Friday, October 2, 2020
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दलित बच्ची का रेप मुसलमान करें तो ओके है, क्योंकि वो तो अपने लोग हैं न!

एक दलित बच्ची अगर मुसलमान द्वारा बलात्कार का शिकार होती है तो वो ऐसे मीडिया संस्थानों के लिए, इन सेलिब्रिटीज के लिए, इन वामपंथियों और लिबरपंथियों के लिए वो अछूत क्यों हो जाती है? क्या किसी बच्ची का बलात्कार अपने आप में दिल दहलाने वाला अपराध नहीं कि इसकी रिपोर्टिंग में, चर्चा में, आरोपित का नाम और जात देखना ज़रूरी हो जाता है?

इंतजार कीजिए कि किसी मुसलमान का रेल गाड़ी में फोन का चार्जर लगाने के लिए किसी हिन्दू से झगड़ा हो जाए और बाताबाती हो। फिर उसका वीडियो वायरल हो जाए और एक प्राइम टाइम शो में बताया जाए कि मुसलमान अब मोदी की ट्रेन में फोन भी चार्ज नहीं कर सकता। एंकर गम्भीर आवाज में, कटाक्ष करते हुए कहेगा, “हाँ मुसलमान लोगों, ये देश तुम्हारा है भी नहीं, तुम अपना पावर बैंक ले कर चला करो, वरना कोई हिन्दू तुम्हें फोन भी चार्ज करने नहीं देगा। और फोन से ही तो सब कुछ होता है। आप लोग भी इन्ज्वॉय कीजिए इस डिजिटल इंडिया को। हें… हें… हें…”

एक बच्ची है पंद्रह साल की। मवेशी के लिए घास छीलने गई। वहाँ नाजिक, आदिल और एक अज्ञात लड़के ने उसे घेर लिया। उसके बाद उसे घसीट कर झाड़ियों में ले गए, उसके साथ जो किया वो कहने में भी आत्मा काँपती है। लेकिन इन तीनों ने उस बच्ची के पहचान लेने पर, उनके अल्लाह का वास्ता देने पर भी, उसे नहीं छोड़ा और वीडियो बनाते रहे। शायद इतना भी कम नहीं था तो उसका वीडियो इंटरनेट पर डाल दिया।

दूसरी खबर सुनिए कि केरल के चेंदामंगलम में एक चर्च है जिसके पादरी की उम्र सत्तर साल है। तीन बच्चियाँ उसके पास चर्च के काम निपटाने के बाद वो पादरी से ‘ब्लेसिंग्स’ यानी आशीर्वाद लेने गईं थीं और पादरी ने आशीर्वाद देने के बहाने, एक-एक कर, तीनों के साथ बलात्कार किया। खबर एक महीने पुरानी है और अब चर्चा में आ रही है। केरल में पादरी लोगों ने खूब कांड किए हैं, लेकिन वो खबरें बाहर आते-आते गायब हो जाती हैं।

हाल ही में चिन्मयानंद वाला कांड सामने आया था। राम रहीम का कांड हम सब जानते हैं। आसाराम जेल में है। ये लोग दरिंदे हैं जिन्होंने अपने पावर का, किसी के विश्वास का फायदा उठाया और उन्हें अपना शिकार बनाया। इस तरह की घटनाएँ जब भी होती हैं तो खूब कवरेज होता है। तब वहाँ वैचारिक स्तंभों में अपराधी गौण हो जाता है और केन्द्र में उसका धर्म आ जाता है।

लेकिन इस पादरी की तरह, केरल में कई बार ऐसे मामले सामने आए हैं, तब आस्था या रिलीजन वैचारिक स्तंभों का विषय नहीं बन पाता। वो भीतरी पन्नों की कोई खबर बन कर गायब हो जाती है। सोशल मीडिया न होता तो शायद वो भी नहीं बनती। इस सत्तर साल के पादरी ने जो किया है वो सीधे तौर पर दूसरे के विश्वास के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। फ्रैंको मुलक्कल ने भी यही किया था नन के साथ और उस नन पर तमाम तरह के दबाव डाले गए कि वो केस वापस ले ले।

