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अयोध्या पर फैसले से पहले राणा अयूब ने उगला जहर, कहा- आज जो सत्ता में हैं, उन्होंने ही बाबरी गिराया था

वाशिंगटन पोस्ट की ग्लोबल ओपिनियंस राइटर राणा अयूब ने अयोध्या मामले को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की, जिसके बाद यूपी पुलिस ने उन्हें चेतावनी दी। हिन्दुओं व भारत के ख़िलाफ़ अक्सर बयान देने वाली राणा अयूब जम्मू-कश्मीर को लेकर भी ज़हर उगलती रहती हैं। अयोध्या विवाद पर फैसला आने से पहले उन्होंने ट्वीट किया:

“शनिवार (नवंबर 9, 2019) का दिन भारत के लिए बहुत बड़ा दिन होगा। बाबरी मस्जिद भारतीय मुस्लिमों की आस्था का स्मारक था। इसे दिसंबर 6, 1992 को उन्हीं लोगों ने ध्वस्त कर दिया, जो आज सत्ता में हैं। इसने मेरी ज़िंदगी बदल दी। इस घटना ने मेरे जैसी करोड़ों मुस्लिमों की ज़िंदगी बदल दी, जिन्हें रातोंरात बेदखल कर दिया गया। मुझे उम्मीद है कि मेरा देश फ़ैसले के दिन मुझे निराश नहीं करेगा।”

राणा अयूब ने इस ट्वीट में सीधा-सीधा आरोप लगाया कि आज जो लोग सत्ता में हैं, उन्होंने ही मस्जिद को ध्वस्त किया था। इसके बाद अमेठी पुलिस ने उन्हें तुरंत अपना ट्वीट डिलीट करने को कहा। अमेठी पुलिस ने राणा अयूब से कहा कि उन्होंने एक राजनीतिक टिप्पणी की है। साथ ही पुलिस ने कहा कि अगर अयूब ने तुरंत अपना ट्वीट
डिलीट नहीं किया तो उनके ख़िलाफ़ वैधानिक कार्रवाई की जाएगी। हालॉंकि बाद में अमेठी पुलिस ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया।

अमेठी पुलिस ने राणा अयूब को फटकारा

राणा अयूब अक्सर अपने भारत-विरोधी रुख का प्रदर्शन करते रहती हैं। हाल ही में उन्होंने दावा किया था कि भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर में सैकड़ों बच्चों को गिरफ़्तार कर रखा है। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया था कि सुरक्षा बलों ने एक 92 वर्षीय वृद्ध महिला पर हमला किया। राणा अयूब गैंग के अन्य पत्रकारों ने आरोप लगाया कि अयूब के उपर्युक्त ट्वीट के कारण अमेठी पुलिस एक पत्रकार को धमकाने का कार्य कर रही है। जॉय अयूब ने लिखा कि राणा अयूब के इस ट्वीट के जवाब में नरसंहारक प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं।

वहीं, फ़ाय डिसूजा ने पुलिस से पूछा कि उक्त ट्वीट के माध्यम से राणा अयूब ने आईपीसी की कौन सी धारा का उल्लंघन किया है? उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अयोध्या पर फ़ैसले के दिन डिबेट करने वाले सभी पत्रकारों को सावधान रहना चाहिए। ‘फॉरेन पॉलिसी’ के मैनेजिंग एडिटर रवि अग्रवाल ने लिखा कि पुलिस राणा अयूब को चुप कराने की कोशिश कर रही है। रेबेका विन्सेंट ने तो ट्विटर के सीईओ जैक को टैग कर के उन्हें यूपी पुलिस को रोकने को कहा। ताज़ा सूचना के अनुसार, अमेठी पुलिस ने ट्विटर पर राणा अयूब को ब्लॉक कर दिया है। हालाँकि, इसका कारण स्पष्ट नहीं हो सका है।

राणा अयूब को अमेठी पुलिस ने किया ब्लॉक

गौरतलब है कि अयोध्या विवाद में आज (9 नवंबर 2019) सुबह 10:30 बजे सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुनाएगा। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली संविधान पीठ ने 16 अक्टूबर को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था। पाँच सदस्यीय पीठ ने छह अगस्त से लगातार 40 दिन इस मामले की सुनवाई की थी। पीठ में मुख्य न्यायाधीश के अलावा जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एसए नजीर शामिल हैं।

अयोध्या: अंग्रेज जज ने 356 साल पुरानी गलती नहीं सुधारी, 491 साल पुरानी भूल सुधार का वक्त आया

अयोध्या विवाद में फैसले की घड़ी आ गई है। आज (9 नवंबर 2019) सुबह 10:30 बजे सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुनाएगा। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली संविधान पीठ ने 16 अक्टूबर को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था। पाँच सदस्यीय पीठ ने छह अगस्त से लगातार 40 दिन इस मामले की सुनवाई की थी। पीठ में मुख्य न्यायाधीश के अलावा जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एसए नजीर शामिल हैं।

शीर्ष अदालत में चली सुनवाई के दौरान जो तथ्य उभरकर सामने आए थे उससे राम मंदिर के हक में फैसला आने की उम्मीद है। ऐसा हुआ तो यह पहला मौका नहीं होगा जब विवादित ढॉंचे पर हिंदुओं का हक होने के दावे पर मुहर लगेगी। हाई कोर्ट ने भले अपने फैसले में जमीन को तीन हिस्सों में बॉंट दिया था, लेकिन विवादित स्थल को रामजन्भूमि ही माना था। अंग्रेजों के जमाने में भी अदालत ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने की बात मानी थी, लेकिन इस घटना के 356 साल पुरानी होने का हवाला देकर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था।

