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मुस्लिमों के लिए अयोध्या की महत्ता नहीं, कोई औलिया या पीर यहाँ से नहीं जुड़ा: पद्मश्री मोहम्मद

अयोध्या मामले का फैसला आने के बाद विवाद के पटाक्षेप का एएसआई (आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया) के पूर्व निदेशक के के मोहम्मद ने स्वागत किया है। उन्होंने इसे ‘सबसे अच्छा’ फैसला बताया है।

टाइम्स नाउ से बात करते हुए एएसआई (उत्तरी) के पूर्व निदेशक मोहम्मद ने कहा कि अयोध्या और जन्मभूमि हिन्दुओं के लिए वैसे ही पवित्र और महत्वपूर्ण है, जैसे मुस्लिमों के लिए मक्का और मदीना हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मुस्लिमों के लिए इसकी उतनी ज़्यादा कोई महत्ता नहीं है, क्योंकि कोई बड़ा औलिया या पीर इस स्थान से जुड़ा नहीं रहा है।

इसके अलावा एएनआई से बात करते हुए उन्होंने कहा कि एक ‘गैंग’ ने उन्हें उस समय परेशान करना शुरू कर दिया था, जब उन्होंने कहा था कि पुरातात्विक साक्ष्य उस जगह पर मंदिर होने की ओर इंगित करते हैं।

आज अयोध्या पर फैसले की ऐतिहासिक घड़ी में मोहम्मद को याद भी खूब किया जा रहा है। हिन्दू उनके प्रति कृतज्ञता जता रहे हैं कि उन्होंने हिन्दुओं की आस्था के पक्ष में क़ानूनी सबूत ढूँढ़ निकाले।

लेखक और वैज्ञानिक आनंद रंगनाथन वह वाकया याद दिला रहे हैं जिसमें के के मोहम्मद को धमकी दी गई थी कि बाबरी का सच जनता को बताने पर उन्हें सस्पेंड कर देने की धमकी दी गई थी। इसके बाद मोहम्मद ने संस्कृत में जवाब में कहा था, “लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि। स्वधर्मे निधनं श्रेयः…”

संक्रांत सानु और संजय दीक्षित जैसे हिंदूवादी विचारकों ने भी आज मोहम्मद के उस आरोप को याद किया कि मुस्लिम पक्ष को भी ‘सेक्युलर’ गैंग ने ही राम मंदिर के खिलाफ भड़काया था।

रामलला के तुलसी: 92 की उम्र में लड़ा अयोध्या का धर्मयुद्ध, दलीलों से मुस्लिम पक्ष को किया चित

भारतीय न्यायिक व्यवस्था में वकालत की दुनिया के पितामह कहे जाने वाले के पराशरण की अंतिम इच्छा पूरी हो गई। वे अपनी मृत्यु से पहले यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि रामलला अपनी जमीन पर​ कानूनी तौर से विराजमान हो जाएँ। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उनकी यह मुराद पूरी हो गई है।

सुप्रीम कोर्ट में रामलला विराजमान की तरफ से उन्होंने ही दलीलें पेश की थी। सुनवाई के दौरान ऐसी-ऐसी दलीलें रखी कि मुस्लिम पक्ष उसकी काट नहीं तलाश पाए। शीर्ष अदालत पूरी सुनवाई उनकी दलीलों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही। उन्होंने पूरे राम जन्मभूमि को न्यायिक व्यक्ति अथवा ज्यूरिस्टिक पर्सन साबित करने की कोशिश की। हालाँकि, अंत में उनकी यह दलील कोर्ट ने स्वीकार नहीं की, लेकिन पूरी सुनवाई इसी के आसपास घूमती रही।

जब सुनवाई चालू होनी थी, उससे पहले सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने कहा था कि के. पराशरण के लिए ये प्रक्रिया काफ़ी थकाऊ होगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पराशरण ने घंटों खड़े होकर बहस की। अदालत में जजों ने उनकी उम्र को देखते हुए उन्हें बैठ कर बहस करने की सहूलियत दी, लेकिन पराशरण ने कहा कि इंडियन बार की जो परंपरा है, वह उसी हिसाब से चलेंगे। उनका जन्म अक्टूबर 9, 1927 को हुआ था। वह 1983 से 1989 तक भारत के अटॉर्नी जनरल रह चुके हैं।

के पराशरण तमिलनाडु से लेकर केंद्र तक, प्रत्येक सरकारों के फेवरिट रहे हैं। उनके पिता केशव अय्यंगर भी एक वकील थे। उनके दोनों बेटे मोहन पराशरण और सतीश पराशरण भी वकील हैं। भारत के अटॉर्नी जनरल रहने से पहले वह 1976-77 में तमिलनाडु के सॉलिसिटर जनरल भी रह चुके हैं। इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी के शासनकाल में भी वह इस पद पर रहे। कॉन्ग्रेस सरकारों के दौरान वो महत्वपूर्ण पदों पर रहे, लेकिन उनकी विद्वता का लोहा भी राजनीतिक दलों, नेताओं और सरकारों ने माना। तभी तो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जब संविधान की वर्किंग के लिए ड्राफ्टिंग एंड एडिटोरियल कमिटी बनाई तो पराशरण को भी उसमें शामिल किया गया।

पराशरण छात्र जीवन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी रहे हैं। उन्हें बीए के कोर्स के दौरान सीवी कुमारस्वामी शास्त्री संस्कृत मेडल और हिन्दू लॉ में जस्टिस वी भाष्यम अयंगर गोल्ड मेडल मिला। तब वो बीएल कर रहे थे, जिसे अब बीए एलएलबी के नाम से जाना जाता है। फिर बार कॉउन्सिल की परीक्षा में उन्हें जस्टिस श्री केएएस कृष्णास्वामी अयंगर गोल्ड मेडल मिला। आप इसी से समझ सकते हैं कि उन्होंने छात्र जीवन के दौरान ही क़दम-क़दम पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। भगवान राम के लिए, रामकाज के लिए- भला उनसे बेहतर वकील कहाँ मिलता?

