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‘ज़रूर बनेगा भारत सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य, इस दिशा में तेजी से प्रगति हो रही है’

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भारत की विदेश नीति के सबसे बड़े सपने को लेकर बड़ा बयान दिया है। राज्य सभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि भारत सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के लिए सतत रूप से प्रयासरत है, इसमें प्रगति भी लगातार हो रही है, और मोदी सरकार इस मामले को लेकर धैर्य, आकांक्षा और मेहनत में कोई कोताही नहीं कर रही है। “मैं इतना यथार्थवादी हूँ कि यह समझ सकूँ कि यह एक लम्बा और धैर्य वाला काम है… हम एक दिन वहाँ ज़रूर पहुँचेंगे।”

गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य बनना भारतीय विदेश नीति की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण आकाँक्षाओं में से एक रहा है। संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना, आतंकवाद की परिभाषा, दूसरे देशों पर आतंकी गतिविधियों के लिए प्रतिबंध लगाने जैसे मामलों में निर्णय यही संस्था लेती है। इसमें मौजूदा 5 स्थाई सदस्य हैं- अमेरिका, चीन, रूस, ब्रिटेन और फ़्रांस। इन्हें वीटो शक्ति मिली है- यानी इनमें से कोई एक चाहे तो सुरक्षा परिषद में बाकी सभी की सर्वसम्मति से लिए गए किसी भी फैसले को रोक सकता है।

पाँचों सदस्य देशों में से 4 भारत को इसका सदस्य बनाने के लिए राज़ी हैं, और अलग-अलग मौकों पर इसके लिए प्रतिबद्धता जता चुके हैं। केवल चीन हर महत्वपूर्ण मंच की तरह इस पर भी भारत का विरोध कर रहा है।

इसके पहले अक्टूबर में भी जयशंकर ने सुरक्षा परिषद के मामले पर इसके स्थाई सदस्यों को खरी-खरी नसीहत दोटूक दी थी। उन्होंने कहा था कि भारत का सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता में न होना इस संस्था की ही खुद की विश्वसनीयता को सवालिया घेरे में खड़ा कर देता है। उन्होंने तर्क दिया था कि दुनिया की सुरक्षा के बारे में फैसला लेते समय अन्य देश उस देश (भारत) को कैसे बाहर रख सकते हैं जो 15 सालों के भीतर दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का घर बनने जा रहा है और दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था पहले ही बन चुका है।

यही नहीं, जयशंकर अपने राजनयिक जीवन के दिनों से ही भारत की सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता के मुद्दे से जुड़े रहे हैं।

मी, उद्धव बालासाहेब ठाकरे, महाराष्ट्र राज्याचा मुख्यमंत्री: हिंदूवाद को ना, मराठी माणूस को हाँ, राहुल-सोनिया नदारद

महा विकास अघाड़ी के विधायक दल के नेता के रूप में शिव सेना सुप्रीमो उद्धव बालासाहेब ठाकरे ने महाराष्ट्र के 18वें मुख़्यमंत्री के रूप में शपथ ले ली है। वे अपनी पार्टी से तीसरे (मनोहर जोशी और नारायण राणे के बाद) और महाराष्ट्र पर मज़बूत पकड़ रखने वाले अपने परिवार के पहले मुख्यमंत्री हैं।

रणभेरी और तालियों की गड़गड़ाहट के बीच शिवाजी पार्क में हुए शपथ ग्रहण समारोह में राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी द्वारा शपथ और पदभार ग्रहण करने के लिए बुलाए जाने पर मराठी माणूस राजनीति के खुल कर पैरोकार बने उद्धव ठाकरे ने छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा के चरण स्पर्श किए, और उसके बाद मराठी में ही शपथ ली। उन्होंने अपनी सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम में भी 80% नौकरियों का आरक्षण स्थानीय और मराठी युवाओं के लिए करने का ऐलान किया हुआ है।

अपनी शपथ में पहला शब्द ही हिन्दू पदपादशाही के नायक “छत्रपति शिवाजी” के नाम को रखने वाले महाराष्ट्र के माननीय मुख्यमंत्री के लिए सबसे बड़ी चुनौती इस बेमेल गठबंधन का औचित्य जनता के सामने साबित करने का होगा। लेकिन ऐसा लग नहीं रहा है कि इस चुनौती में उनके नए-नए संगी बने कॉन्ग्रेस नेता उनकी अधिक सहायता करेंगे। कॉन्ग्रेस के दोनों ही आलाकमान सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी ने उनके शपथ ग्रहण से किनारा कर लिया है। दोनों ने महज़ पत्र लिखकर उन्हें शुभकामना देने और सहयोग के आश्वासन की खानापूर्ति कर डाली।

और यह हाल तब है जब उद्धव के बेटे आदित्य ठाकरे खुद सोनिया गाँधी को न्यौता देने गए थे।

