Home Blog Page 5359

पाकिस्तानी गफूर की आलोचना के बाद, गायिका रबी पीरज़ादा के सेक्स वीडियो वायरल: लोगों ने कहा- सेना का हाथ

पाकिस्तानी गायिका रबी पीरज़ादा के सेक्स वीडियो को लीक कर दिया गया था, क्योंकि उन्होंने ट्विटर पर पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता आसिफ गफूर की आलोचना की थी।

रबी पीरज़ादा पाकिस्तानी गायिका हैं, जिन्होंने अनुच्छेद-370 के हटाए जाने पर पीएम मोदी पर साँपों और मगरमच्छों को छोड़ने का दावा करके भारत में सोशल मीडिया का ध्यान आकर्षित किया था। हाल ही में उन्होंने ट्वीट कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उड़ाने की ख्वाहिश जताई थी। इसके लिए वह फिदायीन बनने को तैयार थीं। उन्होने बकायदा एक तस्वीर ट्वीट की, जिसमें आत्मघाती हमलावरों की तरह उन्होंने अपने शरीर से विस्फोटक बॉंध रखा है। वैसे यह स्पष्ट नहीं है यह सुसाइड बेल्ट असली है या नकली।

इंडिया टुडे की ख़बर के अनुसार, शुक्रवार (1 नवंबर) तड़के पीरज़ादा की नग्न तस्वीरें और वीडियो लीक हो गए थे। दिलचस्प बात यह है कि पीरज़ादा ने नीलम मुनीर पर फिल्माए गए, पाकिस्तानी सेना प्रायोजित फिल्म ‘Kaaf Kangana’ में आइटम गीत के बाद अपने बचाव के लिए पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता (डीजीआईएसपीआर) आसिफ गफूर की आलोचना की, जो ट्विटर पर गफूर के नाम से हैं।

पाकिस्तान आर्मी प्रायोजित फिल्म के आइटम गीत को उसके कंटेंट और लिरिक्स के लिए काफी आलोचना मिली। हालाँकि, गाने के बचाव में आसिफ गफूर सामने आए थे, जिसमें दावा किया गया था कि फिल्म के संदर्भ में, इसमें नाचती हुई लड़की भारतीय है।

बता दें कि सरीसृप-प्रेमी गायिका रबी पीरज़ादा को सस्ते आइटम गीतों की बचाव करने की DGISPR की शैली पसंद नहीं थी और इसलिए उन्होंने इस सन्दर्भ में ट्विटर पर पोस्ट किया था।

पीरज़ादा ने गुरुवार (31 अक्टूबर) को यह पोस्ट किया था। लेकिन, शुक्रवार की सुबह उसके नग्न और अंतरंग वीडियो ने ज़ाहिर तौर पर पाकिस्तानी इंटरनेट पर बाढ़ ला दी। पीरज़ादा के कई प्रशंसकों और समर्थकों ने सोशल मीडिया यूज़र्स ने नग्न वीडियो को शेयर न करने का अनुरोध किया। यह दावा भी किया जा रहा है कि पीरज़ादा ने  डीजीआईएसपीआर की आलोचना की थी, इसलिए अश्लील वीडियो ‘लीक’ होने के पीछे गफूर का हाथ हो सकता है।

Via Twitter

कुछ यूज़र्स ने यह सोचकर भी नाराज़गी व्यक्त की कि गफूर एक महिला का वीडियो कैसे लीक कर सकते हैं।

हालाँकि, बहुत जल्द, पाकिस्तानी ट्विटर यूज़र्स ने यह भी दावा करना शुरू कर दिया कि वीडियो पीरज़ादा के पूर्व प्रेमी द्वारा उनके मोबाइल फोन से लीक किए गए थे, जिनके पास उनका आईक्लाउड पासवर्ड था। कुछ हैंडल यह भी दावा कर रहे थे कि पीरज़ादा ने हाल ही में अपना फोन बेचा था जिसमें कुछ निजी वीडियो थे, हो सकता है कि वीडियो वहाँ से लीक हुए हों।

Via Twitter

वहीं, पीरज़ादा ने इस मुद्दे पर अब तक चुप्पी बनाए रखी है।

नाले में पड़ा मिला दर्जन भर गायों की खाल और कटा हुआ सिर: अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज

उत्तर प्रदेश के हापुड़ जनपद के कोतवाली क्षेत्र के रामपुर रोड पर नाले में गोवंश के अवशेष मिलने की घटना को गंभीरता से लेते हुए पुलिस अधीक्षक ने चौकी प्रभारी को लाइन हाजिर करते हुए अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। पुलिस मामले की जाँच में जुटी है। उन्होंने कोतवाली प्रभारी को जमकर फटकार लगाते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया है।

बता दें कि गुरूवार (अक्टूबर 31, 2019) की शाम रामपुर रोड स्थित नाले से बोरों में भरे करीब एक दर्जन गोवंशों के अवशेष मिले थे। ग्रामीणों ने इन अवशेषों को नाले में पड़े देखकर मामले की सूचना पुलिस को दी थी। मौके पर पहुँची पुलिस ने गोवंश की खाल, कटा हुआ सिर तथा अन्य अवशेष देखे।

इस मामले में एसपी डा यशवीर सिंह ने देर शाम जजीद चौकी प्रभारी सरवन कुमार गौतम को लाइन हाजिर कर दिया। उनके क्षेत्र में इतनी बड़ी मात्रा में गोकशी को लेकर उन्होंने नाराजगी व्यक्त की थी। इसके अलावा कोतवाली प्रभारी महावीर सिंह से भी स्पष्टीकरण माँगा गया है। इस मामले में कोतवाली पुलिस द्वारा अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। 

एएसपी सर्वेश कुमार मिश्र ने बताया कि वे खुद इस पूरे मामले को देख रहे हैं। किसी भी कीमत पर आरोपितों को बख्शा नहीं जाएगा। पुलिस अधीक्षक ने बताया कि लोगों ने संभावना जताई है कि पुलिस की मिलीभगत से पशुओं का अवैध कटान किया जा रहा है। इस बिंदु पर गोपनीय तरीके से जाँच कराई जाएगी। अपर पुलिस अधीक्षक सर्वेश कुमार मिश्रा के नेतृत्व में एक टीम घटना की जाँच करेगी। उन्होंने कहा कि संलिप्तता पाए जाने पर दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाएगा।

इसके साथ ही पुलिस अधीक्षक ने बताया कि रामपुर रोड पर तैनात पीआरवी वाहन और गश्त करने वाली फैंटम पर तैनात पुलिसकर्मियों को बदला जाएगा। जनपद में अवैध रूप से चल रहे सभी कट्टीघरों की जाँच के लिए दो टीमों का गठन किया गया है। प्रशासन द्वारा सील किए गए कट्टीघरों में पशुओं को काटते हुए पाया जाता है तो आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

