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वकील मुकेश शर्मा की हत्या का मास्टरमाइंड नासिर गिरफ्तार, ससुर जुबैर के साथ वारदात को दिया अंजाम

दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने मेरठ में ब्राह्मण महासभा से जुड़े वरिष्ठ अधिवक्ता मुकेश शर्मा की हत्या के मुख्य आरोपित नासिर को दिल्ली से गिरफ्तार किया है। उस पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने 10 हजार रुपए का इनाम भी घोषित किया था। नासिर खान ने अपने ससुर जुबैर के साथ मिलकर 18 अक्टूबर को अधिवक्ता के घर के पास गोली मारकर उसकी हत्या कर दी थी।

घटना शुक्रवार (18 अक्टूबर) रात 9:30 बजे की है। मुकेश शर्मा खाना खाकर बाहर टहलने निकले थे। इसी दौरान घात लगाए हमलावरों ने उनके घर से क़रीब 400 मीटर की दूरी पर प्राइमरी स्कूल के पास घेरकर उनके सिर में गोली मार दी। इसके बाद हमलावर वहाँ से फ़रार हो गए। गंभीर अवस्था में परिजन उन्हें अस्पताल ले गए, जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। 

डीसीपी डॉ जी राम गोपाल नाइक ने बताया कि वांछित बदमाशों की धरपकड़ के लिए एसीपी श्वेता सिंह चौहान के निर्देशन में इंस्पेक्टर कुलदीप सिंह के नेतृत्व में टीम का गठन किया था। बदमाशों के बारे में जानकारी जुटाए जाने के दौरान सूचना मिली कि हत्या के एक मामले में वांछित बदमाश ओखला मंडी के पास अपने दोस्त से मिलने के लिए आने वाला है। जिसके बाद पुलिस ने नासिर को ओखला मंडी से गिरफ्तार किया।

पूछताछ में नासिर ने बताया कि उसने और उसके ससुर जुबैर ने 700 गज जमीन वकील मुकेश के भतीजे अभिषेक से खरीदी थी। मृतक की फैमिली का आपस में जमीन के बँटवारे को लेकर विवाद चल रहा था। मुकेश 37 लाख रुपए लौटा भी नहीं रहा था और जमीन की रजिस्ट्री भी नहीं करवा रहा था। इसलिए मुकेश के भतीजे अभिषेक, नासिर, जुबैर और उनके परिजनों ने उनकी हत्या कर दी।

इस मामले में पाँच आरोपितों को यूपी पुलिस पहले ही गिरफ्तार कर चुकी है। जिसमें ओमकार, योगेश, चेतन, नौशाद और ज़ुबैर का नाम शामिल है। गौरतलब है कि मृतक मुकेश शर्मा मेरठ बार एसोसिएशन के सदस्य और ब्राह्मण सभा के भी पदाधिकारी थे। हत्या की इस घटना के बाद गुस्साए ग्रामीणों ने अस्पताल में पुलिस अधिकारियों का घेराव किया था और कई घंटों तक शव का पंचनामा नहीं भरने दिया था। वहीं घटना की जानकारी मिलते ही भारी संख्या में अधिवक्ता भी अस्पताल पहुँचे थे।

बता दें कि नासिर और उसके साथियों जुबैर, नौशाद आरिफ और शमशेर ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी थी और जून 2018 में सदर तहसील के सामने मुकेश शर्मा पर नासिर, ज़ुबैर और जियाउल हक़ ने जानलेवा हमला भी किया था। जिसका मुक़दमा सदर बाजार थाने में दर्ज है। हालाँकि, इस मामले में पुलिस ने गिरफ़्तारी नहीं हुई थी। आरोपित कोर्ट से स्टे ले आए थे, मगर इस मुक़दमे में चार्जशीट दाखिल है।

बग्वाल: जहाँ बिना आतिशबाजी और पटाखों के मनाया जाता है प्रकाशपर्व दीपावली

त्योहार और उत्सव का मौसम हो और इसमें उत्तराखंड का ज़िक्र न आए यह संभव ही नहीं है। दीपावली के त्यौहार को लेकर देशभर में तैयारियाँ जोरों पर हैं। लेकिन उत्तराखंड में यह प्रकाशपर्व यानी दीपावली बिना पटाखे, आतिशबाजियों और वैचारिक प्रदूषण के ही ख़ास तरीके से मनाया जाता है। देवभूमि कहे जाने वाले इस राज्य में दीपावली को इगास और बग्वाल कहा जाता है। यह बग्वाल राज्य के अलग-अलग स्थानों में दिवाली से 11 दिन बाद और ठीक एक महीने बाद मनाई जाती है। इसके पीछे कारण उत्तराखंड का इतिहास और जनजातीय परम्पराएँ हैं।

दरअसल, उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में दीवाली मनाने के तौर-तरीके देश के अन्य इलाकों से काफी अलग हैं। गढ़वाल में एक नहीं बल्कि चार-चार दीपावली मनाने की परम्परा है। स्थानीय भाषा में इन्हें अलग-अलग नाम दिया गया है। गढ़वाल में कार्तिक दीपावली के अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों में इगास, राज और मार्गशीर्ष दीपावली भी धूमधाम से मनाई जाती हैं। इन्हें भी लोग कार्तिक दीपावली की तरह मनाते हैं।

राज दिवाली

टिहरी जनपद में इस दीपावली से एक दिन पूर्व ‘राज’ दीपावली को मनाने की अनोखी परम्परा है। इस दीपावली को सिर्फ एक ख़ास जाति के लोग, यानी केवल डोभाल जाति के लोग मनाते हैं। इन्हें इस दीपावली को मनाने का अधिकार रियासत के समय से मिला था, इसलिए यह प्रथा डोभाल जाति में आज भी प्रचलित है।

इगास

इसी तरह से कार्तिक दीपावली के ठीक ग्यारह दिन बाद आकाश दीवाली मनाई जाती है जिसे स्थानीय भाषा में ‘इगास’ कहते हैं। इसे मनाने के पीछे यह मान्यता है कि वनवास के बाद पांडवों में से चार भाई घर वापस लौट गए, लेकिन भीम कहीं युद्ध में फँस गए थे। माना जाता है कि ग्यारह दिन बाद ही भीम घर लौटे और इस तरह तब से आज तक यह आकाश दीपावली या इगास दिवाली मनाई जाती है।

