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स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना का नाम नेशनल वॉर मेमोरियल में, यासीन मलिक ने करवाई थी हत्या

स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना का नाम अब नेशनल वॉर मेमोरियल में शामिल किया जाएगा। भारतीय वायुसेना ने उनके नाम की मंजूरी दे दी है। उनका नाम नेशनल वॉर मेमोरियल में वीरगति को प्राप्त जवानों की सूची में शामिल किया जाएगा। इन जवानों ने देश के लिए अपनी जान क़ुर्बान कर दी। ये फ़ैसला सितम्बर के अंतिम सप्ताह में लिया गया, जब वायुसेना के उच्चाधिकारियों ने निर्णय लिया कि रवि खन्ना का नाम नेशनल वॉर मेमोरियल में होना चाहिए। इसके साथ ही उनका नाम वहाँ लिखा जाएगा और साथ ही उनके कारनामों के बारे में विवरण भी दिया जाएगा।

ज्ञात हो कि 1990 में जम्मू-कश्मीर में भारतीय वायुसेना के 4 निहत्थे जवानों की हत्या कर दी गई थी। इनमें स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना भी शामिल थे। इस घटना के 30 साल बाद ट्रायल शुरू किया गया है, जिससे वीरगति प्राप्त जवानों के परिजनों की न्याय की आस फिर से जगी है। टाडा कोर्ट ने तिहाड़ जेल में बंद यासीन मलिक को पेश करने का भी आदेश दिया है। जिन आतंकियों ने जवानों की हत्या की थी, वे यासीन मलिक द्वारा संचालित आतंकी संगठन के सदस्य थे। यह घटना जनवरी 25, 1990 को हुई थी। हाल ही में गोलीबारी की इस घटना में टाडा कोर्ट ने यासीन मलिक सहित 4 आरोपितों को पेश होने का आदेश दिया था।

यासीन मलिक ‘जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट’ नामक संगठन चलाता है। वह फ़िलहाल टेरर फंडिंग मामले में गिरफ़्तार होकर तिहाड़ जेल में बंद है। उसे एनआईए द्वारा गिरफ़्तार किया गया था। उसे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जेल से ही कोर्ट में पेश किया जाएगा। वीरगति को प्राप्त स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना की पत्नी निर्मल खन्ना अपने पति के हत्यारों को सज़ा दिलाने के लिए लड़ रही हैं। हाल ही में उन्होंने रवि खन्ना का नाम नेशनल वॉर मेमोरियल में शामिल करने की माँग की थी, जो अब पूरी हो रही है।

अगर उस हत्याकांड की बात करें तो भारतीय वायुसेना के जवानों की हत्या तब की गई जब उनके पास कोई भी हथियार नहीं था और वे एयरपोर्ट जाने के लिए बस का इन्तजार कर रहे थे। वहाँ भारतीय वायुसेना के 14 जवान थे। तभी अचानक से एक मारुति जिप्सी और एक बाइक से 5 आतंकी वहाँ पहुँचे और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, उन्होंने एके-47 से ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। जवानों के अलावा 2 कश्मीरी महिलाओं की भी हत्या कर दी गई, जो बस का इंतजार कर रही थीं। आतंकियों ने ख़ून से लथपथ जवानों के सामने डांस करते हुए जिहादी नारे भी लगाए थे।

‘श्रीराम हमारे पूर्वज और इस्लाम पूजा-पद्धति, मज़हब बदला जा सकता है पर पूर्वज नहीं’

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक कार्यक्रम के दौरान ऐसा वाकया सुनाया, जिसे सुन कर लोगों ने जम कर तालियाँ बजाईं। लखनऊ के ऐशबाग में चल रही रामलीला में पहुँचे मुख्यमंत्री ने भगवान राम व सीता का किरदार निभा रहे कलाकारों को रोली-टीका लगाया और उनकी आरती उतारी। योगी ने रामलीला के मंच से विपक्षियों पर शब्द-बाण चलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने रामायण पर वृहद शोध की ज़रूरत पर बल दिया।

योगी ने बताया कि जब उत्तर प्रदेश में दीपोत्सव कार्यक्रम के दौरान रामलीला का आयोजन किया गया था, तब इंडोनेशिया से भी रामलीला की एक टीम आई थी। उस टीम में सभी कलाकार मुस्लिम थे। बकौल योगी आदित्यनाथ, उन्होंने उन कलाकारों से पूछा कि भगवान श्रीराम से आपका क्या सम्बन्ध है? उन्होंने बताया कि इस्लाम उनकी पूजा-पद्धति है और राम उनके पूर्वज हैं। उन कलाकारों ने सीएम को बताया कि पूजा पद्धति या मज़हब में तो बदलाव किया जा सकता है, लेकिन पूर्वज को बदलना नामुमकिन है।

