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बम बनाने के सामान के साथ अब्दुल व निजामुद्दीन गिरफ्तार, पावरफूल बम बनाने का वीडियो भी लैपटॉप में

कोलकाता पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स टीम ने उत्तर दिनाजपुर से बांग्लादेशी आतंकी संगठन जमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश (जेएमबी) के 2 आतंकियों, जिनके नाम अब्दुल बारी (28 साल) और निजामुद्दीन खान (19 साल) को गिरफ्तार किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक एसटीएफ सूत्रों ने बताया कि गिरफ्तारी के बाद इन दोनों से पूछताछ हुई और फिर इन दोनों के घरों की तलाशी ली गई। तलाशी में जो चीजें बरामद हुई, उनसे पता चला कि ये लोग किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने वाले थे।

प्रभात खबर की रिपोर्ट के अनुसार एसटीएफ को निजामुद्दीन के ठिकाने से एक लैपटॉप, चार्जर, एक मोबाइल फोन, वायर कटर, टेबल घड़ी, ग्लू स्टिक, कैपेसिटर, छोटे आकार का एलइडी बल्ब, डेटोनेटर और हेक्सा ब्लेड मिला है। जबकि घर से थोड़ी दूर स्थित इनके दूसके ठिकाने से पुलिस को सिमकार्ड के अलावा एक लैपटॉप और एक चार्जर भी बरामद हुआ हैं। लैपटॉप में High caliber explosive (तीव्र क्षमता वाला विस्फोटक) बनाने संबंधी वीडियो अपलोड था।

अब इसे देखकर कयास लगाए जा रहे हैं कि ये आतंकी अपने नए ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए इन चीजों से विस्फोटक बनाने की तैयारी कर रहे थे। एसटीएफ के ज्वायंट सीपी शुभांकर सिन्हा सरकार ने बयान जारी करते हुए बताया है कि जेएमबी के इन संदिग्ध आतंकियों से कई सवालों के जवाब जानने के लिए लगातार पूछताछ की जा रही है। जैसे- इन चीजों से क्या करने वाले थे, उनकी क्या मंसूबे थे? वह कहाँ से वह इन चीजों को लाते थे? इन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उपयोग करके वह कितना घातक विस्फोटक बनाने की तैयारी में थे?

गौरतलब है कि अभी कुछ दिन पहले एसटीएफ की टीम ने अबुल काशेम को कोलकाता के नारकेलडांगा से गिरफ्तार किया था। उससे पूछताछ के दौरान ही इन दोनों संदिग्धों के बारे में जानकारी मिली थी। जिसके बाद पुलिस ने गुप्त अभियान चलाकर इन दोनों को गिरफ्तार किया और इनके खतरनाक मंसूबों के बारे में पता लगाने में जुट गई।

अखबार वाले मन्नूलाल वैष्णव ने माँगे बकाया 300 रुपए, रफीक खान ने कुल्हाड़ी से काट डाला

घर-घर अखबार पहुँचा कर अपनी रोजी-रोटी चलाने वाले मन्नूलाल वैष्णव को यह नहीं पता था कि एक दिन इन्हीं अखबारों में उनकी हत्या की खबर छपेगी! हत्या वो भी उस रफीक खान (इंसान या हैवान!) के द्वारा जो इन्हीं के लाए अखबारों को पढ़ता जरूर था लेकिन पैसे देने के नाम पर नजरें चढ़ाता था।

1 नंबर जिसकी टीशर्ट पर लिखा है, वही है हत्यारा रफीक, दाहिनी ओर की फोटो- थाना प्रभारी को किया गया सस्पेंड

जयपुर के 50 साल के न्यूजपेपर हॉकर (वो आदमी जो हर सुबह हमारे-आपके यहाँ अखबार पहुँचाता है) मन्नूलाल वैष्णव को रफीक ने मार डाला। कुल्हाड़ी से काट डाला। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि मन्नूलाल 5 सितंबर 2019 को सबके घरों में अखबार पहुँचा कर रफीक खान के पास गए। बहुत समय से अपने बकाये 300 रुपए (मात्र 300 रुपए) को लेकर उन्होंने उससे पूछा कि भाई, हिसाब कर दो। लेकिन रफीक ने जवाब दिया – कुल्हाड़ी से। वो पागलों की तरह कुल्हाड़ी से वार करता रहा। हालाँकि बाइक पर बैठे मन्नुलाल कुल्हाड़ी के पहले ही वार से बेसुध होकर गिर पड़े थे, फिर भी वो वार करता रहा।