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दूसरी मान्यता उत्तराखंड के इतिहास से जुड़ी है। महाराजा के सेनापति माधो सिंह भंडारी एक बार तिब्बत के युद्ध में तिब्बतियों को खदेड़ते हुए दूर निकल गए। वह दीपावली के समय अपने घर नहीं लौट पाए थे। उस वक्त अनहोनी की आशंका के कारण पूरी रियासत में दीपावली नहीं मनाई गई थी। बाद में रियासत का यह सेनापति युद्ध में विजयी बनकर लौटा। यह खबर रियासत में दीपावली के ग्यारह दिन बाद पहुँच पाई थी। जिसके पश्चात् टिहरी के समीपवर्ती इलाकों में इगास का त्योहार मनाया जाता है।

बग्वाल: मार्गशीर्ष दीपावली

उत्तराखंड में कार्तिक दीपावली के ठीक एक माह पश्चात् मार्गशीर्ष की दीपावली मनाई जाती है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘रिख बग्वाल’ कहते हैं। इस दिन उत्तराखंड के जनजातीय इलाकों जैसे- रवांई जौनपुर, जौनसार व बावर क्षेत्र में सीड़े, अरसे, पूरी-पकोड़े आदि पकवानों सहित चूड़ा कूटने की भी परम्परा है। ग्रामीण रात भर तांदी, गीत, राधे व पांडव नृत्य करते हुए उत्सव मनाते हैं। मार्गशीर्ष की इस दीपावली या बग्वाल पर आतिशबाजी का शोर नहीं होता और ना ही बारूद के प्रदूषण का खतरा।

इसे मनाने के लिए देवदार के पुराने पेड़ों की लकड़ियाँ और छाल इस्तेमाल किए जाते हैं। जिन्हें जलाकर पारंपरिक उत्सव मनाए जाते हैं।

उत्तराखंड में दीपावली के 11 दिन या एक माह बाद माने जाने के पीछे एक और मान्यता बताई जाती है। कहा जाता है कि गढ़वाल क्षेत्र में भगवान राम के अयोध्या पहुँचने की खबर दीपावली के ग्यारह और कुछ स्थानों में एक माह बाद मिली और इसीलिए ग्रामीणों ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए बाद दीपावली का त्योहार मनाया था और इसी परंपरा को निभाते गए।

देवदार की लकड़ियों से बने ‘भैलू” से बग्वाल मनाते हुए ग्रामीण

लेकिन इन सबसे अलग इन त्योहारों को मनाने का तर्क यह माना जाता है कि जनजातीय इलाकों में लोग अपनी खेती में इस समय इतने व्यस्त होते हैं कि वो किसी त्यौहार की तैयारियाँ कार्तिक माह में नहीं कर पाते हैं। इसी वजह से मार्गशीर्स के माह अपने समस्त कार्यों को निपटाने के बाद ही ग्रामीण लोग इस दीपावली को मनाते आए हैं।

उत्तराखंड भिन्न-भिन्न संस्कृतियों का एक अनोखा संगम है और अब इन्ही परम्पराओं को सुरक्षित रखना भी यहाँ के स्थानीय लोगों के लिए एक गंभीर विषय बनता जा रहा है। अक्सर सरकार द्वारा भी इन परम्पराओं को बचाए रखने के लिए प्रयास किए जाते हैं। हालाँकि, पलायन जैसे संक्रामक रोग का असर फिर भी पूरे उत्तराखंड को लील रहा है और गाँव खाली होते जा रहे हैं। सवाल अब भी यही है कि जब गाँव में लोग ही नहीं रहेंगे तो फिर संस्कृति को सुरक्षित किसके लिए और आखिर कैसे रखा जा सकेगा?

किसी की नहीं सुनेंगे, बच्चा पैदा करने के लिए जो भी करना होगा, करेंगे मुस्लिम: बदरुद्दीन अजमल

असम सरकार की दो बच्चों की नीति पर ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के प्रमुख और सांसद बदरुद्दीन अजमल ने करारा हमला बोला है। अजमल का कहना है कि मुस्लिम बच्चे पैदा करते रहेंगे और वे किसी की नहीं सुनेंगे। बता दें कि असम भाजपा सरकार ने उन लोगों को सरकारी नौकरी नहीं देने का फैसला किया है, जिनके दो से अधिक बच्चे हैं। 

बदरुद्दीन अजमल ने शनिवार (अक्टूबर 26, 2019) को गुवाहाटी में कहा, “मैं निजी तौर पर मानता हूँ और हमारा धर्म भी मानता है कि जो लोग दुनिया में आना चाहते हैं, उन्हें आना चाहिए और उन्हें कोई रोक नहीं सकता है।”

असम में बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार को निशाने पर लेते हुए बदरुद्दीन अजमल ने कहा कि असम सरकार चाहे जो भी कानून बना लें, लेकिन मुस्लिमों पर उसका कोई असर नहीं पड़ने वाला है। उनका कहना है कि प्रकृति को छूने की कोशिश करना ठीक बात नहीं है। उन्होंने कहा कि बच्चा पैदा करने के लिए जो भी करना होगा, मुस्लिम करेंगे। बाद में यह मत कहना कि हमारे बच्चे अधिक हैं। साथ ही उन्होंने प्रकृति के साथ खिलवाड़ न करने की भी हिदायत दी।

बदरुद्दीन का कहना है कि असम सरकार मुस्लिमों को सरकारी नौकरी देने से रोकने के लिए यह कानून लाई है। उन्होंने कहा कि सचर समिति के अनुसार अभी 2 फीसदी से भी कम मुस्लिमों को सरकारी नौकरी मिलती है। अब मुस्लिम समुदाय के बीच भी साक्षरता बढ़ रही है और वो दुनिया भर में काम कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि एक तरफ RSS और मोहन भागवत कहते हैं कि 10-10 बच्चे पैदा करो और दूसरी तरफ सरकार कहती है कि जिनके दो से ज्यादा बच्चे होंगे उन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी। पहले यह तय कर लें कि वे क्या चाहते हैं। आरएसएस जो कहता है वे (बीजेपी सरकार) उसे मानते नहीं हैं।