इस कहानी के माध्यम से योगी ने विपक्षियों पर तंज कसते हुए कहा कि हमारे देश में राम का नाम लेते ही कुछ लोगों को हाई-वोल्टेज करंट लगता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि थाईलैंड के राजा आज भी खुद को श्रीराम का वंशज मानते हैं। उच्च टीआरपी वाली लोकप्रिय टीवी सीरियल रामायण का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यह दुनिया के सबसे लोकप्रिय कार्यक्रमों में से एक साबित हुआ। योगी ने कहा कि भगवान राम भारत की हर एक साँस में बसे हैं।

सीएम योगी ने रामायण पर शोध कर के इसे जीवंत बनाने की वकालत की। उन्होंने कहा कि भारत तभी तक बना रहेगा और मानव कल्याण का मार्ग यहाँ से गुजरता रहेगा, जब तक यह देश मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम से ख़ुद को जोड़ कर उनसे प्रेरणा लेता रहेगा। उन्होंने कहा कि भगवान राम के आदर्शों पर ही रामराज्य की परिकल्पना की गई है।

‘कमल हासन राजनीति में बिना डायपर का बच्चा, पूरे राज्य में गंध मचा रखी है’

अभिनेता से नेता बनने की कोशिश कर रहे कमल हासन ने हाल ही में हिंदी को लेकर अपमानजनक टिप्पणी करते हुए भारतीय भाषा परिवार में इसे ‘डायपर वाला बच्चा’ करार दिया था। इसके जवाब में भाजपा नेता और राज्य सभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने हासन को ‘बिना डायपर वाला बच्चा’ करार दिया है।

कमल हासन ने 3 अक्टूबर को चेन्नै के एक कार्यक्रम में हिंदी को ‘डायपर वाला बच्चा’ जैसी नवजात भाषा करार दिया था। उन्होंने हिंदी की मानी हुई आयु की तुलना प्राचीन समय से चली आ रही भाषाओं जैसे तमिल, संस्कृत, तेलुगु, कन्नड़ आदि से करते हुए यह बात कही थी।

हासन ने हालाँकि बात सँभालने के लिए साथ में यह भी जोड़ा कि उन्हें हिंदी का भी ख्याल रखे जाने की चिंता है, क्योंकि “ये भी हमारा ही बच्चा है आखिरकार”, लेकिन इशारा साफ़ था। इसके पहले भी एक बार कमल हासन हिंदी के खिलाफ तमिलनाडु में हिंसक आंदोलन की बात कह चुके हैं।

एक ट्विटर यूज़र ने इसी मसले पर ऑपइंडिया की लिंक साझा करते हुए सुब्रमण्यम स्वामी को टैग कर उनका ध्यान इस मुद्दे पर आकर्षित किया था। उसी के जवाब में स्वामी ने लिखा, “और राजनीति में कमल हासन क्या है? एक बिना डायपर का बच्चा,जो पूरे राज्य में बदबू फैला रहा है।” उल्लेखनीय है कि खुद तमिल होने के बावजूद स्वामी हिंदी-संस्कृत को भारत की आधिकारिक और राष्ट्रीय भाषाएँ बनाए जाने की वकालत करते रहे हैं। उनके मुताबिक भारत की राष्ट्रीय भाषा संस्कृत होनी चाहिए, जिसे शनैः-शनैः बढ़ावा दे कर आधिकारिक भाषा बनने की तरफ़ ले जाना चाहिए। वहीं अंग्रेजी के साथ तत्सम/संस्कृतनिष्ठ हिंदी को तात्कालिक राजभाषा और ‘link language’ के तौर पर प्रचारित किया जाना चाहिए।

कौशाम्बी गैंगरेप: दलित नाबालिग से कहा- भगवान नहीं, अल्लाह के नाम पर माँगो रहम की भीख

कौशाम्बी गैंगरेप मामले में स्वराज्य पत्रिका के पोर्टल पर प्रकाशित स्वाति गोयल-शर्मा की रिपोर्ट स्तब्ध कर देने वाले खुलासों से भरी पड़ी है। न केवल इसमें स्थानीय समुदाय विशेष के आरोपितों की उम्र कम करके बताने की कोशिश और बलात्कार को “नादानी” कहने जैसी घटनाओं का ज़िक्र है, बल्कि पुलिसिया लीपापोती से लेकर भाजपा के जनप्रतिनिधि के नाकारेपन तक का कच्चा चिट्ठा भी है।

21 सितंबर को दोपहर में हुए अपराध की रिपोर्ट रात 9.30 बजे के बाद लिखी जाती है। जिस बाप की बेटी को नंगा कर नोंचा गया, उसे ज़मीन पर बिठा कर रखा जाता है (उनके आरोप के अनुसार पीटा भी जाता है) और जो भीड़ आरोपित नाज़िम को रंगे-हाथों पकड़ती है, शायद उसी भीड़ में से कोई बलात्कार का वीडियो वायरल भी कर देता है, फ़ोन पुलिस को सौंपने के पहले।

