाया है। पुलिस किशोर की तलाश में जुटी है।

यूपी में धर्मांतरण को लेकर पहले भी कई मामले सामने आ चुके हैं, जहाँ प्रलोभन देकर धर्म बदलवाया गया। किशोर के पत्र ने इस घटना को और भावुक बना दिया है। उसने साफ शब्दों में लिखा कि वह ईसाई धर्म में खुद को असहज महसूस करता है और इसीलिए घर छोड़ने का फैसला किया। हालाँकि पुलिस मामले की तह तक जाने की कोशिश कर रही है, लेकिन किशोर की सुरक्षित वापसी अब भी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।

अंबेडकर, हिंदुत्व आंदोलन और उनकी भूमिका: एकजुट, मजबूत राष्ट्र… जातिवाद के जंजाल से बाहर निकल राष्ट्रहित की सोच

गृह मंत्री अमित शाह का एक 10 सेकंड का छोटा वीडियो क्लिप कुछ दिन पहले वायरल हुआ, जिसमें झूठा दावा किया गया कि उन्होंने डॉ बीआर अंबेडकर का अपमान किया। ऐसे में आजकल राजनीतिक चर्चा के सबसे बड़े मुद्दों में से एक भारत रत्न बाबा साहेब डॉ बीआर अंबेडकर को लेकर देश में यह बहस छिड़ गई है कि कौन उन्हें सबसे ज्यादा पसंद करता है।

हालाँकि, राजनीतिक हलकों में सवाल को उल्टा रखा जाता है – कौन अंबेडकर से सबसे ज्यादा नफरत करता है? इस मुद्दे पर बीजेपी के पास इतिहास का साथ भी है, क्योंकि कॉन्ग्रेस आजादी की लड़ाई ही नहीं, आजादी के बाद नेहरू के दौर में भी अंबेडकर की तारीफ नहीं करती थी, बल्कि वे एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी थे, लगभग दुश्मन। इस कड़ी में अंबेडकर के द्वारा कॉन्ग्रेस पार्टी के खिलाफ कई बयान हैं, जो इसे साबित भी करते हैं, वहीं नेहरू के भी अंबेडकर के खिलाफ कई बयान हैं, जैसे कि उनकी एडविना को लिखी चिट्ठियों में अंबेडकर के प्रति उनकी पूरी नफरत साफ झलकती है।

दूसरी ओर, कॉन्ग्रेस अमित शाह के छोटे से एडिटेड वीडियो क्लिप का इस्तेमाल यह साबित करने के लिए कर रही है कि बीजेपी अंबेडकर से नफरत करती है। हालाँकि यह लड़ाई वहाँ से नहीं शुरू हुई, बल्कि राहुल गाँधी ने भारतीय संविधान पर वीर सावरकर का गलत हवाला देते हुए संसद में मनुस्मृति को दिखाया। हालाँकि अब पीछे मुड़कर देखें तो बीजेपी को राहुल गाँधी की हरकत पर आक्रामक तरीके से प्रतिक्रिया देनी चाहिए थी। अगर बीजेपी ऐसा करती, तो शायद आज अंबेडकर को लेकर बीजेपी को इस तरह से बचाव की मुद्रा में नहीं आना पड़ता।

राहुल गाँधी दरअसल सालों से मनुस्मृति और संविधान के बीच की पुरानी वामपंथी बहस चला रहे हैं, जिसका उद्देश्य जातिवाद को और बढ़ावा देना है। 2024 के चुनावों की तैयारियों में उनकी लगातार ‘कौन जात हो’ की बहस ने उन्हें कुछ राजनीतिक लाभ भी दिया है, इसलिए वे जानते हैं कि यह रणनीति काम करती है। अंबेडकर और संविधान कॉन्ग्रेस के हथियार जैसे हैं, जिनका इस्तेमाल कॉन्ग्रेसी अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए कर रहे हैं।