उल्लेखनीय है कि असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल की कैबिनेट ने 22 अक्टूबर को यह फैसला लिया कि जिनके दो से ज्यादा बच्चे होंगे उन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी। कैबिनेट फैसले के मुताबिक 1 जनवरी, 2021 के बाद से दो से अधिक बच्चे वाले लोगों को कोई सरकारी नौकरी नहीं दी जाएगी।

4.5 साल में 2 सीएम देने वाली शिव सेना माँग रही 2.5 साल, उसकी गलती से ही भाजपा ने भोगा 15 साल का वनवास

शिव सेना की घुड़की भाजपा के लिए नई नहीं है। 2014 में भी जब महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के नतीजे आए थे तो बहुमत से दूर भाजपा के साथ आने में शिव सेना शुरू में तीन तेरह ही कर रही थी। भाजपा ने अल्पमत की सरकार बनाई और बाद में थक-हार शिव सेना भी सरकार में शामिल हो गई। हालॉंकि उस चुनाव में दोनों दल अलग-अलग लड़े थे। इसलिए, इस बार जब दोनों दल साथ-साथ विधानसभा चुनाव लड़ने मैदान में उतरे तो लगा कि शायद शिवसेना का खटराग न सुनाई पड़े।

लेकिन, 2014 के मुकाबले भाजपा की कुछ सीटें क्या गिरी शिव सेना को पुराने ढर्रे पर लौटने में वक्त नहीं लगा। सो, वह कथित ‘50:50 (सत्ता में समान हिस्सेदारी) फॉर्मूले’ की बात करने लगी। अब वह चाहती है कि बीजेपी उसे इस संबंध में लिखित आश्वासन दे। शिव सेना की इच्छा है कि बिल्ली के भाग्य से छींका छूटे और उसे 2.5 साल के लिए सीएम का पद मिल जाए। हालॉंकि उसकी यह इच्छा पूरी होती नहीं दिख रही।

2.5 साल के सीएम कुर्सी के लिए भाजपा के दर पर चिरौरी कर रही शिव सेना को राज्य में पहले एक बार सरकार चलाने का मौका मिल चुका है। उस सरकार में भाजपा भी साझेदार थी। तब शिव सेना की कमान उद्धव ठाकरे के पिता बाला साहेब के हाथों में थी। उस समय सरकार चलाने में शिव सेना की ओर से जो-जो नायाब प्रयोग किए गए थे, उसकी कीमत साझेदार होने के नाते भाजपा को भी चुकानी पड़ी थी। महाराष्ट्र की सत्ता में वापसी करने में फिर भाजपा को 15 साल लग गए, जबकि उस सरकार में भाजपा के कोटे से शामिल नितिन गडकरी जैसे मंत्रियों ने इतना शानदार काम किया था कि आज भी उसकी मिसाल दी जाती है।

1995 में बनी उस सरकार को बाल ठाकरे ने रिमोट कण्ट्रोल से चलाते थे। बाल ठाकरे को जब लगा कि मुख्यमंत्री मनोहर जोशी उनके हिसाब से नहीं चल रहे हैं, तो उन्होंने मुख्यमंत्री बदलने में देर नहीं लगाई। उसके बाद नारायण राणे को जिम्मेदारी दी गई। इसके बाद 1999 में समय से पहले ही लोकसभा के साथ ही विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया।

इसके लिए उस समय की स्थिति को समझते हैं। शरद पवार को कॉन्ग्रेस ने निकाल बाहर किया था। उन्होंने एनसीपी की स्थापना की। तो इस हिसाब से इस चुनाव में एक नई पार्टी हिस्सा ले रही थी। उधर, दिल्ली में भी राजनीतिक उथल-पुथल चल रही थी। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार मात्र 1 वोट से गिर गई थी और संसद में दिया गया उनका ओजस्वी भाषण घर-घर तक पहुँचा था। बावजूद इन चीजों के शिव सेना और भाजपा ने 6 महीने पहले ही विधानसभा भंग कर चुनाव कराने का फ़ैसला किया। आख़िर साढ़े 4 साल सरकार चलाने के बावजूद समय-पूर्व चुनाव की नौबत ही क्यों आई?

दरअसल, शिवसेना जिस स्टाइल से सरकार चला रही थी वह लोगों को रास नहीं आ रहा था। बाल ठाकरे को इसका ख़ूब भान था। इसलिए, लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव कराने का फ़ैसला लिया गया। इस उम्मीद में कि वाजपेयी नैया पार लगा देंगे।

यह भी देखिए कि आज जो पवार सोनिया गाँधी की अध्यक्षता वाले गठबंधन का हिस्सा हैं, कभी गाँधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठा कॉन्ग्रेस से बाहर निकले थे। पवार ने इसे भुनाया। उन्होंने जनता को यह बताने का प्रयास किया कि एक मराठा क्षत्रप के उभरने से कॉन्ग्रेस आलाकमान को दिक्कत है। अगर ध्यान से देखें तो शिव सेना, कॉन्ग्रेस और राजद जैसी वंशवादी पार्टियों से अलग नहीं है। बाल ठाकरे शायद अपनी राजनीतिक विरासत किसी और के हाथ जाने को लेकर कुछ ज्यादा ही आशंकित थे। अगर ऐसा न होते तो 2004 महाराष्ट्र चुनाव से ऐन पहले उन्होंने पार्टी में कार्यकारी अध्यक्ष का नया पद गठित कर इस पर अपने बेटे उद्धव को नहीं बैठाया होता।

