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‘हमारे 4 MLA को बीजेपी ने छिपा रखा है, वो लगातार सम्पर्क में हैं, जल्द लौटेंगे’

महाराष्ट्र में भले ही नई सरकार का गठन हो गया हो, लेकिन राजनीतिक उथल-पुथल का दौर अब भी जारी है। अजित पवार के उप-मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही NCP, शिवसेना की तीखी प्रतिक्रियाएँ लगातार सामने आ रही हैं। कहीं, विधायकों के लापता होने की ख़बरें हैं, तो कहीं बीजेपी पर विधायकों को बरगलाने का आरोप लग रहा है। NCP नेता नवाब मलिक ने अपने हालिया बयान में दावा किया है कि उनके चार विधायकों को बीजेपी ने कहीं छिपा रखा है।

मीडिया से मुख़ातिब होते हुए उन्होंने कहा, “50 विधायक हमारे साथ हैं, लेकिन हर कोई होटल में नहीं है, 4 विधायक जो भाजपा के लोगों द्वारा कहीं छिपाए गए हैं, लगातार हमारे सम्पर्क में हैं और निश्चित रूप से वे वापस आएँगे।” इससे पहले उन्होंने दावा किया था कि हमारे पास नंबर है और फ्लोर टेस्ट में फडणवीस सरकार गिर जाएगी। साथ ही उन्होंने फडणवीस के इस्तीफ़े की माँग भी की।

इसके अलावा, नवाब मलिक उस टीम का हिस्सा थे, जिसने न्यूनतम साझा कार्यक्रम (कॉमन मिनिमम प्रोग्राम) की चर्चा की और राज्य में सरकार बनाने के लिए NCP-शिवसेना और कॉन्ग्रेस को एक साथ लाने में अहम भूमिका निभाई थी। मलिक ने अजित पवार पर आरोप लगाया था कि उन्होंने हाज़िरी के लिए विधायकों के लिए गए हस्ताक्षरों का दुरुपयोग किया है।  

बता दें कि महाराष्ट्र में जारी सियासी उठापठक के बीच एनसीपी के वे दो विधायक सामने आ गए हैं जो गुमशुदा बताए जा रहे थे। विधायक दौलत दारोगा और नितिन पवार की गुमशुदगी को लेकर शिकायत भी दर्ज कराई गई थी। दोनों ने सामने आने के बाद एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार और शनिवार को राज्य के उप मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले अजित पवार, दोनों के प्रति निष्ठा जताई।

यह बेहद दिलचस्प है क्योंकि अजित पवार के भाजपा को समर्थन देने के बाद शरद पवार ने उन्हें विधायक दल के नेता पद से हटा दिया था। उन्होंने यह भी कहा था कि बीजेपी को समर्थन अजित का व्यक्तिगत फैसला है न कि पार्टी का। इसके बाद एनसीपी विधायकों की बैठक भी हुई थी। बैठक के बाद पार्टी प्रवक्ता नवाब मलिक ने कहा था कि केवल चार-पॉंच विधायक ही नेतृत्व के साथ नहीं हैं।

ग़ौरतलब है कि फडणवीस और अजित पवार के शपथ ग्रहण को शिवसेना, कॉन्ग्रेस और एनसीपी ने सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दे रखी है। सोमवार को इस मामले में तीन सदस्यीय पीठ ने सुनवाई करते हुए तत्काल बहुमत परीक्षण की मॉंग नहीं मानी। अदालत ने राज्यपाल का आदेश और फडणवीस की तरफ से उन्हें सौंपे गए समर्थन पत्र की कॉपी मंगलवार को पेश करने का निर्देश दिया है।

अजित के घर में देखे गए शिवसेना नेता: शरद पवार ने कहा- NCP भाजपा के साथ नहीं, भतीजा ग़लत बोल रहा

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अजित पवार के ट्विटर पर फॉलोवर्स की संख्या बढ़ गई है। उन्होंने एक-एक कर सभी की बधाई का धन्यवाद दिया। उनके घर पर भी हलचल बढ़ गई है और वो एक-एक कर अपने गुट के नेताओं से मिल रहे हैं। इस दौरान शिवसेना नेता नरेंद्र पाटिल अजित पवार के घर उनसे मिलने पहुँचे। भाजपा नेता निरंजन डावखरे भी अजित पवार के आवास पर पहुँचे। पवार लगातार बैठक कर रहे हैं और अपने गुट के नेताओं के साथ विचार-विमर्श कर रहे हैं। हालाँकि, शिवसेना नेता अजित पवार के घर क्यों पहुँचे हैं, इस बारे में अभी कुछ स्पष्ट नहीं कहा गया है।’

अजित पवार ने कहा कि एनसीपी उनकी पार्टी है और उन्होंने न तो पार्टी छोड़ी है और न ही भविष्य में ऐसा करेंगे। उन्होंने कहा कि शरद पवार उनके नेता हैं और भाजपा-एनसीपी का गठबंधन हो चुका है। शरद पवार ने अपने भतीजे के इस बयान का खंडन करते हुए कहा है कि ये भ्रामक और ग़लत है। सीनियर पवार ने आरोप लगाया कि अजित जनता के बीच ग़लत सन्देश देने और असमंजस की स्थिति पैदा करने के लिए ऐसे बयान दे रहे हैं। चाचा-भतीजा के बीच इस ‘ट्विटर वॉर’ के कारण महाराष्ट्र की लड़ाई और दिलचस्प हो गई है। शरद पवार ने कहा कि एनसीपी शिवसेना और कॉन्ग्रेस के साथ है। जबकि अजित ने कहा था कि एनसीपी भाजपा के साथ है।

