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भजन के नाम पर घुसपैठ है ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’, अटल जयंती में गायिका ने माफी माँग सुधारी भूल: जानिए ‘रघुपति राघव राजा राम’ को गाँधी ने कैसे और क्यों किया विकृत

बिहार के पटना में बुधवार (25 दिसंबर 2024) को बापू सभागार में अटल जयंती समारोह के दौरान देवी नाम की गायिका ने ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’ गाया तो हंगामा मच गया। खुद कार्यक्रम में मौजूद केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे ने उनका विरोध किया और मंच से ‘जय श्रीराम’ के नारे लगे। आखिर में गायिका को मंच से माफी माँगनी पड़ी और उन्होंने ‘छठी मैया आई ना दुअरिया’ गाया और कार्यक्रम से चली गईं।

बता दें कि गायिका के गीत पर इसलिए इतना बवाल हुआ क्योंकि गीत के लिरिक्स असल में ये नहीं है जो गाए गए। इस गीत की असली पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-

रघुपति राघव राजाराम,
पतित पावन सीताराम।
सुन्दर विग्रह मेघश्याम,
गंगा तुलसी शालिग्राम।
भद्रगिरीश्वर सीताराम,
भगत जन-प्रिय सीताराम।
जानकीरमणा सीताराम,
जय जय राघव सीताराम है…

उक्त पंक्तियाँ श्री हरि के मानव अवतार पुरुषोत्तम श्री राम को समर्पित भजन श्री लक्ष्मणाचार्य द्वारा रचित श्री नम: रामायणम् का एक अंश है।

सवाल है कि जब भजन की पंक्तियाँ विशुद्ध रूप से सीताराम पर हैं, तो फिर इसमें समय के साथ ‘ईश्वर अल्लाह’ जैसे शब्द आए कहाँ से? तो जवाब है कि ये सब किया गया महात्मा गाँधी के द्वारा। उन्होंने सेकुलर माहौल बनाने के नाम पर राम भजन के साथ छेड़छाड़ की और उसे विकृत करने का प्रयास किया। उनके उसी प्रयास का नतीजा है कि आज बच्चों की जुबान पर सही पंक्तियाँ होने की बजाय विकृत पंक्तियाँ हैं। जैसे-

रघुपति राघव राजाराम,
पतित पावन सीताराम,
भज प्यारे तू सीताराम
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम,
सबको सन्मति दे भगवान।

समय के साथ देखते-देखते धार्मिक भजन का यह घटिया संस्करण घर-घर में लोकप्रिय हो गया। लोग इसे स्वतंत्रता के समय रचित गीत बताने लगे जबकि हकीकत यह है कि शुरुआत में गाँधी ने भी राम भजन के साथ छेड़छाड़ करके उसका इस्तेमाल अपनी सभाओं में किया और बाद में तो बॉलीवुड ने इसे और मशहूर कर दिया। हिंदी फिल्मों, जैसे ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ और ‘कुछ कुछ होता है’ में इसका इस्तेमाल किया गया। इसके अलावा, यह 1982 में अफ्रोबीट बैंड के एल्बम ओसिबिसा- अनलेशेड – लाइव का शुरुआती ट्रैक भी था।

लिरिक्स में इस हेरफेर के साथ मुस्लिमों को अपना समर्थन गाँधी को देने और उन प्रार्थना सभाओं में शामिल होने में कोई समस्या नहीं होती थी, जिसका उद्देश्य दोनों समुदायों के बीच मतभेदों को सुलझाना और सांप्रदायिक सद्भाव बनाना था। हालाँकि, मुस्लिम अल्पसंख्यक की माँगों के साथ सामंजस्य बैठाने की जिम्मेदारी हमेशा हिंदू बहुसंख्यकों की ही रही।

गाँधी ने मुस्लिमों द्वारा रखे गए आरक्षण को संबोधित करने के लिए एक हिंदू धार्मिक गीत के लिरिक्स को विकृत करने में बेजोड़ निपुणता दिखाई, लेकिन उन्होंने कभी भी पवित्र कुरान के आयतों की निंदा नहीं की, जो मूर्ति-पूजा को पाप कहता है और मूर्तिपूजा के लिए मृत्युदंड का आदेश देता है। 

गाँधी ने मुस्लिमों को खुश करने के लिए हिंदुओं के राम जाप वाले भजन को विकृत कर दिया। बता दें कि गाँधी के सामुदायिक प्रार्थना में मुस्लिमों का कलमा जाप भी शामिल था। हालाँकि, ऐसी कोई रिपोर्ट या ऐतिहासिक सबूत नहीं हैं, जो यह बताता हो कि गाँधी ने हिंदुओं की चिंताओं को दूर करने के लिए कुरान की आयतों को बदल दिया या कलमा में बदलाव किया था, ताकि इसे आपसी सह-अस्तित्व और सांप्रदायिक सद्भाव के अपने स्वीकृत रुख के अनुकूल बनाया जा सके। शायद इस दोहरेपन के कारण ही विभाजन के दौरान गाँधी की प्रार्थना सभाओं का ध्रुवीकरण हो गया और प्रार्थना सभाओं के दौरान कलमा को शामिल करने पर सवाल उठाए जाने लगे।

राम धुन में मिलावट एक ऐसी घटना थी, जिसमें गाँधी ने हिंदुओं की भावनाओं के प्रति बेहद कम संवेदनशीलता दिखाई। अटल जयंती पर आयोजित समारोह में गायिका का भजन के नाम पर इस धुन को दोहराना भी ठीक उसी तरह असंवेदनशीलता थी। इसके लिए माफी माँग उन्होंने अपनी भूल दुरुस्त करने का कार्य किया है।

मुस्लिम शासकों से शुरू नहीं होता भारत, सभ्यतागत न्याय के लिए इतिहास की खुदाई जरूरी: मोहन भागवत से अलग नहीं ऑर्गेनाइजर के विचार, क्योंकि राष्ट्रीय पहचान की ही लड़ाई लड़ रही RSS

नवम्बर, 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद का सर्वे हुआ। इसके बाद बदायूँ की एक मस्जिद का भी सर्वे करने के लिए याचिका डाली गई। इसी तरह देश के अलग-अलग हिस्सों में कई याचिकाएँ और अदालती मामले सामने आए। संभल में हिंसा भी हुई। इसके बाद यहाँ हुई जाँच में मंदिर मिलने लगे। बाकी कई जगह पर हिन्दुओं ने उन मस्जिदों-दरगाहों और बाकी ढाँचों के जाँच की माँग की, जिनका धार्मिक स्वभाव आक्रान्ताओं द्वारा बदला गया है।