महाराष्ट्र: राष्ट्रपति शासन की आहट से शिवसेना सहमी, समर्थन पर कॉन्ग्रेस बँटी

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव परिणाम आने के 11 दिनों बाद भी सरकार गठन को लेकर सियासी घमासान जारी है। ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद की मॉंग पर अड़ी शिवसेना की परेशानियॉं राष्ट्रपति शासन की अटकलों ने बढ़ा दी है। एनसीपी और कॉन्ग्रेस से भी उसे समर्थन मिलने के आसार नहीं दिख रहे। एनसीपी बार-बार दोहरा रही है कि वह विपक्ष में ही बैठेगी, जबकि शिवसेना को समर्थन के मसले पर कॉन्ग्रेस दो धड़े में बॅंट गई है।

शिवसेना सांसद संजय राउत ने राष्ट्रपति शासन को विधायकों के लिए धमकी बताया है। उन्होंने कहा, “अगर किसी राज्य में सरकार बनाने में देरी हो रही है और सत्तारूढ़ पार्टी के एक मंत्री का कहना है कि महाराष्ट्र में सरकार नहीं बनी तो राष्ट्रपति शासन लागू हो जाएगा, क्या यह उन विधायकों के लिए खतरा है जो चुन कर आए हैं?” शुक्रवार को बीजेपी नेता और महाराष्ट्र के वित्त मंत्री सुधीर मुनगंटीवार ने कहा था कि यदि राज्य में सात नवंबर तक नई सरकार नहीं बनती है तो राष्ट्रपति शासन लागू हो सकता है।

एनसीपी प्रमुख शरद पवार से अपनी मुलाकात पर संजय राउत ने कहा है कि राज्य का कहना है कि महाराष्ट्र में जिस तरह की राजनीतिक परिस्थितियॉं बन गई हैं, उसमें शिवसेना और बीजेपी को छोड़कर सभी राजनीतिक दल एक-दूसरे से बात कर रहे हैं। कॉन्ग्रेस प्रदेश अध्यक्ष बालासाहेब थरोट, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और पृथ्वीराज चव्हाण ने भी शरद पवार से मुलाक़ात की थी। इन मुलाकातों ने राज्य में ग़ैर-भाजपा सरकार की अटकलों को हवा दे दी थी।

शुक्रवार को महाराष्‍ट्र के वरिष्‍ठ कॉन्ग्रेस नेताओं की दिल्‍ली में पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल संग बैठक हुई थी। बैठक के दौरान शिवसेना का समर्थन करने की सूरत में कॉन्ग्रेस की छवि पर पड़ने वाले असर को लेकर चर्चा की गई। इसे देखते हुए फिलहाल वेट ऐंड वॉच की भूमिका में रहने का फैसला किया गया। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इस बैठक में तबीयत ठीक नहीं होने के कारण सोनिया गॉंधी मौजूद नहीं थीं।

शिवसेना को समर्थन पर कॉन्ग्रेस का विभाजन साफ-साफ नजर आ रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और पृथ्वीराज चव्हाण भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए शिवसेना को समर्थन देने के पक्ष में बताए जाते हैं। पार्टी सांसद हुसैन दलवई ने सोनिया गॉंधी को पत्र लिखकर शिवसेना के साथ सरकार बनाने का समर्थन दिया है। शिवसेना के साथ जाने का समर्थक धड़ा प्रतिभा पाटील और प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति चुने जाने के वक्त शिवसेना की ओर से मिले समर्थन का हवाला दे रहे हैं। दूसरी ओर, वरिष्ठ नेता सुशील कुमार शिंदे और संजय निरुपम ने कॉन्ग्रेस को सत्ता के खेल से दूर रहने की सलाह दी। इनका कहना है कि शिवसेना के साथ जाने से कॉन्ग्रेस की सेक्यूलर छवि को नुकसान पहुॅंचेगा और उसे इसका खामियाजा उठाना पड़ेगा।

महाराष्ट्र की 288 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा को 105 और उसकी सहयोगी शिवसेना को 56 सीटें मिली हैं। कॉन्ग्रेस ने 44 और उसकी सहयोगी एनसीपी ने 54 सीटों पर जीत हासिल की है। ऐसे में शिवसेना, कॉन्ग्रेस और एनसीपी साथ मिलकर सरकार बना सकते हैं। लेकिन, कॉन्ग्रेस सहयोगी एनसीपी के रुख को देखकर संशय में है। पवार ने नतीजों के तुरंत बाद कह दिया था कि उनकी पार्टी विपक्ष में बैठेगी। उन्होंने कहा था कि जनादेश भाजपा-शिवसेना गठबंधन को सरकार बनाने के लिए मिला है। इसके बाद से एनसीपी लगातार अपने इस रुख को दोहरा रही है।

दिल्ली का ‘कूड़े का पहाड़’: अगले साल ताजमहल से भी हो जाएगा ऊँचा

दिल्ली के गाजीपुर में कूड़े का पहाड़ लोगों के लिए मुसीबत बना हुआ है। राजधानी दिल्ली का यह सबसे बड़ा कचरे का ढेर अगले साल यानी 2020 तक ताजमहल से भी ज्यादा ऊँचा हो जाएगा। शहर के पूर्वी इलाके गाजीपुर के इस लैंडफिल साइट पर पक्षी, बाज, गाय, कुत्ते, चूहे जानवर खाने के लिए हमेशा मंडराते रहते हैं।

पूर्वी दिल्ली के सुपरिटेंडेंट इंजीनियर अरुण कुमार का कहना है कि यह कूड़े का ढेर पहले से ही 65 मीटर (213 फीट) से अधिक ऊँचा है। यदि यह इसी गति से बढ़ता रहा तो 2020 में यह करीब 73 मीटर ऊँचा हो जाएगा। यह ऊँचाई आगरा के ताजमहल से भी ज्यादा होगी। बता दें कि फुटबॉल के करीब 40 मैदान के आकार में फैला यह कूड़े का पहाड़ हर साल करीब 10 मीटर ऊँचा हो जाता है।

गौरतलब है कि गाजीपुर का यह लैंडफिल साइट साल 1984 में शुरू किया गया था। इसकी क्षमता 2002 में ही पूरी हो गई थी। इसे तब ही बंद किया जाना था। मगर इसे बंद नहीं किया गया। अभी भी शहर का मलबा सैकड़ों ट्रकों के जरिए यहाँ डाला जा रहा है। दिल्ली नगर निगम एक अधिकारी ने बताया कि गाजीपुर में हर दिन लगभग 2 टन कचरा डाला जाता है। 