उधर भाजपा विधायकों की भी बैठक ख़त्म हो गई है। बैठक के बाद भाजपा नेता आशीष शेलार ने कहा कि भाजपा आराम से बहुमत साबित कर देगी। उन्होंने बताया कि भाजपा का समर्थन कर रहे अन्य निर्दलीय विधायकों की बैठक किसी अन्य स्थल पर होगी। उधर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने आरोप लगाया कि भाजपा सुप्रीम कोर्ट से ज्यादा समय चाहती है ताकि कॉन्ग्रेस विधायकों को प्रलोभन देकर खरीद सके। चव्हाण ने कहा कि विधानसभा के सबसे वरिष्ठ नेता को प्रोटेम स्पीकर बनाया जाना चाहिए।

शिवसेना, कॉन्ग्रेस और एनसीपी, तीनों दलों के विधायक अलग-अलग होटलों में रुके हुए हैं। उद्धव ठाकरे ने इन विधयकों से मुलाक़ात की। उन्होंने और शरद पवार ने एनसीपी विधायकों को सम्बोधित करते हुए कहा कि उनका ये गठबंधन लम्बे समय तक चलेगा। पवार ने अपने विधायकों को ढाँढस बंधाते हुए कहा कि घबराने की बात नहीं है क्योंकि विपक्षी दलों के पास संख्याबल है।

उद्धव के CM बनने का सपना टूटा: शिवसेना समर्थक ने नस काटकर की आत्महत्या की कोशिश

महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही सूबे की राजनीति में कोहराम मचा हुआ है। शिवसेना ने भाजपा के साथ अपना चुनाव पूर्व गठबंधन तोड़ दिया। शनिवार को जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के रूप में देवेन्द्र फडणवीस ने शपथ ली। उस शपथ के साथ ही उद्धव ठाकरे के हाथ से सीएम पद की कुर्सी चली गई।

सियासी उठापटक में शिवसेना की हालत ने उसके समर्थकों को काफी हतोत्साहित कर दिया है। उद्धव ठाकरे के सीएम न बन पाने से आहत होकर पार्टी के ही एक व्यक्ति ने आत्महत्या की कोशिश की।

मीडिया में आ रहीं रिपोर्ट्स के मुताबिक मुंबई से 580 किलोमीटर दूर उमरी गाँव के रहने वाले रमेश जाधव ने फडणवीस के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने की खबर सुनते ही ब्लेड से अपना हाथ काट लिया। मामले की ज्यादा जानकारी देते हुए दिग्रास पुलिस स्टेशन के एक अधिकारी ने बताया कि यह घटना वाशिम जिले के मानोरा चौक की है।

उन्होंने बताया कि जैसे ही चौराहे पर खड़े ट्रैफिक पुलिस के पुलिसकर्मी ने उसे (जाधव को) अपना हाथ काटते देखा तो वह फ़ौरन उसके पास दौड़कर चले गए। इसके बाद शिवसेना के उस समर्थक को अस्पताल ले जाया गया जहाँ उसका इलाज किया गया। मामले की जाँच करने वाले एक अधिकारी के अनुसार रमेश ने शराब पी हुई थी, उसने यह हरकत भी शराब के नशे में की।

बता दें कि महाराष्ट्र में चल रहे सियासी ड्रामे के बीच बीजेपी और एनसीपी के नेता अजीत पवार ने शनिवार सुबह आपस में गठबंधन कर लिया था। इसके बाद देवेन्द्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री और अजीत पवार ने उप-मुख्यमंत्री की शपथ ली थी। हालाँकि इससे एक रात पहले शिवसेना के नेता संजय राउत ने एलान किया था कि उद्धव ठाकरे अगले मुख्यमंत्री होंगे मगर इससे पहले कि वह अपना अगला दाँव खेल पाते। भाजपा ने पहले ही खेल पलट कर अपनी सरकार बना ली।

अली मियाँ से ओवैसी तक केवल चेहरे बदले, नहीं मिटा रामलला पर मन का खोट

हॉं, हमने कह दिया अकीदा और मस्जिद बेची नहीं जा सकती, न ही कहीं और ले जाई जा सकती है। मस्जिद में जब एक बार नमाज अदा कर दी जाती है, तब से वह खुदा की हो जाती है। खुदा की चीज को हम कैसे किसी को दे सकते हैं।

अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढॉंचा गिराए जाने से भी पहले यह बात ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) के तत्कालीन अध्यक्ष मौलाना सैयद अबुल हसन नदवी उर्फ़ अली मियॉं ने कही थी। सितंबर 1992 में जनसत्ता को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने यह बात तब कही जब उनसे पूछा गया- क्या आप इस विवाद के सिलसिले में अंतिम बार 18 अगस्त को प्रधानमंत्री से मिले थे?

27 साल पुराना ये बयान आपको इसलिए याद दिलाया ताकि आप राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से मुस्लिम पक्ष खासकर, एआईएमपीएलबी और जमीयत-उलेमा-ए-हिंद जैसे मुस्लिम संगठनों तथा ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी जैसों के स्वघोषित नुमाइंदों के बयानों पीछे छिपी मंशा को समझ सकें। एआईएमपीएलबी के मौजूदा सचिव जफरयाब जिलानी ने न्यूज एजेंसी आईएनएस को दिए हालिया इंटरव्यू में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को शरीयत के खिलाफ बताया है। उनसे फैसले की ज्यादातर तबकों में सराहना होने और इस मामले में सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से पु​नर्विचार याचिका दायर नहीं करने को लेकर सवाल पूछा गया था। जिलानी ने यह भी कहा कि चाहे समुदाय विशेष की जितने लोग इस फैसले का समर्थन करे कोई फर्क नहीं पड़ता और न ही सभी के विचारों पर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान जिलानी ने सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से पैरवी की थी। एआईएमपीएलबी जहॉं इस मामले में पुनर्विचार याचिका दायर करने का फैसला कर चुका है, वहीं सुन्नी वक्फ बोर्ड ने इससे इनकार किया है। पुनर्विचार याचिका दायर करना कानूनी हक है और इस फैसले को लेकर सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए। लेकिन, इसकी पीछे की मंशा की चुगली खुद इनके वो बयान करते हैं, जो इन्होंने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से पहले दिए थे।

