Thursday, June 4, 2020
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हिटलर लिंग विशेषज्ञ दी लल्लनटॉप और राजदीप कर रहे हैं NRC के फर्जी आँकड़ों से गुमराह

सौरभ इस NRC लिस्ट को बेहद दार्शनिक मुद्रा में भाजपा वोट बैंक से भी जोड़ते हुए इसे 'हिन्दू वोट बैंक' का भी नजरिया देते हैं। सौरभ द्विवेदी शायद NRC के आँकड़ो के बारे में स्पष्ट न हों लेकिन कम से कम वो इस बात को लेकर स्पष्ट थे कि उनका असल मुद्दा यानी, हिन्दू, मुस्लिम, भाजपा, कॉन्ग्रेस तो स्पष्ट था।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

सरकार द्वारा 31 अगस्त को NRC यानी, नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) की आखिरी लिस्ट जारी कर दी गई है। इसके बाद से ही NRC के आँकड़ों पर मीडिया गिरोह लगातार पूरे आत्मविश्वास के साथ फर्जी आँकड़ों की बुनियाद पर लम्बी चर्चा कर रहा है। इन सबकी जिम्मेदारी NRC के मुद्दे पर सरकार विरोधी माहौल तैयार कर अपने पाठकों का मनोरंजन करने की है।

MEME का फैक्ट चेक करने वाली वेबसाइट दी लल्लनटॉप ने इसी विषय पर प्रोपेगेंडा पत्रकार राजदीप सरदेसाई की मदद ली है। ख़ास बात यह है कि यूट्यूब पर पब्लिश किए गए इस लगभग एक घंटे की चर्चा में NRC के आँकड़ों पर इंडिया टुडे ग्रुप के पत्रकार राजदीप सरदेसाई उतने ही अस्पष्ट हैं, जितने की उनसे बातचीत करने वाले दी लल्लनटॉप के संपादक सौरभ द्विवेदी।

यह भी पढ़ें: 9 महीने पुरानी फेक न्यूज़ का फैक्ट चेक कर दी लल्लनटॉप ने आरोप कर दिया साबित 

हिटलर के लिंग की नाप का खुलासा कर के चर्चा में आई वेबसाइट दी लल्लनटॉप के यूट्यूब चैनल पर ‘नेता नगरी‘ नाम के इस प्रोग्राम में विषय है NRC। शो की शुरुआत में ही प्रोग्राम होस्ट कर रहे सौरभ द्विवेदी कहते हैं कि NRC की आखिरी लिस्ट से चालीस लाख नाम निकाल दिए गए हैं और इसके साथ ही एक लाख और नाम हटाए जाने के बाद NRC से निकाले गए लोगों की संख्या 41 लाख हो गई है।

इसके आगे सौरभ कहते हैं कि उनकी टीम ने आँकड़े इकट्ठे कर के पता किया है कि कुल 41 लाख लोगों को लिस्ट से बाहर कर दिया गया है। लेकिन वास्तविकता इन आँकड़ो से बिलकुल अलग है। दरअसल, NRC लिस्ट से 41 लाख नाम बाहर नहीं किए गए हैं बल्कि सरकार द्वारा 31 अगस्त को जारी की गई आखिरी लिस्ट से 19 लाख नाम बाहर किए गए हैं।

NRC के मसौदे (ड्राफ्ट) का कुछ हिस्सा दिसंबर 31, 2017 को जारी किया गया था, वहीं दूसरा ड्राफ्ट जुलाई 31, 2018 को प्रकाशित हुआ। जिस आँकड़ो की गवाही सौरभ और NRC विशेषज्ञ राजदीप सरदेसाई दे रहे हैं वह इसी दूसरे ड्राफ्ट की और भ्रामक है।

दूसरी NRC सूची में 3.29 करोड़ लोगों में से 2.89 करोड़ लोगों को नागरिक माना गया था, वहीं 40.37 लाख लोगों का नाम शामिल नहीं था। वहीं, अब अगस्त 31, 2019 को जारी की गई आखिरी लिस्ट में 3.11 करोड़ लोगों का नाम शामिल है और 19 लाख 6 हजार 657 लोगों के नाम नहीं हैं।

बेहद सामान्य शब्दों में कहें तो असम सरकार ने जून 30, 2018 को एनआरसी का दूसरा मसौदा जारी किया था। इस दौरान 41 लाख लोगों को लिस्ट से बाहर रखा गया था। और फाइनल लिस्ट में यह आँकड़ा घटकर लगभग 19 लाख तक आ गया।

इस तरह से, सरकार द्वारा जारी आखिर लिस्ट में पहले के दो ड्राफ्ट को नजरअंदाज कर के नई लिस्ट जारी की गई है, जबकि दी लल्लनटॉप की ‘रिसर्च टीम’ और वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई इस बात से एकदम बेखबर हैं कि NRC पर वास्तव में हुआ क्या है।

