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बेड, बॉडीगार्ड और कुर्सी… प्रियंका गाँधी ने जब नेहरू को ऐसे किया याद तो ट्विटर पर पूछे गए सवाल

अपने परनाना और भारत के प्रथम प्रधानमंत्री “चाचा नेहरू” के जन्मदिन पर कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी ने ट्विटर पर एक कहानी शेयर की। उसमें बताया कि एक रात नेहरू अपने कमरे में आए और उन्होंने अपने अंगरक्षक को अपने कमरे में अपने बिस्तर पर सोते हुए पाया। ऐसा देखकर नेहरू ने उसे कंबल ओढ़ा दिया और खुद रात भर एक कुर्सी पर सोए।

लेकिन नैतिक पतन के इस युग में चाचा नेहरू की भलमनसाहत भला ट्विटर वालों को हजम कैसे होती? अतः ट्विटर पर दुष्ट लोगों ने प्रियंका गाँधी से ऐसे सवाल पूछने शुरू कर दिए, जिनकी जितनी कड़ी निंदा की जाए कम है।

एक व्यक्ति को यह जानने में दिलचस्पी हो गई कि बॉडीगार्ड का काम नेहरू की हिफाज़त करना ही था न, तो कोई पूछने लगा कि अगर बॉडीगार्ड सो गया तो बच्चों के प्यारे चाचा की पहरेदारी कर कौन रहा था।

एक ‘गंदी सोच’ वाले व्यक्ति की दिलचस्पी तो यह जानने में हो गई कि आधी रात को पीएम बिना बॉडीगार्ड के आखिर करने क्या निकले थे!

यह ‘ऐतिहासिक तथ्य’ है कि महात्मा गाँधी के उत्तराधिकारी होने के चलते नेहरू जी बड़े ही सात्विक और सरल व्यक्ति थे। इसके बावजूद प्रियंका गाँधी को कई एक ट्विटर यूज़र ने यह पूछ दिया कि प्रधानमंत्री आवास में उन दिनों कोई दूसरा कमरा, या कोई और बिस्तर ही नहीं था क्या।

एक ने तो बेदर्दी से यही बोल दिया कि (मिसेज गाँधी-वाड्रा के लिए) यह मनगढ़ंत कहानी किसने बनाई।

WhatsApp पर मीमों के फैक्ट-चेक में बिजी प्रतीक ‘गंजू’ सिन्हा के ऑल्ट न्यूज़ को भी लोगों ने इसके ‘फैक्ट चेक’ के लिए परेशान करना शुरू कर दिया।

ऐसे ही एक और बेदर्द ने इस कहानी में गड़बड़ी की तुलना गेम ऑफ़ थ्रोन्स के अंतिम सीज़न की कहानी के छेदों (प्लॉट होल्स) से कर दी।

ऑपइंडिया चाचा नेहरू के बड्डे वाले दिन उनकी और उनकी प्यारी पर-नतिनी की ऐसी क्रूर ट्रोलिंग की कड़ी निंदा करता है।

​गुर्जरों के कोटे से मजहब विशेष को आरक्षण दे सकती है राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार

राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार ने समुदाय विशेष को आरक्षण देने के लिए एक विशेष सर्वे शुरू किया है। राज्य की गहलोत सरकार गुर्जरों के कोटे से समुदाय विशेष को आरक्षण देना चाहती है। फिलहाल मुस्लिम पिछड़ा वर्ग के कोटे से आरक्षण का फायदा उठा रहे थे। लेकिन, अब उन्हें विशेष पिछड़ा वर्ग में शामिल कर इस कोटे से लाभ देने की योजना सरकार ने बनाई है।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक अपने कदम का बचाव करते हुए सरकार का कहना है कि राजस्थान में समुदाय विशेष की आर्थिक हालत खराब है। प्रदेश सरकार के आदेश के बाद सभी जिलों में डीएम ने इस सम्बन्ध में सर्वे कराने के आदेश जारी कर दिए हैं।