इसके बाद सेक्युलर और लिबरल जमात ने 1991 के वर्शिप एक्ट और सेक्युलरिज्म का हवाला दिया और देश में धार्मिक स्थलों की सच्चाई जानने के प्रयासों का विरोध करना चालू कर दिया। उनका दावा है कि अब इतिहास की बातों को जानने से कोई फायदा नहीं है और हर जगह सर्वे-खुदाई नहीं होनी चाहिए। इसी बीच 19 दिसम्बर, 2024 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने भी एक कायर्क्रम में सर्वे और खुदाई जैसे कामों को लेकर संयम बरतने की सलाह दी।

RSS प्रमुख मोहन भागवत के बयान के कुछ दिन बाद ही संगठन का मुखपत्र कही जाने वाली पत्रिका आर्गेनाइजर में हिन्दुओं के संभल जैसे प्रयासों का समर्थन किया गया है। पत्रिका में देश में धार्मिक स्थलों को लेकर चल रही बहस को नए नजरिए से देखने की बात कही गई है। मीडिया इसे ऐसे प्रचारित कर रहा है कि यह विचार RSS प्रमुख भागवत से असहमति का है। जबकि असल में यह बात अपने धर्मस्थल वापस लेने के प्रश्न पर दूसरी तरीके से विचार करने की है। लड़ाई के प्रश्न को दूसरा अर्थ किए जाने की है।

आर्गेनाइजर में यह लेख सम्पादक प्रफुल्ल केतकर ने लिखा है। उन्होंने इस लेख में कहा है कि अब जो बहस शुरू हुई है, उसे हमें क्षद्म-सेक्युलरिज्म के चश्मे से हिन्दू-मुस्लिम मुद्दे तक नहीं सीमित कर देना चाहिए। बल्कि हमें अब अपनी सभ्यता के साथ हुए अन्याय को लेकर चल रही लड़ाई पर एक समावेशी बहस की जरूरत है, जिसमें समाज के सभी वर्गों को शामिल किया जाए।

संभल में मिला मंदिर इस बार आर्गेनाइजर की कवर स्टोरी है

लेख में कहा गया है कि संभल में मस्जिद सर्वे पर पत्थरबाजी, मुस्लिम इलाकों में बिजली चोरी का पकड़ा जाना और फिर बंद पड़े हिन्दू मंदिरों का निकलना, इन सब बातों ने देश में चल रहे कथित सेक्युलरिज्म का भंडाफोड़ कर दिया है और उसकी खामियाँ जगजाहिर हो गई हैं। आर्गेनाइजर का कहना है कि देश में जो संघर्ष धर्मस्थलों की पहचान और उन्हें वापस लिए जाने को लेकर चल रहा है, असल में वह हिन्दू-मुस्लिम का प्रश्न है ही नहीं। ना ही वह यह प्रश्न है कि किसका धर्म दूसरे से श्रेष्ठ है।

असल में यह प्रश्न राष्ट्रीय पहचान और हमारी सभ्यता के साथ हुए अत्याचार का न्याय माँगने का है। लेख में यह भी कहा गया है कि अब तक सही इतिहास बताने और सभ्यता के साथ न्याय करने के बजाय कम्युनिस्ट और कॉन्ग्रेस लगातार आक्रान्ताओं को महान बताते रहे। उन्होंने इस देश के मुसलमानों को यह समझाया कि अंग्रेज आने से पहले वह इस देश के मालिक थे। मुस्लिमों को बताई गई यह बात आधा सच है। उन मुस्लिम आक्रान्ताओं के आने से सैकड़ों साल पहले तक भारत में हिन्दू राजा ही थे।

मुस्लिमों को बात यह बताई जानी चाहिए कि वह इस देश आक्रान्ताओं की विरासत संभालने वाले लोग नहीं बल्कि उनके पीड़ित हैं। लेख में कहा गया है कि देश में मुस्लिमों को समझाया जाना चाहिए कि वह इन बाबर और औरंगजेब को अपना हीरो ना मानें, असल में वह तो भारतीय समाज से ही निकले लोग हैं। लेख में कहा गया है कि जिस तरह बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर ने जाति के प्रश्न का असल कारण निकाला और उसका हल संविधान के जरिए निकाला, उसी तरह इस धर्मस्थलों के प्रश्न और सभ्यता के साथ हुए अन्याय का हल निकाला जाना चाहिए।

अगर सेक्युलरिज्म के चलते इस प्रश्न को हल ना किया गया तो इससे देश में कट्टरपंथ ही बढ़ेगा। जो राय आर्गेनाइजर ने दी है, वही विश्व हिन्दू परिषद का कहना है। विश्व हिन्दू परिषद के एक पदाधिकारी ने वह कारण बताया है जिस कारण से आज हिन्दू अपने सारे धर्मस्थल वापस लेने की बात कह रहे हैं।

VHP के संयुक्त महासचिव सुरेन्द्र कुमार ने कहा, “1984 में भारत के संतों ने एक बढ़िया ऑफर मुस्लिम समाज को दिया था कि आप हमें सिर्फ अयोध्या, काशी और मथुरा दे दीजिए, हम लाखों को भूल जाएँगे। लेकिन आज जो स्थिति बनी है, उसके जिम्मेदार मुस्लिम नेता और सेक्युलर हैं।”

सुरेन्द्र कुमार ने कहा, “अयोध्या हमने लिया है, कोर्ट से लड़ कर लिया है। अब दो बचे हैं, अगर अब भी आगे बढ़ कर उन्हें मुस्लिम समाज सौंप दे तो हम समाज के जागृत वर्ग को समझा सकेंगे कि सब जगह पर ऐसे (खुदाई-सर्वे) के प्रयास नहीं हो सकते। पूज्य सरसंघचालक जी ने सही ही कहा है। उन्होंने सबके लिए बात कही है… अब भी समय है मुस्लिम समाज के पास, काशी मथुरा सौंप दें तो हिन्दू समाज सौहार्द के लिए रुक सकता है।”