राम मंदिर का मामला उन्होंने यूँ ही नहीं लड़ा। उन्हें भारतीय इतिहास, वेद-पुराण और धर्म का वृहद ज्ञान है। यही कारण है कि सुनवाई के दौरान भी वह अदालत में स्कन्द पुराण के श्लोकों का जिक्र कर राम मंदिर का अस्तित्व साबित करते रहे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में जिरह की शुरुआत ही ‘जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ श्लोक के साथ की थी। वाल्मीकि रामायण में ये बात श्रीराम ने अपने भाई लक्ष्मण से कही थी। जहाँ भी आस्था का मामला हो, जहाँ भी धार्मिक विश्वास का मामला हो, वहाँ धर्म की ओर से, श्रद्धा की ओर से, पराशरण ही वकील होते हैं। उन्होंने सरकार के ख़िलाफ़ जाकर रामसेतु बचाने के लिए केस लड़ा।

सबरीमाला मामले में भी श्रद्धालुओं की तरफ़ से पराशरण ही वकील थे। पराशरण मजाक-मजाक में वकालत को अपनी दूसरी पत्नी बताते हैं। 24 घंटे में 18 घंटे वकालत सम्बन्धी कामकाज और अध्ययन में बिताने वाले पराशरण ने बताया था कि वो अपनी पत्नी से भी ज्यादा समय वकालत को देते हैं। सुप्रीम कोर्ट के जज संजय किशन कॉल ने अपनी पुस्तक में उनके लिए ‘पितामह ऑफ इंडियन बार’ शब्द प्रयोग किया। वकालत के कुछ छात्रों ने मिल कर के पराशरण पर ‘Law and Dharma: A tribute to the Pitamaha of the Indian Bar’ नामक पुस्तक भी लिखी है, जिसमें उनके बारे में लिखा गया है

इस मौके पर जस्टिस संजय किशन कौल कहा कि पराशरण न सिर्फ़ बार बल्कि बेंच के युवा सदस्यों का मार्गदर्शन करने के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति हैं। ‘सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ छत्तीसगढ़’ के कुलपति एनआर माधव मेनन ने पराशरण को तीन गुणों का मिश्रण बताया। उनका मानना है कि पराशरण अध्यात्म के साथ-साथ मानवता और सादगी के प्रोफेशनल प्रतीक हैं। पराशरण कहते हैं कि जीवन में कोई भी फ़ैसला लेने से पहले धर्म के प्रति हमें सचेत रहना चाहिए।

बहुत कम लोगों को पता है कि पराशरण को 2012 में राज्यसभा के लिए नामित किया गया था। वह राज्यसभा सांसद भी रह चुके हैं। उन्हें 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उन्हें 2011 में पद्म विभूषण मिला। शनिवार (नवंबर 9, 2019) को जब सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में फ़ैसला सुना कर वहाँ मंदिर बनाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया, पराशरण को ख़ुशी तो हुई लेकिन उन्हें बोरियत भी महसूस हुई। वह पिछले 8 महीनों से इस काम में इतने लीन हो गए थे कि अब उन्हें समझ ही नहीं आ रहा कि उनका समय कैसे व्यतीत होगा? पराशरण की टीम में जितने भी वकील थे, उनकी ऊर्जा देख कर वो सभी अचम्भे में थे और पिछले कुछ महीने उनके लिए यादगार बन गए। उन्हें काफ़ी कुछ सीखने को मिला।

आपको 16 अक्टूबर की एक बात याद दिलानी ज़रूरी है। जब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई ख़त्म हुई, तब पराशरण कोर्ट के बाहर 15 मिनट तक किसी का इन्तजार करते रहे। वो राजीव धवन का इन्तजार कर रहे थे। वही धवन, जिन्होंने 40 दिन की सुनवाई के दौरान कई बार आपा खोया जबकि पराशरण एकदम शांत और गंभीर बने रहे। पराशरण ने धवन के साथ फोटो खिंचवा कर देश-दुनिया को यह सन्देश दिया कि प्रोफेशनल रूप से भले ही आप एक-दूसरे से लड़ें, लेकिन अंत में शांति और समरसता की ही जीत होनी चाहिए।

इतिहास में जब भी ऐतिहासिक राम मंदिर फ़ैसले की बात होगी, पराशरण के जिक्र ज़रूर आएगा क्योंकि पूरा मामले उनके इर्द-गिर्द घूमा और हिन्दुओं की इस विजय में श्रीराम के इस सेनानी का महान योगदान रहा। हिन्दुओं की भी यही इच्छा है कि पराशरण अपने जीवनकाल में भव्य राम मंदिर निर्माण का गवाह बनें। हम भी उनकी लम्बी उम्र और उत्तम स्वास्थ्य की कामना करते हैं।

देश हिंदू राष्‍ट्र की ओर आगे बढ़ रहा, अब वे काशी और मथुरा पर भी अपना दावा ठोकेंगे: असंतुष्ट ओवैसी

सालों से चले आ रहे अयोध्या विवाद पर देश की सर्वोच्च अदालत ने शनिवार (नवंबर 9, 2019) को अपना फैसला सुना दिया। सभी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान किया और शांति बनाए रखने की अपील की। पीएम मोदी ने भी इसे हार और जीत के रूप में न लेने की बात कही। वहीं ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमिन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने अदालत के फैसले को लेकर अपनी नाखुशी जाहिर की है। उन्होंने कहा कि वो इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि उन्हें खैरात में पाँच एकड़ जमीन नहीं चाहिए।

ओवैसी ने कहा, “मैं फैसले से खुश नहीं हूँ। सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम (सर्वोच्च) जरूर है, लेकिन वह अचूक नहीं है। हमें संविधान पर पूरा भरोसा है। हम अपने अधिकार के लिए लड़ रहे थे। हमें दान के रूप में पाँच एकड़ की जमीन नहीं चाहिए। हमें इस 5 एकड़ भूमि के प्रस्ताव को अस्वीकार करना चाहिए, हमें संरक्षण नहीं चाहिए।”

असदुद्दीन ओवैसी ने कॉन्ग्रेस को निशाने पर लेते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी ने भी आज अपना असली रंग दिखा दिया। कॉन्ग्रेस पार्टी पाखंडी और धोखेबाजों की पार्टी है। उनका कहना है कि अगर 1949 में मूर्तियों को नहीं रखा गया होता और तत्‍कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने ताले नहीं खुलवाए होते तो मस्‍जिद अभी भी होती। वहीं नरसिम्‍हा राव ने अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया होता तो मस्‍जिद अभी भी होती।

उन्होंने कहा कि मस्जिद की जमीन का कोई सौदा नहीं किया जा सकता। ओवैसी ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को इस पर विचार करने के लिए कहा है। उन्होंने कहा कि अगर बाबरी मस्जिद नहीं टूटती तो उच्चतम न्यायालय क्या फैसला लेता? साथ ही उनका यह भी कहना है कि भाजपा चुनावों में इन चीजों का इस्तेमाल करेगी।

