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राम जन्मभूमि पर अस्पताल बनाने की सलाह देने वाले ‘लिबरल्स’ को सुब्रमण्यम स्वामी ने दिया था ये मजेदार जवाब

अयोध्या विवाद मामले पर आज सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की पीठ ने विवादित ज़मीन पर रामलला के हक़ में फ़ैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को राम मंदिर बनाने के लिए तीन महीने में ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया है। साथ ही मुस्लिम पक्ष को नई मस्जिद के निर्माण के लिए अलग से पाँच एकड़ ज़मीन देने का निर्देश भी दिया है।

दरअसल, लिबरल गैंग अब तक यह रवैया अपनाता आया है कि राम जन्मभूमि पर अस्पताल, स्कूल या सार्वजनिक उपयोग के लिए किसी अन्य संरचना का निर्माण होना चाहिए। उनके इस रवैये ने दोनों समुदायों के लोगों की भावनाओं को आहत करने के काम किया था, बावजूद इसके वो कभी भी अपने इस रुख़ से नहीं डिगे। 2017 में, भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने लिबरल्स के इस रवैये पर बेहद तीखी प्रतिक्रिया दर्ज की थी। उस समय स्वामी ने सुझाव दिया था कि मंदिर की देख-रेख के लिए पवित्र सरयू नदी के विपरीत किनारे पर एक मनोरोग उपचार सुविधा केंद्र का निर्माण किया जाना चाहिए।

अयोध्या विवाद मामले पर आए फ़ैसले के बाद सोशल मीडिया पर यह ट्वीट फिर से वायरल हो रहा है। सुब्रमण्यम स्वामी, भाजपा के सभी नेताओं की तरह, अयोध्या में एक भव्य राम मंदिर बनाने के मुखर प्रस्तावक रहे हैं। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर वो अपनी सीधी-सादी टिप्पणियों के लिए भी जाने जाते हैं।

इससे पहले, उन्होंने सुझाव दिया था कि सीताराम येचुरी को रामायण पर दुर्भावनापूर्ण टिप्पणी करने से पहले अपना नाम (सीताराम) बदल लेना चाहिए।

‘पवणु गुरु, पाणी पिता, माता धरति महतु’, करतारपुर के कण-कण में गुरू नानक देव की स्मृति: PM मोदी

सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव की 550वीं जयंती के अवसर पर शनिवार (नवंबर 9, 2019) से करतारपुर कॉरिडोर श्रद्धालुओं के लिए खोला गया। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका उद्धघाटन किया और 500 से अधिक भारतीय तीर्थयात्रियों के पहले जत्थे को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। उन्होंने कहा कि करतारपुर बॉर्डर का खुलना भारतीयों के लिए दोहरी खुशी की बात है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार (नवंबर 9, 2019) को पंजाब के सुल्तानपुर लोधी पहुँचे। यहाँ उन्होंने बेर साहिब गुरुद्वारे में माथा टेका। इसके बाद सिखों के पाकिस्तान स्थित तीर्थ स्थल गुरुद्वारा दरबार साहिब और भारत स्थित डेरा बाबा नानक साहिब को जोड़ने वाले करतारपुर कॉरिडोर का उद्घाटन किया। पीएम मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने अपनी-अपनी सीमाओं में इस कॉरिडोर का उद्घाटन किया।

पीएम मोदी ने उद्घाटन से पहले देश को संबोधित किया। उन्होंने सिख भाई-बहनों को बधाई देते हुए कहा कि देश को करतारपुर कॉरिडोर सौंपना सौभाग्य की बात है। उन्होंने पाकिस्तान के पीएम इमरान खान और पाक के मजदूरों का भी शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा करतारपुर के कण-कण में गुरू नानक की स्मृति है। गुरू नानक देव मानवता के लिए मिसाल हैं। पीएम मोदी ने कहा, “करतारपुर में ही उन्होंने प्रकृति के गुणों का गायन किया था। उन्होंने कहा था- “पवणु गुरु, पाणी पिता, माता धरति महतु”!!! यानि हवा को गुरु मानो, पानी को पिता और धरती को माता के बराबर महत्व दो।”

पीएम मोदी ने कहा कि गुरुनानक देवजी ने सीख दी है कि सच्चाई और ईमानदारी से किए गए विकास से हमेशा तरक्की और समृद्धि के रास्ते खुलते हैं। गुरुनानक देवजी ने सीख दी है कि धन तो आता-जाता रहेगा पर सच्चे मूल्य हमेशा रहते हैं। उन्होंने कहा, “करतारपुर से मिली गुरुवाणी की ऊर्जा, सिर्फ हमारे सिख भाई-बहनों को ही नहीं बल्कि हर भारतवासी को अपना आशीर्वाद देगी।” उन्होंने कहा कि करतारपुर केवल गुरुनानक देवजी की कर्मभूमि नहीं है, बल्कि करतापुर के कण-कण में गुरुनानक देवजी के पसीने की महक मिली हुई है। उसकी वायु में उनकी वाणी घुली हुई है।

बता दें कि करतारपुर कॉरिडोर भारत के पंजाब में डेरा बाबा नानक गुरुद्वारे को करतारपुर स्थित दरबार साहिब से जोड़ेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने इस अवसर पर यात्री टर्मिनल भवन का भी उद्घाटन किया। जिसे एकीकृत जाँच चौकी (आईसीपी) भी कहा जाएगा। तीर्थयात्री 4.5 किलोमीटर लंबे नवनिर्मित कॉरिडोर से जाने के लिए यहीं से मंजूरी प्राप्त करेंगे। आईसीपी की जाँच चौकी के उद्घाटन से भारतीय तीर्थयात्रियों को करतारपुर साहिब जाने में सुविधा होगी।

उल्लेखनीय है कि भारत ने 24 अक्तूबर को डेरा बाबा नानक में अंतरराष्ट्रीय सीमा के ‘जीरो प्वाइंट’ पर गलियारे के परिचालन के तौर-तरीकों पर 24 अक्टूबर को पाकिस्तान के साथ करार किया था। भारत और पाकिस्तान के बीच हुए करार के मुताबिक रोजाना करीब पाँच हजार श्रद्धालु गलियारे से होकर इस गुरुद्वारे तक मत्था टेकने जाएँगे। इस करार को लेकर सिख श्रद्धालु बेहद उत्साहित हैं।

मंदिर वहीं बनेगा: CJI गोगोई पर उमड़ा रामभक्तों का प्यार, बताया ‘आज का हनुमान’