देश के आजाद होने के बाद से अब पहली बार ऐसा समय आया है कि जब हिन्दुओं ने अपने धर्मस्थल वापस लेने के संघर्ष को गति दी है और वह सेक्युलरिज्म के झाँसे में नहीं आ रहे। संभल जैसी जगहों पर इन प्रयासों की वजह से 1978 के दंगे तक की सच्चाई बाहर आ गई। लेकिन यह प्रश्न सिर्फ धर्म का नहीं बल्कि हमारी हिन्दू सभ्यता के अवशेष बचाने और उसको संरक्षित करने का है। सरसंघचालक मोहन भागवत और आर्गेनाइजर का विचार एक ही है, बस उसे व्यक्त अलग तरीके से किया गया है।

हम गुरु गोविंद सिंह के पुत्र हैं, अपना धर्म नहीं छोड़ सकते… जब साहिबजादों ने इस्लाम की जगह चुना बलिदान: वीर बाल दिवस पर राष्ट्र का नमन, राष्ट्रपति ने 17 बच्चों को दिए राष्ट्रीय बाल पुरस्कार

26 दिसंबर को आज जब पूरा देश वीर बाल दिवस मना रहा है, ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी गुरु गोबिंद सिंह के साहिबजादों को याद किया। उन्होंने कहा कि छोटी सी उम्र में जिस तरह साहिबजादे अपने विश्वास और सिद्धांतों पर अडिग रहे थे, उनका वो साहस पीढ़ियों को प्रेरित करने वाल है। पीएम मोदी ने माता गुजरी को भी याद करते हुए लिखा कि वो प्रार्थना करते हैं कि माता गुजरी और गुरु गोबिंद सिंह हमेशा समाज निर्माण में उनका मार्ग दर्शन करते रहें।

आज के दिन राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने भी राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र में 17 बच्चों को उनकी असाधारण उपलब्धियों के लिए राष्ट्रीय बाल पुरस्कार प्रदान किया। साथ ही उनकी असीमित क्षमताओं और अतुलनीय गुण के लिए उनकी तारीफ की। राष्ट्रपति ने कहा कि 2047 में जब हम भारत की स्वतंत्रता की शताब्दी मनाएँगे, तब ये पुरस्कार विजेता देश के प्रबुद्ध नागरिक होंगे। ऐसे प्रतिभाशाली लड़के-लड़कियाँ विकसित भारत के निर्माता बनेंगे।

बता दें कि वीर बाल दिवस के दिन गुरु गोबिंद सिंह के दोनों बेटों को यूँ ही याद नहीं किया जाता। आज के समय में जिस धर्म को बचाने की बात लोग सिर्फ सोशल मीडिया पर करते हैं, उसी धर्म की रक्षा में गुरु गोबिंद सिंह के साहिबजादों ने 26 दिसंबर 1704 को अपने प्राण बलिदान कर दिए थे। आइए आज उनके उस बलिदान को फिर याद करें…

साहिबजादों को दीवार में चुनवाया गया

वैसे तो सिख गुरु गोबिंद सिंह ने औरंगजेब के भेजे वजीर खान से कई युद्ध लड़े थे और उसे कई बार धूल भी चटाई थी, लेकिन 1704-05 में वजीर खान ने आनंदपुर साहिब को घेरकर गुरु गोबिंद सिंह पर धोखे से आघात करने की साजिश रची थी। मौजूदा जानकारी बताती है कि उस समय वजीर खान की फौज ने सिख सैनिकों से बार-बार पराजय झेलने के बाद आनंदपुर साहिब को चारों ओर से घेर लिया था और रसद-पानी की किल्लत पैदा करके उन्हें कमजोर करने की कोशिश की थी। इसके बाद उन्होंने संधि का प्रस्ताव देकर कहा था कि अगर गुरु गोविंद सिंह दुर्ग छोड़ देते हैं तो उन्हें और उनके परिवार को सुरक्षित निकलने के लिए रास्ता दिया जाएगा। इसके लिए मुग़ल सूबेदारों ने कुरान तक की कसम खाई थी।

हालाँकि, गुरु गोविंद सिंह ने पहले ही शर्त रख दी थी अगर वो ऐसा करते हैं तो गुरु-शिष्य का रिश्ता नहीं रहेगा। इसके बाद लगभग आठ महीने के समय तक आनंदपुर साहिब को मुगलों ने घेरे रखा और एक दिन कुरान की सौगंध को धता बताते हुए खालसा सेना पर आक्रमण कर दिया। इस दौरान सिख सेना ने गुरु गोविंद सिंह, उनकी माँ गुजरी देवी और चारों साहिबजादों (अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फ़तेह सिंह) के साथ दुर्ग छोड़ने की योजना बनाई।

वो 21 दिसंबर, 1704 की रात थी। स्थान था सरसा नदी का तट। मौसम था ठंड और बारिश का। ऐसे कठिन समय में भी अजीत सिंह (19) और जुझार सिंह (14) को लेकर गुरु गोविंद सिंह किसी तरह चमकौर की गढ़ी तक पहुँचने में कामयाब रहे, लेकिन परिवार के बाकी लोग उनसे बिछुड़ गए। जोरावर सिंह और फ़तेह सिंह के साथ उनकी दादी थीं, माँ गुजरी देवी।

गुरु गोविंद सिंह का एक पुराना रसोइया था, जिसके गाँव में जाकर इन तीनों ने शरण ली। लेकिन, उसने विश्वासघात किया और दोनों बच्चों को वजीर खान को सौंप दिया। क्रूर वजीर खान ने इन दोनों को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद ठंड के मौसम में उन्हें ठंडी जगह में रखा गया। वजीर खान ने दोनों साहिबजादों, जोरावर सिंह(9) और फतेह सिंह(6) के समक्ष शर्त रखी कि वो इस्लाम अपना लें, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। वजीर खान ने उन दोनों को ज़िंदा दीवार में चुनवाने का आदेश दिया। दोनों छोटे बच्चों ने कहा कि वो अपना धर्म कभी नहीं छोड़ सकते।

