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महाराष्ट्र की 288, हरियाणा की 90 सीटों के लिए डाले जा रहे वोट: 18 राज्यों में 53 सीटों पर उपचुनाव भी

महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनावों के मद्देनजर आज यानी सोमवार (अक्टूबर 21, 2019) को वोट डाले जा रहे हैं। इसके अलावा देश के 18 राज्यों की 51 विधानसभा सीटों और 2 लोकसभा सीटों के लिए उपचुनाव भी हो रहे हैं। महाराष्ट्र विधानसभा में 288 और हरियाणा विधानसभा में 90 सीटे हैं।

दोनों ही राज्यों में भाजपा की दोबारा सत्ता में वापसी के आसार दिखाई दे रहे हैं। वोटों की गिनती 24 अक्टूबर को होगी। महाराष्ट्र में भाजपा मुख्यमंत्री फड़णवीस के नेतृत्व में दूसरे कार्यकाल के लिए प्रयासरत है, जबकि हरियाणा में भाजपा मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व मेंं दोबारा चुनाव जीतने की कोशिश में है।

हरियाणा विधानसभा की 90 सीटों के लिए 1169 उम्मीदवार मैदान में हैं। की राजनीतिक किस्मत का फैसला होगा। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में इस बार कुल 3239 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। इनमें 150 महिला हैं।

महाराष्ट्र में पहली बार वोटर वेरीफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल(वीवीपैट) मशीन का भी उपयोग किया जा रहा है। मुकाबला बीजेपी -शिवसेना-रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आठवले) के महागठबंधन और कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के गठबंधन के बीच है। हरियाणा में भाजपा का मुकाबला कॉन्ग्रेस, इनेलो और उससे टूट कर बनी जेजेपी से है।

अप्रैल-मई में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों में से 41 सीटें जीती थीं, जबकि कॉन्ग्रेस ने एक और राकांपा ने चार सीटों पर जीत दर्ज की थी। उद्धव ठाकरे के पुत्र एवं युवा सेना प्रमुख आदित्य ठाकरे मुंबई के वर्ली से चुनाव लड़ रहे हैं। ठाकरे परिवार से चुनावी राजनीति में कदम रखने वाले 29 वर्षीय आदित्य पहले व्यक्ति हैं।

हरियाणा में 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 47 सीटें जीतकर पहली बार सत्ता में आयी थी। भाजपा ने इसी साल हुए जींद उपचुनाव में भी जीत हासिल की थी। लिया था जिससे उसकी सीटों की संख्या बढ़कर 48 हो गई थी। इनेलो के 19 विधायक हैं जबकि कॉन्ग्रेस के 17 विधायक हैं। पिछले विधानासभा चुनाव में बसपा और शिअद ने एक एक सीटें जबकि पांच सीटें निर्दलीयों ने जीती थीं। 17 राज्यों की 51 विधानसभा सीटों पर भी उपचुनाव होगा।

इसके अलावा 17 राज्यों की 51 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव के लिए भी वोट डाले जा रहे हैं। इनमें से करीब 30 सीटें भाजपा और उसके सहयोगी दलों के पास थीं। भाजपा शासित उत्तर प्रदेश की 11, गुजरात की छह, बिहार की पॉंच, असम की चार और हिमाचल प्रदेश तथा तमिलनाडु की दो-दो विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हो रहा है।

वतन के बदले क़ुरान के प्रति वफादार हैं मुस्लिम, वो कभी हिन्दुओं को स्वजन नहीं मानेंगे: आंबेडकर

हिंदुत्ववादी नेता कमलेश तिवारी की हत्या में अब तक जितने भी नाम सामने आए हैं, सभी एक खास कौम के हैं। सूरत से तीन तो नागपुर से एक युवक की गिरफ्तारी हुई है। बिजनौर से 2 मौलाना गिरफ़्तार किए गए हैं। दोनों शूटर की भी पहचान हो गई है और वे भी इसी मजहब के हैं। कमलेश तिवारी की हत्या पैगम्बर मुहम्मद पर टिप्पणी को लेकर की गई है। लिहाजा यह एक ‘हेट क्राइम’ है, लेकिन मीडिया का कोई भी वर्ग ऐसा मानने को तैयार नहीं है। हर धर्म, मज़हब और संप्रदाय में सामाजिक स्तर पर कुछ न कुछ ग़लत होता है और उसे समय-समय पर दूर किया गया है। क्या इस्लाम के मामले में भी ऐसा है?

इसका उत्तर जानने के लिए हमें देश के प्रथम क़ानून मंत्री और संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमिटी के अध्यक्ष बाबासाहब भीमराव आंबेडकर के विचारों को समझना पड़ेगा। आंबेडकर ने इस्लाम को लेकर क्या कहा था, ये जानना ज़रूरी है। आंबेडकर ने इस बात से नाराज़गी जताई थी कि लोग हिन्दू धर्म को विभाजन करने वाला मानते हैं और इस्लाम को एक साथ बाँध कर रखने वाला। आंबेडकर के अनुसार, यह एक अर्ध-सत्य है। उन्होंने कहा था कि इस्लाम जैसे बाँधता है, वह लोगों को उतनी ही कठोरता से विभाजित भी करता है। आंबेडकर मानते थे कि इस्लाम मुस्लिमों और अन्य धर्म के लोगों बीच के अंतर को वास्तविक मानता है और अलग तरीके से प्रदर्शित करता है।

इस्लाम में अक्सर भाईचारे की बात की जाती है। अमन-चैन और सभी कौमों के एक साथ रहने की बात की जाती है। इस बारे में बाबासाहब ने कहा था कि इस्लाम जिस भाईचारे को बढ़ावा देता है, वह एक वैश्विक या सार्वभौमिक भाईचारा नहीं है। बाबासाहब के इस कथन से झलकता है कि वह इस्लाम में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ जैसी किसी भी धारणा होने की बात को सिरे से ख़ारिज कर देते हैं। इसका पता हमें उनकी निम्नलिखित बात से चलता है:

“इस्लाम में जिस भाईचारे की बात की गई है, वो केवल मुस्लिमों का मुस्लिमों के साथ भाईचारा है। इस्लामिक बिरादरी जिस भाईचारे की बात करता है, वो उसके भीतर तक ही सीमित है। जो भी इस बिरादरी से बाहर का है, उसके लिए इस्लाम में कुछ नहीं है- सिवाय अपमान और दुश्मनी के। इस्लाम के अंदर एक अन्य खामी ये है कि ये सामाजिक स्वशासन की ऐसी प्रणाली है, जो स्थानीय स्वशासन को छाँट कर चलता है। एक मुस्लिम कभी भी अपने उस वतन के प्रति वफादार नहीं रहता, जहाँ उसका निवास-स्थान है, बल्कि उसकी आस्था उसके मज़हब से रहती है। मुस्लिम ‘जहाँ मेरे साथ सबकुछ अच्छा है, वो मेरा देश है’ वाली अवधारणा पर विश्वास करें, ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता।”