यह घटना जयपुर के खोनागोरियान थाना क्षेत्र में घटी। हत्यारे रफीक खान को वहाँ मौजूद लोगों ने पकड़ लिया और उसकी धुनाई कर दी। इसके बाद लोगों ने उसे पुलिस के हवाले कर दिया। मरने वाला हिंदू जबकि हत्यारा दूसरे मजहब से है, ऐसे में स्थानीय लोगों में आक्रोश तुरंत फैल गया। उन्होंने स्थानीय थाने के सामने सड़क पर जाम लगा दिया। इस दौरान वहाँ के पूर्व विधायक कैलाशचंद्र वर्मा और अन्य भाजपा नेता भी पहुँच गए।

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस के बड़े अधिकारी भी संबंधित थाने पहुँचे। स्थिति को कंट्रोल में रखने के लिए पुलिस का अतिरिक्त जत्था इलाके में तैनात कर दिया गया है। बता दें कि विरोध-प्रदर्शन कर रहे लोगों पर गुरुवार (5 सितंबर 2019) को पुलिस ने लाठी चार्ज भी किया था। इस मामले को ठीक ढंग से कंट्रोल नहीं करने के कारण थाना SHO को सस्पेंड कर दिया गया है।

51.72 करोड़ रुपए का मामला: एमनेस्टी इंटरनेशनल को प्रवर्तन निदेशालय ने भेजा नोटिस

मानवाधिकार के नाम पर कश्मीर मामले में ग्लोबल कैंपेन शुरू करने का आह्वान करने वाली ब्रिटेन आधारित एनजीओ एमनेस्टी इंटरनेशनल को प्रवर्तन निदेशालय ने कारण बताओ नोटिस जारी किया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल को यह नोटिस विदेशी मुद्रा प्रबंधन कानून (फेमा) के तहत जाँच पूरी होने के बाद जारी किया गया है

जानकारी के मुताबिक एमनेस्टी पर विदेशी मुद्रा कानून (फेमा) के तहत 51.72 करोड़ रुपए के लेन-देन में नियमों के उल्लंघन करने का आरोप है।

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो अधिकारियों का कहना है कि फेमा के न्याय निर्णय प्राधिकरण (विशेष निदेशक स्तर का अधिकारी) द्वारा पिछले महीने यह नोटिस जारी किया गया। यह नोटिस देश में नागरिक व सामाजिक गतिविधियों के लिए 51.72 करोड़ रुपए की उधारी और ऋण से संबंधित है। इसमें एनमेस्टी पर आरोप है कि उसने अपने मूल निकाय एमनेस्टी इंटरनेशनल (ब्रिटेन) से सेवा निर्यात के नाम पर यह राशि हासिल की।

गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से यह संगठन जाँच एजेंसियों की रडार पर रहा है। जिसके चलते पिछले साल अक्टूबर महीने में ईडी ने विदेशी चंदा नियमन कानून (एफसीआरए) के उल्लंघन के आरोपों में संगठन के बंगलुरु कार्यालय में भी छापेमारी की थी। और अब इसी मामले में विशेष निदेशक द्वारा मेसर्स एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल की करतूतों का काला चिट्ठा जानने के लिए आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं-
1. एमनेस्टी इंडिया जैसे डकैत विदेशी एनजीओ दूसरे देशों को अपने बाप की खेती क्यों समझते हैं
2.मानवाधिकार की आड़ में कश्मीर पर आवाज उठाने वाले Amnesty के काले करतूतों का कच्चा चिट्ठा

AAP सरकार का दावा: ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ तो एक दूसरे को चिढ़ाने के लिए बोला गया था, कन्हैया का क्या दोष

‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसे देशद्रोही नारे लगाने के आरोपित कन्हैया कुमार पर दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार मुकदमा दायर करने के लिए दिल्ली पुलिस को अनुमति नहीं देगी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक दिल्ली के गृहमंत्री सत्येंद्र जैन ने अपने इस फैसले पर मुहर लगा दी है और इस मामले पर अपनी राय देते हुए बताया है कि पुलिस ने उनके सामने जो सबूत पेश किए हैं, उसके मुताबिक कन्हैया और अन्य लोगों पर देशद्रोह का मामला नहीं बनता है।