इस दौरान उन्होंने अपने दादा गुरु तेग बहादुर के बलिदान को भी याद किया और कहा- “हम गुरु गोविंद सिंह के पुत्र हैं, जो अपना धर्म कभी नहीं छोड़ सकते।” असल में पहले वजीर खान ने इन दोनों बच्चों को दीवार में चुनवाने के लिए मलेरकोटला के नवाब को सौंपना चाहा, जिसका भाई सिखों के साथ युद्ध में मारा गया था। लेकिन, उसने ऐसा करने से इनकार करते हुए कहा कि उस युद्ध में इन दोनों बालकों का क्या दोष? वजीर खान को लगा था कि वो बदले की आग में जल रहा होगा।

दोनों साहिबजादों में जोरावर सिंह बड़े थे। जब दीवार ऊपर उठने लगी तो उनकी आँखों में आँसू आ गए। इस पर छोटे भाई ने पूछा कि क्या वो बलिदान देने से डर गए, इसीलिए रो रहे हैं? जोरावर सिंह ने जवाब दिया कि ऐसी बात नहीं हैं। वो तो ये सोच कर दुःखी हैं कि छोटा होने के कारण फ़तेह सिंह दीवार में पहले समा जाएँगे और उनकी मृत्यु पहले हो जाएगी। उन्होंने कहा- “दुःख यही है कि मेरे से पहले बलिदान होने का अवसर तुम्हें मिल रहा है।” उन्होंने कहा- “मैं मौत से नहीं डरता, वो मुझसे डरती है।”

इतिहास के किसी युद्ध में बच्चों के साथ इस तरह की अमानवीयता का उदाहरण फिर कहीं नहीं मिलता। इसके बाद फिर चमकौर की गढ़ी में भी युद्ध हुआ, जिसमें वीरता का प्रदर्शन करते हुए गुरु गोविंद सिंह के बाकी दोनों बेटों अजीत सिंह और जुझार सिंह का भी निधन हो गया। वहीं गुरु गोविंद सिंह की माँ गुजरी देवी की बात करें तो कहते हैं, अपने दोनों पोतों की मृत्यु की खबर सुनते ही उन्हें ऐसा सदमा लगा था कि उनका भी निधन हो गया था।

यही कारण है कि दिसंबर महीने का सिख पंथ में एक अलग स्थान है। चमकौर के युद्ध में तो अंतिम सिख सैनिक भी बलिदान हो गया था लेकिन लड़ते-लड़ते। इस तरह गुरु गोविंद सिंह के चारों बेटों और माँ का बलिदान हुआ, लेकिन सिख सेना ने उन्हें कुछ नहीं होने दिया। इसके बाद ही वजीर खान को अपनी क्रूरता के कारण डर का एहसास होने लगा था और ये चार साहिबजादों का बलिदान ही था कि आगे के सिखों में वीरता और बहादुरी कई गुनी हो गई और उनका साहस आसमान छूने लगा।

केजरीवाल को एंटी नेशनल क्यों कहा, हम पर क्यों कराई FIR, संदीप दीक्षित को चुनाव क्यों लड़ाया… कॉन्ग्रेस को AAP का अल्टीमेटम, कहा- INDI गठबंधन से निकाल देंगे

दिल्ली विधानसभा चुनावों से पहले INDI गठबंधन के साथी आम आदमी पार्टी (AAP) और कॉन्ग्रेस के बीच खींचतान बढ़ गई है। आम आदमी पार्टी ने कहा कि गठबंधन से कॉन्ग्रेस को हटाने के लिए वह इंडिया ब्लॉक के अन्य दलों से बातचीत करेगी। दरअसल, दिल्ली विधानसभा चुनावों में अलग-अलग मैदान में उतरी कॉन्ग्रेस ने AAP पर जनता को धोखा देने का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई है। इतना ही नहीं, हाल ही में कॉन्ग्रेस नेता अजय माकन ने कहा अरविंद केजरीवाल को राष्ट्र विरोधी कह दिया। माकन ने कहा कि साल 2013 में AAP को समर्थन देने के कारण दिल्ली में पार्टी का पतन हुआ।

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए AAP के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने अरविंद केजरीवाल को राष्ट्र विरोधी कहने वाले अजय माकन के खिलाफ 24 घंटे के भीतर कार्रवाई करने के लिए कॉन्ग्रेस को अल्टीमेटम दिया है। संजय सिंह ने कहा कि कॉन्ग्रेस के अजय माकन भाजपा की स्क्रिप्ट पढ़ रहे हैं। दिल्ली का चुनाव जीतने के लिए कॉन्ग्रेस अब भाजपा से मदद ले रही है।

वहीं, दिल्ली की मुख्यमंत्री आतिशी ने कहा कि कॉन्ग्रेस के उम्मीदवारों की सूची भाजपा कार्यालय से तय हो रही है। आतिशी ने दावा किया कि संदीप दीक्षित सहित कांग्रेस उम्मीदवारों का चुनाव खर्च भाजपा द्वारा वहन किया जा रहा है। उन्होंने कहा, “कॉन्ग्रेस ने दिल्ली चुनाव के लिए भाजपा के साथ मिलीभगत की है। भाजपा कॉन्ग्रेस उम्मीदवारों को धन मुहैया करा रही है। संदीप दीक्षित को भाजपा से धन मिल रहा है।”

मुख्यमंत्री आतिशी ने कहा, “अगर कॉन्ग्रेस सोचती है कि हम (AAP) राष्ट्र विरोधी हैं तो उन्होंने हमारे साथ गठबंधन करके लोकसभा चुनाव क्यों लड़ा? यह स्पष्ट है कि कॉन्ग्रेस नेताओं ने आम आदमी पार्टी (AAP) को हराने और दिल्ली में भाजपा को जिताने के लिए भाजपा के साथ कुछ आपसी समझौता किया है।” उन्होंने ऐसे कई सीटों के नाम लिए, जहाँ कॉन्ग्रेस नेताओं को बीजेपी द्वारा फंडिंग की गई।

मुख्यमंत्री आतिशी ने कहा कि संदीप दीक्षित के अलावा जंगपुरा से पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के खिलाफ चुनाव लड़ रहे कॉन्ग्रेस प्रत्याशी फरहाद सूरी को भी भाजपा फंडिंग कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सूरी को करोड़ों रुपए का फंड दे रही है। उन्होंने कहा कि अगर अरविंद केजरीवाल देश विरोधी हैं तो लोकसभा चुनावों में अरविंद केजरीवाल से प्रचार क्यों करवाया?