अयोध्या मामले का ऐतिहासिक पटाक्षेप होने के साथ प्रत्याशित “जय श्री राम” और “जय हनुमान” के साथ एक और जय-जयकार ऐसी होने लगी जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी। यह है भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की जय-जयकार।

सीजेआई गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने ही रामजन्मभूमि के पक्ष में फैसला सुनाया है। फैसले में पीठ ने विवादित स्थल हिन्दुओं को सिपुर्द करते हुए उसे रामजन्मभूमि के रूप में स्वीकार किया है। इस फैसले के बाद से गोगोई रामभक्तों की आँखों के तारे बन गए हैं। कोई उन्हें प्रणाम करने के लिए उनका घर ढूँढ़ रहा है तो कोई उन पर ईश्वर की कृपा बने रहने की कामना कर रहा है।

एक यूज़र ने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की निजी ट्विटर प्रोफाइल पर जाकर वहाँ ही “सीजेआई की जय” के नारे लगाए हैं।

ट्विटर पर कुछ लोग सीजेआई गोगोई को ‘आज के समय का हनुमान’ भी बता रहे हैं।

इससे पहले 1 फरवरी 1986 को जब फैजाबाद की अदालत ने इमारत का ताला खोलने का आदेश दिया तो उसके पीछे भी किसी काले बंदर की प्रेरणा सामने आई थी। फैसला देने वाले जज कृष्णमोहन पांडेय ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, “जिस रोज मैं ताला खोलने का आदेश लिख रहा था, मेरी अदालत की छत पर एक काला बंदर पूरे दिन फ्लैग पोस्ट को पकड़कर बैठा रहा। जो फैसला सुनने अदालत में आए थे, उस बंदर को फल और मूॅंगफली देते रहे पर बंदर ने कुछ नहीं खाया। चुपचाप बैठा रहा। फैसले के बाद जब मैं घर पहुॅंचा तो उस बंदर को अपने बरामदे में बैठा पाया। मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने उसे प्रणाम किया। वह कोई दैवीय ताकत थी।”

रामभक्ति हो या रहीमभक्ति, ये समय हम सभी के लिए भारतभक्ति की भावना को सशक्त करने का है: PM मोदी

अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने इस फैसले में विवादित जमीन रामजन्मभूमि न्यास को देने का फैसला किया है। यानी विवादित जमीन राम मंदिर के लिए दे दी गई है, जबकि मुस्लिम पक्ष को अलग स्थान पर जगह देने के लिए कहा गया है। कोर्ट ने अयोध्या में ही मस्जिद बनाने के लिए अलग से 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया है। राम मंदिर निर्माण के लिए कोर्ट ने केंद्र सरकार को तीन महीने के अंदर ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पाँच जजों की बेंच ने यह फैसला सर्वसम्मति से दिया है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद प्रधानमंत्री ने कहा, “देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या पर अपना फैसला सुना दिया है। इस फैसले को किसी की हार या जीत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। रामभक्ति हो या रहीमभक्ति, ये समय हम सभी के लिए भारतभक्ति की भावना को सशक्त करने का है। देशवासियों से मेरी अपील है कि शांति, सद्भाव और एकता बनाए रखें।”

इसके साथ ही उन्होंने एक अन्य ट्वीट में कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कई वजहों से महत्वपूर्ण है: यह बताता है कि किसी विवाद को सुलझाने में कानूनी प्रक्रिया का पालन कितना अहम है। हर पक्ष को अपनी-अपनी दलील रखने के लिए पर्याप्त समय और अवसर दिया गया। न्याय के मंदिर ने दशकों पुराने मामले का सौहार्द्रपूर्ण तरीके से समाधान कर दिया।

पीएम ने कहा कि यह फैसला न्यायिक प्रक्रियाओं में जन सामान्य के विश्वास को और मजबूत करेगा। हमारे देश की हजारों साल पुरानी भाईचारे की भावना के अनुरूप हम 130 करोड़ भारतीयों को शांति और संयम का परिचय देना है। भारत के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की अंतर्निहित भावना का परिचय देना है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, “श्री राम जन्मभूमि कानूनी विवाद के लिए प्रयासरत सभी संस्थाएँ, पूरे देश का संत समाज और अनगिनत अज्ञात लोगों जिन्होंने इतने वर्षों तक इसके प्रयास किया मैं उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ।”

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, “माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत है, देश की एकता व सद्भाव बनाए रखने में सभी सहयोग करें। उत्तर प्रदेश में शांति, सुरक्षा और सद्भाव का वातावरण बनाए रखने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध है।”

राजनाथ सिंह ने इसे ऐतिहासिक फैसला बताया और साथ ही उन्होंने शांति और सैहार्द्र बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि इस फैसले को सहज रूप से सभी को स्वीकार करना चाहिए। इससे सर्वधर्म सद्भाव की भावना भी और मजबूत होगी और साथ ही साथ उन्होंने विश्वास जताया कि इससे सामाजिक ताना-बाना को भी मजबूती मिलेगी।

वहीं केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी कहा कि सभी को सुप्रीम के फैसले को मानना चाहिए और शांति बनाए रखना चाहिए। 

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सभी को स्वागत करना चाहिए। यह सामाजिक समरसता के लिए फायदेमंद होगा। इस मुद्दे पर कोई और विवाद नहीं होना चाहिए, यही मेरी लोगों से अपील है।”

बाबरी मस्जिद के मुस्लिम पक्षकार इकबाल अंसारी ने भी फैसले के सम्मान की बात कही है। वहीं निर्मोही अखाड़ा के प्रवक्ता कार्तिक चोपड़ा ने कहा, “निर्मोही अखाड़ा आभारी है कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले 150 वर्षों की हमारी लड़ाई को मान्यता दी है और राम जन्मस्थान मंदिर के निर्माण और प्रबंधन के लिए केंद्र सरकार द्वारा स्थापित किए जाने वाले ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़ा को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया है।”

लिबरलों को मिली ‘रूदन कक्ष’ हेतु 5 वर्गफीट जमीन, रवीश को पेपर रोल, राठी-कामरा के लिए ChiRAnDh योजना

राममंदिर पर फैसला आ गया। मेरी निजी राय में कम से कम 50 साल और लगते तो सही रहता। आप कहेंगे कि अजीत जी आप पगला गए हैं। वो तो ठीक है कि मैं पगला गया हूँ, लेकिन भारत के सेकुलर तंत्र का क्या? ‘हम भारत के सेकुलर लोग’ का क्या जिसे संविधान के 382वें संशोधन में जोड़ा जाएगा? ‘इंडिया दैट इज भारत’ का क्या जिसे संविधान में ‘हिन्दुस्तान’ नहीं लिखा गया है?

