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हमें पाकिस्तान से आज़ादी चाहिए: POK में हज़ारों लोग सड़क पर, पाक पुलिस ने की बर्बरता

जहाँ भारत सरकार जम्मू कश्मीर में स्थिति सामान्य बनाने के लिए काम कर रही है, पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। पाकिस्तान जम्मू कश्मीर में ‘सब कुछ ठीक न होने’ की बात करते हुए संयुक्त राष्ट्र से लेकर इस्लामिक मुल्क़ों तक को अपने झाँसे में लेने की कोशिश कर रहा है, और इसमें वह बुरी तरह विफल साबित हुआ है। जम्मू कश्मीर में स्थिति सामान्य है। एनएसए अजित डोभाल ने भी क्षेत्र का दौरा कर लोगों से स्थिति की जानकारी ली।

पाक अधिकृत कश्मीर में लोगों ने पाकिस्तान की सेना व पुलिस के द्वारा किए जा रहे अत्याचारों के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया। इस विरोध प्रदर्शन में कई लोग शामिल हुए और उन्होंने ‘पाकिस्तान से आज़ादी’ की माँग की। लोगों का कहना था कि पाकिस्तान ने उनके इलाक़े पर अवैध रूप से कब्ज़ा कर रखा है। पाकिस्तान ने विरोध प्रदर्शन को दबाने के लिए इलाक़े में टोटल कम्युनिकेशन ब्लैकआउट कर दिया है। मोबाइल सेवाएँ ठप्प कर दी गई हैं।

पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के साथ क्रूरता की। उन्हें पीटा गया। उन पर फायरिंग तक की गई। पुलिस ने बीती रात किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार कर लिया था, जिससे लोग और भी गुस्से में थे। हजीरा पुलिस थाना के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र में कई लोग धरने पर बैठे और उन्होंने ‘पाकिस्तान से आज़ादी’ की माँग की। रविवार (सितम्बर 8, 2019) पुलिस ने इन प्रदर्शनकारियों में से 40 को गिरफ़्तार कर लिया है।

इससे पहले शनिवार को भी पुलिस द्वारा विरोध प्रदर्शन करने वाले सैकड़ों लोगों के साथ क्रूरता की गई थी। उस क्षेत्र में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कई मार्च निकाले गए। रक्षा विशेषज्ञ आरके सहगल ने बताया कि बलूचिस्तान और सिंध की तरह ही पाक अधिकृत कश्मीर में भी पाकिस्तानी फौज आम लोगों के साथ द्वारा बर्बरता कर रही है। मानवाधिकारों का लगातार हनन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जम्मू कश्मीर में कहीं भी ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा बल्कि बलूचिस्तान, सिंध और पीओके में हो रहा है।

पाकिस्तान को जम्मू कश्मीर की शांति पच नहीं रही है और वह लगातार घुसपैठियों को इस पार भेजने की कोशिश में लगा हुआ है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने भी कहा था कि 200 से भी अधिक आतंकी घुसपैठ के प्रयास में लगे हुए हैं। इस्लामाबाद क्षेत्र में हिंसा फैलाने की साज़िशें रच रहा है।

पाकिस्तान जाने से श्रीलंकाई खिलाड़ियों ने सुरक्षा कारणों से किया साफ़ इनकार

श्रीलंकाई क्रिकेट टीम के कई सीनियर खिलाड़ी सुरक्षा कारणों से पाकिस्तान दौरे पर जाने से कतरा रहे हैं। श्रीलंका को सितंबर-अक्तूबर में पाकिस्तान दौरे पर सीमित ओवरों की सीरीज खेलनी है। ऐसे में मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वनडे टीम के कप्तान दिमुथ करुणारत्ने, टी-20 कप्तान लसिथ मलिंगा और पूर्व कप्तान एंजेलो मैथ्यूज जैसे सीनियर खिलाड़ियों ने पाकिस्तान दौरे पर जाने से इनकार किया है।

श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड ने पाकिस्तान में क्रिकेट मैच खेलने के लिए हामी भर ली है, लेकिन 11 खिलाड़ियों ने पाकिस्तान जाने से साफ इनकार कर दिया है। लगभग एक दर्जन खिलाड़ियों ने पाकिस्तान में क्रिकेट खेलने से इनकार किया है।