बता दें कि प्रदेश सरकार के इस फैसले के बाद मुस्लिमों को विशेष पिछड़ा वर्ग कोटे में शामिल कर लिया जाएगा। इस फैसले पर गुर्जरों ने कड़ी आपत्ति जताई है। आरक्षण की लड़ाई लड़ रहे गुर्जरों ने साफ़ कर दिया कि एमबीसी (मोस्ट बैकवर्ड कास्ट) कोटे में किसी भी अन्य जाति या समुदाय को आरक्षण देने का सवाल ही नहीं पैदा होता।

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प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार पर गुर्जर समाज के एक नेता हिम्मत सिंह ने हमला बोलते हुए कहा है कि किसी भी परिस्थिति में गुर्जर कोटे से किसी अन्य को हिस्सेदारी नहीं दी जा सकती, ऐसा करना गुर्जर समाज के साथ अन्याय होगा।

एक रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार के इस फैसले के तहत मुस्लिमों के अलावा मांगणियार, ढाढ़ी, लंगा, दमामी, मीर, नगारची, राणा, बायती, बारोटा आदि जातियों को भी विशेष पिछड़ा वर्ग में शामिल किया जाएगा। मौजूदा वक़्त में यह सारी जातियाँ ओबीसी में आती हैं।

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इस मुद्दे पर आरक्षण संघर्ष समिति के संयोजक ने किरोड़ी सिंह बैंसला कहा “आरक्षण का हक लेने के लिए हमारे समाज ने काफी संघर्ष किया। 73 लोगों ने अपनी जान गँवा दी थी। हम किसी भी हाल में दूसरी जातियों को इसमें (विशेष पिछड़ा वर्ग) आरक्षण नहीं लेने देंगे।” उन्होंने कहा कि यदि सरकार उन्हें आरक्षण देना ही चाहती है तो ओबीसी में से ही वर्गीकरण करे। लेकिन एमबीसी कोटे से आरक्षण देना कतई संभव नहीं।

प्रिय असुरनियों, तुम चाहे जितना चिंघाड़ो, सबरीमाला देवता का मुद्दा ही रहेगा, न कि पीरियड्स और पब्लिक प्लेस का

हमारे पुराणों को लेकर वामपंथियों में बड़ी मशहूर ‘थ्योरी’ है कि जिन्हें शास्त्रों में असुर बताया गया है, वे असल में इंसान थे। यही कारण है कि उन्हें महिषासुर “जनप्रिय, मूलनिवासी राजा” लगता है। आज की पत्रकारिता के समुदाय विशेष के सदस्य भले ही अभिव्यक्ति की आजादी का ढोंग रचते हों, लेकिन उनके लक्षण आसुरिक ही नजर आते हैं।

गुरुवार (14 नवंबर 2019) को सबरीमाला के मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच में भेजे जाने पर सागरिका घोष का कहना है कि अगर मंदिर एक सार्वजनिक स्थल है तो वह ‘अशुद्धता’ (‘इम्प्यूरिटी’) के नाम पर किसी लिंग, जाति, आस्था या शारीरिक क्रिया आधारित भेदभाव नहीं कर सकता है। उन्हें रजस्वला महिलाओं को ‘इम्प्योर’ घोषित किया जाना और उनके साथ ‘भेदभाव’ का समर्थन अनैतिक और हास्यास्पद लगता है।

उनकी बात बिलकुल सही होती, अगर मंदिर सार्वजनिक स्थल होता। यह मेरी या करोड़ों अय्यप्पा भक्तों की गलती नहीं है कि सागरिका घोष को ऐसा लगता है उनके घर के बाहर पूरी दुनिया ‘पब्लिक प्लेस’ है जिसके बारे में वे अपनी वैचारिक थूक-खकार उगल सकतीं हैं। लेकिन ऐसा है नहीं। मंदिर एक सार्वजनिक नहीं बल्कि विशिष्ट स्थल है- उनके लिए जो मंदिर में प्रवेश की सामान्य और विशिष्ट अर्हताएँ पूरी करते हैं।