स्वाति गोयल शर्मा की रिपोर्ट बताती है कि गैंगरेप की घटना नाबालिग पीड़िता की बस्ती के महज़ 100 मीटर दूर हुई, जहाँ वह घास काटने गई हुई थी। आरोपितों के घर जिस समुदाय विशेष की बस्ती में हैं, वह भी पास ही है। घटना के बाद जब पीड़िता की चीखें सुन कर स्थानीय लोग वहाँ पहुँचे तो उनमें से एक लड़की को वापिस अपने घर जाना पड़ा- एक सलवार लाने के लिए, जिससे पीड़िता अपने आप को ढँक सके। कथित तौर पर बलात्कारियों ने पीड़िता का कुरता नहीं उतारा- क्योंकि वह अनुसूचित जाति पासी की थी, जिसे स्थानीय समुदाय विशेष वाले अपने से ‘नीचे’ देखते हैं।

स्थानीय लोगों ने स्वाति गोयल-शर्मा को यह भी बताया कि लड़की की चीखें सुनकर इकट्ठा होने वालों की भीड़ केवल हिन्दुओं की थी- वह भी अधिकाँश “नीची” जाति के हिन्दू। न ही कोई दुसरे मजहब विशेष से झाँकने आया, न ही ज्यादा “ऊँची” जाति वाले हिन्दुओं ने इसमें दिलचस्पी ली। और वह तब है जब वह इलाका कथित अल्पसंख्यक-बहुल क्षेत्र है। करीब 600 घरों में से 65%, यानी 400 के आस-पास दूसरे मजहब वालों के हैं।

तीन ने बलात्कार कर ‘अहसान’ किया, वरना 20 करते?

2 मिनट 13 सेकंड के वीडियो में वीडियो बनाने वाला (पीड़िता के आरोप के अनुसार मोहम्मद नाज़िम) पीड़िता से कहता है, “हम लोग नहीं होते तो कम-से-कम 20 लड़के इकट्ठा होते और (गैंगरेप करने के बाद?) तेरे बाप के पास ले जाते।” वीडियो में पीड़िता आरोपितों के घर की बहन-बेटियों का हवाला देती है, भगवान का हवाला देती है। भगवान की कसम पर वे अल्लाह की कसम खाने को कहते हैं, तो वह वो भी करती है। लेकिन बलात्कारी नहीं रुकता। लड़की को वह बताता है कि उसे ‘दो मिनट और चाहिए’। तभी वीडियो बनाने वाला कहता है कि अब उसकी ‘बारी’ है। लड़की इसके बाद चीखने लगती है।

एक तरफ़ भाजपा के नेता मंचों से चढ़ कर बताते हैं कि कैसे न केवल उनके राज में पुलिस-प्रशासन चाक-चौबंद चलने लगता है, बल्कि हिन्दू भी उन्हीं के राज में सुरक्षित हो सकते हैं। स्वाति की रिपोर्ट इस दावे को भी नंगा कर देती है।

स्वाति के अनुसार पीड़िता के परिवार और अन्य स्थानीय ग्रामीणों ने उन्हें बताया कि सबसे पहले वे भाजपा से जुड़े और सराय अकील नगर के चेयरमैन शिवदानी के पास ही गए, लेकिन उन्होंने उन लोगों को पुलिस के पास जाने की सलाह देकर टरका दिया। अपने आने की बात पर वह ‘तू चल मैं आता हूँ’ हो लिए।

इसके बाद ग्रामीण स्थानीय भाजपा विधायक संजय गुप्ता के ‘जनता दरबार’ में भी गए, लेकिन वहाँ भी उन्हें यही बताया गया कि विधायक जी मामले पर ‘गौर करेंगे’, ‘पुलिस को फ़ोन करेंगे जल्दी ही’। अंत में हार कर उन्हें स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता के पास जाना पड़ा। उन्हीं दम्पति के घर पीड़िता 21 सितंबर की इस घटना के बाद से रुकी हुई है।

किस नज़र से 18 साल का है ‘छोटका’?

स्वाति गोयल-शर्मा यह भी लिखतीं हैं कि जब वे दूसरे मजहब की बस्ती में आरोपितों और उनके समाज का पक्ष जानने गईं तो वहाँ पहले तो कोई अधिक बात करने को ही तैयार नहीं हुआ। किसी तरह बात करने के लिए उन्होंने स्थानीय मस्जिद में रसूख रखने वाले वयोवृद्ध दर्जी को तैयार किया। उसने बताया कि उन लड़कों की ‘नादानी’ से यह घटना हुई है! उन्होंने तो यहाँ तक कि पुलिस की जाँच में क्रमशः 20, 27 और 28 साल के पाए गए नाज़िम, आदिल (‘छोटका’ और ‘आतंकवादी’ के नाम से जाना जाने वाला) और आदिक (‘बड़का’, कुछ जगहों पर नाम आकिब भी रिपोर्ट किया जा रहा है) को 14, 18 और 20 साल का बता दिया। यही नहीं, वह “पासी लोग” पर उन लड़कों को खुद बुलाने का आरोप लगाते हैं।

शिक्षक नौशाद ने छात्रा को प्रेम जाल में फँसाया, निकाह की बात करने पर हत्या कर शव नाले में फेंका