गैंग इसी तरह काम करता है

याद कीजिए कि कितने स्तंभकारों ने, वामपंथी या तथाकथित लिबरल पत्रकारों ने, ट्विटर पर शाब्दिक डायरिया से ग्रस्त सेलिब्रिटीज़ ने इन पादरियों पर, मुसलमान अपराधियों पर, हिन्दुओं की मजहबी मॉब लिंचिंग पर, बीफ माफिया द्वारा डेढ साल में ली गई बीस हिन्दू जानों पर कितने शब्द लिखे या बोले? आप कहेंगे कि हर बार मैं यही लाइन क्यों लेता हूँ? वो इसलिए कि कोई और ये लाइन लेने को तैयार नहीं।

आज जब भीम आर्मी का गुंडा चंद्रशेखर, लिंगलहरी कन्हैया, संवेदनशील शेहला, अतिसंवेदनशील स्वरा, बहन कुमारी मायावती और तमाम वैसे लोग तो एक साथ कोरस में गाने लगते हैं, वो कौशांबी की उस बच्ची के लिए कितनी बार आवाज लगाते दिखे? क्या उस बच्ची के साथ जो हुआ, उसके विरोध में सूरत के मस्जिद से सौ मुसलमानों की भीड़ निकली, पुलिस के आदेश को दरकिनार करते हुए कि आदिल, नाजिक और उसके साथी आरोपित ने गलत किया और मुसलमान होने के नाते वो शर्मिंदा हैं?

क्या भीम आर्मी ने पोस्टर चिपकाए कि मोदी और योगी सरकार के राज में पंद्रह साल की दलित बच्ची का सामूहिक बलात्कार हो रहा है? क्योंकि सरकार तो मोदी और योगी की ही है, जिम्मेदारी तो इन्हीं दोनों की है। फिर भी क्रोध क्यों नहीं उबल रहा? क्योंकि बलात्कारी मुसलमान हैं? यानी, संवेदना एक फ्लो चार्ट देख कर बाहर आती है कि पीड़ित कौन है, आरोपित कौन है?

नौ साल की वो बच्चियाँ किस समुदाय से थीं? ईसाई भी तो अल्पसंख्यक होते हैं। उसका पादरी जब बच्चियों के साथ ऐसे जघन्य कृत्य करता है तो पौने तीन एकड़ में फेसबुक पोस्ट लिखने वाला पत्रकार कान बंद कर लेता है या उसका पासवर्ड खो जाता है? केरल की सरकार को, उसके मुख्यमंत्री को, या मोदी को ही क्यों नहीं घेर रहे ये लोग?

क्योंकि चुनाव आने में अभी थोड़ा समय है और बलात्कारी जब अपने ही जात-बिरादरी के हों, तो उनके बारे में लिखने पर क्या पता नरक-वरक जाना पड़ जाए, या कोई पूछ ले कि क्या इसी दिन के लिए अवार्ड दिया था? क्या इसी दिन के लिए तुम्हें भीड़ दे कर खड़ा किया था, तुम्हें नेता बनाया था?

यही कारण है कि सारे चमन चम्पक सीन से गायब चल रहे हैं। ये इस इंतज़ार में बैठे हैं कि बस कोई मुसलमान टिकटॉक पर मुँह पर लाल रंग लगा कर कह दे कि वो तो रस्ते से जा रहा था, उसे किसी ने रोक कर बोला कि वो ‘मोदी जी की जय’ बोले, उसने नहीं बोला तो तीन थप्पड़ मार कर निकल लिया। फिर ये भी नहीं देखना कि वो सच बोल रहा था या झूठ, घटना कहाँ हुई, आरोपित कौन था… कुछ नहीं! मुसलमान ने कहा है तो वो झूठ तो नहीं ही बोलेगा, क्योंकि किताब में लिखा है झूठ बोलना पाप है, नदी किनारे साँप है, वही तुम्हारा बाप है। (सॉरी, वही तुम्हारा बाप है वाला हिस्सा फ्लो में निकल गया, हें… हें… हें…)

इसीलिए जब भी यह गिरोह एकजुट हो कर सामने आता है तो इनकी संवेदना उस बच्ची के साथ नहीं होती। ये कहते हैं कि फलाँ नेता, फलाँ पार्टी हिन्दू-मुसलमान कर रही है, लेकिन इसके उलट जितनी बिगट्री, जितनी मजहबी घृणा और उन्माद, जिस तरह की कुत्सित चर्चा और हिन्दू-मुसलमान, दलित-सवर्ण इन लोगों ने फैलाई है, उतनी भारत के आधुनिक इतिहास में किसी भी दौर में नहीं दिखी।