साल 2018 में कूड़े के इस पहाड़ का एक हिस्सा बारिश में ढह गया था। इसमें दो लोगों की मौत हो गई थी और पाँच लोग घायल हो गए थे। इस घटना के बाद यहाँ कचरा डालने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। मगर कुछ दिन बाद ही यह क्रम फिर शुरू हो गया, क्योंकि अधिकारियों को इसका कोई विकल्प नहीं मिल पाया। पूर्वी दिल्ली नगर निगम ने पिछले 16 वर्षों से साइट का उपयोग करना जारी रखा है।

सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट की सीनियर रिसर्चर शांभवी शुक्ला ने कहा कि कचरे से निकलने वाली मिथेन गैस हवा में घुलने के बाद और भी ज्यादा खतरनाक हो जाती है। पर्यावरण रक्षा समूह चिंतन की प्रमुख चित्रा मुखर्जी ने कहा कि यह सब कुछ तुरंत बंद होना चाहिए। लगातार कचरा डालने के कारण हवा और पानी दोनों प्रदूषित हो रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जहरीली बदबू की वजह से उनका जीवन नर्क बन गया है। लोग हमेशा बीमार रहने लगे हैं। लोग अपने परिवार के साथ यहाँ से पलायन कर रहे हैं।

स्थानीय डॉक्टर कुमुद गुप्ता का कहना है कि उनके यहाँ प्रतिदिन 70 से अधिक लोग आते हैं, जिनमें बच्चे भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इनमें से अधिकतर लोग प्रदूषित हवा के कारण होने वाली साँस और पेट की बीमारियों से पीड़ित होते हैं।

सरकार ने 2013 से 2017 के बीच सर्वे करवाया। इसमें कहा गया कि दिल्ली में 981 लोगों की मौत साँस के इन्फेक्शन के कारण हुई, जबकि 1.7 मिलियन से ज्यादा लोग संक्रमण के शिकार हुए। कथित तौर पर भारतीय शहर दुनिया के सबसे बड़े कचरा उत्पादकों में से है, जो सालाना 62 मिलियन टन कचरा पैदा करता है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार यह 2030 तक 165 मिलियन टन तक बढ़ सकता है।

ओवैसी जी, मदरसों से बाहर आओ, आतंकी के जनाजे में जाना बंद करो, ‘हलाला’ को निजी मसला मत कहो, सुधार होगा

राजनीति आपको सांख्यिकी शास्त्र का ज्ञाता बना देती है, कभी आप विचारक हो जाते हैं, कभी दार्शनिक और कभी-कभी तो खुल्लमखुल्ला आतंकवादी कि पंद्रह मिनट के लिए पुलिस हटा लो, देखता हूँ कितने हिन्दू बचते हैं। 1 नवंबर 2019 को इंडियन एक्सप्रेस ने एक रिपोर्ट छापी और बताया कि भारत में कथित अल्पसंख्यकों की हालत तो SC (यानी अनुसूचित जाति, या कथित निचली जातियाँ), ‘हिन्दू’ OBC (अन्य पिछड़ी जातियाँ) और ‘हिन्दू’ अपर कास्ट (यानी कथित ऊँची जातियाँ) से बदतर है।

इसके लिए रिसर्च की ज़रूरत क्यों पड़ी, यह मेरी समझ में नहीं आया, लेकिन नौ साल पुराना आँकड़ा है, साम्प्रदायिकता चल रही है, कमलेश तिवारी को मार दिया गया है, हिन्दू मुखर हो कर लिख-बोल रहे हैं कि कथित अल्पसंख्यकों में इस हत्याकांड को ले कर मौन स्वीकृति है, तो ये नैरेटिव सही रहेगा कि दूसरे मजहब वाले कथित अल्पसंख्यक तो अशिक्षित और पिछड़े हैं, इसलिए आप देख लीजिए…

कई बार जो लिखा जाता है, वो बस उतना ही नहीं होता। उसमें और कुछ नहीं लिखा होता लेकिन उसे इस्तेमाल करने वाले अपने हिसाब से कर लेते हैं। समुदाय विशेष का शिक्षित न होना, पिछड़ा होना, अचानक ही उनके द्वारा आतंकी गतिविधियों में संलिप्त होने, कमलेश तिवारी जैसे हत्याकांड को अंजाम देने, एवम् अपराधियों को पनाह देने की प्रवृत्ति को धो कर, बात को भुलाने की कोशिश भर है।

दंगाई अकबरुद्दीन ओवैसी के बौद्धिक दंगाई भाई असदुद्दीन ओवैसी ने इस खबर को ट्वीट करते हुए लिखा है, “ये ‘हमारे’ सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन का पहाड़ जैसा बड़ा सबूत है लेकिन मुसलमानों को ऊपर लाने के लिए किसी भी नीति को तुष्टीकरण कह कर खारिज कर दिया जाता है। यह हमारे लिए न्याय का मुद्दा है और भारत की जमीनी हकीकत यह है कि बिना राजनैतिक शक्ति के कोई भी न्याय संभव नहीं।”

अंग्रेजी में ट्वीट लिखने से प्रभाव तो बड़ा भारी पड़ता है लेकिन उससे जमीनी हकीकत बदल नहीं जाती। ओवैसी की जमीनी हकीकत यह है कि वो समुदाय विशेष की राजनीति से कभी ऊपर उठ ही नहीं सके। उसमें भी समस्या यह है कि अपने मजहब के पिछड़ेपन की वजह भी वो अपने समुदाय में खोजने की जगह कहीं और ढूँढ रहे हैं। इस लेख में ओवैसी के विचारों और एक्सप्रेस की खबर, दोनों पर, दो भागों में चर्चा होगी।

समुदाय विशेष की तुलना हिन्दुओं से करो, हिन्दुओं की जातियों से नहीं

नोबेल विजेता अर्थशास्त्री रोनल्ड कोएज़ ने लिखा था कि आँकड़ों को अगर आप उचित समय तक टॉर्चर करते रहेंगे तो वो कुछ भी स्वीकार कर लेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि आप आँकड़ों से खेल सकते हैं और मनमाफिक परिणाम उससे कबूल करवा सकते हैं। जैसे कि, आपने मन बना लिया है कि राहुल द्रविड़ सचिन से बेहतर बल्लेबाज़ हैं, तो आप उपलब्ध आँकड़ों में से सिर्फ वही चुनेंगे जहाँ द्रविड़ बेहतर हों। उसके बाद आप उन्हीं मानदंडों के बारे में लिख देंगे कि पिच पर ज्यादा गेंदें रोकना ही बेहतर बल्लेबाज की पहचान है।

इंडियन एक्सप्रेस के इस लेख में यही हुआ है। बड़ी ही सूक्ष्मता से यह दर्शाया गया है कि मुस्लिम एक पूर्ण और एक ही तरह का समुदाय है, जबकि हिन्दुओं को आप तीन तरह से बाँट सकते हैं। उसमें भी एक और चालाकी यह है कि लिखने वाले ने हिन्दू OBC का प्रयोग किया है, हिन्दू सवर्ण का प्रयोग किया है लेकिन SC के पहले ‘हिन्दू’ शब्द नहीं लिखा गया है। जबकि मुस्लिमों में भी दलित हैं, OBC हैं और लोगों की अनभिज्ञता के परे, ऊँची जातियाँ हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

इसके बाद एक्सप्रेस ने बताया कि कहाँ-कहाँ मुस्लिम समुदाय पिछड़ा है और किस जाति के कितने लोग स्कूल जा रहे हैं, स्नातक हैं, आगे की पढ़ाई कर रहे हैं। सब में मजहब विशेष नीचे चल रहा है। यहाँ समस्या यह है कि जब मजहब विशेष में भी जातियाँ हैं, उनमें भी ‘पॉजिटिव डिस्क्रिमिनेशन’ के आधार पर दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग हैं, तो फिर सारे समुदाय विशेष की तुलना हिन्दुओं के अलग-अलग हिस्सों से क्यों?