ऐतिहासिक रूप से यह बिल्कुल साफ है कि कॉन्ग्रेस (शुरुआत से लेकर 1990s तक) को अंबेडकर से कोई जुड़ाव नहीं था। अगर अंबेडकर के द्वारा विभिन्न संस्थाओं, व्यक्तियों और विचारों पर किए गए नकारात्मक बयानों की गिनती की जाए, जोकि बहुत सारा है, तो गाँधी, नेहरू और कॉन्ग्रेस पार्टी के खिलाफ उनके बयान आसानी से RSS के खिलाफ उनके बयानों से कहीं ज्यादा होंगे। जबकि अंबेडकर का ऐसा कोई बयान ढूँढ़ना मुश्किल है जिसमें उन्होंने सीधे तौर पर RSS पर हमला किया हो।

अंबेडकर और RSS या अंबेडकर और हिंदुत्व के बीच की बहस दरअसल अंबेडकर के हिंदू धर्म (जैसा उन्होंने इसे समझा) और उस समय की हिंदू राजनीति पर दिए गए बयानों की व्याख्या है। यही कारण है कि राहुल गाँधी ने संसद में मनुस्मृति को सामने रखा, क्योंकि वह अंबेडकर का हवाला देकर सीधे तौर पर BJP, RSS या हिंदुत्व पर हमला नहीं कर सकते थे। इसी वजह से राहुल गाँधी को सावरकर के बारे में झूठी जानकारी देने और फर्जीवाड़े का बढ़ावा मिला।

अब चूँकि कॉन्ग्रेस को यह सुविधा मिल गई है कि वह अपनी गलत नीतियों पर सवाल किए बिना अपने दोगलेपन को आसानी से छिपा सकती है। ऐसे में राहुल गाँधी खुद को शिव भक्त और अंबेडकरवादी दोनों के रूप में पेश कर सकते हैं और उनके आसपास के लोग इस पर सवाल भी नहीं उठाएँगे। वहीं, बीजेपी के पास यह सुविधा अब तक नहीं है, क्योंकि लोग सवाल करने लगते हैं कि वे (बीजेपी वाले) किस तरह अंबेडकरवादी होकर भी ‘जय श्री राम’ के नारे (उनकी नजर में दोनों बातें अलग-अलग हैं कि अंबेडकरवादी लोग ‘जय श्रीराम’ नहीं बोल सकते।) लगा सकते हैं।

वैसे, बीजेपी और संघ इस तरह के सवालों को संस्थागत स्तर पर नजरअंदाज करते हैं, जो राजनीतिक तौर पर समझने वाली बात है। पहले- क्यों पार्टी खुद को ऐसे बहसों में उलझाए, जब उनके विरोधियों को बिना किसी सवाल के छूट मिल जाती है? और दूसरे- शायद संगठनात्मक स्तर पर इसका कोई जवाब नहीं है, क्योंकि एक राजनीतिक पार्टी ठीक उसी तरह नहीं होती जैसा कोई वैचारिक समूह होता है। हालाँकि संस्थागत स्तर से परे, समर्थकों और सहानुभूति रखने वालों के लिए इस पर वैचारिक स्तर पर चर्चा करना जरूरी है। यहाँ तक कि संघ में भी, व्यक्तिगत स्वयंसेवक और पदाधिकारी इस पर चर्चा करते हैं (और मैंने खुद कुछ के साथ चर्चा की है), लेकिन वे संघ की ओर से कोई बयान जारी नहीं करते।

यह लेख अंबेडकर और हिंदुत्व आंदोलन में उनकी भूमिका की पहेली पर चर्चा करने का एक प्रयास है। हालाँकि यह विषय इतना व्यापक है कि इस पर पूरी किताब लिखी जा सकती है, लेकिन इसे यहाँ एक बुनियादी (बेसिक) स्तर पर ही समझाने की कोशिश की जा रही है।

अंबेडकर और हिंदू धर्म

अंबेडकर और हिंदू धर्म के संबंध को समझने के लिए सबसे पहले यह साफ कर देना जरूरी है कि अंबेडकर खुद को हिंदू नेता नहीं मानते थे। खासकर उन्होंने अपने जीवन के आखिरी समय में यह साफ कर दिया था कि वो हिंदू नहीं हैं। दरअसल, उन्होंने जिन 22 प्रतिज्ञाओं के जरिए धर्म परिवर्तन किया, उसमें यह साफ तौर पर बताया कि न केवल उन्होंने हिंदू धर्म को अपनाने से इंकार किया, बल्कि उन्होंने एक ऐसी पहचान बनाई जो मुख्य रूप से ‘हिंदू धर्म के खिलाफ’ थी, न कि बौद्ध धर्म या कुछ और… क्योंकि इन प्रतिज्ञाओं में पिंडदान से लेकर राम या कृष्ण की पूजा से इंकार और हिंदू धर्म को समाज के लिए नुकसानदेह मानने जैसी बातें शामिल थीं।