दरअसल, AAP प्रमुख अरविंद केजरीवाल और मुख्यमंत्री आतिशी के खिलाफ युवा कॉन्ग्रेस ने जनता को धोखा देने का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई है। दरअसल, केजरीवाल ‘मुख्यमंत्री महिला सम्मान योजना’ और ‘संजीवनी योजना’ के प्रचार कर रहे थे। इसी दौरान दिल्ली सरकार के दो विभागों ने सार्वजनिक नोटिस जारी कर कहा था कि ये दोनों योजनाएँ अस्तित्व में नहीं हैं। इसके बाद यह शिकायत दी गई।

पोस्टर पर राहुल-सोनिया-प्रियंका और नक्शे से Pok गायब, जिस बेलगावी में CWC की बैठक वहाँ लगाए: बीजेपी बोली- भारत को छिन्न-भिन्न करना चाहती है कॉन्ग्रेस

कर्नाटक के बेलगावी में कॉन्ग्रेस कार्यसमिति (CWC) की दो दिवसीय कार्यसमिति की बैठक में भारत का गलत मानचित्र लगाया गया है। इसमें अक्साई चिन और जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग दिखाया गया है। इसको लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने कहा कि राहुल गाँधी की मोहब्बत की दुकान चीन के लिए हमेशा खुला रहता है। कॉन्ग्रेस देश को तोड़ देंगे। वे एक बार ऐसा कर चुके हैं और फिर वे ऐसा करेंगे।

कॉन्ग्रेस की बैठक में जो भारत का नक्शा दिखाया गया है, उसमें जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान में दिखाया गया है। अब कॉन्ग्रेस ने बैकफूट पर आते हुए कहा कि जिस बैनर पर भारत का गलत मानचित्र दिखाया गया है, वह पार्टी की आधिकारिक बैनर नहीं है। बता दें कि बेलगावी में कॉन्ग्रेस कार्यसमिति की 26 दिसंबर और 27 दिसंबर को बैठक है।

कर्नाटक भाजपा ने सोशल मीडिया साइट एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट में कहा, “कर्नाटक कॉन्ग्रेस ने बेलगावी में अपने कार्यक्रम में एक विकृत नक्शा प्रदर्शित करके भारत की संप्रभुता के प्रति घोर अनादर दिखाया है, जिसमें कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया गया है। यह सब सिर्फ़ अपने वोट बैंक को खुश करने के लिए किया गया है। यह शर्मनाक है।”

कर्नाटक के पूर्व सीएम और भाजपा सांसद बसवराज बोम्मई ने कहा, “कॉन्ग्रेस की बैठक को कर्नाटक सरकार द्वारा वित्त पोषित किया जा रहा है। यह पूरी तरह से अनुचित है। राजनीतिक उद्देश्यों के लिए सार्वजनिक धन का उपयोग करना मनमानी है। सीएम को कर्नाटक के लोगों को बताना चाहिए कि किस प्रावधान के तहत धन मंजूर किया गया है और जारी किया जा रहा है। यह निंदनीय है।”

कॉन्ग्रेस पर हमला बोलते हुए भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा, “गुरु गोविंद सिंह के साहबजादों के बलिदान के इस पावन अवसर पर देश वीर बलिदान दिवस मना रहा है। इस अवसर पर एक दूसरी तस्वीर सामने आई है, जो पीड़ादायक है। बेलगावी में कॉन्ग्रेस की कार्यसमिति की बैठक में एक नक्शा सामने आया, जिसमें पाक अधिकृत कश्मीर (POK) और अक्साई चिन गायब है।”

उन्होंने आगे कहा, “कई बार इन लोगों (कॉन्ग्रेस) ने ऐसा किया है। महत्वपूर्ण बात ये है कि ये महात्मा गाँधी की तस्वीर के साथ लगाई गई है। भारत को छिन्न-भिन्न करने का स्वप्न देखने वाली शक्तियाँ… भारत को तोड़ने का ख्वाब देखने वाली ताकतों के साथ कॉन्ग्रेस के गठजोड़ की साजिश अब एकदम साफ हो गई है।”

त्रिवेदी ने कॉन्ग्रेस पर हमला करते हुए कहा, “क्या ये वही भारत देश है, जिसके लिए महाराणा प्रताप ने घास की रोटी खाई थी? इसके लिए शिवाजी ने जान की बाजी लगाई थी? जिसके कारण रण में कूदी रानी लक्ष्मीबाई थी। जिसके कारण भगत सिंह ने फाँसी गले लगाई थी। जिसके कारण गुरुपुत्रों ने अपनी जान लुटाई थी। जिस भारत माँ के टुकड़े करते, तुम्हें लाज ना आई थी, उस भारत भारत माँ की छवि तुमने आज दिखाई थी।”

ठेके की नौकरी, ₹13000 की सैलरी… पर BMW में चलता था, गर्लफ्रेंड को गिफ्ट में दे दिया 4BHK फ्लैट: डायमंड का चश्मा बनवाया, महाराष्ट्र सरकार के खजाने से चुराए ₹21.59 करोड़

13000 रुपए कमाने वाले के पास लग्जरी कार, हीरे जवाहरात और 4 बीएचके वाला फ्लैट शुरुआती करियर में एक सपने जैसा होता है… लेकिन क्या आप यकीन करेंगे कि महाराष्ट्र सरकार में कॉन्ट्रैक्ट पर 13000 रुपए की सैलरी में काम करने वाले एक युवक के पास ये सब मिला। उसकी लग्जरी लाइफ देख बड़े-बड़े लोग भी हैरान रह गए और उससे भी ज्यादा उन्हें ये देखकर धक्का तब लगा जब सबको पता चला कि उसने ये सब हासिल कैसे किया।

आरोपित का नाम हर्ष कुमार अनिल क्षीरसागर है। उसने और उसके साथी ने मिलकर इंटरनेट बैंकिंग के माध्यम से महाराष्ट्र सरकार को 21 करोड़ 59 लाख और 38 लाख रुपए का चूना लगाया। बाद में इन पैसों से इन्होंने एक बीएमडब्लू कार और बाइक खरीदी और बाद में एयरपोर्ट के पास एक 4 बीएचके फ्लैट भी खरीदा जो कि आरोपित ने अपनी गर्लफ्रेंड के लिए लिया था। इसके बाद जो पैसे बचे उससे वो हीरा जड़ित चश्मा बनवाने पहुँचा था।