यह भी दिखाते कि कैसे समुदाय विशेष में जो बेहतर आर्थिक और सामाजिक स्थिति में हैं, उनके बच्चों में शिक्षा का स्तर क्या है। फिर आँकड़े देते कि दलित मुस्लिमों की स्थिति, ओबीसी मुस्लिमों और उच्च जाति के मुस्लिमों के समक्ष कैसी है। उसके बाद, सारे मुस्लिमों की स्थिति, सारे हिन्दुओं की स्थिति से मिलाते। या, दोनों ही समुदायों के परस्पर समूहों की स्थिति पर चर्चा करते।

लेकिन ऐसा नहीं किया गया क्योंकि उससे पता चल जाता कि आर्थिक और सामाजिक रूप से अगड़े मुस्लिमों की स्थिति तो बेहतर है। फिर आपको यह भी पता करना पड़ता कि आखिर ऐसा क्यों है? फिर आप यह नहीं दिखा पाते कि हिन्दू और मुस्लिम में भेदभाव है। क्योंकि इन सारे आँकड़ों का सत्य यह है कि जिसके पास पैसे नहीं हैं, वो पिछड़ा है। कथित निचली जातियों में भी जिसके पास थोड़े पैसे होते हैं, वो अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेजते है, या शिक्षा को ले कर जागरूक होते हैं।

मुस्लिमों में जाति व्यवस्था

दूसरी बात यह है कि जिन्हें इस बात का भ्रम है कि इस्लाम में जातियाँ नहीं होतीं, वो डॉ. अम्बेडकर का लिखा और (अगर भारतीय लोगों की बात पर विश्वास न हो तो) हेनरी मायर्स एलियट, जॉन नैसफील्ड, विलियम क्रूक, डेनज़िल इब्बेटसन, हॉबर्ट होप रिस्ले आदि की तहरीर अवश्य पढ़ें। आपको पता चलेगा कि अशरफ़ कौन हैं, ऐलाफ़ कौन हैं, और अरज़ल किसे कहा जाता है। आपको पता चलेगा कि मतपरिवर्तन करने वाले हिन्दुओं को ऐलाफ कह कर हिकारत भरी निगाहों से क्यों देखा जाता है।

आपको जान कर आश्चर्य होगा कि चौदहवीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के राजनीतिक विचारक ज़ियाउद्दीन बरानी ने कहा था कि मोहम्मद के बेटों, यानी अशरफों को नीच पैदाइश वाले ऐलाफों से बेहतर सामाजिक ओहदा मिलना चाहिए। उसने यह नियम भी विकसित किया जहाँ मुस्लिमों को राजकीय ओहदों पर, अफसरशाही में, जाति के आधार पर प्रोन्नति और पदावनति (प्रमोशन और डिमोशन) का प्रावधान था।

ये नीच पैदाइश वाले ऐलाफ और अरज़ल हैं कौन? अशरफों में कौन आता है? 1960 में ग़ौस अंसारी बताते हैं कि अशरफ वो हैं जो कहते हैं कि वो तो विदेशी मूल के हैं जिनमें वो स्वयं को अफगानी, अरब, फारसी, तुर्क आदि बताते हैं। इसके नीचे हिन्दुओं की उच्च जाति से मजहब परिवर्तन कर आए लोग आते हैं जैसे कि मुस्लिम राजपूत। उसके बाद ‘साफ जातियों’ के कन्वर्ट आते हैं जिसमें दर्जी, धोबी, नाई, कुम्हार, कुंजरा, तेली आदि आते हैं। और सबसे नीचे ‘अछूत’ आते हैं। अशरफ को छोड़ कर नीचे के दो ‘ऐलाफ़’ कहलाते हैं, और सबसे नीचे वाले ‘अछूत’, मुस्लिम बनने के बाद भी अछूत ही रहते हैं, जिन्हें अरज़ल कहा जाता है। 1901 में सेंसस के सुपरिन्टेंडेंट ने अरज़ल में भानर, हलालखोर, हिजरा, कासबी, लालबेगी, मौगता, मेहतर आदि को रखा था।

एक्सप्रेस ने आखिर नौ साल पुराने आँकड़े उठा कर क्यों लिखा यह लेख? थोड़ी मेहनत कर लेते तो असली कहानी सामने आ जाती कि इस्लाम में जो अशरफ हैं, जो स्वयं को सीधा अफगानी और तुर्क मानते हैं, वो बेहतर कर रहे हैं। वो ओवैसी की तरह लंदन जा कर पढ़ रहे हैं और निचली जातियों के कन्वर्ट मुस्लिमों को हिन्दुओं के खिलाफ भड़का कर अपनी राजनीति चला रहे हैं। लेकिन इतना समय न तो एक्सप्रेस के पास है, न ही यह समुदाय स्वयं इस पर सोचना चाहता है।

ओवैसी की राजनीति और मजहब की जमीनी सच्चाई

ओवैसी की पूरी राजनीति इस्लाम के समर्थकों को इकट्ठा करने, एकमुश्त वोट देने और वो वोट भी अपने ही मजहब को देने की घोषित नीति पर आधारित है। मजहब का ध्रुवीकरण करते हुए ओवैसी ने हाल ही में हुए उपचुनावों में बिहार के मुस्लिम बहुल किशनगंज में एक सीट जीती, और महाराष्ट्र चुनावों में भी दो सीटें पाईं। यहाँ भी वोट पाने का एक ही मुद्दा था: इस्लाम।

इसलिए, हर समय मुस्लिम और इस्लाम के नाम की राजनीति करने वाले ओवैसी को अपने समुदाय के पिछड़ेपन का भार भारत पर नहीं फेंकना चाहिए। उसे अपने समुदाय के साथ होने वाली सभाओं में इस्लाम के समर्थकों से पूछना चाहिए कि उन्होंने अपनी बेहतरी के लिए, दुनिया के साथ चलने के लिए, क्या-क्या कदम उठाए हैं? क्या माता-पिता बच्चों को इलाके के मौलवियों की समझदारी के विपरीत, सरकारी या प्रायवेट स्कूलों में भेजना चाहते हैं?