बात समझिए कि सबको ‘ले’ कर चलना होता है। कोर्ट और सरकारें कई बार ऐसा कर चुकी हैं। अतः, पचास साल बाद अगर एक सरकार होती जहाँ ‘स्कोडा लहसुन तहजीब’ का लहसुन वाला हिस्सा प्रबल होता, उनके बुद्धिजीवी (जो हमेशा हिन्दू आतंक से शांति चाहते हैं) बड़ी संस्थाओं में बैठे होते, तब जा कर एक सेकुलर फैसला आता जो इतिहास में सबको स्वीकार्य होता।

अभी तो ज़फ़रयाब गिलानी कह रहे हैं कि मस्जिद अल्लाताला की संपत्ति है, और शरीयत यह कहता है मस्जिद किसी को दी नहीं जा सकती। इस बात पर गिलानी जी ने कुछ खास नहीं बोला कि शरीयत उनके मजहब वालों को आतंकवादी बन कर किसी दूसरे की जमीन पर मस्जिद बनाने से रोकता है या उसको बढ़ावा देता है। क्योंकि ज़फ़रयाब टाइप के लोगों का तर्क यही है कि धरती तो 1528 से शुरु हुई है जब मीर बाक़ी ने मस्जिद बनाई।

जो भी हो, मैं इस फैसले से, एक खाँटी सेकुलर व्यक्ति के तौर पर, बहुत ठगा हुआ महसूस कर रहा हूँ। सुप्रीम कोर्ट ने ‘द वायर’ जैसी मीडिया संस्थाओं द्वारा दिए गए तर्कों की पूरी तरह से अनदेखी कर दी है कि तुलसीकृत मानस में तो कहीं लिखा ही नहीं है कि अयोध्या एक तीर्थस्थल है। सही बात है क्योंकि ‘वायर’ के निकम्मे पत्रकारों को यह कहाँ से पता होगा कि मानस लिखी भले ही चार सौ साल पहले गई है, लेकिन उसका कथानक बाल्मीकि रामायण के समय का है। ‘वायर’ के हिसाब से राम के काल में ही उनके दर्शन को मॉरीशस से हिन्दू जाया करते थे, ऐसा कहीं नहीं लिखा है। ख़ैर मनाइए कि ‘वायर’ ने ये नहीं कहा कि आसमान से प्रकट हुई ‘क़ुरान’ में भी राम का जिक्र नहीं है, तो हिन्दू झूठ बोल रहे हैं।

कोर्ट की मुख्य बातें जो आपको कहीं नहीं मिलेंगी

शायद ध्यान हो कि भारत की आबादी का एक बहुत छोटा हिस्सा हमेशा से विवादित जगह पर ‘स्कूल, कॉलेज या अस्पताल’ बनवाने की बातें करता था। सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की बैंच के सातवें जज ने अपने अलग फैसले में लिखा कि चूँकि ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है, तो उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा देते हुए, उनकी माँगों पर भी कोर्ट ने विचार किया है। इसी के मद्देनज़र, पाँच जजों के फैसले के बाद, उनके विलाप हेतु, हिन्दुओं से दुराग्रह के साथ कुल पाँच वर्गफीट जमीन ‘रूदन कक्ष’ हेतु देने की बात कही गई है।

सातवें जज ने यह भी कहा कि उस कमरे में एक साथ दो-दो लिबरल ही जा सकते हैं। एक रोए तो दूसरा उसकी पीठ पर हाथ फेरे। लेकिन ऐसे कमरे में तरूण तेजपाल टाइप के लोगों को अकेले ही जाने कहा गया है। साथ ही, जज साहब ने बताया कि केन्द्र सरकार यह तय करेगी कि कमरे का डिजाइन कैसा होगा ताकि लिबरलों के विलाप में कमी न आए। गुप्त सूत्रों ने बताया है कि वहाँ मोदी, शाह और योगी जी की तस्वीरें, कम ऊर्जा का उपयोग करने वाली एलईडी टीवी पर, वालपेपर के तौर पर मोंटाज में चलती रहेंगी।

लिबरल ग्रुप की सहअध्यक्षा सागरिका ने कहा है कि वो इस फैसले की कॉपी पर गौर कर रही हैं, कोई आकर जब बताएगा कि उसमें लिखा क्या है, और इस पर उन्हें क्या नहीं बोलना चाहिए तब ही वो इस पर राय दे पाएँगी। गौरतलब है कि सागरिका जी ने आँखों पर वेल्डिंग करते वक्त पहने जाने वाला चश्मा लगाए हुआ था।

मोदी दो दशमलव शून्य के बाद बेरोजगारी की राह पर चल रहे ध्रुव राठी, कुणाल कमरा जैसे टुटपुँजिया लौंडों को लिए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को नई नीति बनाने का सुझाव दिया है। पाँच जजों की बेंच के छठे जज ने फैसला ट्वीट करते हुए कहा कि मोदी सरकार के दोबारा आने से पहले ही बेरोजगारी दर बढ़ गई है, और अयोध्या पर आए फैसले से कामरा-राठी टाइप के लौंडों के स्थान विशेष में दर्द उठेगा। दर्द उठने को ले कर जज साहब ने आगे कहा कि ये लोग आयुष्मान योजना का लाभ ले कर फ्री में इलाज कराएँगे जिससे अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा।

अतः, सरकार से अपील करते हुए जज साहब ने कहा, “कुछ दे दीजिए बेचारों को… मन लगा रहेगा इनका भी। कोई चिरकुट रोजगार एवम् नल्लारोधी धमाका (ChiRAnDh) योजना बना दीजिए ताकि इनका यूट्यूब चलता रहे।” अमित शाह जी ने इस बात पर कहा है कि ‘संबद्ध मंत्रालय’ इस पर स्वतः कार्य करेगा, और हर बात के लिए उनके पास आने की जरूरत नहीं है।