हर्ष ने स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स के नाम पर खोले गए खाते का दुरुपयोग किया। उसने फर्जी दस्तावेज तैयार किए और बैंक को धोखा देकर इंटरनेट बैंकिंग सक्रिय की। इसके बाद, उसने अपने व्यक्तिगत खातों में पैसे ट्रांसफर किए। यह घोटाला जुलाई 2024 से दिसंबर 2024 के बीच हुआ और इसकी जानकारी तब मिली जब विभागीय अधिकारियों ने लेनदेन में अनियमितताओं को देखा।

जाँच में पता चला कि आरोपितों ने खेल परिसर के लिए सरकार से मिलने वाली धनराशि को जमा करने के लिए खेल परिसर के नाम से इंडियन बैंक में खाता खोला था। इस खाते में लेनदेन डिप्टी स्पोर्ट्स डायरेक्टर द्वारा साइन किए गए चेक के जरिए किया जाता है, लेकिन आरोपित हर्ष कुमार क्षीरसागर, ने फर्जी दस्तावेज तैयार करके बैंक को दिए और इंटरनेट बैंकिंग के लिए अपना नंबर एक्टिव करने के बाद रकम को अपने खाते में ट्रांसफर कर लिया।

धोखाधड़ी का ये मामला 6 महीने बाद जाकर खुला। हाल में इस मामले की शिकायत नंदीग्राम कॉलोनी के खेल अधिकारी तेजस दीपक कुलकर्णी द्वारा दर्ज कराई गई थी। पुलिस ने जाँच शुरू की और हर्ष सहित अन्य आरोपितों को गिरफ्तार करने के लिए अपने एक्शन लेने शुरू कर दिए। बताया जा रहा है कि इस मामले में एक आरोपित अभी भी फरार है।

द सैटेनिक वर्सेस: जिस किताब के कारण 13 लोग मारे गए, जामिया से निकाल फेंका गया वाइस-चांसलर… फिर से बिक रही भारत में, कट्टरपंथी मुस्लिम दे रहे ‘बर्दाश्त नहीं’ करने की धमकी

भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक सलमान रुश्दी की किताब ‘द सैटेनिक वर्सेस’ भारत में लौट आई है। यह किताब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने बैन कर दी थी। इसे इस्लामी कट्टरपंथियों के विरोध के चलते बैन किया गया था। लगभग 40 वर्षों के बाद यह किताब भारत के पाठकों के लिए उपलब्ध हुई है। किताब के वापस लौटने का मुस्लिमों ने विरोध किया है। किताब दिल्ली हाई कोर्ट में हुई एक सुनवाई के चलते भारत लौट सकी है। मुस्लिम मौलानाओं ने माँग है कि किताब पर दोबारा से बैन लगा दिया जाए और इसे भारतीय बाजारों में उपलब्ध ना होने दिया जाए।

क्यों बैन हुई थी किताब?

सलमान रुश्दी की यह किताब 1988 में पहली बार प्रकाशित हुई थी। सलमान रुश्दी जन्मे भारत में थे लेकिन बाद में वह इंग्लैंड चले गए थे और यहीं उन्होंने यह किताब लिखी थी। इस्लामी कट्टरपंथियों का कहना है कि इस किताब का कथानक इस्लाम के विश्वासों का मजाक उड़ाता है और अपमान करता है। इस किताब में पैगम्बर मोहम्मद जैसे एक पात्र, उनकी 12 पत्नियों को लेकर भी लिखा गया है।

सलमान रुश्दी ने किताब में कहीं-कहीं ऐसा दिखाने की कोशिश की थी कि कुरान में पैगम्बर मुहम्मद द्वारा लिखी गई बातें उन्हें अल्लाह के फ़रिश्ते ने नहीं बताई बल्कि उन्होंने खुद लिखी थी। इसके अलावा उनकी 12 पत्नियों के नामों पर भी लिखा गया है। उन 12 पत्नियों के नाम इस किताब में 12 वेश्याएँ रख लेती हैं। इसके अलावा भी किताब में इस्लाम से जुड़ी बहुत सी धारणाओं से मिलती जुलती कहानी बनाकर उन पर प्रहार किया गया था।

इसके बाद सलमान रुश्दी के खिलाफ दुनिया भर में मुस्लिम गुस्सा हो गए थे। मुंबई में इस किताब को लेकर दंगे हुए थे जिसमे 12 लोगों की मौत हुई थी। जामिया के वैस चांसलर मुशीरुल हसन को किताब के बैन की आलोचना के चलते निकाल दिया गया था और इस्लामी कट्टरपंथियों ने उन्हें बेरहमी से पीटा था।

कश्मीर में भी एक आदमी मारा गया था। यहाँ तक कि 1989 में ईरान के मुल्ला शासक आयतुल्लाह खुमैनी ने लेखक सलमान रुश्दी का सर कलम करने का आदेश दुनिया भर के मुस्लिमों को दिया था। इस किताब को बैन करने का आह्वान तत्कालीन कॉन्ग्रेस सांसद सैयद शहाबुद्दीन और खुर्शीद आलम खान (कॉन्ग्रेस नेता सलमान खुर्शीद के अब्बा) ने भारत में किया था।

शहाबुद्दीन ने किताब के खिलाफ याचिका दायर कर इस पुस्तक को सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा बताया था। इसके बाद राजीव गाँधी की सरकार ने 26 सितंबर 1988 को ब्रिटेन में पहली बार पब्लिश इस किताब पर 10 दिनों के भीतर बैन लगा दिया था। भारत इसे बैन करने वाला पहला देश था। इसे मुस्लिम बहुल बांग्लादेश में नवम्बर, 1988 में बैन किया गया था।

किताब के भारत में आयात पर रोक लगाई गई थी। इसके बाद राजीव गाँधी पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगा था। कॉन्ग्रेस सरकार ने बाद में इसके लेख सलमान रुश्दी के भारत आने पर भी रोक लगा दी थी। यह बैन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने हटा दिया था।

कैसे हटा बैन, अब कहाँ मिल रही?