आखिर हर सरकारी बात में उन्हें साजिश कियों नजर आती है? मेरे बगल के गाँव के लोगों ने कई बार पोलियो की दवा देने वालों को यह कह कर लौटा दिया था कि उसमें मुस्लिमों को नपुंसक बनाने वाली दवाई है! ये विचित्र सोच कहाँ से आती है कि हिन्दू बच्चे उस दो बूँद से नपुंसक नहीं होंगे, दूसरे मजहब विशेष वाले हो जाएँगे?

ओवैसी ने कभी यह सोचा है कि मदरसों में जो सीमित शिक्षा मिलती है, उसके आधार पर क्या मुस्लिमों को नौकरी मिलेगी? क्या वो मुख्यधारा का हिस्सा बनने को तैयार हैं? क्या मजहबी शिक्षा के साथ-साथ दुनिया के हर कोने में प्रचलित शिक्षा को मजहब स्वीकारेगा? या फिर वो आज भी गणित और विज्ञान को ‘शैतान’ की बातें मान कर आगे बढ़ने की आस लगाए रहेगा?

सत्य तो यह है कि कई बार मदरसे आतंकी तैयार करने की फैक्ट्री बन कर सामने आए हैं। वहाँ के मौलवी बच्चों का बलात्कार और यौन शोषण करते पाए गए हैं। हाल ही में कमलेश तिवारी हत्याकांड समेत कई मामले में मदरसों ने अपराधियों को छुपाया है, उन्हें संरक्षण दिया है। आखिर पंद्रह मिनट में हिन्दुओं को मिटाने की बात करने वाले कहाँ से पाते हैं ऐसी बेहूदी शिक्षा?

समस्या मजहब में है, समाधान भी वहीं से निकालो

अगर हिन्दुओं के बहुसंख्यक होने के कारण समुदाय विशेष में पिछड़ापन होता तो ये समझ में आता कि ओवैसी की बात तार्किक है, लेकिन ऐसा नहीं है। मजहब विशेष के पिछड़ेपन के पीछे एक अनकही सोच है जहाँ वो बाकियों से कट कर रहना पसंद करते हैं। इस समुदाय के लोग जिन मोहल्लों में रहते हैं, आप उनकी गलियाँ देखिए कि उसकी चौड़ाई कितनी है, वहाँ के बच्चे क्या पढ़ते हैं, कहाँ जाते हैं और क्या करते हैं।

अगर हिन्दुओं में मजहब विशेष को ले कर किसी भी तरह की नकारात्मकता है तो उसके लिए जिम्मेदार कौन है? आपको ‘वंदे मातरम‘ कहने में सकुचाहट होगी, आप ‘भारत माता की जय‘ नहीं बोलेंगे और आपको यह भी याद आता है कि आपको ‘मार्जिनलाइज’ किया जा रहा है। हाशिए पर यह मजहब स्वयं ही रहना चाहता है, क्योंकि इसके किसी नेता ने समस्याओं का समाधान लाने की कोशिश नहीं की, और भीतर से सुधार का आह्वान नहीं किया।

जहाँ समाज की कुरीति पर बात करनी हो वहाँ आपका पर्सनल लॉ सामने आ जाता है। ‘हलाला’ और ‘पॉलिगेमी’ जैसी बेकार और बेहूदी बातों को आप किस तर्क से डिफेंड करते हैं? क्या ये पिछड़ापन नहीं है कि अपनी बीवी को तीन बार तलाक बलने के बाद, अपने ही भाई, पिता या मौलवी के साथ सोने को मजबूर किया जाता है? अगर आज के दौर में ओवैसी को इन बातों पर ‘ये हमारा निजी मसला है’ की याद आती है, तो फिर तुम्हारा पूरा पिछड़ापन भी तुम्हारा निजी मसला ही है, खुद निपटो।

जब तक मजहब विशेष खुद सुधरना नहीं चाहेगा, तंग गलियों वाले मोहल्ले बनाता रहेगा, आतंकवाद पर चुप रहेगा, आतंकियों के जनाजे में टोपी लगा कर दुनिया को यह दिखाता रहेगा कि वो ही उनका आदर्श है, मदरसों की मजहबी शिक्षा के दायरे से बाहर नहीं झाँकेगा, उसे कोई राजनीति नहीं सुधार सकती।

राजनैतिक शक्ति तो लंदन के मेयर को भी मिली, जो कि इस्लाम की ही अनुयाई है, लेकिन वो उस शक्ति का प्रयोग कैसे कर रहा है? पाकिस्तान और बंग्लादेश में तो मुस्लिम ही सत्ता में हैं, उन्होंने क्या उखाड़ लिया वहाँ पर? हिन्दू अल्पसंख्यकों पर अत्याचार, जबरन मतपरिवर्तन से ले कर उन्हें इतना परेशान किया कि जनसंख्या घट कर पातालोन्मुख हो गई है। बर्मिंघम के पार्कों में नमाज पढ़ना और लंदन की गलियों में बुर्का मार्च ही अगर मुस्लिमों की राजनैतिक शक्ति का प्रतिफल है, तो ओवैसी को जान लेना चाहिए कि उससे कोई फायदा नहीं होने वाला।

अगर ओवैसी को लगता है कि सार्वजिनक जगहों पर अपने वर्चस्व का शक्ति प्रदर्शन सड़क, पार्क में नमाज पढ़ कर, या पाँच बार लाउडस्पीकरों से फुल साउंड पर अजान देने, हिन्दुओं के मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ने, कावड़ियों पर पत्थरबाजी करने, कमलेश तिवारी का गला हलाल कर देने और खुलेआम जान मारने की धमकी देने से मुस्लिमों का पिछड़ापन चला जाएगा, तो ओवैसी को यह जान लेना चाहिए कि पिछड़ापन ही तुम्हें ऐसी सोच रखने को मजबूर करता है।

समुदाय विशेष का शख्स जब यह समझ जाएगा कि शांतिपूर्ण तरीके से एक दूसरे के साथ रहना, स्वयं को जगतविजय करने की जबरदस्ती हेतु पैदा होने वाला न मानना, मजहबी किताबों के अलावा दूसरी किताबें भी पढ़ना, आतंकवाद पर मुखर हो कर उसकी निंदा करना, सामाजिक बुराइयों को समूल उखाड़ फेंकना बेहतर विकल्प है, न कि ‘ये तो हमारा निजी मसला है’ की चादर ओढ़ कर चादर को ही दुनिया समझना, तब उनका विकास स्वयं ही होगा।