दिल्ली पुलिस ने रविवार (सितम्बर 29, 2019) को करावल नगर के एक नाले से एक बैग बरामद किया था। जब उस बैग को खोला गया तो सभी हक्के-बक्के रह गए, क्योंकि उसमें एक 25 वर्षीय युवती की लाश थी। इस हत्या की गुत्थी सुलझ गई है। हत्यारा और कोई नहीं बल्कि उक्त युवती आफरीन का ट्यूटर नौशाद ही था। वह 25 सितम्बर से ही अपने घर से गायब थी। आफरीन का मोबाइल भी ऑफ आ रहा था, जिसके बाद परिजनों ने गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी।

परिजनों ने पहले ही इस मामले में उक्त ट्यूटर पर आरोप लगाया था। पुलिस ने उसे हिरासत में लेकर पूछताछ की तो मामला साफ़ हुआ। आफरीन परिवार के साथ बुलंद मस्जिद, शास्त्री पार्क क्षेत्र में रहती थी। परिवार में पिता रफीक अहमद, माँ राबिया बेगम, दो भाई दानिश और आमिर के अलावा एक शादीशुदा बहन है। उसके परिवार का टेंट का कारोबार है। आफरीन ने डीयू के माता सुंदरी कॉलेज से स्नातक करने के बाद हरियाणा के एक कॉलेज में बीएड में एडमिशन लिया था।

पुलिस के अनुसार, आफरीन बचपन से ही शास्त्री पार्क निवासी ट्यूटर मोहम्मद नौशाद के पास ट्यूशन पढ़ने जाती थी। उसने परिजनों को बिना बताए ही नौशाद के कोचिंग सेंटर में पढ़ाना भी शुरू कर दिया था। जब उसकी लाश बरामद हुई, तब सड़ जाने के कारण उसकी स्थिति ऐसी थी कि परिजन भी पहचान नहीं कर सके। बाद में उसके भाई ने शव की पहचान की। पुलिस ने जब युवती की आखिरी लोकेशन चेक की तो वह शास्त्री नगर के मोहम्मद नौशाद अली के घर की मिली।

पुलिस ने जब नौशाद से सख्ती से पूछताछ की तो पता चला कि उसने 26 सितम्बर को ही आफरीन की हत्या कर दी थी। फिर उसके शव को एक जूट के बैग में डाला और अपने साले राजिक की मदद से ठिकाने लगाया। इस काम के लिए उसने इको वैन का प्रयोग किया। नौशाद 8वीं से लेकर 12वीं तक की छात्रों को कोचिंग देता है। इसी दौरान उसके पास पढ़ने आने वाली आफरीन से उसे प्यार हो गया। दोनों में नजदीकियाँ बढ़ने के बाद जब आफरीन शादी की जिद करने लगी, तब उसने योजना बना कर उसकी हत्या कर दी।

आफरीन के दोस्तों ने पहले ही पुलिस को बताया था कि उसका अपने ट्यूटर के साथ प्रेम सम्बन्ध था, लेकिन पूछताछ में नौशाद लगातार पुलिस को बरगलाता रहा। पुलिस ने सीसीटीवी खंगाला तो नौशाद उस इलाक़े से गुजरता दिखा। सख्ती बरतने के बाद उसने सब उगल दिया। युवती की हत्या काफ़ी बेरहमी के साथ की गई थी।

अब शहीद और घायल जवानों के परिजनों को 4 गुना अधिक पैसे मिलेंगे

केंद्र सरकार ने शहीद और घायल जवानों के परिवारों को दी जानी वाली आर्थिक मदद चार गुना बढ़ाने का फैसला किया गया है। इसका लाभा हरेक परिस्थिति में शहीद और घायल होने वाले जवानों के परिजनों को मिलेगा। यानी अब परिवारों को दो लाख की बजाए 8 लाख रुपए मिलेंगे।

यह मदद आर्मी बैटल कैजुअल्टी वेलफेयर फंड के तहत दी जाएगी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जवानों के परिजनों के लिए वित्तीय मदद को दो लाख से बढ़ाकर 8 लाख करने को सैद्धांतिक रूप से मंजूरी दे दी है। लंबे समय से यह माँग उठ रही थी।

इससे पहले शहीद होने या 60 प्रतिशत से अधिक की अक्षमता होने पर 2 लाख रुपए की वित्तीय मदद का प्रावधान था। इसके साथ ही 60 फीसदी से कम अक्षमता वाले जवानों को एक लाख रुपए का वित्तीय मदद मिलती थी। ये धनराशि लाभार्थियों को मिलने वाली पारिवारिक पेंशन और आर्मी ग्रुप इंश्योरेंस की वित्तीय सहायता जैसी दूसरी सुविधाओँ से अतिरिक्त दी जाती थी।