यही कारण है कि चुनाव दर चुनाव जो शिव सेना महाराष्ट्र में राजग गठबंधन की मुख्य पार्टी होती थी, वह छोटा भाई बन कर रह गई। यह पार्टी की मज़बूरी ही थी कि उसे ऐसा करना पड़ा। भाजपा के विरोध के शिव सेना ने हिंदुत्व-विरोधी तरीके भी अपनाए, जिससे पार्टी की हिंदुत्ववादी छवि अवश्य ही कमज़ोर हुई और भाजपा बड़े भाई के रूप में उभरी। एक उदाहरण देखिए। जब 2015 में जब जैन त्योहार के दौरान सरकार ने एक दिन के लिए मीट प्रतिबंधित किया, तब शिव सेना ने उसका कड़ा विरोध किया। कई शिव सेना और मनसे समर्थक जैन मंदिरों से लेकर जैन सोसाइटियों के बाहर माँस का स्टॉल लगाने और चिकेन बनाते देखे गए। सामना में जैन समुदाय के ख़िलाफ़ ज़हर उगला गया। बाद में आदित्य ठाकरे को स्पष्टीकरण देना पड़ा। जैन साधुओं को मातोश्री जाकर उद्धव से मुलाक़ात करनी पड़ी।

उपर्युक्त कारणों जैसे कई अन्य कारणों से भी हिंदुत्व क्षेत्र में शिव सेना की साख पहले जैसी नहीं रही। जब उद्धव मुख्यमंत्री के साथ मंच साझा करना अपनी शान के ख़िलाफ़ समझने लगे थे, तब देवेंद्र फडणवीस ने बाल ठाकरे की प्रतिमा स्थापित करने का ऐसा दाँव खेला कि उन्हें एक मंच पर आना ही पड़ा। कुल मिला कर देखें तो शिव सेना वो बादल है, जो गरजती ज्यादा है लेकिन बरसने के नाम पर एकाध बूँद भी आफत हो जाए। 1999 चुनाव में भी यही हुआ। लोकसभा चुनाव में वाजपेयी के नाम पर महाराष्ट्र की जनता ने भाजपा शिवसेना गठबंधन को 28 सीटें दी। उसी जनता ने गठबंधन को विधानसभा चुनाव में सत्ता से बेदखल कर दिया। एक साथ हुए चुनाव में दो विरोधाभासी परिणाम। जाहिर है सरकार चलाने की शिव सेना की शैली से लोग खुश नहीं थे।

1995 में जीत के बाद बाल ठाकरे, आडवाणी और मनोहर जोशी

शिव सेना की सरकार के दौरान मुख्यमंत्री तक पर भ्रष्टाचार के बड़े आरोप लगे। मनोहर जोशी ने एक प्रमुख सरकारी ज़मीन को अपने दामाद को दे दिया, ताकि हाउसिंग कॉम्प्लेक्स बनाया जा सके। इस मामले में 2011 में टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री जोशी, जो ख़ुद को एक शिक्षाविद भी बताते हैं, उन्होंने अपने दामाद के व्यक्तिगत फायदे के लिए उक्त ज़मीन पर स्कूल बनवाया। कोर्ट ने कहा था कि अगर उनके दामाद गिरीश व्यास ने उस 15 मंजिला इमारत से अपना मालिकाना हक़ नहीं छोड़ा तो उसे गिरा दिया जाएगा। साथ ही जोशी पर 15,000 रुपए का जुर्माना लगाया। जोशी ने ख़ुद इस डील को मुख्यमंत्री रहते स्वीकृति दी थी और उस समय इसे लेकर काफ़ी विवाद हुआ था। तो ऐसे चली थी शिव सेना की सरकार।

जब बाल ठाकरे के रहते शिव सेना न तो सरकार ठीक से चला पाई और न ही वाजपेयी के जादू से भी अपनी नाकामी को छिपा पाई, वह उद्ध्व के नेतृत्व में कोई कमाल कर दिखाएगी ऐसी उम्मीद तो शिव सैनिकों को भी न होगी। इतना ही नहीं बीएमसी का शिव सेना किस तरीके से नेतृत्व करती है इसका नमूना हर साल बारिश में मुंबई सहित देश भर के लोग देखते हैं।

उद्धव के नेतृत्व में सिकुड़ती शिव सेना जानती है कि आज भाजपा और मोदी के बिना उसके सामने अस्तित्व का संकट पैदा हो सकता है। कुछ क्षेत्र विशेष तक सीमित शिव सेना को हालिया वर्षों में जो राजनीतिक उभार मिला है उसके पीछे मोदी की ही लोकप्रियता है। वरना भाजपा से अलग होकर वह 2014 के विधानसभा और 2017 के बीएमसी चुनाव में नतीजे भुगत चुकी है। इसलिए देर सबेर शिव सेना का फिर उसी रास्ते पर लौटना तय है। तब तक उसके राजनीतिक फुफकार के मजे लीजिए!

हमने कांडा से किया किनारा, कॉन्ग्रेस थरूर को निकाल कर दिखाए: सुब्रह्मण्यम स्वामी

गोपाल कांडा पर भाजपा को घेरने की कोशिश करने वालों को पार्टी सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने आड़े हाथों लिया है। उन्होंने कहा है कि भाजपा ने तो कांडा से किनारा कर लिया। लेकिन, क्या उसी तरह के आरोप में फॅंसे अपने सांसद शशि थरूर के खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत कॉन्ग्रेस में है।

उन्होंने ट्विटर पर लिखा, “अब जबकि भाजपा ने पब्लिक ओपिनियन के आगे सर झुकाते हुए गोपाल कांडा को नकार दिया है। क्या कॉन्गी (कॉन्ग्रेसी) भी पब्लिक ओपिनियन के आगे सर झुकाते हुए मिस्टर शशि थरूर को पार्टी से बाहर करेंगे? उन पर अपनी पत्नी को अप्राकृतिक मौत के लिए उकसाने का अधिक गंभीर आरोप है।”

गौरतलब है कि 17 जनवरी 2014 को दिल्ली के होटल लीला में थरूर की पत्नी 51 वर्षीय सुनंदा पुष्कर मृत मिली थीं। उनकी मौत के बाद से पुलिस ने थरूर के खिलाफ़ आईपीसी की धारा 498-A और धारा -306 के तहत मामला दर्ज किया। फिलहाल वह जमानत पर हैं। दिल्ली पुलिस ने इस मामले में अदालत से कॉन्ग्रेस सांसद के खिलाफ हत्या का मामला चलाने की इजाजत मॉंगी है।

सुस्वामी का यह बयान कॉन्ग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी के भाजपा पर हमले के जवाब में आया है। तिवारी ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा था कि भगवा पार्टी राज्य में सरकार बनाने के लिए किसी का भी समर्थन ले लेगी, वह भी तब जब जनादेश ही उसके खिलाफ है। बकौल तिवारी, “कांदा, बटाटा, बैंगन, आलू सब चलेगा बीजेपी को। साम दाम दंड भेद- सरकार बनानी है बीजेपी को। हर गलत तरीके से, जबकि जनादेश भी उनके खिलाफ है। हुँह, पार्टी विथ अ डिफ़रेंस!”