जहाँ साथ में सरकार बनाने के बावजूद सोनिया-राहुल ने उद्धव के शपथ ग्रहण में आना ज़रूरी नहीं समझा, वहीं नाराज़ चल रहे चचेरे भाई और उद्धव के प्रमोशन से ही बिफर कर शिव सेना छोड़ने वाले महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे भाई के लिए महत्वपूर्ण मौके पर मौजूद रहे।

सर्वे रिपोर्ट: मोदी-राज में एक साल में 10% घटी रिश्वतखोरी, बिहार-राजस्थान टॉप पर

भ्रष्टाचार कॉन्ग्रेस शासित यूपीए की सत्ता जाने का सबसे बड़ा कारण बना, और नरेंद्र मोदी के 2014 में प्रधानमंत्री बनने और 2019 में बने रहने का सबसे बड़ा कारण इसी एक सामाजिक बीमारी पर नकेल कसना रहा। लेकिन इसके बाद भी कॉन्ग्रेस ही नहीं, अधिकांश अन्य गैर-भाजपा पार्टियाँ इससे कोई सबक सीखने में दिलचस्पी ले रही हों, ऐसा बिलकुल भी नहीं लग रहा है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था ट्रांस्परेंसी इंटरनेशनल के हालिया सर्वे में भारत ने तो 3 स्थानों की छलाँग और देश के भीतर रिश्वरतखोरी की कुल घटनाओं में 10% कमी आई है, लेकिन चोटी पर मौजूद राज्यों की हालत चिंताजनक है। रिपोर्ट के मुताबिक कॉन्ग्रेस के राज्य राजस्थान और भाजपा-जद(यू) के बिहार से सर्वे में हिस्सेदारी करने वालों में क्रमशः 78% और 75% लोगों को इस साल रिश्वत देनी पड़ी है। 180 देशों में भारत 2018 के 81 से इस साल 78 पर भले ही आ गया हो, लेकिन इन उपरोक्त और कुछ अन्य राज्यों की बदहाली चिंताजनक है।

तकरीबन 2 लाख जवाबों के आधार पर बने इस सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक जहाँ पिछले साल देश के 56% लोगों को रिश्वतखोरी का सामना करना पड़ा, वहीं इस साल ऐसे लोगों की हिस्सेदारी गिर कर 51% पर आ गई है। दक्षिण भारत की ओर रुख करें तो 67% भ्रष्टाचार के साथ तेलंगाना चोटी पर है। यही नहीं, इन 67% लोगों में से भी 56% को तो कई-कई बार रिश्वत के कुचक्र से गुज़रना पड़ा है। तेलंगाना के लिए सबसे चिंताजनक चीज़ यह है कि पिछले साल उसके केवल 43% नागरिकों को भ्रष्टाचार से रूबरू होना पड़ा था- यानी तेलंगाना में भ्रष्टाचार और रिश्वतख़ोरी में डेढ़ गुना बढ़ोतरी हुई है।

वहीं इन अपेक्षाकृत ‘विकसित’ और ‘सभ्य’ माने जाने वाले प्रदेशों, और राजस्थान-बिहार की तरह राजनीतिक रूप से ‘ताकतवर’ राज्यों, के मुकाबले आदिवासी-बहुल, पिछड़े-बीमारू और लोक सभा में केवल 22 सांसद भेजने वाले ओडिशा में भ्रष्टाचार बेहद कम रहा है।

इसके अलावा भाजपा-शासित हरियाणा, गुजरात, गोवा भी सबसे कम भ्रष्ट सूबों में हैं। सबसे अधिक भ्रष्ट सूबों में कॉन्ग्रेस का ‘योगदान’ केवल राजस्थान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कर्नाटक (जहाँ कुछ समय पहले तक उसी का शासन रहा) और पंजाब में भी घूसखोरी प्रचलित पाई गई।

गौरतलब है कि मोदी सरकार के आने के बाद से घूसखोरी पर लगाम लगाने के प्रयासों में बहुत तेज़ी आई है। सरकार ने सब्सिडी लीकेज रोकने के लिए तो कदम उठाए ही हैं, रिश्वतखोरों पर भी कार्रवाई बार-बार की है। हाल ही में पाँचवीं बार मोदी सरकार ने सरकारी अधिकारियों के एक पूरे समूह को भ्रष्टाचार के लिए सरकारी सेवा से बाहर कर दिया।

‘सीरिया की जेलों में बंद ISIS जिहादियों को बिना किसी मुकदमे के दी जा सकती है फाँसी’

सीरिया में जेलों में बंद जिहादियों को बिना किसी मुक़दमे के फाँसी की सज़ा दी जा सकती है। राष्ट्रपति बशर अल-असद ने कहा कि वह विशेष आतंकवादी अदालतें स्थापित कर रहे हैं, जहाँ क़ैदियों को ‘सीरियाई क़ानून’ के अधीन किया जाएगा। सीरिया में इस्लामिक स्टेट (IS) का सदस्य होने पर फाँसी की सज़ा का प्रावधान है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, हज़ारों क़ैदियों को गुपचुप तरीके से कुख्यात सैदनया जेल के अंदर दमिश्क के पास मार दिया गया है। कहा जाता है कि यातना और भुखमरी से हज़ारों लोग वहाँ मारे गए थे।