दरअसल, साल 2009 में पाकिस्तान दौरे पर गई श्रीलंकाई टीम की बस पर लाहौर में आतंकियों ने हमला कर दिया था। श्रीलंका के खेल मंत्री हेरिन फर्नांडो का कहना है कि अधिकतर खिलाड़ियों के परिवारों ने सुरक्षा स्थिति को लेकर अपनी चिंता जाहिर की है। उन्होंने कहा कि टीम के अधिकारी खिलाड़ियों से मुलाकात करेंगे और पाकिस्तान दौरे के लिए उन्हें समझाएँगे कि उन्हें वहाँ पर पूरी सुरक्षा दी जाएगी। इस संबंध में सितंबर 9, 2019 को एक बैठक के बाद इस दौरे में कुछ खिलाडियों ने पकिस्तान दौरे पर न जाने का निर्णय लिया है।

पाकिस्तान और श्रीलंका के बीच 3-3 मैचों की वनडे और टी-20 सीरीज 27 सितंबर से 9 अक्टूबर के बीच होनी है। इससे पहले श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड ने अपने खिलाड़ियों के साथ मीटिंग की और सभी से पूछा कि वे पाकिस्तान में क्रिकेट मैच खेलने के लिए जाएँगे या नहीं। बोर्ड ने खिलाड़ियों के ऊपर आखिरी फैसला छोड़ा, जिसमें से कुल 11 खिलाड़ियों ने नाम वापस ले लिया।

इन 11 खिलाड़ियों में वनडे टीम के कप्तान दिमुथ करुणारत्ने, टी20 टीम के कप्तान लसिथ मलिंगा के अलावा निरोशन डिकवेला, कुसल परेरा, धनंजय डिसिल्वा, थिसारा परेरा, अकिला धनंजया, एंजलो मैथ्यूज, सुरंगा लकमल, दिनेश चांदीमल और न्यूजीलैंड के खिलाफ टी-20 सीरीज में चोटिल हुए कुसल मेंडिस का नाम शामिल है, जो पाकिस्तान दौरे पर नहीं जाएँगे।

अशद, फ़कीर, जमाल सहित 4 बांग्लादेशी धर दबोचे गए: रुपयों के बदले देते थे फेक सऊदी रियाल

असम के सिल्चर में सुरक्षा बलों ने 4 बांग्लादेशी नागरिकों को धर दबोचा, जो मनी लॉन्ड्रिंग करने में लगे हुए थे। उनके पास से फेक सऊदी रियाल भी जब्त किए गए हैं। असम पुलिस ने यह कार्रवाई रविवार (सितम्बर 8, 2019) को की। पुलिस को उनके बारे में सूचना एक ऐसे व्यक्ति को मिली, जो ख़ुद उनकी ठगी का शिकार हो चुका था।

गिरफ्तार होने वालों के नाम रिपोन खान, मोहम्मद अशद, सुमन फ़क़ीर और जमाल मुंशी है। मोहम्मद कबीर नामक व्यक्ति भागने में सफल रहा। ये सभी आरोपित स्थानीय लोगों को भारतीय करेंसी के बदले सऊदी की फेक करेंसी देने का लालच दिया करते थे। ये लोग पिछले एक महीने से इस अपराध को अंजाम दे रहे थे।

इन आरोपितों के पास बोनाफाइड बांग्लादेशी पासपोर्ट थे और ये सभी त्रिपुरा होते हुए असम में घुसे थे। एक पीड़ित के अनुसार, आरोपितों ने उससे संपर्क कर के 2 लाख भारतीय मुद्रा के बदले 1 लाख सऊदी करेंसी देने का वादा किया। इसकी क़ीमत लगभग 19 लाख रुपए हो जाती है और इसीलिए ऐसा ऑफर ठुकराना मुश्किल होता है, पीड़ित ने ‘नार्थ ईस्ट नाउ’ को बताया

‘नार्थ ईस्ट नाउ’ की ख़बर का वीडियो

ये सभी आरोपित बांग्लादेश की राजधानी ढाका के नजदीक स्थित गोपालगंज के निवासी हैं। उनके पास से कई सिम कार्ड, मोबाइल फोन और फेक सऊदी रियाल के नोट मिले हैं। सिल्चर सदर थाना की पुलिस इन सभी आरोपितों से पूछताछ कर रही है। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि इस अपराध में कौन-कौन लोग शामिल हैं और यह कहाँ तक फैला है?