सुप्रीम कोर्ट में 16 अक्टूबर को इस मामले की सुनवाई पूरी होने के अगले दिन जिलानी ने कहा था- अयोध्या मसले पर किसी तरह की मध्यस्थता का अब कोई मतलब नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का जो भी निर्णय आएगा मानेंगे। बोर्ड के ही एक अन्य सदस्य सैयद अतहर अली ने कहा था- यह एक भूमि विवाद है। हमने कोर्ट में पर्याप्त साक्ष्य पेश किए हैं। कोर्ट का जो भी फैसला होगा हम उसका सम्मान करेंगे। लेकिन नौ नवंबर फैसला आते ही जिलानी के सुर बदलने लगे। फैसले के तत्काल बाद उन्होंने कहा- हम फैसले का सम्मान करते हैं, लेकिन संतुष्ट नहीं हैं। फैसले में कई विरोध हैं, इसलिए हम पुनर्विचार याचिका दायर करेंगे। इसके बाद एआईएमपीएलबी ने पुनर्विचार याचिका दायर करने का फैसला कर लिए तो 17 नवंबर को जिलानी ने कहा- हमें अयोध्या मसले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला मँजूर नहीं है। हम पुनर्विचार याचिका दाखिल करेंगे। मस्जिद के बदले हम कोई और जमीन कबूल नहीं कर सकते।

फैसला का सम्मान करने की बात कहने वाले जिलानी पहले पुनर्विचार याचिका और फिर शरीयत पर कैसे आए यह उसका नमूना भर है। उनकी तरह ही सुर जमीयत-उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी के भी बदले। उन्होंने 17 अक्टूबर को कहा- हम सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्था का बेहद सम्मान करते हैं। जो फैसला आएगा उसका सम्मान करेंगे। फैसले से ठीक पहले 6 नवंबर को दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में पत्रकारों से बात करते हुए मदनी ने कहा- कानून हमारा है। सुप्रीम कोर्ट हमारी है। जो भी फैसला होगा हम उसका एहतराम करेंगे। लेकिन, उसी दिन शरीयत का हवाला देते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा, “बाबरी मस्जिद, कानून और न्याय की नजर में एक मस्जिद थी। करीब 400 साल तक मस्जिद थी। लिहाजा शरीयत के हिसाब से वो आज भी मस्जिद है। सत्ता और ताकत के दम पर उसे कोई भी रूप दे दिया जाए कयामत तक वह मस्जिद ही रहेगी।” इसके बाद 17 नवंबर को मदनी ने कहा- सुप्रीम कोर्ट का फैसला समझ से परे है। हमारी पुनर्विचार याचिका 100 फीसद खारिज हो जाएगी, इसके बावजूद हम याचिका दाखिल करेंगे। यह हमारा हक है। अगर मस्जिद न तोड़ी गई होती तो क्या सुप्रीम कोर्ट मस्जिद तोड़कर मंदिर बनाने के लिए कहता? दो दिन बाद 19 नवंबर को इकोनॉमिक टाइम्स में उनका एक इंटरव्यू प्रकाशित हुआ। इसमें और आगे बढ़ते हुए उन्होंने कहा, “सुप्रीम कोर्ट के फैसले में, सभी सबूत बाईं ओर इशारा करते हैं, जबकि फैसला दाईं ओर जाता है।” इतना ही नहीं उन्होंने यह भी कहा कि हिंदुओं को मंदिर बनाने के लिए जगह राम जन्मभूमि से अलग दी जानी चाहिए थे। ओवैसी ने तो फैसला आते ही कह दिया था कि उनके मजहब को खैरात नहीं चाहिए और उसके बाद से लगातार इस मसले पर भड़काऊ बयानबाजी कर रहे हैं।

राम जन्मभूमि को लेकर ये सारे जहर तब उगले गए जब इस मामले के दो मुख्य पक्षकार इकबाल अंसारी और सुन्नी वक्फ बोर्ड ने पुनर्विचार याचिका दाखिल नहीं करने की बात कही है। लेकिन, इस मामले में मुस्लिम पक्ष अपना स्टैंड शुरू से ही बार-बार बदलते रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में बताया है कि अली मियॉं के अब्बा मौलाना हकीम अब्दुल हई ने अरबी में ‘हिंदुस्तान इस्लामी अहमदे’ नाम से एक किताब लिखी थी। अली मियॉं ने इस किताब का उर्दू अनुवाद किया। इस किताब में सात मंदिरों का जिक्र था, जिन्हें तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी। इनमें से एक बाबरी मस्जिद भी थी। इस किताब के ‘हिंदुस्तान की मस्जिदें’ अध्याय में बाबरी मस्जिद बनाने का पूरा ब्योरा दर्ज था।

शर्मा लिखते हैं कि जब यह विवाद चल रहा था कि बाबरी मस्जिद मंदिर को तोड़कर बनाई गई है या नहीं, तो उस समय इंडियन एक्सप्रेस के संपादक रहे अरुण शौरी के कहने पर उन्होंने इस किताब की खोज की। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में यह किताब थी पर शर्मा को नहीं दिखाई गई। उस समय शर्मा जनसत्ता के लखनऊ ब्यूरो में काम करते थे। उन्होंने अली मियॉं से अपने संपर्कों के आधार पर उस अध्याय की फोटो कॉपी लेकर अरुण शौरी को भेजी। शौरी ने इंडियन एक्सप्रेस में इसका हवाला दे लेख लिखा। कहा कि अब क्या सबूत चाहिए। यह तो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पिता का ही लिखा है। आप जानकर हैरत में रह जाएंगे कि शौरी का वह लेख छपते ही वह किताब दारुल उलूम नदवदुल उलेमा और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी सहित सभी इस्लामी संस्थानों के पुस्तकालय से गायब हो गई।