विवादों का सिलसिला

इस पूरे विवाद की शुरुआत 1528 से होती है जब बाबर के सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या में भगवान राम के जन्मस्थान पर ​मस्जिद का निर्माण करवाया। हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में बताया है कि 1528-1731 के बीच इस स्थान पर कब्जे को लेकर हिंदू और मुगलों के बीच 64 बार संघर्ष हुए। फैजाबाद अदालत के मुलाजिम हफीजुल्ला ने 1822 में सरकार को भेजी एक रिपोर्ट में भी कहा था कि राम के जन्मस्थान पर मस्जिद बनवाई गई है। दोनों मजहबों के बीच तनाव को देखते हुए 1859 में ब्रिटिश हुकूमत ने इस जगह की घेराबंदी कर दी। अंदर का हिस्सा नमाज के लिए और बाहर का हिस्सा हिंदुओं को पूजा के लिए दिया गया।

अदालत में विवाद

अदालत में इस जगह मंदिर बनवाने की माँग पहली बार 15 जनवरी 1885 को पहुॅंची। महंत रघुबर दास ने केस फाइल किया। उन्होंने राम चबूतरा पर एक मंडप बनाने की इजाजत माँगी। 24 फरवरी 1885 को फैजाबाद की जिला अदालत ने उनकी अर्जी यह कहते हुए खारिज कर दी कि वह जगह मस्जिद के बेहद करीब है। लेकिन, जज ने अपने फैसले में माना कि चबूतरे पर रघुबर दास का कब्जा है। उन्हें एक दीवार उठाकर चबूतरे को अलग करने को कहा। इसके बाद महंत रघुबर दास ने 17 मार्च 1886 को फैजाबाद के जिला जज कर्नल एफईए कैमियर की अदालत में अपील दायर की। कैमियर ने अपने फैसले में कहा, “मस्जिद हिंदुओं के पवित्र स्थान पर बनी है। पर अब देर हो चुकी है। 356 साल पुरानी गलती को सुधारना इतने दिनों बाद उचित नहीं होगी। यथास्थिति बनाए रखें।”

प्रकट हुए रामलला

22-23 दिसंबर 1949 की दरम्यानी रात विवादित ढाँचे में रामलला की मूर्ति प्रकट हुई। मामला अदालत में पहुॅंचा और सरकार ने इलाके को विवादित घोषित कर इमारत की कुर्की के आदेश दिए। लेकिन, पूजा-अर्चना जारी रही। इस घटना के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने मूर्ति हटाने का निर्देश प्रदेश की तत्कालीन सरकार को दिया था। लेकिन, फैजाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी केकेके नायर के अड़ने के कारण ऐसा नहीं हो पाया।
ढॉंचे में चोरी-छिपे मूर्ति रखने का दावा करते हुए सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने 1961 में याचिका दायर की। उसने कहा कि मस्जिद और उसके आसपास की जमीन एक कब्रगाह है, जिस पर उसका दावा है।

काले बंदर की प्रेरणा से आदेश, 40 मिनट में तामील

फैजाबाद की अदालत ने 1 फरवरी 1986 को इमारत का ताला खोलने का आदेश दिया। हेमंत शर्मा ‘युद्ध में अयोध्या’ में लिखते हैं कि शाम के 4:40 में जज ताला खोलने का आदेश देते हैं और शाम 5:20 मिनट पर ताला खुल गया। जिला जज कृष्णमोहन पांडेय ने यह फैसला वकील उमेश चंद्र पांडेय की अर्जी पर दिया था। बकौल उमेश चंद्र पांडेय, “हमें इस बात का अंदाजा नहीं था कि सब कुछ इतनी जल्दी हो जाएगा।” जज कृष्णमोहन पांडेय ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, “जिस रोज मैं ताला खोलने का आदेश लिख रहा था, मेरी अदालत की छत पर एक काला बंदर पूरे दिन फ्लैग पोस्ट को पकड़कर बैठा रहा। जो फैसला सुनने अदालत में आए थे, उस बंदर को फल और मूॅंगफली देते रहे पर बंदर ने कुछ नहीं खाया। चुपचाप बैठा रहा। फैसले के बाद जब मैं घर पहुॅंचा तो उस बंदर को अपने बरामदे में बैठा पाया। मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने उसे प्रणाम किया। वह कोई दैवीय ताकत थी।” उनके फैसले के खिलाफ 3 फरवरी 1986 को हाशिम अंसारी ने हाई कोर्ट में अपील की। हाई कोर्ट ने 14 अगस्त 1989 को यथास्थिति बरकरार रखने के निर्देश दिए।

ताला किसके आदेश से लगा था?