इसके साथ ही तीसरे तरह के गिरोह को भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में बोल्ड अक्षरों में जगह दी है। यह गिरोह मीडिया के अजेंडाबाजों के लिए है जिन्होंने हमेशा यह दुहाई दी है कि हिन्दू समाज मजहब विशेष में डर पैदा कर रहा है। ‘डर का माहौल’ की प्रसूता रवीश कुमार जी के लिए सुप्रीम कोर्ट की पतली बेंच के सबसे अंत में बैठे जज ने कहा है कि रवीश कुमार को भारत सरकार तीन किलोमीटर लम्बी पोस्ट लिखने के लिए कागज का एक ‘रोल’ दे क्योंकि फेसबुक पर, इंडियन एक्सप्रेस के लेख के अनुसार, SC, हिन्दू OBC और हिन्दू सवर्णों से आर्थिक और शैक्षणिक रूप से कहीं बहुत पिछड़े मजहब विशेष वाले नहीं हैं, जो उन्हें पढ़ते हों।

साथ ही, कोर्ट ने नोट किया कि जो मजहबी नाम वाले लोग फेसबुक पर हैं भी, उनमें से अधिकतर मनोहर पर्रिकर से ले कर सुषमा स्वराज आदि की मृत्यु और उरी, पुलवामा जैसे नृशंस हमलों पर ‘हा-हा’ करते नजर आते हैं। कोर्ट के अनुसार ऐसे लोग फेसबुक पर और कुछ करते नहीं, तो रवीश जी किलोमीटर लम्बी अजेंडाबाजी कहाँ से पढ़ पाएँगे। अतः, सरकार को निर्देश देते हुए जज साहब ने कहा कि उन्हें हर दिन बाथरूम में ही रोल पहुँचा दिया जाए, ताकि वो अपनी अजेंडाबाजी विष्ठा डिजिटल से भौतिक रूप में भी फैला सकें।

इसके बाद फैसले में एक बात जो ध्यान देने योग्य थी वो यह है कि बिग बीसी, स्क्रॉल, क्विंट, एनडीटीवी, वायर जैसे मीडिया संस्थानों को कोर्ट ने कहा है कि अगर उन्हें दर्द हो रहा है तो वो एकाध दिन की छुट्टी ले सकते हैं। इस पर राजदीप सरदेसाई ने जज साहब से ट्वीट के जरिए पूछा है कि क्या सरकार प्रेस क्लब में पूरे दो दिन हैप्पी आवर्स का प्रावधान रखवा सकती है? जज ने कहा कि वो मोदी जी से बात करें। इस पर राजदीप ने कहा कि उनका न्याय व्यवस्था से विश्वास उठ चुका है।

साथ ही ध्रुवीकरण की राजनीति करने वाले ओवैसी जैसे नेताओं के लिए जज साहब ने कहा कि उन्हें भी पाँच एकड़ जमीन मुहैया कराई जाए ताकि वो वहाँ एक रैली करें, और भीड़ को संबोधित करते हुए, रोज सुबह-शाम, ‘भारत माता की जय’, ‘वंदे मातरम्’ आदि का नारा लगवाएँ ताकि उन लोगों का मुँह बंद हो जाए जो कहते हैं कि भारत का ‘शांतिप्रिय’ राष्ट्र से प्रेम नहीं करता। साथ ही, उनसे यह भी आदरपूर्वक आग्रह किया गया है कि वो धार्मिक सद्भाव के लिए एक मिसाल पेश कर सकते हैं अगर वो ‘भारत माता की जय’ आदि के साथ-साथ ‘जय श्री राम’ का नारा भी लगाएँ। इससे हिन्दुओं को अच्छा महसूस होगा और शांति व्यवस्था बनी रहेगी। ओवैसी या उसके पंद्रह मिनटी भाई ने इस पर कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी है, मुँह घुमा कर चले गए।

गंजे लौंडे प्रतीक द्वारा संचालित ऑल्ट न्यूज और पंक्चर का व्यवसाय करने वाले जुबैर नामक व्यक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कुछ खास नहीं कहा। इस पर परमसम्माननीय श्री अजीत भारती जी ने जज साहब को पर्सनली कहा है कि फेक न्यूज फैला कर, इंटरनेट पर चलते चुटकुलों और मीमों की फैक्टचेकिंग करने वाले इन लम्पटद्वय के लिए कुछ तो किया ही जाना चाहिए। इस पर जज साहब ने कहा कि श्री भारती एक ट्वीट लिख कर लोगों से अपील कर दें कि इस गंजे को कोई पैसे न दे। इससे गंजे और पंक्चर वाले का जुबैर का बहुत फायदा भी हो जाएगा और कोर्ट पर यह आरोप भी नहीं लगेगा कि कोर्ट अब ऐसे टुच्चे लोगों के लिए भी विशेष प्रावधान करने लगी है।

कोर्ट की जजमेंट 1000 पन्नों से ऊपर है, और मैं लिखते वक्त भी उसे पढ़ ही रहा हूँ, अतः, आगे कुछ और भी आएगा तो बताता रहूँगा।

मस्जिद अल्लाताला की होती है, शरीयत में मस्जिद हटा नहीं सकते कहीं से: सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के निराश वकील

राम मंदिर मामले में सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 सदस्यीय पीठ ने बहुप्रतीक्षित फ़ैसला सुना दिया है। पूरी ज़मीन हिन्दुओं को दी गई है। मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या में ही कहीं और 5 एकड़ ज़मीन दी जाएगी। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पक्ष विवादित ज़मीन पर अपना दावा साबित नहीं कर सका। अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार एक ट्रस्ट बना कर 3 महीने के भीतर राम मंदिर निर्माण के लिए योजना तैयार करे। फ़ैसले से जहाँ पूरे देश में ख़ुशी की लहर है, मुस्लिम पक्षकारों ने निराशा जताई है।

सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने कहा है कि वो फ़ैसले का सम्मान तो करते हैं, लेकिन संतुष्ट नहीं हैं। बोर्ड के वकील ज़फ़रयाब जिलानी ने कहा कि आगे क्या क़दम उठाना है, इस सम्बन्ध में बोर्ड विचार करेगा। साथ ही उन्होंने कहीं भी फ़ैसले को लेकर किसी तरह का प्रदर्शन न करने की अपील की। उन्होंने पुनर्विचार याचिका दायर करने की बात करते हुए कहा कि समिति की बैठक के दौरान इस बारे में निर्णय लिया जाएगा। जिलानी ने कहा कि ये उनका अधिकार है और नियमानुकूल भी है। उन्होंने दावा किया कि जिन दस्तावेजों के आधार पर हिन्दुओं की आस्था और विश्वास की पुष्टि की गई, उसी दस्तावेज के आधार पर वहाँ मस्जिद होने की बात भी पता चलती है।