ओवैसी ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि जिन लोगों ने बाबरी मस्‍जिद गिराई, उन्‍हीं को कोर्ट ने ट्रस्‍ट बनाने और मंदिर निर्माण का जिम्‍मा सौंप दिया है। इससे साफ लगा रहा है कि यह देश अब हिंदू राष्‍ट्र की ओर आगे बढ़ रहा है। अब वे काशी और मथुरा पर भी अपना दावा ठोकेंगे। ओवैसी ने कहा कि वो अपने निजी घर का सौदा कर सकते हैं, मगर मस्जिद की जमीन का सौदा नहीं कर सकते। हिन्दुस्तान का मुस्लिम इतना गिरा नहीं है कि वो 5 एकड़ की जमीन भीख लेंगे।

बता दें कि कोर्ट ने अपने फैसले में विवादित जमीन रामलला विराजमान को देने का फैसला किया है, जबकि मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही दूसरी जगह 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन रामलला को इसलिए दी, क्योंकि मुस्लिम पक्ष जमीन पर दावा साबित करने में नाकाम रहा। जिसके बाद कोर्ट ने राम मंदिर निर्माण की रूपरेखा तय करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार को दी है। कोर्ट ने केंद्र से तीन महीने के अंदर ट्रस्ट बनाने के लिए कहा है।

जिन सबूतों से बाबरी मस्जिद का दावा कमजोर साबित हुआ उन्हें जुटाने वालों में 53 मुस्लिम थे

अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया है उसका आधार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट भी है। 2003 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्देश पर यहॉं खुदाई थी। हाई कोर्ट के फैसले का भी य​ह रिपोर्ट आधार बनी थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में कहा है कि एएसआई की रिपोर्ट से पता चलता है कि बाबरी मस्जिद के नीचे कोई ढाँचा था। यह ढॉंचा इस्लामिक नहीं था यह भी शीर्ष अदालत ने माना है। हालॉंकि चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई वाली पीठ ने यह भी कहा है कि एएसआई की रिपोर्ट से यह साबित नहीं होता कि मंदिर ध्वस्त कर मस्जिद बनाई गई थी।

यह रिपोर्ट बताती है कि अयोध्या सिर्फ हिंदुओं की मान्यता नहीं है। मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने की बात कोरी आस्था नहीं है। हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट में भी जिन पुरातात्विक सबूतों से बाबरी मस्जिद का दावा कमजोर साबित हुआ, उन्हें जुटाने वालों में 53 मुस्लिम थे। इनमें सबसे प्रमुख नाम केके मुहम्मद का है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के क्षेत्रीय निदेशक रहे केके मुहम्मद मलयालम में लिखी अपनी आत्मकथा ‘जानएन्ना भारतीयन’ में बताते हैं कि 1976-77 में ही इस बात के सबूत मिल चुके थे कि बाबरी मस्जिद असल में मंदिर है। उनकी आत्मकथा हिंदी में ‘मैं भारतीय हूॅं’ नाम से है। वैसे, ब्रिटिश राज में पीटर कारनेगी ने भी लिखा था, “यह बात स्थानीय तौर पर पुष्ट होती है कि मुस्लिमों की विजय के वक्त अयोध्या में तीन महत्वपूर्ण हिंदू मंदिर थे। जन्मस्थान मंदिर, स्वर्गद्वार मंदिर और ठाकुर मंदिर। पहले पर बाबर ने मस्जिद बनवा दी, जिस पर अभी भी उसका नाम खुदा है। दूसरे मंदिर के साथ औरंगजेब ने वैसा ही किया। तीसरे पर भी बाद में मस्जिद बना दी गई। ये सब इस्लाम के उस मशहूर सिद्धांत के आधार पर किया गया, जिसके तहत उन सभी पर धर्म थोप दिया जाता है, जिन्हें जीत लिया गया हो।”

कारनेगी फैजाबाद का पहला ब्रिटिश कमिश्नर था। उसने ही अवध का पहला गजेटियर तैयार किया था। कारनेगी के लिखे से जाहिर है कि बाबरी मस्जिद उसी जगह पर बनाई गई थी, जो जन्मस्थान है। फैजाबाद अदालत के मुलाजिम हफीजुल्ला ने भी 1822 में सरकार को एक रिपोर्ट भेजी थी जिसमें कहा गया था कि राम के जन्मस्थान पर बाबर ने मस्जिद बनवाई थी।

यदि कारनेगी और हफीजुल्ला के दावों को नकार दें तो भी खुदाई से मिले साक्ष्य बार-बार इस सत्य को दुहराते हैं कि बाबरी मस्जिद असल में मंदिर के मलबे पर खड़ा किया गया था। मुहम्मद अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, “हमें विवादित स्थल से 14 स्तंभ मिले थे। सभी स्तंभों में गुंबद खुदे हुए थे। ये 11वीं और 12वीं शताब्दी के मंदिरों में मिलने वाले गुंबद जैसे थे। गुंबद में ऐसे 9 प्रतीक मिले हैं, जो मंदिर में मिलते हैं।”

1976-77 में पुरातात्विक अध्ययन के लिए अयोध्या में प्रो. बीबी लाल की अगुवाई में खुदाई हुई थी। इस टीम में मुहम्मद भी थे। बकौल मोहम्मद, “खुदाई के लिए जब हम वहॉं पहुॅंचे तो मस्जिद की दीवारों में मंदिर के खंभे साफ-साफ दिखाई देते थे। मंदिर के उन स्तंभों का निर्माण ‘ब्लैक बसाल्ट’ पत्थरों से किया गया था। स्तंभ के नीचे भाग में 11वीं और 12वीं सदी के मंदिरों में दिखने वाले पूर्ण कलश बनाए गए थे। मंदिर कला में पूर्ण कलश 8 ऐश्वर्य चिन्हों में एक माने जाते हैं।”

एक इंटरव्यू में मोहम्मद ने बताया था कि उस समय इन साक्ष्यों पर उतनी बात नहीं हुई। जब अयोध्या का विवाद गहराया तो उस उत्खनन की रिपोर्ट को लेकर संदेह जताए गए। इसके बाद हाई कोर्ट के आदेश पर एएसआई ने 12 मार्च 2003 से 7 अगस्त 2003 के बीच राम जन्मभूमि परिसर की खुदाई की। खुदाई में कुल 137 मजदूर लगाए गए थे, जिनमें से 52 मुस्लिम थे।

खुदाई के बाद एएसआई ने 22 सितंबर 2003 को अपनी 574 पन्नों की रिपोर्ट हाई कोर्ट को सौंपी। इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर हाई कोर्ट के तीन जजों ने माना कि विवादित स्थल का केंद्रीय स्थल रामजन्मभूमि ही है। खास बात यह रही कि तीनों जज गर्भगृह के सवाल पर एकमत थे। अब सुप्रीम कोर्ट की पॉंच सदस्यीय पीठ के भी फैसले से इस पर मुहर लग गई है।

हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ और ‘अयोध्या का चश्मदीद’ में 2003 में हुई खुदाई का विस्तार से ब्यौरा दिया है। वे लिखते हैं, “एएसआई ने कुल 90 खाइयाँ खोदीं। पूरे क्षेत्र को पॉंच हिस्सों में बॉंटा। इनमें पूर्वी, दक्षिणी, पश्चिमी, उत्तरी क्षेत्र और उभरा हुआ प्लेटफॉर्म शामिल था। सभी क्षेत्रों में क्रमवार खुदाई हुई, जिससे ढॉंचों की प्रकृति और उसकी सांस्कृतिकता का अंदाजा लगे। जो अवशेष मिले, उससे साबित होता था कि वहाँ 11वीं शताब्दी का हिंदू मंदिर था।”

खुदाई के दौरान निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर सवाल नहीं उठे, इसके भी बकायदा इंतजाम किए गए थे। हेमंत शर्मा ने इसका ब्यौरा देते हुए लिखा है, “समूची खुदाई और ढॉंचों के अभिलेखीकरण की पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की गई। खुदाई न्यायिक पर्यवेक्षकों, वकीलों और संबंधित पक्षों या उनके नामित व्यक्तियों की मौजूदगी में संपन्न हुई। खुदाई में पारदर्शिता हो, इस खातिर सारी उत्खनित सामग्री दोनों पक्षों की मौजूदगी में ही सील की जाती थी। इसे उसी दिन फैजाबाद के कमिश्नर की ओर से उपलब्ध कराए गए स्ट्रांग रूम में रखा जाता था। हर रोज इस स्ट्रांग रूम को बंद करने के बाद सील किया जाता था।”

एएसआई की रिपोर्ट में खुदाई के दौरान पाए गए अभिलेखों के तीन हिस्सों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी भी है। इनमें एक नागरी में और दो अरबी में पाए गए थे। अरबी अभिलेख में एक 16वीं शताब्दी की नस्ख शैली में था। इसमें कुरान की एक आयत खुदी थी। दूसरा अरबी अभिलेख भी 16वीं शताब्दी के शुरुआत की शैली में था। इसमें अल्लाह शब्द खुदा था। एएसआई के मुताबिक नागरी का पॉंच वर्णों वाला अभिलेख 11वीं शताब्दी का था। मुहम्मद बताते हैं कि विवादित ढॉंचा विध्वंस के बाद मलबे से ‘विष्णु हरिशिला पटल’ मिला था। इसमें 11वीं और 12वीं सदी की नागरी लिपि में संस्कृत भाषा में लिखा गया है, “यह मंदिर बाली और दस हाथों वाले (रावण) को मारने वाले विष्णु (श्रीराम विष्णु के अवतार माने जाते हैं) को समर्पित किया जाता है।”

दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट के अनुसार, एएसआई की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि विवादित ढॉंचे के ठीक नीचे एक बड़ी संरचना मिली है। जो अवशेष मिले हैं वह ढॉंचे के नीचे उत्तर भारत के मंदिर होने का संकेत देते हैं। यही नहीं 10वीं शताब्दी के पहले उत्तर वैदिक काल तक की मूर्तियाँ और अन्य वस्तुओं के खंडित अवशेष मिले हैं। इनमें शुंग काल की चूना पत्थर की दीवार और कुषाण काल की बढ़ी संरचना शामिल है।

एएसआई रिपोर्ट में कहा गया है कि विवादित ढांचे के नीचे मिली विशाल संरचना में नक्काशीदार ईंटें, देवताओं की युगल खंडित मूर्तियाँ, नक्काशीदार वास्तुशिल्प, पत्तों के गुच्छे, अमालका, कपोतपाली, दरवाजों के हिस्से, कमल की आकृति जैसी चीजें मिली हैं। विवादित मस्जिद के ठीक नीचे मिले इमारत का आकार 50 गुना 30 मीटर उत्तर-दक्षिण और पूरब-पश्चिम था। इसके 50 खम्भों के आधार मिले हैं। इसके केंद्र बिंदु के ठीक ऊपर विवादित मस्जिद के बीच का गुंबद है, जहाँ अस्थायी मंदिर में भगवान राम की मूर्तियॉं रखी होने की वजह से खुदाई नहीं हो सकी।

तीन अभिलेख। दो अरबी में और एक नागरी में। अरबी के दोनों अभिलेख 16वीं शताब्दी के। पॉंच वर्णों का नागरी अभिलेख 11वीं शताब्दी का। 16वीं शताब्दी के बाद का इतिहास तो आपको वामपंथी इतिहासकारों ने खूब पढ़ाया है। और ये भी कि मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद नहीं बनाई गई थी!

पुरातत्व की इसी ताकत को देख अमेरिकी पुरातत्वविद सारा पर्कक ने कहा है;

पुरातत्व उन सारी बातों को समझने की कुॅंजी है कि हम कौन हैं और कहॉं से आते हैं।

राम जन्मभूमि पर अस्पताल बनाने की सलाह देने वाले ‘लिबरल्स’ को सुब्रमण्यम स्वामी ने दिया था ये मजेदार जवाब

अयोध्या विवाद मामले पर आज सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की पीठ ने विवादित ज़मीन पर रामलला के हक़ में फ़ैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को राम मंदिर बनाने के लिए तीन महीने में ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया है। साथ ही मुस्लिम पक्ष को नई मस्जिद के निर्माण के लिए अलग से पाँच एकड़ ज़मीन देने का निर्देश भी दिया है।

दरअसल, लिबरल गैंग अब तक यह रवैया अपनाता आया है कि राम जन्मभूमि पर अस्पताल, स्कूल या सार्वजनिक उपयोग के लिए किसी अन्य संरचना का निर्माण होना चाहिए। उनके इस रवैये ने दोनों समुदायों के लोगों की भावनाओं को आहत करने के काम किया था, बावजूद इसके वो कभी भी अपने इस रुख़ से नहीं डिगे। 2017 में, भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने लिबरल्स के इस रवैये पर बेहद तीखी प्रतिक्रिया दर्ज की थी। उस समय स्वामी ने सुझाव दिया था कि मंदिर की देख-रेख के लिए पवित्र सरयू नदी के विपरीत किनारे पर एक मनोरोग उपचार सुविधा केंद्र का निर्माण किया जाना चाहिए।