इस मजहब के करोड़ों लोगों की सामूहिक सोच अभी तक भी आइसिस के रूप में ही दिखती है। चोरों और अपराधियों पर आँख मूँदने की बात, गौरक्षकों के हत्यारे पर चुप हो जाना, पत्थरबाजी को अपना संविधानप्रदत्त अधिकार मानना, आतंकवाद पर मौन साध कर अच्छा और बुरा मुस्लिम कहने लगना, बताता है कि आप मुद्दे को ले कर गंभीर होना तो छोड़िए, सुधरना चाहते ही नहीं हैं।

ओवैसी को अपने कैंसर के लिए दूसरों का स्वस्थ शरीर जिम्मेदार लगता है जैसे कि बाकी लोगों में समस्या कम है तो उन्होंने अपनी समस्या लोगों में पोलियो की दो बूँदों के जरिए पहुँचा दिया। कोई साजिश नहीं कर रहा तुम्हारे खिलाफ, किसी को मजहब विशेष के यहाँ होने से आपत्ति नहीं है। सैकड़ों साल से रह रहे हैं, आगे भी रहेंगे। लेकिन यह चाहोगे कि पूरी धरती पर ख़िलाफ़त आ जाए, सब लोग नमाज पढ़ने लगें, सारे लोग हलाल मांस खाएँ, किसी को लाउडस्पीकर पर से आती आवाज से आपत्ति न हो, तो वो नहीं होगा।

वो इसलिए नहीं होगा क्योंकि अभी के पोलिटिकली करेक्ट स्टेटमेंट की दौर से आगे का दौर वह होगा जहाँ हर देश इस्लामी आतंक को इस्लामी आतंक ही कहेगा। ये कह कर लोग झूठ नहीं बोलेंगे कि आतंक का मजहब नहीं होता क्योंकि आइसिस के झंडे पर जो लिखा है वो तुम्हारा ही मजहबी नारा है, बुरहान वनी, अफजल गुरु, याकूब जैसे आतंकियों के जनाजे में हिन्दू जालीदार टोपी लगा कर नहीं उतरता।

इस सत्य को स्वीकारो ओवैसी, नहीं स्वीकारोगे तो राजनैतिक शक्ति पाने में दशकों बीत जाएँगे। तुम मजहब विशेष से आशा करते हो कि वो अपने ही ‘मजहब’ को ही वोट दें, तो हिन्दू भी तो वही करेगा। फिर किस गणित के हिसाब से खुद को संसद या विधायिकाओं में बहुमत पाते देख रहे हो? ओह सॉरी! गणित से तुम्हारा क्या वास्ता, वो तो शैतानों का काम है न!

बिहार का वो शहर जहॉं पहली बार सीता ने की थी छठ पूजा, आज भी मौजूद हैं चरणों के निशान

लोकआस्था के महापर्व छठ को लेकर कई धार्मिक मान्यताएँ प्रचलित हैं। इनमें से एक यह भी है कि जनक नंदिनी सीता ने सबसे पहले छठ पूजा की थी। इसके बाद ही इस महापर्व की शुरुआत हुई। फिर धीरे-धीरे छठ बिहार सहित पूरे देश मे मनाया जाने लगा।

छठ व्रत के साथ कई मंदिरों और जगहों की महत्ता जुड़ी हुई है। इस कड़ी में एक नाम बिहार के मुंगेर का भी है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सीता ने पहली बार छठ पूजा बिहार के मुंगेर में गंगा तट पर की थी। इसके प्रमाण स्वरूप आज भी यहॉं अर्घ्य देते उनके चरण चिह्न मौजूद हैं। इस स्‍थान को वर्तमान में ‘सीता चरण मंदिर’ के नाम से जाना जाता है।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार मुंगेर में कभी सीता ने छ: दिनों तक रह कर छठ पूजा की थी। श्री राम जब 14 वर्ष वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे तो ब्राह्मण वध के पाप से मुक्त होने के लिए ऋषि-मुनियों के आदेश पर राजसूय यज्ञ करने का फैसला लिया। इसके लिए मुग्दल ऋषि को आमंत्रण दिया गया था लेकिन मुग्दल ऋषि ने भगवान राम एवं सीता को अपने ही आश्रम में आने का आदेश दिया।

ऋषि की आज्ञा पर भगवान राम एवं सीता स्वयं यहाँ आए और उन्हें इसकी पूजा के बारे में बताया गया। मुग्दल ऋषि ने सीता को गंगाजल छिड़क पवित्र किया एवं कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। यहीं रह कर सीता ने छ: दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी।

बताया जाता है कि रावण एक ब्राह्मण था इसलिए उसके वध से राम को ब्रह्म हत्या का पाप लगा था। इस ब्रह्म हत्या से पापमुक्ति के लिए अयोध्या के कुलगुरु मुनि वशिष्ठ ने मुगदलपुरी (वर्तमान में मुंगेर) में ऋषि मुद्गल के पास राम-सीता को भेजा। भगवान राम को ऋषि मुद्गल ने वर्तमान कष्टहरणी घाट में ब्रह्महत्या मुक्ति यज्ञ करवाया और माता सीता को अपने आश्रम में ही रहने का आदेश दिया।

चूँकि महिलाएँ यज्ञ में भाग नहीं ले सकती थीं, इसलिए उन्‍होंने आश्रम में रहकर ऋषि मुद्गल के निर्देश के अनुसार सूर्योपासना का छठ व्रत किया था। व्रत के दौरान माता सीता ने अस्ताचलगामी सूर्य को पश्चिम दिशा में और उगते सूर्य को पूरब दिशा में अर्घ्‍य दिया था। आज भी मंदिर के गर्भ गृह में पश्चिम और पूरब दिशा की ओर माता सीता के पैरों के निशान मौजूद हैं। इसके साथ ही वहाँ पर सूप, डाला एवं लोटा के निशान भी हैं।

इस मंदिर का गर्भ गृह साल के छह महीने गंगा के गर्भ में समाया रहता है। गंगा का जल स्तर घटने पर 6 महीने ऊपर रहता है। इसके बावजूद उनके पदचिह्न धूमिल नहीं पड़े हैं। ग्रामीणों का कहना है कि दूसरे प्रदेशों से भी लोग पूरे साल यहाँ पर मत्था टेकने आते हैं। ऐसा माना जाता है कि मंदिर के प्रांगण में छठ करने से लोगों की मनोकामना पूर्ण होती है।

अयोध्या: राम मूर्ति और पर्यटन विकास के लिए ₹447 करोड़, 61 हेक्टेयर जमीन खरीदेगी योगी सरकार

