5 अगस्त को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को मिलने वाला विशेष राज्य का दर्जा रद्द कर दिया। इसके बाद जम्मू-कश्मीर राज्य में शांति व्यवस्था की स्थिति को लेकर सरकार ने इस सम्बन्ध में आँकड़े पेश किए हैं। जम्मू-कश्मीर राज्य की शांति और स्थिरता के बारे में बात करते हुए लोकसभा में गृह-राज्यमंत्री जी किशन रेड्डी ने मंगलवार को इसकी जानकारी दी।
संसद के निचले सदन में एक सवाल के जवाब में बोलते हुए रेड्डी ने बताया कि घाटी में 15 नवम्बर तक पत्थरबाज़ी के करीब 190 मामले दर्ज किए हैं। पत्थरबाज़ी की इन घटनाओं में 765 लोगों को गिरफ्तार किया गया है।
एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने बताया कि राज्य में शांति बनाए रखने और पत्थरबाजी की घटनाओं पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए सरकार कई मोर्चों पर सक्रिय है। उन्होंने कहा कि माहौल बिगाड़ने वालों में एक बड़ी तादाद दंगाइयों और भीड़ उकसाने वालों की है। इसके लिए सरकार एहतियातन गिरफ़्तारी से लेकर पीएसए के तहत गिरफ़्तारी जैसे कदम उठा रही है।
रेड्डी ने हुर्रियत कांफ्रेंस जैसे अलगाववादी संगठनों पर घाटी के लोगों को पत्थरबाज़ी के लिए उकसाने का आरोप लगाया। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ रेड्डी न बताया कि एनआईए ने टेरर फंडिंग के मामले में अभी तक 18 लोगों पर चार्जशीट तैयार की है।
घाटी में शांति और स्थिरता पर बोलते हुए रेड्डी ने बताया कि सरकार द्वारा कश्मीर पर फैसला लेने के कुछ महीने तक स्कूलों में छात्रों की उपस्थिति कम थी मगर सरकार द्वारा लिए गए एहतियात के चलते कश्मीर में एग्ज़ाम देने वाले छात्रों का आँकड़ा अब 99.7 प्रतिशत है।
एक अन्य प्रश्न के उत्तर में गृह-राज्यमंत्री ने जानकारी देते हुए बताया कि कश्मीर प्रशासन के मुताबिक पिछले छह महीने में राज्य में 34 लाख, 10 हज़ार 219 सैलानी घूमने आए जिसमें कि 12 हज़ार 934 विदेशी पर्यटक भी शामिल थे। इसके ज़रिए राज्य को करीब 25.12 करोड़ रुपए की आमदनी हुई। उन्होंने यह भी बताया कि राज्य में हिंसा और उपद्रव के दौरान पम्प एक्शन गन का इस्तेमाल उन परिस्थितयों में किया गया जब नागरिकों की जान बचाने के लिए कोई अन्य विकल्प नहीं था।
संसद में बोलते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि घाटी में इन्टरनेट सेवाओं पर लगे प्रतिबन्ध उसी वक़्त हटाया जाएगा जब स्थानीय प्रशासन को लगेगा कि घाटी की स्थितियाँ सामान्य हैं। वर्तमान समय में इन्टरनेट की महत्ता को स्वीकार करते हुए अमित शाह ने इस बैन को सही ठहराते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोपरि बताया। उन्होंने कहा कि राज्य में सभी अखबार और टीवी चैनल सुचारू रूपसे काम कर रहे हैं और अख़बारों के सर्कुलेशन में कोई कमी नहीं आई है।
मंगलवार को जम्मू-कश्मीर के स्थानीय प्रशासन ने कहा था कि घाटी में लगाए गए प्रतिबन्ध धीरे-धीरे हटाए जाएँगे। बता दें कि हाल ही में घाटी में लगे प्रतिबंधों को लेकर मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि सरकार ने करीब 90 फीसदी प्रतिबन्ध हटा लिए हैं।
बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में फ़िरोज़ ख़ान को ‘धर्म विज्ञान संकाय’ में कर्मकांड पढ़ाने के लिए भेजा गया है, जिसे लोग संस्कृत भाषा समझ कर उनका विरोध कर रहे छात्रों को ही भला-बुरा कह रहे हैं। कई लिबरल्स व अन्य लोग समझ रहे हैं कि बीएचयू में भेदभाव के तहत एक ‘मुस्लिम शिक्षक का विरोध’ हो रहा है। जबकि, ऐसा नहीं है। इस विभाग में यज्ञ और ज्योतिष जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं। यह नियुक्ति बीएचयू के संस्थापक महामना मदन मोहन मालवीय के मूल्यों एवं उनके द्वारा बनाए गए नियमों के भी ख़िलाफ़ है। छात्रों का आरोप है कि कुलपति मनमानी कर रहे हैं।
इसी क्रम में वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला ने एक अख़बार का एड शेयर कर के दिखाया कि किस तरह मुस्लिमों व ईसाइयों द्वारा संचालित शिक्षण संस्थानों में उसी ख़ास महजब के लोगों को विभिन्न पदों पर न सिर्फ़ नियुक्त किया जाता है, बल्कि इसके लिए सार्वजनिक आवेदन भी निकाले जाते हैं। यह सब खुल्लम-खुल्ला होता है और कोई मुँह नहीं खोलता। आखिर कथित अल्पसंख्यकों को कोई नाराज़ क्यों करे? प्रभु चावला ने अख़बार में छपे जिस एड की तरफ लोगों का ध्यान आकृष्ट कराया, वो ‘जीसस एंड मेरी’ का है। इसमें प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति हेतु आवेदन आमंत्रित किया गया है।
लेकिन, सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात है कि आवेदक के पास पादरी का ‘अनुशंसा पत्र’ होना चाहिए और उसके पास ‘बैप्टिज्म सर्टिफिकेट’ भी होना चाहिए। यानी पादरी की अनुशंसा और आपका ईसाई होना, ये दोनों ही ज़रूरी है। ऐसा किसी चर्च के नियम-क़ानून या कर्मकांड वाले विषय के लिए नहीं किया जा रहा, बल्कि कॉलेज के प्रधानाध्यापक के पद पर नियुक्ति के लिए किया जा रहा। फ़िरोज़ ख़ान वाले मामले में ग़लत तरीके से छात्रों पर आरोप लगाने वाले ऐसे अनगिनत घटनाओं पर चुप रहते हैं, जबकि, बीएचयू वाला मामला इससे एकदम अलग है।