यह भी देखा जा सकता है कि बौद्ध धर्म में दीक्षा लेने से पहले अंबेडकर ने हमेशा हिंदू शब्द का इस्तेमाल एक बाहरी समूह (Out-group) के रूप में किया, न कि अपने समूह (In-group) के लिए। हालाँकि यह भी नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने अपने जीवन के आखिर में हिंदू पहचान छोड़ दी, जबकि वो उस समय शायद बहुत अधिक गुस्से में और निराशा से भरे हुए थे। क्योंकि उनकी सामूहिक एकता या सद्भाव की कोशिशें फेल हो रही थीं।

यही तथ्य कई लोगों के लिए यह तर्क देने का आधार बनता है कि अंबेडकर को हिंदुत्व आंदोलन का हिस्सा नहीं माना जा सकता। हालाँकि, यह नजरिया हर जगह व्यापक यानी एक समान नहीं है। उदाहरण के लिए, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे कि ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर जहाँ ‘राइट विंग’ की मजबूत मौजूदगी है, वहाँ भी अंबेडकर को लेकर समर्थन अधिक नजर आता है। मैंने खुद एक पोल चलाया… अब जब तक यह लेख लिखा गया, अंबेडकर को भारी समर्थन मिल रहा था। इसका मतलब यह है कि ‘राइट विंग’ विचारधारा वाले भी बड़ी संख्या में अंबेडकर का समर्थन करते हैं। इस पोल में 47.9% प्रतिशत लोग अंबेडकर के पक्ष में जुटे, जबकि दूसरे नंबर पर रहे नेहरू के पक्ष में महज 19.9% और तीसरे नंबर पर रहे मोहनदास करमचंद गाँधी के लिए 19.3% लोग खड़े हुए। पहले और दूसरे-तीसरे स्थान के लिए अंतर बहुत बड़ा रहा और दोनों मिलकर भी अंबेडरकर के आस-पास नहीं पहुँचे, क्योंकि दोनों का जोड़ भी मिलाकर 39.2% ही रहा।

कुछ लोग इस वोटिंग को अवैज्ञानिक कहकर खारिज कर सकते हैं और यह दावा कर सकते हैं कि वोट देने वालों को अंबेडकर के बारे में ‘सच्चाई’ नहीं पता। लेकिन ऐसा सोचना गलत और अनुचित होगा, खासकर बाद वाले मामले में। वामपंथियों के विपरीत, कम से कम हिंदुओं की ओर से तो विरोधाभासी विचारों को समझने की कोशिश होनी ही चाहिए।

मैंने उन लोगों के विचारों को समझने और उनके तर्कों को सुनने की कोशिश की है, जो मानते हैं कि 22 प्रतिज्ञाओं और अन्य बयानों के बावजूद अंबेडकर को हिंदुत्व आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा सकता है। यहाँ मैं उन तर्कों को संक्षेप में प्रस्तुत करने की कोशिश करूँगा। यह जरूरी नहीं है कि इन तर्कों का समर्थन भी किया जाए, लेकिन इन्हें सामने रखना इसलिए जरूरी है ताकि इस पर बहस और विचार-विमर्श हो सके।

‘अंबेडकर एक सुधारवादी थे’

अंबेडकर को एक सुधारक के रूप में देखने का तर्क यह है कि हिंदुत्व, जैसा कि सावरकर ने परिभाषित किया और संघ ने अपनाया, वास्तव में हिंदू समाज के सुधार पर केंद्रित एक प्रगतिशील आंदोलन है। सावरकर ने अपने लेखन में हिंदू समाज की ‘सात बेड़ियों’ की चर्चा की है और उन कई प्रथाओं की निंदा की है, जो या तो शास्त्रों द्वारा अनुमोदित थीं या उनकी मुख्यधारा की व्याख्या के अनुसार प्रचलित थीं।