अयोध्या विवाद मामले पर आए फ़ैसले के बाद सोशल मीडिया पर यह ट्वीट फिर से वायरल हो रहा है। सुब्रमण्यम स्वामी, भाजपा के सभी नेताओं की तरह, अयोध्या में एक भव्य राम मंदिर बनाने के मुखर प्रस्तावक रहे हैं। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर वो अपनी सीधी-सादी टिप्पणियों के लिए भी जाने जाते हैं।

इससे पहले, उन्होंने सुझाव दिया था कि सीताराम येचुरी को रामायण पर दुर्भावनापूर्ण टिप्पणी करने से पहले अपना नाम (सीताराम) बदल लेना चाहिए

‘पवणु गुरु, पाणी पिता, माता धरति महतु’, करतारपुर के कण-कण में गुरू नानक देव की स्मृति: PM मोदी

सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव की 550वीं जयंती के अवसर पर शनिवार (नवंबर 9, 2019) से करतारपुर कॉरिडोर श्रद्धालुओं के लिए खोला गया। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका उद्धघाटन किया और 500 से अधिक भारतीय तीर्थयात्रियों के पहले जत्थे को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। उन्होंने कहा कि करतारपुर बॉर्डर का खुलना भारतीयों के लिए दोहरी खुशी की बात है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार (नवंबर 9, 2019) को पंजाब के सुल्तानपुर लोधी पहुँचे। यहाँ उन्होंने बेर साहिब गुरुद्वारे में माथा टेका। इसके बाद सिखों के पाकिस्तान स्थित तीर्थ स्थल गुरुद्वारा दरबार साहिब और भारत स्थित डेरा बाबा नानक साहिब को जोड़ने वाले करतारपुर कॉरिडोर का उद्घाटन किया। पीएम मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने अपनी-अपनी सीमाओं में इस कॉरिडोर का उद्घाटन किया।

पीएम मोदी ने उद्घाटन से पहले देश को संबोधित किया। उन्होंने सिख भाई-बहनों को बधाई देते हुए कहा कि देश को करतारपुर कॉरिडोर सौंपना सौभाग्य की बात है। उन्होंने पाकिस्तान के पीएम इमरान खान और पाक के मजदूरों का भी शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा करतारपुर के कण-कण में गुरू नानक की स्मृति है। गुरू नानक देव मानवता के लिए मिसाल हैं। पीएम मोदी ने कहा, “करतारपुर में ही उन्होंने प्रकृति के गुणों का गायन किया था। उन्होंने कहा था- “पवणु गुरु, पाणी पिता, माता धरति महतु”!!! यानि हवा को गुरु मानो, पानी को पिता और धरती को माता के बराबर महत्व दो।”

पीएम मोदी ने कहा कि गुरुनानक देवजी ने सीख दी है कि सच्चाई और ईमानदारी से किए गए विकास से हमेशा तरक्की और समृद्धि के रास्ते खुलते हैं। गुरुनानक देवजी ने सीख दी है कि धन तो आता-जाता रहेगा पर सच्चे मूल्य हमेशा रहते हैं। उन्होंने कहा, “करतारपुर से मिली गुरुवाणी की ऊर्जा, सिर्फ हमारे सिख भाई-बहनों को ही नहीं बल्कि हर भारतवासी को अपना आशीर्वाद देगी।” उन्होंने कहा कि करतारपुर केवल गुरुनानक देवजी की कर्मभूमि नहीं है, बल्कि करतापुर के कण-कण में गुरुनानक देवजी के पसीने की महक मिली हुई है। उसकी वायु में उनकी वाणी घुली हुई है।

बता दें कि करतारपुर कॉरिडोर भारत के पंजाब में डेरा बाबा नानक गुरुद्वारे को करतारपुर स्थित दरबार साहिब से जोड़ेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने इस अवसर पर यात्री टर्मिनल भवन का भी उद्घाटन किया। जिसे एकीकृत जाँच चौकी (आईसीपी) भी कहा जाएगा। तीर्थयात्री 4.5 किलोमीटर लंबे नवनिर्मित कॉरिडोर से जाने के लिए यहीं से मंजूरी प्राप्त करेंगे। आईसीपी की जाँच चौकी के उद्घाटन से भारतीय तीर्थयात्रियों को करतारपुर साहिब जाने में सुविधा होगी।

उल्लेखनीय है कि भारत ने 24 अक्तूबर को डेरा बाबा नानक में अंतरराष्ट्रीय सीमा के ‘जीरो प्वाइंट’ पर गलियारे के परिचालन के तौर-तरीकों पर 24 अक्टूबर को पाकिस्तान के साथ करार किया था। भारत और पाकिस्तान के बीच हुए करार के मुताबिक रोजाना करीब पाँच हजार श्रद्धालु गलियारे से होकर इस गुरुद्वारे तक मत्था टेकने जाएँगे। इस करार को लेकर सिख श्रद्धालु बेहद उत्साहित हैं।

मंदिर वहीं बनेगा: CJI गोगोई पर उमड़ा रामभक्तों का प्यार, बताया ‘आज का हनुमान’

अयोध्या मामले का ऐतिहासिक पटाक्षेप होने के साथ प्रत्याशित “जय श्री राम” और “जय हनुमान” के साथ एक और जय-जयकार ऐसी होने लगी जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी। यह है भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की जय-जयकार।

सीजेआई गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने ही रामजन्मभूमि के पक्ष में फैसला सुनाया है। फैसले में पीठ ने विवादित स्थल हिन्दुओं को सिपुर्द करते हुए उसे रामजन्मभूमि के रूप में स्वीकार किया है। इस फैसले के बाद से गोगोई रामभक्तों की आँखों के तारे बन गए हैं। कोई उन्हें प्रणाम करने के लिए उनका घर ढूँढ़ रहा है तो कोई उन पर ईश्वर की कृपा बने रहने की कामना कर रहा है।

एक यूज़र ने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की निजी ट्विटर प्रोफाइल पर जाकर वहाँ ही “सीजेआई की जय” के नारे लगाए हैं।

ट्विटर पर कुछ लोग सीजेआई गोगोई को ‘आज के समय का हनुमान’ भी बता रहे हैं।

इससे पहले 1 फरवरी 1986 को जब फैजाबाद की अदालत ने इमारत का ताला खोलने का आदेश दिया तो उसके पीछे भी किसी काले बंदर की प्रेरणा सामने आई थी। फैसला देने वाले जज कृष्णमोहन पांडेय ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, “जिस रोज मैं ताला खोलने का आदेश लिख रहा था, मेरी अदालत की छत पर एक काला बंदर पूरे दिन फ्लैग पोस्ट को पकड़कर बैठा रहा। जो फैसला सुनने अदालत में आए थे, उस बंदर को फल और मूॅंगफली देते रहे पर बंदर ने कुछ नहीं खाया। चुपचाप बैठा रहा। फैसले के बाद जब मैं घर पहुॅंचा तो उस बंदर को अपने बरामदे में बैठा पाया। मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने उसे प्रणाम किया। वह कोई दैवीय ताकत थी।”

