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तिब्बती शरणार्थी, फिर भी भारत में जीने की आज़ादी का आनंद ले रहे: दलाई लामा

तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने भारत में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर बड़ी बात कही है। उन्होंने कहा कि तिब्बती शरणार्थी हैं फिर भी वे 60 साल से भारत में जीने की आजादी का आनंद ले रहे। उन्होंने कहा कि भारत में रहने वाले तिब्बती शरणार्थियों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया है। आज तिब्बतियों की चुनी हुई सरकार सभी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन कर रही है।

चंडीगढ़ जाते वक्त ऊना में उन्होंने यह बात कही। दलाई लामा ने 2001 में तिब्बतियों से जुड़े राजनीतिक फ़ैसलों से स्वयं को अलग कर लिया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाक़ात पर दलाई लामा ने कहा था कि दोनों देशों के बीच अच्छे संबंध होने बहुत ज़रूरी हैं। उन्होंने कहा कि भारत और चीन दोनों देशों की सभ्यताएँ बहुत पुरानी है, इसलिए दोनों देशों में अच्छे रिश्ते होने जरूरी हैं।

इस दौरान तिब्बत की आज़ादी पर पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि वर्ष 1974 में हमने तय किया था कि चीन से आज़ादी की माँग नहीं करेंगे। चीन में रहते हुए तिब्बती सिर्फ़ अपनी संस्कृति के संरक्षण के लिए कुछ अधिकारों की माँग कर रहे हैं। दलाई लामा ने कहा कि हम तिब्बती नालंदा दर्शन का अनुसरण कर रहे हैं और नालंदा दर्शन तर्क पर आधारित है। आज चीनी बुद्धिजीवी भी मानते हैं कि तिब्बती बौद्ध धर्म पौराणिक नालंदा परंपरा के अनुसार है जो पूरी तरह से विज्ञान पर आधारित है। इन बौद्ध शिक्षाओं को आधुनिक शिक्षा के साथ पढ़ाया जा सकता है।

ख़बर के अनुसार, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा के पहले निर्वासित तिब्बत सरकार ने धर्मशाला में तीन दिन की विशेष आम सभा आयोजित की थी। इस बैठक में 24 देशों से आए 345 प्रतिनिधि शामिल हुए। इसमें पास हुए प्रस्ताव में कहा गया कि दलाई लामा अपने ‘पुनर्जन्म’ यानी उत्तराधिकारी के बारे में ख़ुद फ़ैसला करेंगे।

बैठक के बाद इंडिया टुडे से विशेष बातचीत में निर्वासित तिब्बत सरकार के प्रेसीडेंट लॉबसांग सांग्ये ने कहा कि चीन को ‘पुनर्जन्म’ जैसे मसले पर निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है, इसलिए चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी को धार्मिक मामले में दख़लअंदाज़ी नहीं करनी चाहिए। 

J&K के 4,500 छात्रों ने PM स्कॉलरशिप के तहत लिया दाखिला, 6 सालों में सबसे अधिक

जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 निष्प्रभावी होने के बाद से जहाँ विपक्षी और पड़ोसी मुल्क भारत सरकार की आलोचना करते नहीं थक रहे। वहीं, जम्मू-कश्मीर की युवा पीढ़ी अपने सुनहरे भविष्य के लिए बड़ी तादाद में भारत सरकार की योजनाओं का लाभ उठा रही है।

इस वर्ष जम्मू और कश्मीर से लगभग 4,500 छात्रों ने प्रधानमंत्री स्पेशल स्कॉलरशिप योजना (पीएमएसएसएस) के तहत स्नातक में दाखिला लिया, जो कि पिछले 6 सालों में सबसे अधिक है। इसमें जम्मू क्षेत्र से 2,400 और कश्मीर से 1,474 छात्र हैं। शेष लद्दाख से हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक इन 4,500 छात्रों में से सबसे अधिक बच्चों ने इंजीनियरिंग में दाखिला लिया है। इनकी संख्या 2,690 है। 800 के करीब बच्चों ने बीए और बीएससी जैसी डिग्री में एडमिशन लिया। 700 छात्रों ने नर्सिंग चुना है और लगभग 150 ने फार्मेसी।

बता दें कि जम्मू-कश्मीर पर हाल ही में आए सरकार के फैसले के बाद राज्य प्रशासन ने सर्वोच्च न्यायालय से पीएमएसएसएस के तहत चुने गए छात्रों की निर्धारित संस्थानों में रिपोर्ट करने की तारीख को बढ़ाने के संबंध में अनुरोध किया था। इसमें प्रशासन ने कहा था कि राज्यों में लगे प्रतिबंध के कारण चुने गए छात्र 15 अगस्त तक दाखिले के लिए मिले संस्थान में रिपोर्ट नहीं कर सकते, इसलिए समय सीमा को बढ़ाकर 15 सितम्बर कर दिया जाए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने राज्य प्रशासन के इस अनुरोध को अपनी मंजूरी दे दी थी। बता दें कि इस वर्ष जम्मू-कश्मीर के सबसे अधिक बच्चों ने महाराष्ट्र में दाखिला लिया है। इसके बाद दिल्ली, पंजाब और उत्तर प्रदेश का नंबर आता है।

गौरतलब है कि जिस योजना के तहत जम्मू-कश्मीर के ये छात्र अलग-अलग क्षेत्रों में दाखिला ले रहे हैं, वह 2011-12 में शुरू किया गया था। इस योजना में जम्मू-कश्मीर के बच्चों को पूरे देश भर के कॉलेज, संस्थान और विश्वविद्यालयों में दाखिला देने का प्रस्ताव था। इसके अलावा उनकी ट्यूशन, बोर्ड, बुक और अन्य जरूरी सामान के भुगतान की बात भी इस योजना के अंतर्गत कही गई है।

पीएमएसएसएस का उद्देश्य जम्मू-कश्मीर के युवाओं को पूरे देश भर में समान रूप से अवसर प्रदान करना है। इस योजना में 5,000 स्कॉरलरशिप जम्मू-कश्मीर के छात्रों को हर वर्ष इंजीनियरिंग, मेडिकल, नर्सिंग, फार्मेसी और होटल मैनेजमेंट, कृषि, आर्किटेक्चर और कॉमर्स की पढ़ाई के लिए दी जाती है।