हरियाणा विधानसभा चुनाव का परिणाम सामने आने के बाद हरियाणा लोकहित पार्टी के प्रमुख गोपाल कांडा ने भाजपा को समर्थन देने का ऐलान किया था, जिसको लेकर विपक्षी दलों ने काफी बवाल काटा। हालाँकि, भाजपा ने स्पष्ट कर दिया है कि उसने न तो कांडा से समर्थन मॉंगा था और न ही वे उसकी सरकार में होंगे। कांडा के ख़िलाफ़ एक एयर होस्टेस की आत्महत्या से जुड़ा मामला चल रहा है।

नगालैंड में शांति की राह में रोड़ा बन रहे गुट में बगावत, अलग निशान और अलग विधान की मॉंग से किनारा

ईसाई बहुल नगालैंड के अलग संविधान और झंडे के लिए ज़िद पर अड़े नगा अलगाववादी संगठन एनएससीएन (आईएम) को बड़ा झटका लगा है। उसकी इस माँग से किनारा करते हुए उसके 17 सदस्य नगा नेशनल पोलिटिकल ग्रुप्स (एनएनपीजी) में शामिल हो गए हैं। यह विभिन्न नगा राजनीतिक संगठनों का एक समूह है। एनएससीएन (आईएम) छोड़ने वालों में हुकावी येपुतोमि भी हैं। एनएससीएन (आईएम) छोड़ने वालों में हुकावी येपुतोमि भी हैं। वे एनएससीएन (आईएम) की समानांतर सरकार में गृह मंत्री रहे हैं। केंद्र सरकार और गवर्नर आरएन रवि से शांति वार्ता करने वाली टीम में भी वे शामिल थे।

कल (शुक्रवार, 26 अक्टूबर, 2019 को) रात जारी किए गए बयान में हुकावी येपुतोमि ने कहा कि एनएनपीजी की वर्किंग कमेटी केंद्र सरकार के साथ अपनी वार्ता और लेनदेन में “वास्तविक और यथार्थवादी” है। “बिना अपने इतिहास और साझा पहचान से समझौता किए, मैं, हुकावी येपुतोमि, एनएससीएन (आईएम) का भूतपूर्व किलो किलोनसर (गृह मंत्री) और वर्तमान में एनएससीएन (आईएम) की वार्ता टीम का सदस्य, अपने 16 साथियों के साथ अपनी इच्छा और स्वच्छ अंतःकरण से, डब्लूसी एनएनपीजी की सदस्यता ग्रहण करता हूँ।”

येपुतोमि ने कहा कि भूराजनीतिक परिस्थितियों की माँग है कि नगा इस मोड़ पर यथार्थवादी रुख अख्तियार करें। उन्होंने एनएससीएन (आईएम) के चेयरमैन क्यू तुक्कु और ‘अतो किलोनसर’ (प्रधान मंत्री) टी मुइवाह पर आरोप लगाया कि वे नगा लोगों की एक सम्मानजनक समझौते और हल की याचनाओं को लेकर असंवेदनशील हैं।

उन्होंने कहा, “हम इस को लेकर आश्वस्त हैं कि नगाओं की भविष्य की पीढ़ियों के हित और सम्भावनाएँ के आड़े अनसुलझे प्रतीकात्मक मुद्दों को नहीं आने देना चाहिए, जब वार्ता कर रहे पक्ष इस नतीजे पर बहुत समय पहले ही पहुँच गए हैं कि सम्प्रभुता और विलय वर्तमान में सम्भव नहीं हैं।” साथ ही जोड़ा, “मेरा निर्णय हमारे लोगों की शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की इच्छा पर आधारित है। हम किसी के लिए दिल में वैर भाव नहीं रखते हैं और उम्मीद है कि हमारे निर्णय का सम्मान किया जाएगा।”

गौरतलब है कि सरकार की शांति वार्ता सात नगा संगठनों के साथ चल रही है और NSCN (IM) के अलावा बाकी सभी 22 साल से खिंच रही वार्ता खत्म कर शांति समझौते पर हस्ताक्षर के पक्ष में बताए जा रहे हैं। NSCN (IM) के नेता भी सरकार के साथ पहले ही ‘Framework Agreement’ पर हस्ताक्षर कर चुके हैं। जहाँ सरकार ‘Framework Agreement’ के दायरे में झंडा और संविधान के मुद्दों के न आने की बात कर रही है, वहीं NSCN (IM) ‘Framework Agreement’ में इन दोनों का वादा किए जाने की बात कह रही है। सरकार ने वार्ता के लिए अंतिम तिथि 31 अक्टूबर, 2019 को तय करते हुए इसे आगे बढ़ाने से इंकार कर दिया है।

श्रीनगर में CRPF पर आतंकियों ने फेंका ग्रेनेड, 6 जवान जख्मी, सर्च ऑपरेशन शुरू

जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर के करन नगर इलाके में शनिवार को केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के एक दल पर आतंकवादियों ने ग्रनेड फेंका। हमले में छह जवान जख्मी हो गए। हमला सीआरपीएफ CRPF की 144वीं बटालियन को निशाना बनाकर किया गया। जवानों का यह दल सुरक्षा चौकी पर तैनात था।