इन प्रथाओं में अस्पृश्यता, सभी जातियों के लिए मंदिर प्रवेश, अंतरजातीय विवाह और भोजन को लेकर निषेध, और कुछ जातियों पर वैदिक अनुष्ठानों की पाबंदी जैसी बातें शामिल थीं। महाराष्ट्र के रत्नागिरी में स्थित पतित पावन मंदिर इस बात का प्रमाण है कि सावरकर ने इन परंपराओं के खिलाफ काम किया। यह स्पष्ट रूप से ‘पारंपरिक’ हिंदू धर्म के खिलाफ जाने जैसा था।

हालाँकि, सावरकर ने इन शास्त्रों को जलाने जैसी कोई प्रतीकात्मक कार्रवाई नहीं की, जो इन प्रथाओं का समर्थन करते थे। लेकिन उन्होंने निश्चित रूप से अपने समय के मौजूदा ज्ञान और प्रथाओं के खिलाफ जाकर सुधारवादी रुख अपनाया। सुधारक अक्सर परंपरावादियों को नाराज करते हैं, क्योंकि वे चीजों को बदलने की कोशिश करते हैं।

अंबेडकर के आलोचकों का मानना है कि उन्होंने हिंदू धर्म और शास्त्रों जैसे मनुस्मृति पर जो हमले किए, उन्हें भी इसी दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। उनका तर्क है कि ये हमले हिंदू समाज को आगे बढ़ाने के लिए थे। उनकी सामाजिक पीड़ा को दर्शाने वाले उनके तीखे शब्दों को माफ करने की बात भी सामने आती है, भले ही माफी की कोई माँग न हो।

हालाँकि, सावरकर और अंबेडकर के दृष्टिकोण में एक बड़ा अंतर भी है। सावरकर का सुधार एकजुटता के उद्देश्य से प्रेरित था, खासकर बाहरी खतरों और धर्मनिरपेक्ष राज्य के संदर्भ में। उन्होंने जाति जैसी पहचान से ऊपर उठने की बात कही, लेकिन उनका यह प्रयास हिंदू धर्म के प्रति शत्रुता से प्रेरित नहीं था। इसके विपरीत अंबेडकर के विचारों में हिंदू धर्म के प्रति गहरी असहमति दिखाई देती है।

फिर सवाल उठता है कि जब अंबेडकर खुद को हिंदू नहीं मानते थे, तो उन्हें ‘हिंदू सुधारक’ कैसे माना जा सकता है? इस पर आमतौर पर हिंदू और हिंदुत्व की व्यापक परिभाषा का सहारा लिया जाता है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसे ‘जीवन जीने का तरीका’ कहे जाने का हवाला दिया जाता है।

इसके अलावा अंबेडकर के कुछ बयान भी ऐसे हैं जो यह तर्क देते हैं कि वे हर हिंदू धर्मशास्त्र के खिलाफ नहीं थे। उदाहरण के लिए ‘अनहिलेशन ऑफ कास्ट’ में उन्होंने कहा, “मुझे बताया गया है कि स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे सिद्धांतों के लिए आपको विदेशी स्रोतों से उधार लेने की आवश्यकता नहीं है। आप उपनिषदों से भी ऐसे सिद्धांत प्राप्त कर सकते हैं।”

कुछ लोग यह भी तर्क देते हैं कि उसी समय के कई अन्य सुधारवादी जैसे आर्य समाज और ब्रह्म समाज के सदस्य भी पारंपरिक शास्त्रों और गैर-वैदिक देवताओं के प्रति उतने सहिष्णु नहीं थे। अगर उन्हें बड़े हिंदू दायरे का हिस्सा माना जा सकता है, तो अंबेडकर को क्यों नहीं?