अयोध्या में भगवान राम की भव्य मूर्ति लगाने और पर्यटन विकास के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने करीब 447 करोड़ रुपए के बजट को मंजूरी दी है। यह मूर्ति गुजरात में स्थापित सरदार पटेल की स्टेच्यू ऑफ यूनिटी की तर्ज पर बनेगी। भगवान राम की यह मूर्ति विश्व की सबसे ऊँची मूर्ति होगी। अयोध्या को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर धार्मिक पर्यटन केन्द्र के तौर पर स्थापित करने की कवायद के तहत उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने शुक्रवार (नवंबर 1, 2019) को हुई कैबिनेट की बैठक में इससे संबंधित प्रस्ताव को मंजूरी दी।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में शुक्रवार को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में सात प्रस्तावों पर मुहर लगाई गई। प्रदेश सरकार के प्रवक्ता सिद्धार्थनाथ सिंह और श्रीकांत शर्मा ने संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में बताया कि अयोध्या को अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित किया जाएगा। श्रीकांत शर्मा ने बताया कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम की नगरी अयोध्या से देश और दुनिया के करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी है।

उन्होंने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि अयोध्या में पर्यटन विकास एवं सौंदर्यीकरण के लिए भगवान राम की भव्य प्रतिमा, उन पर आधारित डिजिटल म्यूजियम, इंटरप्रेटेशन सेंटर, लाइबेरी, पार्किंग, फूड प्लाजा आदि की स्थापना हेतु 61.387 हेक्टेयर भूमि की खरीद के लिए 447.46 करोड़ रुपए के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है। इसमें से 100 करोड़ रुपए चालू वित्तीय वर्ष में जारी किए जाएँगे।

दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर का स्क्रीनशॉट

शर्मा ने बताया कि भगवान राम की प्रतिमा गुजरात में लौह पुरूष सरदार बल्लभ भाई पटेल की स्टेच्यू ऑफ यूनिटी से भी ऊँची होगी। इसके निर्माण के लिए सीएसआर फंड की भी मदद ली जाएगी। बता दें कि सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा गुजरात में स्थित है। इसकी ऊँचाई 182 मीटर (597 फीट) है। भगवान राम की मूर्ति इससे भी ऊँची होगी। उल्लेखनीय है कि इस परियोजना के लिए 200 करोड़ रुपए का अनुमोदन पहले ही किया गया था।

व्हाट्सएप: मोदी सरकार सख्त, आईटी मंत्रालय ने पूछा- जासूसी के बारे में क्यों नहीं बताया

व्हाट्सएप के जरिए डाटा लीक पर केंद्र सरकार सख्त रुख दिखाया है। आईटी मंत्रालय ने इस संबंध में व्हाट्सएप से जवाब मॉंगा है। मंत्रालय ने इस बात पर हैरानी जताई है कि उसे स्पाइवेयर अटैक की जानकारी नहीं दी गई। वहीं, व्हाट्सएप ने बयान जारी कर कहा है कि यूजर्स की निजता और सुरक्षा उसकी प्राथमिकता है। मई में उसने सुरक्षा से जुड़ा मामला जल्दी ही सुलझा लिया था और इसे लेकर भारत सरकार के अधिकारियों को सूचित किया था।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि व्हाट्सएप ने पेगासस या ब्रीच की सीमा का उल्लेख किए बगैर मई में सरकारी एजेंसी CERT-IN को जानकारी दी थी। साझा की गई जानकारी केवल एक तकनीकी भेद्यता के बारे में थी और इस तथ्य से कोई लेना-देना नहीं था कि भारतीय यूज़र्स की गोपनीयता से समझौता किया गया था।

व्हाट्सएप के प्रवक्ता ने कहा कि हम निजता की सुरक्षा को लेकर भारत सरकार की चिंता से सहमत हैं। इसलिए कंपनी ने मामले की गंभीरता को समझते हुए कठोर क़दम उठाए हैं। हम पूरी कोशिश कर रहे हैं कि किसी भी यूजर्स के डेटा के साथ किसी तरह का खिलवाड़ ना हो। व्हाट्सएप यूजर्स के मैसेज की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने सूत्रों के हवाले से लिखा कि व्हाट्सएप अधिकारियों ने पिछले पाँच महीनों में भारत सरकार से मुलाकात की है। यह घटना अगस्त की है। बावजूद इसके व्हाट्सएप ने उस समय सूचित नहीं किया। भारत के बाद अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया भी व्हाट्सअप पर दबाव बना रहे हैं।

दरअसल, भारत सरकार को जासूसी मामले में व्हाट्सएप पर साज़िश कराने का शक है। सूत्र के मुताबिक़, टेलीकॉम मंत्रालय लगातार व्हाट्सएप से मैसेज के सोर्स सुरक्षा एजेंसियों को डिस्क्लोज करने की माँग कर रहा है , लेकिन हर बार प्राइवेसी का हवाला देकर व्हाट्सएप ने सरकार की बात नहीं मानी। बता दें कि व्हाट्सएप का स्वामित्व फेसबुक के पास है।

व्हाट्सएप के ज़रिए भारत के कुछ पत्रकारों और हस्तियों की जासूसी की खबर ने भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया है। व्हाट्सएप ने इस बात की पुष्टि की है कि इजरायल की साइबर खुफिया कंपनी एनएसओ ग्रुप की ओर से भारत के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को स्पाइवेयर द्वारा टारगेट कर उनकी जासूसी की गई।

इजरायली कंपनी के द्वारा Pegasus नाम के स्पाइवेयर से भारतीय पत्रकारों को निशाना बनाया गया, जिसमें 2 दर्जन से ज्यादा पत्रकार, वकील और हस्तियाँ शामिल हैं। अगर दुनियाभर में इस आँकड़े को देखें तो ये नंबर करीब 1400 तक जाता है। अब Pegasus के दस्तावेज जो सामने आ रहे हैं, उससे ये खुलासा हो रहा है कि ये जासूसी सिर्फ व्हाट्सएप तक सीमित नहीं है।

इन दस्तावेजों में दावा किया गया है कि Pegasus स्पाइवेर का खेल व्हाट्सएप के अलावा सेल डाटा, स्काइप, टेलिग्राम, वाइबर, एसएमएस, फोटो, ईमेल, कॉन्टैक्ट, लोकेशन, फाइल्स, हिस्ट्री ब्राउज़िंग और माइक-कैमरा तक को अपने कब्जे में ले सकता है। इस स्पाइवेर के द्वारा टारगेट किए गए फोन नंबर के कैमरा, माइक के डाटा को इकट्ठा किया जा सकता है। कागजों के मुताबिक, इसके लिए सिर्फ स्पाइवेर को इन्स्टॉल करने की जरूरत है, जो कि सिर्फ फ्लैश SMS से भी हो सकता है।

कमलेश तिवारी मर्डर: हत्यारों को पिस्टल देने वाला यूसुफ खान कानपुर से गिरफ्तार

हिंदू समाज पार्टी के नेता कमलेश तिवारी के हत्यारों को पिस्टल उपलब्ध कराने के आरोप में एक व्यक्ति की गिरफ्तारी हुई है। आरोपित का नाम यूसुफ खान है। यूपी और गुजरात एटीएस ने संयुक्त कार्रवाई कर उसे कानपुर से दबोचा। बताया जा रहा है कि हत्यारों को सूरत में उसने ही पिस्टल मुहैया करवाई थी।