इसके अलावा गृह विभाग द्वारा जारी किए गए नोट में भी कहा गया है कि JNU में देश विरोधी नारे लगाने के प्रकरण में यह साबित नहीं हो पाया है कि नारे कन्हैया कुमार ने लगाए थे। अब यह पत्र केजरीवाल सरकार के पास जाएगा।

गौरतलब है कि बीते दिनों जेएनयू में देश विरोधी नारे लगाने के आरोपित कन्हैया कुमार के खिलाफ़ 1200 पन्नों की चार्जशीट दिल्ली सरकार की अनुमति के बिना ही पुलिस ने कोर्ट में पेश कर दी थी, जिसमें पुष्टि की गई थी कि 2016 में जेएनयू परिसर में हुई घटना एक सोची समझी साजिश थी और ये घटना पूरी प्लॉनिंग के साथ हुई थी। जिस पर बाद में AAP सरकार ने कहा था कि पहले वह इस मामले की जाँच कराएँगे और बाद में इस मामले के संबंध में निर्णय लेंगे।

हालाँकि, कुछ महीने पहले इस मामले में देरी करने के लिए दिल्ली के पटियाला कोर्ट ने केजरीवाल सरकार को फटकार भी लगाई थी और उनसे अपना रुख जल्द से जल्द स्पष्ट करने को कहा था।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक इसके बाद दिल्ली सरकार ने इस मामले में कानूनी राय लेने के लिए इसे लॉ विभाग के पास भेजा था और लॉ विभाग ने अपनी रिपोर्ट को गृह विभाग को भेजा था। बाद में लॉ विभाग की राय को उचित करार देते हुए अंतिम रिपोर्ट तैयार की गई और कहा गया कि कन्हैया कुमार पर देशद्रोह का मामला नहीं बनता है।

गृह विभाग की इस रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि यह दो छात्र राजनैतिक गुटों का मामला था। जहाँ दोनों गुटों ने एक दूसरे को उकसाने के लिए नारेबाजी की थी।

वहीं इस मामले पर गृह मंत्री का विचार है कि आरोपियों का हिंसा भड़काने का कोई इरादा नहीं था और मार्च के दौरान लगाए गए नारे को आरोपियों से नहीं जोड़ा जा सकता है।

दिल्ली के गृहमंत्री सत्येंद्र जैन के मुताबिक वो देशविरोधी नारे दूसरे गुट को चिढ़ाने के लिए थे न कि राज्य और उसकी संप्रभुता को चुनौती देने के लिए। उनका कहना है कि दो छात्र गुटों के बीच झगड़े के कारण उस दिन घटना हुई थी। वहाँ लगे नारों को आरोपितों के साथ नहीं जोड़ा जा सकता है। इसलिए पुलिस अपनी FIR में देशद्रोह की धारा छोड़कर अन्य उल्लेख की गई धाराओं के तहत आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर सकती है।

यहाँ जानकारी के लिए बताते चलें कि पुलिस द्वारा दायर की गई जिस चार्जशीट पर AAP सरकार ने विचार किया है, उस चार्जशीट में पुलिस ने इस मामले से जुड़े 90 गवाहों को साक्ष्य के तौर पर भी रखा था। और कहा था कि इनमें से 30 ऐसे हैं, जो देशद्रोही नारेबाज़ी के प्रत्यक्षदर्शी हैं। इनमें से कुछ वहाँ के स्टाफ और सुरक्षाकर्मी भी हैं। इस चार्ज शीट में इस बात का भी उल्लेख था कि कन्हैया कुमार ने ही उस दिन पूरी भीड़ का नेतृत्व किया था और बतौर छात्रसंघ नेता उसने सबको रोकने की जगह उन सबके साथ मिलकर देश-विरोधी नारेबाज़ी की थी।

एमनेस्टी इंडिया जैसे डकैत विदेशी एनजीओ दूसरे देशों को अपने बाप की खेती क्यों समझते हैं?