दी लल्लनटॉप के इस शो में हुई इस ‘उच्चस्तरीय’ चर्चा की एक ख़ास बात यह है कि शो के 3.01 मिनट पर ही जब राजदीप सरदेसाई कहते हैं कि 19 लाख लोगों को लिस्ट से…. उसी समय सौरभ द्विवेदी ऊँगली उठाकर बेहद दार्शनिक मुद्रा में और पूरे आत्मविश्वास के साथ राजदीप सरदेसाई को ‘सही’ करते हुए कहते हैं ‘इकतालीस लाख..’ इस इकतालीस लाख को सुनते ही राजदीप सरदेसाई एक कदम आगे जाते हुए कहते हैं- “हाँ….हाँ वही इकतालीस लाख, उन्नीस लाख को मिलाकर और अभी और नाम इसमें जुड़ रहे हैं।”

चर्चा की शुरुआत में ही अपनी टीम द्वार की गई रिसर्च के आँकड़ो से राजदीप सरदेसाई को सही करते हुए सौरभ द्विवेदी

पहले तीन मिनट में ही इस आत्मविश्वास के साथ अपनी ‘रिसर्च’ पेश करने के बावजूद यह पूरा शो और चर्चा किया गया है। इसके बाद सौरभ इस NRC लिस्ट को बेहद दार्शनिक मुद्रा में भाजपा वोट बैंक से भी जोड़ते हुए इसे ‘हिन्दू वोट बैंक’ का भी नजरिया देते हैं। इस चर्चा को देखने के बाद पता चलता है कि इस प्रोग्राम के होस्ट सौरभ द्विवेदी शायद NRC के आँकड़ो के बारे में स्पष्ट न हों लेकिन कम से कम वो इस बात को लेकर स्पष्ट थे कि उनका असल मुद्दा यानी, हिन्दू, मुस्लिम, भाजपा, कॉन्ग्रेस तो स्पष्ट था।

राजदीप और सौरभ आगे इस विषय पर चिंता व्यक्त करते हैं कि लिस्ट से हटा दिए गए इन लोगों का क्या होगा? यहाँ पर राजदीप उन्हें बताते हैं कि नहीं, यह हिन्दू-मुस्लिम का विषय नहीं है। इसके बाद सौरभ फिर अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए स्वर को थोड़ा सा बढ़ा कर रोष की मुद्रा में अंग्रेजी में पूछते हैं- “How to deal with that?” हिंदी में इसका अर्थ होता है- “आप इससे किस तरह से निपटेंगे?”

इस 54 मिनट के पूरे कार्यक्रम से कम से कम यह तो स्पष्ट है कि NRC के विषय पर सौरभ और राजदीप, दोनों की ही पकड़ बहुत कमजोर है। हालाँकि, इस चूक के लिए इस चर्चा में इस्तेमाल की गई भारी-भरकम शब्दावली, चेहरे की भाव-भंगिमा और हाथों की मुद्रा से ही NRC के आँकड़ो को समझने से मना कर देना और अनदेखा कर देना बेहद निंदनीय होगा (व्यंग्य)।

साथ ही, जब इंसान को मन की गहराइयों से यकीन हो कि उसके पास चर्चा के लिए अपनी ‘रिसर्च टीम’ के झूठे और भ्रामक आँकड़ो के अलावा कोई ख़ास स्रोत नहीं है तो महात्मा गाँधी को आगे लेकर आना आपको इतिहास का भी जानकार बता देता है। सौरभ और राजदीप ने इस चर्चा में गाँधी का स्मरण कर उनके नोटों में स्थापित होने पर भी अपनी राय दी है।

हालाँकि, यह उम्मीद करना कि विभाजन के समय महात्मा गाँधी की मुस्लिमों पर राय से ये दोनों ही पत्रकार अनभिज्ञ हों। गाँधी ने विभाजन के समय कहा था कि यदि मुसलमान हिन्दुओं को मारकर नया देश बसाना चाहते हैं तो हम भी वीरतापूर्वक मौत को स्वीकार कर के अपना एक अलग संसार बसाएँगे।

गाँधी के इन शब्दों को याद कर के ही हम जान सकते हैं कि शरणार्थी और अवैध नागरिकों पर गाँधी की क्या राय होती?

यदि दी लल्लनटॉप की चर्चा से इतर वास्तविकता की बात करें, तो नेशनल सिटिजन रजिस्टर (NRC) असम में रहने भारतीय नागरिकों की पहचान के लिए बनाई गई एक सूची है। जिसका मकसद राज्य में अवैध रूप से रह रहे अप्रवासियों, खासकर बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान करना है। इसकी पूरी प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही थी।

इस प्रक्रिया के लिए 1986 में सिटीजनशिप एक्ट में संशोधन कर असम के लिए विशेष प्रावधान किया गया। इसके तहत रजिस्टर में उन लोगों के नाम शामिल किए गए हैं, जो 25 मार्च 1971 के पहले असम के नागरिक हैं या उनके पूर्वज राज्य में रहते आए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने एनआरसी के अंतिम प्रकाशन की समयसीमा को 31 जुलाई से बढ़ाकर 31 अगस्त कर दिया था।