घुसपैठ की कोशिश में मारे गए पाकिस्तान के 5 बैट ‘आतंकी’, भारतीय सेना ने जारी किया वीडियो

सीमा पार से पाकिस्तान लगातार घुशपैठ की कोशिशें जारी रखे हुए है। भारतीय सेना ने पाकिस्तान के ऐसे ही एक प्रयास को विफल कर दिया। ये घटना अगस्त के पहले सप्ताह की है, जब पाकिस्तान की बॉर्डर एक्शन टीम (BAT) सीमा पार से घुसपैठ की कोशिश कर रही थी। पाकिस्तान का बैट भारत में घुसपैठ करने और आतंकियों को घुसपैठ कराने के लिए कुख्यात है।

भारतीय सेना ने कैसे पाकिस्तानी आतंकियों के इस घुसपैठ को नाकाम किया, उसका वीडियो आप यहाँ देख सकते हैं:

ये घटना कुपवाड़ा के केरन सेक्टर की है, जहाँ एलओसी के पास पाकिस्तान की इस हरकत को नाकाम किया गया। भारतीय सेना द्वारा जारी की गई वीडियो में 5 बैट आतंकियों की लाशें और उनके हथियार दिख रहे हैं।

भारतीय सेना ने 6-7 बैट आतंकियों को मार गिराया था। इस साल के आठ महीनों में जम्मू-कश्मीर में भारतीय सेना द्वारा 139 आतंकवादियों को ढेर किया गया है।

त्रिपुरा में एक ही जगह पर बनेंगे 51 शक्तिपीठ मंदिर, 14.22 एकड़ भूमि आवंटित

त्रिपुरा में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए, राज्य सरकार ने 51 मंदिरों का निर्माण करने का निर्णय लिया है। ये मंदिर 51 शक्तिपीठों की प्रतिकृतियाँ होंगी। रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों ने बताया है कि इसके साथ ही रॉक-कट मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध देवतामुरा और उन्नावकोटी पहाड़ियों के लिए एक हेलीकाप्टर सेवा भी शुरू की गई है।

राज्य की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)-इंडीजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) सरकार ने 51 शक्तिपीठों का निर्माण करने के लिए 14.22 एकड़ भूमि आवंटित की है। राज्य सरकार ने केंद्र सरकार की प्रसाद योजना के तरह इसके लिए एक परियोजना तैयार की है।

अधिकारियों ने सोमवार (सितंबर 09, 2019) को बताया कि राज्य सरकार ने पहले से मौजूद पर्यटन स्थलों का नवीनीकरण करने के अलावा पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए कम लागत में कई कदम उठाए हैं। राज्य के पर्यटन विभाग ने हाल ही में देवतामुरा हिल क्षेत्र में उन्नावकोटी पुरातात्विक स्थलों पर 15वीं सदी की कई मूर्तियाँ मौजूद हैं।

शक्तिपीठ मंदिर हिंदू रिवाज के अनुसार एशिया के 51 स्थानों पर बनाए गए हैं और इन मंदिरों को मुश्किल से ही देश के लोग देख पाते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए राज्य के मुख्यमंत्री विप्लव कुमार देव ने माता त्रिपुरेश्वरी देवी मंदिर के पास उदयपुर के फुलकुमारी गाँव में 51 शक्तिपीठ मंदिरों का निर्माण करवाने का फैसला लिया है।

राज्य के पर्यटन मंत्री प्रणजित सिंह रॉय ने बताया कि एशिया में स्थित 51 शक्तिपीठों में 38 शक्तिपीट भारत में, छह बंगलादेश में, तीन नेपाल, दो पाकिस्तान में और तिब्बत तथा श्रीलंका में एक-एक शक्तिपीठ मंदिर स्थित है। इस वजह से राज्य सरकार ने इन सभी शक्तिपीठों का निर्माण एक ही जगह पर कराने का फैसला लिया है।

उन्होंने कहा- “पर्यटन विभाग 51 शक्तिपीठों का निर्माण करवाने के लिए प्रारंभिक तौर पर 44 करोड़ रुपए की परियोजना तैयार की है और इसे धन मुहैया करने के लिए 15वें वित्त आयोग के पास भेजा है। हमें उम्मीद है कि वित्त आयोग से यह राशि मिल जाएगी।”

राम मंदिर पर स्थिति स्पष्ट करे सभी पार्टियाँ: BJP में शामिल होते ही पुराने अंदाज़ में लौटे कल्याण सिंह

भाजपा के दिग्गज नेता रहे कल्याण सिंह की पार्टी में फिर से वापसी हो गई है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री का राम मंदिर आंदोलन में ख़ास योगदान रहा है और इसी कारण उनकी सरकार भी बर्खास्त कर दी गई थी। 87 वर्षीय कल्याण सिंह राज्यपाल का कार्यकाल पूरा कर अपनी पार्टी में वापस लौट आए हैं। आते-आते उन्होंने राम मंदिर पर तगड़ा सवाल दागा। कल्याण सिंह ने सभी राजनीतिक दलों को राम मंदिर पर स्थिति स्पष्ट करने को कहा।