एमनेस्टी इंटरनेशनल एक अंग्रेजी एनजीओ है जो ‘मानवाधिकारों की रक्षा’ के लेबल के नीचे लगभग छः दशकों से छुपती रही है लेकिन इसके कुकर्मों की पोल गाहे-बगाहे खुलती रहती है। हम या आप इस तरह के नाम सुनते हैं तो पहले जर जाते हैं कि बाप रे! ऐसा सेक्सी नाम है, इस पर सवाल क्या करना, जो करता होगा सही ही करता होगा।

लेकिन इन तमाम नैतिकता से ओत-प्रोत ‘मिशन और विजन’ वाले एनजीओ की जमीन खोदने पर ऐसे कंकाल निकलते हैं जिसमें बच्चों की तस्करी से लेकर मजहबी कन्वर्जन, चर्चों से फंड लेकर दूसरे देशों में दंगे-फसाद करवाने, मीडिया और नेताओं को पैसा खिला कर मजहबी हिंसा भड़काने से लेकर आतंकियों के साथ खड़े होने की बातें सामने आती हैं।

इसलिए जब एमनेस्टी जैसी संस्थाओं पर कोई देश सवाल उठाता है तो ये अपने आप को ऐसे दिखाते हैं जैसे सारी नैतिकता का ठेका और उसकी दुकानदारी इन्हीं के बापों की मिल्कियत है और सरकारों के कानून तो उन्हें सताने के लिए बने हैं। जबकि, सत्य यह होता है कि एनजीओ के नाम पर पैसों के हेर-फेर में लिप्त रहने वाली ऐसी संस्थाएँ लगातार भारत को तोड़ने के लिए तमाम तरह के कुत्सित कार्यों में व्यस्त पाए जाते हैं।

कश्मीर पर संदर्भहीन बात

आज एमनेस्टी इंटरनेशल इंडिया ने ज्ञान बाँचते हुए लिखा कि वो अब कश्मीर में हो रहे मानवाधिकारों के हनन पर वैश्विक स्तर पर आवाज उठाएगी। अगर कश्मीर में वाकई मानवाधिकारों का हनन होता तो इस बात की सराहना की जाती लेकिन एमनेस्टी ने जिस बेहूदगी और धूर्तता के साथ आधी बात और संदर्भ को छुपा लिया है, उसके लिए उन्हें सड़कों पर नंगे करके बेंत मारने की सजा मिलनी चाहिए।

कश्मीर का इतिहास हिंसक रहा है। वहाँ कुछ आतंकी तत्व अभी भी सक्रिय हैं। हालिया राजनैतिक फैसलों के कारण वहाँ की स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए सरकार ने आम नागरिकों की रक्षा के लिए उन पर कुछ प्रतिबंध लगाए हैं जिसमें इंटरनेट की सेवा प्रमुख है। अब एमनेस्टी यह भूल जाता है कि कश्मीर में होने वाली पत्थरबाजी की जड़ में, या सेना के आतंकी सफाई अभियान में वहाँ के पत्थरबाजों द्वारा रोक लगाने में व्हाट्सएप्प का सबसे बड़ा हाथ रहा है।

कई जगहों पर इंटरनेट सेवा बंद करने पर सरकार ने स्थिति को नियंत्रण में लाने में सफलता पाई है। कश्मीर में यही हो रहा है। ये बात ऐसे भी साबित हो जाती है कि इतने नियंत्रण के बावजूद कुछ आतंकियों ने ट्रक ड्राइवर नूर मोहम्मद से लेकर दुकानदार और कुछ और कश्मीरियों की हत्या कर दी है। ये आतंकी सरकार को अपना संदेश देने के लिए किसी भी हद तक गिर सकते हैं और ऐसे में इन्हें संचार की सुविधा देकर इकट्ठा होने, योजना बनाने और हिंसा फैलाने के लिए किसी भी हाल में छोड़ा नहीं जा सकता।

भारत सरकार के पास कश्मीर की स्थिति को समझने के लिए सेना है, इंटेलिजेंस एजेंसियाँ हैं, स्थानीय पुलिस है और प्रशासन है जिन्हें विश्वास में लेने के बाद ही आम नागरिकों पर कुछ रोक लगे हैं। ये ज़रूरी हैं क्योंकि कुछ कश्मीरियों के क्रोध के कारण दूसरे निर्दोषों को सड़कों पर मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। लेकिन एमनेस्टी को इससे मतलब नहीं है।