मुस्लिम पक्ष ने कहा कि उन्हें विवादित ज़मीन के बाहरी हिस्से को लेकर कोई शिकायत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इनर कोर्ट यार्ड में मुस्लिमों के स्वामित्व का 1857 के पहले का कोई साक्ष्य नहीं है। जिलानी ने दावा किया कि जिन भी सबूतों का जिक्र किया, वो सभी वहाँ मस्जिद की पुष्टि करती हैं। जिलानी ने कहा कि अगर वहाँ मस्जिद है तो नमाज होती ही होगी। जिलानी ने कहा कि उनकी समझ में ये इन्साफ नहीं है। उन्होंने कहा कि मस्जिद की जगह कुछ नहीं हो सकता है। 5 एकड़ दिए जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि इसमें ज़मीन के क्षेत्रफल की कोई बात ही नहीं है।

सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी ने शरीयत क़ानून का जिक्र करते हुए कहा कि मस्जिद किसी को नहीं दिया जा सकता है। जिलानी ने दावा किया कि हिन्दू पक्ष की दलील यह थी कि विक्रमादित्य के जमाने का मंदिर तोड़ा गया, जो इसे ईसापूर्व के आसपास वाले समय में ले जाता है। जिलानी ने कहा कि मस्जिद की कोई क़ीमत नहीं होती और मस्जिद की मिलकियत अल्लाहताला के पास होती है। उन्होंने कहा कि इसे न तो बेचा जा सकता है और न ही अदला-बदली की जा सकती है, इसके लिए 5 करोड़ या 500 करोड़ रुपए ही क्यों न मिले।

ज़फ़रयाब जिलानी के बयान से साफ़ है कि मुस्लिम पक्ष पुनर्विचार याचिका दायर करने के पक्ष में है और वो इस सम्बन्ध में क़दम बढ़ाएँगे। फिलहाल उन्होंने पूरा जजमेंट पढ़ने के बाद ही आगे का एक्शन लेने की बात कही है। उनके बयान से साफ़ है कि वो फ़ैसले से निराश हैं।

अयोध्या: लिबरल गैंग का छलका दर्द, कहा- SC के फ़ैसले ने VHP को किया पुरस्कृत

अयोध्या भूमि विवाद मामले में आज सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की पीठ ने अपना ऐतिहासिक फ़ैसला सुना दिया। पीठ ने विवादित ज़मीन पर रामलला के हक़ में निर्णय सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को राम मंदिर बनाने के लिए तीन महीने में ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया है। साथ ही मुस्लिम पक्ष को नई मस्जिद बनाने के लिए अलग से पाँच एकड़ ज़मीन देने का निर्देश भी दिया है। इसके अलावा, कोर्ट ने निर्मोंही अखाड़े और शिया वक़्फ़ बोर्ड के दावों को ख़ारिज कर दिया। हालाँकि, निर्मोही अखाड़े को ट्रस्ट में जगह देने की अनुमति को स्वीकार कर लिया गया है।

ज्यादातर तबकों में इस फैसले का स्वागत हो रहा है। लेकिन एक समूह ऐसा भी है जिसे फैसला पच नहीं रहा। इस समूह ने अपने दुख का राग अलापना शुरू कर दिया है। निखिल थाटे ने ट्वीट किया कि 1986 में बाबरी मस्जिद के ताले को किसने खोला उन्हें कभी नहीं भूलना चाहिए। इसके अलावा उन्होंने यह भी लिखा कि भूमि विवाद मामले में 27 साल पहले न्याय की मौत हो गई थी और आज अंतत: उसे दफ़ना दिया गया।

नंदिनी सुंदर ने हिन्दू पक्ष को पूरी जमीन दिए जाने के फ़ैसले की निंदा करते हुए लिखा कि सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद गिराने के लिए विश्व हिन्दू परिषद (VHP) को पुरस्कृत किया है, यह शर्म की बात है। 

फासिस्ट फकीरा ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को ‘न्याय’ न बताकर ‘निर्णय’ करार दिया और लिखा कि INDIA को आज आधिकारिक रूप से HINDU REPUBLIC घोषित किया गया है।

काकवाणी यूज़र ने अपने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को RSS का फ़ैसला करार देते हुए लिखा कि मालिकाना हक़ का मामला था, तो मालिक़ाना हक़ किसी एक पक्ष को दिया जाता। लेकिन जब ज़मीन पर मुस्लिमों का मालिकाना हक़ है ही नहीं तो 2.77 एकड़ ज़मीन के बदले मुस्लिम पक्ष को पाँच एकड़ ज़मीन दिए जाने का क्या मतलब है?

आदित्य मेनन ने भी लिखा कि अयोध्या फैसले को संतुलित कहना गलत है। पाँच एकड़ जमीन सुन्नी वक्फ बोर्ड के लिए कुछ नहीं है। इतना तो मुस्लिम बिना कोर्ट की मदद के भी कर सकते हैं। यह उस विशेष मस्जिद की बात है जिसे एक क्रिमिनल एक्ट में ध्वस्त कर दिया गया अगर ऐसा नहीं होता तो क्या ये फैसला आता।

ग़ौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया कि 1857 से पहले हिन्दू यहाँ पूजा करते थे। यानी, अंग्रेजों के आने से पहले ही राम चबूतरा, सीता रसोई और विवादित ज़मीन के बाहरी हिस्से में हिन्दू पूजा किया करते थे। अर्थात, आउटर कोर्टयार्ड हिन्दुओं की पूजा का मुख्य बिंदु था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सारा विवाद अंदर के हिस्से को लेकर है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मुस्लिम पक्ष विवादित ज़मीन के भीतरी हिस्से पर अपना दावा साबित करने में विफल रहा है और सारा विवाद भीतरी हिस्से को लेकर ही है। यानी, बाहरी हिस्से पर हिन्दू काफ़ी पहले से पूजा करते आ रहे हैं, इसमें कोई विवाद नहीं है।

रोड टू रामलला: 1528 से 2019 तक का सफर, राम मंदिर के लिए हिंदुओं के संघर्ष की पूरी कहानी