राजस्थान के पूर्व राज्यपाल ने कई भाजपा नेताओं की उपस्थिति में पार्टी ज्वाइन की। उनके बेटे राजवीर सिंह एटा के सांसद हैं और पोते संदीप सिंह उत्तर प्रदेश सरकार में वित्त राज्यमंत्री हैं। कार्यक्रम के दौरान वे सभी मौजूद रहे। हालाँकि, कल्याण सिंह ने साफ़ कर दिया कि वह अब चुनाव नहीं लड़ेंगे क्योंकि उन्होंने अपनी ज़िंदगी में काफ़ी चुनाव लड़े हैं। उन्होंने कहा कि उनका राजनीति से सन्यास लेने का फ़िलहाल कोई इरादा नहीं है।

कल्याण सिंह ने राम मंदिर को लेकर सभी राजनीतिक दलों से स्थिति स्पष्ट करने को कहा। सिंह ने कहा कि सभी राजनीतिक दलों को बताना चाहिए कि वे राम मंदिर के पक्ष में हैं या नहीं? राम मंदिर मामले की सुप्रीम कोर्ट में नियमित सुनवाई चल रही है और नवंबर तक इस सम्बन्ध में फैसला आ जाने की उम्मीद है।

कल्याण सिंह की जगह पूर्व केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र को राजस्थान का राज्यपाल बनाया गया है। कल्याण सिंह ने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भी तारीफ की और कहा कि राज्य में उनका कोई विकल्प नहीं है। उन्होंने सरकार को पूर्ण सहयोग देने का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि वह भाजपा को मजबूत करने के लिए कार्य करते रहेंगे।

कल्याण सिंह ने कहा कि बतौर राज्यपाल वह कुछ बोलते नहीं थे लेकिन यूपी की पल-पल की जानकारियाँ लेते रहते थे। लखनऊ लौटे सिंह का समर्थकों ने ज़ोरदार स्वागत किया, जहाँ से वे सीधे भाजपा के कार्यालय पहुँचे। अब देखना यह है कि राम मंदिर आंदोलन के एक मुख्य चेहरे के अपने गृह-राज्य और गृह-पार्टी में लौटने के बाद यूपी के राजनीतिक समीकरणों पर क्या प्रभाव पड़ता है?

कश्मीर से लश्कर के 8 आतंकी गिरफ़्तार, व्यापारियों से रंगदारी वसूलने में लिप्त, बनाए हुए थे खौफ का माहौल

जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने का एक महीना हो गया है और इसके साथ ही जम्मू कश्मीर पुलिस ने आतंकवादियों पर बड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है। बारामुला के सोपोर में पुलिस ने लश्कर-ए-तैयबा के 8 आतंकियों को गिरफ़्तार किया है। ये सभी किसी बड़े आतंकी हमले की फ़िराक़ में थे। ये आतंकी राज्य के व्यापारियों को भी लगातार धमका रहे थे। उनकी वजह से डरे हुए कारोबारियों ने अपनी दुकानें बंद रखने में ही भलाई समझी थी।

ये आतंकी पैम्पलेट और पोस्टर के माध्यम से स्थानीय कारोबारियों को धमका रहे थे। ये पोस्टरों में धमकियाँ लिखते थे और उन्हें बाँटते थे। लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी ढाँचे को फिर से मजबूत बनाने के लिए ये आतंकी नॉर्थ कश्मीर के बड़े व्यापारियों से रंगदारी वसूलने में भी लिप्त थे।

जम्मू कश्मीर को मिले विशेषाधिकार वापस लेने के बाद इन आतंकी सगठनों का वहाँ काम करना मुश्किल हो गया है और उनकी वसूली पर बड़ी मार पड़ी है। इसीलिए रुपयों की ज़रूरत पूरी करने के लिए ये लगातार आतंकी हमलों की योजना बनाने की फ़िराक़ में थे। ये आतंकी चाहते थे कि कश्मीर में हमेशा सभी व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद ही रहें।

हिटलर लिंग विशेषज्ञ The Lallantop और राजदीप कर रहे हैं NRC के फर्जी आँकड़ों से गुमराह

सरकार द्वारा 31 अगस्त को NRC यानी, नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) की आखिरी लिस्ट जारी कर दी गई है। इसके बाद से ही NRC के आँकड़ों पर मीडिया गिरोह लगातार पूरे आत्मविश्वास के साथ फर्जी आँकड़ों की बुनियाद पर लम्बी चर्चा कर रहा है। इन सबकी जिम्मेदारी NRC के मुद्दे पर सरकार विरोधी माहौल तैयार कर अपने पाठकों का मनोरंजन करने की है।