‘द न्यूज़ इंडियन एक्सप्रेस’ के एडिटोरियल डायरेक्टर प्रभु चावला ने पूछा कि क्यों न हिन्दुओं द्वारा संचालित शिक्षण संस्थान अपने यहाँ विभिन्न पदों पर नियुक्ति के लिए शर्त रख दें कि केवल हिन्दू ही आवेदन करने के योग्य होंगे? उन्होंने लिबरलों से पूछा कि क्या तुमलोगों के पास इसका जवाब है कि हिन्दुओं को ऐसा करने का अधिकार क्यों नहीं है? इसके जवाब में अभिजीत मित्रा ने बताया कि ऐसी मजहबी चीजें ‘अल्पसंख्यक अधिकार’ के तहत आती हैं और कोई आवाज़ नहीं उठा पाता। उन्होंने कहा कि स्टीफेंस, जामिया और लोयला में हिन्दू छात्रों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है, ये किसी से छिपा नहीं है।
Unfortunately this kind of sectarian rubbish is protected under “minority rights”. We all know HINDU students get treated like shit at JMC, Loyola & Stephens … yet they choose to go there & crawl to the churches tune to get the right “label” https://t.co/EFIcqXLfyg
सोशल मीडिया पर कई लोगों ने ‘इंडिया टुडे ग्रुप’ के पूर्व एडिटोरियल डायरेक्टर प्रभु चावला के प्रश्नों से सहमति जताई है। इनका कहना है कि हिन्दुओं द्वारा संचालित संस्थानों को भी अब केवल हिन्दुओं की ही नियुक्ति करनी चाहिए।
काशी हिन्दू विश्विद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के छात्रों द्वारा संकाय में मुस्लिम सहायक प्रोफ़ेसर डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध जारी है। डॉ.फिरोज खान की नियुक्ति को महज ‘संस्कृत भाषा’ का मुद्दा बनाकर मीडिया और सोशल मीडिया के कई वामपंथी क्रन्तिकारी अभी भी भ्रम फ़ैलाने में लगे हैं। अभिव्यक्ति की आजादी और अधिकारों की लड़ाई के नाम पर इस पूरे मुद्दे को इस तरह से पेश किया जा रहा है जैसे ‘अधिकार’ और ‘संवैधानिक सुरक्षा’ केवल फिरोज खान को प्राप्त है। वही संविधान धर्म और उसके मूल्यों की रक्षा की भी गारंटी देता है। लेकिन, मीडिया गिरोह इस लाइन पर अड़ा है कि भजन गायक पिता रमजान के पुत्र फिरोज खान को संस्कृत पढ़ने-पढ़ाने से रोका जा रहा है। उसे उसके संवैधानिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा जिससे फिरोज खान की भावनाएँ आहत हो रही हैं।
यहाँ यही मीडिया ‘गिरोह’ ये भूल जा रहा है कि क्यों वैदिक ग्रंथों, सनातन मूल्यों और धर्म विज्ञान की शिक्षा लेने गए एक विशेषीकृत संकाय के छात्रों को, जो आज भी विद्या अर्जन विधिवत गुरु-शिष्य परम्परा और उनके सारभूत मूल्यों के आधार पर ही करते आए हैं, एक मुस्लिम धर्मावलम्बी फिरोज खान को संस्कृत भाषा जानने और कुछ शास्त्र कंठस्थ होने के कारण अपना गुरु मान लें? क्या ऐसा करने से उन छात्रों की भावनाएँ आहत नहीं होंगी? क्या उन्हें अपने धर्म और शास्त्रों की शिक्षा उन्हीं से लेने का अधिकार नहीं है जो उस धर्म के हों और उस सनातन परंपरा और उसके अनुष्ठानों को जीते हों?
आज ऐसे कई मुद्दों पर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ जिस पर आमतौर पर मुख्यधारा की मीडिया मौन है। आपको उन उद्देश्यों और उस दृष्टिकोण से भी परिचित कराऊँगा जिसे ध्यान में रखकर एक ही संस्थान में एक ही विषय के लिए एक अलग से विभाग, संस्कृत विभाग (कला संकाय में) बनाया गया और एक पूरा संकाय (संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय)। यही नहीं SVDV जिसका पूर्व नाम वैदिक महाविद्यालय था, के लिए निर्दिष्ट नियम मालवीय जी ने खुद एक शिलालेख पर अंकित करवा दिया ताकि इससे यहाँ प्रवेश करने वाला हर इंसान परिचित हो। कागजों पर लिखी बातें समय के ‘छद्म’ सेक्युलरिज्म के नाम पर बदली जा सकती हैं। शायद ऐसा उन्हें भी भान रहा हो कि मेरे जाने के बाद जिस उद्देश्य से BHU जैसा बड़ा संस्थान और उसमें भी हिन्दू धर्म और उसकी वैज्ञानिक व्याख्याओं के लिए अलग से एक संकाय संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान उन्होंने खड़ा किया ताकि उसकी मूल भावना सुरक्षित रहे। यह महाविद्यालय (संकाय) सनातन हिन्दू धर्म और वेद, व्याकरण, ज्योतिष, वैदिक दर्शन, धर्मागम, धर्मशास्त्र मीमांसा, जैन-बौद्ध दर्शन के साथ-साथ इन सबसे जुड़े साहित्य के निरंतर उन्नयन और संवर्धन में लगा रहे।
शिलालेख SVDV BHU
किसी भी संस्था की स्थापना के पीछे उसके संस्थापक का एक उद्देश्य होता है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ‘हिन्दू’ शब्द और संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के ‘धर्म’ शब्द में संस्थापक महामना मदन मोहन मालवीय की बहुत सारी अवधारणाएँ समाहित हैं। आज भी SVDV के वेबसाइट पर उस संकाय की स्थापना का उद्देश्य साफ़ लिखा है:
“SVDV की स्थापना 1918 में महामना द्वारा इस उद्देश्य से की गई थी कि प्राचीन भारतीय शास्त्रों, संस्कृत भाषा और साहित्य के अध्ययन को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए, इस संकाय का प्रमुख उद्देश्य समाज में धर्म, अध्यात्म, ज्योतिष और तंत्र के बारे में व्याप्त भ्रान्तियों को दूर करना है और विशेष रूप से समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिए नैतिकता और धर्म के सर्वोपरि मूल्यों को बहाल करना है। यहाँ परंपरागत तरीकों के साथ-साथ मौखिक-सह-लिखित परंपरा को ध्यान में रखते हुए शास्त्रीय ग्रंथों की ‘स्ट्रिक्टली’ पढ़ाई होती है।”
संकाय की खुद उद्घोषणा है कि हम ग्रंथों के प्रत्येक शब्द की व्याख्या पर जोर देते हैं ताकि उनके ‘आवश्यक’ निहितार्थ को समझा जा सके। यही फ़िरोज़ खान की नियुक्ति के विरोध का आधार भी है। जिसे आप हमारे इस रिपोर्ट में पढ़ सकते हैं।