क़ैदियों को नियमित रूप से बेरहमी से पीटा जाता है, उन पर विद्युत और यौन हमले किए जाते हैं। कुछ को जानवरों की तरह काम करने और एक दूसरे को मारने तक के लिए मजबूर किया गया।

असद की इस टिप्पणी का ज़िक्र पेरिस मैच पत्रिका में उनके एक साक्षात्कार में की गई थी। सीरियन डेमोक्रेटिक फ़ोर्सेस, जिन्होंने मार्च में अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन की मदद से ISIS को हराया था, वर्तमान में 2,000 विदेशियों सहित 10,000 से अधिक आतंकवादियों को पकड़ रखा है।

ख़बर के अनुसार, अधिकांश सीरियाई और इराक़ी हैं, जिन्हें जेलों के भीतर रखा जा रहा है, जिनमें तथाकथित जिहादी जैक सहित लगभग 2,000 विदेशी शामिल हैं।

अक्टूबर में, एक आतंकी को टीवी समाचार रिपोर्ट में सीरियाई नरकहोल जेल की फ़र्श पर धमाके करते देखा गया था। उसे उसके माता-पिता ने भी देखा था। जैक लेट्स नाम के इस शख़्स का फुटेज भी सामने आया था, जिसमें उसने ख़ुद को “ब्रिटेन का दुश्मन” घोषित कर दिया था। 23 वर्षीय जैक ने सीरिया में ISIS में शामिल होने के लिए एक आलीशान मध्यवर्गीय जीवन छोड़ दिया था। लेकिन, उसे कुर्द बलों द्वारा पकड़ लिया गया था।

पकड़े जाने के बाद, उसने नम्रतापूर्वक अपने ऑक्सफ़ोर्ड शायर घर में यह कहते हुए वापस जाने की गुहार लगाई कि उसका “ब्रिटेनियों को उड़ाने का कोई इरादा नहीं है।”

हालाँकि, ब्रिटेन लौटने की उसकी संभावनाओं पर ज़ोरदार प्रहार हुआ, जब एसडीएफ ने अमेरिका द्वारा त्याग दिए जाने के बाद मदद के लिए असद का रुख़ किया। अधिकांश यूरोपीय देश अपने नागरिकों को वापस लेने से इनकार कर रहे हैं और इराक में कई फ्रांसीसी ISIS क़ैदियों को पहले ही मौत की सज़ा दी जा चुकी है।

कॉन्ग्रेस जिस कारण से शिवसेना से बचना चाहती थी, उसी हिंदुत्व का लालच बना गठबंधन का गोंद?

अगर मीडिया में आ रही खबरों और मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस के नेताओं के दावो पर यकीन करें तो महाराष्ट्र में ‘महा विकास अघाड़ी’ का असली चाणक्य तो इस पूरे शतरंजनुमा खेल के दौरान महाराष्ट्र में आया ही नहीं। कमलनाथ ने भोपाल में बैठकर ही कथित तौर पर ऐसी लॉबिंग की कि मातोश्री के ‘महल’ से निकल कर सरकार बनाने के लालच में होटलों के पिछले दरवाजे तक पहुँच गए उद्धव ठाकरे की सीएम पद की गोटी फिट हो गई।

‘वादाखिलाफ़ी’ का ताव देकर बेटे की राजनीति में ओपनिंग ही सीएम पद से कराने के इच्छुक उद्धव ठाकरे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से निकल तो आए थे, लेकिन समस्या यह थी कि महज़ 56 विधायक लेकर जाएँ किसके दर पर। हिंदुत्व के नाम से उल्टियाँ करने वाली कॉन्ग्रेस (44 विधायक) के पास जाने का विकल्प (उस समय तक) था नहीं, एनसीपी (54) भी उसी खेमे की थी, और निर्दलीय और अन्य केवल 30 थे- वे भी फडणवीस के पाले में अधिक दिख रहे थे। उनमें भी एक नाराज़ भाई राज ठाकरे की मनसे का था, दो हिन्दुओं के सबसे बड़े विरोधी ओवैसी की पार्टी के। और अगर कहीं न जाते तो भी दिक्कत थी- भाजपा (105 विधायक) देर-सबेर येद्दियुरप्पा फॉर्मूले के तहत किसी न किसी पार्टी के विधायकों से सदन में इस्तीफ़ा दिलाकर बहुमत के लिए ज़रूरी संख्या गिराकर सरकार बना लेती, और इस्तीफ़ा देने वालों को अपने टिकट पर स्थिर सरकार और नैतिक-ईमानदार राजनीति के हवाले से जिता कर पूर्ण सदन में भी संख्याबल का पाला छू लेती।