एमनेस्टी कश्मीर पर लम्बे समय से ज्ञान देता रहा है। एक साधारण सा गूगल सर्च करने पर इस संस्था के दोगलेपन का पता चल जाता है जब कश्मीर के मुद्दे पर इनके पास दसियों लेख और रिपोर्ट हैं लेकिन पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर, या गिलगिट-बल्तिस्तान, के साथ आप सर्च करें तो आपकी आँखें तरस जाएँगी। पाकिस्तान वाले हिस्से में लोग गायब कर दिए जाते हैं, सेना हर तरह के अत्याचार कर रही है, लेकिन एमनेस्टी वहाँ आर्टिकल नहीं लिखती, कैम्पेन नहीं चलाती। जबकि, वो इलाका पाकिस्तान द्वारा गैरकानूनी रूप से कब्जे में है।

दूसरे देशों की बातों में नाक घुसाने की पुरानी आदत

एमनेस्टी जैसी संस्थाओं ने हमेशा स्वयं को ‘गॉड’ टाइप का समझा है। वो सोचते हैं कि उनकी दोगली नीतियाँ, पक्षपाती रवैया और पश्चिमी देशों से चिपकने की बातें किसी को मालूम नहीं। कश्मीर भारत का मुद्दा है और वहाँ सेना गश्त दे रही है, गोली नहीं चला रही कहीं। वहाँ की गलियों को शांत रखना उनकी प्राथमिकता है। फिर एमनेस्टी का मानवाधिकार उसमें कहाँ से घुस गया?

ऐसे ही, 2007 में क्रिकेट विश्वकप में इन्होंने कैरेबियाई मैदानों पर श्रीलंका की सरकार के ऊपर सीधा आरोप लगाते हुए कैम्पेन चलाया था कि ‘श्रीलंका, प्ले बाय द रूल्स’। जबकि क्रिकेट वर्ल्डकप में न तो सरकारें हिस्सा लेती हैं, न ही खिलाड़ियों में से कोई भी श्रीलंका सरकार द्वारा आतंकरोधी अभियान का हिस्सा रहा था।

एमनेस्टी के एशिया-पैसिफिक डेप्यूटी डायरेक्टर ने इस पर सफाई देते हुए कहा था कि श्रीलंका में यह अत्यावश्यक है कि वहाँ कोई स्वतंत्र मानवाधिकार संस्था जा कर सरकार, तमिल टाइगर्स और बाकी हथियारबंद समूहों को बताए कि उनके झगड़े में आम नागरिक न उलझें। आप यह देखिए कि एमनेस्टी के लिए सरकार और तमिल टाइगर्स जैसे आतंकी समूह बिलकुल समान हैं। उन्हें यह नहीं दिखता सरकार को अगर वो रूल्स याद दिला रहे हैं, तो ये सुनिश्चित कौन करेगा कि लिट्टे के आतंकी भी रूल्स से खेलें?

ये किस तरह की बात है कि एक संप्रभु राष्ट्र को उस देश के सरकार द्वारा फंड की जा रही संस्था मानवाधिकारों पर ज्ञान दे रही है जिसने दो सौ सालों तक मानवाधिकारों की बत्ती बना न सिर्फ जला दी बल्कि अपने घरों को रौशन भी किया। अब ब्रिटेन के विदेश मंत्रालय से फंड पाने वाली संस्था यह बताएगी कि श्रीलंका दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकी गुट से ‘आओ मैं तुम्हें गेम के रूल्स बता दूँ’ कहने के बाद कार्रवाई करे?

ब्रिटिश इंटेलिजेंस का हिस्सा, दूसरे देशों की छवि खराब करना मुख्य लक्ष्य

एमनेस्टी पर ब्रिटिश इंटेलीजेन्स MI5 का हिस्सा होने के आरोप भी लगे हैं। इनकी फंडिंग की जाँच करने पर पता चलता है कि कई बार इन्होंने जो फंड ब्रिटिश सरकार से पाए हैं वो ऐसे मौकों पर पाए हैं जब ये संस्था मोअज्जम बेग जैसे आतंकियों के साथ साँठ-गाँठ में थी। इस पर विस्तृत रिपोर्ट आपको हमारी अंग्रेजी साइट पर यहाँ मिल जाएगी।

1960 के दशक में अंग्रेज पूरी दुनिया से लूटपाट और हत्या का दौर खत्म करने के बाद धीरे-धीरे बाहर आ रहे थे तभी एमनेस्टी के लिए यहाँ के विदेश मंत्रालय ने अपने तमाम दूतावासों को लिखा था कि एमनेस्टी को बिना पब्लिक में बताए मदद मिलती रहनी चाहिए। साथ ही यह भी कहा था कि सरकार का एमनेस्टी के क्रियाकलापों में हस्तक्षेप नही होगा, जिसका सीधा मतलब था कि एमनेस्टी के घटिया कामों की परछाई सरकार पर न पड़े।