सामान्य अर्हता हुई हिन्दू होना। यानी मंदिर के प्रति श्रद्धा-भाव होना, उसके यम-नियम (इसका अर्थ सागरिका खुद ढूँढ़ें) का पालन करने का वचन देना। इसके लिए कोई अलग से घोषणा-पत्र या शपथ-पत्र कोर्ट में नहीं दिया जाता। मंदिर में घुसने का अर्थ ही यह होता है कि घुसने वाला खुद को हिन्दू धर्म के अंतर्गत आने वाली किसी न किसी आस्था, उपासना पद्धति, पंथ आदि का अनुगामी घोषित कर रहा है।

यह तो हुई सामान्य अर्हता। इसके अलावा कुछ मंदिरों में प्रवेश के लिए विशिष्ट नियम होते हैं, जो उस मंदिर के देवता की इच्छा पर आधारित होते हैं- और देवता की इच्छा का पता उसी धर्मग्रंथ से चलता है, जो यह बताता है कि इस मंदिर में इस वाले देवता का वास है। सबरीमाला ऐसा ही मंदिर है, और इससे जुड़े धर्मशास्त्रों ‘भूतनाथ उपाख्यानं’ और ‘तंत्र समुच्चयं’ में साफ लिखा है कि इस मंदिर में भगवान अय्यप्पा का नैष्ठिक ब्रह्मचारी रूप स्थापित है।

सागरिका घोष की बात तब भी सही हो सकती थी, अगर महिलाओं पर यह रोक उनकी ‘अशुद्धता’ के चलते होती। लेकिन ऐसा भी है नहीं। इस रोक का कारण है रजस्वला आयु वर्ग की महिलाओं का उस मंदिर की पूजा-साधना के लिए अयोग्य होना, ‘अशौच’ होना। शौच-अशौच पवित्रता-अपवित्रता नहीं होते।

चूँकि सागरिका को मंदिर और सार्वजनिक फुटपाथ में अंतर नहीं पता, इसलिए उन्हें तो मूर्ख माना जा सकता है। लेकिन बरखा दत्त मंदिर का नाम स्पष्ट तौर पर लेतीं हैं और इसके बाद भी कहती हैं कि उन्हें सबरीमाला में जबरन प्रवेश चाहिए। यह मूर्खता नहीं, दुर्भावना वाली आसुरिक वृत्ति है।

इसे ‘पीरियड्स’, नारी अधिकार, नारीवाद (जो अपने आप में कम्यूनिज़्म का ही बदला हुआ रूप है; जिसे यकीन न हो, कम्यूनिस्ट मैनिफेस्टो और फेमिनिस्टों के उद्देश्यों में मिलान करके देख ले) की आड़ में हिन्दूफ़ोबिया, मंदिरों, हिन्दू धर्म और हिन्दू धर्मावलम्बियों पर हमला ही माना जाएगा।

ऐसा आज पहली बार नहीं हो रहा है। पौराणिक समय में भी यही होता था। असुर जिन पूजा-पद्धतियों, साधनाओं के खुद मुरीद नहीं होते थे, उन पर हमले करते थे, उनमें विघ्न डालते थे, शास्त्रार्थ के बहाने कुतर्क करते थे, राज्य सत्ता का बल प्रयोग, हिंसा, शोरगुल से भक्तों का ध्यान भंग करना वगैरह। इसलिए, बरखा दत्त और सागरिका घोष कुछ नया नहीं कर रही हैं, केवल उनका माध्यम (इंटरनेट) नया है।

लेकिन जैसे हमने रामलला के लिए 500 साल तक बाबर-औरंगज़ेब जैसी क्रूर, अंग्रेज़ों जैसी चंट और सेक्युलरासुर सरकारी मशीनरी जैसी अधर्मी ताकतों से युद्ध किया, वैसे ही सबरीमाला पर भी आपका प्रोपेगंडा पोस्ट-दर-पोस्ट, महीने-दर-महीने, अदालत-दर-अदालत, पीढ़ी-दर-पीढ़ी काटा जाता रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 5 गुना बढ़ी अयोध्या आने वाले श्रद्धालुओं की तादाद