यह भी कहा जाता है कि जैन समुदाय के कई लोग हिंदू देवताओं पर विश्वास नहीं करते, और उनके विचार भी कभी-कभी हिंदू देवताओं के प्रति आलोचनात्मक होते हैं। फिर भी, ये दोनों समुदाय भाईचारे के साथ रहते हैं।

हालाँकि ये तर्क पूरी तरह से संतोषजनक नहीं लगते, लेकिन औपनिवेशिक युग के संदर्भ और उस समय चल रहे सुधार आंदोलनों को ध्यान में रखना जरूरी है। उस समय ‘उपनिवेशवाद-मुक्त सोच’ जैसा विचार मौजूद नहीं था, क्योंकि पूरी दुनिया उस समय औपनिवेशिक प्रभाव में थी। यह समझ हाल ही में विकसित हुई है।

इस विषय पर बहुत सारा आग और गुस्सा बाहर आ सकता है, क्योंकि इस पर बहस की बहुत ज्यादा ही गुंजाइश है। ऐसे में इसे अभी के लिए यहीं छोड़ना बेहतर होगा।

‘अंबेडकर ने इस्लाम की निंदा की’

अंबेडकर के हिंदुत्व आंदोलन में स्थान को लेकर एक और तर्क यह दिया जाता है कि उन्होंने इस्लाम और मुस्लिम समुदाय पर स्पष्ट और बेबाक टिप्पणियाँ की थीं, खासकर पाकिस्तान के निर्माण और मालाबार में हिंदुओं के नरसंहार के संदर्भ में। उन्होंने इन मुद्दों पर वामपंथियों या धर्मनिरपेक्षतावादियों की तरह बात को घुमाने या मीठे शब्दों में ढालने की कोशिश नहीं की।

यह तथ्य निर्विवाद है। हालाँकि अंबेडकर ने इस्लाम के बारे में कुछ सकारात्मक बातें भी कही थीं और कुछ अवसरों पर ‘अस्पृश्यों’ के इस्लाम धर्म अपनाने का समर्थन किया था। लेकिन जब बात मालाबार नरसंहार, जिसे वामपंथी अक्सर ब्रिटिश शासन के खिलाफ किसान क्रांति के रूप में पेश करते हैं, या पाकिस्तान के निर्माण के समय इस्लामी अलगाववादी मानसिकता की होती है, तो अंबेडकर ने बिना किसी झिझक के सच्चाई सामने रखी।

फिर भी अंबेडकर अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं थे। श्री अरविंदो और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे अन्य महान व्यक्तियों ने भी इस्लाम और उसकी अलगाववादी मानसिकता पर आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखा था। राम स्वरूप और सीता राम गोयल जैसे विचारकों ने भी ऐसे मुद्दों पर चर्चा की है।

तर्क यह है कि वामपंथियों और इस्लामवादियों के लिए अंबेडकर के सीधे बयानों/भाषणों का जवाब देना मुश्किल हो जाता है। अन्य सुधारकों की तुलना में उनका (अंबेडकर) नाम और उनके विचार एक बड़े सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ में आते हैं, जो उनके आलोचकों के लिए चुनौती खड़ी करते हैं।

शायद केवल इस वजह से आप पूरी तरह से प्रभावित न हों, लेकिन यह तर्क पूरी तरह से खारिज करने लायक भी नहीं है। हल्के-फुल्के अंदाज में कहा जाए तो, आपको ऐसे बयानों की जरूरत होती है, जिसे विकिपीडिया बैन न करे। वैसे, अगर विकिपीडिया ने अंबेडकर पर बैन लगा दिया, तो शायद इससे कहीं ज्यादा बवाल मचेगा, जितना सीता राम गोयल पर बैन लगाने से हुआ।

‘कम से कम अंबेडकर ने कोई अब्राहमिक मजहब नहीं, बल्कि ‘भारतीय धर्म’ अपनाया’

अंबेडकर के धर्म परिवर्तन को लेकर एक और तर्क यह दिया जाता है कि उन्होंने इस्लाम या ईसाई धर्म की बजाय एक ‘भारतीय’ धर्म को अपनाया। उनकी यह बात अक्सर सामने लाई जाती है।

अंबेडकर ने कहा था, “धर्म परिवर्तन के देश पर पड़ने वाले परिणामों पर विचार करना आवश्यक है। इस्लाम या ईसाई धर्म में धर्म परिवर्तन से दलित वर्गों का राष्ट्रीयकरण समाप्त हो जाएगा। यदि वे इस्लाम में जाते हैं, तो मुसलमानों की संख्या दोगुनी हो जाएगी और मुस्लिम वर्चस्व का खतरा वास्तविक बन जाएगा। यदि वे ईसाई बनते हैं, तो ईसाईयों की संख्या पाँच से छह करोड़ हो जाएगी, जिससे अंग्रेजों की पकड़ देश पर और मजबूत हो जाएगी।”