सीमा में दिखते ही मार गिराएँ ड्रोन: सुरक्षा बलों को सरकार का आदेश

ड्रोन के जरिए भारत में आतंकवादियों तक हथियार और ड्रग्स भेजने की पाकिस्तान की साजिश को नाकाम करने के लिए सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने सुरक्षाबलों को सीमा पार से आने वाले सभी ड्रोन को मार गिराने का आदेश दिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स, में सरकारी सूत्र के हवाले से बताया गया है, “अंतरराष्ट्रीय सीमा पर तैनात सुरक्षा बलों को भारतीय सीमा में आने वाले ड्रोन को मार गिराने का आदेश दिया गया है।” उनके मुताबिक 1,000 फीट और उससे नीचे उड़ने वाले ड्रोन को मारने का आदेश दिया गया है। लेकिन 1,000 फीट से अधिक ऊँचाईं पर उड़ रहे ड्रोन्स को एजेंसियों से सुरक्षा क्लीयरेंस लेना होगा।

उल्लेखनीय है कि बीते दिनों पाकिस्तान की नापाक कोशिशों का पर्दाफाश होने के बाद सुरक्षा बल के जवान अधिक चौकन्ना हो गए हैं। जानकारी के अनुसार, फिरोजपुर के नजदीक हुसैनवाला सीमा के करीब बीएसएफ जवानों ने अभी हाल ही में एक और ड्रोन को भारत में घुसते देखा था। इसके बाद से उसे ढूँढने के लिए तलाशी अभियान चलाया जा रहा है। पंजाब पुलिस को भी इस ड्रोन के सीमा में आने की जानकारी दे दी गई है। अब स्थानीय पुलिस इसकी जाँच कर रही है।

बता दें कि पिछले दिनों सीमा पार से भारत में ड्रोन घुसने के मामले के संबंध में पंजाब सरकार बयान जारी करते हुए साफ कर चुकी है कि पाकिस्तान इन्हीं ड्रोन के जरिए हथियार और विस्फोटक भेजने का काम कर रहा है। पंजाब पुलिस के अनुसार अभी हाल ही में एके-47 राइफल्स और ग्रेनेड भारी मात्रा में ड्रोन के जरिए ही अमृतसर भेजे गए।

जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल-370 खत्म होने के बाद से पाकिस्तान भारत में अशांति फैलाने का प्रयास कर रहा है। घुसपैठिए लगातार अपनी कोशिशों में सेना की सख्ती के कारण नाकाम हो रहे हैं। जिससे सीमा पार बैठे आतंकी बौखलाए हुए हैं। सीमा पार बैठे आतंकियों ने भारत में दहशतगर्दी पैदा करने के लिए प्लान ‘ए, बी और सी’ बना रखा है। प्लान ‘ए’ के तहत आतंकवादी कश्मीर में खून-खराबा कराना चाहते हैं। प्लान ‘बी’ के तहत वे घुसपैठ कर हमले करने की फिराक में हैं। प्लॉन ‘सी’ के तहत देश भर में साम्प्रादायिक दंगे भड़काने की साजिश रची गई है।

मोदी सरकार से अलग होने का फैसला TDP को ले डूबा: चंद्रबाबू नायडू को अब हो रहा पछतावा

तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के अध्यक्ष और आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने भाजपा नीत एनडीए छोड़ने के अपने फैसले पर सार्वजनिक तौर पर खेद जताया है। एनडीए से अलग होने के बाद हुए आम चुनावों और आंध्र प्रदेश राज्य विधानसभा चुनावों में टीडीपी को करारी हार का सामना करना पड़ा था।

जानकारी के मुताबिक नायडू ने विशाखापत्तनम जिले में एक रैली को संबोधित करते हुए एनडीए सरकार छोड़ने के अपने फैसले पर खेद व्यक्त किया। इससे पहले नायडू कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन के फैसले पर भी खेद जता चुके हैं। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस के साथ हाथ मिलाना बहुत बड़ी गलती थी, मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

टीडीपी पार्टी अध्यक्ष ने शनिवार (अक्टूबर 12, 2019) को यह भी स्वीकार किया कि मई 2018 में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार से बाहर होने के फैसले ने इस साल विधानसभा और लोकसभा चुनावों में उनकी पार्टी को बड़ा झटका दिया। नायडू ने कहा कि आंध्र के लिए विशेष दर्जे की माँग को बल देने के लिए उन्होंने मोदी सरकार से अलग होने का फैसला किया था। लेकिन यह टीडीपी को भारी पड़ा।

एनडीए से अलग होने के बाद नायडू विपक्षी मोर्चा बनाने के लिए सबसे ज्यादा सक्रिय नजर आए थे। यहॉं तक आम चुनावों के बाद जब एक्जिट पोल बता रहे थे कि मोदी सरकार लौट रही है तब भी उन्हें एनडीए के हार की उम्मीद थी। नतीजों के ठीक पहले तक वे गैर एनडीए दलों को साथ लाने की कवायद में जुटे हुए थे।

हालॉंकि अपने पूर्व के फैसले पर अफसोस जताए जाने के बावजूद एनडीए में नायडू की वापसी के आसार नहीं दिख रहे। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “अमित शाह ने उसी वक्त नायडू से कह दिया था कि उनकी पार्टी के लिए राजग के दरवाजे अब बंद हो चुके हैं।”

2019 के चुनावी पराजयों के बाद टीडीपी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही। उसके कई बड़े नेता बीजेपी का दामन थाम चुके हैं। जून में पार्टी के छह राज्यसभा सांसदों में से चार भाजपा में शामिल हो गए थे।