इसके बाद बाबासाहब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने जो बातें कही हैं, वो सोचने लायक है और आज भी प्रासंगिक है। बाबासाहब ने कहा था कि इस्लाम कभी भी किसी भी अपने अनुयाई को यह स्वीकार नहीं करने देगा कि भारत उसकी मातृभमि है। बाबासाहब के अनुसार, इस्लाम कभी भी अपने अनुयायियों को यह स्वीकार नहीं करने देगा कि हिन्दू उनके स्वजन हैं, उनके साथी हैं। पाकिस्तान और विभाजन पर अपनी राय रखते हुए बाबासाहब ने ये बातें कही थीं। आंबेडकर की इन बातों पर आज ख़ुद को उनका अनुयायी मानने वाले भी चर्चा नहीं करते, क्योंकि ये उनके राजनीतिक हितों को साधने का काम नहीं करेगा। अपना धर्म बदलने की घोषणा करने वाली मायावती भी इस बारे में कुछ नहीं बोलतीं।

बाबासाहब कहते थे कि कोई भी मुस्लिम उसी क्षेत्र को अपना देश मानेगा, जहाँ इस्लाम का राज चलता हो। इस्लाम में जातिवाद और दासता की बात करते हुए आंबेडकर ने कहा था कि सभी लोगों का मानना था कि ये चीजें ग़लत हैं और क़ानूनन दासता को ग़लत माना गया, लेकिन जब ये कुरीति अस्तित्व में थीं, तब इसे सबसे ज्यादा समर्थन इस्लामिक मुल्कों से ही मिला। उन्होंने माना था कि दास प्रथा भले ही चली गई हो लेकिन मुस्लिमों में जातिवाद अभी भी है। आंबेडकर का ये बयान उन लोगों को काफ़ी नागवार गुजर सकता है, जो कहते हैं कि हिन्दू समाज में कुरीतियाँ हैं, जबकि मुस्लिम समाज इन सबसे अलग है। आंबेडकर का साफ़-साफ़ मानना था कि जितनी भी सामाजिक कुरीतियाँ हिन्दू धर्म में हैं, मुस्लिम उनसे अछूते नहीं हैं। ये चीजें उनमें भी हैं।

बाबासाहब आंबेडकर आगे कहते हैं कि हिन्दू समाज में जितनी कुरीतियाँ हैं, वो सभी मुस्लिमों में हैं ही, साथ ही कुछ ज्यादा भी हैं। मुस्लिम महिलाओं के ‘पर्दा’ प्रथा पर आंबेडकर ने कड़ा प्रहार करते हुए इसकी आलोचना की थी। उन्होंने पूछा था कि ये अनिवार्य क्यों है? जाहिर है, उनका इशारा बुर्का और हिजाब जैसी चीजों को लेकर था। इन चीजों की आज भी जब बात होती है तो घूँघट को कुरीति बताने वाले लोग चुप हो जाते हैं। आंबेडकर में इतनी हिम्मत थी कि वो खुलेआम ऐसी चीजों को ललकार सकें। उनका मानना था कि दलितों को धर्मांतरण कर के मुस्लिम मजहब नहीं अपनाना चाहिए, क्योंकि इससे मुस्लिम प्रभुत्व का ख़तरा वास्तविक हो जाएगा।

उस समय मुस्लिम कोंस्टीटूएंसी की बात करते हुए बाबासाहब आंबेडकर का कहना था कि वहाँ मुस्लिमों को इससे कोई मतलब नहीं रहता कि उनका उम्मीदवार जीतने के बाद क्या करेगा? आंबेडकर कहते हैं, मुस्लिमों को बस इस बात से मतलब रहता है कि मस्जिद का लैंप बदल दिया जाए, क्योंकि पुराना वाला ख़राब हो गया है। मस्जिद की चादर नई लाइ जाए, क्योंकि पहले वाला फट गया है और मस्जिद की मरम्मत कराई जाए, क्योंकि वो जीर्ण हो चुका है। आंबेडकर को मुस्लिमों के इस सिद्धांत से आपत्ति थी कि जहाँ भी स्थानीय नियम-क़ायदों और इस्लामिक क़ानून के बीच टकराव की स्थिति आए, वहाँ इस्लाम अपने क़ानून को सर्वोपरि मानता है और स्थानीय नियम-क़ायदों को धता बताता है।

आंबेडकर मानते थे कि मुस्लिमों की आस्था, चाहे वो आम नागरिक हो या कोई फौजी, केवल क़ुरान पर ही निर्भर रहेगी। आंबेडकर के अनुसार, मुस्लिम भले ही ख़ुद के शासन में रह रहें हो या फिर किसी और के, वो क़ुरान से ही निर्देशित होंगे। आंबेडकर ने तभी यह मान लिया था कि भारत कभी भी ‘हिन्दुओं और मुस्लिमों के बराबर हक़ वाला’ देश नहीं बन सकता। बाबासाहब का साफ़ मानना था कि भारत मुस्लिमों की भूमि बन सकती है, लेकिन हिन्दुओं और मुस्लिमों, दोनों का एक कॉमन राष्ट्र नहीं बन सकता। क्या आज के नेतागण और सामाजिक कार्यकर्ता बाबासाहब के इन कथनों पर चर्चा के लिए तैयार हैं? या फिर सेलेक्टिव चीजें ही चलेंगी?

मुक्ति मार्ग पर 2 कदम और… कॉन्ग्रेस वह ‘बैल’ है जिसे अब गॉंधी भी हाँकना नहीं चाहते

कल्पना कीजिए आप युद्ध के मैदान में हैं और आपका सेनापति सीन से गायब है। आपका ‘बाहुबली’ बैक फायर कर चुके हथियारों के साथ मैदान में है। यकीनन, आप खुद को कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता महसूस करेंगे। हताश, निराश और पस्त।

लोकतंत्र में चुनाव युद्ध सरीखे ही होते हैं। विचारों का यह द्वंद्व लोकतंत्र के लिए ऊर्जा सरीखा होता है। लेकिन, तब क्या हो जब विपक्ष बिना लड़े हथियार डाल दे? कुछ-कुछ वैसे ही जैसा महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनाव में दिख रहा है। दोनों राज्यों में लोग अगले पॉंच साल के लिए प्रदेश सरकार चुनने के लिए वोट डाल चुके हैं और नतीजे 24 अक्टूबर को आएँगे। लेकिन, आप महसूस कर रहे होंगे कि मुकाबला बिल्कुल एकतरफा है। दोनों राज्यों की सत्ता में भाजपा फिर दमखम के साथ लौटती नजर आ रही है।