शनिवार (9 नवंबर 2019) को वह इंतजार पूरा हुआ जिसका हिंदू दशकों से इंतजार कर रहे थे। अयोध्या में राम मंदिर के लिए लंबे संघर्ष के बाद सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है। शीर्ष अदालत ने विवादित जगह पर दूसरे मजहब के दावे को खारिज करते हुए केंद्र सरकार से मंदिर निर्माण के लिए तीन महीने में ट्रस्ट बनाने को कहा है। मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने से लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक का पूरा घटनाक्रम;

  • 1528: बाबर के सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या में भगवान राम के जन्मस्थान पर ​मस्जिद का निर्माण करवाया।
  • 1528-1731: इमारत पर कब्जे को लेकर हिंदू और मुगलों के बीच 64 बार संघर्ष हुए।
  • 1822: फैजाबाद अदालत के मुलाजिम हफीजुल्ला ने सरकार को भेजी एक रिपोर्ट में कहा कि राम के जन्मस्थान पर बाबर ने मस्जिद बनवाई।
  • 1852: अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह के शासन में पहली बार यहॉं मारपीट की घटना का लिखित जिक्र मिलता है। निर्मोही पंथ के लोगों ने दावा किया कि बाबर ने एक मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई थी।
  • 1855: हनुमानगढ़ी पर बैरागियों और मुगलों के बीच संघर्ष हुआ। वाजिद अली शाह ने ब्रिटिश रेजिडेंट मेजर आर्टम को अयोध्या के हालात पर एक पर्चा भेजा। इसमें 5 दस्तावेज लगाकर यह बताया गया कि इस विवादित इमारत को लेकर यहॉं अक्सर हिंदू और दूसरे मजहब के बीच तनाव रहता है।
  • 1859: ब्रिटिश हुकूमत ने इस पवित्र स्थान की घेराबंदी कर दी। अंदर का हिस्सा नमाज के लिए और बाहर का हिस्सा हिंदुओं को पूजा के लिए दिया गया।
  • 1860: डिप्टी कमिश्नर फैजाबाद की कोर्ट में मस्जिद के खातिब मीर रज्जन अली ने एक दरखास्त लगाई कि मस्जिद के परिसर में एक निहंग सिख ने निशान साहिब गाड़कर एक चबूतरा बना दिया है, जिसे हटाया जाए।
  • 1877: मस्जिद के मुअज्जिन मोहम्मद असगर ने डिप्टी कमिश्नर के दफ्तर में फिर से अर्जी देकर शिकायत की कि बैरागी महंत बलदेव दास ने मस्जिद परिसर में एक चरण पादुका रख दी है, जिसकी पूजा हो रही है। उन्होंने पूजा के लिए चूल्हा बनाया है। अदालत ने कुछ हटवाया तो नहीं लेकिन मस्जिद में जाने का दूसरा रास्ता बनवा दिया।
  • 15 जनवरी 1885: पहली बार इस जमीन पर मंदिर बनवाने की मॉंग अदालत पहुॅंची। महंत रघुबर दास ने पहला केस फाइल किया। उन्होंने राम चबूतरा पर एक मंडप बनाने की इजाजत मॉंगी। संयोग से इसी साल भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस की स्थापना भी हुई।
  • 24 फरवरी 1885: फैजाबाद की जिला अदालत ने महंत रघुबर दास की अर्जी को यह कहते हुए खारिज कर दी कि वह जगह मस्जिद के बेहद करीब है। जज हरिकिशन ने अपने फैसले में माना किया चबूतरे पर रघुबर दास का कब्जा है। उन्हें एक दीवार उठाकर चबूतरे को अलग करने को कहा, लेकिन मंदिर बनाने की इजाजत नहीं दी।
  • 17 मार्च 1886: महंत रघुबर दास ने जिला जज फैजाबाद कर्नल एफईए कैमियर की अदालत में अपील दायर की। कैमियर ने अपने फैसले में कहा कि मस्जिद हिंदुओं के पवित्र स्थान पर बनी है। पर अब देर हो चुकी है। 356 साल पुरानी गलती को सुधारना इतने दिनों बाद उचित नहीं होगी। यथास्थिति बनाए रखें।
  • 20-21 नवंबर 1912: बकरीद के मौके पर अयोध्या में गौहत्या के खिलाफ पहला दंगा हुआ। यहॉं 1906 से ही म्यूनिसिपल कानून के तहत गौहत्या पर पाबंदी थी।
  • मार्च 1934: फैजाबाद के शाहजहॉंपुर में हुई गौहत्या के विरोध में दंगे हुए। नाराज हिंदुओं ने बाबरी मस्जिद की दीवार और गुंबद को नुकसान पहुॅंचाया। सरकार ने बाद में इसकी मरम्मत करवाई।
  • 1936: इस बात की कमिश्नरी जॉंच की गई कि क्या बाबरी मस्जिद बाबर ने बनवाई थी।
  • 20 फरवरी 1944: आधिकारिक गजट में एक जॉंच रिपोर्ट प्रकाशित हुई। यह 1945 में शिया और सुन्नी वक्फ बोर्ड के फैजाबाद की रेवेन्यू कोर्ट में मुकदमे के दौरान सामने आई।
  • 22-23 दिसंबर 1949: भगवान राम की मूर्ति विवादित इमारत के भीतर प्रकट हुई। दोनों पक्षों ने केस दायर किए। सरकार ने इलाके को विवादित घोषित कर इमारत की कुर्की के आदेश दिए। लेकिन, पूजा-अर्चना जारी रही।
  • 29 दिसंबर 1949: फैजाबाद म्यूनिसिपल बोर्ड के चेयरमैन प्रिया दत्त राम को विवादित परिसर का रिसीवर नियुक्त किया गया।
  • 1950: हिंदू महासभा के गोपाल सिंह विशारद और दिगंबर अखाड़े के महंत परमहंस रामचंद्रदास ने अदालत में याचिका दायर कर जन्मस्थान पर स्वामित्व का मुकदमा ठोंका। दोनों ने वहॉं पूजा-पाठ की इजाजत मॉंगी। सिविल जज ने भीतरी हिस्से को बंद रखकर पूजा-पाठ की इजाजत देते हुए मूर्तियों को न हटाने के अं​तरिम आदेश दिए।