MEME का फैक्ट चेक करने वाली वेबसाइट दी लल्लनटॉप (The Lallantop) ने इसी विषय पर प्रोपेगेंडा पत्रकार राजदीप सरदेसाई की मदद ली है। ख़ास बात यह है कि यूट्यूब पर पब्लिश किए गए इस लगभग एक घंटे की चर्चा में NRC के आँकड़ों पर इंडिया टुडे ग्रुप के पत्रकार राजदीप सरदेसाई उतने ही अस्पष्ट हैं, जितने की उनसे बातचीत करने वाले दी लल्लनटॉप के संपादक सौरभ द्विवेदी।

यह भी पढ़ें: 9 महीने पुरानी फेक न्यूज़ का फैक्ट चेक कर दी लल्लनटॉप ने आरोप कर दिया साबित 

‘हिटलर के लिंग’ की नाप का खुलासा कर के चर्चा में आई वेबसाइट दी लल्लनटॉप (The Lallantop) के यूट्यूब चैनल पर ‘नेता नगरी‘ नाम के इस प्रोग्राम में विषय है NRC। शो की शुरुआत में ही प्रोग्राम होस्ट कर रहे सौरभ द्विवेदी कहते हैं कि NRC की आखिरी लिस्ट से चालीस लाख नाम निकाल दिए गए हैं और इसके साथ ही एक लाख और नाम हटाए जाने के बाद NRC से निकाले गए लोगों की संख्या 41 लाख हो गई है।

इसके आगे सौरभ कहते हैं कि उनकी टीम ने आँकड़े इकट्ठे कर के पता किया है कि कुल 41 लाख लोगों को लिस्ट से बाहर कर दिया गया है। लेकिन वास्तविकता इन आँकड़ो से बिलकुल अलग है। दरअसल, NRC लिस्ट से 41 लाख नाम बाहर नहीं किए गए हैं बल्कि सरकार द्वारा 31 अगस्त को जारी की गई आखिरी लिस्ट से 19 लाख नाम बाहर किए गए हैं।

NRC के मसौदे (ड्राफ्ट) का कुछ हिस्सा दिसंबर 31, 2017 को जारी किया गया था, वहीं दूसरा ड्राफ्ट जुलाई 31, 2018 को प्रकाशित हुआ। जिस आँकड़ो की गवाही सौरभ और NRC विशेषज्ञ राजदीप सरदेसाई दे रहे हैं वह इसी दूसरे ड्राफ्ट की और भ्रामक है।

दूसरी NRC सूची में 3.29 करोड़ लोगों में से 2.89 करोड़ लोगों को नागरिक माना गया था, वहीं 40.37 लाख लोगों का नाम शामिल नहीं था। वहीं, अब अगस्त 31, 2019 को जारी की गई आखिरी लिस्ट में 3.11 करोड़ लोगों का नाम शामिल है और 19 लाख 6 हजार 657 लोगों के नाम नहीं हैं।

बेहद सामान्य शब्दों में कहें तो असम सरकार ने जून 30, 2018 को एनआरसी का दूसरा मसौदा जारी किया था। इस दौरान 41 लाख लोगों को लिस्ट से बाहर रखा गया था। और फाइनल लिस्ट में यह आँकड़ा घटकर लगभग 19 लाख तक आ गया।

इस तरह से, सरकार द्वारा जारी आखिर लिस्ट में पहले के दो ड्राफ्ट को नजरअंदाज कर के नई लिस्ट जारी की गई है, जबकि दी लल्लनटॉप की ‘रिसर्च टीम’ और वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई इस बात से एकदम बेखबर हैं कि NRC पर वास्तव में हुआ क्या है।

दी लल्लनटॉप के इस शो में हुई इस ‘उच्चस्तरीय’ चर्चा की एक ख़ास बात यह है कि शो के 3.01 मिनट पर ही जब राजदीप सरदेसाई कहते हैं कि 19 लाख लोगों को लिस्ट से…. उसी समय सौरभ द्विवेदी ऊँगली उठाकर बेहद दार्शनिक मुद्रा में और पूरे आत्मविश्वास के साथ राजदीप सरदेसाई को ‘सही’ करते हुए कहते हैं ‘इकतालीस लाख..’ इस इकतालीस लाख को सुनते ही राजदीप सरदेसाई एक कदम आगे जाते हुए कहते हैं- “हाँ….हाँ वही इकतालीस लाख, उन्नीस लाख को मिलाकर और अभी और नाम इसमें जुड़ रहे हैं।”

चर्चा की शुरुआत में ही अपनी टीम द्वार की गई रिसर्च के आँकड़ो से राजदीप सरदेसाई को सही करते हुए सौरभ द्विवेदी