इसका कारण जानना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। जिस दौर में 20-20 खेलने से पहले घंटों नेट पर पसीने बहाए जाते हैं, उसी कालखंड में 288 सदस्यीय महाराष्ट्र और 90 सदस्यीय हरियाणा विधानसभा चुनाव के प्रचार से कॉन्ग्रेस का शीर्ष परिवार दूर-दूर रहा। पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गॉंधी ने एक भी रैली नहीं की। हरियाणा की उनकी एकमात्र रैली भी अंतिम क्षणों में अस्वस्थता की वजह से टाल दी गई। उनके बेटे और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी ने 7 रैलियॉं की। 5 महाराष्ट्र में और 2 हरियाणा में। पार्टी महासचिव और राहुल की बहन प्रियंका गॉंधी ने भी एक रैली करने की जहमत नहीं उठाई। जबकि तीनों का नाम चुनाव के लिए पार्टी की ओर से जारी स्टार प्रचारकों की सूची में था।

महाराष्ट्र और हरियाणा की गिनती आप यूपी और बिहार जैसे उन राज्यों में भी नहीं कर सकते जहॉं कॉन्ग्रेस दशकों से दफन है। पॉंच साल पहले जब इन दो राज्यों की सत्ता से कॉन्ग्रेस बेदखल हुई थी, उससे पहले वह महाराष्ट्र में डेढ़ दशक तो हरियाणा में दशकभर तक लगातार सत्ता में बनी रही थी। बावजूद इन दो राज्यों का इस बार का चुनाव कॉन्ग्रेस को केवल इसलिए याद रहेंगे कि उसके नेता आपस में जमकर लड़े। थोक के भाव नेता पार्टी छोड़ गए। परिवार की शपथ खाने वाले नेताओं ने एक के बाद एक ऐसे बयान दिए जिससे लगा कि मॉं-बेटे में भी अब साम्य नहीं है। मुंबई कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष रहे संजय निरुपम और हरियाणा के पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर ने तो साफ-साफ शब्दों में कहा कि सोनिया के नेतृत्व सॅंभालने के बाद से राहुल के करीबी नेताओं का काम लगाया जा रहा है।

यह सब ऐसे वक्त में हुआ जब कॉन्ग्रेस अपने सब मुश्किल वक्त से गुजर रही है। उसके मुकाबिल मोदी-शाह की जोड़ी है। जिस जोड़ी ने भाजपा को ऐसी चुनावी मशीनरी में बदल दिया है जो केवल जीत का वरण करना जानती है। रणनीति ऐसी कि चूक फटकने भी न पाए। बावजूद इसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने महाराष्ट्र और हरियाणा में 50 के करीब रैलियॉं की। विकास के साथ-साथ हर उस मुद्दे को उभारा जिसके आधार पर वोटरों को गोलबंद किया जा सकता था। दूसरी तरफ, राहुल गॉंधी राफेल से उतर नहीं पाए। आर्थिक मोर्चे पर सरकार को घेरने के लिए कॉन्ग्रेस ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उतारा। लेकिन, खुद की पार्टी के गुनाह गिना उन्होंने इस रणनीति का भी भट्टा बिठा दिया।

मनमोहन के इस पाश्वाताप पर कॉन्ग्रेस से ज्यादा आश्चर्य गॉंधी परिवार को हुआ होगा। क्योंकि, कॉन्ग्रेसी चाल में अब तक नहीं ढल पाए पूर्व प्रधानमंत्री ने बीते कुछ सालों में कई मौकों पर साबित किया है कि गॉंधी परिवार के इशारे पर वे मोदी सरकार पर अनर्गल आरोप लगा सकते हैं। चाहे इसके चक्कर में अर्थशास्त्री होने की उनकी कुल जमा पूॅंजी ही क्यों न खाक हो जाए। वैसे जिस परिवार की कृपा से आप 10 साल पीएम रहे हों, उसके लिए इतना करना तो बनता है!

भाई-बहन की जुगलबंदी में भी जीत का फॉर्मूला नहीं तलाश पाई कॉन्ग्रेस

असल, में कॉन्ग्रेस के पास दोनों राज्यों में चुनाव लड़ने को लेकर रणनीति पहले दिन से ही नहीं थी। वह तो भाजपा से चूक होने और फिर चमत्कार होने की उम्मीद में बैठी थी। ऐसा होना नहीं था और हुआ भी नहीं।

यह सच है कि गॉंधी-नेहरू परिवार सियासी घाघ है। यह भी सोलह आने सच है कि उन्हें पसीना बहाना रास नहीं आता। लेकिन, चुनावी मौसम में इस परिवार ने आज तक वैसी बेरुखी नहीं दिखाई थी, जैसा इस बार दिखा। बिहार के मुख्यमंत्री रहे दिवंगत डॉ. जगन्नाथ मिश्र ने अस्सी के दशक में कहा था कि कॉन्ग्रेस की बनावट वैसी नहीं हो पाई है जिससे कार्यकर्ताओं में कमिटमेंट डाला जा सके। जब ​डॉ. मिश्र ने यह बात कही थी तब वे कॉन्ग्रेस के कद्दावर नेता हुआ करते थे। उस समय राजीव गॉंधी देश के प्रधानमंत्री और कॉन्ग्रेस के सर्वेसर्वा हुआ करते थे। डॉ. मिश्र ने कॉन्ग्रेस की जिस बीमारी की ओर इशारा किया था, उसे न तो कभी नेहरू ने भाव दिया और न इंदिरा और राजीव ने। ऐसे में इलाज की उम्मीद तो बीते तीन दशक से बैसाखियों के सहारे टिकी कॉन्ग्रेस ने सोनिया और राहुल से भी नहीं की होगी। लेकिन, लगातार दो आम चुनावों में करारी पराजय ने कॉन्ग्रेस की उस बीमारी को भी उजागर कर दिया है जिसका पता डॉ. मिश्र को भी नहीं था। यानी, पार्टी का शीर्ष परिवार भी कमिटेड नहीं है। महाराष्ट्र और ​हरियाणा के प्रचार ने इस पर ठप्पा लगा दिया है।

मोदी ने जब कॉन्ग्रेस मुक्त भारत की बात की थी तब उन्हें भी उम्मीद नहीं रही होगी कि इसे हकीकत में तब्दील करने की उनसे भी ज्यादा जल्दी खुद कॉन्ग्रेस को होगी। कहते हैं कि आदमी को आगे से हॉंकते हैं और बैल को पीछे से। पार्टी तो जीते-जागते, विचारों से लैस लोगों का ही संगठन होता है। सो, कायदे से उसका भी नेतृत्व आगे से होना चाहिए। पर कॉन्ग्रेस का हाल तो उस बैल जैसा लगता है जिसे उसका मालिक (गाँधी परिवार) भी हॉंकने को तैयार नहीं है। वह दूसरी कॉन्ग्रेस थी जिसने आजादी के बाद ​संगठन का अस्तित्व खत्म कर देने की गॉंधी की सलाह ठुकरा दी थी। यह कॉन्ग्रेस मोदी की भी सुनती है, इसलिए मुक्ति मार्ग पर सरपट भाग रही है।

आपस में लड़ते-कटते शिया, सुन्नी, अहमदिया… आखिर कौन है सच्चा मुस्लिम? रब भी न जानें!