  • 26 अप्रैल 1955: हाई कोर्ट ने सिविल जज के अंतरिम आदेश पर मुहर लगाई।
  • 1959: निर्मोही अखाड़े ने एक दूसरी याचिका दायर कर विवादित स्थान पर अपना दावा जताया। स्वयं को रामजन्मभूमि का संरक्षक बताया।
  • 1961: सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने मस्जिद में मूर्तियों के रखे जाने के विरोध में याचिका दायर की। दावा किया कि मस्जिद और उसके आसपास की जमीन एक कब्रगाह है, जिस पर उसका दावा है।
  • 29 अगस्त 1964: जन्माष्टमी के मौके पर मुंबई में विश्व हिंदू परिषद की स्थापना।
  • 7-8 अप्रैल 1984: मंदिर निर्माण के लिए राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति बनी। महंत अवैद्यनाथ अध्यक्ष बने। रथयात्राएँ निकाली गई। राम मंदिर आंदोलन ने जोर पकड़ा।
  • 1 फरवरी 1986: फैजाबाद की अदालत ने इमारत का ताला खोलने का आदेश दिया। हिंदुओं को पूजा-पाठ की इजाजत मिली।
  • 3 फरवरी 1986: ताला खोले जाने के खिलाफ हाई कोर्ट में हाशिम अंसारी ने अपील की।
  • 5-6 फरवरी 1986: सैयद शहाबुद्दीन ने प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की अपील की। 14 फरवरी को शोक दिवस मनाने की अपील की।
  • 6 फरवरी 1986: लखनउ में मजहब विशेष की एक सभा हुई। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के गठन का ऐलान। मौलाना मुजफ्फर हुसैन किछौछवी अध्यक्ष और मोहम्मद आजम खान तथा जफरयाब जिलानी संयोजक बने।
  • 23-24 दिसंबर 1986: सैयद शहाबुद्दीन की अध्यक्षता में दिल्ली में बाबरी मस्जिद कोऑर्डिनेशन कमेटी का गठन। 1987 के गणतंत्र दिवस समारोह के बहिष्कार का ऐलान।
  • जून 1989: पालमपुर में बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक। मंदिर आंदोलन पहली बार बीजेपी के एजेंडे में। एक प्रस्ताव पास कर राम मंदिर बनाने का संकल्प लिया गया। कहा गया कि यह आस्था का सवाल है। अदालत फैसला नहीं कर सकती।
  • 1 अप्रैल 1989: विहिप ने धर्मसंसद बुलाई। 30 सितंबर को प्रस्तावित मंदिर के शिलान्यास का ऐलान।
  • 14 अगस्त 1989: हाई कोर्ट का आदेश यथास्थिति बरकरार रखी जाए।
  • अक्टूबर-नवंबर 1989: मंदिर निर्माण के लिए पूरे देश से साढ़े तीन लाख रामशिलाएॅं अयोध्या पहुॅंची।
  • 9 नवंबर 1989: राम मंदिर का शिलान्यास प्रस्तावित मंदिर के सिंहद्वार पर हुआ।
  • फरवरी 1990: कारसेवा का ऐलान।
  • जून 1990: विहिप की बैठक में 30 अक्टूबर से मंदिर निर्माण कार्य शुरू करने का ऐलान।
  • 25 सितंबर 1990: सोमनाथ से अयोध्या के लिए लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा शुरू।
  • 30 अक्टूबर-2 नवंबर 1990: कारसेवक लाखों की संख्या में अयोध्या पहुॅंचे। मुलायम सिंह की सरकार ने गोली चलवाई। 40 से ज्यादा कारसेवक मारे गए।
  • 7-10 अक्टूबर 1991: कल्याण सिंह की सरकार ने 2.77 एकड़ विवादित जमीन का अधिग्रहण किया।
  • 6 दिसंबर 1992: बाबरी मस्जिद गिरा दी गई।
  • अप्रैल 2002: हाई कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने इस बात पर सुनवाई शुरू की कि विवादित स्थल पर किसका अधिकार है।
  • 2003: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को खुदाई करने के निर्देश दिए।
  • जुलाई 2005: विवादित स्थल पर आतंकी हमला। सुरक्षा बलों ने पॉंच आतंकियों को मार गिराया।
  • जून 2009: लिब्राहन आयोग ने बाबरी विध्वंस पर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी।
  • 2010: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया। विवादित स्थल को तीन हिस्सों में बॉंट दिया।
  • मई 2011: सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पर रोक लगाई। यथास्थिति बनाए रखने को कहा।
  • 21 मार्च 2017: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामला संवेदनशील है। समाधान कोर्ट के बाहर होना चाहिए। सभी पक्षों से एक राय बनाकर समाधान ढूॅंढ़ने को कहा।
  • 14 मार्च 2018: सुप्रीम कोर्ट ने सभी 32 हस्तक्षेप अर्जियों को खारिज कर दिया। वही पक्षकार बचे जो इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले में शामिल थे।
  • 6 अगस्त 2019: मध्यस्थता प्रक्रिया नाकाम होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में रोजान सुनवाई शुरू।
  • 16 अक्टूबर 2019: 40 दिन दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा।
  • 9 नवम्बर 2019: सुप्रीम कोर्ट ने बहुप्रतीक्षित फ़ैसला सुनाया। पूरी विवादित ज़मीन रामलला की। मंदिर वहीं बनेगा। मस्जिद के लिए अयोध्या में ही कहीं और 5 एकड़ ज़मीन दी जाएगी।