रक्षा मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि रक्षा मंत्री ने युद्ध हताहतों की सभी श्रेणी के परिवारों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता 2 लाख रुपए से बढ़ाकर 8 लाख रुपए करने को सैद्धांतिक स्वीकृति दे दी है। जानकारी के मुताबिक कैजुअल्टी वेलफेयर फंड के तहत मिलने वाली इस सहायता के अलावा, पहले से मौजूद अनुदान में 25 लाख रुपए से लेकर 45 लाख रुपए और सेना समूह बीमा के लिए 40 लाख रुपए से लेकर 75 लाख रुपये तक के विभिन्न अनुदान शामिल हैं।

उल्लेखनीय है कि पिछली सरकार में गृह मंत्री के रूप में राजनाथ सिंह ने कार्रवाई में मारे गए या घायल हुए अर्द्धसैनिक कर्मियों के परिवारों की सहायता के लिए ‘भारत के वीर’ कोष की शुरुआत की थी।

बधाई हो रवीश जी! अनंतनाग में ग्रेनेड फेंका गया, आज ख़ुश तो बहुत होंगे आप?

जम्मू-कश्मीर को लेकर मीडिया गिरोह ने एक ऐसा नैरेटिव गढ़ा, जिससे यह प्रतीत हुआ कि राज्य में चल रही सारी समस्याएँ वर्तमान सरकार की ही देन हैं और वहाँ सुरक्षा-व्यवस्था चाक-चौबंद करना बड़ी भूल है। सबसे पहले तो अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने को ‘अलोकतांत्रिक’ सिद्ध करने की कोशिश की गई लेकिन संसद के दोनों सदनों में बहुमत से पास होने और कई विरोधी दलों का भी साथ मिलने से विपक्षी सांसत में पड़ गए। इसके बाद मीडिया के एक धड़े ने ‘कश्मीरियत’ की बात करनी शुरू की लेकिन जब उन्हें राज्य के वाल्मीकि समुदाय व महिलाधिकारों की याद दिलाई गई तो वे बगले झॉंकने लगे।

उसके बाद मीडिया का यह वर्ग इस उम्मीद में बैठा रहा कि जम्मू-कश्मीर में कुछ बहुत बड़ा हो, जिससे वे केंद्र सरकार के घेर सकें और उसके फ़ैसले को ग़लत ठहरा सकें। आख़िर में कुछ आतंकियों ने उनके इस स्वप्न को साकार करने के बीड़ा उठाया, लेकिन जहाँ-तहाँ मुठभेड़ में सभी मारे गए। हालाँकि, उन्होंने खुन्नस निकालने के लिए मासूम कश्मीरियों को ही निशाना बनाना शुरू कर दिया लेकिन सुरक्षा बलों ने समय रहते कई बड़े हमले नाकाम किए। जम्मू बस स्टैंड के पास से विस्फोटक जब्त किए गए। अंत में मीडिया के उस वर्ग ने अलगाववादियों और कश्मीरी नेताओं को नज़रबंद किए जाने को लेकर लोकतंत्र का राग अलापना शुरू कर दिया।

रवीश कुमार ने तो अपने शो में राज्यपाल सत्यपाल मलिक के उस बयान का भी मज़ाक बनाया, जिसमें उन्होंने जम्मू-कश्मीर में नौकरियों में बम्पर भर्तियाँ करने की बात कही थी। राज्यपाल ने इंटरनेट बहाली में देरी का कारण बताते हुए कहा था कि इसका इस्तेमाल आतंक और अशांति फैलाने वाले कर सकते हैं। एनडीटीवी के पत्रकार रवीश ने पब्लिक से राज्यपाल को यह बताने को कहा कि इंटरनेट छात्रों की पढ़ाई के काम भी आता है। क्या यह सोचने लायक बात नहीं है कि जब किसी बहुत बड़े खतरे की आशंका रही होगी, तभी इंटरनेट को प्रतिबंधित किया गया होगा? क्या सरकार को नहीं पता होगा कि इंटरनेट के अच्छे उपयोग भी हैं?

रवीश कुमार जम्मू-कश्मीर और पूरे देश को एक जैसे ही देखते हैं। ऐसा नहीं है कि उन्हें वस्तुस्थिति का ज्ञान नहीं, उन्हें ख़ूब पता है कि पूरे देश की और जम्मू-कश्मीर की परिस्थितियों में काफ़ी अंतर है। रवीश का तर्क था कि अगर आतंकवाद के बहाने जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट को बैन किया जा रहा है तो ऐसा पूरे देश में भी किया जा सकता है। क्या पूरे देश में पत्थरबाजी आम बात थी? क्या पूरे देश में पाकिस्तान पोषित आतंकी रोज़ घुसपैठ के लिए तैयार रहते हैं? क्या पूरे देश में अलगाववादी नेता हैं और वे भारत को गालियाँ देते हैं? क्या पूरे देश में दो निशान-दो संविधान चलता था? क्या पूरे देश में आए दिन आतंकी घटनाएँ होना आम बात थी? जाहिर है, इसका जवाब ना में है।