कट्टरपंथियों द्वारा कमलेश की नृशंस हत्या कर देने के बाद से ही समुदाय विशेष में हिंदुत्व के खिलाफ उमड़ रही नफरत पर से ध्यान भटकाने की कोशिशें आजकल ज़ोरों पर है। इन्ही सब के बीच चल रही सुगबुगाहट में से एक यह भी है कि आखिर ‘सच्चा मुस्लिम कौन है?’

ट्विटर पर शाहिद सिद्दीकी नामक व्यक्ति द्वारा की गई टिप्पणी बेहद आपत्तिजनक मालूम होती है। शाहिद का किया हुआ ट्वीट कई धाराओं में बँटे हुए मुस्लिमों से ज्यादा गैर-मुस्लिमों पर निशाना साधने के इरादे से किया गया है।

समस्या और भी गंभीर तब हो जाती है जब पता चलता है कि यह तथ्य इस्लाम की अंदरूनी कलह का द्योतक है। इसीलिए, जहाँ एक ही पंथ में एकता की एक झलक भी दिखाई नहीं देती, वहाँ मुस्लिमों के लिए यह सवाल उभरता है कि वे किसे सिद्धान्तवादी मुस्लिम कहेंगे और किसे नहीं?

जैसे कि सुन्नी, शिया समुदाय को सच्चा मुस्लिम नहीं मानते। ठीक उसी तरह शिया भी सुन्नियों को सच्चा मुस्लिम नहीं मानते। मगर शिया और सुन्नी समुदाय के बीच चलने वाले विवाद की जड़ें दरअसल मध्य-पूर्व से जुड़ी हुई हैं। सालों या दशकों नहीं बल्कि सदियों से लड़ा जा रहा ‘शांतिप्रिय समुदाय’ का यह अंदरूनी युद्ध कभी ख़त्म नहीं होता और न ही इसके ख़त्म होने के आसार दिखाई पड़ते हैं।

कई आपसी मतभेदों के बावजूद ये दोनों ‘अहमदिया’को सच्चा मुस्लिम नहीं मानते। बता दें कि मुस्लिमों की अहमदिया प्रजाति पाकिस्तान में पूरी तरह प्रतिबंधित है। उन्हें अपने पंथ का प्रदर्शन करना तक मना है और अगर वे ऐसा करते हैं तो उन्हें भारी उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। इसी तरह एक प्रजाति ‘उइगर’ है, इन्हें भी ‘सच्चे मुस्लिम’ होने की श्रेणी से बाहर रखा जाता है क्योंकि उइगर मुस्लिमों की पूरी प्रजाति सभी चीन के आगे नतमस्तक है।

इसके बाद बारी आती है ISIS (इस्लामिक स्टेट फॉर इराक एंड सीरिया) की, जो एक आतंकवादी संगठन है। मुस्लिमों की इस प्रजाति का यह मानना है कि जो लोग इनका समर्थन नहीं करते, वह सच्चे मुस्लिम नहीं हो सकते। इस मजहब का यह वह भाग है जिसे अपने खिलाफ के लोगों का खून बहाने पर कोई मलाल नहीं होता। हालाँकि ऐसी प्रवृत्ति वाला यह कोई इकलौता आतंकी संगठन नहीं है।

तत्पश्चात आते हैं शाहिद सिद्दीकी जो अपने आप में एक अलग प्रजाति कहे जा सकते हैं। इनका मानना है कि हर कट्टरपंथ का समर्थन करने वाला हर व्यक्ति मुस्लिम नहीं हो सकता। वे कहते हैं कि आतंकी संगठनों के सबसे बड़े खैर-ख्वाह गैर मुस्लिम हैं। ऐसे संगठनों को मुस्लिमों से ज्यादा समर्थन वह सम्प्रदाय देते हैं जो गैर मुस्लिम हैं।

लोगों के बीच बड़ा भ्रम जिसे खूब फैलाया गया है वह यह है कि गैर-मुस्लिमों के क़त्ल के लिए उनसे ज्यादा ज़िम्मेदार और कोई नहीं है। इसमें कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकवादी संगठनों को दोष देना ठीक नहीं। वे यह मानने से भी इनकार करते हैं कि आतंकवादियों और उनके प्रति सहानुभूति रखने वाले लोगों की नजर में मारे गए मुस्लिम ‘सच्चे मुस्लिम’ नहीं हैं। ऐसे लोग इस तथ्य का ध्यान नहीं रखते कि कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकवादी ‘सच्चा मुस्लिम’ शब्द पर एकाधिकार रखते हैं। जैसा दावा उनका खुद का भी है।

यह संगठन तीन आवश्यक तर्कों के आधार पर दुनिया भर में मुस्लिमों की हत्या को सही ठहराते हैं। इनमें पहला तर्क यह है कि मार दिए गए मुस्लिम आतंकवादियों के लिए ‘सच्चे मुस्लिम’ नहीं होते। उनका पक्ष लेने वाले ‘काफिर’ होते हैं। दूसरा, कि अगर किसी ‘सच्चे मुस्लिम’ की हत्या हो भी जाए तो अल्लाह के लिए लड़ी जाने वाली इस जंग में उसे भला कौन टाल सकता है। यही वजह है कि जिहादियों की मौत को भी किसी बड़ी क्षति के तौर पर नहीं देखते।

वहीं आतंकवादियों के मुताबिक उनका तीसरा आवश्यक तर्क यह है कि अगर कोई मुस्लिम जिहाद के लिए अपनी जान देता है उसे उसके किए का इनाम जन्नत में मिलता है। इसीलिए शाहिद जैसे घिनौनी सोच वाले लोग इस्लामिक आतंकवादियों द्वारा मारे गए मुस्लिमों तक को जायज़ ठहरा देते हैं।