अंबेडकर ने धर्म परिवर्तन को सिर्फ व्यक्तिगत धर्म का बदलना नहीं, बल्कि पूरे देश की सामाजिक और राजनीतिक पहचान पर प्रभाव डालने वाली घटना के रूप में देखा। उनका यह विचार हिंदुत्व विचारधारा से मेल खाता है, क्योंकि हिंदुत्व भी भारत को एकजुट और मजबूत राष्ट्र के रूप में देखने की बात करता है। इसके साथ ही, अंबेडकर का यह मानना था कि धर्म परिवर्तन के परिणामों को राष्ट्रहित में सोचना चाहिए। उनका उद्देश्य सिर्फ धर्म नहीं, बल्कि समाज के दबे-कुचले वर्गों के लिए एक नया रास्ता खोलना था, ताकि वे जातिवाद के जंजाल से बाहर निकल सकें।

ऐसे में अंबेडकर का ‘हिंदुत्व’ वीर सावर के हिंदुस्व से कहीं अधिक कठोर जान सकता है, क्योंकि सावरकर तो मुस्लिमों को भी हिंदू मानने को तैयार हो गए थे, अगर वो मक्का को छोड़कर भारत को अपनी पवित्र भूमि मानते।

अंबेडकर ने यह भी कहा था कि अगर धर्म परिवर्तन की बात हो, तो सिख धर्म को अपनाना सबसे उपयुक्त होगा। हालाँकि, उन्होंने अंत में बौद्ध धर्म को ही अपनाया। लेकिन अंबेडकर का धर्म परिवर्तन कोई साधारण कदम नहीं था। उन्होंने बौद्ध धर्म को अपनाया, साथ ही 22 उपदेशों के माध्यम से एक नया सामाजिक और धार्मिक रूप रेखा तैयार की। ये उपदेश हिंदू धर्म के खिलाफ थे- जिसमें वे पिंडदान, भगवान राम और कृष्ण की पूजा और हिंदू धर्म की सामाजिक व्यवस्था को नकारते थे।

इसके अलावा यह भी तर्क दिया जाता है कि अंबेडकर ने धर्म परिवर्तन केवल मजबूरी में किया। हालाँकि, उनके विचार और भाषण इस धारणा को पूरी तरह से साबित नहीं करते। उन्होंने अपने जीवनकाल में कई बार हिंदू धर्म छोड़ने और बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन की बात की थी।

‘उनकी कड़वी बातें उनके अनुभवों की देन थीं’

यह कोई संदेह नहीं है कि जातिवाद ने हमारे समाज में एक बड़ी समस्या पैदा की है और कुछ जातियों को सचमुच असंवेदनशील और अमानवीय व्यवहार का सामना करना पड़ा है। मैं इस बात से बिल्कुल भी सहमत नहीं हूँ कि हम सब कुछ केवल ‘अत्याचार साहित्य’ के रूप में खारिज कर दें, हालाँकि यह सच है कि कुछ घटनाओं को अतिरंजित रूप से पेश किया गया है। अतिरंजनाओं से ज्यादा हमारे समाज में जो असली समस्या है वह है तथ्यों और घटनाओं को तोड़-मरोड़ कर पेश करना।

मैं खुद एक तथाकथित ‘ऊँची जाति’ से हूँ और मैंने कुछ लोगों के सामंती मानसिकता को देखा है। मैंने रिवर्स जातिवाद (यानी दबी जातियों द्वारा तथाकथित उच्च जातियों के खिलाफ-Reverse Casteism) भी देखा है, और यही कारण है कि मैं इस मामले में सिर्फ एक पक्ष को नहीं चुन सकता। एक बात जो मैंने देखा है और जिसका मुझे पूरा विश्वास है, वह यह है कि मेरे परिवार की सामंती मानसिकता कहीं से भी मनुस्मृति की वजह से नहीं थी। मुझे न तो मेरे घर में और न ही मेरे गाँव में इसका कोई प्रमाण मिला। असल में उनमें से अधिकांश लोग धार्मिक भी नहीं थे। मैंने इस बारे पर अपनी किताब में भी लिखा है, जिसे आप यहाँ से खरीद (मेरा प्रचार समझ लीजिए) भी सकते हैं।