रामभक्ति हो या रहीमभक्ति, ये समय हम सभी के लिए भारतभक्ति की भावना को सशक्त करने का है: PM मोदी

अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने इस फैसले में विवादित जमीन रामजन्मभूमि न्यास को देने का फैसला किया है। यानी विवादित जमीन राम मंदिर के लिए दे दी गई है, जबकि मुस्लिम पक्ष को अलग स्थान पर जगह देने के लिए कहा गया है। कोर्ट ने अयोध्या में ही मस्जिद बनाने के लिए अलग से 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया है। राम मंदिर निर्माण के लिए कोर्ट ने केंद्र सरकार को तीन महीने के अंदर ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पाँच जजों की बेंच ने यह फैसला सर्वसम्मति से दिया है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद प्रधानमंत्री ने कहा, “देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या पर अपना फैसला सुना दिया है। इस फैसले को किसी की हार या जीत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। रामभक्ति हो या रहीमभक्ति, ये समय हम सभी के लिए भारतभक्ति की भावना को सशक्त करने का है। देशवासियों से मेरी अपील है कि शांति, सद्भाव और एकता बनाए रखें।”

इसके साथ ही उन्होंने एक अन्य ट्वीट में कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कई वजहों से महत्वपूर्ण है: यह बताता है कि किसी विवाद को सुलझाने में कानूनी प्रक्रिया का पालन कितना अहम है। हर पक्ष को अपनी-अपनी दलील रखने के लिए पर्याप्त समय और अवसर दिया गया। न्याय के मंदिर ने दशकों पुराने मामले का सौहार्द्रपूर्ण तरीके से समाधान कर दिया।

पीएम ने कहा कि यह फैसला न्यायिक प्रक्रियाओं में जन सामान्य के विश्वास को और मजबूत करेगा। हमारे देश की हजारों साल पुरानी भाईचारे की भावना के अनुरूप हम 130 करोड़ भारतीयों को शांति और संयम का परिचय देना है। भारत के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की अंतर्निहित भावना का परिचय देना है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, “श्री राम जन्मभूमि कानूनी विवाद के लिए प्रयासरत सभी संस्थाएँ, पूरे देश का संत समाज और अनगिनत अज्ञात लोगों जिन्होंने इतने वर्षों तक इसके प्रयास किया मैं उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ।”

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, “माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत है, देश की एकता व सद्भाव बनाए रखने में सभी सहयोग करें। उत्तर प्रदेश में शांति, सुरक्षा और सद्भाव का वातावरण बनाए रखने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध है।”

राजनाथ सिंह ने इसे ऐतिहासिक फैसला बताया और साथ ही उन्होंने शांति और सैहार्द्र बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि इस फैसले को सहज रूप से सभी को स्वीकार करना चाहिए। इससे सर्वधर्म सद्भाव की भावना भी और मजबूत होगी और साथ ही साथ उन्होंने विश्वास जताया कि इससे सामाजिक ताना-बाना को भी मजबूती मिलेगी।

वहीं केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी कहा कि सभी को सुप्रीम के फैसले को मानना चाहिए और शांति बनाए रखना चाहिए। 

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सभी को स्वागत करना चाहिए। यह सामाजिक समरसता के लिए फायदेमंद होगा। इस मुद्दे पर कोई और विवाद नहीं होना चाहिए, यही मेरी लोगों से अपील है।”

बाबरी मस्जिद के मुस्लिम पक्षकार इकबाल अंसारी ने भी फैसले के सम्मान की बात कही है। वहीं निर्मोही अखाड़ा के प्रवक्ता कार्तिक चोपड़ा ने कहा, “निर्मोही अखाड़ा आभारी है कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले 150 वर्षों की हमारी लड़ाई को मान्यता दी है और राम जन्मस्थान मंदिर के निर्माण और प्रबंधन के लिए केंद्र सरकार द्वारा स्थापित किए जाने वाले ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़ा को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया है।”

लिबरलों को मिली ‘रूदन कक्ष’ हेतु 5 वर्गफीट जमीन, रवीश को पेपर रोल, राठी-कामरा के लिए ChiRAnDh योजना

राममंदिर पर फैसला आ गया। मेरी निजी राय में कम से कम 50 साल और लगते तो सही रहता। आप कहेंगे कि अजीत जी आप पगला गए हैं। वो तो ठीक है कि मैं पगला गया हूँ, लेकिन भारत के सेकुलर तंत्र का क्या? ‘हम भारत के सेकुलर लोग’ का क्या जिसे संविधान के 382वें संशोधन में जोड़ा जाएगा? ‘इंडिया दैट इज भारत’ का क्या जिसे संविधान में ‘हिन्दुस्तान’ नहीं लिखा गया है?

बात समझिए कि सबको ‘ले’ कर चलना होता है। कोर्ट और सरकारें कई बार ऐसा कर चुकी हैं। अतः, पचास साल बाद अगर एक सरकार होती जहाँ ‘स्कोडा लहसुन तहजीब’ का लहसुन वाला हिस्सा प्रबल होता, उनके बुद्धिजीवी (जो हमेशा हिन्दू आतंक से शांति चाहते हैं) बड़ी संस्थाओं में बैठे होते, तब जा कर एक सेकुलर फैसला आता जो इतिहास में सबको स्वीकार्य होता।

अभी तो ज़फ़रयाब गिलानी कह रहे हैं कि मस्जिद अल्लाताला की संपत्ति है, और शरीयत यह कहता है मस्जिद किसी को दी नहीं जा सकती। इस बात पर गिलानी जी ने कुछ खास नहीं बोला कि शरीयत उनके मजहब वालों को आतंकवादी बन कर किसी दूसरे की जमीन पर मस्जिद बनाने से रोकता है या उसको बढ़ावा देता है। क्योंकि ज़फ़रयाब टाइप के लोगों का तर्क यही है कि धरती तो 1528 से शुरु हुई है जब मीर बाक़ी ने मस्जिद बनाई।