ऐसे में उद्धव ने तो विचारधारा को तिलांजलि देकर कॉन्ग्रेस के साथ जाने का फैसला कर लिया था, लेकिन पेंच यह फँसा कि भले ही महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस कमेटी सबसे लचर प्रदर्शन के बावजूद मुफ्त में मिल रही सत्ता की मलाई के लिए लालयित थी, लेकिन इसमें राष्ट्रीय आलाकमान को फ़ायदा कम और नुकसान ज़्यादा दिख रहा था। चिंता यह थी कि हिंदुत्व वाली शिवसेना के साथ जाने से मोदी-शाह के राजनीतिक ‘नरसंहार’ में गाजर-मूली की तरह कट रहे कॉन्ग्रेसी वोटों में और कमी न हो जाए- बीच के एकाध अपवादों को छोड़ कर 2012-13 के मोदी-उदय के बाद से कॉन्ग्रेस का वोट-शेयर लगातार गोते खा रहा है, और मज़हब के आधार पर वोट करने वाले लोग भी कहीं ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ माने जाने वाले बाला साहेब की पार्टी देख कर अलविदा न कह दे। गोटी यहीं अटक गई थी। सामने दिल्ली, बिहार, झारखंड के चुनाव थे जहाँ कॉन्ग्रेस बिना ‘अल्पसंख्यक’ वोटबैंक के बहुत मुश्किल में होगी।

एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार जब ‘अस्थाई’ कॉन्ग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी से मिलने पहुँचे थे तो लोगों को उम्मीद थी कि इस पार या उस पार की कोई बात हो जाएगी- शरद पवार न केवल पुराने कॉन्ग्रेसी रह चुके हैं, बल्कि जिस सोनिया गाँधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर उन्होंने कॉन्ग्रेस छोड़ी, उन्हीं सोनिया ने यूपीए में डॉ. मनमोहन सिंह के बाद दूसरे नंबर का मंत्री बनाया, तत्कालीन गृह मंत्री को यह पद देने के प्रोटोकॉल को ताक पर रखते हुए। लेकिन वे भी सोनिया गाँधी को तैयार पूरी तरह नहीं कर पाए।

ऐसे में कथित तौर पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने कथित तौर पर तर्क यह दिया कि एक हिंदूवादी इतिहास वाली पार्टी के साथ गठबंधन कर लेने से कॉन्ग्रेस पर लगा ‘हिन्दू विरोधी’ का ठप्पा कमज़ोर पड़ जाएगा। उन्होंने अपना उदाहरण भी दिया कि कैसे उन्होंने शिवराज सिंह चौहान की पूर्ववर्ती भाजपा सरकार की लकीर छोटी करने के लिए एक साल में इतनी गौसेवा कर डाली है कि उन्हें ‘गौभक्त’ कमलनाथ के नाम से जाना जाने लगा है। यानी जिस हिंदूवाद के नाम से सोनिया गाँधी को एलर्जी हो रही थी, कमलनाथ ने समझाया कि उन्हीं हिंदूवादियों के साथ गठबंधन कर के कॉन्ग्रेस गाँधी-नेहरू के समय से चले आ रहे हिन्दू-विरोधी होने के दाग को हल्का कर सकती है।

मीडिया की खबरों के अनुसार इसके बाद भी सोनिया गाँधी को आश्वस्त होने में 4 दिन लग गए। कमलनाथ के बारे में यह जान लेना ज़रूरी है कि वे न केवल सोनिया गाँधी के खास हैं, बल्कि पूर्व प्रधानमंत्रियों राजीव गाँधी और इंदिरा गाँधी के भी नज़दीकी रहे। इंदिरा उन्हें राजीव-संजय के बाद अपना तीसरा बेटा कहतीं थीं, और उनकी हत्या के बाद हुए सिख दंगों में हत्यारी भीड़ का नेतृत्व करने का आरोप भी कमलनाथ पर लग चुका है।

बहरहाल, येन-केन-प्रकारेण सोनिया गाँधी मान गईं- और आज सीएम की कुर्सी को ताकत का स्रोत नहीं बल्कि उस पर एक अवांछित बाँध मानने वाले बाला साहेब ठाकरे का बेटा उसी कुर्सी के लिए हिंदूवाद को ही राम-राम कर कॉन्ग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बनने जा रहा है। और इस अहसान के लिए उद्धव कमलनाथ के कृतज्ञ भी हैं। मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस के नेताओं का दावा है कि उन्होंने खुद फ़ोन कर के कमलनाथ को अपने शपथ ग्रहण समारोह में आने के लिए आमंत्रित किया है। और कमलनाथ मान भी गए हैं। फुटबॉल के नॉन-प्लेइंग कैप्टेन की तरह बिना मैदान में उतरे ही इस प्रकरण के अहम वार्ताकार के रूप में उनकी भूमिका पर शायद किसी दिन एक पूरी किताब लिखी जाएगी!

तो कॉन्ग्रेस ने ‘आतंकी’ के हिमायतियों से ही गठबंधन कर लिया… क्यों?