जाहिर है, इस मसले को विवाद का मुद्दा बनाने वाले मुस्लिम नुमाइंदे और संगठन पहले दिन से जानते हैं कि सच क्या है। कल भी रामलला को लेकर उनके मन में जहर भरा था और आज भी है। वे बस बहरुपिए हैं जो बीच-बीच में झाँसा देने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करने जैसी बातें करते हैं। अदालत से जब उनके हक़ में फैसला नहीं आता तो वो धार्मिक भावनाओं को भड़काने के लिए शरीयत का हवाला देने लगते हैं।

इसमें रत्ती भी संदेह नहीं कि राम जन्मभूमि आस्था से जुड़ा मसला है और इसे वापस पाने के लिए हिंदू करीब 500 साल से संघर्ष कर रहे थे। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि उसके निर्णय का आधार आस्था नहीं है। कोर्ट के फैसले का मुख्य आधार एएसआई की रिपोर्ट थी जिसके अनुसार बाबरी मस्जिद के नीचे हिंदू ढॉंचा होने के प्रमाण मिले थे। साथ ही शीर्ष अदालत ने यह भी साफ़ कर दिया था कि सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड इस जमीन पर अपना दावा होने के सबूत पेश करने में नाकाम रहा था।

ऐसे में वो वक़्त आ गया है जब मजहब के आम लोगों को आगे आकर स्पष्ट करना चाहिए कि ओवैसी जैसे नेता या फिर जमीयत और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी संस्थाएँ उनकी ठेकेदार नहीं हैं। उनके लिए राम असल मायनों में ‘इमाम-ए-हिन्द’ हैं। वरना लोग तो पूछेंगे ही कि अली मियाँ से ओवैसी तक आते-आते उनकी नीयत का खोट क्यों नहीं मिटा? आज जिस भाषा मैं ओवैसी बोल रहे उसी जुबान में 90 के दशक की शुरुआत में अली मियाँ ने कहा था- यह झगड़ा अदालत के दायरे से बाहर है। अदालत का फैसला शायद ही माना जाए।

मैं NCP में ही हूँ और रहूँगा, शरद पवार हमारे नेता: अजित पवार ने कहा- BJP और NCP का हो चुका है गठबंधन

महाराष्ट्र के नव-निर्वाचित उप-मुख्यमंत्री अजित पवार ने साफ़ कर दिया है कि उन्होंने एनसीपी नहीं छोड़ी है। अपने ताज़ा ट्वीट में उन्होंने स्पष्ट कहा है कि उन्होंने न तो पार्टी छोड़ी है और न ही उनका ऐसा कोई इरादा है। अजित ने लिखा कि वो भविष्य में भी एनसीपी में बने रहेंगे। साथ ही उन्होंने कहा कि उनके चाचा शरद पवार उनके नेता है। बता दें कि शरद पवार एनसीपी के संस्थापक-अध्यक्ष हैं। अजित पवार ने लिखा कि महाराष्ट्र में भाजपा और एनसीपी गठबंधन की सरकार पाँच साल चलेगी।

इससे पहले उन्होंने अपने ट्विटर बायो में ‘डिप्टी सीएम’ लिख कर अपडेट किया। इससे पता चलता है कि भाजपा और अजित सदन में बहुमत साबित करने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं। जबकि विरोधी खेमों में अच्छी-ख़ासी हलचल देखने को मिल रही है। उद्धव ठाकरे अपने विधायकों को ढाँढस बँधा रहे हैं कि सरकार शिवसेना की ही बनेगी। उद्धव एनसीपी के विधायकों के होटल में जाकर उन्हें भी आश्वासन दे रहे हैं कि ये गठबंधन लम्बा चलेगा। शरद पवार का कहना है कि उनकी पार्टी के 54 में से लगभग 50 विधायक उनके साथ हैं। वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि 43 एनसीपी विधायक अजित पवार के साथ हैं।

अजित पवार कह रहे हैं कि शरद पवार उनके नेता हैं और राज्य में भाजपा-एनसीपी की सरकार बनेगी। ऐसे में, अब ये समझना कठिन हो गया है कि एनसीपी का गठबंधन कॉन्ग्रेस और शिवसेना के साथ है या फिर भाजपा के साथ। अजित पवार की मानें तो भाजपा के साथ और शरद पवार की मानें तो कॉन्ग्रेस के साथ। अजित पवार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी धन्यवाद देते हुए कहा है कि अगले 5 सालों तक देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार चलेगी। अजित ने ट्विटर पर केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले और अन्य नेताओं सहित सभी की शुभकामनाओं का जवाब दिया।

उधर शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले ने उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे और शायद पवार के भाई के पोते रोहित पवार के साथ फोटो डाल कर दिखाया कि दोनों दलों के पास अगली लाइन की लीडरशिप तैयार है। रोहित और आदित्य पहले से ही दोस्त हैं। शरद पवार के भाई के पोते पार्थ हैं, जो अजित पवार के बेटे हैं। उनके दूसरे भाई के पोते रोहित हैं, जिन्होंने हाल ही में विधानसभा चुनाव जीता है। पार्थ लोकसभा चुनाव हार गए थे।

अजित की बगावत के बाद रोहित ने अपने फेसबुक पर प्रोफाइल व कवर फोटो में शरद पवार के साथ वाली तस्वीर लगाई थी। उन्होंने अजित सहित पूरे परिवार की तस्वीर लगा कर उन्हें लौट आने की अपील भी की। रोहित पवार ‘ऑल इंडिया शुगर मिल्स एसोसिएशन’ के अध्यक्ष हैं।