जो भी हो, मैं इस फैसले से, एक खाँटी सेकुलर व्यक्ति के तौर पर, बहुत ठगा हुआ महसूस कर रहा हूँ। सुप्रीम कोर्ट ने ‘द वायर’ जैसी मीडिया संस्थाओं द्वारा दिए गए तर्कों की पूरी तरह से अनदेखी कर दी है कि तुलसीकृत मानस में तो कहीं लिखा ही नहीं है कि अयोध्या एक तीर्थस्थल है। सही बात है क्योंकि ‘वायर’ के निकम्मे पत्रकारों को यह कहाँ से पता होगा कि मानस लिखी भले ही चार सौ साल पहले गई है, लेकिन उसका कथानक बाल्मीकि रामायण के समय का है। ‘वायर’ के हिसाब से राम के काल में ही उनके दर्शन को मॉरीशस से हिन्दू जाया करते थे, ऐसा कहीं नहीं लिखा है। ख़ैर मनाइए कि ‘वायर’ ने ये नहीं कहा कि आसमान से प्रकट हुई ‘क़ुरान’ में भी राम का जिक्र नहीं है, तो हिन्दू झूठ बोल रहे हैं।

कोर्ट की मुख्य बातें जो आपको कहीं नहीं मिलेंगी

शायद ध्यान हो कि भारत की आबादी का एक बहुत छोटा हिस्सा हमेशा से विवादित जगह पर ‘स्कूल, कॉलेज या अस्पताल’ बनवाने की बातें करता था। सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की बैंच के सातवें जज ने अपने अलग फैसले में लिखा कि चूँकि ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है, तो उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा देते हुए, उनकी माँगों पर भी कोर्ट ने विचार किया है। इसी के मद्देनज़र, पाँच जजों के फैसले के बाद, उनके विलाप हेतु, हिन्दुओं से दुराग्रह के साथ कुल पाँच वर्गफीट जमीन ‘रूदन कक्ष’ हेतु देने की बात कही गई है।

सातवें जज ने यह भी कहा कि उस कमरे में एक साथ दो-दो लिबरल ही जा सकते हैं। एक रोए तो दूसरा उसकी पीठ पर हाथ फेरे। लेकिन ऐसे कमरे में तरूण तेजपाल टाइप के लोगों को अकेले ही जाने कहा गया है। साथ ही, जज साहब ने बताया कि केन्द्र सरकार यह तय करेगी कि कमरे का डिजाइन कैसा होगा ताकि लिबरलों के विलाप में कमी न आए। गुप्त सूत्रों ने बताया है कि वहाँ मोदी, शाह और योगी जी की तस्वीरें, कम ऊर्जा का उपयोग करने वाली एलईडी टीवी पर, वालपेपर के तौर पर मोंटाज में चलती रहेंगी।

लिबरल ग्रुप की सहअध्यक्षा सागरिका ने कहा है कि वो इस फैसले की कॉपी पर गौर कर रही हैं, कोई आकर जब बताएगा कि उसमें लिखा क्या है, और इस पर उन्हें क्या नहीं बोलना चाहिए तब ही वो इस पर राय दे पाएँगी। गौरतलब है कि सागरिका जी ने आँखों पर वेल्डिंग करते वक्त पहने जाने वाला चश्मा लगाए हुआ था।

मोदी दो दशमलव शून्य के बाद बेरोजगारी की राह पर चल रहे ध्रुव राठी, कुणाल कमरा जैसे टुटपुँजिया लौंडों को लिए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को नई नीति बनाने का सुझाव दिया है। पाँच जजों की बेंच के छठे जज ने फैसला ट्वीट करते हुए कहा कि मोदी सरकार के दोबारा आने से पहले ही बेरोजगारी दर बढ़ गई है, और अयोध्या पर आए फैसले से कामरा-राठी टाइप के लौंडों के स्थान विशेष में दर्द उठेगा। दर्द उठने को ले कर जज साहब ने आगे कहा कि ये लोग आयुष्मान योजना का लाभ ले कर फ्री में इलाज कराएँगे जिससे अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा।

अतः, सरकार से अपील करते हुए जज साहब ने कहा, “कुछ दे दीजिए बेचारों को… मन लगा रहेगा इनका भी। कोई चिरकुट रोजगार एवम् नल्लारोधी धमाका (ChiRAnDh) योजना बना दीजिए ताकि इनका यूट्यूब चलता रहे।” अमित शाह जी ने इस बात पर कहा है कि ‘संबद्ध मंत्रालय’ इस पर स्वतः कार्य करेगा, और हर बात के लिए उनके पास आने की जरूरत नहीं है।

इसके साथ ही तीसरे तरह के गिरोह को भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में बोल्ड अक्षरों में जगह दी है। यह गिरोह मीडिया के अजेंडाबाजों के लिए है जिन्होंने हमेशा यह दुहाई दी है कि हिन्दू समाज मजहब विशेष में डर पैदा कर रहा है। ‘डर का माहौल’ की प्रसूता रवीश कुमार जी के लिए सुप्रीम कोर्ट की पतली बेंच के सबसे अंत में बैठे जज ने कहा है कि रवीश कुमार को भारत सरकार तीन किलोमीटर लम्बी पोस्ट लिखने के लिए कागज का एक ‘रोल’ दे क्योंकि फेसबुक पर, इंडियन एक्सप्रेस के लेख के अनुसार, SC, हिन्दू OBC और हिन्दू सवर्णों से आर्थिक और शैक्षणिक रूप से कहीं बहुत पिछड़े मजहब विशेष वाले नहीं हैं, जो उन्हें पढ़ते हों।

साथ ही, कोर्ट ने नोट किया कि जो मजहबी नाम वाले लोग फेसबुक पर हैं भी, उनमें से अधिकतर मनोहर पर्रिकर से ले कर सुषमा स्वराज आदि की मृत्यु और उरी, पुलवामा जैसे नृशंस हमलों पर ‘हा-हा’ करते नजर आते हैं। कोर्ट के अनुसार ऐसे लोग फेसबुक पर और कुछ करते नहीं, तो रवीश जी किलोमीटर लम्बी अजेंडाबाजी कहाँ से पढ़ पाएँगे। अतः, सरकार को निर्देश देते हुए जज साहब ने कहा कि उन्हें हर दिन बाथरूम में ही रोल पहुँचा दिया जाए, ताकि वो अपनी अजेंडाबाजी विष्ठा डिजिटल से भौतिक रूप में भी फैला सकें।