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश ने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ़ कर दिया है। इसके बाद से अयोध्या शहर में एक नया उमंग देखने को मिल रहा है। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद से अयोध्या में भारी भीड़ जुटने लगी है। इनमें बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है जो पहली पहली बार अयोध्या आए हैं। इनमें सुदूर गुजरात से लेकर उत्तरप्रदेश तक के लोग भी शामिल हैं।

दरअसल 9 नवम्बर को अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जन्मभूमि पर चले आ रहे सदियों पुराने इस विवाद का अंत हो गया। इसके बाद तो जैसे अयोध्या नगरी में श्रद्धालुओं का ताँता लग गया है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक कार्तिक पूर्णिमा के दिन अयोध्या का कुछ अलग ही नज़ारा था। जिस उत्साह के साथ लाखों लोग इस पर्व पर वहाँ इकठ्ठा हुए वह अद्वितीय था।

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अयोध्या में कार्तिक पूर्णिमा के दिन पहुँचे अनेक श्रद्धालुओं में से एक शिवम कुमार की यह पहली अयोध्या यात्रा थी। बिहार के रोहतास से आए शिवम ने बताया, “यहाँ आते वक़्त मैं बहुत चिंतित था। मैंने और मेरे दो दोस्तों ने राम की इस नगरी में आने की योजना बनाई ताकि मंदिर निर्माण में हम भी कुछ योगदान दे सकें।” शिवम के माथे पर तिलक लगा था और उसने जय श्री राम ​प्रिंटेड पीला कुर्ता पहन रखा था। राम मंदिर निर्माण कार्यशाला में देने के लिए वह अपने साथ ईंट भी लेकर आया था।

विहिप के प्रवक्ता शरद शर्मा ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के 9 नवंबर के फैसले के बाद अचानक से कार्यशाला पहुॅंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ गई है। उन्होंने कहा, “शनिवार की रात काफी संख्या में लोग यहॉं पहुॅंचे और उसके बाद से लगातार संख्या बढ़ रही है। अमूमन 1000 लोग रोजाना कार्यशाला आते थे। अब यह संख्या बढ़कर 5000 हो गई है। कारसेवकपुरम् आकर्षण का बड़ा केंद्र बनकर उभरा है।”

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अयोध्या पहुँची 26 वर्षीय अंजलि सिंह ने बताया कि मीडिया में जैसा दिखाया जाता है, यह शहर उससे कहीं बढ़कर है। मैं उन सब घटनाओं के बारे में जानती हूँ जो मेरे पैदा होने के पहले 1992 में यहाँ घटित हुईं, मगर अब अयोध्या को अब अपने भाईचारे की डोर को टूटने नहीं देना है।

बता दें कि न्यास अयोध्या के कारसेवकपुरम में 1990 से कलाकारों और शिल्पकारों के लिए कार्यशाला चला रहा है। इसमें कलाकारों ने कई पत्थरों और खंभों पर कलाकृतियां उकेरी हैं, इस उम्मीद के साथ, कि जब भी रामलला का मंदिर बनेगा तो इन्हें उसमें लगाया जाएगा। इस कार्यशाला के प्रभारी 79 वर्षीय अन्नू भाई सोमपुरा ने बताया कि रामजन्मभूमि न्यास की योजना के मुताबिक मंदिर 268 फुट लंबा, 140 फुट चौड़ा और शिखर तक 128 फुट ऊंचा होगा। जिसमें कुल 212 खंभे होंगे।

सिर में संगीन, सीने पर गोली खाकर जो हुआ शहीद… बाल दिवस पर सबसे छोटे स्वतंत्रता सेनानी को सलाम