अब आप उन तथ्यों को जानिए जो इस विश्वविद्यालय की स्थापना के मूल में हैं। मालवीय जी के उन्हीं सिद्धांतों, विश्वविद्यालय के विज़न को खुद हाल ही में BHU के वर्तमान वाइसचांसलर JNU के प्रोफ़ेसर राकेश भटनागर ने रीलिज किया। पहले देखिए उसमें क्या लिखा है। किताब के पहले पन्ने पर VC राकेश भटनागर का सन्देश भी है।
प्रस्तावना और BHU की स्थापना का उद्देश्य
विश्वविद्यालय की स्थापना के समय की प्रस्तावना में भी BHU के निर्माण का उद्देश्य साफ है। एक उद्धरण प्रस्तुत है, “जब दिसंबर में काशी में राष्ट्रीय महासभा हुई और उसी अवसर पर 31 दिसंबर 1905 को बरार के श्री वीएन महाजनी एमए के सभापतित्व में काशी के टाउन हॉल में एक बड़ी भारी सभा हुई थी। सब धर्मों के प्रतिनिधि देशभर के प्रसिद्ध शिक्षा प्रेमियों के सामने आज की यह योजना रखी गई। यहाँ भी हिंदू विश्वविद्यालय की योजना का सबने स्वागत किया। 1 जनवरी सन 1906 को वहीं कॉन्ग्रेस के पंडाल में हिंदू विश्वविद्यालय स्थापित करने की घोषणा हुई थी।”
BHU का प्रस्ताव
अगले ही वर्ष 1907 में 20 से 26 जनवरी तक प्रयाग में परमहंस परिव्राजकाचार्य जगद्गुरु श्री स्वामी शंकराचार्य जी के सभापतित्व में सुप्रसिद्ध साधुओं तथा विद्वानों की सनातन धर्म महासभा में यह प्रस्ताव स्वीकार हो गया कि-
भारतीय विश्वविद्यालय के नाम से काशी में एक हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए, जिसके निम्नांकित उद्देश्य हों-
श्रुतियों तथा स्मृतियों द्वारा प्रतिपादित वर्णाश्रम धर्म के पोषक, सनातन धर्म के सिद्धांतों का प्रचार करने के लिए धर्म के शिक्षक तैयार करना।
संस्कृत भाषा और साहित्य के अध्ययन की अभिवृद्धि।
भारतीय भाषाओं तथा संस्कृत के द्वारा वैज्ञानिक तथा शिल्प-कला से संबंधित शिक्षा के प्रचार में योगदान देना।
विश्वविद्यालय में निम्नांकित संस्थाएँ होंगी-
वैदिक विद्यालय (वर्तमान में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय)- जहाँ वेद, वेदांग, स्मृति, इतिहास तथा पुराणों की शिक्षा दी जाएगी। ज्योतिष विभाग में एक ज्योतिष संबंधित तथा अंतरिक्ष विद्या संबंधित वेधशाला भी निर्मित की जाएगी।
वैदिक कॉलेज का कार्य उन हिंदुओं के अधिकार में होगा जो श्रुति, स्मृति तथा पुराणों द्वारा प्रतिपादित सनातन धर्म के सिद्धांतों को मानने वाले होंगे।
इस विश्वविद्यालय में वर्णाश्रम धर्म के नियमानुसार ही प्रवेश होगा।
इस विद्यालय (संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय) के अतिरिक्त अन्य सभी विद्यालयों में सब धर्मावलंबियों तथा सब जातियों का प्रवेश हो सकेगा तथा संस्कृत भाषा के अन्य शाखाओं की शिक्षा जाति और सम्प्रदाय का भेदभाव किए बिना सबको दी जाएगी।
इतने से ही आपको इस विश्विद्यालय की स्थापना का उद्देश्य और इसके संस्थापक का दृष्टिकोण स्पष्ट हो गया होगा। आज इन्हीं मालवीय मूल्यों और संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के उद्देश्यों के लिए SVDV के छात्र लड़ रहे हैं।
VC ने जिस किताब को लॉन्च किया, उसी में लिखी बातें शायद पढ़ी नहीं या पढ़कर भी ‘सेक्युलर’ होने के नाम पर उस निर्णय को मंजूरी दी, जिसे अभी तक संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के किसी अधिकारी या पूर्व के किसी भी वाईसचांसलर ने लाँघने की कोशिश नहीं की। या तो पहले के सभी रूढ़िवादी रहे होंगे या उनकी मालवीय जी के मूल्यों, उद्देश्यों और आदर्शों में श्रद्धा और आस्था रही होगी। उनके लिए मालवीय जी ‘एक सामान्य व्यक्ति’ नहीं थे। उन्होंने उस वक़्त हिन्दू धर्म और सनातन मूल्यों की सम्पूर्ण शिक्षा का दूरदर्शी सपना देखा जब देश गुलाम था। न केवल सपना देखा बल्कि उसके आदर्श स्थापित करने वाले महामानव रहे।
SVDV BHU
मालवीय जी के सेक्युलर होने पर कभी प्रश्न नहीं उठा, विश्विद्यालय में उन्होंने सभी धर्मों के प्रवेश को सुनिश्चित किया सिर्फ एक संकाय को छोड़कर जो हिन्दू धर्म और इसके वैज्ञानिक व्याख्या के लिए विशेषीकृत था। कहा जाता है कि बिरला के दान दिए पैसे से मंदिरनुमा बने इस संस्थान को वैदिक साहित्य, हिन्दू धर्म और सनातन मूल्यों के सतत प्रवाह को बनाए रखने के लिए ऐसा विशेष प्रावधान बनाया गया कि वहाँ सिर्फ वर्णाश्रम धर्म के अनुसार हिन्दुओं (बौद्ध, जैन, सिख क्योंकि ये भी अपने आप को मूलरूप से सनातनी ही मानते हैं) का प्रवेश होगा। अब तो विश्विद्यालय के ही छात्र कह रहे हैं कि यदि आज की तरह मालवीय जी ‘छद्म’ सेक्युलर होने के चक्कर में पड़े होते तो न आज BHU में विश्वनाथ मंदिर होता, जिसे अपने मृत्यु से पहले बिरला से उन्होंने वचन लिया था कि वो इसे पूरा कराएँगे और आज भी सत्र का आरम्भ वहाँ परिसर में स्थित विश्वनाथ मंदिर में रुद्राभिषेक से ही होता है। न मालवीय भवन में गीता पाठ होता, जिसमें वाईसचांसलर की अनुपस्थिति उनकी मालवीय मूल्यों के प्रति भावना को पहले ही प्रदर्शित कर स्थानीय मीडिया में चर्चा का विषय बन चुकी है।
स्थानीय मीडिया में ऐसी कई खबरें हैं
एक और बात आज जिस संविधान और BHU एक्ट पर VC अड़े हैं। उसे धीरे-धीरे मालवीय जी के न रहने पर कार्यकारिणी और BHU कोर्ट में बाहरी लोगों को घुसाकर बदला गया। उसमें भी सबसे अधिक संशोधन तब हुए जब कॉन्ग्रेस के शासन में वामपंथी प्रभाव से BHU ग्रसित हो चुका था। यहाँ BHU एक्ट का 1951 और अंतिम संशोधन 1999 का एक क्लॉज प्रस्तुत है। देखिए कैसे धीरे-धीरे विश्विद्यालय के मूल स्वरुप और भावना से खिलवाड़ किया गया।