एमनेस्टी इंटरनेशनल एक संदिग्ध संस्था रही है

जिस मोअज्जम बेग की बात ऊपर हुई है उस पर एमनेस्टी के जेंडर यूनिट की मुखिया गीता सहगल ने कहा कि एमनेस्टी को ऐसे तालिबानी आतंकी के साथ नहीं दिखना चाहिए था। आप यह सोचिए कि मानवाधिकारों की बात करने वाली संस्था आखिर एक आतंकी के साथ संबंध में कैसे रह सकती है? बाद में जब बहुत भद्द पिटी तो कई सालों के बाद एमनेस्टी ने स्वयं को इससे अलग किया

इसके अलावा कई मौकों पर एमनेस्टी के कार्यालयों में नस्लभेद, लिंगभेद, और अभद्र व्यवहार करने के आरोप लगते रहे हैं। इस पर कई बार रिपोर्ट्स आए हैं। साथ ही, एमनेस्टी ने जहाँ दुनिया में समान सैलरी की बात की है, वहीं इसने स्वयं एक महिला से इसी मुद्दे पर कोर्ट से बाहर सेटलमेंट किया और उससे इस पर कुछ भी न बोलने का अनुबंध भी कराया।

एनजीओ मॉनीटर नामक संस्था ने एमनेस्टी के पक्षपाती रवैये पर एक शोधपत्र जारी किया जहाँ पता चलता है कि इस संस्था द्वारा बनाए गए रिपोर्ट, जिसकी कसमें तमाम सेलिब्रिटी और नेता खाते हुए अपनी बात रखते हैं, उनमें न तो शोध का तरीका सही होता है, न ही थोड़ी सी जाँच करने पर कोई तथ्य मिलते हैं। इन्हीं शोधों को आधार मान कर यही संस्था कैम्पेन चलाती है, सरकारों और व्यक्तियों से धन का दान लेती है।

इसी संस्था ने लिखा है कि एमनेस्टी की शिराओं और धमनियों तक में भ्रष्टाचार फैला हुआ है। इसी की बात करते हुए उन्होंने नौ ऐसे मामले गिनाए जहाँ इनकी संल्पितता थी। इन्होंने जिहाद को सेल्फ डिफेंस तक कहा है और अलकायदा से लेकर तालिबान तक से इनके संबंध बताए जाते हैं। इन्होंने कभी भी मिडिल इस्ट में महिलाओं के अधिकारों पर एक शब्द नहीं बोला है। इनके करतूतों की फेहरिस्त काफी लम्बी है।

भारत में इनकी नौटंकी

इस संस्था की गतिविधियों पर कई देशों ने सवाल उठाए हैं। पिछले साल ही, एमनेस्टी इंडिया ने उत्तर प्रदेश की पुलिस पर 900 लोगों को एनकाउंटर में मार देने का आरोप लगाया। जब पुलिस ने कहा कि वो इन पर कानूनी कार्रवाई करेगी तब ये कहने लगे कि उनका मतलब तो मारे गए और घायल, दोनों तरह के, लोगों से था। भला हो ट्विटर जैसे माध्यमों का जहाँ तुरंत सरकार बयान जारी कर देती है वरना यही संस्था इसी पर रिपोर्ट बना कर यूएन मानवाधिकार आयोग से लेकर तमाम राष्ट्रों को यह बताती कि भारत के सबसे बड़े राज्य में एक हिन्दूवादी सरकार की पुलिस ने 900 लोगों की जान ले ली!

आप यह देखिए कि यह संस्था भारत में किसके बचाव में उतर रही है? और ऐसा क्यों कर रही है? पिछले साल मार्च में इनके बंगलोर कार्यालय पर प्रवर्तन निदेशालय ने छापे मारे थे क्योंकि इनके ऊपर विदेशों से आने वाली फंडिंग पर भारतीय कानूनों को बायपास करने के आरोप लगे थे। जब ऐसा हुआ तो इन्होंने भारत सरकार पर ही आरोप लगा दिया कि चूँकि ये भारत में मानवाधिकारों के बारे में बोलते हैं तो सरकार बदला ले रही है।

जबकि अगर इनकी करतूतों देखी जाएँ तो ये भारत को तोड़ने वाली शक्तियों के साथी रहे हैं। इसी साल जनवरी में इन्होंने नसीरुद्दीन शाह को लेकर एक विडियो बना कर भारतीय आम चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश की थी जहाँ भारत की स्थिति ऐसी दिखाई गई कि यहाँ बोलने की आजादी खत्म हो चुकी है और मानवाधिकारों को तो हर गली-मुहल्ले में खुलेआम धता बता कर तबाही मचाई जा रही है। आप तो जानते ही हैं कि नसीरुद्दीन शाह जब गंभीर आवाज में बोलते हैं तो कैसे लगते हैं!