पुलिस के अनुसार ग्रेनेड तेज आवाज के साथ फटा और इलाके में दहशत फैल गई। अधिकारियों के अनुसार सुरक्षाबलों ने जवाब में हवा में गोलियॉं चलाई। हमले के बाद सुरक्षा बलों ने पूरे इलाके को घेर कर सर्च ऑपरेशन शुरू किया है। बुधवार शाम को इसी तरह कुलगाम जिले में आतंकियों ने सीआरपीएफ जवानों की एक टीम पर ग्रेनेड हमला किया था। इसमें एक जवान घायल हो गया था।

इस बीच, जम्मू-कश्मीर के पुलिस महानिदेशक दिलबाग सिंह ने कहा है कि आतंकवादी घाटी में पर्यटकों और बागानों को निशाना बनाने के बाद अब जल और विद्युत आपूर्ति समेत पूरे बुनियादी ढांचे काे तबाह करने का प्रयास कर रहे हैं। सिंह ने कहा कि सुरक्षा बल आतंकवादियों द्वारा बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुँचाने और घाटी से सेबों को ट्रकों में भरकर राज्य से बाहर ले जाने वाले चालकों को निशाना बनाने की कोशिशों को विफल करने के लिए पूरी तरह सतर्क हैं। उन्होंने कहा, “देश के विभिन्न भागों से घाटी में सेब लेने आए ट्रक चालकों पर हमले होने से राज्य की अर्थव्यवस्था को चोट पहुँच रही है। यह राज्य बागवानी और कृषि पर निर्भर है तथा आतंकवादी पाकिस्तान के इशारे पर इन दोनों ही क्षेत्रों को क्षति पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।”

डीजीपी ने यह भी जोड़ा कि यह घाटी के लोगों की आमदनी पर सीधा हमला है और इस तरह के कृत्यों में शामिल लोगों के साथ सख्ती से निपटा जाएगा। ट्रक चालकों पर हमलों में शामिल लोगों की पहचान कर ली गई है। उन्होंने यह भी बताया कि कि आतंकवादियों ने उत्तर कश्मीर में एक उच्च शक्ति वाले विद्युत टावर को भी निशाना बनाने का प्रयास किया था, जिसे सुरक्षा बलों ने विफल कर दिया।

‘6 दिसंबर से राम मंदिर का निर्माण’: 5.51 लाख दीये अयोध्या में जले, 2500 बच्चों ने पेश की रामलीला

अयोध्या मे दिवाली के मौके पर 5.51 लाख दीपक जलाए गए, जो अपने-आप में एक विश्व रिकॉर्ड है। श्रीराम की नगरी अयोध्या में ‘राम की पैड़ी’ पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित कई बड़े नेताओं ने भाग लिया। शनिवार (अक्टूबर 26, 2019) को आयोजित इस कार्यक्रम में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल भी मौजूद रहीं। उत्तर प्रदेश में योगी सरकार आने के बाद से ही दीपोत्सव के कार्यक्रम को भव्य बनाने पर विशेष जोर रहा है लेकिन इस बार का कार्यक्रम बेहद ख़ास है, क्योंकि अयोध्या विवाद पर अगले महीने सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने की उम्मीद है।

इस दौरान सीएम योगी ने एक मुहावरे का प्रयोग करते हुए नए भारत की ताक़त का एहसास दिलाया। उन्होंने कहा कि आज का भारत किसी को छेड़ता नहीं है, लेकिन कोई और छेड़े तो छोड़ता भी नहीं है, हमारा देश आज इस स्थिति में पहुँच चुका है। पिछले साल इसी दीपोत्सव कार्यक्रम के दौरान लगभग 4 लाख दीये जलाए गए थे, जबकि इस बार पिछली बार से भी 1.5 लाख ज्यादा दीपक जलाए गए हैं। इस दौरान भगवान राम की चर्चा करते हुए सीएम योगी ने कहा:

प्रभु श्रीराम सबके हैं। निषादराज, शबरी, गिद्धराज जटायु से लेकर गिरिजनों तक, इसीलिए वे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। प्रभु श्रीराम उत्तर में हिमाच्छादित हिमालय से लेकर दक्षिण के समुद्र तट तक और पूर्व में ब्रह्मपुत्र घाटी से लेकर राजस्थान के थार मरूस्थल तक सर्वमान्य हैं। यह भव्य और दिव्य दीपोत्सव तमस को दूर करने वाला तथा समाज के सभी वर्गों को प्रभु श्रीराम जी के आदर्शों से एकात्म स्थापित करने वाला है। मैं आह्वान करता हूँ कि इसमें शामिल होकर सामाजिक समरसता के प्रतीक, समाज और परिवार के लिए आदर्श मर्यादा पुरुषोत्तम से एकाकार हों।

इस अवसर पर 2500 छात्रों ने विभिन्न कलाओं द्वारा रामायण की कथा का प्रदर्शन किया। सरकार ने इसे ‘अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम’ करार देते हुए 133 लाख रुपए ख़र्च किए हैं। सरकार ने इसे ‘स्टेट फेयर’ का दर्जा दिया है। मध्य प्रदेश, झारखण्ड और राजस्थान से कलाकार पहुँचे हुए हैं। रामकथा पार्क में उन्होंने अपनी प्रस्तुतियाँ दी।

उधर, उन्नाव के सांसद साक्षी महाराज ने कहा है कि 6 दिसंबर से राम मंदिर का निर्माण प्रारम्भ हो जाएगा। उन्होंने मामले को गंभीरता से सुनने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जजों का धन्यवाद करते हुए उन्नाव में कहा कि 6 दिसंबर से पहले ही राम मंदिर के निर्माण का कार्य शुरू हो जाएगा। उन्होंने कहा कि जैसे अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद एक पत्ता भी नहीं हिला, वैसे ही हिन्दू और मुस्लिम मिल कर राम मंदिर निर्माण का कार्य शुरू करेंगे। साक्षी महाराज ने उन्नाव में अधिकारियों व नेताओं के साथ विकास कार्यों की भी समीक्षा की। इस बैठक के दौरान जिले की प्रभारी मंत्री कमल रानी अरुण ने अफसरों को कड़ी डाँट पिलाई।

मोदी का यह एहसान शायद ही भूल पाएँ चारा घोटाले में सजा काट रहे लालू, परिवार में अरसे बाद मना जश्न