बाबरी वर्षगाँठ पर CM योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में सुरक्षा तंत्र को दुरुस्त करने का दिया निर्देश

योगी आदित्यनाथ ने 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद विध्वंस की वर्षगाँठ से पहले पर्याप्त सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करने के लिए सभी नागरिकों और पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया है।

इस महीने की 9 तारीख को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवादित भूमि पर ऐतिहासिक फ़ैसला दिया था। इसके तहत मंदिर निर्माण के लिए हिन्दुओं को पूरी विवादित ज़मीन देने का फ़ैसला सुनाते हुए मस्जिद के लिए अयोध्या में ही विवादित स्थल से अलग पाँच एकड़ ज़मीन देने के आदेश दिया था।

अधिकतर मुस्लिम याचिकाकर्ताओं ने मस्जिद के लिए पाँच एकड़ ज़मीन के आदेश को खारिज कर दिया था और शीर्ष अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ उन्होंने एक समीक्षा याचिका दायर करने की योजना बनाई।

ख़बर के अनुसार, सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करने वाले सीएम योगी ने कहा कि सभी सुरक्षा व्यवस्था 15 दिसंबर तक लागू रहेगी। एक आधिकारिक बयान के अनुसार, सीएम ने गश्त, यूपी-112 पेट्रोलिंग के साथ पीस कमिटियों, धर्मगुरुओं और समाज के प्रमुख लोगों से लगातार संवाद कायम रखने पर ज़ोर दिया।

सीएम योगी ने धार्मिक स्थलों, वाणिज्यिक और औद्योगिक प्रतिष्ठानों, एटीएम और बैंकों समेत अन्य महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर सीसीटीवी कैमरे लगाने की आवश्यकता को भी रेखांकित किया है।

ख़बर के अनुसार, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार की देर शाम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए ज़िला, रेंज और मंडल के पुलिस और प्रशासनिक अफसरों के साथ क़ानून-व्यवस्था सहित महत्वपूर्ण मुद्दों की समीक्षा कर रहे थे। उन्होंने कहा कि अधिकारी मुख्यालय से लेकर प्रत्येक स्तर पर कम से कम एक घंटा जनसुनवाई के लिए सुनिश्चित करें। महिला अपराधों पर तेजी से कार्रवाई करने के निर्देश देते हुए सीएम ने पॉक्सो ऐक्ट से जुड़े मामलों में प्रगति पर संतोष जताया। सीएम ने प्लास्टिक, थर्मोकोल, पॉलीथीन के प्रयोग को प्रभावी तरीके से रोकने को कहा।

इसके अलावा, उन्होंने शिक्षा विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिए कि प्राथमिक विद्यालयों में छात्र-छात्राओं को हर हाल में 30 नवंबर तक स्वेटर उपलब्ध कराए जाएँ। इस लापरवाही बरतने वाले संबंधित डीएम और बीएसए के ख़िलाफ़ ठोस कार्रवाई की जाएगी। जनगणना कार्यक्रम से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों को जनगणना के साथ पारदर्शिता व ईमानदारी से कार्य करते हुए शौचालय निर्माण और अन्य योजनाओं से जुड़े आंकड़ों पर नज़र रखने के निर्देश भी दिए गए।

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‘राम प्रहर’ में शपथ लेने वाले फडणवीस कभी भी साबित कर देंगे बहुमत: सुनते ही विधायकों से मिलने भागे उद्धव

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सोमवार (नवंबर 25, 2019) को महाराष्ट्र मामले में फिर से सुनवाई की जाएगी। उस दिन राज्यपाल के आदेश की कॉपी भी कोर्ट में रखी जाएगी। भाजपा और कॉन्ग्रेस, दोनों ही इसे अपनी जीत के रूप में दर्शा रही है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने कहा है कि वो सुप्रीम कोर्ट का आभार व्यक्त करते हैं। उन्होंने कहा कि देवेंद्र फडणवीस की नई सरकार अवैध है और इसे जाना होगा। उधर भाजपा ने भी मुंबई में अपने विधायकों की बैठक बुलाई। भाजपा नेता आशीष शेलार ने कहा कि जब भी मौक़ा मिलेगा, भाजपा सदन में बहुमत साबित कर के दिखा देगी।

उधर उद्धव ठाकरे को न सिर्फ़ अपनी पार्टी बल्कि कॉन्ग्रेस और एनसीपी की भी चिंता सता रही है। वह मातोश्री से निकल कर ललित होटल में रुके शिवसेना विधायकों से मिलने पहुँचे। उससे पहले वो पोवई में स्थित आरएमसी सेंटर पहुँचे, जहाँ एनसीपी के विधायकों को ठहराया गया है। उनके साथ शिवसेना के सुभाष देसाई और संजय राउत भी थे। एकनाथ सिंदे को पहले से ही वहाँ तैनात कर के रखा गया है। इसके बाद उद्धव जुहू के जेडब्ल्यू मैरियट होटल पहुँचे, जहाँ उन्होंने कॉन्ग्रेस के विधायकों से मुलाक़ात की।

फ़िलहाल तीनो ही विपक्षी पार्टियों के विधायकों को अलग-अलग होटलों में रखा, ठाकरे उन सभी पर नज़र बनाए रखना चाहते हैं। इधर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद भाजपा भी एक्टिव मोड में आ गई है। अगर सुप्रीम कोर्ट आज ही बहुमत साबित करने का आदेश देता तो दिक्कतें आ सकती थीं। पार्टी को पता है कि समय बहुत कम है और बहुमत साबित करना कोई आसान काम नहीं है। कॉन्ग्रेस के कई नेता भाजपा पर ‘लोकतंत्र की हत्या’ का आरोप लगा रहे हैं। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी ऐसा ही आरोप लगा चुके हैं।