मुर्शिदाबाद हत्याकांड: ममता के प्रेम की दीवानी मीडिया और ‘हलाल’ की गई लाशें 

अमानत खाँ उदास-सा चेहरा लिए, घर के बाहर सर लटकाए बैठा था मानो कोई अपना चला गया हो। सहसा कोई आवाज आती है तो उसे लगता है कि कहीं वही तो जिंदा हो कर वापस नहीं आ गया। ज़ोहरा ने आज खाना नहीं बनाया, बच्चों का भी दिल नहीं लग रहा। एक अजीब सी मायूसी पूरे मोहल्ले में छाई हुई है। लगता है कि कोई अजीज रुखसत हो भी गया, और शायद नहीं भी… क्योंकि वो अमानत और ज़ोहरा जैसे मानवीय संवेदना से भरे परिवारों के बुझे चूल्हों में कहीं ज़िंदा है। आज के इस माहौल में जहाँ पाँच साल के दूसरे मजहब के बच्चे को कोई हिन्दू बच्चा यह कह देता है कि उसका देश तो पाकिस्तान है, अमानत और ज़ोहरा मानवता की उम्मीद की वो लौ है जो पिछले कुछ सालों में साम्प्रदायिकता की कालिमा को दूर करने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं।

इंतज़ार कीजिए मुर्शीदाबाद के स्वयंसेवक बंधुप्रकाश पाल, उनकी पत्नी जो सात माह के बच्चे के साथ गर्भवती थी, उनके आठ साल के बच्चे की नृशंस हत्या पर आने वाले ऐसे लेखों का क्योंकि वो आएँगे तो ज़रूर! हत्या का कारण पता नहीं चल पाया है। कुछ इसे राजनैतिक हत्याकांड मान रहे हैं, कुछ मजहबी एंगल देख रहे हैं और पुलिस इस दृष्टिकोण से भी देख रही है कि पति-पत्नी के संबंध में भी कुछ खटास थी। लेकिन बात वो है भी नहीं। सोचिए किसी दलित की परिवार सहित हत्या, गुजरात में हो गई होती। सोचिए मरने वाला परिवार बदायूँ के किसी दूसरे मजहब विशेष का होता।

इसमें कुछ भी सामने नहीं आ पा रहा और तय कारणों से वो मीडिया शांत है, जो राज्य सरकार की पार्टी, मरने वाले का मजहब या जाति देख कर आधे घंटे में बता देती है कि फलाँ राज्य में कानून-व्यवस्था बेकार हो चुकी है, अल्पसंख्यकों का जीना हराम है, कथित निचली जाति के लोग सवर्णों की हिंसा का शिकार हो रहे हैं। प्रेस क्लब तक मार्च भी निकलता, सूरत के किसी मस्जिद से मजहबी भीड़ निकलती और वो नारा लगाती कि वो हत्यारों को छोड़ेंगे नहीं।

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बंधुप्रकाश को वो लग्जरी हासिल नहीं। वो बंगाल का है, हिन्दू है, और संघ का सदस्य भी था। इसलिए वो मरे या खो जाए, ‘डर का माहौल’ बताने वाली, आपातकाल के प्रजनन हेतु फोरप्ले में लिप्त मीडिया को न तो क़ानून व्यवस्था पर कोई सवाल पूछना है, न ही राजनैतिक या साम्प्रदायिक एंगल को तरजीह देनी है। अगर ये इस हत्याकांड पर फेसबुक पोस्ट भी लिखेंगे तो कहेंगे कि बेवजह इसे तूल मत दीजिए, पुलिस को अपना काम करने दीजिए, जब जाँच हो जाएगी तो सब क्लियर होगा, अभी मैं क्या बोलूँ? सही बात है! लेकिन यही लोग तो याकूब मेनन से लेकर अफजल गुरु जैसों पर सालों केस चलने के बाद, हर जाँच में आरोप सिद्ध होने के बाद भी, उन्हीं संस्थाओं को ‘एक्स्ट्राजूडिशियल किलिंग’ के नाम पर सुप्रीम कोर्ट को ‘कातिल’ का दर्जा दे देते हैं।

वो भी रहने दीजिए, याद कीजिए कि गौरी लंकेश की हत्या के आधे घंटे बाद कातिलों से जुड़े कितने विशेषण ट्रेंड करने लगे थे? याद कीजिए कि उन्हें क्या कहा गया था, कौन सा धर्म जुड़ा था उन ‘तब भी अनाम’ कातिलों के साथ, कौन सी विचारधारा जोड़ी गई थी और कैसे प्रेस क्लब से ले कर दिल्ली की सड़कों तक काँख में पानी मार कर अपनी थकान और नकली दुख का चेहरा ओढ़े लोग मार्च करते दिखे थे। डाभोलकर, कलबुर्गी, पनसरे आदि की मौत किसके शासनकाल में हुई थी और आरोप किस धर्म, विचारधारा और सरकार पर लगे थे, वो भी याद कीजिए। जब सब याद आ जाए तो पता कीजिए कि इन पापी पत्रकारों की कल्पना और वास्तविकता में कितना अंतर था, या है।

हलाल की हुई लाशों का संदेश

सोशल मीडिया पर चाकुओं से गोदी हुई नहीं, रेती हुई तस्वीरें घूम रही हैं। चाकुओं से गोदने और रेतने में वही अंतर है जो झटका और हलाल में होता है। एक में पीड़ित को सिर्फ मारना उद्देश्य होता है, एक में तड़पा कर मारना, और शायद कोई मैसेज देना। सोशल मीडिया पर घूमती तस्वीरों पर लिखा है कि ये बहुत हिंसक तस्वीरें हैं, क्या आप इसे देखना चाहते हैं? जिस तरह से चाकू का इस्तेमाल हुआ है और जैसे काटा गया है, वो एक संदेश देने जैसा है। वो बता रहा है कि कातिल की मंशा हत्या से ज़्यादा कुछ और भी बताने की रही होगी।

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ये बताता है कि कातिल के मन में निजी, राजनैतिक या मजहबी घृणा का स्तर कितना ज़्यादा रहा होगा। ये किसी को नहीं पता, ममता की पुलिस तो यही कहती फिर रही है, कि मारने वाले कौन थे या हत्या का मकसद क्या था। ये बात और है कि बंगाल में राजनैतिक और मजहबी हत्याएँ, जिनमें तृणमूल के काडर और दंगे को आतुर एक खास मजहब के लोग शामिल रहते हैं, इतनी आम हो गई हैं कि जिनकी पार्टी के कार्यकर्ता मारे जा रहे हैं, वो ट्विटर पर बस गिन रहे हैं कि ये 81वाँ बलिदान हुआ।