BHU ACT -1951संशोधन के बाद (अंतिम संशोधन -1999)
ऐसा लगता है कि धीरे-धीरे विश्विद्यालय ‘सेक्युलर’ होने की राह पर बढ़ चला है। आज VC कह रहे कि मैं SVDV के शिलालेख को नहीं मानता। मेरे लिए देश का संविधान ही सब कुछ है और BHU एक्ट में कहीं नहीं लिखा है कि SVDV में मुस्लिम की नियुक्ति नहीं होगी। ऐसे में यह आशंका जताई जा रही है कि कल कोई वाइसचांसलर ये भी कह सकता है कि जब विश्विद्यालय में विश्वनाथ मंदिर है तो उसके बगल में मस्जिद या चर्च क्यों नहीं हो सकता। मालवीय भवन में सिर्फ गीता पाठ क्यों, वहाँ अजान और प्रेयर भी होंगे। क्योंकि लिखा तो ये भी कहीं नहीं है।
बावजूद इसके यह विश्विद्यालय सभी धर्मों को समाहित करने के साथ भी सनातन हिन्दू धर्म के मूल्यों और अपने संस्थापक महामना के आदर्शों को आत्मसात कर आगे बढ़ता रहा, किसी टकराव की नौबत नहीं आई। आज टकराव भी तब उत्पन्न हुआ है जब कहीं न कहीं मालवीय जी की मूल भावना और मूल्यों से खिलवाड़ हो रहा है। एक अदूरदर्शी कदम को नियमों का हवाला देकर सही ठहराया जा रहा है। जो आने वाले समय में हिन्दू धर्म और सनातन संस्कृति की रक्षार्थ देश में एकमात्र बचे संकाय को भी अपने दूषण के आगोश में ले लेगा। फिर आज के SVDV के छात्रों की आशंका सही साबित होगी, जब मुस्लिम और ईसाई एक तरफ अल्पसंख्यक होने के नाम पर अपना मजहब और उसकी शुद्धता बनाए रखेंगे और दूसरी तरफ भजन, गीत, संगीत के आभूषणों के साथ संस्कृत भाषा सीखकर आपके हिन्दू धर्म, सनातन मूल्यों, वैदिक साहित्य और अनुष्ठानों की अपने तरह की व्याख्या करेंगे। तब आप सर्वधर्म समभाव का झुनझुना बजाते रहिएगा।
अखंड एक निश्चय प्रतिभा का संचय कुछ यूँ हो एक योद्धा का परिचय संस्कृति की धरोहर सादगी का सरोवर अनंत एक गूँज अपना भाई मनोहर
गोवा की राजधानी में आयोजित एक मौके पर जैसे ही ये पंक्तियाँ गूँजी, वहाँ उपस्थित एक-एक व्यक्ति भावुक हो उठा। राज्यपाल सत्यपाल मलिक, केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और श्रीपद नाइक सहित कई वरिष्ठ जन इस मौके पर मौजूद थे। आइए, जानते हैं कि आज गोवा में क्यों याद किए गए मनोहर पर्रिकर? दरअसल, ये मौक़ा एशिया के सबसे बड़े फ़िल्म फेस्टिवल के आयोजन का था।
गोवा की राजधानी पणजी में 50वें ‘इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया (IFFI)’ के दौरान गोवा के लोग पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर को याद कर भावुक हो उठे। पर्रिकर के प्रयासों के कारण ही आईएफएफआई का आयोजन पणजी में हो पाया और ये फेस्टिवल गोवा की पहचान बन गया। इस वर्ष महानायक अमिताभ बच्चन और सुपरस्टार रजनीकांत जैसे वरिष्ठ अभिनेता इसका हिस्सा बने और उन्हें सम्मानित भी किया गया। इस अवसर पर पीआईबी ने पर्रिकर पर बनी फ़िल्म का एक वीडियो शेयर किया, जिसे देख कर न सिर्फ़ गोवा बल्कि पूरे भारत के लोगों के जेहन में मनोहर पर्रिकर की यादें ताज़ा हो गईं।
इस वीडियो में बताया गया है कि मनोहर पर्रिकर ने अपनी पत्नी से वादा किया था कि वो सार्वजनिक जीवन से विदा लेकर कभी न कभी निजी जीवन में वापस लौटेंगे और परिवार को पूरा समय देंगे। अफसोस ऐसा हो नहीं पाया, लेकिन अपने दोनों बेटों के लिए उन्होंने माँ और पिता, दोनों की ही भूमिका निभाई। उनकी पत्नी का निधन सन 2000 में ही हो गया था।
भारत के पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर पर बनी इस फ़िल्म को बॉलीवुड के फ़िल्म निर्माता करण जौहर ने पेश किया। इस फ़िल्म की शुरुआत में पर्रिकर की आवाज़ गूँजती है, जिसमें वह पद एवं गोपनीय की शपथ लेते दिखते हैं। इस फ़िल्म में बताया गया कि पर्रिकर ने कैसे इंजीनियरिंग का करियर छोड़ कर सार्वजनिक जीवन में क़दम रखा और सारी जिम्मेदारियाँ निभाई। इस फ़िल्म में बताया गया है:
“पर्रिकर जी के सार्वजनिक जीवन से औपचारिकताएँ शून्य हो गईं और उनके निजी जीवन की जिम्मेदारियाँ भी उनका हिस्सा बन गईं। अपने दोनों बेटों को माता और पिता का प्यार देते, वो गोवा के लिए भी एक पिता की छवि बन चुके थे। उनका जीवन सिर्फ़ अपने प्रदेश और वहाँ के लोगों से ही प्रभावित होता था। वो अक्सर मुलाकातियों से घिरे रहते थे और शायद ही उन्हें कोई ख़बर अख़बारों से पता चलती थीं। अपनी योजनाओं को जन-जन तक पहुँचाने के लिए उन्होंने स्वयं को ही माध्यम चुना। इन योजनाओं में वैज्ञानिक सोच और सोशल इंजीनियरिंग का एक मिश्रण था। इनमें युवाओं के लिए स्टार्ट-अप योजनाएँ थीं तो बुजुर्गों के लिए पेंशन योजनाएँ। उनका व्यवहार विनम्र था और व्यक्तित्व सुलझा हुआ था।”
‘Late #ManoharParrikar gave a permanent venue for #IFFI here in #Goa. Bringing #IFFI to Goa was an official decision but Parrikar gave credibility to that decision’ – excerpts from a film on the former Chief Minister Goa
ऊपर संलग्न किए गए वीडियो में आप उस फ़िल्म को देख सकते हैं। इसमें मनोहर पर्रिकर के जीवन के कई महत्वपूर्ण पलों की झलकियाँ भी दिखाई गई हैं, जिन्हें देख कर आप भी पुराने दिनों में खो जाएँगे।
वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार का अंतिम सहारा अब सड़क पर उतर कर होने वाला विरोध-प्रदर्शन ही रह गया है। अगर आप सोच रहे हैं कि रवीश डफली बजाते हुए सड़क पर लाल झंडा लिए उतरने की योजना बना रहे हैं, तो शायद आप उनकी घाघ-बुद्धि से परिचित नहीं हैं। वो भला ख़ुद क्यों सड़क पर आएँ? इसमें उनका घाटा है। सरकार का क्या जाता है? इसलिए, उनके धूर्त दिमाग ने नई योजना तैयार की है। क्यों न युवाओं, ख़ासकर छात्रों को ही भड़का कर सड़क पर उतार दिया जाए। साँप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी। एनडीटीवी की टीआरपी पाताल में धँसते जा रही है और रवीश नाक में धँसने वाला मॉलिक्यूल बनाने की बात कर रहे हैं। उनका मीडिया संस्थान कंगाल होने की ओर अग्रसर है और वो युवाओं को बौद्धिक रूप से कंगाल बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
अफवाह ऐसे फैलाई जा रही है, जैसे लगता हो कि जेएनयू की फी काफ़ी महँगी है। जबकि देखा जाए तो विश्वविद्यालय ने सालाना 240 रुपए के ट्यूशन या 9 रुपए के लाइब्रेरी फी में कोई बदलाव नहीं किया है। बस हॉस्टल मैनुअल अपडेट हुआ है। जिन सेवाओं का छात्र इस्तेमाल करेंगे, उनका शुल्क देना होगा। शुल्क कम देना है, कम बिजली पानी यूज कीजिए। 10 रुपए से 300 रुपए हुए मासिक हॉस्टल फी को 3000% की वृद्धि बता कर प्रचारित किया जा रहा है। क्या ये भ्रामक नहीं? इससे जेएनयू महँगा तो नहीं हो जाता। उसकी तुलना उसके इर्द-गिर्द स्थित आईआईटी और आईआईएमसी से न ही करें तो बेहतर।
मुफ्त शिक्षा के लिए बजट कहाँ से आएगा? सरकार ने 12वीं तक की शिक्षा पहले ही मुफ़्त कर रखी है। जर्मनी और नॉर्वे जैसे देशों में उच्च-शिक्षा काफ़ी सस्ती है, लेकिन उसकी जनसंख्या से ज्यादा लोग तो बिहार के कई जिलों में रहते हैं। 130 करोड़ लोगों के देश में सभी के लिए मुफ्त शिक्षा की बात ही बेमानी है, जहाँ की जीडीपी अपना राजस्व घाटा कम करने के लिए संघर्ष कर रही हो। जेएनयू के आंदोलन के पीछे राजनीति हो रही है, इसमें कोई शक नहीं। सत्ता में अस्थिरता फैलाने की मंशा रखने वाले वामपंथी इस पर जवाब देंगे कि चीन की वामपंथी सरकार ने हॉन्गकॉन्ग के छात्रों के साथ कैसा व्यवहार किया है?
दरअसल, रवीश ने एक लेख लिखा। इसमें उन्होंने युवाओं को सड़क पर उतर कर अराजकता फैलाने की अपील की। भले ही उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा किया लेकिन उनकी मोदी-विरोधी मंशा हिलोरे मारते हुए अपना प्रत्यक्ष परिचय दे रही थी। रवीश ने हिंदी पट्टी के नौजवानों को अभिशप्त करार दिया। उन्होंने हिंदी बेल्ट के युवाओं की राजनीतिक समझ पर सवाल खड़े किए। रवीश ने कहा कि यहाँ के युवाओं की राजनीतिक समझ थर्ड क्लास की है। वो कहते हैं कि थर्ड क्लास न होती तो वो भी जेएनयू वालों की तरह ही सड़क पर होते।
क्या रवीश चाहते हैं कि यूपी-बिहार के युवा भी अपने कॉलेज के किसी डीन को घेर कर दुर्व्यवहार करें, जिससे वो वहीं अचेत होकर गिर पड़े? उसकी बीवी और बच्ची गिड़गिड़ाते रहें, क्योंकि बीमार डीन को जल्दी अस्पताल पहुँचाना है और छात्र नारेबाजी करते हुए एम्बुलेंस को घेर कर खड़े हो जाएँ? जी हाँ, ऐसा जेएनयू में हुआ, जब प्रोफेसर उमेश कदम मरते-मरते बचे। क्या रवीश चाहते हैं कि हिंदी पट्टी की छात्राएँ भी अपने कॉलेज की किसी महिला प्रोफेसर के कपड़े फाड़ने का प्रयास करे? ऐसा जेएनयू में हुआ। उन्हीं छात्रों ने किया, एक हाथ में जो महिलाधिकार का झंडा और दूसरे हाथ में कैंडल लिए आए दिन सड़कों पर निकलती हैं।
युवाओं को भड़काते हुए रवीश कुमार का फेसबुक पोस्ट
कहीं रवीश की इच्छा ये तो नहीं कि बिहार के छात्र संगठनों में वामपंथ काबिज हो जाए और नेता झूठी अफवाह फैलाएँ कि कैम्पस में सीआरपीएफ तैनात कर छात्रों को पिटवाया जा रहा है। जेएनयू के छात्र नेता साकेत मून ने कुछ ऐसा ही किया। आवाज़ उठाने और सड़क पर उतरने के लिए युवाओं को जेएनयू से सीखने की सलाह देने वाले रवीश कहीं ऐसा तो नहीं चाहते कि यूपी-बिहार के कॉलेजों में भी महिला पत्रकारों के साथ बदतमीजी की जाए और उनके ‘मजे लेने’ की बात कही जाए। महिला मीडियाकर्मियों को घेर कर गुंडागर्दी करने का काम जेएनयू के उपद्रवी कर चुके हैं।
आखिर पढ़ने के लिए राजनीति करना अनिवार्य क्यों है? राजनीति की समझ होना, राजनीतिक चर्चा करना और सड़क पर उतर कर राजनीति करना अलग-अलग चीजें हैं। जब रवीश कहते हैं कि हिन्दू पट्टी के युवा चुप हैं, तब क्या वो उन्हें अराजकता फैलाते हुए जेएनयू के उपद्रवियों की तरह पुलिस बैरिकेडिंग तोड़ कर क़ानून-व्यवस्था की ऐसी-तैसे करने को नहीं भड़का रहे? क्या रवीश कुमार जवाब देंगे कि सोमवार (नवंबर 18, 2019) को दिल्ली में उद्योग भवन, लोक कल्याण मार्ग, सेंट्रल सेक्रेटेरिएट और पटेल चौक मेट्रो स्टेशनों पर सेवाओं को ठप्प क्यों किया गया था? इससे कितने लोगों को परेशानी हुई, इसका कोई हिसाब नहीं। उस दिल्ली में ऐसा हुआ, जहाँ मेट्रो को सिटी की लाइफलाइन कहा जाता है।
बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी भी तो इसी देश का हिस्सा है। वहाँ के छात्र भी तो युवा ही हैं। वो अपने ही विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना मदन मोहन मालवीय के मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनके बारे में रवीश ने कभी लिखा क्या? बीएचयू में महमना का नियम चलेगा या फिर किसी वामपंथी वीसी की मनमानी? अगर ऐसा है तो वहाँ शिलापट्टों पर लिखे महामना के विचारों को उसी स्प्रे पेंट्स से मिटा देना चाहिए, जिसका प्रयोग कर के विवेकानंद को अपमानित किया गया था। और हाँ, उस स्प्रे पेंट की कीमत जेएनयू के कई छात्रों के हॉस्टल फी से ज्यादा होती है।