संसद में साध्वी प्रज्ञा के नाथूराम गोडसे को देशभक्त कहने से नया हंगामा खड़ा हो गया है। नाथूराम गोडसे को महात्मा गाँधी की हत्यारे के रूप में जाना जाता है। इस बीच एक नया विवाद तब सामने आ गया जब कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने पलटकर साध्वी प्रज्ञा को ही आतंकवादी कह डाला। अपने एक ट्वीट में राहुल ने लिखा “भारत के संसदीय इतिहास में यह एक काला दिन है। आतंकी प्रज्ञा ने आतंकवादी गोडसे को देशभक्त कहा है।”

राहुल अपने इस बयान में उसी महिला का ज़िक्र कर रहे थे जिसे यूपीए के शासनकाल में “हिन्दू आतंकवाद” को साबित करने के लिए जेल में बंद कर प्रताड़ित किया गया। वहीं दूसरी ओर महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस पार्टी गोडसे को सम्मान देने वाली पार्टी शिवसेना को समर्थन दे रही है।

राहुल या उनकी कॉन्ग्रेस पार्टी के नेताओं से इस बात की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वह राष्ट्रवादियों की सलाह पर ध्यान भी देंगे। मगर उन्हें अब अपने नए सहयोगी दल ‘शिवसेना’ की तो सुननी चाहिए।

शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में 2010 में छपे एक सम्पादकीय में नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताया था। उसमें कहा गया था कि गोडसे इटली से नहीं आए थे बल्कि एक देशभक्त थे जो बँटवारे के वक़्त हिन्दुओं के कत्लेआम से बहुत आहत थे।

सामना में नाथूराम गोडसे पर यह सम्पादकीय उस वक़्त लिखा गया था जब ठाणे लिटरेरी मीट की एक स्मारिका में गोडसे को फीचर किया गया था। इसके बाद एनसीपी और कॉन्ग्रेस दोनों ही पार्टियों ने इसका जमकर विरोध किया था। जिसपर सामना के सम्पादकीय में लिखा गया कि, “उनका ज़िक्र किया गया यह कॉन्ग्रेस और एनसीपी के दुखी होने का कारण तो नहीं” इसके अलावा सम्पादकीय में यह भी कहा गया कि उस स्मारिका में गोडसे को गाँधी के हत्यारे के तौर पर नही दर्शाया गया।”

इस सम्बन्ध में ही एक एडिटोरियल में कहा गया था कि “जो लोग गोडसे को नहीं मानते वह क्या इशरत से प्रेम करते हैं? क्या स्मारिका पर इशरत की तस्वीर छापी जाती? गोडसे एक देशभक्त थे जो हमेशा अखंड भारत के लिए जिए। उनके लिए भावना होना क्या एंटी-नेशनल होना है? “

साध्वी ने भी लगभग वही कहा जो शिवसेना की ओर से पहले भी कहा जा चुका है। वही शिवसेना जो महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस का एक सहयोगी दल है। मगर क्या प्रज्ञा को आतंकवादी बोलने वाले राहुल की कॉन्ग्रेस शिवसेना को आतंकवादी से सहानुभूति रखने वाला बोल सकती है? गोडसे और साध्वी के लिए ‘आतंकवादी’ शब्द का इस्तेमाल करने वाले राहुल का तो जैसे इस शब्द पर एकाधिकार है।

एक लम्बे समय से कई राजनेताओं ने नाथूराम के नाम को ऐसा मोहरा बनाया है जिसके ज़रिए वह हिन्दुत्ववादियों को निशाना बना रहे हैं। यह कॉन्ग्रेस और गाँधी परिवार की भ्रष्टता नहीं तो और क्या है कि इन्होने देश के प्रधानमंत्री रहे इनके अपने परिवार के सदस्य राजीव गाँधी के हत्यारों को चुनाव में फायदे के लिए माफ़ कर दिया। जबकि कॉन्ग्रेस पार्टी को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि गोडसे को लेकर आम जनता क्या सोचती है क्योंकि अगर उन्हें इसका फर्क पड़ता तो महाराष्ट्र में वह उस शिवसेना से गठबंधन नहीं करती जो हमेशा से गोडसे के प्रति सम्मान का भाव प्रकट करती रही है। उनके खुद के ही बयानों का सार देखें तो कॉन्ग्रेस पार्टी इस समय आतंकवादी के हिमायती संग गठजोड़ कर के बैठी है।

कैमूर गैंगरेप मामला: अरबाज पर कार्रवाई के बाद अन्य आरोपितों को पकड़ने की माँग, आगजनी, खूनी संघर्ष

बिहार के कैमूर में नाबालिग लड़की से गैंगरेप के बाद वीडियो वायरल मामले में चौथे दिन भी मोहनिया इलाके में लोगों का विरोध जारी है। गुरुवार (नवंबर 28, 2019) को शहर में तोड़फोड़, आगजनी, पथराव और फायरिंग हुई। जिसमें 3 लोगों के घायल होने की खबर अब तक सामने आई है। फिलहाल, घायलों को इलाज के लिए मोहनिया अनुमंडलीय अस्पताल में भर्ती कराया गया है। लेकिन, फिर भी स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई। पुलिस एसपी लगातार इलाके में माइक से शांति बहाल करने की अपील कर रहे हैं। मगर स्थिति में खासा फर्क नहीं दिख रहा। प्रशासन ने वहाँ धारा 144 लागू कर दी है।