चारा घोटाले में सजा काट रहे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के घर अरसे बाद खुशियॉं लौटी है। आम चुनावों की निराशा और पारिवारिक कलह को पीछे छोड़ते हुए परिवार के सदस्यों ने जश्न मनाया है। जश्न हरियाणा विधानसभा चुनाव में लालू के दामाद और कॉन्ग्रेस के टिकट पर चिरंजीव राव की जीत का मनाया गया। मीडिया रिपोर्टों की माने तो इस खुशी का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है।

चिरंजीव हरियाणा के दिग्गज कॉन्ग्रेस नेता कैप्टेन अभय सिंह के पुत्र हैं। उनकी शादी लालू की छठी नंबर की बेटी अनुष्का से हुई है। आपको याद होगा कि जब पटना बारिश के पानी में डूब गया था और लोग पूछ रहे थे कि विपक्ष कहॉं है तो लालू के बेटे तेजस्वी यादव की एक तस्वीर वायरल हुई थी। बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी हरियाणा में एक उम्मीदवार का नामांकन पत्र दाखिल करवा रहे थे। ये उम्मीदवार चिरंजीव राव ही थे।

असल में उस समय तेजस्वी के ट्विटर हैंडल से पटना जलजमाव को लेकर ज्ञान भरे ट्वीट्स आ रहे थे, तो दूसरी तरफ चिरंजीव राव के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से जो चीजें सामने आ रही थीं, उसमें तेजस्वी हरियाणा के कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं को चुनाव जीतने के गुर सिखाते नज़र आ रहे थे। तेजस्वी कार्यकर्ताओं को बता रहे थे कि कैसे मजबूती से एकजुट होकर काम करना है और हर बूथ पर नजर रखना है।

जब बिहार में ये चर्चाएँ जोरो पर चल रही थीं कि जलजमाव की इस भयंकर स्थिति में निष्क्रिय सरकार से सवाल पूछने के लिए विपक्ष कहाँ है, तब तेजस्वी यादव अपनी बहन के पति चिरंजीव राव के समर्थकों को बता रहे थे कि हर बूथ जीतोगे तो चुनाव जीतोगे। हरियाणा के रेवाड़ी सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय था। भाजपा के सुनील यादव, भाजपा से बगावत कर निर्दलीय लड़ रहे रणधीर सिंह कापड़ीवास और कॉन्ग्रेस के चिंरजीव राव के बीच। भाजपा का वोटर कापड़ीवास के बगावत को समर्थन देता दिख रहा था, लेकिन पीएम मोदी की रैली ने तस्वीर बदल दी और सुनील यादव के पक्ष में भाजपा का वोटर झुक गया। इस बदले समीकरण में चिरंजीव ने महज 1,331 वोटों से बाज़ी मार ली।

लालू यादव की पुत्री धन्नू उर्फ़ अनुष्का और हरियाणा के तत्कालीन बिजली मंत्री कैप्टेन अजय सिंह यादव के पुत्र चिरंजीव राव की शादी 2012 में हुई थी। उस समय लगन समारोह के लिए रेवाड़ी पहुँचे लालू के स्वागत में रणदीप सुरजेवाला सहित कई कॉन्ग्रेसी नेता स्वागत के लिए पलकें बिछाए खड़े थे। वकालत की पढाई कर चुके चिरंजीव तब हरियाणा युवक कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष थे। अप्रैल महीने में हुए इस समारोह में करीब-करीब हरियाणा का पूरा मंत्रिमंडल ही मौजूद था। इस हाई प्रोफाइल शादी समारोह के बारे में तब राष्ट्रीय मीडिया में ख़ूब चर्चा हुई थी। उस समय लालू बिहार और केंद्र, दोनों जगह सत्ता से बाहर थे, लेकिन उनका राजनीतिक वजूद बचा हुआ था।

अपने पति चिरंजीव की जीत के बाद लालू यादव की बेटी अनुष्का ने जनता का धन्यवाद किया: उन्होंने बिहार वोटरों को लुभाने की जिम्मेदारी मिली थी

चिरंजीव राव अब अपने पिता की विरासत संभालने के लिए विधायक चुने गए हैं। उनके पिता 6 बार विधायक रह चुके हैं। उनके दादा अभय सिंह यादव भी 3 बार विधायक रहे थे। ऐसे में, लालू परिवार के भीतर खुशियाँ लौट आईं और चिरंजीव के जीतने के बाद परिवार ने जश्न मनाया। लेकिन, तब और अब की परिस्थितियाँ काफ़ी अलग हैं। जो रामविलास पासवान अनुष्का और चिरंजीव की शादी में सक्रिय रहे थे और लालू यादव के साथ हर समारोह में दिखे थे, आज पिछले साढ़े 5 वर्षों से राजग का हिस्सा हैं और मोदी कैबिनेट के प्रमुख चेहरों में से एक हैं। उस समय विपक्ष की गोलबंदी के हिमायती रहे लालू आज बिरसा मुंडा जेल में बंद हैं और अपने गृह राज्य के चुनावों में भी दखल देने की उनकी ताक़त नहीं रही है।

चिरंजीव की जीत उनके पिता के लिए भी संजीवनी बन कर आई है, क्योंकि लगातार 6 बार विधायक रहने के बाद उन्हें 2014 में हार का सामना करना पड़ा था। उनके राजनीतिक प्रतिद्वंदी पूर्व मुख्यमंत्री राव वीरेंद्र सिंह के बेटे राव इंद्रजीत सिंह मोदी मंत्रिमंडल में शामिल हैं और पिछली बार भी वह मंत्रिमंडल का हिस्सा थे। हालिया लोकसभा चुनाव में उन्होंने ही कैप्टेन अजय सिंह को बड़े अन्तर से हराया था। ऐसे में उनके ख़िलाफ़ लगातार अपना कद बढ़ाने में लगे और पिछले 2 चुनाव हार चुके कैप्टेन अजय सिंह को अपने बेटे की जीत से राहत मिली होगी।