दिल्ली हाई कोर्ट में नवम्बर, 2024 में हुई एक सुनवाई में यह स्पष्ट हुआ था कि इस किताब के आयात पर रोक लगाने वाली अधिसूचना अब मौजूद ही नहीं है। कोर्ट ने तब कहा था, “अब हमारे पास यह मानने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है कि ऐसी कोई अधिसूचना मौजूद नहीं है। इसलिए हम इसकी वैधता की जाँच नहीं कर सकते।” इस अधिसूचना को साल 2019 में संदीपन खान नाम के व्यक्ति ने कोर्ट में चुनौती दी थी। उन्होंने न्यायालय को बताया कि वे पुस्तक पर प्रतिबंध होने के कारण इसे आयात नहीं कर पा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि अधिसूचना न तो किसी आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध है और न ही किसी प्राधिकरण के पास उपलब्ध है। संदीपन खान ने RTI के तहत केंद्रीय गृह मंत्रालय से इस संबंध में जवाब भी माँगा था। गृह मंत्रालय ने जवाब में कहा था कि ‘द सैटेनिक वर्सेज’ पर प्रतिबंध लगा है। गृह मंत्रालय ने आदेश के मुताबिक, सीमा शुल्क विभाग से भी याचिका का बचाव करने को कहा गया था। वहीं, केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क के अधिकारी प्रतिबंध से संबंधित अधिसूचना कोर्ट में पेश नहीं कर पाए।

इसके बाद कोर्ट ने इसे अस्तित्वहीन मान लिया और खान को यह पुस्तक आयात करने की अनुमति दे दी। पीठ ने कहा, “याचिकाकर्ता उक्त पुस्तक के संबंध में कानून के अनुसार सभी कार्रवाई करने का हकदार होगा।” दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद सैटेनिक वर्सेज के आयात पर 36 साल से लगा प्रतिबंध खत्म हो गया है। अब इसे कोई भी आयात कर सकता है। इसके बाद स्पष्ट हो गया था कि अब यह किताब भारत में आ सकती है। यह किताब अब दिल्ली के किताब विक्रेताओं के पास आ गई है। किताब का दाम ₹1999 है।

अब मुस्लिम फिर कर रहे विरोध

मुस्लिमों ने इस किताब की भारत में एंट्री को लेकर फिर से विरोध जताया है। जमीयत उलेमा-ए-हिन्द उत्तर प्रदेश के लीगल एडवाइजर मौलाना काब रशीदी ने कहा है कि इस किताब में ईशनिंदा की गई है और इसकी बिक्री मुस्लिमों को भड़काने का प्रयास है। उन्होंने कहा है कि मुस्लिम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। रशीदी ने इस किताब को दोबारा बैन करने की माँग की है। एक और मौलाना शहाबुद्दीन रिजवी ने कहा है कि कोई भी मुस्लिम इस किताब को दुकानों में देख कर बर्दाश्त नहीं करेगा।

क्रिसमस पर 17+ ईसाई घरों में बांग्लादेशी इस्लामी भीड़ ने लगाई आग, प्रार्थना करने चर्च गए थे सभी लोग: पीड़ित बोले- पहले से मिल रही थी धमकियाँ

बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समुदायों पर अत्याचार थमने का नाम नहीं ले रहे। हाल में क्रिसमस के मौके पर ईसाई समुदाय के 17-19 घरों को जला दिया गया। घटना बंदरबन के लामा उपजिला की है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह हमला 25 दिसंबर को शाम के वक्त हुआ। उस समय गाँव के लोग दूसरे गाँव में स्थित चर्च में प्रार्थना करने गए थे। उसी दौरान इस कृत्य को अंजाम दिया गया। इस हमले 17-19 घर पूरी तरह नष्ट हो गए। पीड़ितों में से एक गुंगामणि त्रिपुरा ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा, “हमारे घर पूरी तरह जलकर राख हो गए हैं। कुछ भी नहीं बचा।”

जानकारी के मुताबिक, बुधवार को रात करीब 12:30 बजे पड़ोसी गाँव में क्रिसमस की प्रार्थना करने गए ग्रामीणों ने अपने गाँव में आग जलती देखी और फौरन अपने घरों की ओर भागे, लेकिन जब तक वह पहुँचते तब तक सारे घर जलकर खाक हो चुके थे। गाँव के सभी घर बांस और घास-फूस से बने थे, इसलिए घर जल्दी जल गए।

ईसाई समुदाय के लोगों ने बताया कि इस घटना में उनका 15 लाख टका (बांग्लादेशी करंसी) से ज्यादा का नुकसान हुआ है। ग्रामीणों ने बताया कि उन्हें कुछ समय से धमकियाँ मिल रही थीं और इसीलिए वे चर्च जाते समय गांव में किसी को भी नहीं छोड़ते थे। 25 दिसंबर की रात जब वो लोग गए तो इस घटना को अंजाम दिया गया। घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस ने तुरंत घटनास्थल का दौरा किया। स्थानीय प्रशासन ने प्रभावित परिवारों को राहत सामग्री के रूप में चावल, दाल, तेल और कंबल उपलब्ध कराए हैं। मगर, पीड़ितों की चिंता ये है कि वो लोग रहेंगे कहाँ।

बता दें कि त्रिपुरा समुदाय के ये ईसाई लोग लामा सराय के एसपी गार्डन में रहते थे। गार्डन हसीना सरकार में बड़े अधिकारी रहे बेनजीर अहमद का है। 5 अगस्त को तख्तापलत के लोग बेनजीर के परिवार के लोग ये जगह छोड़ गए और यहाँ त्रिपुरा ईसाई समुदाय के लोग आ गए। उन्होंने दावा किया कि उनके पूर्वज यहीं रहा करते थे, लेकिन कब्जे के बाद उन्हें जाना पड़ा था।

हिंदू महिला को अगवा कर पैरों में बाँध दी लोहे की जंजीर, जबरन मुस्लिम बनाकर करता था रेप: असम पुलिस ने मुनाफ अली को पकड़ा, प्रॉपर्टी के लिए करता था प्रताड़ित