प्रभात खबर के अनुसार, कैमूर के मोहनिया थाना क्षेत्र में मुख्य आरोपित अरबाज पर कार्रवाई होने के बाद भी इलाके में मामला शांत नहीं हो रहा हैं। सोमवार से ही वहाँ पर ऐसा माहौल जारी है। जिसके कारण वहाँ तोड़फोड़, पथराव और आगजनी लगातार हो रही है।

ताजा जानकारी के मुताबिक गुरुवार को भारी उपद्रव होने के कारण पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की है और सभी उपद्रवियों को खदेड़कर मोर्चा संभाल लिया है। माहौल को नियंत्रित करने के लिए वज्र वाहन, अग्नि शामक वाहन और भारी मात्रा में पुलिस को भी तैनात कर दिया गया है। साथ ही भभुआ पथ को भी पुलिस ने पूरी तरह से बंद कर दिया है। इस उपद्रव में अब तक करीब आधा दर्जन दुकानें आग के हवाले की जाने की खबर हैं।

बता दें बीते रविवार को नाबालिग लड़की के साथ गैंगरेप और उसका वीडियो वायरल होने के बाद से ही कैमूर में ऐसी स्थिति बनी हुई। जानकारी के मुताबिक सोमवार को तो प्रदर्शनकारी आरोपितों का घर जलाना चाहते थे, लेकिन मौक़े पर पहुँची पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर कर दिया। सुरक्षा के लिहाज से राज्य सरकार ने कैमूर में इंटरनेट सेवाओं को भी बंद कर दिया गया था। इसके बाद 4 आरोपितों में से 2 के गिरफ्तार होने की खबर सामने आई थी, जबकि अन्य 2 के लिए एसटीएफ छापेमारी कर रही थी।

पूरा मामला

पीड़िता के अनुसार, मुख्य आरोपित अरबाज उसका पहले से परिचित था। वह उसे उसकी कोचिंग आने-जाने के दौरान मिला था। इस बीच ही उसने उसे प्रेम जाल में फँसाया। फिर शादी का झाँसा देकर पिछले 5 महीने से वह उसका यौन शोषण करता रहा। मंगलवार (नवंबर 19) को पीड़िता को कलाम ने मोहनिया में मुंडेश्वरी गेट के पास बुलाया। वहाँ अरबाज और उसके साथी पहले ही गाड़ी लेकर मौजूद थे। लड़की के आते ही उसे गाड़ी में खींच लिया गया। जब लड़की ने चिल्ला कर विरोध किया तो उसके मुँह पर पट्टी बाँध दी गई और हत्या कर फेंकने की धमकी देकर रतवार नदी के पास ले गए। जहाँ चारों ने मिलकर उसके साथ पहले बलात्कार किया और फिर उसका वीडियो वायरल कर दिया।

…अब तक की सबसे बड़ी खोज, रात में ऑक्सीजन देंगे पेड़: इमरान ‘वैज्ञानिक’ ख़ान को नोबेल प्राइज

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूँ तो अपनी तमाम बेवकूफ़ियों के चलते हमेशा हँसी-ठहाकों का पात्र बने रहते हैं। इस बार वो चर्चा में छाए हैं अपने एक कोरे ज्ञान को लेकर। इसके चलते सोशल मीडिया पर उन्हें जमकर ट्रोल किया जा रहा है।

दरअसल, एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा, “दरख़्त रात में ऑक्सीजन देते हैं।” पाकिस्तान की पत्रकार, नाइला इनायत ने इस कार्यक्रम की 15 सेकंड की वीडियो क्लिप शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा, “पेड़ रात में ऑक्सीजन देते हैं: आइंस्टीन ख़ान मंत्री।”

वीडिया की शुरुआत में लोगों को संबोधित करते हुए इमरान ख़ान ने कहा,

“70 फ़ीसद जो ग्रीन कवर था, वो कम हुआ, 10 सालो के अंदर। उसके नतीजे तो आने थे, क्योंकि दरख़्त हवा को साफ़ करते हैं, ऑक्सीजन देते हैं रात को। कार्बन डाइऑक्साइड को अबज़ोर्ब करते हैं”

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने हाल ही में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी का मज़ाक उड़ाया था, जिसमें उन्होंने कहा था भारी वर्षा के कारण बाढ़ आती है। जियो टीवी के हवाले से लिखा गया, “बिलावल ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों को यह कहकर चौंका दिया था कि जब बरिश होती है तो पानी आता है।”