यूसुफ खान मूल रूप से यूपी के फतेहपुर का रहने वाला है। वह पिछले कुछ समय से गुजरात में रह रहा था। यूसुफ को शुक्रवार (नवंबर 1, 2019) शाम 6 बजे कानपुर के घंटाघर से गिरफ्तार किया गया। उत्तर प्रदेश एटीएस ने अपने बयान में बताया कि 18 अक्टूबर को कमलेश तिवारी की दो लोगों ने हत्या कर दी थी। हत्या के मुख्य आरोपित अशफाक और मोइनुद्दीन उर्फ फरीद पठान पहले ही गिरफ्तार किए जा चुके हैं।

बता दें कि 18 अक्टूबर को हिंदू महासभा के पूर्व नेता और हिंदू समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कमलेश तिवारी दो बदमाशों ने लखनऊ में बेरहमी से हत्या कर दी थी। दोनों बदमाश भगवा कपड़े पहने हुए थे और मिठाई के डिब्बे में पिस्टल व चाकू छिपाकर लाए थे। दोनों नाका स्थित खुर्शेदबाग की तंग गलियों में स्थित कमलेश के घर पहुँचे। पहली मंजिल स्थित पार्टी दफ्तर में पहले उनकी गर्दन पर गोली मारी थी। फिर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर गला रेत दिया था।

इससे पहले गुजरात एटीएस ने कमलेश तिवारी की हत्या के मामले में मौलाना मोहसिन शेख, फैजान, और राशिद अहमद पठान को सूरत से गिरफ्तार किया था। संदिग्ध हत्यारों के मददगार वकील नावेद के साथी कामरान को बरेली से गिरफ्तार किया था। एटीएस के मुताबिक कामरान ने हत्यारों को नेपाल जाने में मदद की थी।

इस्लाम के नाम पर सत्ता हथियाने के दिन लद गए, ये नया पाकिस्तान है: इमरान खान

मौलाना फजलुर रहमान की चेतावनी के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी पलटवार किया है। उन्होंने कहा है कि इस्लाम पर सत्ता हथियाने के दिन लद चुके हैं। गिलगिट-बाल्टिस्तान में एक रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने यह बात कही। उन्होंने कहा कि इस्लामाबाद में ‘आजादी मार्च’ के लिए जुटने वाले लोगों को जितने खाने की जरूरत होगी वे मुहैया कराएँगे। लेकिन, उनके नेता उनसे किसी नरमी की उम्मीद न रखें।
मौलाना फजलुर रहमान का आजादी मार्च 27 अक्तबूर को शुरू हो शुक्रवार को इस्लामाबाद पहुॅंचा था। उन्होंने इमरान से दो दिन में इस्तीफा देने या गंभीर नतीजे भुगतने की चेतावनी दी है।

इसके जवाब में इमरान ने कहा,

“वे दिन बीत गए हैं, जब सत्ता हासिल करने के लिए इस्लाम का इस्तेमाल किया जाता था। यह एक नया पाकिस्तान है। आप जब तक आप चाहते हैं, तब तक प्रदर्शन करें। जब आपका भोजन खत्म हो जाएगा, हम और भिजवा देंगे। लेकिन हम आपको एक एनआरओ नहीं देंगे।”

उनकी यह टिप्पणी पीएमएल-एन के अध्यक्ष शहबाज शरीफ के इस्लामाबाद में आजादी मार्च में शामिल होने से कुछ समय पहले आई थी। डॉन की ख़बर के अनुसार, आज़ादी मार्च पर खेद जताते हुए उन्होंने कहा, “हम आपकी आज़ादी का जश्न मना रहे हैं जबकि एक आज़ादी मार्च इस्लामाबाद में जारी है। वे किससे आज़ादी हासिल करना चाहते हैं?” प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा, “मैं चाहता हूँ कि मीडिया वहाँ जाए और उन लोगों से पूछें, जिन्हें वे खुद से मुक्त करना चाहते हैं।” उन्होंने कहा कि उनके सभी विरोधी उनके विचारों और उद्देश्यों से निराश हैं।

उन्होंने कहा, “जब मौलाना फ़ज़लुर रहमान वहाँ (इस्लामाबाद) हैं तो हमें विदेशी साज़िशों की कोई ज़रूरत नहीं है। भारतीय मीडिया जिस तरह से इस मार्च का जश्न मना रहा है, उससे लगता है कि रहमान खुद एक भारतीय हैं।” प्रधानमंत्री ने वोटों के बँटवारे के लिए इस्लाम के इस्तेमाल पर अफ़सोस जताया। उन्होंने कहा, “युवाओं को गुमराह किया जाएगा। वे सोचेंगे कि वह (मौलाना) इस्लाम के कार्यवाहक हैं। इस्लाम में आने के बजाय, उन्हें देखकर लोग धर्म छोड़ देंगे।”

इमरान ने कहा, “यह सोशल मीडिया का युग है। लोगों को पता है कि आपके बयानों में कोई दम नहीं है। लोगों को अभी भी याद है कि पीपीटी और पीएमएल-एन ने क्या कहा था जब पीटीआई ने 2014 में एक धरना दिया था।”

प्रधानमंत्री ने यह टिप्पणी भी की कि प्रदर्शनकारियों में ​​असफ़ंदरियार (वली) भी हैं, जो हर समय JUI-F के खिलाफ बोलते थे। प्रधानमंत्री ने यह भी पूछा कि पीपीपी नेता बिलावल भुट्टो-जरदारी जो आमतौर पर खुद को प्रगतिशील बताते हैं वे कैसे एक दक्षिणपंथी इस्लामवादी पार्टी के साथ हाथ मिला रहे हैं। उन्होंने कहा, “बिलावल, जो खुद को उदारवादी कहते हैं, जलसा में भी शामिल हो गए हैं। उनके बारे में केवल ‘उदार’ बात यह है कि ऐसा लगता है  वह उदारवादी रूप से भ्रष्ट है।”

इमरान खान ने इस्लामाबाद में एकत्रित सभी दलों को बताना चाहिए कि उनका असली मकसद क्या है। वे डरे हुए हैं। उन्हें भय हो रहा है कि उनके भ्रष्टाचार के मामले सबके सामने आ जाएँगे। इमरान ने कहा कि उन्होंने नया पाकिस्तान बनाने की कसम खाई है। वे इसे ऐसा मुल्क नहीं बनने देंगे, जहॉं चोर महल में रह सकें। गलत करने वाले जेल जाएंगे और उनको देख कर दूसरा ऐसा करने से डरेंगे।