पहले तीन मिनट में ही इस आत्मविश्वास के साथ अपनी ‘रिसर्च’ पेश करने के बावजूद यह पूरा शो और चर्चा किया गया है। इसके बाद सौरभ इस NRC लिस्ट को बेहद दार्शनिक मुद्रा में भाजपा वोट बैंक से भी जोड़ते हुए इसे ‘हिन्दू वोट बैंक’ का भी नजरिया देते हैं। इस चर्चा को देखने के बाद पता चलता है कि इस प्रोग्राम के होस्ट सौरभ द्विवेदी शायद NRC के आँकड़ो के बारे में स्पष्ट न हों लेकिन कम से कम वो इस बात को लेकर स्पष्ट थे कि उनका असल मुद्दा यानी, हिन्दू, अल्पसंख्यक, भाजपा, कॉन्ग्रेस तो स्पष्ट था।

राजदीप और सौरभ आगे इस विषय पर चिंता व्यक्त करते हैं कि लिस्ट से हटा दिए गए इन लोगों का क्या होगा? यहाँ पर राजदीप उन्हें बताते हैं कि नहीं, यह दो मजहबों का विषय नहीं है। इसके बाद सौरभ फिर अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए स्वर को थोड़ा सा बढ़ा कर रोष की मुद्रा में अंग्रेजी में पूछते हैं- “How to deal with that?” हिंदी में इसका अर्थ होता है- “आप इससे किस तरह से निपटेंगे?”

इस 54 मिनट के पूरे कार्यक्रम से कम से कम यह तो स्पष्ट है कि NRC के विषय पर सौरभ और राजदीप, दोनों की ही पकड़ बहुत कमजोर है। हालाँकि, इस चूक के लिए इस चर्चा में इस्तेमाल की गई भारी-भरकम शब्दावली, चेहरे की भाव-भंगिमा और हाथों की मुद्रा से ही NRC के आँकड़ो को समझने से मना कर देना और अनदेखा कर देना बेहद निंदनीय होगा (व्यंग्य)।

साथ ही, जब इंसान को मन की गहराइयों से यकीन हो कि उसके पास चर्चा के लिए अपनी ‘रिसर्च टीम’ के झूठे और भ्रामक आँकड़ो के अलावा कोई ख़ास स्रोत नहीं है तो महात्मा गाँधी को आगे लेकर आना आपको इतिहास का भी जानकार बता देता है। सौरभ और राजदीप ने इस चर्चा में गाँधी का स्मरण कर उनके नोटों में स्थापित होने पर भी अपनी राय दी है।

हालाँकि, यह उम्मीद करना कि विभाजन के समय महात्मा गाँधी की समुदाय विशेष पर राय से ये दोनों ही पत्रकार अनभिज्ञ हों। गाँधी ने विभाजन के समय कहा था कि यदि समुदाय विशेष हिन्दुओं को मारकर नया देश बसाना चाहते हैं तो हम भी वीरतापूर्वक मौत को स्वीकार कर के अपना एक अलग संसार बसाएँगे।

गाँधी के इन शब्दों को याद कर के ही हम जान सकते हैं कि शरणार्थी और अवैध नागरिकों पर गाँधी की क्या राय होती?

यदि दी लल्लनटॉप की चर्चा से इतर वास्तविकता की बात करें, तो नेशनल सिटिजन रजिस्टर (NRC) असम में रहने भारतीय नागरिकों की पहचान के लिए बनाई गई एक सूची है। जिसका मकसद राज्य में अवैध रूप से रह रहे अप्रवासियों, खासकर बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान करना है। इसकी पूरी प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही थी।

इस प्रक्रिया के लिए 1986 में सिटीजनशिप एक्ट में संशोधन कर असम के लिए विशेष प्रावधान किया गया। इसके तहत रजिस्टर में उन लोगों के नाम शामिल किए गए हैं, जो 25 मार्च 1971 के पहले असम के नागरिक हैं या उनके पूर्वज राज्य में रहते आए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने एनआरसी के अंतिम प्रकाशन की समयसीमा को 31 जुलाई से बढ़ाकर 31 अगस्त कर दिया था।

फाइनल लिस्ट में नाम नहीं होने के बावजूद लोगों को खुद को भारतीय नागरिक साबित करने के और मौके दिए जाएँगे। ऐसे विदेशी नागरिक पहले ट्रिब्यूनल में जाएँगे, उसके बाद हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकेंगे। लोगों को राज्य सरकार भी कानूनी मदद देगी। 2018 की लिस्ट में 3.29 करोड़ लोगों में से करीब 10% को नागरिक नहीं माना था।

सरकार ने स्पष्ट किया है कि NRC से बाहर होने वाले लोगों के मामले की सुनवाई के लिए राज्य में एक हजार ट्रिब्यूनल बनाए जाएँगे। राज्य में 100 ट्रिब्यूनल बनाए जा चुके हैं, अगले 200 सितंबर पहले हफ्ते में शुरू हो जाएँगे। लोगों को इस संबंध में अपील करने के लिए 120 दिन की मोहलत मिलेगी।