इसके लिए लोगों ने प्रधानमंत्री ख़ान को याद दिलाया कि उन्हें दूसरों का मज़ाक उड़ाने से पहले विज्ञान के अपने ज्ञान को जाँच-परख लेना चाहिए। कुछ लोगों ने सवाल किया कि एक ऑक्सफोर्ड स्नातक ऐसी ग़लती कैसे कर सकता है, जबकि अन्य ने ख़ान के लिए नोबेल पुरस्कार की माँग की 🙂

इस वीडियो के सामने आते ही सोशल मीडिया के यूज़र्स ने जमकर उनकी चुटकी ली।

सलीम-इस्लाम ने 17 वर्षीय किशोरी को घर से उठाया, धमकी देकर किया बलात्कार: दोनों आरोपित फरार

उत्तरप्रदेश के चित्रकूट के एक गाँव से नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार की घटना सामने आई है। जहाँ आरोपितों की पहचान इस्लाम और सलीम के रूप में हुई है। जानकारी के अनुसार दोनों आरोपितों ने लड़की को उस समय उसके घर से उठाया, जब वह अपने घर में सो रही थी और उसके पिता खेतों में पानी डालने गए थे।

अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक, रैपुरा थानाक्षेत्र के निवासी और पीड़िता के पिता ने पुलिस को शिकायत दर्ज कराते हुए बताया कि बुधवार (नवंबर 27, 2019) की रात को वह सब खेत में पानी लगाने गए थे। इस दौरान घर में उनकी 17 वर्षीय पुत्री व अन्य बच्चे सो रहे थे। तभी सलीम और इस्लाम ने अपहरण को अंजाम दिया।

वहीं, आरोपितों की चंगुल से भागकर आई किशोरी ने बताया कि बुधवार की देर रात गाँव के ही 2 युवक सलीम और इस्लाम उसके घर आए थे। दोनों को देखकर उसने चिल्लाने का भी प्रयास किया था, लेकिन उन दोनों ने उसका मुँह बंद कर दिया।

इसके बाद सलीम उसे पकड़कर अपने कमरे में ले गया और उसके साथ दुष्कर्म किया। जबकि वहीं, खड़ा इस्लाम उसे लगातार धमकी दे रहा था। काफी मशक्कत के बाद जब किशोरी दोनों के चंगुल से किसी तरह भागने में सफल हुई, तो सीधा अपने घर पहुँची। जहाँ उसने अपने परिजनों को पूरी घटना की जानकारी दी।

बता दें, इस मामले में आज यानी गुरुवार को किशोरी के पिता ने दोनों आरोपितों के ख़िलाफ थाने में तहरीर दी है। जिसके बाद थाना प्रभारी राजेश कुमार ने बताया कि सलीम के खिलाफ दुष्कर्म व इस्लाम के खिलाफ पकड़कर धमकी देने की रिपोर्ट दर्ज की गई है। अभी आरोपित फरार हैं और किशोरी को मेडिकल टेस्ट के लिए जिला अस्पताल भेजा है।

गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले ऐसा ही एक मामला यूपी के एटा से भी आया था, जब आरिफ खान, इसरार और कलुआ नाम के पशु चोरों ने पशु न मिलने के कारण सोती बच्ची का अपहरण कर लिया था और फिर खेत में ले जाकर उसका रेप किया था।

बाबरी मस्जिद तोड़ने, अल्पसंख्यकों को ‘फोड़ने’ और गोडसे वाली शिवसेना पर सोनिया गाँधी से 8 सवाल

महाराष्ट्र में सत्ता को लेकर चली लम्बी खींचतान उस वक़्त ख़त्म हुई जब सूबे में सरकार बनाने के लिए शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस एक हो गए। शिवसेना के नेतृत्व में बनने वाली सरकार को समर्थन देने के लिए दोनों दलों ने अपनी-अपनी कुछ शर्तों के साथ हामी भर दी। महाराष्ट्र में एक त्रिशंकु सरकार का खाका भी तैयार हो गया।

शिवसेना जिस कॉन्ग्रेस और एनसीपी के समर्थन से सरकार बनाने जा रही है वह तो हमेशा से उनके छद्म सेकुलरिज्म के खिलाफ राजनीति करती रही। शिवसेना संस्थापक बालासाहेब खुद हिंदुत्व के प्रबल पक्षधर थे। उनके बेटे और मौजूदा शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने भी कभी ऐसी छवि से इनकार नहीं किया। हालाँकि, जबसे महाराष्ट्र में सरकार बनाने की कवायद में तीनों पार्टियाँ एक मंच पर आईं तो इनके सुर ही बदल गए। अब कॉमन मिनिमम प्रोग्राम की बात होती है। हिन्दू आतंकवाद जैसे शब्द गढ़ने वाली कॉन्ग्रेस शिवसेना को सेक्युलर साबित करने में जुट गई है।