लेकिन, रवीश कुमार बीएचयू पर नहीं लिखेंगे। वे कैलिफोर्निया से अराजकता भड़काने की मीठी गोली फेंकेंगे। उन्होंने मंगलवार को ख़ुद बताया कि वो फ़िलहाल कैलिफोर्निया के कॉलेज ऑफ केमिस्ट्री में घूम रहे हैं। मज़ाकिया अंदाज़ में उन्होंने लिखा कि वो एक ऐसा मॉलिक्यूल बना रहे हैं, जो कम्युनल/ फेक टेक्स्ट के साथ अपने आप चिपक जाएगा। हालाँकि, उन्होंने ये नहीं बताया कि ये मॉलिक्यूल झूठ बोल कर और भ्रामक बातें कर के युवाओं को अराजकता फैलाने के लिए भड़काने वालों के कहाँ जाकर चिपकेगा? रवीश ने लिखा कि जैसे ही कोई कम्युनल टेक्स्ट पढ़ेगा, उसकी नाक से होते हुए मॉलिक्यूल दिमाग़ में अलार्म बजाने लगेगा।
अगर सच में ऐसा है तो रवीश को इस मॉलिक्यूल का प्रयोग ख़ुद पर तो कभी नहीं करना चाहिए। वरना वो डूबते चैनल एनडीटीवी के लो-टीआरपी शो ‘प्राइम टाइम’ में बैठेंगे तो उनके रुदन की जगह जनता को एक घंटे तक अलार्म की आवाज़ ही सुनने मिलेगी। दावा तो उन्होंने ये किया है कि ये अलार्म दिमाग में बजेगा लेकिन रवीश के मामले में कहाँ से आवाज़ निकलेगी, इस पर वो फ़िलहाल चुप हैं। राज्यसभा का 250वाँ सत्र चल रहा है। ऐसे में रवीश चाहते हैं कि इस ऐतिहासिक मौके पर कुछ ऐसा हो, जिससे जनता का ध्यान वहाँ से हट कर कहीं और चला जाए। सड़कों पर ख़ून बहे और अराजकता फैले।
बीते दिनों खबर आई थी कि उत्तर प्रदेश की सरकार आगरा का नाम बदलकर अग्रवन करना चाहती है। इस संबंध में सरकार की ओर से ऐतिहासिक प्रमाण मॉंगे गए हैं। अब अलीगढ़ का नाम बदलने की भी मॉंग उठने लगी है। योगी सरकार से अलीगढ़ का नाम बदलकर ‘हरिगढ़’ करने की मॉंग भाजपा के स्थानीय नेताओं ने किया है। अलीगढ़ का नाम बदलने की पहल तब भी हुई थी जब कल्याण सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। लेकिन, उस समय केंद्र में कॉन्ग्रेस की सरकार होने के कारण यह मुमकिन नहीं हो पाया था।
भाजपा की महानगर उपाध्यक्ष सुबोध स्वीटी ने इस बारे में बात करते हुए कहा कि तत्कालीन सीएम कल्याण सिंह ने 1992 में मुख्यमंत्री रहते हुए शहर का नाम हरिगढ़ करने कोशिश की थी लेकिन उस वक्त केंद्र में कॉन्ग्रेस सरकार थी, इसलिए उनकी कोशिशें कामयाब नहीं हुईं।
योगी सरकार के आगरा का नाम बदलने की चर्चाओं के बीच भाजपा के जनप्रतिनिधि अलीगढ़ का नाम बदलने की बात कह रहे हैं। पढ़ें पूरी खबर…#UttarPradeshhttps://t.co/sNTuijNL5G
उल्लेखनीय है कि साल 2015 में विश्व हिन्दू परिषद ने अलीगढ़ में एक प्रदेशव्यापी बैठक में प्रस्ताव पास कर शहर का नाम हरिगढ़ करने की माँग की थी। बीते साल जब आजमगढ़ का नाम आर्यमगढ़ करने का प्रस्ताव योगी सरकार तैयार कर रही थी, तब सांसद सतीश गौतम और शहर विधायक संजीव राजा ने शासन स्तर पर अलीगढ़ को हरिगढ़ करने की माँग की थी।
सांसद सतीश गौतम ने बताया कि पूर्व में भी अलीगढ़ को उसका प्राचीन नाम हरिगढ़ दिलाने की माँग अरसे से उठाई जा रही है। शासन स्तर पर भी इससे अवगत कराया गया है। वहीं, विधायक संजीव राजा ने कहा, पुरातन समय से हरिगढ़ नाम से ही शहर को जाना जाता था, लेकिन मुगलकाल में इसे अलीगढ़ कर दिया गया। पुराना स्वरुप वापिस लौटने का समय आ गया है।
बीते दिनों आम्बेडकर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. अरविंद कुमार दीक्षित ने बताया था कि उन्हें शासन की ओर से आगरा का नाम अग्रवन करने के संबंध में पत्र मिला है। पत्र में उससे जुड़े ऐतिहासिक साक्ष्य के बारे में पूछा गया है। विश्वविद्यालय ने इस संबंध में शोध के लिए टीम बना दी है।
उत्तरप्रदेश के आगरा में भगवान हनुमान की मूर्ति क्षतिग्रस्त किए जाने की घटना सामने आई है। घटना शहर के एत्माद्दौला क्षेत्र के घनी आबादी वाले महावीर नगर की है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक कुछ शरारती तत्वों ने हनुमान मूर्ति की आँखें निकाल ली। लोगों को इसकी भनक मंगलवार (19 नवंबर 2019) की सुबह लगी जब वे मंदिर पहुँचे।
घटना की सूचना मिलते ही बड़ी संख्या में लोग मौके पर जमा हो गए। आनन-फानन में पुलिस भी पहुॅंची और लोगों को समझा-बुझाकर शांत कराया। तनाव को देखते हुए पुलिस बल की तैनाती की गई है। अज्ञात के खिलाफ मामला दर्ज कर पुलिस जॉंच कर रही है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार, मंदिर के पुजारी महावीर दास ने बताया कि घटना सोमवार और मंगलवार की दरम्यानी रात घटी। वहीं एत्माद्दौला थाने के स्टेशन ऑफिसर उदयवीर सिंह मलिक का कहना है कि मंगलवार की सुबह घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस हरकत में आई। खंडित मूर्ति को हटाकर उसकी जगह नई मूर्ति स्थापित करा दी गई है। इस मामले में पुलिस द्वारा अज्ञात शरारती तत्वों के खिलाफ आईपीसी की धारा 153 के तहत एफआईआर दर्ज की गई है। पुलिस ने बताया है कि वे इलाके में किसी सीसीटीवी कैमरे को ढूँढने का प्रयास कर रही है, ताकि मंदिर के पास घूम रहे संदिग्धों की पहचान करके आरोपितों की पहचान की जा सके।