असम में फिलहाल 6 डिटेंशन सेंटर चल रहे हैं। इनमें करीब एक हजार अवैध नागरिक रह रहे हैं। इनमें ज्यादातर बांग्लादेश और म्यांमार के हैं, जो देश की सीमा में बिना किसी कागजात के घुस आए या वीजा अवधि खत्म होने के बाद भी राज्य में बने रहे। हालाँकि, सरकार ने साफ कर दिया है कि नागरिकता खोने के बावजूद भी लोगों को डिटेंशन सेंटर नहीं भेजा जाएगा।

NRC : टाइमलाइन के जरिए जानिए NRC प्रक्रिया महत्वपूर्ण फैसले

  • मई 2005- तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में केंद्र सरकार, असम सरकार और ‘आसू’
     (All Assam Students Union or AASU) के प्रतिनिधियों के बीच त्रिपक्षीय बैठक हुई। बैठक में 1985 में हुई असम संधि के दौरान किए गए वादों को पूरा करने के लिए NRC को अपडेट करने को लेकर कदम उठाने को लेकर तीनों पक्षों के बीच सहमति बनी। इसके बाद केंद्र सरकार ने असम सरकार से बात करने के बाद इसे लागू करने की प्रक्रिया तय की।
  • जुलाई 2009- ‘असम पब्लिक वर्क्स’ नाम के एक NGO (गैर सरकारी संगठन) ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका लगाते हुए उन प्रवासियों के नाम मतदाता सूची से हटाने की माँग की, जिन्होंने अपने दस्तावेज नहीं जमा कराए थे। साथ ही इस NGO ने अदालत से NRC प्रक्रिया शुरू करवाने का अनुरोध भी किया। ये पहला मौका था जब NRC का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा था।
  • अगस्त 2013- असम पब्लिक वर्क्स की याचिका पर सुनवाई शुरू हुई।
  • दिसंबर 2013- उच्चतम न्यायालय ने NRC अपडेट करने के लिए प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया।
  • फरवरी 2015- उच्चतम न्यायालय ने वास्तविक नागरिकों और अवैध रूप से रह रहे अप्रवासियों की पहचान के लिए दिसंबर 2013 में ही NRC को अपडेट करने का आदेश दे दिया था। लेकिन इसकी वास्तविक प्रक्रिया फरवरी 2015 में जाकर शुरू हुई।
  • 31 दिसंबर 2017- सरकार ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का पहला ड्राफ्ट जारी किया।
  • 30 जुलाई 2018- असम सरकार ने NRC का दूसरा ड्राफ्ट जारी किया। जिसमें राज्य में रहने वाले 3.29 करोड़ लोगों में से 2.89 करोड़ लोगों को नागरिक माना गया। इस दौरान 40 लाख से ज्यादा लोगों का नाम शामिल नहीं किया गया।
  • 31 दिसंबर 2018- सरकार द्वारा NRC का अंतिम हिस्सा जारी करने के लिए यही आखिरी तारीख तय की गई थी। हालाँकि, इस तारीख पर ये काम पूरा नहीं हो सका।
  • 26 जून 2019- NRC से बाहर रहने वाले लोगों की सूची पर एक अतिरिक्त मसौदा प्रकाशित किया गया। इस सूची में कुल 1,02,462 नाम थे, जिसके बाद रजिस्टर से बाहर रहने वाले लोगों की कुल संख्या 41,10,169 हो गई।
  • 31 जुलाई 2019- सरकार ने नेशनल सिटिजन रजिस्टर (NRC) की आखिरी लिस्ट जारी की। यह फाइनल एनआरसी लिस्ट 31 जुलाई को प्रकाशित होनी थी, लेकिन एनआरसी अथॉरिटी द्वारा राज्य में बाढ़ का हवाला देने के बाद इसे 31 अगस्त तक के लिए आगे बढ़ा दिया गया था। इससे पहले 2018 में 30 जुलाई को एनआरसी का फाइनल ड्राफ्ट आया था। लिस्ट में शामिल नहीं लोगों को दोबारा वेरीफेकशन के लिए एक साल का समय दिया था।

बहुत हुआ नीतीश कुमार, अब किसी BJP नेता को मिलना चाहिए CM बनने का मौका: पूर्व केंद्रीय मंत्री