उसके बाद एमनेस्टी ने शहरी नक्सलियों को डिफेंड करते हुए कहा था कि भारत में मानवाधिकारों की बात करने वालों को सरकार गिरफ्तार कर रही है। पहली बात तो यह है कि नक्सलियों के मुँह से मानवाधिकारों की बात बदबू ही देती है, दूसरी यह कि जिस अर्बन नक्सल को लेकर ये चिंतित थे वो अरुण फरेरा भीमा कोरेगाँव हिंसा को भड़काने और भारत के प्रधानमंत्री की हत्या की योजना बनाने में आरोपित था।

और तो और, इनके कर्मचारी तो ऐसे-ऐसे हैं कि खुले में ब्राह्मणों पर हिंसा भड़काने के लिए लोगों को उकसाते हुए कहते हैं कि आरएसएस को तब डर लगता है जब ब्राह्मणों पर हमले होते हैं, यही उनकी असली कमजोरी है।

जब इस तरह के कर्मचारी हों, मानवाधिकारों की ऐसी मजबूत ढाल हो जहाँ पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के समुदाय विशेष की हालत या मिडिल ईस्ट में महिलाओं की हालत, या अमेरिका के नेटिव महिलाओं पर होते सेक्सुअल क्राइम्स पर इनकी चुप्पी या सहमति रहती हो, तो जाहिर है कि कश्मीरी जिहादियों के लिए इनकी छाती तो फटेगी ही।

इन्होंने सेल्फ डिफेंस के लिए जिहाद को सही ठहराया है। सारे कश्मीरी आतंकी तो सेल्फ डिफेंस ही करते हैं, उसी में हजारों सैनिक और निर्दोष कश्मीरी मर जाते हैं तो इन आतंकियों का क्या दोष! वो तो पत्थर फेंक रहे थे, गोली चला रहे थे, बम फोड़ रहे थे, अब उसकी रेंज में कुछ लोग मर गए तो उनकी क्या गलती! बेचारे आत्मरक्षा में लगे हुए थे!

इनकी भाषा तो देखिए आप कि ये अपने बयानों में सरकारों को आदेश देते दिखते हैं कि ये तो अब और दिन तक जारी नहीं रह सकता! उसके बाद बार-बार सिर्फ झूठ लिख कर बरगलाने में लीन रहते हैं कि कश्मीरियों के जीवन पर भयंकर प्रभाव पड़ा है। चूँकि कुछ चीजें कोई प्रूव नहीं कर सकता तो आराम से कह दो कि उसको मानसिक और भावनात्मक तौर पर भयानक पीड़ा पहुँची है। फिर एक झूठ लिखो कि उनकी बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं हो रही, मेडिकल केयर नहीं मिल रहा।

जबकि ये सारी बातें बेकार हैं, झूठ हैं, प्रपंच और प्रलाप हैं। बार-बार कश्मीर के अधिकारियों ने अस्पताल और दवाइयों की बातों पर मीडिया को सच लिखने को कहा है। आप इनकी साइट पर जा कर देख लीजिए कि इन्होंने आतंकियों को कितनी बार इन्हीं कश्मीरियों की सिविल लिबर्टी पर हमला करने वाला कहा है। आप जा कर देखिए कि जब पत्थरबाज इन्हीं गरीब सैनिकों या कश्मीरियों की जान ले लेते हैं तब एमनेस्टी को मानवाधिकारों की कितनी याद आती है।