अब जम्मू-कश्मीर से ऐसी ख़बर आई है, जिससे रवीश के कलेजे को ज़रूर ठंडक मिली होगी। ‘कुछ बड़ा होने’ की उम्मीद में बैठे रवीश को केंद्र सरकार पर कटाक्ष करने का एक और मौक़ा मिल ही गया। वे राहत महसूस कर रहे होंगे। दक्षिणी कश्मीर के अनंतनाग में शनिवार (सितम्बर 5, 2019) को डिप्टी कमिश्नर के दफ्तर के सामने ग्रेनेड अटैक हुआ। इस हमले में एक ट्रैफिक पुलिस का जवान और एक पत्रकार सहित 14 लोग घायल हो गए। अगस्त 5, 2019 को अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद से घाटी में यह दूसरा ग्रेनेड अटैक है।

यह हमला उस क्षेत्र में हुआ, जहाँ डीसी का ऑफिस होने के कारण पहले से ही सुरक्षा-व्यवस्था चुस्त थी। आतंकियों ने गश्त लगा रहे सुरक्षा बलों के जवानों पर ग्रेनेड फेंके। हालाँकि, निशाना चूकने की वजह से ग्रेनेड सड़क पर गिर गया, जिससे एक दर्जन से अधिक लोग घायल हो गए। 13 लोगों को अस्पताल में इलाज के बाद डिस्चार्ज कर दिया गया, जबकि एक की स्थिति ख़राब होने के कारण उसे अभी भी अस्पताल में ही रखा गया है। हालाँकि, वह ख़तरे से बाहर है। जैसा कि होना था, इस ब्लास्ट के बाद शहर में भय का माहौल बन गया। सुरक्षा बल आतंकियों की तलाश में इलाक़े में घेराबंदी कर सर्च ऑपरेशन चला रहे हैं।

अभी तक किसी भी आतंकी संगठन ने इस हमले की ज़िम्मेदारी नहीं ली है। आपको याद होगा कि राजधानी श्रीनगर के नवा कदल क्षेत्र में सीआरपीएफ पर 28 सितम्बर को इसी तरह का ग्रेनेड अटैक हुआ था। क्या रवीश कुमार को इस तरह के हमलों के बाद ख़ुशी होती है कि उन्हें सरकार को घेरने का एक और मौक़ा मिल गया? जब हमले नहीं हो रहे थे, तब उन्हें समस्या होती है कि सब कुछ इतना शांत-शांत सा क्यों है, कुछ तो गड़बड़ है। अब जब एकाध हमलों की ख़बरें आ गई हैं, अब उनकी समस्या यह हो सकती है कि सरकार वहाँ सुरक्षा के लिए क्या कर रही है? रवीश ऐसा बोल सकते हैं:

“आतंकियों ने ग्रेनेड हमला किया। आख़िर जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों के इतने जवान क्या कर रहे हैं? इस हमले के कारण एकाध छात्र रेलवे और बैंकिंग का फॉर्म भरने से वंचित रह गए होंगे। सरकार राज्य के नागरिकों की सुरक्षा के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठा रही? जब ग्रेनेड फेंका गया, तब प्रधानमंत्री बांग्लादेश की पीएम से मुलाक़ात की तैयारी कर रहे थे। आख़िर ढाका के रामकृष्ण मिशन में विवेकानंद भवन का उद्घाटन करने से जम्मू-कश्मीर के उन छात्रों को क्या मिलेगा, जो रेलवे और बैंकिंग की परीक्षा नहीं दे पा रहे? कहीं पुलिस इस हमले के बाद निर्दोष लोगों को गिरफ़्तार कर के उन पर इल्जाम न डाल दे। आख़िर क्या सबूत होगा कि सुरक्षा बल जिन्हें पकड़ेंगे, वो आतंकी ही होंगे?”

असल में रवीश कुमार इतनी आजादी चाहते हैं कि उनके दोनों ही हाथों में लड्डू हों। वह चाहते हैं कि जब सुरक्षा-व्यवस्था पुख्ता रहने के कारण सब शांत रहे तब वह ये कहें कि कश्मीरियों को बोलने की आज़ादी नहीं दी जा रही है। वह ये भी चाहते हैं कि प्रतिबंधों में ढील के बाद अगर आतंकी किसी वारदात को अंजाम देने में सफल हो जाएँ, तब वह पूछें कि सरकार क्या कर रही है, सुरक्षा बल क्या कर रहे हैं और प्रधानमंत्री तब कहाँ थे? रवीश के कलेजे में ठंडक इसलिए भी आई होगी क्योंकि अब उन्हें ऐसे सवाल पूछने का मौक़ा मिल गया है। रवीश चाहते हैं कि हमले न हों तो सरकार द्वारा ‘डर का माहौल’ बनाए जाने की बात करें और हमले हों तो ये कहें कि सरकार आतंकियों द्वारा बनाए गए ‘डर का माहौल’ को काबू में नहीं कर पा रही।