फडणवीस को शपथ दिलाए जाने के समय पर टिप्पणी करते हुए भाजपा नेता आशीष शेलार ने कहा कि उस वक़्त ‘राम-प्रहर’ चल रहा था और यही वो समय होता है जब लोग संघ की शाखाओं में जाते हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा कभी भी भगवान श्रीराम को नहीं भूल सकती है। शेलार ने कहा कि ‘राम प्रहर’ का अपना महत्व होता है और इसे ‘रात के अँधेरे में शपथ लेने’ का तमगा देना सही नहीं है।

अजित पवार के साथ हैं NCP के 43 विधायक: शरद पवार के दावों की सुप्रीम कोर्ट में खुली पोल

महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार को शपथ दिलाए जाने के ख़िलाफ़ विपक्षी पार्टियाँ सुप्रीम कोर्ट पहुँची, जहाँ दोनों पक्ष अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। अगली सुनवाई सोमवार (नवंबर 25, 2019) को होगी। इस दौरान राज्यपाल के आदेश की कॉपी भी कोर्ट में रखी जाएगी। एनसीपी-कॉन्ग्रेस की तरफ से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए। सिंघवी ने इस दौरान अजित पवार का समर्थन कर रहे विधायकों की संख्या को लेकर राज़ खोल दिया। जहाँ एनसीपी दावा कर रही है कि उसके 54 में से 49 विधायक वापस लौट आए हैं। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट में सिंघवी ने अलग ही दावा किया।

सुनवाई के दौरान कॉन्ग्रेस नेता सिंघवी ने पूछा कि मात्र 42-43 विधायकों के समर्थन से अजित पवार उप-मुख्यमंत्री कैसे बन सकते हैं? उन्होंने इसे ‘लोकतंत्र की हत्या’ करार दिया। सिंघवी ने अपनी दलीलें रखते हुए कोर्ट में कहा कि राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने अपनी जिम्मेदारियाँ ठीक से नहीं निभाई। उन्होंने कहा कि राज्यपाल को विधायकों के हस्ताक्षर वाले पत्र को वेरीफाई करना चाहिए था। उन्होंने कहा कि राज्यपाल ने उन हस्ताक्षरों की पुष्टि नहीं की और शपथग्रहण करा दिया। लेकिन, क्या सिंघवी ने अनजाने में यह बता दिया कि अजित पवार के साथ एनसीपी के 43 विधायक हैं? एनसीपी और सिंघवी के बयान अलग-अलग क्यों?

अगर अभिषेक मनु सिंघवी के बयान पर विश्वास करें तो देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली भाजपा और एनसीपी के अजित धड़े की सरकार आराम से बहुमत साबित कर देगी। 288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा में 105 सीटों वाली भाजपा को बहुमत का जादुई आँकड़ा छूने के लिए 39 अन्य विधायकों के समर्थन की ज़रूरत है। अजित पवार के 43 विधायकों को मिला कर ये आँकड़ा आराम से पार हो जाता है। वहीं अगर एनसीपी के दावों पर विश्वास करें तो भाजपा के लिए संकट खड़ा हो सकता है, क्योंकि अजित पवार के साथ मात्र 3-4 विधायकों के होने की बात ही कही जा रही है।

अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि शुक्रवार (नवंबर 22, 2019) की शाम को ही शिवसेना-एनसीपी और कॉन्ग्रेस के गठबंधन ने उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाए जाने की घोषणा कर दी थी। उन्होंने पूछा कि इस घोषणा के बाद राज्यपाल को जल्दबाजी में फ़ैसला लेने की बजाय इंतजार नहीं करना चाहिए था? राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी फ़िलहाल दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में आयोजित ‘गवर्नर्स कॉन्फ्रेंस’ में हिस्सा ले रहे हैं।

शनिवार को एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने विधायकों की बैठक बुलाई थी। बैठक में अजित पवार को विधायक दल के नेता के पद से हटा दिया गया था। बैठक के बाद एनसीपी के प्रवक्ता नवाब मलिक ने कहा था कि पार्टी के केवल पॉंच विधायक नेतृत्व के संपर्क में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष के लिए होने वाले चुनाव में ही बीजेपी और अजित पवार वाले धड़े की हार तय है। इसके बाद शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस का राज्य में सरकार बनाना तय है।

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‘अहमदिया होकर बाजवा कैसे बन गए पाक आर्मी अध्यक्ष, मुस्लिम ही नहीं है, नियुक्ति अवैध’

पाकिस्तान आर्मी के चीफ कमर जावेद बाजवा को आने वाले वक़्त में नई मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। उनके खिलाफ पेशावर की उच्च अदालत में एक याचिका दायर की गई है। दरअसल अदालत में दायर याचिका में कहा गया है कि बाजवा मुस्लिम ही नहीं हैं। वह कादियानी समुदाय से सम्बन्ध रखते हैं जोकि इस्लाम का हिस्सा नहीं हैं। बता दें कि पाकिस्तान में उसके अपने संविधान के अनुसार किसी भी गैर-मुस्लिम को पाक सेना अध्यक्ष का पद ग्रहण करने की इजाज़त नहीं है।

पाक आर्मी चीफ के खिलाफ यह याचिका पाक आर्मी के पूर्व मेजर खालिद शाह ने पेशावर की अदालत में याचिका दायर की है। उनका आरोप है कि बाजवा जिस अहमदिया समुदाय से आते हैं वह इस्लाम का हिस्सा ही नहीं है। यही वजह है कि उन्होंने आरोप लगाया है कि पाकिस्तान में इस पद पर बाजवा की नियुक्ति असंवैधानिक है।

एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में मुसलामानों के अधिकतर धर्मगुरु अहमदिया समुदाय को इस्लाम का हिस्सा तक नहीं मानते। इसी सम्बन्ध में मामले को लेकर पेशावर की उच्च-अदालत में खालिद शाह ने याचिका दायर कर बाजवा के सेनाध्यक्ष पद पर बने रहे को लेकर सवाल उठाए हैं। अपनी दलील में खालिद ने कहा है कि वह (बाजवा) कादियानी हैं, वह पाक आर्मी के चीफ कैसे बन सकते हैं। पाकिस्तानी संविधान के मुताबिक यह पद किसी भी गैर-मुस्लिम को नहीं दिया जाना चाहिए।

‘कादियानी’ दरअसल अहमदिया समुदाय के लोगों को ही कहा जाता है। इस मामले में बाजवा के अलावा आईएसआई के डीजी रिजवान अख्तर का भी नाम सामने आया है। इस सम्बन्ध में दायर याचिका में रिजवान पर यह आरोप है कि एक मुस्लिम के तौर पर रिजवान ने अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं किया। याचिकाकर्ता ने कहा है कि उन्होंने सरकार से इस बारे में जानकारी छुपाई।

इस मामले को लेकर पेशावर के हाईकोर्ट में दायर दलील में खालिद ने बाजवा के अलावा आईएसआई के डीजी रिजवान अख्तर का भी नाम है। इस सम्बन्ध में दायर याचिका में रिजवान पर यह आरोप है कि एक मुस्लिम के तौर पर रिजवान ने अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं किया। याचिकाकर्ता ने कहा है कि उन्होंने सरकार से इस बारे में जानकारी छुपाई कि बाजवा मुस्लिम नहीं हैं।

बता दें कि 58 वर्षीय बाजवा को नवम्बर 2016 में पाकिस्तान के तत्कालीन पीएम नवाज़ शरीफ ने इस पद पर नियुक्त किया था। इसके बाद इमरान खान की सरकार ने भी बाजवा को इस पद पर रहने के लिए तीन साल का एक्सटेंशन दे दिया था। याचिका में कहा गया है कि बाजवा को हाल ही में इमरान खान सरकार ने जो एक्सटेंशन दिया वह भी अवैध है।

इतिहास में गुम हैं मुगलों को 17 बार हराने वाले अहोम योद्धा: देश भूल गया ब्रह्मपुत्र के इन बेटों को

आपने मुगलों और राजपूतों की लड़ाई ज़रूर सुनी होगी। बाबर के ख़िलाफ़ लड़ाई में सैकड़ों घाव लिए लड़ते राणा सांगा की वीरता और अकबर के विरुद्ध घास की रोटी खा कर आज़ादी का युद्ध लड़ने वाले महाराणा प्रताप का नाम सबसे सुना है। उनकी गाथाएँ घर-घर पहुँचनी चाहिए। आज हम आपको कुछ ऐसे योद्धाओं के बारे में बताना चाह रहे हैं, जिन्होंने मुगलों के पसीने छुड़ाए थे। ये हैं असम के अहोम योद्धा। असम को प्राचीन काल में कामरूप या प्राग्यज्योतियशपुरा के रूप में जाना जाता था। इसकी राजधानी आधुनिक गुवाहाटी हुआ करती थी। इस साम्राज्य के अंतर्गत असम की ब्रह्मपुत्र वैली, रंगपुर, बंगाल का कूच-बिहार और भूटान शामिल था।

जैसे मुगलों को मराठों से बार-बार टक्कर मिली, ठीक उसी तरह अहोम ने भी मुगलों को कई बार हराया। दोनों पक्षों के बीच डेढ़ दर्जन से भी ज्यादा बार युद्ध हुआ। अधिकतर बार या तो मुगलों को खदेड़ दिया गया, या फिर वो जीत कर भी वहाँ अपना प्रभाव कायम नहीं रह सके। असम में आज भी 17वीं सदी के अहोम योद्धा लाचित बरपुखान को याद किया जाता है। उनके नेतृत्व में ही अहोम ने पूर्वी क्षेत्र में मुगलों के विस्तारवादी अभियान को थामा था। अगस्त 1667 में उन्होंने ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे मुगलों की सैनिक चौकी पर जोरदार हमला किया। लाचित गुवाहाटी तक बढ़े और उन्होंने मुग़ल कमांडर सैयद फ़िरोज़ ख़ान सहित कई मुग़ल फौजियों को बंदी बनाया।

मुग़ल भी शांत नहीं बैठे। अपमानित महसूस कर रहे मुगलों ने बड़ी तादाद में फ़ौज अहोम के साथ युद्ध के लिए भेजी। सैकड़ों नौकाओं में मुग़ल सैनिकों ने नदी पार किया और अहोम के साथ एक बड़े संघर्ष की ओर बढ़े। मुगलों ने इस बार काफ़ी मजबूत सेना भेजी थी। लेकिन, इस बार जो हुआ वो इतिहास की हर उस पुस्तक में पढ़ाई जानी चाहिए, जहाँ ‘नेवल वॉर’ या फिर जलीय युद्ध की बात आती है। लाचित के नेतृत्व में अहोम सैनिक सिर्फ़ 7 नौकाओं में आए। उन्होंने मुगलों की बड़ी फ़ौज और कई नावों पर ऐसा आक्रमण किया कि वो तितर-बितर हो गए। मुगलों की भारी हार हुई। इस विजय के बाद लाचित तो नहीं रहे लेकिन इस हार के बाद मुगलों ने पूर्वी क्षेत्र की ओर देखना ही छोड़ दिया। मुगलों की इस हार की पटकथा समझने के लिए थोड़ा और पीछे जाना होगा।