पूर्व क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग ने गुरुवार (14 नवंबर) को बाल दिवस के अवसर पर भारत के कई स्वतंत्रता सेनानियों में से सबसे कम उम्र के सेनानी की फ़ोटो शेयर की है। उन्होंने एक 12 वर्षीय बच्चे बाजी राउत की फ़ोटो शेयर की, जिनकी ब्रिटिश सैनिकों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने (बच्चे) नदी पार करने के उनके (ब्रिटिश) हुक़्म को मानने से इनकार कर दिया था।

वीरेंद्र सहवाग ने 1938 में बाजी राउत की हत्या के बारे में बताते हुए लिखा, “12 साल की उम्र में, यह युवा लड़का एक देशी नाव पर सवार था और ब्राह्मणी नदी के पार जाने के लिए ब्रिटिश टुकड़ी ने उन्हें आदेश दिया था।”

पूर्व क्रिकेटर ने लिखा कि बाजी, जिन्होंने पहले ही अंग्रेजी सैनिकों की क्रूरता का विवरण सुना रखा था कि कैसे उन्होंने गाँव में निर्दोष लोगों की हत्या कर दी थी। इसलिए उन्होंने ब्रिटिश सैनिकों के आदेश (नदी पार कराने) की अवहेलना की।

इसके आगे उन्होंने लिखा कि आदेश की अवहेलना के बाद बच्चे के सिर पर एक बंदूक रखी गई और गोली मार दी गई, जिसके परिणामस्वरूप उनकी मौत हो गई। वीरेंद्र सहवाग का वर्णन के अनुसार, “एक सैनिक ने अपने संगीन को बाजी की नरम खोपड़ी में घुसा दिया। जबकि एक अन्य ब्रिटिश सैनिक ने बेरहमी से गोली मार दी।”

बाजी राउत का जन्म 5 अक्टूबर, 1926 को ओडिशा के धेनकनाल ज़िले के नीलकंठपुर गाँव में एक गरीब खंडायत परिवार में हुआ था। ओडिशा सरकार की वेबसाइट के अनुसार, उन्होंने अपने पिता को कम उम्र में ही खो दिया था और माँ ने अलग-अलग घरों में काम करके उस मासूम बच्चे की परवरिश की थी।

पिछले महीने युवा स्वतंत्रता सेनानी की जयंती पर, ओडिशा के सैंड आर्टिस्ट सुदर्शन पटनायक ने मासूम बच्चे को श्रद्धाजंलि देते हुए समुद्र तट पर रेत की कलाकृति बनाई। पटनायक ने ट्वीट किया, “साहस, निस्वार्थता और वीरता की उसकी कहानी को हर बच्चे को जानना चाहिए। सुपरहीरो।”

आँख से बह रहा था खून, वीडियो पोस्ट कर बोली- अम्मी-अब्बा मुझे बचाओ: शौहर खिजर उल्ला गिरफ्तार

शारजाह में भारतीय मूल के एक व्यक्ति को पत्नी से मारपीट करने के आरोप में वहाँ की पुलिस ने गिरफ्तार किया है। गुरुवार (नवंबर 14, 2019) को आई मीडिया रिपोर्ट्स के बाद पता चला कि महिला द्वारा सोशल मीडिया पर मदद की गुहार लगाए जाने के बाद ये गिरफ्तारी हुई।

जानकारी के अनुसार बीते 12 नवंबर को जैस्मीन सुल्तान नाम की महिला ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया था। इसमें वह रोती नजर आ रही थी। शेयर किए गए वीडियो में उसके आँख से खून भी रिस रहा था और अपनी अम्मी-अब्बा से वह बचाने की गुहार लगा रही थी।

ट्वीट कर उसने लिखा था, “मुझे मदद की जरूरत है। मेरा नाम जैस्मीन सुल्तान है। मैं यूएई के शारजाह में रहती हूॅं। मेरे पति का नाम मोहम्मद खिजर उल्ला है, मेरे पति ने मुझे बहुत बुरी तरह मारा है…मुझे मदद चाहिए।”