जीत के बाद चिरंजीव राव ने सबसे पहले राव इंद्रजीत सिंह पर ही निशाना साधा। उन्होंने कहा कि राव ने इस सीट को अपनी प्रतिष्ठा का विषय बना लिया था और इसीलिए यहाँ मुख्यमंत्री खट्टर, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक की रैली कराई गई (जिससे उन्हें फायदा ही हो गया)। इस चुनाव में महिलाओं की भी अहम भूमिका रही। जहाँ चिरंजीव की तरफ से उनकी माँ रणनीति तैयार करने में लगी रहीं, उनकी पत्नी और लालू की बेटी अनुष्का बिहारी वोटरों को लुभाने में लगी रहीं। उधर राव इंद्रजीत की बेटी आरती सिंह राव ने भी सघन चुनाव प्रचार अभियान चलाया था। यह दोनों पुराने राजनीतिक खानदानों की विरासत को मजबूत करने की लड़ाई बन गई थी।

केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह की बेटी आरती ने भी भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में ख़ूब मेहनत की

गौरतलब है कि ​नीतीश कुमार के झटके के बाद से लालू की पार्टी ही नहीं, बल्कि उनका परिवार भी बिखर रहा है। उनके बड़े बेटे तेज प्रताप यादव और ऐश्वर्या राय की शादी के बाद के घटनाक्रम ने इस पारिवारिक कलह को मीडिया की नियमित ‘मनोरंजक ख़बर’ का हिस्सा बना दिया है। जिस तरह तैमूर की चड्डी लगातार कवर की जाती है, उसी तरह तेज प्रताप और ऐश्वर्या की कहानी भी रोज़ मीडिया में ख़ूब चली, अभी भी चल रही है। इस सार्वजनिक फजीहत के बीच बिहार से भी लालू परिवार को अच्छी ख़बर मिली है। उपचुनाव में बिहार में भी पार्टी के दो विधायक चुने गए हैं। राजद का चुनाव प्रचार कमजोर रहा था, ऐसे में इसे नीतीश और जदयू की नाकामी ही कहेंगे।

जदयू ने अपने दो सांसदों को उम्मीदवार उतारने की जिम्मेदारी दे दी। जहाँ सिवान की सांसद कविता सिंह ने अपने पति अजय सिंह को ही अपने बदले दरौंदा से चुनावी मैदान में उतार दिया, वहीं बाँका के सांसद गिरधारी लाल यादव ने लालधारी यादव को प्रत्याशी बना कर उतरवा दिया। बिहार में विकल्पहीनता के रथ पर सवार नीतीश की पार्टी को तगड़ा झटका लगा और उसके दोनों प्रत्याशियों को जनता ने नकार दिया। बेलहर और सिमरी बख्तियारपुर सीटें जदयू के कब्जे में थी, जिसे राजद ने छीन लिया।

चिदंबरम और उनके बेटे के खिलाफ दो लोगों को गवाही देने से रोका गया: CBI

सीबीआई ने दावा किया है कि पूर्व वित्त मंत्री और कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम के खिलाफ INX घोटाले में उसके आरोप महज़ मनगढ़ंत बातें नहीं हैं। जाँच एजेंसी का कहना है कि उसका केस तीन अहम सबूतों के आधार पर खड़ा है- गवाहों द्वारा मुहैया कराइ गई अहम जानकारी, इन्द्राणी मुखर्जी का बयान और दस्तावेज़ी सबूत। दस्तावेज़ी सबूत यानी दुनिया भर के देशों में छिपा कर रखा गया इस घोटाले से जुड़ा पैसा।

समाचार एजेंसी आईएएनएस ने सीबीआई के एक सूत्र के हवाले से कहा है, “हम एक छिपा कर रखी गई (कैमोफ्लाज्ड) लकीर का पीछा कर रहे हैं। इसमें पैसा कई नामों से बैंक अकाउंटों में जमा किया गया जो लगभग एक दर्जन देशों में फैला हुआ है। हमारा केस बहुत ही स्पष्ट और साफ गवाहियों पर आधारित है। गवाही और सबूतों को सेक्शन सीआरपीसी की धाराओं 161 और 164 के अंतर्गत दर्ज किया गया है, जिसमें गवाहों ने ऑन द रिकॉर्ड आ कर कहा है कि चिदंबरम अदालत में गवाही न देने के लिए उन पर दबाव बना रहे हैं।”

सीबीआई ने इसी शुक्रवार को (26 अक्टूबर, 2019 को) सुप्रीम कोर्ट में एक रिव्यु पेटिशन डाली है। इसमें चिदंबरम को आईएनएक्स मीडिया केस में जमानत देने वाले दिल्ली हाई कोर्ट की तीन जजों की बेंच के आदेश को चुनौती दी गई है।

सीबीआई का कहना है कि उसकी जाँच में एफआईपीबी अप्रूवल के लिए रिश्वत के और भी मामले सामने आए हैं। बकौल सीबीआई, उसकी जाँच में और भी ऐसे मामले सामने आए हैं जब चिदंबरम के बेटे कार्ति पी चिदंबरम ने अपने स्वामित्व वाली कंपनी एएससीपीएल (एडवांस्ड स्ट्रेटेजिक) के ज़रिए 6 अन्य कंपनियों से कंसल्टेंसी या कमीशन के नाम पर पैसे मिले। इन सभी कंपनियों को एफआईपीबी अप्रूवल मिला था।

सीबीआई के मुताबिक अदालत को चिदंबरम को जमानत सीबीआई द्वारा दिए गए दस्तावेज़ी सबूतों को पढ़े बिना नहीं देनी चाहिए थी। एजेंसी ने चिदंबरम के खिलाफ सबूतों को एक सीलबंद लिफाफे में अदालत को सौंपा था, जिसे उसके मुताबिक अदालत ने पढ़ने तक की जहमत नहीं उठाई। अदालत ने न केवल चिदंबरम को जमानत दे दी, बल्कि यह भी कहा कि सीबीआई का चिदंबरम द्वारा गवाहों को प्रभावित करने में सक्षम होना केवल एक सामान्य एहतियाती आशंका और बिना सबूत के है। वहीं सीबीआई का दावा है कि दो गवाहों को याचिकाकर्ता या उनके आदमियों ने सम्पर्क कर उनके या उनके बेटे के खिलाफ गवाही न देने के लिए कहा है।