चूँकि आप टीवी पर ये कह सकते हैं कि सब हिन्दू-मुसलमान में लगे हुए हैं और आपके चम्पक समर्थक ऐसा मान भी लेते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि ये पूरा गिरोह घृणा से सना हुआ है जो कि मानवीय संवेदनाओं की आड़ में अपने कलुषित हृदय के अंधेर कोठरी से कालिख निकाल कर बेच रहा है, जिसे इनके समर्थक चेहरे पर पोते घूम रहे हैं। सारी संवेदना सिर्फ और सिर्फ आरोपित का धर्म और जाति देख कर बाहर आती है।

अगर ऐसा नहीं है तो फिर इस पंद्रह साल की बच्ची का क्या दोष है? उस 19 साल की लड़की का क्या दोष है जिसे जसीम नामक लड़के ने नशा खिला कर, उसका बलात्कार किया और तस्वीरें ली, एक महीने तक ब्लैकमेल करता रहा कि वो इस्लाम कबूल कर ले? फिर इन कुकृत्यों की, इन अपराधों की खबर आप तक यही मीडिया, यही गैंग क्यों नहीं पहुँचाता? क्या ये इनके लिए अनटचेबल हैं?

एक दलित बच्ची अगर मुसलमान द्वारा बलात्कार का शिकार होती है तो वो ऐसे मीडिया संस्थानों के लिए, इन सेलिब्रिटीज के लिए, इन वामपंथियों और लिबरपंथियों के लिए वो अछूत क्यों हो जाती है? क्या किसी बच्ची का बलात्कार अपने आप में दिल दहलाने वाला अपराध नहीं कि इसकी रिपोर्टिंग में, चर्चा में, आरोपित का नाम और जात देखना ज़रूरी हो जाता है?

आप तय कीजिए कि हिन्दू-मुसलमान में कौन किसको उलझा रहा है

यही चैनलों के एंकर, लिबरल गैंग, माओवंशी लाल नितम्ब समूह आपको हर ऐसी घटना पर पूछेंगे कि क्या भारत में 2014 के बाद से ‘डर का माहौल’ आ गया है! ये रोएँगे कि आपातकाल यही है। बताएँगे कि ये अंधेरा ही आज के टीवी की तस्वीर है। कहेंगे कि टीवी मत देखो, फेंक दो बाहर। जबकि हर ऐसी घटना को कवर करना संभव नहीं है, फिर भी कुछ घटनाएँ मीडिया द्वारा उठा ली जाती हैं, क्योंकि उनके पास और कुछ कवर करने के लिए होता नहीं।

24 घंटे अपनी स्क्रीनों पर लाल-नीले-काले-पीले स्ट्रिप में हर खबर को ब्रेकिंग कहने और हर बात पर चिल्लाने वाले एंकरों के पास खुद को उद्वेलित दिखाने के अलावा और कुछ आता ही नहीं। इन्हें मेन्टेन करना होता है नकली क्रोध का बहाव, इन्हें चिल्लाना होता है पार्टियों के प्रवक्ताओं पर, क्योंकि ये मुद्दे से बहुत दूर होते हैं, मुद्दे से कटे हुए, उन्हें शब्दों के झुंड की तरह ट्रीट करते हुए जहाँ किसी हीरोइन की जूती गायब होने की खबर और किसी बच्ची के रेप की खबर उन्हीं तीन सौ शब्दों में सिमट जानी है, जो टेलिप्रॉम्प्टर पर उस समय के लिए उल्टी हो कर झूलती रहती है।

आखिर, जब हर बलात्कार की घटना कवर नहीं की जा सकती तो कुछ ही क्यों कवर होती हैं? कठुआ की बच्ची की खबर में ऐसा क्या है, जो गाजियाबाद की बच्ची में नहीं! दोनों आठ साल की, एक घटना मंदिर के पास, दूसरी मस्जिद के पास, एक में हिन्दू नाम वाले, दूसरे में मुसलमान मौलवी… किस को कवरेज मिली? क्यों? सीधा जवाब है कि यहाँ आठ साल की बच्ची तो कैंसल आउट हो गई, दोनों जोड़-घटाव में कट कर शून्य हो गईं।