जब सब शांत होता है, रवीश को लगता है कि ज़रूर सरकार कुछ गड़बड़ कर रही है

इस हमले के बाद ‘ट्रोलवीश कुमार’ का एक प्राइम टाइम तो आराम से निकल ही जाएगा- इस घटना के लिए राष्ट्रपति से लेकर भाजपा तक से सवाल करते हुए। वह मीठी आवाज़ में जनता को यह बता ही देंगे कि देखो, केंद्र सरकार के लाख दावों के बावजूद कैसे आतंकी सफल हो गए (मन में भाव- ओहो, आतंकी सफ़ल हो गए। वाओ। अब तो सबको घेरूँगा)। मीडिया का एक वर्ग भी फिर से यही चलाएगा कि जम्मू-कश्मीर में सरकार असफल हो रही है। अगर हमले बंद हो जाएँगे तो फिर मीडिया मानवाधिकार का मुद्दा लेकर आएगी, जैसा अभी कुछ दिनों पहले हो रहा था।

गौतम गंभीर का केजरीवाल पर तंज: बाबू जी धीरे चलना, बड़े गड्ढे हैं इस राह में!

दिल्ली की सड़कों में गड्ढे को लेकर सत्ताधारी आम आदमी पार्टी और भाजपा आमने सामने है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शनिवार को अपनी सरकार के दायरे में आने वाली लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) की सड़कों को गड्ढा मुक्त करने का अभियान शुरू करने का ऐलान किया। इस पर तंज कस्ते हुए बीजेपी सांसद और पूर्व क्रिकेटर गौतम गंभीर ने ट्वीट किया, बाबू जी धीरे चलना, बड़े गड्ढे हैं इस राह में!

केजरीवाल को टैग करते हुए लिखा कि हम को मालूम है ‘दिल्ली’ की हक़ीकत, लेकिन दिल को ख़ुश रखने के लिए ये ख़्याल अच्छा है।

इससे पहले, सड़कों में गड्ढों को लेकर केजरीवाल ने भी ट्वीट किया था जिसमें लिखा था कि दिल्ली सरकार के अधीन PWD सड़कों को गड्ढा मुक्त बनाने का अभियान आज से शुरू। 50 विधायक 25-25 किलोमीटर सड़क का निरीक्षण करेंगे, जिसमें हर विधायक के साथ एक इंजीनियर भी होगा।

अपने ट्वीट में केजरीवाल ने एक ऐप का भी ज़िक्र किया था जिसके ज़रिए गड्ढे या अन्य ख़राबी की फ़ोटो और लोकेशन रिकॉर्ड होगी और हर ख़राबी को तुरंत ठीक कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि पीडब्ल्यूडी के अधीन दिल्ली की कुछ ही सड़कें आती हैं, लेकिन उन पर रोज लाखों वाहन चलते हैं। बारिश से सड़कों पर जो असर होता है उससे किसी को असुविधा नहीं हो इसलिए यह अभियान चलाया जा रहा है । मुख्यमंत्री ने दावा किया कि इतने बड़े स्तर पर पहली बार सड़कों का निरीक्षण हो रहा है।

हाल ही में, मुख्यमंत्री केजरीवाल तब विवादों में घिर गए थे, जब उन्होंने कहा था कि बिहार से एक आदमी 500 रुपए का टिकट लेकर दिल्ली आता है और अस्पताल में पाँच लाख का ऑपरेशन फ्री में कराकर चला जाता है। इस बयान को लेकर उनकी चौतरफ़ा किरकिरी भी हुई थी। इससे पहले, उन्होंने दिल्ली में एनआरसी लागू करने के मसले पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी पर निशाना साधा था। केजरीवाल ने कहा था कि एनआरसी लागू करने पर सबसे पहले तिवारी को दिल्ली छोड़कर जाना होगा।

इमरान खान का ‘न्यू पाकिस्तान’: PM की पार्टी का नेता स्कूली छात्राओं को पहना रहा बुर्का

पाकिस्तान की खैबर पैख्‍तूनख्‍वा प्रांत की सरकार ने पिछले दिनों स्कूली छात्रों के लिए बुर्का या अबाया अनिवार्य करने का आदेश जारी किया था। विरोध होने पर सरकार ने आदेश तो वापस ले लिया, लेकिन गुपचुप तरीके से इस पर अमल जारी है। इस प्रांत में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ही सत्ता में है। इमरान खान न्यू पाकिस्तान का वादा कर सत्ता में आए थे।

पाकिस्तानी अखबार ‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ के अनुसार प्रांत के रुस्तम घाटी के एक गाँव में PTI के एक स्थानीय नेता ने स्कूली छात्राओं के बीच बुर्के बाँटे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारियों ने पूर्व जिला परिषद सदस्य मुजफ्फर शाह द्वारा दी गई रकम से रुस्तम घाटी के चेना गाँव के एक गर्ल्स मॉडल स्कूल में छात्राओं के बीच बुर्के वितरित किए।