‘सच्चा मुस्लिम’ शब्द इस्लामी जगत में पहले ही बहुत खून-खराबा करवा चुका है। इसीलिए यह भी कहना ठीक नहीं होगा कि इस पर सिर्फ शाहिद जैसे मुस्लिम ही एकाधिकार रखते हैं। इसीलिए जब कोई गैर-मुस्लिम इनके ‘सच्चा मुस्लिम’ वाले दावे को इनके आधिकारिक आँकड़े के बावजूद ख़ारिज कर देता है तो उसकी वजह कट्टरता नहीं है।

शाहिद सिद्दीकी जैसे लोग अगर वास्तव में मानवता की भलाई के लिए कोई योगदान देना चाहते हैं तो उन्हें वहाबी कट्टरता का खुला समर्थन करने से ज्यादा यह देखना चाहिए कि वे इस प्रकार की बातें मुस्लिमों के बीच पहुँचाएँ, जिससे मुस्लिमों में फैली आतंकवाद की भयंकर बीमारी पर काबू करने की ओर विचार किया जा सके।

शाहिद सिद्दकी जैसे भारत में बैठे लोग घृणा फैला रहे हैं क्योंकि इस्लाम और उसको मानने वाले यहाँ-वहाँ बिखरे पंथ ‘सच्चा मुस्लिम’ शब्द की परिभाषा को जीने के पीछे लगे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि विभिन्न मत और पंथ में बिखरे मज़हब इस्लाम के इतिहास की जड़ें खून में सनी हुई हैं।

TMC कार्यकर्ता ने कहा ‘जय श्री राम’ तो साथी ने ही की पिटाई, बंगाल पुलिस द्वारा कोई गिरफ्तारी नहीं

पश्चिम बंगाल में बौखलाए तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ता अब अपने ही साथियों की पिटाई कर रहे हैं। जहाँ इससे पहले भाजपा नेताओं की हत्या और पिटाई की ख़बरें आती थीं, अब ख़बर आई है कि एक तृणमूल कार्यकर्ता की ही जम कर पिटाई की गई। अव्वल तो यह कि उसे पीटने वाला उसका ही साथी था, जो तृणमूल का ही कार्यकर्ता है। ख़बर के अनुसार, नॉर्थ 24 परगना के बसीरहाट में एक तृणमूल कार्यकर्ता की उसके ही पार्टी के नेता ने सिर्फ़ इसीलिए पिटाई कर दी, क्योंकि उसने ‘जय श्री राम’ का नारा लगाया था।

पिटाई के कारण उक्त तृणमूल कार्यकर्ता को गंभीर चोटें आई हैं। एएनआई के अनुसार, पीड़ित की पहचान रंजीत मंडल के रूप में हुई है, वहीं उसे पीटने वाले मुख्य आरोपित का नाम तारक पिरोई है। मंडल ने पुलिस को दी गई शिकायत में बताया है कि वह तृणमूल के अन्य कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत कर रहा था, जिसके दौरान उसने ‘जय श्री राम’ कहा। बस इतनी सी बात के लिए परोइ गुस्सा हो गया और उसने गालियाँ बकनी शुरू कर दी। वह इतने पर ही नहीं रुका, उसने मंडल की जम कर पिटाई भी की और उसे घायल कर दिया।

पिटाई के बाद पीड़ित को स्थानीय हॉस्पिटल ले जाया गया, जहाँ उसका इलाज हुआ। हरवा पुलिस थाना में इस बाबत मामला दर्ज कर लिया गया है लेकिन अभी तक कोई गिरफ़्तारी नहीं की गई है। इस मामले में अभी तक पुलिस का कोई बयान नहीं आया है। बता दें कि राजनीतिक संघर्ष में पश्चिम बंगाल में 80 से भी अधिक भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या की जा चुकी है। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इन आँकड़ों की पुष्टि की है

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव, पंचायत चुनाव और फिर लोकसभा चुनाव के दौरान हिंसा की वारदातें हुईं। पंचायत चुनाव और लोकसभा चुनाव में तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने ज्यादा गुंडई की क्योंकि इन दोनों ही चुनावों में भाजपा तृणमूल पार्टी के विपक्ष में एक मजबूत विकल्प बन कर उभरी और इससे सत्ताधारी दल को चुनौती मिलने लगी। बंगाल की बदलती राजनीतिक फिजाँ में 18 भाजपा नेता संसद पहुँच गए, जिसके बाद अगले विधानसभा चुनावों पर सबकी नज़र है।

घर में घुसकर BJP नेता की पत्नी संग गोली मारकर हत्या, छोटी बेटी ने नक़ाबपोश हत्यारे से पूछा…

रांची में खूंटी सायको थाना क्षेत्र के आड़ा गाँव में शुक्रवार (18 अक्टूबर) को अज्ञात नक़ाबपोशों ने कुड़ापूर्ति पंचायत के उप-मुखिया शीतल मुंडा और उनकी पत्नी मादे मुंडाइन की गोली मारकर हत्या कर दी। नक़ाबपोश हत्यारों ने उनके घर में घुसते ही कुर्सी पर बैठे शीतल मुंडा पर गोलियों की बौछार कर दी। इस दौरान तीन गोलियाँ शीतल मुंडा के पेट में लगी और एक गोली छाती में लगी। हत्यारों ने उनकी पत्नी की कनपटी में भी एक गोली मारी।

ख़बर के अनुसार, शीतल मुंडा भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता थे और अपने गाँव में बूथ अध्यक्ष के पद पर थे। रात लगभग 9:30 बजे शीतल मुंडा खाना खाने के बाद अपने घर में बैठे हुए थे, उसी दौरान तीन अपराधी उनके घर में घुसे। तीनों ने एक जैसी वर्दी पहन रखी थी और अपना चेहरा ढक रखा था। घर में घुसते ही अपराधियों ने शीतल मुंडा को गोली मार दी। यह देख कर उनकी पत्नी डर गईं और ख़ुद को अंदर के कमरे में बंद कर लिया, लेकिन अपराधियों ने जबरन दरवाज़ा खोलकर उन्हें भी गोली मार दी। 

वारदात के समय शीतल मुंडा की छोटी बेटी वहीं मौजूद थीं। उसने नक़ाबपोश हत्यारों से सवाल किया, “मेरे माता-पिता को क्यों मारा?” इस पर हत्यारों ने जबाव दिया कि शीतल मुंडा ने दो साल पहले एक तालाब बनवाया था, जिसमें उसने पैसे नहीं दिए थे। इतना ही नहीं, उन्होंने घर में रखी अटैची और बक्सों की तलाशी भी ली, इसके बाद वो वहाँ से भाग निकले।