दरअसल, लाचित के इस पराक्रम से 50 साल पहले से ही मुगलों और अहोम के संघर्ष की शुरुआत हो गई थी। सन 1615 में ही मुगलों ने अबू बकर के नेतृत्व में एक सेना भेजी थी, जिसे अहोम ने हराया। हालाँकि, शुरुआत में अहोम को ख़ासा नुकसान झेलना पड़ा, वो अंततः मुगलों को खदेड़ने में कामयाब हुए। दरअसल, 1515 में कूच-बिहार में कूच वंश की शुरुआत हुई। विश्व सिंह इस राजवंश के पहले राजा बने। उनके बेटे नारा नारायण देव की मृत्यु के बाद साम्राज्य दो भागों में विभाजित हो गया। पूर्वी भाग कूच हाजो उनके भतीजे रघुदेव को मिला और पश्चिमी भाग पर उनके बेटे लक्ष्मी नारायण पदासीन हुए। लक्ष्मी नारायण का मुगलों से काफ़ी मेलजोल था। अहोम राजा सुखम्पा ने रघुदेव की बेटी से शादी कर पारिवारिक रिश्ता कायम किया। यहीं से सारे संघर्ष की शुरुआत हुई।

उपजाऊ भूमि, सुगन्धित पेड़-पौधों और जानवरों, ख़ासकर हाथियों के कारण कामरूप क्षेत्र समृद्ध था और मुगलों की इस क्षेत्र पर बुरी नज़र होने के ये भी एक बड़ा कारण था। अहोम ने एक पहाड़ी सरदार को अपने यहाँ शरण दी थी। मुग़ल इस बात से भी उनसे नाराज़ थे। जब शाहजहाँ बीमार हुए, तब उसके बेटे आपस में सत्ता के लिए लड़ रहे थे। इस कलह का फायदा उठा कर अहोम राजा जयध्वज सिंघा ने मुगलों को असम से खदेड़ दिया। उन्होंने गुवाहाटी तक फिर से अपना साम्राज्य स्थापित किया। लेकिन, असली दिक्कत तब आई जब मुग़ल बादशाह औरंगजेब ने उस क्षेत्र में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए बंगाल के सूबेदार मीर जुमला को भेजा।

मार्च 1662 में मीर जुमला के नेतृत्व में मुगलों को बड़ी सफलता मिली। अहोम के आंतरिक कलह का फायदा उठाते हुए उसने सिमूलगढ़, समधारा और गढ़गाँव पर कब्ज़ा कर लिया। मुगलों को 82 हाथी, 3 लाख सोने-चाँदी के सिक्के, 675 बड़ी बंदूकें 1000 जहाज मिले। उन्होंने इनके अलावा भी कई बहुमूल्य चीजें लूटीं। लेकिन, ठण्ड आते ही मुगलों को वहाँ के मौसम में मुश्किलें आने लगी और उनका दिल्ली से संपर्क टूट गया। मुग़ल वहाँ से भाग खड़े हुए। बारिश का मौसम आते ही मुगलों और अहोम राजा जयध्वज सिंघा में फिर युद्ध हुआ लेकिन अहोम को हार झेलनी पड़ी। मुगलों को 1 लाख रुपए देने पड़े और कई क्षेत्र गँवाने पड़े। ‘ग़िलाजारीघाट की संधि’ अहोम को मज़बूरी में करनी पड़ी। जयध्वज को अपनी बेटी और भतीजी को मुग़ल हरम में भेजना पड़ा।

जयध्वज को ये अपमान सहन नहीं हुआ। उनकी मृत्यु हो गई। प्रजा की रक्षा के लिए उन्हें मज़बूरी में विदेशी आक्रांताओं के साथ संधि करनी पड़ी थी। जयध्वज के पुत्र चक्रध्वज ने इसे अपमान के रूप में लिया और मुगलों को खदेड़ना शुरू किया। वो मुगलों को भगाते-भगाते मानस नदी तक ले गए और मीर जुमला ने जितने भी अहोम सैनिकों को बंदी बनाया था, उन सभी को छुड़ा कर ले आए। अहोम ने अपनी खोई हुई ज़मीन फिर से हासिल की। गुवाहाटी से मुगलों को भगाने के बाद मानस नदी को ही सीमा माना गया। इसके बाद चक्रध्वज ने कहा था कि अब वो ठीक से भोजन कर सकते हैं।

इस अपमान के बाद औरंगज़ेब ने एक बहुत बड़ी फ़ौज असम भेजी लेकिन ऐतिहासिक सरायघाट के युद्ध में लाचित बोरपुखान के हाथों उन्हें भारी हार झेलनी पड़ी। ऊपर हमने इसी युद्ध की चर्चा की है, जिसके बाद लाचित मुगलों के ख़िलाफ़ अभियान के नए नायक बन कर उभरे। 50,000 से भी अधिक संख्या में आई मुग़ल फ़ौज को हराने के लिए उन्होंने जलयुद्ध की रणनीति अपनाई। ब्रह्मपुत्र नदी और आसपास के पहाड़ी क्षेत्र को अपनी मजबूती बना कर लाचित ने मुगलों को नाकों चने चबवा दिए। उन्हें पता था कि ज़मीन पर मुग़ल सेना चाहे जितनी भी तादाद में हो या कितनी भी मजबूत हो, लेकिन, पानी में उन्हें हराया जा सकता है।

लाचित ने नदी में मुगलों पर आगे और पीछे, दोनों तरफ से हमला किया। मुग़ल सेना बिखर गई। उनका कमांडर मुन्नवर ख़ान मारा गया। असम सरकार ने 2000 में लाचित बोरपुखान अवॉर्ड की शुरुआत की। ‘नेशनल डिफेंस अकादमी’ से पास हुए सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को ये सम्मान मिलता है। आज भी उनकी प्रतिमाएँ असम में लगी हुई हैं। ऐसे में हमें उन अहोम योद्धाओं को याद करना चाहिए, जिन्होंने मराठाओं और राजपूतों जैसे कई भारतीय समूहों की तरह मुगलों से संघर्ष किया। आज भी 24 नवंबर को ‘लाचित दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।