अब बचे मंदिर और मस्जिद, हिन्दू और मुसलमान। मंदिर और हिन्दू को तय कारणों से चुन लिया गया और इंडिया की जगह हिन्दुस्तान लिखते हुए लोगों ने बताया कि हिन्दू तो बस आठ साल की बच्चियों का बलात्कार कर रहे हैं। उसके बाद मौलवियों ने मस्जिदों में दसियों बार कम उम्र की बच्चियों का यौन शोषण किया है, खबर नहीं आई।

जो व्यक्ति दिन रात फ़ेसबुक और प्राइम टाइम टीवी से हिन्दू-मुसलमान के नाम पर नफ़रत बाँट रहा है, समाज में ज़हर घोल रहा है, वो कॉलेज के बच्चों की सभा में यह बोलता पाया जा रहा है कि किसी आईटी सेल वाले से प्रेम मत कर लेना लड़कियों वो न अच्छा पति बन सकता है, न प्रेमी! अब सवाल उसी व्यक्ति से है कि क्या वो स्वयं अच्छा पति, पिता या प्रेमी है या नहीं? ऐसे लोग बात बनाने में बहुत आगे होते हैं क्योंकि इनके पास शब्द बड़े महीन वाले हैं। ये उन्माद और घृणा बाँटने वाले लोग हर रात यह सोचते हुए सोते हैं कि मोदी राज में दंगे क्यों नहीं हो रहे, मुसलमान और हिन्दू इनके भड़काने के बाद भी तलवार ले कर एक दूसरे को क्यों नहीं काट रहा?

ये समझने के लिए आपको जीतेन्द्रीय नहीं होना पड़ेगा कि एक तरह की खबर को, एक तय समय के आस-पास, एक ही तरह के लोग और संस्थाएँ, एक तय टोन में, एक साथ क्यों कवर करते हैं। बहुत सीधी-सी बात है कि ये कहने से कि मेरी भी एक बेटी है इसी उम्र की, उसको बाहर जाते देख कर मुझे डर लगता है… इन्हें संवेदना नहीं दिखानी होती, इन्हें कंटेंट को बेचने के लिए पैकेजिंग करनी होती है और इसी में ये अपनी बेटियों और बहनों को बेच लेते हैं।

धिक्कार है ऐसे एंकरों पर और लानत है ऐसे लोगों पर जो अपनी बहन-बेटी का नाम वैसे मौकों पर लेते हैं जब उनके लिए वो आठ साल की बच्ची की कोई अहमियत है ही नहीं, क्योंकि उसका बलात्कार मात्र एक जरिया है अपने अजेंडे को हवा देने का। वरना, इनकी नाटकीय संवेदना और कथारसिस हर ऐसी घटना पर बाहर आती जहाँ पीड़िता बस बच्ची है और आरोपित बस अपराधी। उनकी पहचान, उनके साथ चल रहे विशेषणों से अगर इनकी कवरेज प्रभावित नहीं होती, चुनाव देख कर इनकी वाणी में ओज और वक्तृता में जोश न आता, तो मैं मान लेता कि ये संवेदनशील लोग हैं।

गिरोह के साथी: फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब

जब से सोशल मीडिया ने एक अनौपचारिक हलो-हाय की सीमा तोड़ कर अपने ‘मीडिया’ होने वाली बात को गम्भीरता से लेना शरू किया है, तब से इनके अपने ही मालिकों की नींद उड़ चुकी है। कभी-कभी कोई ऐसी चीज बनाता है जिसका उद्देश्य कुछ होता है और लोगों के हाथ में पहुँचते ही वो किसी और काम में आने लगता है।

वही हाल सोशल मीडिया के साथ हुआ। जो चीज फोटो शेयर करने, दोस्त बनाने, चैट करने और वीडियो शेयर करने को ले कर बनी थी, उस पर अब विचार शेयर होने लगे हैं। उस पर खबरें बँट रही हैं। उस पर घटनाओं को वीडियो बन रहे हैं और वो वीडियो लाखों लोग देख रहे हैं। जब ऐसा होने लगता है तो ऐसे संस्थानों को चलाने वालों की विचारधारा पर हमला होता दिखता है।

यही कारण है कि जब हमने शाम में इस खबर को फेसबुक पर शेयर किया, तो आधे घंटे के भीतर इसे फेसबुक ने यह कह कर हटा दिया कि यह खबर उनके ‘कम्यूनिटी गाइडलाइन्स’ के खिलाफ जाती है। जबकि, ये कोई वैचारिक स्तम्भ नहीं था, बस एक रिपोर्ट थी जहाँ हमने सत्य को, बिना लाग-लपेट के, बिना किसी घृणा का एंगल दिए, रखा था कि पंद्रह साल की दलित बच्ची अपने तीन बलात्कारियों के सामने अल्लाह का वास्ता दे कर चिल्लाती रही और आदिल, नाजिक विडियो बनाते रहे।

कमाल की बात यह है कि हेडलाइन में ‘जय श्री राम’ हो और किसी मुसलमान के पीड़ित होने की बात हो, तब वो फेसबुक के गाइडलाइन्स के खिलाफ नहीं जाती! वो ‘अल्लाह’ और ‘बलात्कारी’ के नाम पर ही बिफर जाते हैं। इसी पर एक सोशल मीडिया यूजर ने ट्वीट के माध्यम से हमें सलाह दी कि हमें इस खबर को फेसबुक पर कुछ ऐसे शेयर करना चाहिए था:

आरोपित राम (नाम बदला हुआ है) और उसके दो दोस्तों ने एक नाबालिग दलित युवती को… लड़की चिल्लाती रही भगवान के नाम पर मुझे छोड़ दो… भीड़ ने बलात्कार के आरोपित राम (नाम बदला हुआ है) को पकड़ लिया जबकि दूसरे दो आरोपित श्याम (नाम बदला हुआ है) और एक अज्ञात व्यक्ति भागने में सफल रहे!

कल शाम ही हमने एक वीडियो बनाया जिसमें डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा कट्टरपंथी इस्लामी आतंक से लड़ने की बात की गई थी, उसे यूट्यूब ने पूरी तरह से अपलोड होने से पहले ही डाउनग्रेड कर दिया और उसे डीमोनेटाइज कर दिया। यानी, उससे होने वाली आमदनी हमारे चैनल को नहीं मिलेगी। क्यों? क्योंकि ये उनके ‘कम्यूनिटी गाइडलाइन्स’ के खिलाफ है!

हम आखिर ऐसी खबरें क्यों करते हैं?

ख़ैर, हमारी मंशा भी यह नहीं है कि हम हर ऐसी घटना को कवर करें। हम वो कर ही नहीं सकते। लेकिन हाँ, हम हर वैसी खबर को बाहर ले कर आएँगे जिसे सिर्फ इसलिए नकार दिया गया हो क्योंकि आरोपित किसी समुदाय विशेष का है या पीड़ित किसी जाति विशेष से ताल्लुक रखता है। क्योंकि वो ऐसी हर घटना को हिन्दू-मुसलमान बनाएँगे। वो हर सामाजिक अपराध को ऐसे दिखाएँगे जैसे वो अपराध इसलिए हुआ क्योंकि आरोपित और पीड़ित किसी खास धर्म, जाति या मजहब के थे।

इसे कहते हैं स्पिन देना। इसे कहते हैं कि हेडलाइन लिख कर लोगों के मन में पहले ही नैरेटिव डाल देना कि ‘मुस्लिम महिला को पुलिस ने पीटा और उसका गर्भपात हो गया’ लिखते हुए बीबीसी आपको यह मानने को कह रहा है कि चूँकि महिला मुसलमान थी, उसी कारण उसे पीटा गया और उसका गर्भपात हो गया। जबकि खबर में ऐसा कोई संदर्भ, कहीं नहीं दिखता।

ये महीन तरीके से नैरेटिव को आगे बढ़ाना है। इस नैरेटिव को काटने के लिए, इन दोगले लोगों को एक्सपोज करने के लिए, इन सेलिब्रिटीज़ को नग्न करने के लिए, ऐसी खबरों को दिखाना ज़रूरी है ताकि लोग ये तय कर सकें कि इनकी संवेदना कभी भी, एक बार भी, उस बच्ची के लिए या उस मुसलमान नवयुवक के लिए, उस दलित के लिए थी ही नहीं। ये बहुत ही नीच किस्म के लोग हैं जो अपने गिरने की हद पर जा कर एक और गड्ढा खोद लेते हैं और आप अचंभित रह जाते हैं कि अब और कितना गिरोगे!

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एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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