ग्रामीणों को इस घटना की जानकारी रात में ही मिल गई थी, लेकिन दहशत के चलते कोई अपने घर से बाहर नहीं निकला और न ही घटना की सूचना पुलिस को दी। पुलिस को इस घटना की सूचना शनिवार (19 अक्टूबर) को सुबह दी गई।

सूचना मिलने पर एसपी आशुतोष शेखर, एएसपी अनुराग राज और सोयको थाना प्रभारी ने घटना-स्थल पर पहुँचे। इसके अलावा, भाजपा के जिलाध्यक्ष काशीनाथ महतो भी घटनास्थल पर पहुँचे। फ़िलहाल, पुलिस ने शव को क़ब्जे में लेकर पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया गया है। संदेह जताया जा रहा है कि लेवी के कारण शीतल मुंडा की हत्या की गई है।

मौक़े पर पहुँचे भाजपा जिलाध्यक्ष काशीनाथ महतो ने कहा कि शीतल मुंडा पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता थे, वो एक मिलनसार व्यक्ति थे, किसी से उनकी कोई दुश्मनी भी नहीं थी। इसके अलावा, घटना की जानकारी मिलने पर केंद्र सरकार में जनजातीय मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा और झारखंड सरकार के ग्रामीण विकास मंत्री नीलकंठ सिंह मुंडा पोस्टमार्टम हाउस पहुँचे और मृतक के परिजनों को सांत्वना दी। 

हत्या की इस वारदात पर अर्जुन मुंडा ने कहा कि लगातार भाजपा कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है। प्रशासन को इस हत्याकांड की तह तक जाना चाहिए और यह पता लगाना चाहिए कि इस तरह की घटनाओं के पीछे क्या कारण है, इसका ख़ुलासा किया जाना चाहिए। 

बता दें कि शीतल मुंडा के तीन बच्चे हैं, जिसमें से बड़ी बेटी मुरहू स्थित कस्तूरबा आवासीय बालिका विद्यालय और बेटा कदमा में एक स्कूल में पढ़ता है और हॉस्टल में रहता है। वहीं, छोटी बेटी गाँव के ही स्कूल में पढ़ती है। 

इससे पहले भी कई भाजपा नेताओं की हत्या हो चुकी  है। 22 जुलाई को मुरहू के हेठगोवा में मागो मुंडा की हत्या, 25  मार्च 2017 को मुरहू के नंदकिशोर महतो की हत्या, 28 अक्तूबर 2017 को राजेंद्र महतो और दो दिसंबर 2017 को भईयाराम मुंडा की हत्या हुई। इसके अलावा भाजपा से जुड़े शशि पांडेय, रूपनारायण सिंह, संबल प्रधान, मंगल सिंह  मुंडा, नरेश सिंह की भी हत्याएँ हो चुकी हैं।

राम मंदिर का फैसला ‘भविष्य को ध्यान में रखकर’ सुनाएँ, SC से दूसरे पक्ष ने लगाई गुहार

अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई ख़त्म हो चुकी है, फैसला आना बाकी है। इसके बाद एक खबर यह भी आई कि मस्जिद का हिमायती दूसरा पक्ष खुद को मामले से अलग करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दे सकता है। इसके बाद फैसले पर प्रभाव डालने की अपनी आखिरी कोशिश में मस्जिद के पैरोकार दूसरे पक्ष ने कोर्ट में सीलबंद लिफाफे में मोल्डिंग ऑफ़ रिलीफ पेश किया है।

हाल ही में 40 दिन तक लगातार सुनवाई चलने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या के जन्मभूमि विवाद पर अपने फैसले को सुरक्षित रखा है। कोर्ट में मस्जिद की माँग करने वालों के पक्ष की ओर से जो मोल्डिंग ऑफ़ रिलीफ का दस्तावेज़ अदालत में पेश किया गया, उसमें कहा गया-

“अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के दूरगामी असर वाले परिणाम देखने होंगे, इसीलिए बेहतर होगा अगर सुप्रीम कोर्ट अपने इस ऐतिहासिक फैसले को कुछ इस तरह पेश करे, जिससे वह उन संवैधानिक मूल्यों का भी प्रदर्शन करे, जिन पर इस देश को भरोसा है।”

अपने हलफनामे में मस्जिद के पैरोकार पक्ष की ओर से कहा गया है, “कोर्ट विवादित मुद्दे को सुलझाने के लिए दिए गए अपने निर्णय में भारत के बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक मूल्यों का ख़ास ध्यान रखेगा। फैसले में राहत देना उस सर्वोच्च अदालत की ज़िम्मेदारी है, जिसे संविधान का संरक्षक बताया गया है।”

मस्जिद के पक्ष से इस स्टेटमेंट में आगे कहा गया है कि निर्णय में राहत देने साथ अदालत को यह भी ध्यान रखना होगा कि आने वाली नस्लें इस फैसले को किस तरह से देखेंगी, यह भी सोचना होगा। यानी मस्जिद पक्ष ने अदालत को सच्चाई से गुमराह करने के लिए अब भावनात्मक पासा फेंका है, जिसमें उन्होंने इस फैसले के दूरगामी परिणाम की ओर इशारा करते हुए यह कहा है कि आने वाली पीढ़ियों पर इस फैसले का क्या असर पड़ेगा।

एक प्रकार से देखा जाए तो मस्जिद की तरफदारी करता दूसरा पक्ष संविधान की दुहाई देने के बहाने कुछ आग ही बात कह रहा है। उनका कहना है कि इस्लामिक आक्रान्ता द्वारा मस्जिद बनाने के लिए हथियाई गई जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण से भारत के संवैधानिक मूल्यों और उसके बहु-सांस्कृतिक चरित्र का पूरी तरह से ह्रास हो जाएगा। वे परोक्ष रूप से यह भी कह रहे हैं कि शताब्दियों से चले आ रहे राम-जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद पर आने वाले समय में सर्वोच्च न्यायलय की और से एक अंतिम निर्णय की उम्मीद की जा सकती है।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला 14 नवम्बर से लेकर 16 नवम्बर के बीच आ सकता है। दरअसल 16 अक्टूबर को एक रिपोर्ट मीडिया में लीक हुई थी, जिसमें मध्यस्थता पैनल की कुछ जानकारी बंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गई थी। इस दौरान यह भी कहा गया था कि सुन्नी वक्फ बोर्ड विवादित भूमि पर अपना दावा छोड़ना चाहता है मगर उसके लिए उन्होंने तीन शर्तें रखी हैं।