इन्ही बातों को लेकर एक ट्विटर यूज़र ने अपने सिलसिलेवार ट्वीट से इन पार्टियों के बदलते हुए सुर को लेकर कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ साझा कीं। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक उद्धव ने गोडसे की तारीफ करते हुए कहा था कि “जो गोडसे में विश्वास नहीं रखता उन्हें सरे-आम पीट देना चाहिए” मगर जबसे महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए यह गठबंधन बना, कॉन्ग्रेस यह दर्शाने में जुट गई है कि शिवसेना तो अपने स्वभाव से बेहद सेक्युलर है, उसने तो बस मराठी अस्मिता के लिए जंग लड़ी है।

महाराष्ट्र में तीन पार्टियों का महाअघाड़ी गठबंधन सरकार बनाने जा रहा है इसमें दो पार्टियाँ ऐसी हैं जो खुदको सेक्युलर कहती आई हैं। वहीं एक पार्टी शिवसेना है जिसपर कॉन्ग्रेस, एनसीपी जैसे दल कम्युनल का ठप्पा लगाते आए हैं लेकिन अब यही पार्टी राज्य में इनके गठबंधन की सरकार का नेतृत्व करेगी।

शिवसेना के नेता संजय राउत ने बयान दिया था “मुस्लिमों का मताधिकार छीन लेना चाहिए”- वही मुस्लिम, जिन्हें कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके जैसे दलों ने वोट बैंक बनाकर सत्ता में रहने के लिए भरपूर इस्तेमाल किया और समय-समय पर इस करतूत को ढँकने के लिए सेक्युलर शब्द उठा लिया।

राउत ने शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ के सम्पादकीय में कहा था कि जो भी गोडसे से नफरत करते हैं, वह ज़रूर इशरत से मोहब्बत करते हैं। सामना के सम्पादकीय में लिखा था कि गोडसे के स्मारक की जगह क्या इशरत का स्मारक बनाया जाए? @TweetinderKaul हैंडल वाले इस ट्विटर यूजर ने ट्वीट कर कहा कि सोनिया गाँधी से इस बात को लेकर भी सवाल होना चाहिए। बता दें कि सोनिया वर्तमान में उस कॉन्ग्रेस पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष हैं जिसके भरोसे पर शिवसेना सरकार बनाने जा रही है।

यूज़र ने ज़िक्र किया कि 1991 में भाजपा-शिवसेना गठबंधन के लिए प्रचार करते वक़्त बालासाहेब ने खुलकर नाथूराम गोडसे का समर्थन किया था। उन्होंने कहा था कि “नाथूराम ने महात्मा गाँधी को उनके विश्वासघात के लिए मारा था, वह कोई भाड़े का शूटर नहीं था”

शिवसेना का नाता बाबरी विध्वंस से भी जोड़ा जाता रहा है। एक समय बालासाहेब ने खुद इसका श्रेय अपनी पार्टी के शिवसैनिकों को दिया था, इस पर भी संजय राउत का एक बयान शेयर करते हुए अपने ट्वीट में निखिल ने शिवसेना के उस दौर की याद दिलाई जब बाल ठाकरे जीवित थे। मीडिया की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए निखिल मेहरा नामक इस ट्विटर यूज़र ने बताया कि शिवसेना ने बाबरी मस्जिद को 17 मिनट में ही ध्वस्त कर दिया था। यह बयान संजय राउत ने दिया था और उन्होंने कहा था, “हमने बाबरी मस्जिद को 17 मिनट में ध्वस्त कर दिया था मगर मोदी सरकार मंदिर बनाने में इतना समय क्यों लगा रही है।”

जिन सेक्युलर पार्टियों के गठबंधन में शिवसेना शामिल हुई वह बाबरी विध्वंस को सही नहीं मानतीं। आज की शिवसेना की तुलना बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना से करते हुए ट्विटर यूज़र ने बताया कि बालासाहेब ठाकरे ने ढाँचा तोड़े जाने की घटना पर जमकर तारीफ की थी। वहीं इसी घटना के लिए सेक्युलर कॉन्ग्रेस ने अपने एक प्रधानमंत्री को उचित सम्मान तक नहीं दिया। वही कॉन्ग्रेस आज शिवसेना को सरकार बनाने के लिए महाराष्ट्र में गठबंधन को समर्थन देने जा रही है।

इतना ही नहीं! ट्विटर यूज़र ने उस खबर को भी शेयर किया जिसमें शिवसेना ने बुर्का बैन की माँग की थी।

कॉन्ग्रेस पार्टी अगर खुद को नैतिक साबित करती है तो वह उस शिवसेना को समर्थन कैसे दे सकती है जो उसके एजेंडे के उलट राष्ट्रवाद की बात करती है। एक अन्य ट्वीट में @TweetinderKaul ने उस मीडिया रिपोर्ट का ज़िक्र भी किया जिसमें लिखा है कि शिवसेना ने आरएसएस और भाजपा को राष्ट्रवाद पर सुदृढ़ रहने की नसीहत दी। इस सब को देखते हुए लगता है कि पिछले कई सालों से हार का मुँह देख रही कॉन्ग्रेस पार्टी अब सत्ता की चाहत में कुछ भी करने पर उतर आई है।