लेकिन गंभीरता से कहूँ तो हाँ.. लोग वास्तव में अपने दुखद अनुभवों के कारण कड़वी बातें कह सकते हैं। यह सामान्य रूप से सही है, और हर कोई एक नया आरंभ करने की उम्मीद कर सकता है। क्या यही एकमात्र कारण था कि अंबेडकर ने ऐसा कहा? बिलकुल नहीं। वह एक वकील, राजनेता और कार्यकर्ता थे। उनके पास यह सब कहने के कई कारण थे।

‘वो सबसे बड़े दलित आइकॉन, आप अपने ही लोगों को अलग नहीं कर सकते’

अंततः बात वास्तविक राजनीति पर आ जाती है। संघ और भाजपा के कई लोग मानते हैं कि यह सोचना बड़ी भूल होगी कि हर व्यक्ति जिसने अंबेडकर की फोटो सोशल मीडिया पर लगाई है या जिसे अपने घर में उनकी तस्वीर लगाई है, वह एक कट्टर अंबेडकरवादी है जिसका मुख्य उद्देश्य हिंदू धर्म और विशेष रूप से ब्राह्मणों को खत्म करना है।

इससे पहले कि इसे तुरंत खारिज किया जाए और झूठा बताया जाए, मुझे लगता है कि लोगों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि अधिकांश जनता वास्तव में किसी विचारधारा को अपनाने से पहले उसका गंभीरता से विश्लेषण नहीं करती। अधिकांश लोग केवल राजनीतिक नारों को अपना लेते हैं।

उदाहरण के लिए, आज समाजवादी पार्टी (सपा) का समर्थक ‘बाबासाहेब का अपमान’ पर बुरा मान जाएगा, क्योंकि सपा INDI गठबंधन में है और अखिलेश यादव राहुल गाँधी के साथ काम कर रहे हैं। लेकिन 1990 के दशक में सपा के लोग उत्तर प्रदेश के पार्कों और गाँवों में अंबेडकर की मूर्तियों को तोड़ देते थे, क्योंकि उन्हें वह मूर्तियाँ BSP द्वारा सत्ता की ओर बढ़ने के प्रयास के रूप में दिखाई देती थीं। यही है राजनीति का यह बेवजह और बदलता स्वरूप इस देश में।

‘अंबेडकर को उनके पास एक उद्धारक के रूप में बेचा गया है उन लोगों द्वारा जिन्होंने नरेटिव को नियंत्रित किया, और अब हम इस पर ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। तुरंत अंबेडकर पर हमला करना और उन्हें अलग-थलग करना, उन्हें वामपंथी या इस्लामवादी पक्ष में धकेलना समझदारी नहीं होगी। हमें कुछ चीजों को नजरअंदाज करना होगा और अपने दृष्टिकोण को मजबूती से प्रस्तुत करना होगा।’

यह बात पूरी तरह से समझ में तब आती, जब आपके पास कोई वैकल्पिक योजना होती, लेकिन मैं व्यक्तिगत रूप से यह नहीं देख पा रहा हूँ। मुद्दा यह है कि वह ‘वैकल्पिक योजना’ क्या होनी चाहिए। संघ अंबेडकर को जैसा है, वैसे ही स्वीकार करने में कोई परेशानी नहीं दिखाता और भाजपा भी ऐसा ही करती है और सच्चाई तो यह है कि आप उन्हें धोखा देने का आरोप नहीं लगा सकते क्योंकि वे हमेशा से ऐसे ही थे।

संघ ने अबेडकर और फुले को अपने विचारों में तीस साल से पहले ही स्वीकार कर लिया था। मैं यहाँ एक किताब का सुझाव दूँगा (जो यहाँ ऑनलाइन फ्री में उपलब्ध है), जिसका नाम है “Manu Sangh and I”, इसे साल 1996 में रामेश पटांगे द्वारा लिखा गया, जो पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ संघ विचारक हैं। इस किताब में यह बताया गया है कि संघ मनुस्मृति पर विश्वास नहीं करता, भले ही वह उसे जलाए नहीं।