‘युद्ध में अयोध्या’ के मुताबिक ताला किसके आदेश से और कब लगा था यह किसी को पता नहीं। इस बात का कहीं कोई आदेश भी नहीं मिलता। स्थानीय लोगों की मानें तो ताला 1971 में लगा था। पूरे मामले का कानूनी पहलू यह था कि यह जगह एक ‘रिसीवर’ के अधिकार क्षेत्र में था। 1949 में अदालत ने संपत्ति को कुर्क कर प्रिया दत्त राम को ‘रिसीवर’ बनाया था। 1971 में उनकी मौत हो गई। इसके बाद नए ‘रिसीवर’ और निर्मोही अखाड़े के बीच विवाद खड़ा हो गया। पुलिस ने दखल दिया और ताला लगाकर चाबी अपने पास रख ली। तब भी एक दरवाजा भोग लगाने और प्रार्थना के लिए हमेशा खुला रहता था। यानी यह जगह कभी पूरी तरह ताले में बंद ही नहीं रही।

हाई कोर्ट ने माना विवादित स्थल ही रामजन्मभूमि

अप्रैल 2002 में हाई कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने इस बात पर सुनवाई शुरू की कि विवादित स्थल पर किसका अधिकार है। 30 सितंबर 2010 को वह ऐतिहासिक फैसला आया जिसने काफी हद तक इस विवाद की तस्वीर और तकदीर दोनों साफ कर दी। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने विवादित स्थल को रामजन्मभूमि घोषित किया। 2.77 एकड़ जमीन को तीन हिस्सों में बाँट दिया। जहाँ रामललला की मूर्ति स्थापित है, वह जगह रामलला विराजमान को मिली। राम चबूतरा और सीता रसोई वाला दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को दिया। तीसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को मिला। फैसले में स्पष्ट रूप से कहा गया कि विवादित ढाँचा ही भगवान राम का जन्मस्थान है।

फैसले का आधार

हाई कोर्ट ने फैसले का आधार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट को माना। इसके अलावा भगवान राम का जन्मस्थान होने की मान्यता को भी आधार माना गया। हाई कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को खुदाई का आदेश 2003 में दिया था। खुदाई के बाद एएसआई ने 22 सितंबर 2003 को अपनी 574 पन्नों की रिपोर्ट हाई कोर्ट को सौंपी। हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ और ‘अयोध्या का चश्मदीद’ में इसका विस्तार से ब्यौरा दिया है। वे लिखते हैं, “एएसआई ने कुल 90 खाइयाँ खोदीं। पूरे क्षेत्र को पॉंच हिस्सों में बॉंटा। इनमें पूर्वी, दक्षिणी, पश्चिमी, उत्तरी क्षेत्र और उभरा हुआ प्लेटफॉर्म शामिल था। सभी क्षेत्रों में क्रमवार खुदाई हुई, जिससे ढॉंचों की प्रकृति और उसकी सांस्कृतिकता का अंदाजा लगे। जो अवशेष मिले, उससे साबित होता था कि वहाँ 11वीं शताब्दी का हिंदू मंदिर था।”

खुदाई के दौरान निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर सवाल नहीं उठे, इसके भी बकायदा इंतजाम किए गए थे। हेमंत शर्मा ने इसका ब्यौरा देते हुए लिखा है, “समूची खुदाई और ढॉंचों के अभिलेखीकरण की पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की गई। खुदाई न्यायिक पर्यवेक्षकों, वकीलों और संबंधित पक्षों या उनके नामित व्यक्तियों की मौजूदगी में संपन्न हुई। खुदाई में पारदर्शिता हो, इस खातिर सारी उत्खनित सामग्री दोनों पक्षों की मौजूदगी में ही सील की जाती थी। इसे उसी दिन फैजाबाद के कमिश्नर की ओर से उपलब्ध कराए गए स्ट्रांग रूम में रखा जाता था। हर रोज इस स्ट्रांग रूम को बंद करने के बाद सील किया जाता था।”

दिसंबर 2010 में अखिल भारतीय हिंदू महासभा और सुन्नी वक्फ बोर्ड ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मई 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए यथास्थिति बनाए रखने को कहा। शीर्ष अदालत ने 21 मार्च 2017 को मामले को संवेदनशील बताते हुए सभी पक्षों से एक राय बनाकर अदालत से बाहर समाधान ढूॅंढ़ने को कहा। सुप्रीम कोर्ट ने 14 मार्च 2018 को सभी 32 हस्तक्षेप अर्जियों को खारिज कर दिया। इसके बाद इस मामले में वही पक्षकार बचे जो इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले में शामिल थे। मध्यस्थता प्रक्रिया नाकाम होने के बाद 6 अगस्त 2019 से मामले की रोजाना सुनवाई शुरू हुई।

अब वह घड़ी आ गई है जिसका देश को दशकों से इंतजार है। शीर्ष अदालत के फैसले से पता चल जाएगा कि रामलला का वनवास खत्म होता है या नहीं!

मेरी अंतिम इच्छा है कि मरने से पहले इस मामले को अंजाम तक पहुँचा दूँ: रामलला के 92 वर्षीय वकील

अगर आप अदालती कार्यवाहियों का हिस्सा रहे हैं या फिर आपने यह व्यवस्था देखी है तो आपको पता होगा कि वकील खड़े होकर बहस करते हैं। कम से कम फ़िल्मों में तो आपने देखा ही होगा। सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या विवाद पर चली 40 दिन की सुनवाई के दौरान रामलला विराजमान की तरफ से पैरवी कर रहे थे के पराशरण। बहस के दौरान कई ऐसे मौके आए जब उन्होंने अपनी दलीलों से मुस्लिम पक्षकारों को पस्त कर दिया।

सुनवाई के दौरान एक दिन मुख्य न्यायाधीश ने पराशरण से पूछा, “क्या आप बैठ कर दलीलें पेश करना चाहेंगे?” लेकिन, उन्होंने कहा, “मिलॉर्ड आप बहुत दयावान हैं लेकिन वकीलों की परंपरा रही है कि वे सुनवाई के दौरान खड़े होकर दलीलें पेश करते रहे हैं और मैं इस परम्परा से लगाव रखता हूँ।” सीजेआई द्वारा इस सवाल को पूछने की वजह थी पराशरण की उम्र। अदालत में घंटों खड़े होकर दलील देने वाले पराशरण 92 साल के हैं।

तमिलनाडु के अधिवक्ता जनरल रहे पराशरण के अनुभवों के बारे में अंदाजा लगाना हो तो जान लीजिए कि वह इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में ही भारत के अटॉर्नी जनरल रह चुके हैं। हालाँकि, 2016 के बाद पराशरण अदालती कार्यवाहियों में कम ही दिखते हैं और और चुनिन्दा मामलों में ही अदालत जाते हैं। चेन्नई से दिल्ली तक के इस सफ़र में उन्होंने न जाने कितने अच्छे-बुरे दौर देखे।

उन्होंने सबरीमाला मंदिर मामले में भी पैरवी की थी। उन्हें हिंदुत्व का विद्वान माना जाता है। 2012 से 2018 तक राज्यसभा सांसद रह चुके पराशरण 70 के दशक से ही अधिकतर सरकारों के फेवरिट वकील रहे हैं। धार्मिक पुस्तकों का उन्हें इतना ज्ञान है कि वह अदालत में बहस के दौरान भी उनका जिक्र करते रहते हैं। मद्रास हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजय किशन कॉल के शब्दों में “पराशरण भारतीय वकालत के पितामह हैं जिन्होंने बिना धर्म से समझौता किए भारतीयों के लिए इतना बड़ा योगदान दिया।”

पराशरण ने सबरीमाला मंदिर विवाद के दौरान महिलाओं की एंट्री की अनुमति न दिए जाने के लिए पैरवी की थी। उन्होंने श्रद्धालुओं की राय अदालत में अपने मजबूत दलीलों के साथ रखी। राम सेतु मामले में तो दोनों ही पक्षों ने उन्हें अपनी साइड करने के लिए सारे तरकीब आजमाए लेकिन धर्म को लेकर संजीदा रहे पराशरण ने रामसेतु सरकार के ख़िलाफ़ पैरवी करना उचित समझा। ऐसा उन्होंने सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट से रामसेतु को बचाने के लिए किया। उन्होंने अदालत में कहा, “मैं अपने श्रीराम के लिए इतना तो कर ही सकता हूँ।“

के पराशरण के पिता वेदों के विद्वान थे, अतः कहा जा सकता है कि ये संस्कार उन्हें विरासत में मिले हैं, जिसे उन्होंने एक नया आयाम दिया। बाबरी मस्जिद पक्ष के वकील राजीव धवन को अदालत की रोजाना सुनवाई से दिक्कतें थीं और उन्होंने प्रतिदिन सुनवाई न करने की अपील की थी, जिसे अदालत ने ठुकरा दिया था। लेकिन, क्या आपको पता है इस मामले को लेकर पराशरण का क्या कहना है? वे कहते हैं, “यह मेरी अंतिम इच्छा है कि मरने से पहले मैं इस मामले को अंजाम तक पहुँचा दूँ।“

अयोध्या: वामपंथी इतिहासकारों के दावों को सुप्रीम कोर्ट ने सबूत मानने से कर दिया था इनकार

दशकों पुराने अयोध्या विवाद पर शनिवार (9 नवंबर 2019) को सुप्रीम कोर्ट फैसला सुनाएगा। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली संविधान पीठ ने 16 अक्ट्रबर को इस मामले की सुनवाई पूरी की थी। पीठ ने छह अगस्त से लगातार 40 दिन इस मामले में सुनवाई की। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी से उन वामपंथी इतिहासकारों को तगड़ा झटका लगा था, जिन्होंने इतिहास को अपनी जागीर समझ कर न जाने क्या-क्या लिखा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘प्रख्यात इतिहासकारों’ द्वारा लिखी गई चीजों को सिर्फ़ उनका विचार माना जा सकता है, कोई सबूत नहीं। इन ‘प्रख्यात इतिहासकारों’ में कौन लोग शामिल हैं, ये जानने के लिए हमें कोई माथापच्ची नहीं करनी होगी। यह जगजाहिर है।

दरअसल, सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्षकार राजीव धवन ने कोर्ट को एक बड़ा नोट सौंपा था। ‘Historians’ Report To The Indian Nation’ नामक इस नोट को जल्दबाजी में तैयार किया गया था। सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील द्वारा सुप्रीम कोर्ट में इस नोट को इसीलिए रखा गया, क्योंकि इसमें इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि अयोध्या का विवादित स्थल न तो श्रीराम का जन्मस्थान है और न ही बाबर ने मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनवाया। धवन द्वारा इस नोट को पेश किए जाने के बाद रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली संवैधानिक पीठ ने उपर्युक्त बात कही।

इस रिपोर्ट को 1991 में 4 वामपंथी इतिहासकारों द्वारा तैयार किया गया था। आरएस शर्मा, एम अतहर अली, डीएन झा और सूरज भान ने अयोध्या में हुए पुरातात्विक उत्खनन से निकले निष्कर्ष का अध्ययन किए बिना ही इस रिपोर्ट को तैयार किया था। उत्खनन का आदेश इलाहबाद हाईकोर्ट ने दिया था। इसके बाद निकले निष्कर्षों से साफ़ पता चलता है कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण मंदिर को तोड़ कर किया गया था। बावजूद इसके चारों वामपंथी इतिहासकारों ने लिख दिया कि वहाँ कोई मंदिर नहीं था।

जब धवन ने इस रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा तो कोर्ट ने कहा कि वे अधिक से अधिक इसे बस एक विचार अथवा अभिमत मान सकते हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन इतिहाकारों ने
पुरातात्विक उत्खनन से मिली चीजों और उससे निकले निष्कर्षों को ध्यान में नहीं रखा था। एएसआई द्वारा की गई खुदाई में मंदिर के पक्ष में कई अहम साक्ष्य मिले थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस रिपोर्ट का कोई मतलब नहीं है क्योंकि वह उत्खनन के पहले तैयार किया गया था।

कोर्ट ने कहा कि इन इतिहासकारों द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया असावधानीपूर्वक संचालित की गई लगती है। एक तरह से सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि उन्होंने बिना सबूतों को देखे और अहम पहलुओं का अध्ययन किए बिना रिपोर्ट तैयार कर के कुछ भी दावा कर दिया। इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने भी ऐसे इतिहासकारों के दावों को नकार दिया था। सुप्रिया वर्मा नामक एक कथित एक्सपर्ट ने भी एएसआई के डेटा को ही ग़लत ठहरा दिया। मजे की बात यह कि उन्होंने खुदाई से जुड़ी ‘रडार सर्वे रिपोर्ट’ को पढ़े बिना ही ऐसा कर दिया।

सुप्रिया वर्मा और जया मेनन नामक कथित एक्सपर्ट्स खुदाई के समय वहाँ मौजूद नहीं थीं। लेकिन उन्होंने दावा कर दिया कि वहाँ मिले स्तम्भ कहीं और से लाकर रख दिए गए थे। सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के एक अन्य ‘एक्सपर्ट’ गवाह डी मंडल ने कोर्ट में स्वीकार किया कि अयोध्या गए बिना ही उन्होंने विवादित स्थल के ऊपर ‘Ayodhya: Archaeology after Demolition’ नामक एक भारी-भरकम पुस्तक लिख डाली। उन्होंने कोर्ट को बताया कि उन्हें बाबर के बारे में बस इतना पता है कि वह 16वीं शताब्दी का शासक था। इसके अलावा उन्हें बाबर के बारे में कुछ नहीं पता।

‘हिन्दू फासिस्ट’ से लिबरल-दुलारी हुई शिव सेना, उद्धव बने आँख के तारे: ‘मीडिया गिरोह’ ने जमकर उड़ेला प्यार

हमारे समय की राजनीति किस तरह से नरेंद्र मोदी और भरतीय जनता पार्टी के पक्ष और विपक्ष पर शुरू और खत्म हो रही है, आज (8 नवंबर, 2019 को) शाम ट्विटर इसकी नज़ीर बन गया। कल तक जो शिव सेना ‘कट्टर हिंदूवादी’ की छवि के नाम पर लिबरल गैंग की दुश्मन थी, भाजपा से अलग होते ही लिबरल गैंग की डार्लिंग हो गई। जो उद्धव ठाकरे एक फ़ासिस्ट पार्टी के प्रमुख थे, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर निशाना साधते ही ‘शेर’ की उपाधि से नवाज़े जाने लगे।

यहाँ तक कि गोलवलकर-सावरकर के समय के संघ और आडवाणी काल की भाजपा से भी अधिक नफरत मीडिया गिरोह जिन बाला साहेब ठाकरे से करता था, महज़ इसलिए कि कुछ हिन्दू उन्हें ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ कहते थे और वह कश्मीरी पंडितों और राम मंदिर के समर्थक थे, अचानक से वह भी याद किए जाने लगे। उद्धव ठाकरे के विशुद्ध राजनीतिक दाँव और उनकी ‘रैंटिंग‘ अर्थात भड़ास की पीठ थपथपाई जाने लगी कि बाला साहेब की ‘छवि’ दिख रही है उद्धव में।

सबसे ज़्यादा खुश स्वाति चतुर्वेदी नज़र आईं जिनकी खुशी ताबड़तोड़ ट्वीट पर ट्वीट में बहती नज़र आई। उद्धव को ‘सॉफ़्ट स्पोकन’ से लेकर ‘शेर’ तक बता डाला। बताने लगीं कि उद्धव ने दिखा दिया कि भाजपा और उसके अध्यक्ष अमित शाह का मुकाबला कैसे किया जाना है। और यह भूल गईं कि इनकी लिबरल गैंग विचारधारा में हिन्दू हितों के पैरोकार होने के चलते उद्धव भी उतने ही अस्पृश्य हैं जितने कभी भाजपा और संघ रहे थे और जिसके बारे में वाजपेयी ने ‘राजनीतिक अस्पृश्यता’ शब्द ईजाद किया था।

स्वाति चतुर्वदी का आज बस चलता तो वे राहुल गाँधी समेत विपक्ष के नेताओं को उद्धव के निवास ‘मातोश्री’ में ट्यूशन लेने भेज देतीं।

सागरिका घोष की ख़ुशी ट्विटर पर बल्लियों उछल कर बाहर आ रही थी। वे शायद वह समय भूल गईं जब उनके लिबरल गैंग ने इन्हीं उद्धव ठाकरे के पिता को हत्यारा, फासिस्ट और न जाने क्या-क्या कहा था।

यही हाल स्वाति चतुर्वेदी का भी था। वे न केवल उद्धव की शान में एक के बाद एक कसीदे पढ़ रहीं थीं, जैसे कि मानो उद्धव सेक्रेड गेम्स 2 के अंत में सैफ अली खान के किरदार की जगह न्यूक्लियर बम डिफ्यूज करने के लिए रुक गए हों, बल्कि उनकी बाला साहेब से तुलना भी तारीफ़ के ‘सेंस’ में कर रहीं थीं।

बीबीसी वाले खांडेकर जी ‘अलग एंगल’ निकालने के चक्कर में 280 कैरेक्टरों के ट्वीट में एक ही साथ उद्धव के बर्ताव को सही साबित करते, क्योंकि कथित तौर पर बाला साहेब ठाकरे भी ऐसे ही करते थे, और इसे भाजपा के पिछले 5 साल के न जाने कौन से दुर्व्यवहार का ‘दंड’ बताते नज़र आए।

अभिसार शर्मा की तो ख़ुशी इतनी ज़्यादा थी शायद कि विह्वल होकर उनके मुखण्डल से शब्द ही नहीं फूटे। सो स्वाति चतुर्वेदी को केवल एक मूक रीट्वीट देने में वे बुक्का फाड़कर दिवाली मनाते दिखे।

अशोक स्वाइन (जिनके नाम की स्पेलिंग में कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है, बाला साहेब की कसम!) की सूई अमित शाह के आगे ही नहीं बढ़ी, वहीं मर्या शकील एक तरफ महायुति की मैरिज काउंसिलिंग करने लगीं, और दूसरी ओर उसी के साथ सेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस का ‘संयुक्त परिवार’ की बाट भी साथ में जोहना चालू कर दिया।

अयोध्या मामले में कल सुबह 10.30 बजे सुप्रीम कोर्ट सुनाएगा फैसला, यूपी में अलर्ट जारी: रिपोर्ट्स

अयोध्या मामले पर ताज़ा जानकारी के हिसाब से सूचना आ रही है कि कल सुबह 10.30 बजे सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुनाएगा। अदालत की 5 जजों की संविधान पीठ ने 40 दिन सुनवाई करने के बाद 16 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित कर लिया था। 2010 में इलाहबाद हाई कोर्ट ने दो-तिहाई जमीन ज़मीन हिन्दुओं और एक तिहाई मुस्लिमों को दे दी थी।

इस फैसले के साथ ही लगभग 500 साल पुराने इस विवाद के हल हों जाने की उम्मीद बढ़ गई है। बता दें कि इधर, यूपी सरकार ने अयोध्या जमीन विवाद को लेकर आने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मद्देनजर अयोध्या समेत पूरे प्रदेश में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है।

साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार ने सभी स्कूल, कॉलेज, ट्रेनिंग सेंटर, सहित सभी शैक्षणिक केंद्रों को 9 से लेकर 11 नवंबर तक बंद रखने का आदेश दिया है।

अयोध्या में राम जन्मभूमि जाने वाले सभी रास्तों को बंद कर दिया गया है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, टेढ़ी बाजार से दोपहिया और चारपहिया वाहनों की आवाजाही पर भी रोक लगा दी गई है। आज से ही सघन चेकिंग शुरू कर दी गई है।

बता दें कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि के विवादित 2.77 एकड़ जमीन के स्वामित्व के लिए हिंदू और मुस्लिम पक्षकारों द्वारा दायर की गई अपील पर 40 दिन सुनवाई चली। CJI रंजन गोगोई की अध्यक्षता में 5 जजों वाली पीठ ने इस मामले पर 16 अक्टूबर को अपना फैसला सुरक्षित रखा था।

इस मामले में दोनों पक्षों ने इतिहासकारों, ऐतिहासिक यात्रियों, गैजेटियर, अंग्रेज के जमाने से चले आ रहे जमीन संबंधी कागजातों के साथ अपनी-अपनी आस्था का पक्ष भी रखा। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्टों को भी सुनवाई के दौरान जजों के समक्ष रखा गया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सितंबर 2010 के अपने फैसले में विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बाँटा था – राम लला, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड।

(यह डेवलपिंग स्टोरी है। और जानकारी मिलने पर इसे अपडेट किया जाएगा।)

महिला शिक्षक का अपहरण, जबरन बिठा कर गुंडागर्दी: JNU को ‘गढ़चिरौली’ बनाने की ओर एक और कदम

ऐसा लग रहा है कि देश की राजधानी दिल्ली के बीच स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को इसके वामपंथी छात्र अपने राजनीतिक आका नक्सलियों के केंद्र ‘गढ़चिरौली’ जैसा बनाने पर ही तुले हुए हैं।

ट्विटर पर वायरल हो रहे एक वीडियो को देख कर लग रहा है कि माओ-लेनिन-मार्क्स के वंशजों के गढ़ में यूनिवर्सिटी के नियम तो दूर की बात, नागरिक कानून व्यवस्था ही पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है और विश्वविद्यालय लेफ्ट वाले छात्रों के रहमो करम पर आ चुका है। वीडियो के ट्वीट में बताया जा रहा है कि जेनएयू की एसोशिएट डीन ऑफ़ स्टूडेंट्स, डॉ. वंदना मिश्रा, को सुबह से यूनिवर्सिटी के छात्रों ने उनकी मर्ज़ी के खिलाफ एक कमरे में कैद कर रखा है (यानि अपहृत कर रखा है)।

वीडियो में उनके चारों ओर नारेबाजी करते, चीखते और दहाड़ते छात्र दिख रहे हैं। साथ ही डॉ. मिश्रा बहुत ही बेबस नज़र आ रहीं हैं। वीडियो शेयर करने वाले ट्वीट में यह भी दावा किया गया है कि उनकी सेहत सुबह से गिरती ही जा रही है। यह भी बताया गया है कि उन्हें उनकी ही स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ की बिल्डिंग में स्थित क्लास में कैद कर के रखा गया है।

ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इसके पीछे कारण छात्रों और यूनिवर्सिटी प्रशासन के बीच फीस, ड्रेस कोड, लाइब्रेरी के समय जैसी चीज़ों को लेकर टकराव है। इसके चलते छात्रों के भूख हड़ताल पर होने की बात कही गई है।

इस बीच कैम्पस ‘नक्सलियों’ की हरकतों से ट्विटर पर कई प्रबुद्ध व्यक्तित्व बिफर उठे हैं। पत्रकार आदित्य राज कौल ने ट्वीट करके कहा है कि भले ही उन छात्रों को शांतिपूर्वक अपनी बात कहने का अधिकार हो, लेकिन अवैध रूप से किसी को बंदी बनाना कानून के खिलाफ है। कौल ने जेएनयू के कुलपति वीके सारस्वत को निशाने पर लेते हुए सवाल किया है कि उन्होंने अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की या दिल्ली पुलिस को क्यों नहीं बुलाया।

एएनआई सम्पादक स्मिता प्रकाश ने भी घटना की आलोचना की है। वरिष्ठ पत्रकार कंचन गुप्ता ने जेएनयू को ‘रिपब्लिक ऑफ़ जेएनयू’ बताते हुए बेबस देश की जनता के पैसों से चल रही एक समानांतर राजनीतिक सत्ता करार दिया है।

ख़ास ही नहीं, आम लोग भी जेएनयू की घटना से बेहद नाराज़ हैं। एक ट्विटर यूज़र ने कहा कि खाली ट्वीट कर अपने आप को पीड़ित दिखा रहे जेएनयू कुलपति खुद को नाकारा साबित कर रहे हैं। वहीं एक दूसरे ट्वीटर हैंडल ने जेएनयू की तुलना दुर्दांत जिहादी संगठन इस्लामिक स्टेट से कर दी है।

गंगा साफ़ करते-करते भाजपा का मन मैला हो गया: उद्धव ठाकरे का छलका ‘दर्द’, बोले शाह पर भरोसा नहीं

शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी का 30 साल पुराना गठबंधन लगभग खत्म होने की कगार पर दिख रहा है। 5 साल की सरकार चलाने के बाद दोबारा जनादेश पाने के बावजूद मुख्यमंत्री पद और विभागों की संख्या पर दावेदारी इसका कारण है। इसके अलावा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की प्रेस कॉन्फ़्रेंस के बाद अब शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भी भाजपा के खिलाफ बयान दिया है, जिसमें भाजपा का मन मैला हो जाने, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर भरोसा न करने जैसे हमले किए गए हैं।

ठाकरे ने कहा है कि उन्होंने अपने पिता और शिव सेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे से वादा किया था कि शिव सेना का एक दिन सीएम होगा, और इस वादे को पूरा करने के लिए उन्हें अमित शाह या देवेंद्र फडणवीस की ज़रूरत नहीं है। उन्होंने साथ भी भाजपा पर गंगा साफ़ करते-करते अपने मन में मैल आ जाने का आरोप लगाया।

इसके अलावा उद्धव ने एक ओर फडणवीस के इस आरोप का खंडन किया है कि सेना की एनसीपी से बात हो चुकी है, वहीं उन्होंने भाजपा पर चुनाव के पहले सीटों के बँटवारे और सीएम की साझेदारी का झूठ बोलने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि उन्होंने भाजपा के लिए दरवाज़े बंद नहीं किए थे, केवल भाजपा के (कथित) झूठ के चलते खुद बात नहीं की।

साथ ही उद्धव ने, जो कि कॉन्फ़्रेंस में अपने बेटे, सेना के मुख्यमंत्री उम्मीदवार माने जा रहे युवा सेना प्रमुख आदित्य के साथ आए थे, कहा कि भाजपा को लगता होगा कि उन दोनों दलों के बीच भरोसा नहीं है, अब उन्हें अमित शाह ‘एन्ड कम्पनी’ पर भरोसा नहीं रहा।

फरवरी के बाद भी पाक रहेगा FATF की ग्रे लिस्ट में, निकलने की उम्मीद नहीं: पाकिस्तानी मंत्री

अंतरराष्ट्रीय आर्थिक कार्रवाई समूह (फाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स, एफएटीएफ) की ग्रे लिस्ट में से निकलने की पाकिस्तान की राह मुश्किल से और मुश्किल होती जा रही है। यहाँ तक कि अब तो उसके खुद के नेतृत्व और प्रशासन को यह लगने लगा है कि फ़िलहाल फरवरी 2020 तक ग्रे लिस्ट में डाला गया उनका देश उसके बाद भी ग्रे लिस्ट से बाहर नहीं निकल पाएगा।

पाकिस्तान के अखबार डॉन में पाकिस्तान के आर्थिक मामलों के मंत्री हम्माद अज़हर के हवाले से यह बयान प्रकाशित हुआ है कि फरवरी, 2020 के बाद भी पाकिस्तान का इस ग्रे लिस्ट से निकलना मुश्किल लग रहा है। इसका कारण मुख्यतः इस आतंकी देश की रिस्क प्रोफाइल को बताया गया है, यानि यह खतरा और अन्य सदस्य देशों को डर, है कि इस लिस्ट में से निकलते ही पाकिस्तान मनी लॉन्ड्रिंग कर जिहादियों को पैसा देना फिर से शुरू कर देगा।

पाकिस्तान को जून, 2019 में पेरिस स्थित इस संस्था ने अपनी ग्रे लिस्ट में डाला था। इसके बाद उसे एक एक्शन प्लान दिया गया था, जिसके हिसाब से पिछले महीने (अक्टूबर 2019) तक पाकिस्तान को काले धन के जिहादियों के हाथ में पहुँचने पर नियंत्रण करके दिखाना था। ऐसा न करने पर उसके नार्थ कोरिया और ईरान की तरह ब्लैक लिस्ट में चले जाने का खतरा था।

ऐसा न करने के बाद भी पाकिस्तान को ब्लैक लिस्ट में एफएटीएफ ने डाला नहीं था, और ग्रे लिस्ट में बनाए रखा था। और अब पाकिस्तान के मंत्री यह रोना रो रहे हैं कि कुछ अन्य देशों को एफएटीएफ के नियमों का केवल 80 प्रतिशत अनुपालन पर छूट दे दी गई, जबकि पाकिस्तान को यह इजाज़त नहीं मिल रही है। पाकिस्तान पर नियमों का 100 फीसदी अनुपालन करने के लिए दबाव बनाया जाना पाकिस्तानी मंत्री को बहुत बुरा लग रहा है।

सवाल पर बवाल: शिवाजी के नाम से छत्रपति हटाने पर भड़के मराठी, केबीसी के बहिष्कार की माँग

मशहूर टीवी गेम शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ अपनी एक छोटी सी भूल से एक राजनीतिक विवाद का केंद्रबिंदु बन गया है। गेम शो में पूछे गए एक प्रश्न में हिन्दू शासक और मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम में उपनाम ‘छत्रपति’ न लगाने, और उसी सवाल में अन्य हिन्दू राजाओं, और मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के लिए उपयुक्त राजनीतिक उपनामों का प्रयोग करने को लेकर ट्विटर पर देश भर की जनता की आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।

यही नहीं, फ़िलहाल मराठा पार्टी शिव सेना से सत्ता संघर्ष में उलझी भारतीय जनता पार्टी की महाराष्ट्र इकाई ने भी इस पर आपत्ति जताई है। भाजपा के महाराष्ट्र विधायक नितेश राणे ने चैनल और आयोजकों से माफ़ी की माँग की है।

बवाल का कारण एक सवाल है जिसमें स्क्रीन पर औरंगज़ेब और शिवाजी महाराज समेत पाँच ऐतिहासिक शासकों के बारे में पूछा गया था। इसमें से शिवाजी के अलावा बाकी सभी शासकों, जैसे महाराणा प्रताप, राणा सांगा, महाराज रंजीत सिंह आदि के लिए सही उपनामों का इस्तेमाल हुआ और छत्रपति शिवाजी को केवल “शिवाजी” लिखा गया।

इसे उनका इसलिए अपमान माना जा रहा है क्योंकि ऐतिहासिक रूप से भी उनकी जन्म की जाति के चलते उनके राजतिलक में अड़चन आने की बात कही जाती है। उस समय वाराणसी के सम्मानित ब्राह्मण पंडित विश्वेश्वर ‘गागा’ भट्ट ने यह ढूँढ़ कर निकाला कि वे जाति-भ्रष्ट(या कुछ विवरणों के अनुसार, पूर्वजों के कुछ कृत्यों के चलते जातिच्युत) सिसोदिया क्षत्रिय हैं। सूर्यवंशी सिसोदिया भगवान श्री राम के इक्ष्वाकु कुल के माने जाते हैं। उसके बाद ही उनका राजतिलक सम्भव हो पाया था।

इस चूक से नाराज़ लोगों के केबीसी के आयोजकों और सोनी चैनल वालों को आड़े हाथों लिया। किसी ने क्रूर जिहादी औरंगज़ेब को सम्मान देने पर आपत्ति जताई तो कुछ लोगों ने होस्ट अमिताभ बच्चन से भी माफ़ी की माँग कर डाली।

विवाद बढ़ता देख कर सोनी टीवी ने एक ट्वीट कर विवाद पर माफ़ी माँग ली है। साथ ही दावा किया है कि कल जिस एपिसोड की शूटिंग हुई है उसमें उन्होंने माफीनामे का एक ‘स्क्रॉल’ जोड़ दिया है।