केंद्रीय परिषद पालो धेरी चीना ग्राम पार्षद और पीटीआई नेता मुजफ्फर शाह ने 1 लाख रुपए के मूल्य के बुर्के खरीदे। जिसे स्कूली छात्राओं के बीच मुफ्त में बाँटा गया। मुजफ्फर शाह ने फोन पर द एक्सप्रेस ट्रिब्यून से बात करते हुए कहा, “मैंने छात्राओं के लिए अबाया खरीदने का फैसला किया था, लेकिन फिर स्थानीय नेताओं के साथ परामर्श करने के बाद मैंने उनके लिए बुर्का खरीदा।” शाह ने बताया कि एक बुर्के की कीमत 1,000 रुपए है।

पाकिस्तानी पत्रकार नायला इनायत ने इस पर तंज कसते हुए कहा कि पुराने पाकिस्तान में छात्राओं को लैपटॉप मिलते थे, जबकि नए पाकिस्तान में 1 लाख रुपए के मूल्य के बुर्के बाँटे जा रहे हैं।

शाह ने बताया कि प्रांत के मुख्यमंत्री से प्रेरित होकर उन्होंने यह कदम उठाया है। उन्होंने कहा कि इससे छात्राओं के साथ छेड़छाड़ नहीं होगा और वे सुरक्षित रहेंगी।

खैबर पैख्‍तूनख्‍वा सरकार ने प्रांत में सरकार द्वारा संचालित किए जाने वाले शैक्षणिक संस्थानों में छात्राओं के लिए खुद को पूरी तरह ढकना अनिवार्य कर दिया था। उल्लेखनीय है कि प्रान्त के हरिपुर जिला शिक्षा विभाग ने सबसे पहले आदेश जारी किया था। जिला शिक्षा अधिकारी ने सभी प्राचार्यों और पब्लिक स्कूलों के प्रधानाध्यापकों को यह सुनिश्चित करने को कहा था कि छात्राएँ बुर्का या अबाया पहनें। हालाँकि बाद में यह आदेश वापस ले लिया गया। सीएम महमूद खान ने आदेश वापस लेने का निर्देश जारी करते हुए कहा था कि ऐसा सरकार की सहमति के बिना किया गया था।

मोदी सरकार ने नहीं कराया PM को पत्र लिखने वाले 49 सेलेब्स के ख़िलाफ़ FIR, मीडिया चला रहा प्रपंच

केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने साफ़ किया है कि केंद्र सरकार ने 49 सेलेब्रिटीज के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज नहीं कराई है। पीएम मोदी को पत्र लिख कर कथित रूप से मॉब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं पर विरोध दर्ज कराने वाले सेलेब्रिटीज के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की बात मीडिया में चल रही थी। हालाँकि, यह ख़बर सही है लेकिन इसमें मोदी सरकार का कोई हाथ नहीं है। मीडिया आउटलेट ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने एक लम्बा-चौड़ा पैराग्राफ लिख कर इस क़दम की आलोचना की थी और मीडिया में ये बात कुछ इस तरह फैलाई जा रही थी जैसे केंद्र सरकार ने ही इन सेलेब्रिटीज पर देशद्रोह का चार्ज लगा दिया हो।

हालाँकि, जिस व्यक्ति ने सेलेब्रिटीज के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कराई है, उसने कहा कि इन सेलेब्रिटीज ने देश की छवि को कलंकित किया है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किए गए प्रभावशाली कार्यों को कमतर आँका है। इन 49 लोगों में कथित इतिहासकार रामचंद्र गुहा, फ़िल्म निर्देशक मणिरत्नम, श्याम बेनेगल, अनुराग कश्यप और अभिनेत्री अपर्णा सेन सहित कई जानी-मानी हस्तियाँ शामिल थीं। पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने भी आरोप लगा दिया कि देश में सरकार विरोधी आवाज़ों को दबाया जा रहा है, जबकि इस एफआईआर को किसी व्यक्ति द्वारा दर्ज कराया गया है, सरकार द्वारा नहीं।

पत्र लिखनेवालों में से एक फ़िल्म निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन ने तो न्यायपालिका पर ही सवाल खड़ा करते हुए पूछा कि आख़िर इस केस को स्वीकार ही क्यों किया गया? उन्होंने इसे लेकर चिंता ज़ाहिर की। हालाँकि, इन लोगों को ये समझना चाहिए कि जैसे इन्हें पत्र लिख कर विरोध जताने का हक़ है वैसे ही किसी अन्य नागरिक को भी न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाने का पूरा हक़ है। अगर एक स्वच्छ लोकतंत्र की निशानी हैं तो दूसरा चिंताजनक कैसे हुआ?

पत्र लिखने वालों में से एक कौशिक सेन ने कहा कि उनलोगों को प्रताड़ित करने के लिए ऐसा किया जा रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता और वकील सुधीर ओझा द्वारा मुजफ्फरपुर में दायर की गई इस एफआईआर में 49 सेलेब्रिटीज पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाया है। उधर, फ़िल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने भी स्पष्ट कर दिया है कि इस एफआईआर से उनका कोई ताल्लुक नहीं है और इससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वह कोई सम्बन्ध नहीं रखते।