(साभार: हेमंत शर्मा द्वारा रचित पुस्तक ‘युद्ध में अयोध्या’)

मंदिर वहीं बनेगा, मस्जिद कहीं और बनेगा: 10 प्वाइंट्स में समझें सुप्रीम कोर्ट का पूरा फ़ैसला

491 सालों का लम्बा इन्तजार। बाबरी मस्जिद निर्माण के 491 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुना राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने साफ़ कर दिया कि मुस्लिम पक्ष अयोध्या की विवादित ज़मीन पर अपना दावा साबित करने में विफल रहा।

राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट स्थापित कर 3 महीने के भीतर मंदिर निर्माण के लिए योजना शुरू की जाए, ऐसा सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले के दौरान और क्या-क्या कहा, इसे बिंदुवार समझें:

  • सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय पीठ ने सर्वसम्मति से फ़ैसला सुनाया। अर्थात, ये निर्णय 5-0 से आया। कोर्ट ने सबसे पहले निर्मोही अखाड़ा और शिया वक़्फ़ बोर्ड की याचिका को ख़ारिज किया।
  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महज आस्था और विश्वास के आधार पर फ़ैसला नहीं सुनाया जा सकता। साथ ही केवल एएसआई की रिपोर्ट को आधार बना कर भी निर्णय नहीं सुनाया जा सकता है।
  • एएसआई की रिपोर्ट से पता चलता है कि बाबरी मस्जिद के नीचे कोई ढाँचा था, जिसके ऊपर मस्जिद बनाई गई। लेकिन, एएसआई यह साबित नहीं कर पाया कि मंदिर को ध्वस्त कर मस्जिद बनाया गया था।
  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुसार, वो सभी धर्मों की भावनाओं का ख़्याल रखने के लिए प्रतिबद्ध है और संतुलन का ध्यान रखते हुए यह साबित होता है कि हिन्दू बाहरी हिस्से में काफ़ी पहले से पूजा करते आ रहे थे।
  • सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड यह साबित नहीं कर पाया कि विवादित ज़मीन पर उसका विशेषाधिकार अथवा एक्सक्लूसिव स्वामित्व था।
  • फ़ैसले का सबसे अहम भाग ये रहा कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को ट्रस्ट बना कर मस्जिद के लिए अयोध्या में ही कहीं और 5 एकड़ ज़मीन की व्यवस्था करने को कहा। इसी ट्रस्ट के माध्यम से राम मंदिर निर्माण के लिए भी योजना बनाने के लिए कहा गया। इस मामले में केंद्र और यूपी सरकार आपस में बातचीत कर आगे की कार्रवाई करे, ऐसा सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया।
  • केंद्र जो ट्रस्ट स्थापित करेगा, उसे बाहरी और भीतरी अहाते का अधिकार दे दिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने साफ़-साफ़ कहा कि हिन्दू विवादित ज़मीन पर अंग्रेजों के आने से पहले से ही पूजा करते आ रहे हैं। कोर्ट ने 1934 के दंगे का जिक्र करते हुए बताया कि भीतरी हिस्सा उसी वक़्त गंभीर विवाद का विषय बन गया था।
  • सुप्रीम कोर्ट ने हिन्दुओं की उस आस्था और विश्वास की भी पुष्टि की, जिसके अनुसार भगवान श्रीराम का जन्म मुख्य गुम्बद के नीचे हुआ था। हालाँकि, कोर्ट ने बताया कि गवाहों के बयान से ये भी पता चलता है कि वहाँ मुस्लिम भी नमाज पढ़ा करते थे।
  • सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सार यह है कि पूरी की पूरी विवादित ज़मीन हिन्दुओं को दे दी जाएगी और सरकार एक ट्रस्ट बना कर आगे का कार्य करेगी।
  • सुप्रीम कोर्ट ने इनर कोर्टयार्ड और आउटर कोर्टयार्ड को लेकर अलग-अलग बातें कहीं। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि के न्यायिक व्यक्ति होने की बात भी अस्वीकार कर दी।

सीएम पिता जानते थे बेटा CJI बनेगा, पर शायद ही पता रहा हो अयोध्या जैसा फैसला भी सुनाएगा

न्यायाधीश का काम ही है फैसला सुनाना। लेकिन, ज्यादातर न्यायाधीशों के करियर में ऐसे मौके नहीं आते कि उनके सुनाए फैसले की छाप अमिट हो। अयोध्या जैसे दशकों पुराने, राजनीतिक रूप से संवेदनशील और आस्था से जुड़े मसले पर फैसला सुनाने का मौका तो विरले को ही मिलता है। इस लिहाज से मौजूदा मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और उनकी अगुवाई वाली पीठ में शामिल जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एसए नजीर विरले ही माने जा सकते हैं।

सीजेआई रंजन गोगोई को लेकर किताब ‘गुवाहाटी हाईकोर्ट, इतिहास और विरासत’ में एक रोचक किस्से का जिक्र है। इसके मुताबिक उनके पिता केशब चंद्र गोगोई से उनके एक दोस्त ने पूछा कि क्या उनका बेटा भी उनकी ही तरह राजनीति में आएगा? जवाब में उनके पिता ने कहा- मेरा बेटा शानदार वकील है और उसके अंदर इस देश का मुख्य न्यायाधीश बनने की क्षमता है। उल्लेखनीय है कि 18 नवंबर 1954 को जन्मे गोगोई असम के पूर्व मुख्यमंत्री केशव चंद्र गोगोई के बेटे हैं।

बीते साल 03 अक्टूबर को चीफ जस्टिस पद की शपथ लेने वाले गोगोई इस साल 17 नवंबर में रिटायर हो जाएँगे। देश के 46वें चीफ जस्टिस गोगोई इस पद तक पहुॅंचने वाले पूर्वोतर से पहले जज हैं। उनकी छवि पारदर्शिता को पसंद करने वाले और बेहद खुलकर बोलने वाले जज की रही है। सुप्रीम कोर्ट के रोस्टर को लेकर जब बीते साल चार जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी तो उसमें गोगोई भी शामिल थे। इसके बाद कुछ खेमों से आशंका जताई गई थी कि उनकी वरिष्ठता को नजरंदाज कर किसी और को सीजेआई बनाया जा सकता है।

विनम्र स्वभाव के गोगोई सख्त जज माने जाते हैं। एक बार उन्होंने अवमानना नोटिस जारी कर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू को अदालत में तलब कर लिया था। काटजू ने सौम्या मर्डर केस में ब्लॉग लिखकर उनके फैसले पर सवाल उठाए थे। जेएनयू के छात्र नेता रहे कन्हैया कुमार के मामले में एसआईटी के गठन से इनकार करने वाले जज भी गोगोई ही थे।

फाइटर प्लेन मिराज के दुर्घटनाग्रस्त होने के मामले की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में न्यायिक जॉंच को लेकर दाखिल एक याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्होंने याचिकाकर्ता वकील अलख आलोक श्रीवास्तव से पूछा था कि मिराज किस जेनरेशन का है। वकील का जवाब सुन कर कहा:

“आपने याचिका दाखिल की है और आपको पता ही नहीं मिराज किस जेनरेशन के हैं। आप भाग्यशाली हैं कि हम आप पर इस याचिका को दाखिल करने के लिए जुर्माना नहीं लगा रहे और ऐसा इसलिए क्योंकि आप वकील हैं।”

रिटायर होने से पहले जस्टिस गोगोई कई और अहम मामलों में फैसला सुना सकते हैं। इनमें सबरीमाला रिव्यू पिटिशन, राफेल रिव्यू पिटिशन, राहुल गाँधी पर अवमानना का मुकदमा, फाइनेंस एक्ट 2017 की वैधता जैसे मामले शामिल हैं।