इस रिपोर्ट में एक कथित शर्त यह भी थी कि दूसरा पक्ष अगर राम जन्मभूमि पर अपना दावा छोड़ते हैं तो इसके बदले उनकी माँग ‘Status Quo’ है यानी सभी पुराने ढाँचे यथास्थिति में संरक्षित किए जाएँ। उल्लेखनीय है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड एक लम्बे से इसकी माँग करता आ रहा है कि हिन्दुओं की ज़मीन पर बनी काशी की ज्ञानवापी मस्जिद तथा मथुरा के शाही ईदगाह पर से अपना दावा वापस ले लें।

हालाँकि बाद में उन्होंने लीक हुई इस रिपोर्ट पर अपना पक्ष रखकर इसे गलत और निराधार बताया था। उन्होने कहा था कि दूसरे पक्ष वाले राम की जन्मभूमि पर से अपना दावा हरगिज़ वापस नहीं लेंगे।

कमलेश तिवारी की हत्या, ‘The Godfather’ का हॉस्पिटल वाला वो दृश्य और यूपी पुलिस का बदला हुआ रूप

“द गॉडफादर” नाम के विख्यात उपन्यास (जिस पर उतनी ही विख्यात फिल्म भी बनी) की कहानी एक माफिया परिवार को उखाड़ने की साजिशों के इर्द-गिर्द बुनी गई है। इसका मुख्य किरदार “डॉन कोर्लेओने” उसूलों का जरा पक्का किस्म का इंसान होता है, तो अपने हिसाब से अपने दोस्तों की मदद कर रहा होता है। शायद इसी कारण वो भयावह अपराधी कम और सम्मान योग्य कोई शक्तिशाली आदमी लगता है। एक किसी तस्कर के उसके इलाके में नशीली दवाओं का धंधा करने का इरादा था, जो डॉन को पसंद नहीं था।

डॉन भले नशे के धंधे को जो भी माने, तस्कर के लिए ‘कोई भी धंधा छोटा नहीं होता’ और ‘धंधा से बड़ा कोई मजहब भी नहीं होता’। लिहाजा तस्कर डॉन का क़त्ल करवाने की कोशिश करता है। डॉन जख्मी होता है मगर बच जाता है। उसे देखने अस्पताल में उसका बेटा माइकल पहुँचता है तो देखता है कि जिस पर अभी-अभी गोलियाँ चली हैं, उसकी सुरक्षा से पुलिसकर्मी गायब हैं! किस्मत से वहां डॉन की सेहत पूछने एक गरीब बेकरी वाला युवक आया होता है। जब तक डॉन के लोग वहाँ पहुँचते, माइकल उसे ही अपने साथ खड़ा हो जाने कहता है।

डॉन की हत्या के लिए अस्पताल पहुँचे लोग जब दो नौजवानों को बाहर ही खड़ा देखते हैं तो उन्हें लगता है कि डॉन के सुरक्षाकर्मी वहाँ मौजूद हैं और वो घबराकर भाग जाते हैं। थोड़ी ही देर में जिले का पुलिस प्रमुख वहाँ पहुँचता है। उससे बातचीत में जब माइकल सुरक्षाकर्मियों के बारे में पूछता है तो पुलिस प्रमुख माइकल को भी वहाँ से भगाने की कोशिश करता है। इतने तक में साफ़ समझ आने लगता है कि पुलिस प्रमुख ने भी तस्कर से डॉन को मारने में मदद के लिए कोई मोटी रकम ली है। एक दो सीधे सवालों में ही पुलिस प्रमुख चिढ़ जाता है।

जब माइकल सीधा ही पूछ लेता है कि डॉन को मारने देने के लिए उसने कितने पैसे लिए हैं तो कुछ पुलिसकर्मियों को माइकल को पकड़ने कहकर पुलिस प्रमुख माइकल का जबड़ा तोड़ देता है। ये घटना उपन्यास की दिशा बदल देती है। घूँसा खाने वाला माइकल उस वक्त तक शरीफ सा आदमी था। साजिशों में इतने बड़े पुलिस प्रमुख को शामिल देखने के बाद माइकल अगला डॉन बनने की तरफ मुड़ जाता है। कई बार अपराधों पर आधारित उपन्यास (फ़िल्में भी) ऐसे ही पुलिस को कुछ अपराधियों को प्रश्रय देती दिखाती हैं।

कमलेश तिवारी की हत्या वाले दिन पुलिस का बयान

बाकी ऐसा सचमुच होता होगा या नहीं, इस पर अलग-अलग लोगों की अलग-अलग राय हो सकती है। जो पुलिस व्यवस्था पिछली सरकार में कुछ ख़ास नहीं कर रही थी, वही यूपी पुलिस इस सरकार में बदले रूप में कैसे दिखती है, इस पर भी अलग अलग वजहें गिनाई जा सकती हैं। हाँ, बदला निजाम सबको पसंद आ रहा या नहीं, कुछ लोग भीतर ही भीतर इससे नाराज तो नहीं होंगे, इसके बारे में भी सोचा जा सकता है। सोचिएगा, फ़िलहाल सोचने पर जीएसटी तो नहीं लगता!

कमलेश तिवारी की हत्या के अगले दिन पुलिस का बयान

सेना ने मार गिराए 10 आतंकी और इतने ही पाक फौजी, जनरल रावत ने कहा- ‘हमें सरकार की खुली छूट’

भारतीय सेना ने पाकिस्तान के कई लॉन्च पैड को तबाह करते हुए कई पाकिस्तानी फौजियों को भी मार गिराया है। भारतीय सेना की इस बड़ी कार्रवाई में 6 से 10 पाकिस्तानी फौजी मारे गए हैं। ख़ुद सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने ये जानकारी दी है। जनरल रावत ने बताया कि सेब का व्यापार चल रहा है और स्कूल वगैरह भी खुल गए हैं लेकिन आतंकी लगातार लोगों को धमकियाँ दे रहे हैं कि स्कूलों में बच्चों को न भेजें। जनरल रावत ने बताया कि सेब के व्यापारियों को भी धमकी दी जा रही है। सेना प्रमुख ने आतंकियों के मसूबों की बात करते हुए कहा कि वे यहाँ अमन-चैन की बहाली नहीं होने देना चाहते हैं, ताकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह दिखाया जा सके कि ‘अनुच्छेद 370 के निरस्त होने से कश्मीरी ख़ुश नहीं हैं।’

हालाँकि, सेना प्रमुख ने साफ़ कर दिया कि अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने से जम्मू कश्मीर की जनता बिलकुल ख़ुश है लेकिन आतंकी इसके उलट माहौल पैदा करने में प्रयासरत हैं। उन्होंने कहा कि सरहद के पार से कुछ और आतंकियों को भेजने की कोशिश हो रही है, ताकि माहौल बिगाड़ा जा सके। सेना को पक्की सूचना मिली थी कि फॉरवर्ड एरिया के कुछ आतंकी कैम्पों को फिर से सक्रिय किया गया है। इसके बाद भारतीय सेना ने उन आतंकी कैम्पों को निशाना बनाने का फ़ैसला किया। जनरल रावत ने बताया कि भारतीय सेना की इस कार्रवाई से न सिर्फ़ आतंकियों बल्कि पाकिस्तानी फ़ौज को भी भारी नुकसान हुआ है।