यही वजह है कि भाजपा राहुल गाँधी द्वारा सावरकर के बारे में फैलाए गए झूठ का मुकाबला नहीं कर पाई। राहुल के हाथ में मनुस्मृति होने के कारण पार्टी को हिचकिचाहट हुई, क्योंकि वे उस दौर से बहुत पहले ही निकल चुके हैं।

बाहरी नजरिए से देखा जाए तो संघ और भाजपा को यह साफ समझ में आता है कि अंबेडकर और हिंदुत्व एक साथ चल सकते हैं और वे पिछले 30 वर्षों से इस विचारधारा के साथ हैं भी। ऐसा इसलिए, क्योंकि उनके दृष्टिकोण में हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र दोनों विचार स्वतंत्र, उदार विचार हैं जो सभी को समाहित कर सकते हैं।

हिंदू धर्म और हिंदुत्व को सबसे उदार तरीके से परिभाषित करना आत्मसंतुष्ट और आत्मप्रशंसा जैसा लग सकता है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि विचारधाराएँ इस तरह काम करती हैं। क्योंकि कोई व्यक्ति आगे इसमें पेरियार को भी शामिल करने की बात कर सकता है.. और इसके बाद कौन-कौन से नाम आएँगे, इसका मैं अनुमान भी नहीं लगाना चाहता। ऐसे में एक सीमा-रेखा खींची ही जानी चाहिए… और अगर वह सीमा रेखा अंबेडकर के बाद खींची जाती है, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन कम से कम वह सीमा-रेखा स्पष्ट रूप से दिखाई तो दे।

वो सवाल, जिनके जवाब नहीं

जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ कि संघ या भाजपा इन सवालों का संगठन के स्तर पर जवाब नहीं देंगे और न ही ऐसा करने के लिए वो बाध्य हैं। लेकिन व्यापक हिंदू समाज और दक्षिणपंथी समुदाय को इन पर चर्चा करनी होगी।

इस समय सबसे बड़ा खतरा यह नहीं है कि अंबेडकर को भगवान के स्तर पर उठाया जा रहा है, उन्हें तो काफी पहले ही उस स्तर पर रखा गया था, बल्कि उनके इर्द-गिर्द एक तरह का ईशनिंदा कानून (Blasphemy) बनने की स्थिति है। यहाँ तक कि अगर अमित शाह का संदर्भ-रहित वीडियो देख लिया जाए, तो उन पर आरोप लगते कि उन्होंने अंबेडकर को भगवान के रूप में मान्यता देने से इनकार किया। यह ऐसा है जैसे अंबेडकर का नाम लेना स्वर्ग की प्राप्ति का साधन हो गया हो।

यह विडंबना ही है कि एक व्यक्ति (अंबेडकर) जिसने अपनी 22 प्रतिज्ञाओं में हिंदू देवी-देवताओं को मान्यता देने से मना कर दिया, उसे ही एक ऐसे भगवान के रूप में पहचाना जा रहा है, जिसकी पूजा अनिवार्य की जा रही हो।

इसके अलावा हिंदू धर्म में देवी-देवता आपस में लड़ सकते हैं, ईर्ष्या कर सकते हैं, यहाँ तक कि एक-दूसरे के खिलाफ षड्यंत्र भी रच सकते हैं। लेकिन अगर कोई यह कहे कि उसकी हर कोई पूजा करे, तो यह न तो हिंदू परंपरा है और न ही हिंदुत्व का हिस्सा। यह पूरी तरह से अब्राहमिक दृष्टिकोण जैसा लगता है। ऐसे में इससे बचाव कैसे करें, इसके बारे में मेरे पास कोई आईडिया नहीं है।

इसके बावजूद, मैं अंबेडकर को हिंदुत्व के दायरे से पूरी तरह से बाहर करने के पक्ष में नहीं हूँ, इसके कई कारण हैं, जो पहले ही बताए गए हैं। जो लोग अंबेडकर को इस दायरे में शामिल करने की वकालत करते हैं, उनके तर्क भी पूरी तरह से गलत नहीं हैं। लेकिन यह समावेश (उनका हिंदुत्व में प्रवेश) विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति की कीमत पर नहीं होना चाहिए, और यही चीज इस समय खतरे में है।

मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें