जम्मू-कश्मीर 31 अक्टूबर को केंद्रशासित प्रदेश बन गया।गिरीशचंद्र मुर्मू ने पहले उपराज्यपाल के तौर पर शपथ ली। उनके शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने पर पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी ने अपने एक सांसद को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। श्रीनगर में पीडीपी के प्रवक्ता ने कहा “राज्यसभा के सदस्य नजीर अहमद को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया है।” उन्होंने बताया कि उप-राज्यपाल के शपथ ग्रहण में शामिल होने के चलते नजीर पर यह कार्रवाई की गई है।
प्रवक्ता ने बताया कि कार्यक्रम में सांसद की भागीदारी वर्तमान राजनीतिक स्थिति को देखते हुए पीडीपी के खिलाफ है। उन्होंने यह भी बताया कि नजीर अहमद ने राज्यसभा में ट्रिपल तलाक बिल पर बहस के बाद वोटिंग में उसके खिलाफ मतदान नहीं किया था। वे पहले भी कई मुददों पर पार्टी के घोषित स्टैंड के खिलाफ जा चुके हैं। गौरतलब है कि नजीर वही सांसद हैं जिन्होंने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक पेश किए जाने के दौरान पीडीपी के एक अन्य सांसद मीर मोहम्मद फैयाज के साथ विरोध स्वरुप विधेयक को फाड़ दिया था।
Peoples Democratic Party (PDP) has expelled party’s Rajya Sabha MP, Nazir Ahmad Laway (in pic) for attending the swearing-in ceremony of newly-appointed Lieutenant-Governor of Jammu and Kashmir, GC Murmu. pic.twitter.com/Za1UousrW5
कश्मीर में केंद्र सरकार द्वारा 5 अगस्त को लिए गए बड़े निर्णय के बाद से ही पीडीपी का चेहरा रहीं पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती को गिरफ्तार कर नज़रबंद रखा गया है। बता दें कि सरकार द्वारा संसद में कानून के जरिए अनुच्छेद 370 पर कार्यवाही के बाद उसे ख़त्म कर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया गया था। दोनों ही प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख केंद्र के अंतर्गत संचालित किए जाएँगे। हालाँकि जम्मू-कश्मीर में विधानसभा का प्रावधान है। गुरुवार को केंद्र शासित जम्मू-कश्मीर प्रदेश के पहले उप-राज्यपाल के तौर पर पूर्व आईएएस गिरीश चन्द्र मुर्मू ने शपथ ली। राज्य के हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस गीता मित्तल ने उन्हें शपथ दिलाई थी।
उत्तर प्रदेश के शाहजहॉंपुर में एक ग्रामीण को गोली मारकर साजिद अली फरार है। वह बसपा के प्रदेश अध्यक्ष मुनकाद अली का भाई है। पुलिस कल (31 अक्टूबर, 2019 को) को जब साजिद की तलाश में घर पहुॅंची तो वह गायब हो चुका था। पुलिस सरगर्मी से उसकी तलाश कर रही है।
Uttar Pradesh: BSP state president’s brother, Sajid Ali, goes missing after shooting a villagerhttps://t.co/e8HKzbwJig
किठौर इलाके के सर्कल अफ़सर (सीओ) आलोक सिंह के हवाले से मीडिया में घायल का नाम यासीन बताया गया है। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार यासीन की हालत उसका इलाज कर रहे डॉक्टरों ने स्थिर बताई है।
आलोक सिंह ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “पहले तो यासीन के परिवार ने अज्ञात हमलावरों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। लेकिन बाद में एक ऐसा वीडियो प्रकाश में आया जिसमें यासीन को साजिद अली पर अपने ऊपर फायरिंग करने का आरोप लगाते हुए देखा जा सकता है। यासीन ने बताया कि वे साजिद अली के शाहजहाँपुर रिसोर्ट के पास स्थित तालाब में मछली मारने के लिए गया था। यह सोमवार (28 नवंबर, 2019, दीवाली का अगला दिन) शाम की घटना है। उसे रोकते हुए गोलियाँ चलाई गईं।”
आलोक सिंह ने इस बात की भी पुष्टि की कि साजिद अली का नाम वीडियो फुटेज के आधार पर ही एफआईआर में जोड़ा गया है। उन्होंने आगे बताया, “वह (साजिद अली) भागे हुए हैं और मेरठ के एसएसपी से हमने उनके सिर पर नकद पुरस्कार रखने की सिफारिश कर दी है। हम अदालत से उनके नाम पर एक वारंट पाने का भी प्रयास कर रहे हैं।”
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बसपा पदाधिकरियों के असामाजिक और आपराधिक बर्ताव से जुड़ी यह पहली खबर नहीं है। इसके पहले भी हाल ही में पुलिस ने बसपा के एक और नेता रह चुके और मायावती सरकार में मंत्री रहे हाजी याकूब कुरैशी के घर पर भी छापा मारा था। मेरठ में हुई इस कार्रवाई के तार उनके खिलाफ जमीन पर जबरदस्ती कब्ज़ा और हत्या के प्रयास के आरोप से जुड़े हैं। इस मामले में उन्हें और उनके बेटे इमरान कुरैशी को मुकदमे में भी नामजद किया जा चुका है।
अर्थव्यवस्था में मंदी, बढ़ती बेरोजगारी, निवेश के अनुकूल माहौल नहीं होने के विपक्ष के आरोपों के बीच आदित्य बिड़ला ग्रुप के चेयरमैन कुमार मंगलम बिड़ला का एक बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने कहा है कि देश में उद्योग धंधे लगाना और कारोबार करना पहले से कहीं ज्यादा आसान हो गया है।
Kumar Mangalam Birla: …And given the fact that we are such a large country, that makes a little more challenging but having said that, I can see that coordination between states and the Centre on dealing with a particular project is much better now than in the past. https://t.co/bynYdlr4aM
थाइलैंड में मीडिया से बात करते हुए बिड़ला ने कहा कि हालाँकि भारत में अभी भी बेहतरी की बहुत सी सम्भावनाएँ हैं और हम इससे भी अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत में व्यापार करने का मतलब अधिकाँश मामलों में केंद्र और राज्य सरकार दोनों के साथ किसी भी प्रोजेक्ट विशेष में काम करना होता है। चूँकि हम इतना बड़ा देश हैं, इसलिए ऐसा कर पाना (केंद्र और राज्य सरकार, दोनों के ही साथ काम कर पाना) थोड़ा अधिक मुश्किल हो जाता है। बकौल बिड़ला, “मुझे लगता है कि राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के बीच किसी प्रोजेक्ट विशेष को लेकर समन्वय की स्थिति पहले से बहुत बेहतर है।”
उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार के राज में भारत वर्ल्ड बैंक की ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस रैंकिंग में ऊपर चढ़ा है। ताज़ा रैंकिंग में भारत 14 स्थान ऊपर आकर 63वीं पोज़ीशन पर पहुँच गया है। सीआईआई निदेशक चंद्रजीत बनर्जी समेत उद्योग जगत की कई हस्तियों ने उम्मीद जताई है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में ही भारत ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस रैंकिंग में चोटी के 50 देशों में भी शामिल हो ही जाएगा। उद्योग चैंबर एसोचैम से जुड़े बालकृष्ण गोयनका ने ट्विटर पर लिखा कि भारत में इससे विदेशी निवेश को बूस्ट मिलेगा।
अयोध्या विवाद पर इसी महीने सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने की उम्मीद है। इसे देखते हुए दिल्ली के छतरपुर में हुई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बैठक में मंथन किया गया। फैसले के बाद सांप्रदायिक सद्भाव को बनाए रखने के लिए उठाए जाने वाले कदमों पर चर्चा की गई। बता दें कि 40 दिन तक चली सुनवाई के बाद अयोध्या मामले पर मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। जम्न्भूमि पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की सेवानिवृत्ति से पूर्व यानी 17 नवम्बर से पहले आने की उम्मीद है।
बुधवार और गुरुवार को संघ की बैठक में भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा भी उपस्थित रहे। बैठक में चर्चा अयोध्या पर फैसले के इर्द-गिर्द घूमती रही। राम मंदिर के पक्ष में फैसला आने की उम्मीदों को लेकर जहॉं खुशी जाहिर की गई। साथ ही यह भी तय किया गया कि ऐसा कुछ भी न हो जिससे दूसरे पक्ष की भावनाओं को ठेस पहुॅंचे।
एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बैठक में कहा गया कि फैसले के बाद देश का सद्भाव नहीं बिगड़ना चाहिए। इसके साथ ही कोई ऐसी बात न हो जिससे किसी भी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुॅंचे। संघ के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ऐसे मौके पर किसी भी तरह के आक्रामक तेवर के लिए कोई जगह नहीं है। खासकर जुलूस जैसी चीजों से दूर रहना होगा, जो समुदाय विशेष के खिलाफ हों।
संघ के एक पदाधिकारी के मुताबिक हम फैसला अपने पक्ष में आने को लेकर आशान्वित हैं। वैसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में मंदिर स्थान को तीन बराबर भागों में बाँटने का आदेश दिया था। ऐसे में हर फैसले को लेकर खुद को तैयार किया जा रहा है और उसके अनुसार रणनीति तैयार की जा रही है। संघ नहीं चाहता है कि फैसले के बाद किसी भी प्रकार देश का सौहार्द बिगड़े।
बैठक में सरसंघचालक मोहन भागवत सहित सुरेश भैय्याजी जोशी,दत्तात्रेय होसबोले और मनमोहन वैद्य मौजूद थे। वहीं विश्व हिन्दू परिषद से जस्टिस वीएस कोकजे और आलोक कुमार अन्य पदाधिकारियों तथा क्षेत्रीय प्रचारकों के साथ मौजूद थे। फैसले के मद्देनजर आरएसएस नवम्बर महीने के अपने सभी आयोजनों को पहले ही रद्द कर चुका है।
कभी सोचा है कि “उत्तम खेती, मध्यम बान, नीच चाकरी, भीख निदान” की कहावतों वाले देश में लोग बदले कैसे? आखिर यह कैसे हुआ कि लोग कृषि को उत्तम, वाणिज्य को मध्यम और नौकरी को ओछा मानने के बदले इसका उल्टा सोचने लगे? एक आम आदमी अपना पेशा, या कोई काम किस आधार पर चुनता है? पहले तो वह यह देखेगा कि उसकी रुचियाँ और कौशल क्या हैं, फिर वह यह भी देखेगा कि जो पेशा या काम वह चुनने जा रहा है, वह कितनी आर्थिक सुरक्षा देता है। ऐसा सोचते ही किसी भी पढ़े-लिखे व्यक्ति को याद आ जाएगा कि एक सरकारी नौकरी पाना जरूर मुश्किल हो, लेकिन उसका छूटना या ख़त्म हो जाना तो करीब-करीब नामुमकिन है। वह सबसे अधिक सुरक्षा देती है।
इसकी तुलना में अगर व्यापार को देंखें, तो नेहरू युग वाली समाजवादी व्यवस्था में उसे दुष्टों का काम और व्यापारियों को धूर्त बताया जाता रहा। करीब पाँच दशक की इस व्यवस्था ने व्यापार की जो छवि बनाई, उससे काफी पहले सत्ता का समर्थन हटाकर, शोषण बढ़ाकर, कृषि की वही दशा की जा चुकी थी। “डोगूना लागान डेना पड़ेगा” केवल एक फ़िल्मी डायलॉग भर नहीं है। एक फिरंगी सत्ता द्वारा इसके ज़रिए करीब डेढ़ सौ साल किसान का खून पिया जाता रहा। अगर मुग़ल काल में भी देखेंगे तो यह नजर आ जाएगा कि तुलनात्मक रूप से कृषि पर टैक्स काफी ज्यादा था। एक लम्बा समय लगा, मगर कृषि और वाणिज्य-व्यापार धीरे-धीरे पीछे की जगह लेने लगे।
धीरे-धीरे जैसे जैसे समय बदला वैसे-वैसे सरकारी नौकरियों की गिनती कम होने लगी और निजी क्षेत्र में अवसर बढ़े। युवाओं को समझ में आने लगा कि सुरक्षा बस एक भावना है। किसी निजी कंपनी में नौकरी कोई भरोसेमंद चीज़ नहीं होती, वह जा सकती है, बदल भी सकती है। अब जब अनिश्चितता उतनी भयावह नहीं दिखने लगी तो कई युवा वापस वाणिज्य और कुछ बहुत थोड़े से कृषि की ओर भी मुड़े। यह आम लोगों की बात थी, सरकार की नहीं, क्योंकि सरकार अभी भी अधिकांश उसी व्यवस्था पर चल रही थी जो विदेशियों ने कभी भारत पर शासन करने के लिए बनाई थी। यह वह व्यवस्था थी जिसके लिए खुद नेहरू ही कहा करते थे कि न तो यह भारतीय है, ना ही इनका व्यवहार नागरिक है और सेवा तो यह किसी तरह नहीं। (आज के आईएएस को उस दौर में आईसीएस यानी इंडियन सिविल सर्विस कहा जाता था।)
अब जब बात कृषि तक पहुँच चुकी है, तो अपने आस-पास पड़े मोबाइल फ़ोन के बारे में सोचिए। कभी न कभी इसके खोने/चोरी होने का सामना खुद या किसी मित्र/परिचित को करना ही पड़ा होगा। उस स्थिति में क्या इसकी पक्की रिपोर्ट (जिसमें एफआईआर नंबर और कॉपी मिलती है) करवाई थी, या बस एक आवेदन देकर आ गए थे? संभवतः एक आवेदन देकर उसकी प्राप्ति (रिसीविंग कॉपी) नया सिम कार्ड लेने के लिए रख ली होगी। ऐसा संभवतः इसलिए किया था क्योंकि खरीद की रसीद और सच में चोरी ही हुई है उसका प्रमाण जुटाना और पक्की एफआईआर करवाना बहुत समय लेने वाला और मुश्किल काम होता है। आपने आसान तरीका चुना, क्योंकि फ़ोन के लिए ₹20-25 हजार जुटा लेना आपके लिए उतना मुश्किल नहीं था।
किसान के लिए यह उतना आसान नहीं। उसके लिए एक पशु (गाय-बैल) खरीदने के ₹20-25 हजार जुटाना कुछ वर्षों की मेहनत का मामला है। उसकी चोरी होने पर एफआईआर लिखवाना और भी मुश्किल होगा, क्योंकि किसान न तो आप जितना पढ़ा-लिखा है, न उतने रसूख वाला है, न ही आर्थिक तौर पर मजबूत है। ऊपर से यह भी जोड़िए कि पशु-तस्कर रास्ते में आने वाले पुलिसकर्मियों पर गाड़ी चढ़ाने से हिचकते नहीं। चोरी के दौरान पशु के मालिक के जाग जाने पर उसे गोली मार देने की घटनाएँ आम हैं। हरियाणा में अभी हाल में ही दो ऐसे मामले चर्चा में रहे हैं जिसमें पशु-तस्करों को रोकने की कोशिश में किसान को गोली मार दी गयी और उसे कोई अख़लाक़ जैसे करोड़ों का मुआवजा तो छोड़िए, देखने तक नहीं गया।
ऐसे में कृषि के लिए किसान क्या पशु रखना चाहेगा? सुरक्षा है ही नहीं- न जीवन की, न चोरी से बचाने की, न ही चोरी होने पर किसी मुआवजे की, न चोरी रोकने के प्रयास में जान न जाने की! किसान ने पशु रखने छोड़ दिए और वह किराए की मशीनों पर निर्भर रहने लगा। अधिकांश ग्रामीण किसान ऐसे ही मिलेंगे जो खुद का ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, थ्रेसर जैसी मशीनें नहीं खरीदते। वह खेत जोतने या दौनी जैसे कामों के लिए पशु भी नहीं रखते। वह गाँव या आस-पास के ही किसी अमीर किसान से मशीन किराए पर लेते हैं। इन पालतू पशुओं के न होने से क्या नुकसान हुआ? जो पुआल या तो भूसा बनकर पशुओं के चारे में काम आता था या फिर कच्चे मकानों की छत बनता था, वह अब किसी काम का नहीं बचा। सिर्फ एक गाय-बैलों पर से ध्यान हटते ही खेतों में कई-कई एकड़ ऐसा पुआल जमा हो गया, जो किसी काम नहीं आ सकता। यह घास की तरह आसानी से गल जाने वाली चीज़ भी नहीं थी जो सीधा इसे खेत में ही जोत देते। पशुओं के चारे की तरह बेचने का विकल्प नहीं बचा तो इसे जलाना किसान की मजबूरी थी।
दिल्ली जैसे राज्यों में अंग्रेजों के दौर से ही गाय पालने पर पाबंदियाँ हैं। आस-पड़ोस के राज्यों से जब पशु घटे और खेत में पुआल जलने लगा तो धुआं दिल्ली तक भी पहुँचने लगा। अब साँस लेने में दिक्कत हो रही हो, तो परेशानी की जड़ में भी जाने की सोचिएगा कामरेड। सोचने पर फ़िलहाल जीएसटी नहीं लगता, और कंधे उचकाकर चल देने से धुआँ तो पीछा छोड़ने से रहा!
बिहारी चाहे दुनिया के किसी भी कोने में रहता हो वह छठ में घर वापस आना चाहता है। इस त्योहार से ज्यादा बिहारियों के दिल को और कुछ नहीं छूता। यह देश के अन्य प्रमुख त्योहारों- दीवाली,होली, दुर्गा पूजा की तरह एक धार्मिक उत्सव भर नहीं है। यह परिवार तक जाने वाली एक डोर है, जिसे कोई छोड़ना नहीं चाहता। बिहार (और झारखंड) का यह प्रचलित त्योहार चार दिनों का होता है। यह भगवान सूर्य और उनकी दो पत्नियों ऊषा और प्रत्यूषा को समर्पित है। ‘छठ’ नामकरण के पीछे इसका अमावस्या के छठे दिन या षष्ठी को होना है।
बिहार में सूर्य देव और छठी मईया (ऊषा देवी के लिए प्रयुक्त नाम) इस पर्व के आराध्य हैं। इसकी तैयारी अत्यंत श्रमसाध्य और सघन होती है। ऊषा और प्रत्यूषा सूर्य देव की दो शक्ति मानी जाती हैं और उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। संध्या काल में दिया जाने वाला पर्व का प्रथम अर्घ्य उनकी अंतिम किरण प्रत्यूषा को दिया जाता है और प्रातः काल का अर्घ्य सूर्य की प्रथम किरण ऊषा को।
छठ पर्व और सूर्य देव की पूजा का उल्लेख भारत के दोनों महाकाव्यों महाभारत और रामायण में है। श्रीराम के वनवास से लौटने के बाद देवी सीता के अयोध्या के राजपरिवार के कुल देवता के रूप में सूर्योपासना और महाभारत में इंद्रप्रस्थ की महारानी द्रौपदी के इस पर्व को मनाने के बारे में लिखित प्रमाण हैं। सूर्य पुत्र कर्ण महाभारत के प्रमुखतम किरदारों में एक है। यही नहीं, देवी ऊषा स्वयं वैदिक काल की देवी मानी गईं हैं, जिनकी उपासना में कई वेद मन्त्र और ऋचाएँ हैं।
समकालीन परम्परा की बात करें तो दीवाली खत्म होते ही बिहार 6 दिन बाद होने वाले छठ के की तैयारियों में लग जाता है। राज्य के हर कोने में छठी मईया के गीत गाए जाते हैं। सबसे प्रचलित गीत बिहार की अपनी बेटी और पद्मश्री से सम्मानित शारदा सिन्हा के होते हैं। “उग हो सुरुज देव” से लेकर “मारबो रे सुगवा धनुष से” तक इन गीतों का जुड़ाव हर बिहारी से होता है।
गाँव-कस्बों में साफ़-सफाई चालू हो जाती है, जो एक सामुदायिक प्रक्रिया होती है। केवल पगार पाने वाले सफाई कर्मचारी ही नहीं, छठ के दौरान साफ़-सफाई पूरे बिहार का जिम्मा होता है। घर से लेकर घाट तक, जहाँ पानी के किनारे अर्घ्य देना होता है, कंकड़-पत्थर, गंदगी, घास-फूस का नामोनिशान मिटा दिया जाता है।
पहला दिन: नहाय-खाय
इस दिन व्रतिन (व्रती महिलाएँ) सुबह-सवेरे नहा कर मौसमी सब्ज़ियों, चावल और दाल का भोजन करती हैं। दाल में अमूमन चना सबसे अधिक प्रचलित है, जबकि सब्ज़ियों में लौकी (जिसे बिहार ‘कद्दू’ के नाम से जानता है); साथ में चने का साग भी होता है। व्रतिन का बिना नमक का भोजन प्रसाद होता है, जिसे बाद में पूरा परिवार ग्रहण करता है।
इसी दिन (या अगले दिन, सुविधानुसार) व्रतिन अपने घर के अन्य लोगों की मदद से सूर्य देवता को चढ़ाए जाने वाले प्रसाद को बनाने में प्रयुक्त होने वाले गेहूँ को धोकर सूखने के लिए फैला देती हैं। घर के बच्चों की ज़िम्मेदारी होती है ध्यान रखना कि गेहूँ में कोई गंदगी न गिर जाए या चिड़िया जूठा न कर दे या बीट न कर दे।
बिहार की सबसे चर्चित मिठाई ठेकुआ की भी तैयारी जम कर होती है। गेहूँ को या तो घर ही में जाँते में पिसा जाता है या पास की चक्की से पिसवाया जाता है। इसी आटे से मिठाइयाँ, रोटी, पूड़ी आदि बनती हैं।
दूसरा दिन: खरना
व्रतिन का पूरे दिन उपवास होता है- वह भी निर्जला। इसके अलावा उन्हें स्वच्छता, शौच-अशौच के भी कठोर नियमों का पालन करना होता है। शाम को वही घर वालों के लिए भोजन भी बनाती हैं, जिसमें पूड़ी और तस्मई (गुड़ या शक़्कर की खीर) प्रमुख होते हैं। तस्मई में एक बूँद पानी का प्रयोग नहीं होता है और दूध उसी गाय का इस्तेमाल किया जाता है जिसका बछड़ा जीवित रहता है।
शाम को भोजन बनाने से खाली होकर व्रतिन पूजा पर बंद कमरे में बैठती हैं। विभिन्न देवताओं, जिनमें ग्राम और कुल के भी देवी-देवता शामिल होते हैं, को नैवेद्य का भोग लगता है। इस नैवेद्य में रोटी, तस्मई और केला होता है, और यह भोग केले के पत्ते पर ही लगता है।
व्रतिन जब पूजा करतीं हैं तो पूरा घर दम साधे बैठे रहता है ताकि उनका ध्यान भंग न हो जाए। उसके बाद वे प्रसाद ग्रहण कर अपने उपवास का पारण करती हैं। वे अपने थाल में कुछ खाना छोड़ कर उठतीं हैं, जिसे घर के बाकी सदस्य प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। कई बार तो घरों में इस प्रसाद को ग्रहण करने के लिए आपस में हो होड़ लग जाती है, क्योंकि यह माँ का प्रसादों में सबसे अनुपम माना जाता है। इस नैवेद्य के प्रसाद के बाद पूरा घर तस्मई और पूड़ी ग्रहण करता है।
तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य
तीसरे दिन व्रतिन का उपवास फिर शुरू हो जाता है जो लगभग 36 घंटे चलता है। यह भी निर्जला ही होता है।
इस दिन परिवार के बच्चे या युवा डलिया और सूप तैयार करते हैं जिनमें ठेकुआ, लडुआ, साँच और घर के पास उगने वाली कोई भी फसल (गन्ना, संतरा, सेब से लेकर मूली, केला, मूँगफली, मकई तक) हो सकते हैं। घर के पुरुष इन डलियों को सिर पर लेकर घर से घाट तक जाते हैं। रास्ते भर में सफाई, पानी के छिड़काव आदि से स्वच्छता और शुचिता बरकरार रखे जाते हैं।
डलिया को घाट पर खोल कर रख दिया जाता है। व्रतिन जल में स्नान कर ढलते सूर्य और प्रत्यूषा की वंदना करती हैं। इसके बाद वे हर डलिया को एक दिए के साथ हाथ में लेतीं हैं और वे और परिवार के अन्य सदस्य डलिया में जल और दूध द्वारा अर्घ्य देते हैं।
इसके बाद व्रतिन फिर एक बार स्नान करतीं हैं और उसके बाद घाट पर पूजा होती है। इसमें आराधना, पुष्पांजलि, धूप चढ़ाना और अगरबत्ती जलाना शामिल होते हैं। डलिया को पुरुष सदस्य वापिस घर ले आते हैं और इसे सहेज कर रात भर के लिए ऐसी जगह स्थापित किया जाता है जहाँ गलती से स्पर्श, पैरों का लगना आदि न हो।
चौथा दिन: ऊषा अर्घ्य
शाम के अर्घ्य की ही प्रक्रिया इसमें दोहराई जाती है। डलिया लेकर घाट पर पहुँचा जाता है, जहाँ व्रतिन पानी में उतर कर सूर्योदय का इंतज़ार करतीं हैं। जैसे सूर्य देव देवी ऊषा के साथ प्रकट होते हैं, युगल को जल और दूध का अर्घ्य शाम की ही भाँति पहली किरण के साथ दिया जाता है।
इसके बाद डलिया को वापिस घर ले जा कर परिवार के लोगों और पड़ोसियों में प्रसाद वितरित होता है। व्रतिन के जलाशय से बाहर आने तक पूरा परिवार भी उनके साथ खाली पेट प्रतीक्षा करता है।
व्रतिन जलाशय से बाहर आकर नए वस्त्र धारण करतीं हैं और घर की अन्य महिलाओं के साथ वापिस घर जातीं हैं। रास्ते में खेतों में वे मृदा (मिट्टी) की भी पूजा करतीं हैं। इसे भूमि की उर्वरा शक्ति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन माना जाता है।
जब व्रतिन घर पहुँचती हैं तो घर के सभी सदस्य उनके चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। उन क्षणों में जब वे अपनी सभी इन्द्रियों और अंगों के आवेश को स्थिर किए हुए होतीं हैं, तो उनकी वाणी में माता उषा या छठी मईया का निवास माना जाता है।
डलिया के प्रसाद के अलावा इस वक्त का मुख्य भोजन कद्दू (लौकी)-भात होता है।
डलिया की सामग्री की महत्ता
हर परिवार में अलग-अलग संख्या में डलिया होती हैं। एक, दो, तीन से लेकर किसी-किसी परिवार में संख्या दस के परे भी जा सकती है। यह संख्या इस पर निर्भर करती है कि घर के लोगों ने छठी मईया से कितनी डलिया की मनौती मानी थी।
कई बार मान लीजिए कि कोई अगर गंभीर रूप से बीमार है तो घर की वयोवृद्ध दादी-नानी कुछ वर्षों (या हो सकता है हमेशा के लिए भी) एक निश्चित बड़ी संख्या की मनौती मान लें। इसमें कई बार तो ऐसा भी होता है कि लोग अपने ही नहीं, आस-पड़ोस के लोगों के लिए मनौती मान लेते हैं, जैसे, “हे छठी मईया, मेरा ये बेटा (गाँव का मुखिया, जिसका मान लीजिए एक्सीडेंट हो गया था) बिस्तर से उठ खड़ा हो, तो मैं जब तक ये जिएगा, एक डलिया फल हर साल चढ़ाऊँगी।”
‘कष्ट लेना’
यह अर्घ्य के दो दिनों की शाम और सुबह में काफी आम है। कई लोग, अमूमन पुरुष, छोटी चाकू या ऐसी ही किसी धातु वाली वस्तु के साथ सूर्य की ओर चेहरा कर दंड प्रणाम करते हुए घाट तक जाते हैं।
असल में वे क्या कर रहे होते हैं:
वे अपने घर से निकल कर सूर्य को प्रणाम करते हैं, और ज़मीन पर लेट कर अपने शरीर की लम्बाई जितनी दूरी नापते हैं। इस दूरी का वे ज़मीन पर कील या चाकू आदि से निशान लगा देते हैं। उसके बाद वे उठ कर फिर से सूर्य को प्रणाम करते हैं, निशान वाली जगह पैर जमा कर फिर ज़मीन पर लेट जाते हैं, सिर की जगह पर निशान लगाते हैं… यह प्रक्रिया घाट पहुँचने तक जारी रहती है।
यह केवल सुनने में ही नहीं, करने में भी बहुत ही कठिन प्रक्रिया है। इसे करने वाला या तो खुद इसकी मन्नत माना होता है, या उसके लिए उसकी माँ, दादी-नानी ने उसके कल्याण के लिए यह मन्नत मानी होती है। इस आराधना विधि को ‘कष्ट लेना’ कहा जाता है।
यह इतना दुष्कर और जटिल है कि इस मन्नत का उपयोग केवल बहुत ही बड़ी विपत्ति के उपाय में किया जाता है- जैसे अगर किसी का एक्सीडेंट हो गया है, या किसी अन्य कारण से प्राण संकट में पड़ गए हों। तभी इस कष्ट के अर्पण के बदले देवताओं से सहायता माँगी जाती है।
हालाँकि यह ‘कष्ट लेना’ क्रिया अमूमन केवल पुरुष ही करते हैं, लेकिन इससे मिलता-जुलता एक संस्करण स्त्रियों के लिए भी होता है। उन्हें उसके लिए जलाशय में सबसे पहले पहुँच जाना होता है, उन महिलाओं के पहले जो ‘कष्ट’ वाली मनौती नहीं किए होतीं हैं और अर्घ्य की प्रक्रिया समाप्त होने पर उनसे बाद में निकलना होता है। अक्टूबर अंत-नवंबर के कड़ाके की ठंड में सूर्योदय के पहले से ऐसा करना बेहद मुश्किल होता है।
बिहार में सबसे प्रचलित छठी मईया से मॉं, दादी, नानी हमेशा ही प्रार्थना करती रहती हैं। ऐसी मान्यता है कि माँ उषा अपने बच्चों का सदैव ध्यान रखतीं हैं। यह ‘कष्ट’ माँ उषा की संतान होने के प्रति आभार प्रकट करने का एक ज़रिया है।
विश्वास ही हम सब को एक सूत्र में पिरोता है। छठ पूजा पूरे परिवार को साथ ले आती है। व्रतिन को घर में सबसे अधिक सम्मान दिया जाता है और बच्चों में उनके थके हाथ-पैर दबाकर, सिर पर मालिश कर उनका आशीर्वाद लेने की होड़ लगी रहती है।
यह पर्व पृथ्वी पर साक्षात् दिखने वाले एकमात्र देवता को धन्यवाद करने का एक तरीका है, जिनके अनुग्रह से पृथ्वी पर जीवन और प्राण का संचार होता है। यह उन सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का तरीका है, जिनकी किरणों के बिना पूरा ब्रह्माण्ड मृत हो जाएगा। वे केवल जीवन ही नहीं देते। अपनी किरणों से व्याधियों का नाश कर पालन भी करते हैं। छठ पर हम उन्हें और उनकी शक्तियों ऊषा और प्रत्यूषा को अपना आभार ज्ञापित करते हैं…
(मूलतः अंग्रेजी में प्रकाशित अजीत भारती के इस लेख का हिंदी रूपांतरण मृणाल प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव ने किया है।)
दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स ‘बेहद गंभीर’ श्रेणी में पहुॅंच गया है। सर्दियों के साथ ही दिल्ली का गैस चेंबर में बदल जाना रूटीन जैसा हो गया है। लेकिन, यहॉं रहने वाले लोगों की मजबूरी दोहरी है। दमघोंटू हवा में सॉंस लेने को मजबूर लोगों के लिए दिल्ली की आप सरकार की राजनीति घुटन बढ़ाने वाली है।
हवा की गुणवत्ता बेहद खराब होने के साथ सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित पर्यावरण प्रदूषण रोकथाम एवं नियंत्रण प्राधिकरण (ईपीसीए) ने शुक्रवार को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में जन स्वास्थ्य आपातकाल की घोषणा की। पॉंच नवंबर तक सभी प्रकार के निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी। दिल्ली सरकार ने भी प्रदूषण की वजह से राजधानी के सभी स्कूलों को पॉंच नवंबर तक बंद कर दिया है। ऐसा बीते साल भी हुआ था। लेकिन, पिछली सर्दी से इस सर्दी के बीच जो चीज नहीं हुआ, वह है प्रदूषण रोकने के लिए जिन कदमों को उठाने की घोषणा आप सरकार की ओर से हुई थी उस पर अमल नहीं किया गया।
दिल्ली के मुख्यमंत्री पहले दिन से ही प्रदूषण का ठीकरा दीवाली की आतिशबाजी और पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने पर फोड़ने की फिराक में लगे थे। हद तो यह है कि अपने इस राजनीतिक पैंतरे में अब उन्होंने दिल्ली के स्कूली बच्चों को भी शामिल कर लिया है। शुक्रवार को केजरीवाल ने स्कूली बच्चों से कहा कि पंजाब और हरियाणा में जल रही पराली के कारण प्रदूषण हो रहा है। उन्होंने बच्चों से कहा, “कृप्या कैप्टन अंकल और खट्टर अंकल को पत्र लिखें और कहें कि कृप्या हमारी सेहत का ध्यान रखें।”
Delhi CM: Pollution level has deteriorated in Delhi due to smoke from stubble burning in adjoining states, whose number has doubled this year. People are facing difficulty in breathing, & to provide relief, we’re distributing 2 masks to each student in private & govt schools. https://t.co/A5Em3t0vd2pic.twitter.com/zXEqQoWZvU
कहॉं तो दिल्ली सरकार के जिम्मे हवा की गुणवत्ता को सुधारना था ताकि बच्चे अपने फेफड़े में जहर न भरें। लेकिन, उलटे उनका राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा है। वैसा यह पहला मौका नहीं है जब केजरीवाल ने अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए बच्चों का इस्तेमाल किया है। इस साल की शुरुआत में स्कूली बच्चों और उनके अभिभावकों को संबोधित करते हुए उन्होंने मोदी को वोट नहीं देने की अपील की थी। उन्होंने कहा था, “यदि आप अपने बच्चों से प्यार करते हैं, तो उन लोगों के लिए वोट करें जो आपके बच्चों के लिए काम कर रहे हैं। और यदि आप अपने बच्चों से प्यार नहीं करते हैं, तो मोदीजी को वोट दें।” केजरीवाल की ‘बच्चा पॉलिटिक्स’ सियासत में उनकी एंट्री से ही शुरू हो गई थी। उन्होंने अपने बच्चों की कसम खाई थी कि न कॉन्ग्रेस को समर्थन देंगे और ना उससे लेंगे। लेकिन, 2013 में उन्होंने कॉन्ग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई। इस बार भी लोकसभा चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस के साथ वे गठबंधन को लेकर कितने सक्रिय थे यह सबने देखा।
अनिल विज का केजरीवाल पर पलटवार, कहा-दिल्ली में होने वाले प्रदूषण के कारण दिल्ली में ही खोजें https://t.co/HNV986ttBu
दिलचस्प यह भी है कि बीते साल जब दिल्ली की हवा बिगड़ गई थी तब केजरीवाल परिवार के साथ प्राइवेट ट्रिप पर दुबई चले गए थे। इस बार, ऐसे माहौल में भी वे टिके हुए हैं, क्योंकि चुनाव बस चौखट पर ही हैं। यही कारण है कि पराली पर उनके बयान को खारिज करते हुए पंजाब के मंत्री एसएस धर्मसोत ने कहा, “केजरीवाल की बात छोड़िए। जब वे पंजाब में प्रचार कर रहे थे तो कहा था कि एक बूॅंद पानी बाहर नहीं जाने देंगे। दो घंटे बाद हरियाणा में कहा कि पानी पर दोनों राज्यों का हक है। आखिर में दिल्ली में कहते हैं कि पानी पर सबका हक।”
Punjab Minister SS Dharamsot on Delhi CM tweet on stubble burning: Kejriwal ki baat chhodiye yaar.When campaigning in Punjab,he said won't let a drop of water go out of Punjab,after 2 hours in Haryana said water belongs to Haryana&Punjab.Finally in Delhi said water belongs to all pic.twitter.com/Yyyw4xcIXK
जाहिर है, केजरीवाल की इस सियासत को हर कोई बखूबी समझने लगा है। इसलिए, जितनी तेजी से वे चढ़े, उतनी ही तेजी से आप का प्रदर्शन गिर रहा है। पर असल सवाल यह है कि सियासत के फेर में कितना गिरेंगे केजरीवाल?
झारखंड में विधानसभा चुनाव की तारीखों का चुनाव आयोग ने ऐलान कर दिया है। इसके साथ ही राज्य में आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है। 81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा के लिए पॉंच चरणों में मतदान होगा। नतीजे 23 दिसंबर को आएँगे।
5 जनवरी 2020 को झारखंड की वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल पूरा होगा। मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने आज (शुक्रवार) बताया कि पहले चरण का मतदान 30 नवम्बर, दूसरे चरण का 7 दिसंबर, तीसरे चरणा का 12 दिसंबर, चौथे चरण का 16 दिसंबर और पाँचवे चरण का मतदान 20 दिसंबर को होगा।
Chief Election Commissioner, Sunil Arora: Phase-1: Polls on 30 November, phase 2: Polls on 7 December, phase 3: Polls on 12 December, phase 4: Polls on 16th December, phase 5: Polls on 20th December, and counting on 23rd December. https://t.co/ZI432DMXdopic.twitter.com/AhZiX4TAw3
चुनाव पॉंच चरण में कराए जाने को लेकर कॉन्ग्रेस ने सवाल खड़े किए हैं। पार्टी के प्रदेश प्रभारी पूर्व मंत्री आरपीएन सिंह ने कहा है कि पॉंच चरणो में चुनाव कराने का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है। हमने आयोग से एक ही चरण में चुनाव कराने की अपील की थी। बता दें कि झारखंड के 19 जिले नक्सल प्रभावित हैं। इनमें से 13 अति संवेदनशील हैं। इन जिलों में विधानसभा की 67 सीटें हैं। यही कारण है कि सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम को ध्यान में रखते हुए चुनाव पॉंच चरणों में कराने का फैसला लिया गया है। आयोग की टीम ने 17-18 अक्टूबर को राज्य का दौरा भी किया था।
RPN Singh, In-charge Jharkhand Congress, on Jharkhand Legislative Assembly Elections: We welcome the elections in the state, but it is unfortunate that elections are to be held in five phases. Congress had asked EC that elections should be held in one phase in Jharkhand. pic.twitter.com/jPzXxhJPKj
पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 31.3 फीसदी वोट के साथ 37 सीटें जीती थी। उसकी सहयोगी आजसू को 3.7 फीसदी वोट के साथ 5 सीटें मिली थीं। जेएमएम 20.4 फीसदी वोटो के साथ 19 सीटें, कॉन्ग्रेस 10.5 फीसदी वोट के साथ 7 और जेवीएम 10 फीसदी वोट के साथ साथ 8 सीटें जीतने में कामयाब रही थी। इस बार भी भाजपा राज्य की सत्ता में वापसी को लेकर पूरी तरह आशान्वित दिख रही है। जन आशीर्वाद यात्रा के जरिए मुख्यमंत्री रघुवर दास पहले से ही राज्य के दौरे पर हैं। दूसरी ओर, झामुमो और झाविमो के साथ मिलकर कॉन्ग्रेस चुनौती देने की कोशिश कर रही है। हालॉंकि उसकी यह रणनीति लोकसभा चुनाव में बुरी तरह फेल रही थी।
शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने 1984 में सिख दंगा मामले को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है। इसमें उन्होंने भारत सरकार से उन 309 सिख सैनिकों को आरोप मुक्त करने की अपील की है, जिनका कोर्ट मार्शल हुआ था।
Sukhbir Singh Badal, Shiromani Akali Dal (SAD) in a letter to PM Narendra Modi, over 1984 Sikh massacre case: Govt of India should acquit the 309 court-martialled Sikh soldiers of all charges& treat them as ex-servicemen & restore all ex-servicemen benefits to them. pic.twitter.com/O41XgwXbmw
पत्र में बादल ने कहा है कि 1984 में भगोड़ा करार दिए गए 309 सिख सैनिकों का कोर्ट मार्शल किया गया था। उनकी सेवा समाप्त कर दी गई थी। अब इन सिख सैनिकों को सभी आरोपों से बरी कर उन्हें पूर्व सैनिक माना जाना चाहिए। साथ ही उनको पूर्व सैनिकों की तरह सारे लाभ और सुविधाएँ मिलनी चाहिए।
पत्र में कहा गया है, ” प्रधानमंत्री जी, मैं 35 साल पहले सिखों के साथ हुए अन्याय की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूॅं। 1 नवंबर 1984 को उस समय की सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस ने सिखों का नरसंहार कराया। दिल्ली सहित पूरे देश में 10 हजार से ज्यादा लोगों की हत्याएँ की गई। इसके कई गुनहगार आज भी खुलेआम रहे हैं और पीडि़त परिवार इंसाफ का इंतजार कर रहे हैं।”
बादल ने लिखा है, “जून 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सिखों के पवित्रतम स्थल श्री अकाल तख्त साहिब और श्री दरबार साहिब पर सैन्य कार्रवाई का आदेश दिया था। यह आदेश हमले सरीखा था। इस हमले से सिखों की भावनाएं और आत्मा बुरी तरह आहत हुई। सिखों ने इसके लिए कांग्रेस पार्टी को कभी माफ नहीं किया।” पत्र में कहा गया है, “इस हमले के बारे में सुनने के बाद आहत होकर 309 सिख सैनिक अपने बैरक छोड़ बाहर आ गए। बाद में सेना ने उनका कोर्ट मार्शल किया और उनकी सेवा समाप्त कर दी। उनको सजा भी दी गई।”
पत्र में बादल ने कहा है कि सरकार श्री नानक देव जी का 550वॉं प्रकाश पर्व मना रही है। इस अवसर पर तत्कालीन बर्बर सरकार से आहत होकर गलती करने वाले सिख सैनिकों को सभी आरोपों से मुक्त कर देना चाहिए।
पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम एम्स के प्राइवेट वार्ड में इलाज नहीं करा पाएँगे। इस संबंध में दिल्ली हाई कोर्ट ने शुक्रवार को उनकी याचिका खारिज कर दी। हाई कोर्ट ने कहा कि चिदंबरम को एम्स में स्टरलाइज़्ड (जीवाणुरहित) निजी वार्ड में भर्ती करने की आवश्यकता नहीं है। साथ ही अदालत ने जेल अधीक्षक को तिहाड़ में ही उनको साफ और स्वच्छ वातारण मुहैया कराने के दिशा-निर्देश दिए हैं।
पूर्व वित्त मंत्री इस समय INX मीडिया मामले में तिहाड़ जेल में बंंद हैं। बुधवार को विशेष सीबीआई अदालत ने उनकी न्यायिक हिरासत 13 नवंबर तक बढ़ा दी थी। चिदंबरम ने प्रवर्तन निदेशालय की हिरासत को चुनौती देते हुए स्वास्थ्य कारणों से हाई कोर्ट से जमानत मॉंगी थी। उनकी याचिका के आधार पर गुरुवार (31 अक्टूबर) को हाई कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड का गठन भी किया था।
INX media case: Delhi Court disposes of the plea of Congress leader P. Chidambaram’s interim bail with direction to Tihar Jail Superintendent to keep P. Chidambaram’s cell clean & provide mineral water, protection against mosquitoes & he should be provided a face mask. (file pic) pic.twitter.com/7NUhfV5m7C
शुक्रवार (1 नवंबर) को हाई कोर्ट के सामने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पेश की। इसके बाद अदालत ने कहा कि चिदंबरम को एम्स में इलाज के लिए निजी वार्ड में भर्ती करने की आवश्यकता नहीं है। जेल में ही डॉक्टर उनका रेगुलर चेकअप करें। साथ ही उन्हें पीने के लिए मिनरल वाटर देने और मच्छरों से बचाव के लिए लोशन उपलब्ध कराने को कहा।
न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत ने जेल अधीक्षक को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि चिदंबरम के आसपास का परिवेश साफ और स्वच्छ हो। उन्हें घर का बना खाना और साफ मिनरल वाटर उपलब्ध कराया जाए। उन्हें मच्छरदानी और मास्क भी मुहैया कराने के भी निर्देश दिए।
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि चिदंबरम की न्यायिक हिरासत में नियमित स्वास्थ्य जाँच हो। उनका ब्लड प्रेशर आदि चेक किया जाए। जेल में जिस जगह उन्हें रखा जा रहा है वहाँ दिन में दो बार साफ़-सफ़ाई की जाए।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट के सामने रिपोर्ट रखी, जिसमें कहा गया है कि चिदंबरम को स्वच्छ वातावरण देने की जरूरत है, एडमिट करने की ज़रूरत नहीं है। इससे पहले उन्होंने बताया था कि चिदंबरम की जाँच क्रोहन रोग के विशेषज्ञ एम्स के डॉक्टर आहूजा द्वारा की गई है। डॉक्टर आहूजा ने भी चिदंबरम के अनुरोध पर डॉक्टर रेड्डी के साथ बातचीत की, जहाँ उन्होंने कहा कि उपचार की दिशा ठीक है। सॉलिसिटर जनरल ने यह भी तर्क दिया था कि स्टरलाइज़्ड (जीवाणुरहित) वातावरण एम्स में ही आवेदक को उपलब्ध करवाया जा सकता है।
सिब्बल ने इस प्रस्ताव पर कहा था कि चिदंबरम को कम से कम निजी अस्पताल ले जाना चाहिए। जब इस माँग को अस्वीकार कर दिया गया, तो सिब्बल ने एम्स में एक स्टरलाइज़्ड निजी वार्ड देने के लिए निवेदन किया था।