गौरतलब है कि हिंदुओं की भावना आहत करने के इरादे से मंदिर में देवी-देवताओं की मूर्ति खंडित करने का ये पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी आगरा के पड़ोसी जिलों से कम से कम 15 ऐसी घटनाओं की खबर बीते कुछ दिनों में सुनने को मिल चुकी हैं। इससे पहले राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के चांदनी चौक इलाके में भी हिंदू मंदिर में देवी-देवताओं की मूर्तियों के साथ तोड़फोड़ की खबर ने तूल पकड़ा था। जब पुलिस ने मोहम्मद जुबेर और अनस नाम के शख्स को गिरफ्तार किया था और बाद में 10 लोगों की गिरफ्तारी हुई थी।
इसके अलावा जून महीने में उत्तर प्रदेश के पीलीभीत के रोहनिया गाँव में एक मुस्लिम भीड़ द्वारा लाउडस्पीकर का विरोध करने पर भी एक मंदिर में तोड़-फोड़ की गई थी। जिसके बाद इलाक़े में साम्प्रदायिक तनाव फैल गया था। इस दौरान भीड़ ने लाउडस्पीकर को तोड़ दिया था और मंदिर की मूर्तियों को अपने साथ ले गए। इस घटना में महबूब, मोनिस, इज़राइल, आज़ाद और अलनूर को गिरफ्तार किया गया था।
फिर, खतौली से भी खबर आ चुकी है कि वहाँ एक मुस्लिम युवक ने कुछ समय पहले मंदिर में प्रवेश करके वहाँ स्थापित हनुमान जी की मूर्ति को तोड़ने का प्रयास किया था। इस दौरान आरोपित ने मंदिर में पूजा करने वाले भक्तों के साथ दुर्व्यवहार भी किया था। हालाँकि इस घटना में घटनास्थल पर मौजूद लोग अपराधी को पकड़ने में क़ामयाब रहे, लेकिन वह उसे मंदिर के शीशे को तोड़ने से नहीं रोक सके। पुलिस ने आकर उसे गिरफ़्तार किया। आरोपी की पहचान मूसा के रूप में हुई।
राहुल गॉंधी सहित कई कॉन्ग्रेसी नेताओं के बयानों का हवाला देकर कश्मीर पर पाकिस्तान अपने प्रोपगेंडा को हवा देता रहता है। अब कॉन्ग्रेस के चर्चित सांसद शशि थरूर ने एक ऐसे संगठन से जुड़ने का फैसला किया है जो पाक परस्त माना जाता है। हाल ही में इस संगठन ने लंदन में कार्यक्रम आयोजित कर कश्मीर पर पाकिस्तानी प्रोपगेंडे को हवा दी थी। कार्यक्रम के दौरान भारत विरोधी बातें की गई थी। इस कार्यक्रम में एनडीटीवी की एंकर निधि राजदान भी शामिल हुई थीं। ब्रिटेन की इस पाकिस्तान परस्त संस्था का नाम है सीटीडी एडवाइज़र्स। थरूर इस संस्था के रणनीतिक सलाहकार का पद संभालेंगे।
सीटीडी एडवाइज़र्स का गठन पिछले साल पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश बैंकर शोएब बाजवा ने किया था। उनकी संस्था ने 7 नवम्बर को लन्दन में एक कार्यक्रम आयोजित किया था। “द कॉस्ट टू ब्रिटेन ऑफ़ द कश्मीर क्राइसिस-इज़ देयर अ सोल्यूशन” नाम यह कार्यक्रम भारत विरोधी एजेंडे का हिस्सा था। कार्यक्रम में कश्मीर को लेकर कई तरह के भ्रम और झूठ फ़ैलाने की कोशिश की गई।
इस कार्यक्रम में एनडीटीवी की एंकर निधि राजदान भी शामिल हुई थीं। निधि ने भी कश्मीर पर उसी सुर में बात की जैसे पाकिस्तान करता रहता है। निधि ने कश्मीर में भारत की कार्रवाई को विश्व का सबसे बड़े लोकतंत्र पर धब्बा बताया था।
इस कार्यक्रम में संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की दूत रहीं मलीहा लोधी और ब्रिटेन के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ल्या ग्रांट भी मौजूद थे। ग्रांट ने भी विवादित बयान देते हुए कहा था कि मोदी सरकार का कदम कश्मीरियों को कट्टरपंथ की ओर ढकेल रहा है। उन्होंने कहा कि इसका सीधा प्रभाव ब्रिटेन की सुरक्षा पर पड़ेगा, क्योंकि यहाँ करीब 10 लाख कश्मीरी रहते हैं।
गौरतलब है कि इस कार्यक्रम का समर्थन जेकेएलएफ जैसे आतंकी संगठन ने भी किया था। कश्मीर में कट्टरपंथ और आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले जेकेएलएफ ने निधि को भी शाबाशी दी थी। निधि राज़दान के भाषण की सराहना करते हुए जेकेएलएफ ने इसे कश्मीरियों को एक मंच पर लाने का अच्छा प्रयास बताया था। थरूर के साथ ब्रिटेन के पूर्व एनएसए ग्रांट भी सीटीडी एडवाइज़र्स को ज्वाइन करेंगे। ब्रिटेन की खुफिया सुरक्षा सेवा के पूर्व प्रमुख क्रिस निकोलस और फ्रेंड्स ऑफ इजरायल ग्रुप्स के मानद अध्यक्ष लॉर्ड स्टुअर्ट पोलॉक भी इस संस्था के साथ जुड़ने जा रहे हैं।
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में हॉस्टल मैन्युअल अपडेट किए जाने को लेकर विवाद चल रहा है। इस सम्बन्ध में कुछ बातें हैं, जो आपके लिए जाननी ज़रूरी है। इसे आँकड़ों के माध्यम से समझने की ज़रूरत है। दरअसल, इस यूनिवर्सिटी में सबसे ज्यादा छात्र आर्ट्स, सोशल स्टडीज, लैंग्वेज कोर्स और इंटरनेशनल स्टडीज पढ़ते हैं। जेएनयू में लगभग 8,000 छात्र हैं। इनमें से आधे से ज्यादा आर्ट्स, लैंगवेज, लिटरेचर और सोशल साइंस के हैं। 57% छात्र इन्हीं चार विषयों की पढ़ाई करते हैं। बाकी बचे छात्रों में से 15% इंटरनेशनल स्टडीज में हैं। कुल छात्रों में से 55% एमफिल और पीएचडी कर रहे हैं।
एजुकेशन को लेकर ट्विटर पर अक्सर जानकारी साझा करने वाले अनुराग सिंह ने इन आँकड़ों को ट्वीट किया है। सवाल उठता है कि सरकार जेएनयू पर कितना ख़र्च करती है? अनुराग सिंह ने इस सवाल का जवाब भी दिया है। उन्होंने 2014 से लेकर 2018 तक जेएनयू को हुए वित्तीय लाभ और हानि का विवरण दिया है। ये आँकड़े जेएनयू के एनुअल रिपोर्ट से लिए गए हैं, जो क़रीब 600 पन्नों का है। अनुराग लिखते हैं कि जिन आँकड़ों को पहले पन्ने पर होना चाहिए, वो बीच में कहीं दबे रहते हैं।