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महिला ने बताया है कि उसकी शादी को 7 साल हो चुके हैं और उसके 2 लड़के हैं। एक 5 साल का और दूसरा 17 महीने का है। लेकिन फिर भी उसका पति उसे लगातार मारता है और उस पर अत्याचार करता है। महिला के मुताबिक 47 वर्षीय उसके पति मोहम्मद खिजर उल्ला (भारतीय प्रवासी) ने उससे उसका पासपोर्ट और सोने के गहने भी ले लिए हैं। जिसके संबंध में उसने इस वर्ष फरवरी में शिकायत भी दर्ज करवाई थी।

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जैस्मीन के मुताबिक शारजाह में उसका कोई रिश्तेदार नहीं है। उसके पास इतने पैसे भी नहीं है कि अपने बच्चों का लालन-पालन कर सकें। वह बंगलुरु स्थित अपने घर लौटना चाहती है। इसके लिए उसने स्थानीय प्रशासन से भी मदद मॉंग चुकी है।

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इस बीच शारजाह पुलिस ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट से जानकारी दी है कि इस मामले को सुलझा लिया गया है। पुलिस ने लोगों से जैस्मीन के वीडियो को शेयर नहीं करने की भी अपील की है। पुलिस ने कहा है कि इससे समाज पर नकारात्मक असर पड़ता है।

‘इस्लामिक स्टेट आ रहा है अफ़ग़ानिस्तान, भारत के लिए खतरा, मदद नहीं करेगा अमेरिका’

हाल ही में इस्लामिक स्टेट के सरगना अबू बकर अल बगदादी को अमेरिका ने मार गिराया था। बावजूद यह ख़तरनाक इस्लामी संगठन खतरा बना हुआ है। ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ ने दावा किया है कि दुनिया के सबसे क्रूर जिहादियों का गिरोह अपनी गतिविधियों का बेस अफ़ग़ानिस्तान में स्थानांतरित कर रहा है। गौरतलब है कि मूलतः मध्य-पूर्व एशिया के मुस्लिम देशों इराक और सीरिया में बने इस समूह को एक लम्बी जंग के बाद अमेरिका, रूस, इज़रायल आदि पश्चिमी देशों के सैन्य गठबंधन ने इराक और सीरिया से उखाड़ फेंका है।

कुछ ही दिन पहले (27 अक्टूबर, 2019 को) ‘दाएश’ के नाम से भी जाने जाने वाले इस आतंकवादी संगठन के मुखिया को अमेरिका ने तुर्की में मार गिराया था। ईरानी विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ ने इंडिया टुडे टीवी को दिए इंटरव्यू में कहा कि इस्लामिक स्टेट का अफ़ग़ानिस्तान जैसे संवेदनशील इलाके में पहुँच जाना भारत, पाकिस्तान, रूस और यहाँ तक कि चीन के लिए भी खतरे की घंटी है। उन्होंने कहा कि उन्हें आईएस के अफ़गानी बेस से ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान में जिहादी घटनाओं को अंजाम दिए जाने की रिपोर्ट मिल रही है।

ज़रीफ़ हालाँकि दुनिया भर में जिहाद के खिलाफ लड़ाई के स्वघोषित चौधरी अमेरिका के रुख को लेकर आशान्वित नहीं दिखते। उन्होंने कहा, “अमेरिका हमारी मदद के लिए नहीं आएगा। हमें अपनी सहायता खुद करनी होगी।”

भारत के लिए चिंता की बात यह भी है कि अफ़ग़ानिस्तान से जोड़ने वाले उसके भूभाग पीओके पर पाकिस्तान का कब्ज़ा है। यानी अगर पाकिस्तान चाहे तो बड़ी आसानी से अपने जिहादी बिरादरों को भारत के काफ़िरों पर कहर ढाने के लिए अफ़ग़ानिस्तान से पीओके, पीओके से कश्मीर और कश्मीर से भारत में उतार सकता है। ऐसे में दुनिया के सबसे क्रूर और नृशंस जिहादियों से देश की रक्षा के लिए पीओके पर भारतीय अधिपत्य दोबारा स्थापित जल्दी से जल्दी करना और भी ज़रूरी हो गया है।

‘सबरीमाला तो ठीक… लेकिन अजान पर भी तो आया था कोर्ट का फैसला, उसका क्या?’