मैं लिबरलों से सवाल नहीं पूछ रहा क्योंकि वो बिके हुए लोग हैं जो अपने बाप का नाम गलत बता देंगे अगर कोई चार पैसे दे दे। मेनस्ट्रीम मीडिया के दो फुट के कलम की नींब वाला पुरस्कार ले कर नाचने वाले पत्रकार अमूमन ममता के बंगाल पर चुप ही पाए जाते रहे हैं। जब दंगों से बंगाल जल रहा था तो वो बिहार के जलने पर लेख लिख रहे थे। उन्हें जब लगातार गाली पड़ी तब जा कर दो लाइन में लिखा कि बंगाल की हालत खराब है, लेकिन हर बात पर मोदी की हलक में हाथ डालने वाले पत्रकार शिरोमणि ममता का नाम तक नहीं लिख पाए थे।

मेनस्ट्रीम मीडिया इन बातों पर हमेशा चुप ही देखी गई है। बड़े-बड़े तोपों की नालों में बाल्टी भर पानी चला जाता है। तब उन्हें यह याद नहीं आता कि उनके घर में बेटी है, पत्नी है, माँ है, बाप है…तब उन्हें बंधुप्रकाश पाल में खुद की छवि नहीं दिखती, उनकी गर्भवती पत्नी की चाकुओं से हलाल करने के स्टाइल पर उनका गला नहीं रुँधता, वो तब चेहरा दुख से मलिन नहीं करते कि पेट में सात माह के अजन्मे बच्चे ने क्या बिगाड़ा था, तब वो याद नहीं करते कि उनका बेटा भी उसी आठ साल के बच्चे जैसा होगा…तब दर्शकों को यह नैरेटिव नहीं थमाया जाता कि हत्या का कारण चाहे निजी दुश्मनी हो, राजनैतिक रंजिश हो या मजहबी घृणा, लेकिन ममता बनर्जी के राज्य में यह इतना आम क्यों हो गया है?

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हत्या तो हुई है न या वो भी फोटोशॉप है?

सारे एंगल हटा दीजिए, बस यह बता दीजिए कि हत्या तो हुई है न? या वो भी फोटोशॉप के माध्यम से ममता के खिलाफ साजिश रची जा रही है? ये तो तय है न कि चार हत्याएँ हुई हैं एक घर में जिसमें दो वयस्क, एक बच्चा और एक अजन्मा शिशु शामिल है? क्या ये इतना नृशंस नहीं है कि राज्य की कानून-व्यवस्था पर सवाल किया जा सके? कुछ दिन पहले एक भाजपा कार्यकर्ता को भी इसी ‘हलाल’ स्टाइल में रेता गया था और भाजपा वाले ट्विटर पर 81 लिख रहे थे, क्या ये कानून व्यवस्था पर टिप्पणी करने के लिए काफी नहीं है?

या अचानक से गौरी लंकेश की हत्या से ले कर अफजल और याकूब की फाँसी तक, जिस मीडिया को पूरा डिटेल मालूम रहता था कि कातिलों की पहचान क्या है, वो किस पार्टी के हैं, किस भगवान को पूजते हैं, किसके स्पीच सुन कर उनके मन में जहर आया, और ये कि इन कट्टर आतंकियों की फाँसी भारतीय न्यायिक व्यवस्था द्वारा की गई हत्या है, उस मीडिया के पास आज कोई सवाल या विश्लेषण नहीं? ये लोग तो बाथ टब में बैठ कर श्रीदेवी की आत्महत्या की गुत्थी सुलझाते दिखते हैं, वो मुर्शिदाबाद की इन चार हत्याओं पर चुप कैसे हैं?

अभी तक एक बहुत गहरा शक निजी दुश्मनी की तरफ जा रहा है। बंगाल के कुछ स्थानीय लोग बता रहे हैं कि 65% समुदाय विशेष की आबादी वाले इलाके में इस व्यक्ति की हत्या का कारण आपसी दुश्मनी भी हो सकती है। हाँ, बंधुप्रकाश आरएसएस से जुड़े हुए थे जो कि निजी या राजनैतिक या मजहबी, किसी भी तरह के एंगल को खत्म नहीं करता। लेकिन सवाल घूम-फिर कर वहीं आता है कि ममता बनर्जी के राज्य में ये सब इतना आम कैसे है? वहाँ की पुलिस कहाँ है? क्या पिछले चार दिन में हुई आठ राजनैतिक हत्याओं, या विधानसभा चुनाव के परिणामों के बाद की गई 35 हत्याओं, या कुल मिला कर 81 भाजपा-संघ कार्कर्ताओं की जान का कोई मोल नहीं?

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मीडिया इस संख्या का इन आँकड़ों का विश्लेषण क्यों नहीं करता? क्या ये काम भी अब सोशल मीडिया के जिम्मे ही है? या फिर बंगाल ममता बनर्जी का निजी गणतंत्र बन गया है और वो वहाँ की तानाशाह है जिसके बारे में लिखने-बोलने पर बंगाल की खुफिया जाँच एजेंसी के लोग आपको राह चलते गोली मार देंगे? कई बार तृणमूल कॉन्ग्रेस का यह भी दावा रहा है कि भाजपा वाले खुद ही अपनी पार्टी के लोगों को मार रहे हैं ताकि तृणमूल पर आरोप लगाया जा सके। यह बात अगर सही है तो फिर ममता की पुलिस निकम्मी है कि एक भी मामले में उन्होंने अभी तक एक भी भाजपा वाले को नहीं पकड़ा है जिससे उनकी यह विचित्र बात साबित हो सके।

आम बंगाली डरा हुआ क्यों है?

बंगाल में रह रहे आम बंगाली से पूछिए कि वहाँ क्या हो रहा है। वो बताएगा कि राजनैतिक हत्याओं के मामले में तृणमूल ने वामपंथियों को पीछा छोड़ने की ठान रखी है। विकास के नाम पर कुछ नहीं हो रहा। तुष्टिकरण का चरम यह है कि सैकड़ों दंगों की आग में बंगाल जलता रहा, घर और परिवार तबाह हो गए लेकिन वोट बैंक की राजनीति में एक खास मजहब के लोग कभी पुलिस स्टेशन की प्राथमिकी में भी नहीं आते। साड़ी को सर पर रख कर दुआ में होंठ हिलाने वाली ममता बनर्जी उतनी ही बड़ी नौटंकीबाज है, जितना ‘मजहबी’ से ज्यादा ‘मजहबी’ दिखने की कोशिश करते इफ्तार पार्टी में टोपी लगाए घूमते हिन्दू नेता। इसलिए वहाँ हॉस्पिटल में बुजुर्ग की मौत हो जाने पर दो सौ कट्टरपंथियों की भीड़ पहुँच जाती है और तबाही मचा कर चली जाती है। उन ‘शंतिप्रियों’ का कुछ नहीं होता।

आप सोचिए कि लोग सोशल मीडिया पर ये तक पूछ रहे हैं कि अगर कल को उनके साथ मुर्शिदाबाद हत्याकांड जैसा कुछ हुआ तो वो क्या करेंगे? वो पूछ रहे हैं कि क्या वो घर में तलवार और फरसा रख सकते हैं? वो पूछ रहे हैं कि ऐसा करना गैरकानूनी है शायद, पुलिस पूछेगी तो क्या बताएँगे? ये आम लोग हैं जो बंगाल में डर कर जीवन बिता रहे हैं। उन्हें डर है कि किसी दिन उनका धर्म या विचार, किसी के मजहबी उन्माद की बलि चढ़ जाएगा और वो प्रतिकार की स्थिति में भी नहीं रहेंगे और मरने के बाद मिलने वाले इंसाफ की बात तो रहने ही दीजिए।

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सोचना यह है कि बंगाल के मुर्शिदाबाद में कैमरा और ओबी वैन ले कर करोड़ों का टर्नओवर पाने वाली मीडिया क्यों नहीं पहुँच रही? सवाल यह है कि ये बात सोशल मीडिया और फंडिंग से जूझते पोर्टलों के पन्नों से बाहर क्यों नहीं पहुँच रही? पुलिस और प्रशासन के मुँह में माइक ठूँस देने वाले पत्रकार कहाँ हैं? मोबाइल फोन के दौर में मुर्शिदाबाद की घटना को इतना क्यों दबाया जा रहा है कि जब मैं वहाँ के किसी स्थानीय व्यक्ति से बात करना चाहता हूँ तो वो इस बात पर बात करने से झिझकता है और कहता है कि व्हाट्सएप्प पर कॉल करो? आप जरा सोचिए कि किस तरह की मॉनिटरिंग हो रही है कि आम आदमी मुर्शिदाबाद पर बात करने से पहले कॉल काट देता है!

क्योंकि उसे बंगाल में ही रहना है और ये बंगाल वही है जिसके नाम के लिए ममता हर सप्ताह मोदी सरकार को रिमाइंडर भेज रही हैं, लेकिन उसकी बदलती पहचान के लिए कुछ नहीं कर रही। मृतक की माँ ये कह रही है कि उसका संघ से कोई नाता नहीं था, जबकि ऐसा कहने के लिए उस पर दवाब न बनाया गया हो ऐसा मानना भी मुश्किल ही है। बंगाल में ही रहना है, उसी इलाके में, उसी सरकार के राज में, उसी पुलिस थाने के अंतर्गत जहाँ ये सब आम है, जहाँ हत्या करने के बाद न तो हत्यारा पकड़ा जाता है, न उस पर चर्चा होती है।

डर का माहौल यही है। राज्य में तानाशाही ऐसे ही चलती है। पुलिस जब आपके साथ धरने पर बैठ जाती है तो पता चलता है कि उसने अपनी सेवाओं और जनता की रक्षा के शपथ की बत्ती बना कर किसके लिए जला रखी है। बंगाल में कभी जली हुई लाश मिलती है, कभी पोल पर टँगी हुई लाश मिलती है, कभी नदी में फूली हुई लाश मिलती है, कभी हलाल की हुई, गर्दन रेती हुई लाश मिलती है, लेकिन न तो हत्यारा मिलता है, न ही इंसाफ।

उस्मान ने किया रेप, उसकी अम्मी 2 महीने से दे रही थी धमकी, पीड़िता ने लगाई फाँसी

मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक दुष्कर्म पीड़िता ने फाँसी लगाकर अपनी जान दे दी। मृतका के परिजनों का आरोप है कि आरोपित युवक उस्मान खान के परिजन पिछले 2 महीने से पीड़िता को धमका रहे थे और लगातार उस पर समझौते के लिए दबाव बना रहे थे, जिससे पीड़िता काफी परेशान चल रही थी। शुक्रवार (अक्टूबर 11, 2019) की शाम को भी उस्मान की अम्मी पीड़िता के घर गई और उसे जान से मारने की धमकी दी। इससे परेशान युवती ने शनिवार (अक्टूबर 12, 2019) की दोपहर में फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली। 

घटना जनकगंज इलाके की है। मृतका के परिजनों ने आरोपित के परिजनों को मौत का जिम्मेदार ठहराया है। बता दें कि जनकगंज इलाके की रहने वाली एक युवती के साथ घोसीपुरा निवासी उस्मान खान ने दुष्कर्म किया था। युवती ने जून में जनकगंज थाने में FIR दर्ज कराई थी। इसके बाद जनकगंज थाना पुलिस ने आरोपित उस्मान को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। घटना के बाद से ही उस्मान के परिजन युवती व उसके परिजनों पर राजीनामा करने के लिए दबाव बना रहे थे। 

मृतका के पिता का कहना है कि 20 अगस्त को भी उस्मान की अम्मी मुन्नी ने यह कहकर धमकाया था कि अगर राजीनामा नहीं किया तो जान से मार देंगे। इस मामले में जनकगंज थाने में पीड़िता ने शिकायती आवेदन दिया। मृतका के पिता ने बताया कि 20 अगस्त को जनकगंज थाने में शिकायती आवेदन दिया था, लेकिन पुलिस ने गंभीरता से नहीं लिया। लगातार इस मामले में इन लोगों की तरफ से धमकी मिल रही थी, लेकिन पुलिस ने एक बार भी उनसे पूछताछ तक नहीं की।

आरोपित के परिजनों की तरफ से धमकियों का सिलसिला जारी रहा। बताया जा रहा है कि शुक्रवार (11 अक्टूबर) शाम को उस्मान की अम्मी फिर से युवती के घर पहुँची और उसे धमकाया। जिसके बाद परेशान युवती ने अगले दिन यानी शनिवार दोपहर को अपने कमरे में फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली। पुलिस का कहना है कि इस मामले में कोई शिकायत दर्ज नहीं की गई थी, लेकिन अब पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया है। पुलिस ने यह भी कहा कि अगर आरोपित के परिजन मृतका और उसके परिजनों को परेशान कर रहे थे तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

मोदी-जिनपिंग के सामने गूँजा राष्ट्रपति का पद ठुकराने वाली उस महान महिला कलाकार का नाम…

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच महाबलिपुरम में मुलकात हुई। हालाँकि, इस बारे में कुछ विशेष बताने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि मीडिया से आपको पल-पल का अपडेट मिलता रहा। इसीलिए, हम उनके हैंडशेक और कूटनीति की बातें न करते हुए शुक्रवार (अक्टूबर 9, 2019) की शाम दोनों की मौजूदगी में मामल्लपुरम के शोर मंदिर में हुए सांस्कृतिक कार्यक्रम की बात करेंगे। इस दौरान कलाक्षेत्र ने कुल 6 प्रस्तुतियाँ दी। इन सभी प्रस्तुतियों के गहरे अर्थ थे। इसकी कुछ ऐसी बातें हैं, जिसके बारे में आपको जानना चाहिए। शोर मंदिर इस ऐतिहासिक पल का गवाह बना।

जिस कलाक्षेत्र के कलाकारों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सामने प्रस्तुतियाँ दी, उसकी संस्थापक रुक्मिणी देवी थीं। कार्यक्रम के दौरान रुक्मिणी देवी का नाम भी गूँजा। तीसरे परफॉरमेंस के दौरान उनकी कोरियोग्राफी की चर्चा हुई। उस प्रस्तुति की बात हम आगे करेंगे, लेकिन उससे पहले आपको बता दें कि भारत-चीन के बीच अनौपचारिक समिट के दौरान जिस रुक्मिणी देवी का नाम मंच से लिया गया, वो एक साधारण नाम नहीं है। आप जान कर भले ही चौंक जाएँ लेकिन क्या आपको पता है कि रुक्मिणी देवी ने भारत की राष्ट्रपति का पद ठुकरा दिया था?

रुक्मिणी देवी राज्यसभा के लिए नामित की जाने वाली पहली महिला थीं। वह 2 बार राज्यसभा सांसद रहीं। तमिलनाडु के ‘मंदिरों का शहर’ मदुरै में जन्मीं रुक्मिणी नृत्य और नाटकों को कोरियोग्राफ करती थीं। लेकिन, भरतनाट्यम में पारंगत होने की उनकी ललक इतनी बढ़ गई कि बाद में वह भारत के सबसे महान शख्सियतों में शामिल हुईं। ‘इंडिया टुडे’ ने उन्हें उन 100 लोगों की सूची में शामिल किया, जिन्होंने भारत को एक नया आकार दिया। 1935 में उन्होंने अपना पहला स्टेज परफॉरमेंस दिया और उसके बाद से वह कभी नहीं रुकीं।

देखें कलाक्षेत्र द्वारा मोदी-जिनपिंग के सामने परफॉर्म की गई 6 प्रस्तुतियाँ

नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉक्टर सीवी रमन ने तो उनके इस परफॉरमेंस की तुलना हिमालय की ऊँचाई के सदृश आकर्षण से की। जो देश अपनी नृत्य शैलियों को भूलने लगा था और यहाँ तक कि भरतनाट्यम को अश्लील तक मानने लगा था, उस देश में रुक्मिणी देवी ने न सिर्फ़ इसे पुनर्जीवित किया बल्कि उसे पुनर्स्थापित कर जन-जन में लोकप्रिय बनाया। रुक्मिणी देवी कलाक्षेत्र और नृत्य से इतनी ज्यादा जुड़ गई थीं कि 1977 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने उन्हें भारत का राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव दिया, उन्होंने इसे तुरंत नकार दिया। वजह एक ही थी- यह उन्हें उनके काम से दूर कर देता, कला से दूर कर देता।

इतनी महान शख्सियत का नाम और काम, दोनों ही उनकी मृत्यु के बाद चेन्नई से 60 किलोमीटर दूर महाबलिपुरम के शोर मंदिर में ऐसा गूँजा कि उसकी आवाज़ दिल्ली से लेकर बीजिंग तक सुनाई दी। उस कार्यक्रम की तीसरी प्रस्तुति रुक्मिणी देवी द्वारा कोरियोग्राफ किए गए रामायण डांस-ड्रामा का एक भाग था। रुक्मिणी देवी ने इसे 6 भाग के सीरीज में कोरियोग्राफ किया था। ‘महा पट्टाभिषेकम’ के जिस भाग का मंचन मोदी-जिनपिंग के सामने शोर मंदिर के प्रांगण में किया गया, उसे ‘सेतुबंधनम’ के नाम से जाना जाता है। इसमें वानर सेना द्वारा रामेश्वरम से लंका तक सेतु बनाने का दृश्य है।

कलाक्षेत्र ने इस दौरान कबीरदास के एक भजन को लेकर भी प्रस्तुति दी। यह भजन भी श्रीराम से ही जुड़ा है। इस दौरान पहली प्रस्तुति ‘अलरिप्पू’ नृत्य की थी। इसके बाद ‘पुरप्पाडु’ की प्रस्तुति हुई, जिसमें कई तरह की भाव-भंगिमाओं के साथ नृत्य किया जाता है। प्रस्तुतियों का अंत एक तमिल गाने से हुआ, जो वैश्विक शांति और सद्भाव को बढ़ावा देता है। कुल मिला कर देखें तो रुक्मिणी देवी द्वारा स्थापित संस्था ने इस ऐतिहासिक पल में चार चाँद लगाने और इसे सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वैसे, कबीर के जिस भाजन पर प्रस्तुति दी गई, उसके बोल इस प्रकार हैं:

भजो रे भैया राम गोविंद हरी।
राम गोविंद हरी भजो रे भैया राम गोविंद हरी॥
जप तप साधन नहिं कछु लागत, खरचत नहिं गठरी॥
संतत संपत सुख के कारन, जासे भूल परी॥
कहत कबीर राम नहीं जा मुख, ता मुख धूल भरी॥

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के पौत्र पूर्व राज्यपाल गोपाल कृष्ण गाँधी के मुताबिक रुक्मिणी देवी पशु-अधिकारों के लिए हमेशा समर्पित रहीं। एक बार वह किसी रेलवे स्टेशन पर खड़ी थीं, तभी उन्हें एहसास हुआ कि कोई उनकी साड़ी खींच रहा है। जब उन्होंने देखा तो वह पिंजरे में बंद एक बन्दर था जो बाहर निकलने के लिए छटपटा रहा था। रुक्मिणी देवी के अनुसार, वो उस समय भले ही कुछ नहीं कर सकती थीं लेकिन उन्हें एहसास हुआ कि इस एक घटना ने उनको एक मिशन सौंपा है। जानवरों पर क्रूरता के रोकथाम के लिए उन्होंने 1952 में संसद में एक प्राइवेट मेंबर बिल भी पेश किया, जिसकी पंडित नेहरू ने भी प्रशंसा की।

गाँधी लिखते हैं कि रुक्मिणी देवी और मोरारजी देसाई में कुछ समानताएँ थीं। दोनों ही शाकाहारी थे, अल्कोहल नहीं लेते थे और ब्राह्मण थे। दोनों ही मार्क्सवादी और सोशियलिस्ट विचारधारा के समर्थक थे। राष्ट्रपति बनाने वाले प्रस्ताव के बारे में गोपालकृष्ण गाँधी कुछ यूँ बताते हैं:

“1977 में अचानक से रुक्मिणी देवी को मोरारजी देसाई का कॉल आया। उस समय राष्ट्रपति का पद खाली पड़ा था। देसाई ने रुक्मिणी देवी से पूछा कि क्या आप प्रेजिडेंट बनेंगी? रुक्मिणी देवी ने पूछा किस संस्था या संगठन का प्रेजिडेंट? जब मोरारजी कहा- ‘भारत की राष्ट्रपति’, तब उन्होंने नकारने में वक़्त नहीं लगाया। रुक्मिणी देवी ने बाद में कहा था कि नंगे पाँव चलने वाली एक महिला भला राष्ट्रपति भवन में ऐसे कैसे कर पाएगी? उन्होंने आगे पूछा कि बन्दूक और युद्ध साजो-सामान से नफरत करने वाली एक महिला लगातार अस्त्र-शस्त्र धारी अंगरक्षकों से घिरी कैसे रह सकती है? एक शाकाहारी महिला विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को मीट कैसे खिलाएगी?”

तो ऐसी थी रुक्मिणी देवी की शख्सियत। आज तक भारत के इतिहास में शायद वह ऐसी अकेली हस्ती हैं, जिन्होंने देश का राष्ट्रपति बनने से इनकार कर दिया। एक तमिल महिला विश्व पटल पर चमकीं और भारत का नाम रोशन किया। आज अगर चीन के राष्ट्रपति के सामने भारत ने यह प्रदर्शित किया कि सैंकड़ों-हज़ारों वर्ष पुरानी नृत्य कलाएँ भी हमनें सहेज कर रखी हैं तो इसमें रुक्मिणी देवी का योगदान है। उन्होंने कई लोगों को भरतनाट्यम की शिक्षा देकर इसे विलुप्त होने से बचाया।

राम मंदिर: सुप्रीम कोर्ट में आखिरी दौर में सुनवाई, अयोध्या ज़िले में धारा-144 लागू

दशहरे की हफ़्ते भर की छुट्टी के बाद सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले की सोमवार यानी आज से (14 अक्टूबर) अंतिम दौर की सुनवाई शुरू हो रही है। न्यायालय की संविधान पीठ 38वें दिन इस मामले की सुनवाई करेगी। इसके मद्देनज़र अयोध्या में धारा-144 लागू कर दी गई है और ज़िले को छावनी में तब्दील कर दिया गया है।

10 दिसंबर तक ज़िले में धारा-144 लागू रहेगी। इसका मतलब है कि दिवाली, चेहल्लुम और कार्तिक मेले के दौरान भी निषेधाज्ञा लागू रहेगी। ज़िले में भारी संख्या में सुरक्षाबल की तैनाती का फ़ैसला भी लिया गया है। 

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने मध्यस्थता प्रक्रिया नाकाम होने के बाद मामले में 6 अगस्त से प्रतिदिन की सुनवाई शुरू की थी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2014 के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट 14 अपीलों पर सुनवाई कर रहा है।

पीठ ने इस मामले में न्यायालय की कार्यवाही पूरी करने की समय सीमा की समीक्षा की थी और दलीलें पेश करने के लिए 17 अक्टूबर की सीमा तय की है। पीठ में न्यायमूर्ति एसए बोबडे, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़, न्यायामूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एसए नज़ीर शामिल हैं।

न्यायालय ने अंतिम चरण की दलीलों के लिए कार्यक्रम निर्धारित करते हुए कहा था कि मुस्लिम पक्ष 14 अक्टूबर तक अपनी दलीलें पूरी करेंगे और इसके बाद हिंदू पक्षकारों को अपना जवाब पूरा करने के लिए 16 अक्टूबर तक दो दिन का समय दिया जाएगा। इस मामले में 17 नवंबर तक फ़ैसला सुनाए जाने की उम्मीद है।

अयोध्या फ़ैसले को लेकर ज़िला प्रशासन हाई अलर्ट पर है। अयोध्या में सुरक्षा-व्यवस्था के लिए बड़ी संख्या में फ़ोर्स की माँग की गई है जिसके लिए ज़िले के 200 स्कूलों को आरक्षित किया गया है, साथ ही स्कूलों की लिस्ट ज़िला प्रशासन को भेज दी गई है। बता दें कि आज सुप्रीम कोर्ट रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के तमाम पक्षकार की आख़िरी दलील सुनना शुरू करेगा। मुस्लिम पक्ष आखिरी बार अपनी दलील पेश करेंगे। वहीं, अगले तीन दिन हिंदू पक्ष अपनी बात रखेंगे।

आध्यात्मिक यात्रा पर हिमालय के लिए निकले सुपरस्टार रजनीकांत, तमिलनाडु में सियासी हलचल तेज़

सुपरस्टार रजनीकांत 10 दिनों की आध्यात्मिक यात्रा के लिए हिमालय रवाना हो गए हैं। वहाँ वह साधना और ध्यान करेंगे। इस दौरान रजनीकांत केदारनाथ, बद्रीनाथ और बाबा टेम्पल सहित कई मंदिरों व पवित्र स्थलों का दौरा करेंगे और वहाँ दर्शन करेंगे।

वह महावतार बाबा के भक्त हैं और 2018 में भी उन्होंने लगभग 14 दिन हिमालय में गुजारे थे। हालाँकि, सार्वजनिक रूप से रजनीकांत अपनी यात्राओं के बारे में घोषणा करते से बचते हैं, क्योंकि इतनी बड़ी फैन फॉलोविंग होने के कारण फैंस उनके यात्रास्थल पर पहुँच सकते हैं।

तमिल अभिनेता रजनीकांत परमहंस योगानंद द्वारा बताई गई साधना प्रक्रिया का अनुसरण करते हैं। योगानन्द महावतार बाबा के शिष्य थे। रजनीकांत हिमालय की किसी गुफा में जाकर साधना करते हैं और अधिकतर समय एकांत में व्यतीत करते हैं। हालाँकि, सुरक्षा कारणों से इस पूरी प्रक्रिया को गुप्त रखने की कोशिश की जाती है। इस बार भी रजनीकांत जब हिमालय के लिए निकल रहे थे, तब एयरपोर्ट पर उनकी तस्वीर लीक हो गई। तमिल फ़िल्म समीक्षक श्रीधर पिल्लई ने इस तस्वीर को ट्वीट कर इस संबंध में जानकारी दी।

अगर बॉक्स ऑफिस की बात करें तो 2018 में रिलीज हुई उनकी फ़िल्म ‘2.0’ ने 800 करोड़ रुपए से भी अधिक का कारोबार किया था, जबकि इस वर्ष आई फ़िल्म ‘पेट्टा’ ने एक अन्य बड़ी तमिल फ़िल्म के साथ क्लैश करने के बावजूद 250 करोड़ रुपए से भी अधिक का कारोबार किया। इस तरह पिछली दोनों फ़िल्मों की सफलता के बाद रजनीकांत ने ‘दरबार‘ फ़िल्म की शूटिंग कर रहे हैं, जिसमें वह दशकों बाद एक पुलिस ऑफिसर का किरदार निभा रहे हैं।

जहाँ तमिलनाडु के अधिकतर द्रविड़ राजनितिक नेता अपने आप को धर्म और अध्यात्म से दूर रखने का दिखावा करते हैं और जनता के बीच ख़ुद को ‘धर्मनिरपेक्ष’ साबित करने की कोशिश में लगे रहते हैं, राजनीति में एंट्री की घोषणा कर चुके रजनीकांत का यह आध्यात्मिक दौरा राज्य के सियासी समीकरण के लिए अहम है। ख़बरों में कहा जा रहा है कि वह वहाँ से लौट कर वे एक मसाला मूवी पर काम शुरू करेंगे।

शरद यादव के मंच पर आने से पहले कार्यकर्ताओं ने छोड़ा सभागार, कुर्सी को देते रहे भाषण

पटना में शनिवार (अक्टूबर 12, 2019) को लोहिया की पुण्यतिथि पर आयोजित एक कार्यक्रम में बहुत ही अजीब नजारा देखने को मिला। लोकतांत्रिक जनता दल पार्टी के संस्थापक और जदयू के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव द्वारा मंच संभालने से पहले ही पूरा सभागार खाली होने लगा और लोग अपनी सीट छोड़-छोड़कर बाहर चले गए। इससे भी अधिक हैरानी की बात तब हुई जब माइक पर आने के बाद शरद यादव समाजवाद और संविधान बचाने का पाठ खाली कुर्सियों को सुनाते रहे।

जानकारी के अनुसार जिस समय शरद यादव बोल रहे थे, उस समय सभागार में मौजूद लोगों से अधिक संख्या मंच पर बैठे महागठबंधन के नेताओं को पीछे बैठे पार्टी के कार्यकर्ताओं की थी। बताया जा रहा है शरद यादव के बोलने से कुछ देर पहले ही आयोजक उपेंद्र कुशवाहा महागठबंधन का प्रस्ताव पढ़ने लगे, लेकिन इस दौरान सभी कार्यकर्ता सभागार से बाहर निकलने लगे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इन कार्यकर्ताओं को देखकर लग रहा था जैसे उन्हें शरद यादव को सुनने की कोई जिज्ञासा ही नहीं। इसलिए उन्होंने समय गवाने से अच्छा सभागार के बाहर निकलना उचित समझा। गौरतलब है कि शरद यादव 2016 तक जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे और 2014-17 के बीच राज्यसभा के सदस्य भी। वे जदयू की ओर से लोकसभा में 7 बार और राज्यसभा में 3 बार चुने जा चुके हैं। लेकिन साल 2018 में जनता दल से अपना नाता तोड़ कर अपनी पार्टी का गठन कर लिया था। ऐसे में आयोजन में खाली सभागार की बात मीडिया में आते ही जदयू पूर्व प्रवक्ता डॉ. अजय आलोक ने इसको लेकर शरद यादव पर तंज कसा।

उन्होंने लिखा, “अपनी हालत के ज़िम्मेदार ख़ुद हैं माननीय शरद जी, समय की बात है राजनीति में बदलते वक़्त को भाँपने में उम्रदराजों से ग़लती हो जाती है। हालाँकि, नीतीश जी ने समझाया था। सम्मानपूर्वक घर बैठिए सर, आपको यूँ देख अच्छा नहीं लगता।” यहाँ बता दें कि शनिवार को डॉ राम मनोहर लोहिया की पुण्यतिथि के अवसर पर पटना के बापू सभागार में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। जिसमें तेजस्वी यादव, उपेंद्र कुशवाहा, मुकेश सहनी, जीतन राम मांझी और शरद यादव समेत कई नेता शामिल हुए थे।