लगभग 6 से 10 पाकिस्तानी आतंकियों के मारे जाने की सूचना है और इतनी ही संख्या में पाकिस्तानी फौजी भी मारे गए हैं। जनरल रावत ने बताया कि मारे गए आतंकियों की संख्या और अधिक भी हो सकती है, जिस सम्बन्ध में सूचना मिलते ही जानकारी साझा की जाएगी। जनरल रावत ने बताया कि 3 आतंकी कैम्पों को पूरी तरह तबाह कर दिया गया है, वहीं 1 अन्य आतंकी कैम्प को ख़ासा नुकसान पहुँचा है। उन्होंने पाकिस्तान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि अगर उसका रवैया यही रहा तो भारतीय सेना आगे भी इस तरह की कार्रवाई करने से नहीं हिचकेगी। जनरल रावत ने बताया कि जब भी ऐसी कुछ कार्रवाई होती है तो राजनीतिक नेतृत्व को इससे अवगत कराया जाता है।

जनरल रावत ने बताया कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ ऑपरेशन में देश का राजनीतिक नेतृत्व पूरी तरह सेना को समर्थन दे रहा है। उन्होंने कहा कि सेना को बिना पाबन्दी कार्रवाई करने की छूट तो दी ही गई है, साथ ही राजनीतिक नेतृत्व ने इस बात की भी पूरी स्वतंत्रता दे रखी है कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ किस तरह से कार्रवाई की जानी है और इसके लिए क्या प्रक्रिया अपनाई जाने वाली है। जनरल रावत ने पाकिस्तान के बैट कमांडो, ड्रोन और नावों के इस्तेमाल को लेकर कहा कि आतंकी लगातार नए-नए तौर-तरीके अपनाते रहते हैं और उसके लिए पाक सेना तैयारी करवाती है। उन्होंने बताया कि रावी और व्यास नदियों में बरसात के दौरान पानी बढ़ता है तो आतंकी उसके जरिये हथियार पहुँचाने का प्रयास करते हैं।

उन्होंने पंजाब पुलिस और जम्मू कश्मीर पुलिस को लेकर कहा कि वो लगातार सतर्क हैं और सेना आतंकियों के हथियारों का स्रोत पता करने में जुटी है। वहीं पाकिस्तान के मीडिया पोर्टलों पर भी भारत की इस कार्रवाई का जिक्र है, हालाँकि वहाँ की खबरों में मारे गए आतंकियों को ‘सामान्य नागरिक’ बता कर पेश किया जा रहा है। पाकिस्तानी फ़ौज के अधिकारियों ने भी भारतीय सेना की कार्रवाई को दबी जुबान से स्वीकार किया है।

‘कमलेश तिवारी के हत्यारों को 72 तोपों की सलामी दी जाए’ – कमेंट पर दानिश नवाब, मोहम्मद इमरान गिरफ़्तार

हिन्दू महासभा के पूर्व अध्यक्ष कमलेश तिवारी हत्याकांड मामले में अब तक कई ख़ुलासे हो चुके हैं। इनमें आरोपितों की पहचान से लेकर उनके हत्या करने की साज़िश तक का ख़ुलासा हो गया है। जिस योजनाबद्ध तरीक़े से कमलेश तिवारी की नृशंस हत्या की गई, उसका भी पता चल चुका है। मिटाई के डिब्बे में असलहे और पिस्टल को छिपाकर किस तरह से हत्या की इस ख़ौफ़नाक वारदात को अंजाम दिया गया, वो किसी के भी दिल को दहलाने में सक्षम है।

जहाँ एक ओर इस हत्याकांड की देशभर में भरसक निंदा हो रही है, वहीं कुछ अराजक तत्व अपनी विकृत मानसिकता के चलते भद्दे कमेंट करने से बाज नहीं आ रहे हैं। ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश के अम्बेडकर नगर से सामने आया है। जानकारी के अनुसार, कमलेश तिवारी की हत्या को लेकर फेसबुक पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में पुलिस ने दानिश नवाब और मोहम्मद इमरान अंसारी को गिरफ़्तार किया है। 

इन आरोपितों ने कमलेश तिवारी की मौत का मज़ाक उड़ाते हुए उनकी हत्या करने वालों को 72 तोपों की सलामी दिए जाने की बात कही। फेसबुक पर की गई यह टिप्पणी जैसे ही वायरल हुई, हिन्दू संगठनों ने जमकर प्रदर्शन किया और आरोपितों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज करने की माँग की। प्रदर्शनकारियों में ब्राह्मण महासभा सेवा समिति, हिन्दू जागरण मंच और करणी सेना शामिल थी, जिन्होंने अकबरपुर थाने में तहरीर दी। इसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपितों को गिरफ़्तार कर लिया।

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बता दें कि मोहम्मद इमरान अंंसारी ने फ़ेसबुक पर हँसी-ठिठोली की इमोजी का इस्तेमाल करते हुए ‘एक ट्रक निंदा’ कमेंट लिखकर कमलेश तिवारी की हत्या की ख़बर शेयर की, इस पर अकबरपुर थाना इलाक़े के निवासी दानिश नवाब ने कमेंट किया, “जिसने भी मारा हो उसे 72 तोपों से सलामी दी जाए।” इस विवादित टिप्पणी के सामने आते ही हिन्दू संगठनों में आक्रोश फैल गया। क़रीब एक घंटे तक चले धरना-प्रदर्शन के बाद एसपी वीरेंद्र कुमार मिश्र के निर्देश पर आरोपितों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया। एसपी ने आरोपितों की गिरफ़्तारी की पुष्टि की।

सोशल मीडिया पर एक हिन्दू नेता की सरेआम हत्या कर दिए जाने पर कुछ लोगों ने इसकी भर्त्सना की, वहीं कुछ कट्टरपंथी अपनी नीचता का परिचय यहाँ भी दिया। सोशल मीडिया पर “हा-हा” रिएक्शन देने वालों में फ़हीम रहमान, नदीम अख़्तर, मोहम्मद इमरान जैसे विकृत मानसिकता वाले लोग भी शामिल हैं, तो “लव” रिएक्ट करने वालों में सलाउद्दीन अंसारी और मुहम्मद समीउल्लाह के नाम सामने आए।