इसके बाद फैसले में एक बात जो ध्यान देने योग्य थी वो यह है कि बिग बीसी, स्क्रॉल, क्विंट, एनडीटीवी, वायर जैसे मीडिया संस्थानों को कोर्ट ने कहा है कि अगर उन्हें दर्द हो रहा है तो वो एकाध दिन की छुट्टी ले सकते हैं। इस पर राजदीप सरदेसाई ने जज साहब से ट्वीट के जरिए पूछा है कि क्या सरकार प्रेस क्लब में पूरे दो दिन हैप्पी आवर्स का प्रावधान रखवा सकती है? जज ने कहा कि वो मोदी जी से बात करें। इस पर राजदीप ने कहा कि उनका न्याय व्यवस्था से विश्वास उठ चुका है।

साथ ही ध्रुवीकरण की राजनीति करने वाले ओवैसी जैसे नेताओं के लिए जज साहब ने कहा कि उन्हें भी पाँच एकड़ जमीन मुहैया कराई जाए ताकि वो वहाँ एक रैली करें, और भीड़ को संबोधित करते हुए, रोज सुबह-शाम, ‘भारत माता की जय’, ‘वंदे मातरम्’ आदि का नारा लगवाएँ ताकि उन लोगों का मुँह बंद हो जाए जो कहते हैं कि भारत का ‘शांतिप्रिय’ राष्ट्र से प्रेम नहीं करता। साथ ही, उनसे यह भी आदरपूर्वक आग्रह किया गया है कि वो धार्मिक सद्भाव के लिए एक मिसाल पेश कर सकते हैं अगर वो ‘भारत माता की जय’ आदि के साथ-साथ ‘जय श्री राम’ का नारा भी लगाएँ। इससे हिन्दुओं को अच्छा महसूस होगा और शांति व्यवस्था बनी रहेगी। ओवैसी या उसके पंद्रह मिनटी भाई ने इस पर कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी है, मुँह घुमा कर चले गए।

गंजे लौंडे प्रतीक द्वारा संचालित ऑल्ट न्यूज और पंक्चर का व्यवसाय करने वाले जुबैर नामक व्यक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कुछ खास नहीं कहा। इस पर परमसम्माननीय श्री अजीत भारती जी ने जज साहब को पर्सनली कहा है कि फेक न्यूज फैला कर, इंटरनेट पर चलते चुटकुलों और मीमों की फैक्टचेकिंग करने वाले इन लम्पटद्वय के लिए कुछ तो किया ही जाना चाहिए। इस पर जज साहब ने कहा कि श्री भारती एक ट्वीट लिख कर लोगों से अपील कर दें कि इस गंजे को कोई पैसे न दे। इससे गंजे और पंक्चर वाले का जुबैर का बहुत फायदा भी हो जाएगा और कोर्ट पर यह आरोप भी नहीं लगेगा कि कोर्ट अब ऐसे टुच्चे लोगों के लिए भी विशेष प्रावधान करने लगी है।

कोर्ट की जजमेंट 1000 पन्नों से ऊपर है, और मैं लिखते वक्त भी उसे पढ़ ही रहा हूँ, अतः, आगे कुछ और भी आएगा तो बताता रहूँगा।

मस्जिद अल्लाताला की होती है, शरीयत में मस्जिद हटा नहीं सकते कहीं से: सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के निराश वकील

राम मंदिर मामले में सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 सदस्यीय पीठ ने बहुप्रतीक्षित फ़ैसला सुना दिया है। पूरी ज़मीन हिन्दुओं को दी गई है। मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या में ही कहीं और 5 एकड़ ज़मीन दी जाएगी। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पक्ष विवादित ज़मीन पर अपना दावा साबित नहीं कर सका। अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार एक ट्रस्ट बना कर 3 महीने के भीतर राम मंदिर निर्माण के लिए योजना तैयार करे। फ़ैसले से जहाँ पूरे देश में ख़ुशी की लहर है, मुस्लिम पक्षकारों ने निराशा जताई है।

सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने कहा है कि वो फ़ैसले का सम्मान तो करते हैं, लेकिन संतुष्ट नहीं हैं। बोर्ड के वकील ज़फ़रयाब जिलानी ने कहा कि आगे क्या क़दम उठाना है, इस सम्बन्ध में बोर्ड विचार करेगा। साथ ही उन्होंने कहीं भी फ़ैसले को लेकर किसी तरह का प्रदर्शन न करने की अपील की। उन्होंने पुनर्विचार याचिका दायर करने की बात करते हुए कहा कि समिति की बैठक के दौरान इस बारे में निर्णय लिया जाएगा। जिलानी ने कहा कि ये उनका अधिकार है और नियमानुकूल भी है। उन्होंने दावा किया कि जिन दस्तावेजों के आधार पर हिन्दुओं की आस्था और विश्वास की पुष्टि की गई, उसी दस्तावेज के आधार पर वहाँ मस्जिद होने की बात भी पता चलती है।

मुस्लिम पक्ष ने कहा कि उन्हें विवादित ज़मीन के बाहरी हिस्से को लेकर कोई शिकायत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इनर कोर्ट यार्ड में मुस्लिमों के स्वामित्व का 1857 के पहले का कोई साक्ष्य नहीं है। जिलानी ने दावा किया कि जिन भी सबूतों का जिक्र किया, वो सभी वहाँ मस्जिद की पुष्टि करती हैं। जिलानी ने कहा कि अगर वहाँ मस्जिद है तो नमाज होती ही होगी। जिलानी ने कहा कि उनकी समझ में ये इन्साफ नहीं है। उन्होंने कहा कि मस्जिद की जगह कुछ नहीं हो सकता है। 5 एकड़ दिए जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि इसमें ज़मीन के क्षेत्रफल की कोई बात ही नहीं है।

सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी ने शरीयत क़ानून का जिक्र करते हुए कहा कि मस्जिद किसी को नहीं दिया जा सकता है। जिलानी ने दावा किया कि हिन्दू पक्ष की दलील यह थी कि विक्रमादित्य के जमाने का मंदिर तोड़ा गया, जो इसे ईसापूर्व के आसपास वाले समय में ले जाता है। जिलानी ने कहा कि मस्जिद की कोई क़ीमत नहीं होती और मस्जिद की मिलकियत अल्लाहताला के पास होती है। उन्होंने कहा कि इसे न तो बेचा जा सकता है और न ही अदला-बदली की जा सकती है, इसके लिए 5 करोड़ या 500 करोड़ रुपए ही क्यों न मिले।

ज़फ़रयाब जिलानी के बयान से साफ़ है कि मुस्लिम पक्ष पुनर्विचार याचिका दायर करने के पक्ष में है और वो इस सम्बन्ध में क़दम बढ़ाएँगे। फिलहाल उन्होंने पूरा जजमेंट पढ़ने के बाद ही आगे का एक्शन लेने की बात कही है। उनके बयान से साफ़ है कि वो फ़ैसले से निराश हैं।