भारतीय जनता पार्टी की ओर से सबरीमाला मुद्दे पर बड़ा बयान आया है। भाजपा नेता और पार्टी के प्रवक्ता सुदेश वर्मा ने आज (गुरुवार, 14 नवंबर, 2019 को) सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में रजस्वला आयुवर्ग की स्त्रियों के प्रवेश के मुद्दे को बड़ी बेंच में भेजे जाने के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए अज़ान का मुद्दा उठा लिया।

उन्होंने कहा, “बहुत सारे आदेश हैं जो मस्जिदों से सुबह दी जाने वाली अजान की आवाज़ या माइकों में आवाज़ के डेसीबल (आवाज़ की तीव्रता नापने का वैज्ञानिक पैमाना ) स्तर के बारे में भी है।” इसके साथ उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को लोगों की भावनाओं की कद्र करनी चाहिए। उन्होंने यह बात आईएएनएस समाचार एजेंसी से बात करते हुए कही

हालाँकि सुदेश वर्मा ने यह स्पष्ट किया कि वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हैं, लेकिन कॉन्ग्रेस के मुखपत्र नेशनल हेराल्ड को प्रोपेगेंडा किए बगैर चैन नहीं पड़ रहा। नेशनल हेराल्ड में इस बयान के बारे में छपी रिपोर्ट में अपनी मर्ज़ी से यह जोड़ कर लिखा गया है कि प्रवेश वर्मा का ऐसा कहने के पीछे तात्पर्य यह है कि चूँकि सुबह की अज़ान और डेसीबल स्तर के बारे में आया फैसला लागू नहीं किया गया, अतः महिलाओं के सबरीमाला में प्रवेश से संबंधित फैसला भी लागू नहीं होना चाहिए।

गौरतलब है कि केरल के सबरीमाला मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट निर्णायक फैसला नहीं सुना पाया। 5 जजों की पीठ में से 3 जज इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेजे जाने के पक्ष में रहे, जबकि 2 जजों ने इससे संबंधित याचिका पर ही सवाल उठा दिए।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के अवाला जस्टिस खानविलकर और जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने इस मामले को बड़ी बेंच के पास भेजने के पक्ष में अपना मत सुनाया। जबकि पीठ में मौजूद जस्टिस चंद्रचूड़ और जस्टिस नरीमन ने सबरीमाला समीक्षा याचिका पर असंतोष व्यक्त किया।

मुज़फ्फरपुर: खाने लेकर आई नाबालिग से मौलवी ने किया रेप, पंचायत बोली- बच्चा बेच डालो

बिहार से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। मुज़फ्फरपुर जिले में एक 15 वर्षीय नाबालिग लड़की से दुष्कर्म की घटना घटित हुई। दुष्कर्म करने वालों में एक मौलवी और एक अन्य व्यक्ति शामिल है। पीड़िता ने जब पंचायत में गुहार लगाई तो उल्टे उसे ही अजीबो-गरीब नसीहत दे दी गई। दुष्कर्म का एक आरोपित मौलवी बताया जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इलाके के लोग मौलवी को अक्सर खाने के लिए कुछ न कुछ दे दिया करते थे। सभी लोगों की तरह जब बच्ची उसे खाना देने पहुँची तो मौलवी ने उसे हवस का शिकार बना लिया। पीड़िता द्वारा पुलिस को दिए बयान के अनुसार उस मौलवी ने बच्ची से दुष्कर्म का एक वीडियो भी बनाया था। जिसके बाद वह उसे ब्लैकमेल कर रहा था। इस बात की भनक जब एक इलेक्ट्रीशियन को लगी तो उसने भी उस नाबालिग का रेप किया।