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे संजय पासवान ने कहा है कि जदयू-भाजपा गठबंधन का मुख्य चेहरा अब भारतीय जनता पार्टी से होना चाहिए। पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन राज्यमंत्री ने इस बात पर ज़ोर दिया कि नीतीश कुमार पिछले 15 वर्षों से गठबंधन का चेहरा बने हुए हैं, इसीलिए यह मौक़ा किसी भाजपा नेता को मिलना चाहिए।

भाजपा नेता का यह बयान दर्शाता है कि नीतीश कुमार अब गठबंधन का सर्व स्वीकार्य चेहरा नहीं हैं। ऑपइंडिया से बात करते हुए नवादा के पूर्व सांसद संजय पासवान ने कहा कि बिहार भाजपा में नीतीश कुमार और नित्यानंद राय जैसे कई चेहरे हैं, जो मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनने की काबिलियत रखते हैं। उन्होंने कहा कि मोदी और राय इन नेताओं में प्रमुख हैं।

संजय पासवान का बयान इसीलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह राज्य में भाजपा का प्रमुख दलित चेहरा हैं। भाजपा के भीतर से यह बात अब उठने लगी है कि नीतीश कुमार की जदयू को भी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे के कारण फायदा हुआ, इसीलिए अब मुख्यमंत्री भाजपा का होना चाहिए। 2014 में जब नीतीश की पार्टी ने भाजपा से अलग चुनाव लड़ा था, तब उसकी सीटों की संख्या काफ़ी कम हो गई थी।

बिहार में 2020 में विधानसभा चुनाव होना है लेकिन राजनीतिक रूप से हमेशा सक्रिय इस राज्य में चुनाव की तैयारियाँ काफ़ी पहले से शुरू हो जाती है। बिहार की राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ियों में से एक लालू यादव राँची स्थित जेल में बंद हैं। ऐसे में तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद की भी अग्निपरीक्षा होगी।

‘असम ही नहीं बल्कि पूरे देश को विदेशी घुसपैठियों से मुक्त करवाएँगे, योजना तैयार हो रही है’

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने असम में नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रैटिक अलायंस (नेडा) की बैठक में हिस्‍सा लेने के दौरान कॉन्ग्रेस पार्टी की नीति पर जमकर निशाना साधा । साथ ही असम के लोगों को आश्वासन दिया कि वह केवल असम को ही नहीं बल्कि पूरे देश को विदेशी घुसपैठियों से मुक्त करवाएँगे। जिसके लिए योजना भी तैयार की जा रही है।

बैठक को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा, “कॉन्ग्रेस ने फूट डालो और राज करो वाली नीति अपनाई थी। लेकिन हर राज्य भारत का अभिन्न अंग है। इस भावना को प्रत्येक व्यक्ति तक अगर पहुँचाना था तो यह बहुत जरूरी था कि नार्थ ईस्ट कॉन्ग्रेस से मुक्त बने। नॉर्थ ईस्ट में आतंकवाद की समस्या को सुलझाने के बजाए कॉन्ग्रेस ने इसे और फैलाया ताकि अपना राज बना रहे।”

केंद्रीय गृह मंत्री ने कॉन्ग्रेस की नीति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आजादी के बाद से 2014 तक कॉन्ग्रेस ने नॉर्थ ईस्ट में भाषा, जाति, संस्कृति, क्षेत्र विशेष के आधार पर झगड़े पैदा किए। इससे पूरा नॉर्थ ईस्ट अशांति का गढ़ बन गया। यहाँ विकास की जगह भ्रष्टाचार को अहम जगह देने का काम कॉन्ग्रेस ने किया।

गौरतलब है कि गुवाहाटी में पूर्वोत्तर परिषद के 68वीं पूर्ण सत्र को संबोधित करने वाले गृह मंत्री अमित शाह पूर्वोत्तर परिषद के चेयरमैन भी हैं। इस कार्यक्रम में उन्होंने एनआरसी में छूटे लोगों के बारे में बात की। उन्होंने एनआरसी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इस सूची में काफ़ी लोग छूट गए हैं, इसलिए इसपर ज्यादा गहनता से काम होना चाहिए।

इसके अलावा उन्होंने ये भी कहा कि नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स (NRC) पर कई लोगों ने कई तरह के सवाल उठाए हैं, इसलिए वह स्पष्ट रूप से कह देना चाहते हैं कि एक भी अवैध अप्रवासी को भारत सरकार देश में नहीं रहने देगी। ये उनका वादा है।

बता दें कि एनआरसी राज्य समन्वयक कार्यालय ने 31 अगस्त को कहा था कि एनआरसी में शामिल होने के लिए 3,30,27,661 लोगों ने आवेदन दिया था। इनमें से 3,11,21,004 लोगों को शामिल किया गया है और 19,06,657 लोगों को बाहर कर दिया गया है।