फाइनल लिस्ट में नाम नहीं होने के बावजूद लोगों को खुद को भारतीय नागरिक साबित करने के और मौके दिए जाएँगे। ऐसे विदेशी नागरिक पहले ट्रिब्यूनल में जाएँगे, उसके बाद हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकेंगे। लोगों को राज्य सरकार भी कानूनी मदद देगी। 2018 की लिस्ट में 3.29 करोड़ लोगों में से करीब 10% को नागरिक नहीं माना था।

सरकार ने स्पष्ट किया है कि NRC से बाहर होने वाले लोगों के मामले की सुनवाई के लिए राज्य में एक हजार ट्रिब्यूनल बनाए जाएँगे। राज्य में 100 ट्रिब्यूनल बनाए जा चुके हैं, अगले 200 सितंबर पहले हफ्ते में शुरू हो जाएँगे। लोगों को इस संबंध में अपील करने के लिए 120 दिन की मोहलत मिलेगी।

असम में फिलहाल 6 डिटेंशन सेंटर चल रहे हैं। इनमें करीब एक हजार अवैध नागरिक रह रहे हैं। इनमें ज्यादातर बांग्लादेश और म्यांमार के हैं, जो देश की सीमा में बिना किसी कागजात के घुस आए या वीजा अवधि खत्म होने के बाद भी राज्य में बने रहे। हालाँकि, सरकार ने साफ कर दिया है कि नागरिकता खोने के बावजूद भी लोगों को डिटेंशन सेंटर नहीं भेजा जाएगा।

NRC : टाइमलाइन के जरिए जानिए NRC प्रक्रिया महत्वपूर्ण फैसले

  • मई 2005- तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में केंद्र सरकार, असम सरकार और ‘आसू’
     (All Assam Students Union or AASU) के प्रतिनिधियों के बीच त्रिपक्षीय बैठक हुई। बैठक में 1985 में हुई असम संधि के दौरान किए गए वादों को पूरा करने के लिए NRC को अपडेट करने को लेकर कदम उठाने को लेकर तीनों पक्षों के बीच सहमति बनी। इसके बाद केंद्र सरकार ने असम सरकार से बात करने के बाद इसे लागू करने की प्रक्रिया तय की।
  • जुलाई 2009- ‘असम पब्लिक वर्क्स’ नाम के एक NGO (गैर सरकारी संगठन) ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका लगाते हुए उन प्रवासियों के नाम मतदाता सूची से हटाने की माँग की, जिन्होंने अपने दस्तावेज नहीं जमा कराए थे। साथ ही इस NGO ने अदालत से NRC प्रक्रिया शुरू करवाने का अनुरोध भी किया। ये पहला मौका था जब NRC का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा था।
  • अगस्त 2013- असम पब्लिक वर्क्स की याचिका पर सुनवाई शुरू हुई।
  • दिसंबर 2013- उच्चतम न्यायालय ने NRC अपडेट करने के लिए प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया।
  • फरवरी 2015- उच्चतम न्यायालय ने वास्तविक नागरिकों और अवैध रूप से रह रहे अप्रवासियों की पहचान के लिए दिसंबर 2013 में ही NRC को अपडेट करने का आदेश दे दिया था। लेकिन इसकी वास्तविक प्रक्रिया फरवरी 2015 में जाकर शुरू हुई।
  • 31 दिसंबर 2017- सरकार ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का पहला ड्राफ्ट जारी किया।
  • 30 जुलाई 2018- असम सरकार ने NRC का दूसरा ड्राफ्ट जारी किया। जिसमें राज्य में रहने वाले 3.29 करोड़ लोगों में से 2.89 करोड़ लोगों को नागरिक माना गया। इस दौरान 40 लाख से ज्यादा लोगों का नाम शामिल नहीं किया गया।
  • 31 दिसंबर 2018- सरकार द्वारा NRC का अंतिम हिस्सा जारी करने के लिए यही आखिरी तारीख तय की गई थी। हालाँकि, इस तारीख पर ये काम पूरा नहीं हो सका।
  • 26 जून 2019- NRC से बाहर रहने वाले लोगों की सूची पर एक अतिरिक्त मसौदा प्रकाशित किया गया। इस सूची में कुल 1,02,462 नाम थे, जिसके बाद रजिस्टर से बाहर रहने वाले लोगों की कुल संख्या 41,10,169 हो गई।
  • 31 जुलाई 2019- सरकार ने नेशनल सिटिजन रजिस्टर (NRC) की आखिरी लिस्ट जारी की। यह फाइनल एनआरसी लिस्ट 31 जुलाई को प्रकाशित होनी थी, लेकिन एनआरसी अथॉरिटी द्वारा राज्य में बाढ़ का हवाला देने के बाद इसे 31 अगस्त तक के लिए आगे बढ़ा दिया गया था। इससे पहले 2018 में 30 जुलाई को एनआरसी का फाइनल ड्राफ्ट आया था। लिस्ट में शामिल नहीं लोगों को दोबारा वेरीफेकशन के लिए एक साल का समय दिया था।

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आशीष नौटियाल
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