इस मामले में तीन जुलाई को पुलिस में एफआईआर दर्ज हुई, जिसके बाद मामले की जाँच शुरू हुई। इसमें पुलिस ने भारतीय दंड संहिता के तहत 15 वर्षीय पीड़ित से यौन उत्पीड़न के मामले में दोनों को आरोपितों पर पॉस्को कानून के तहत मामला दर्ज कर लिया है। एसपी जयंत कान्त ने बताया ” इस मामले में जाँच के आदेश दे दिए गए हैं।”

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक दुष्कर्म पीड़िता एक गरीब परिवार से है और अशिक्षित है। बता दें कि पीड़िता जब पुलिस के पास पहुँची तब वह गर्भावस्था की स्थिति में थी। दो दिन पहले लड़की पंचायत पहुँची कि डीएनए टेस्ट से उसके नवजात बच्चा के बाप का पता लगाया जाए। लड़की मुताबिक उसे (बलात्कारी को) पीड़िता और उसके बच्चे को परिवार मानकर अपनाना चाहिए। मगर पीड़िता का आरोप है कि पंचायत ने उसे ही बच्चा बेच देने की नसीहत दे डाली।

राफेल पर IAF के बयान को विपक्ष ने बताया था राजनैतिक, लेकिन आज हम सही साबित हुए: पूर्व एयर मार्शल

राफेल मामले में सभी पुनर्विचार याचिकाओं को आज (नवंबर 14, 2019) सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि राफेल विमान सौदा मामले में प्राथमिकी दर्ज करने की या बेवजह जाँच के आदेश देने की जरूरत है।

इस फैसले के बाद कई तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आई है। पूर्व एयर मार्शल बीएस धनोआ ने कहा, “दिसंबर 2018 में जब हमने कहा था कि कोर्ट ने सही फैसला सुनाया है तो हमें कहा गया था कि ये राजनीति से प्रेरित बयान है।” उनके मुताबिक उस दौरान उनके बयान को राजनीति से जोड़ने वाले बिलकुल गलत थे, क्योंकि वह सिर्फ़ इसका बचाव कर रहे थे।

मीडिया से बातचीत में रिटायर्ड एयर मार्शल धनोआ ने कहा कि अब जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया है तो साबित हो गया है कि वे सही थे। उन्होंने कहा,” मुझे उम्मीद है कि अब ये मामला खत्म हो जाएगा। राजनीतिक लाभ पाने के लिए ऐसे मुद्दों को उठाना और अपने सशस्त्र बलों के हित को पीछे रखना, मुझे लगता है कि यह सही नहीं है।” इस दौरान बीएस धनोआ ने राफेल को एक शानदार विमान भी बताया।

रक्षा से जुड़े मसलों पर न हो राजनीति: राजनाथ

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि यह सरकार के रुख का समर्थन करती है। उन्होंने, “हमारी सरकार के निर्णय लेने की पारदर्शिता को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दे दी है। मुझे लगता है कि रक्षा तैयारियों से संबंधित मामलों में राजनीति नहीं होनी चाहिए।”

रक्षा मंत्री ने कहा, “लोग अपने निजी फायदे के लिए ऐसा (मामलों का राजनीतिकरण) करते हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री की छवि खराब करने की कोशिश की। मैं कहना चाहूँगा कि यह विशेष रूप से कॉन्ग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं द्वारा किया गया था।”

उल्लेखनीय है कि राफेल मामले पर काफी लंबे समय से सवाल उठाए जा रहे थे। संसद से लेकर चुनाव प्रचार तक में विपक्ष द्वारा मोदी सरकार को घेरा जा रहा था। बार-बार यह आरोप लगाया जा रहा था कि अनिल अंबानी को फायदा पहुँचाने के लिए द सॉल्ट एविएशन का ऑफसेट ठेका दिलाया गया। केंद्र सरकार शुरू से अपने ऊपर लग रहे सभी आरोपों को नकारती रही है। 2018 के अंत में सर्वोच्च न्यायलय ने भी इस मामले में सरकार को क्लीनचिट दे दी थी, जिसके बाद पुनर्विचार याचिकाएँ दायर की गई थी।