असम के कछार जिले में मुस्लिम युवक द्वारा एक हिन्दू महिला को बंधक बनाने का मामला सामने आया है। जनजातीय समुदाय की इस पीड़िता के पैरों में लोहे की जंजीर बाँध दी गई थी। उसे लगातार प्रताड़ित करके इस्लाम कबूल करने पर मजबूर किया गया। पुलिस ने इस मामले में केस दर्ज करके मुनाफ अली नाम के आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है। इस घटना का हिन्दू संगठनों ने कड़ा विरोध किया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 3 महीने पहले स्थानीय लोगों द्वारा बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को मुनाफ अली के घर में किसी हिन्दू महिला के बंधक होने की जानकारी दी थी। उन्होंने बताया कि महिला को जंजीरों में बाँध कर बेरहमी से मारा-पीटा जाता है। इस जानकारी की तस्दीक बजरंग दल के सदस्यों ने करवाई तो सूचना सही पाई गई। इसके बाद मामले की जानकारी फ़ौरन पुलिस को दी गई।

पुलिस ने मौके पर पहुँचकर पीड़िता को जंजीरों से मुक्त करवाया और मुनाफ अली को गिरफ्तार कर लिया। पीड़िता की प्रताड़ना का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में महिला के बाएँ पैर में लम्बी जंजीर बँधी दिख रही है। जंजीर इतनी लम्बी थी कि पीड़िता अधिकतम घर के कुछ हिस्सों में ही पहुँच सकती थी।

हिन्दू संगठन के सदस्यों का आरोप है कि महिला का लगभग 12 साल पहले मुनाफ अली ने अपहरण कर लिया था। तब से उसे बंधक बनाकर रखा गया था। जानकारी के मुताबिक, मुनाफ अली ने पीड़िता को डरा-धमका कर इस्लाम कबूल करवा कर निकाह कर लिया था। निकाह के बाद मुनाफ अली बार-बार महिला को उसकी पुश्तैनी जमीन अपने नाम करने का दबाव बनाता था।

जब पीड़िता मना करती थी तो उसकी बुरी तरह से पिटाई की जाती थी। विगत 12 वर्षों में आरोपित ने पीड़िता से जबरन शारीरिक संबंध बनाए। इस वजह से पीड़िता ने 5 बच्चों को जन्म दिया। ये बच्चे अभी मुनाफ अली के भाई के कब्ज़े में हैं। पीड़िता ने पुलिस को बताया कि मुनाफ अली ने उसके साथ बहुत अत्याचार किया है। उसने उसकी गला घोंटकर मारने का भी प्रयास किया था।

पीड़िता का कहना है कि वह कहीं भाग न जाए इसके चलते मुनाफ अली उसके पैरों में जंजीर बाँध कर रखता था। एक दिन महिला ने शोर मचा कर अपने पड़ोसियों से मदद माँगी थी। पड़ोसियों ने हिन्दू संगठनों से सम्पर्क किया और आखिरकार ये मामला पुलिस तक पहुँच गया। बजरंग दल के सदस्यों ने वैदिक अनुष्ठान से पीड़िता की हिन्दू धर्म में घर वापसी करवाई है।

जम्मू में दंगा भड़काने के लिए मरे हुए गाय-बछड़ों को हिंदू बहुल इलाकों में देते थे फेंक, पुलिस ने मुख्तियार, तारिक और आरिफ को पकड़ा

जम्मू कश्मीर में ऐसे गोतस्कर को पुलिस ने पकड़े हैं, जो गायों को मार करके हिन्दू इलाकों में फेंकते थे। यह इस काम के जरिए लोगों को भड़काना और दंगा करवाना चाहते थे। पुलिस ने इस गिरोह के 3 लोग पकड़े हैं। इन्होने जम्मू कश्मीर के नगरोटा में हाल ही में यही करने का प्रयास किया, जिसके बाद इनकी गिरफ्तारी हुई।

पुलिस की गिरफ्त में आए इन तीनों गोतस्करों का नाम मुख्तियार अहमद, तारिक हुसैन और आरिफ है। यह तीनों लम्बे समय से गोतस्करी करते थे। गोतस्करी के लिए यह क्रूरता से गोवंशों को ट्रकों में भरते थे। क्रूरता के चलते जो गोवंश पहले ही मारे जाते थे, उनको यह गोतस्कर हिन्दू बहुल इलाकों में फेंक दिया करते थे।

मंगलवार (24 दिसंबर, 2024) को भी इन तीनों ने इसी साजिश को अंजाम देने का प्रयास किया था। इन्होंने नगरोटा के जगटी-राजपुर मार्ग पर गोवंश फेंके थे। मंगलवार की सुबह इसी राह से कुछ स्थानीय लोग सड़क से जा रहे थे। इसी दौरान उन्हें बदबू आने लगी। आसपास के लोगों ने पास जा कर देखा तो खाई में गाय और बछड़ा मृत अवस्था में पड़े मिले।

कुछ ही देर में यह बात आसपास के इलाकों में फ़ैल गई। स्थानीय लोगों के साथ हिन्दू संगठन से जुड़े सदस्य भी घटनास्थल पर पहुँचने लगे। ये सभी घटना पर नाराजगी व्यक्त कर रहे थे। जब यह जानकारी पुलिस को मिली तो स्थानीय SHO परवेज सज्जाद पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुँचे।

लोगों के आक्रोश को देखते हुए उन्होंने आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए 24 घंटों का समय माँगा। लोगों को समझा कर वापस भेजा गया। आरोपितों की पहचान के लिए इलाके के CCTV फुटेज खँगाले गए और अन्य सबूतों को जुटाया गया। एक फुटेज में रजिस्ट्रेशन नंबर 2195 का एक ट्रक चिन्हित हुआ। इसी को आधार बना कर पुलिस ने अपनी जाँच आगे बढ़ाई।

पुलिस ने ट्रक के जरिए हुई पड़ताल के आधार पर इन तीनों को दबोच लिया। इनमें से मुख्तियार कश्मीर के अनंतनाग का रहने वाला है जबकि आरिफ और तारिक का घर जम्मू के रियासी क्षेत्र में है। इन सभी पर विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। पुलिस की पूछताछ में इन तीनों ने अपना गुनाह कबूल कर लिया। पुलिस ने इनके ट्रक को भी सीज कर दिया है।

पुलिस की पूछताछ में इन्होने बताया है कि 2 महीने पहले भी इन्ही तीनों ने मिल कर जगटी इलाके में एक मृत गाय फेंक दी थी। तब नाराज हिन्दुओं ने इस घटना के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किया था। इन्होने आगे बताया कि गोवंश फेंक कर वह हिन्दू-मुस्लिम दंगा भड़काना चाहते थे।