जेएनयू को सब्सिडी और सहायता के रूप में सरकार से 352 करोड़ मिलते हैं। जेएनयू प्रतिवर्ष 556 करोड़ ख़र्च करता है। यूनिवर्सिटी के सभी कार्यों को मिला कर सालाना ख़र्च होने वाली रक़म यही है। अब सवाल उठता है कि अगर छात्रों की हिसाब से देखें तो यूनिवर्सिटी प्रति छात्र सालाना कितनी रक़म ख़र्च करता है? छात्रों की संख्या लगभग 8,000 है। कुल ख़र्च 556 करोड़ है। कैलकुलेट करने पर पता चलता है कि जेएनयू हर एक छात्र पर सालाना 6.95 लाख रुपए ख़र्च करता है। अगर हम बाकी चीजों को हटा दें और केवल सरकारी सब्सिडी और ग्रांट्स की बात करें, तब भी आँकड़ा 352 करोड़ होता है। यानी, 4.40 लाख रुपए प्रति छात्र।
अब आपको लगता होगा कि इतनी ज्यादा रक़म ख़र्च हो रही है तो छात्र ज़रूर बेहतर अकादमिक प्रदर्शन करते होंगे? आपको लगता होगा कि काफ़ी उम्दा गुणवत्ता वाले रिसर्च पेपर्स प्रकाशित होते होंगे। दुनिया भर के नामी जर्नल्स में जेएनयू के छात्रों के रिसर्च पेपर्स छपते होंगे और उनकी वाहवाही होती होगी। अनुराग बताते हैं कि ऐसा नहीं है। रिसर्च और प्लेसमेंट के बारे में जेएनयू कुछ स्पष्ट नहीं बताता। अपनी रिपोर्ट्स में वह नहीं बताता कि प्लेसमेंट्स की स्थिति क्या है? फिर भी, उपलब्ध आँकड़ों पर गौर करें तो एमफिल और पीएचडी के छात्रों की संख्या भले ही 4360 हो पर रिसर्च पेपर्स की संख्या 1000 छूने में भी हाँफ जाती है।
अनुराग सिंह ने आगे कैलकुलेट कर के बताया कि प्रतिवर्ष औसतन 4.5 छात्रों में से 1 के ही ‘आर्टिकल’ जर्नल में छप पाते हैं। हर साल 2000 से भी अधिक इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में छात्र हिस्सा लेते हैं। जब रिसर्च पेपर नहीं छप रहे और न कोई पेटेंट्स आ रहे, तो फिर उन कॉन्फ्रेंस से क्या प्राप्त होता है, ये तो भगवान ही जानें। हर साल क़रीब 600 पीएचडी धारक निकलते हैं और न कोई उम्दा रिसर्च पेपर और न कोई पेटेंट।
We see that there are a total of ~8000 students at JNU. Of this, the lion’s share of 57% students is of social sciences, language, literature & arts (4578 students) & International studies 15% ( 1210 students). Almost 55% of the total i.e. 4359 students are doing M.Phil. or Ph.D
तो फिर हंगामा क्यों? फी बढ़ाने का आरोप लगा कर विरोध-प्रदर्शन क्यों? जेएनयू में ट्यूशन फी मात्र 240 रुपए प्रतिवर्ष है। लाइब्रेरी फी के नाम पर प्रतिवर्ष मात्र 6 रुपए लिए जाते हैं। सिक्योरिटी डिपाजिट मात्र 40 रुपए है, जो वापस भी मिल जाते हैं। ये आँकड़े एमफिल और पीएचडी के हैं।
With 4360 students in M.Phil. & Ph.D. courses, there are hardly 1000 research “articles” published in Journals. The university doesn’t name any notable journals while making such claims. This implies that there is just ONE “article” published for every 4.5 students each year.
आईआईटी दिल्ली जेएनयू के बगल में ही स्थित है। वहाँ छात्रों के प्रतिवर्ष 2.25 लाख ख़र्च होते हैं। इसी तरह आईआईएमसी में प्रतिवर्ष 5 से 10 लाख रुपए फी लगते हैं। जब चार्जेज में मामूली बढ़ोतरी की गई है, तब इस सवाल का उठना लाजिमी है कि जेएनयू छात्र संगठन के इस विरोध-प्रदर्शन का औचित्य क्या है? वैसे भी जेएनयूएसयू के विभिन्न पदों पर वामपंथी छात्र संगठन के लोग काबिज हैं।
पाकिस्तान ने 2 भारतीय नागरिकों को गिरफ्तार किया है। इनकी पहचान हैदराबाद के सॉफ्टवेयर इंजीनियर प्रशांत मैदाम और मध्यप्रदेश के किसान डुरमी लाल के रूप में हुई है। दोनों को पिछले हफ्ते पंजाब के बहावलपुर के रेगिस्तानी इलाके से पकड़ा गया। बहावलपुर पुलिस ने 14 नवंबर को इनके खिलाफ मामला दर्ज किया। बताया जा रहा है कि दोनों युवकों बिना किसी वैध कागजात के पाकिस्तान के सीमा में प्रवेश कर गए थे। इनके पास न तो वीजा था और न ही पासपोर्ट।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार प्रशांत मैदाम ने बताया है कि वह तुर्की में रहने वाली महिला से प्यार करता है। पाकिस्तान-अफ्गानिस्तान के रास्ते वह उससे मिलने जा रहा था। वहीं, डुरमी लाल का कहना है कि वह बॉर्डर देखना चाहते था और गलती से सीम पार कर गया।
बहावलपुर के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने स्थानीय पुलिस को इन दोनों भारतीयों को मुल्तान में संघीय जाँच एजेंसी को सौंपने को कहा। जाँच के बाद एजेंसी ने दोनों को पुलिस के हवाले कर दिया। फिलहाल दोनों युवक बहावलपुर पुलिस की हिरासत में हैं।
पाकिस्तान के एक पुलिस अधिकारी ने बताया, “प्रशांत खुशनसीब है कि वो यहीं गिरफ्तार हो गया। हमें नहीं मालूम अगर वो पाकिस्तान से अफ़ग़ानिस्तान पहुँच गया होता, तो उसका क्या होता।” बताया जा रहा है कि जरूरी कार्रवाई पूरी होने के बाद जल्द ही दोनों युवकों को भारत भेजा जा सकता है।
वहीं, तेलंगाना पुलिस के मुताबिक प्रशांत साल 2017 से ही हैदराबाद से गायब है। लेकिन अब इस सूचना के बाद साइबराबाद के पुलिस कमिश्नर वीसी सज्जनर ने राज्य सरकार को एक पत्र लिखा है, जिससे विदेश मंत्रालय को संपर्क किया जा सके और प्रशांत की वापसी संभव हो सके।
पाकिस्तान में बेटे के पकड़े जाने की खबर मिलने के बाद से प्रशांत मैदाम के पिता बाबू राव परेशान हैं। उनके अनुसार उन्हें प्रशांत के पाक में होने की खबर न्यूज चैनलों से मिली। उन्होंने पुलिस कमिश्नर सज्जानर से मिलकर अपने बेटे को वापस लाने की अपील की है। उन्होंने बताया है कि 2 साल पहले उनका लड़का घर से ऑफिस के लिए निकला था, लेकिन वापस नहीं है। जिसके संबंध में उन्होंने 11 अप्रैल को लड़के के गुमशुदगी की शिकायत साइबराबाद की माधापुर पुलिस में दर्ज भी करवाई थी।