एमनेस्टी के लोगो में लगा कैंडल जल रहा है। उसका मोम ब्रिटेन से आता है। इसकी आग में मानवाधिकारों की हत्या ही होती है। अगर एक अंतरराष्ट्रीय संस्था के लिए श्रीलंका की सरकार और लिट्टे समान हैं, इस्लामी देशों में महिलाओं को दोयम दर्जे के अधिकारों का मिलना सही लगता है, नेटिव अमेरिकन महिलाओं का रेप स्वैच्छिक सेक्स लगता है, भारत की चुनी हुई सरकार और जिहादी आतंकियों में जिहादी आतंकियों का पलड़ा भारी है, तो भारत को तोड़ने के लिए आतुर इस एमनेस्टी इंटरनेशनल को उसी मोमबत्ती का दूसरा उपयोग बहुत सारे लोग बता सकते हैं। उसका दुर्भाग्य कि उसकी मोमबत्ती के साथ कँटीला तार भी है।

JioFiber हुआ लॉन्च, टीवी वीडियो कॉलिंग और कॉन्फ्रेसिंग सहित कई सुविधाएँ, ₹699 से शुरू

रिलायंस जियो फाइबर आज यानी 5 सितंबर 2019 को लॉन्च हो गया है। जियो फाइबर के प्लान को अलग-अलग कैटेगरी में बाँटा गया है। ये हैं- ब्रॉन्ज, सिल्वर, गोल्ड, डायमंड, प्लेटिनम और टाइटेनियम।

बता दें कि जियो फाइबर कनेक्शन लेने के लिए 2,500 रुपए की प्रारंभिक स्कीम है। इसमें से 1,500 रुपए की राशि की सिक्योरिटी डिपॉजिट होगी। जबकि बाकी का 1,000 रुपए की राशि वापस नहीं मिलेगी।

मिनिमम डाटा प्लान 100 Mbps से शुरू होगा और 1Gbps तक जाएगा। जियो फाइबर के 100Mbps स्पीड वाले डेटा प्लान की कीमत 699 रुपए रखी गई है जबकि इसके सबसे मँहगे 1Gbps डेटा स्पीड की कीमत 8,499 रुपए है।

699 रुपए वाला प्लान ‘ब्रॉन्ज प्लान’ है। इसमें 100Mbps की स्पीड मिलेगी। इस प्लान में 100gb+50gb एक्सट्रा डेटा मिलेगा।

इसका ‘सिल्वर प्लान’ 849 रुपए का है। इसमें आपको 100gb+50gb एक्सट्रा डेटा मिलेगा। सिल्वर प्लान में भी आपको 100Mbps की स्पीड मिलेगी। इस प्लान में भी यूजर्स को फ्री वॉइस कॉलिंग ऑल ओवर इंडिया, टीवी वीडियो कॉलिंग और कॉन्फ्रेंसिंग, होम नेटवर्किंग आदि सेवा मिलेगी।

इसके बाद है गोल्ड ओर डायमंड प्लान, गोल्ड प्लान में 500Mbps की स्पीड मिलेगी, जब कि डायमंड प्लान में 500Mbps की स्पीड मिलेगी। गोल्ड प्लान में आपको 500gb+250gb एक्स्ट्रा डेटा प्राप्त होगा।

वहीं डायमंड में 1250gb+250gb एक्सट्रा डेटा मिलेगा। गोल्ड प्लान का प्राइस 1,299 रुपए है और डॉयमंड प्लान की कीमत 2,499 रुपए है। गोल्ड प्लान में भी यूजर्स को फ्री वॉइस कॉलिंग, सेट टॉप वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग जैसी सर्विसेस मिलेंगी। वहीं डायमंड प्लान में भी अन्य प्लान की तरह ही फ्री कॉलिंग, टीवी वीडियो कॉलिंग, गेमिंग, होम नेटवर्किंग आदि सर्विसेस मिलेंगी।

ऐसे ही 1Gbps की स्पीड वाला प्लेटिनम प्लान आप 3,999 रुपए में है। इसमें आपको 2500gb डेटा मिलेगा।
इसका सबसे मँहगा प्लान ‘टाइटेनियम’ है। इस प्लान में 1Gbps की स्पीड और 5000gb अनलिमिटेड डेटा मिलेगा।

मानवाधिकार की आड़ में कश्मीर पर आवाज उठाने वाले Amnesty के काले करतूतों का कच्चा चिट्ठा

वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों, मानवीय मूल्यों और मानवीय स्वतंत्रता के नाम पर चलने वाले अनेकों गैर सरकारी संगठनों का काला सच क्या है? ये किसी से छिपा नहीं है। मानव-हित के नाम पर अपने कुकर्मों को अंजाम देना और अन्य देशों की संप्रभुता से खिलवाड़ कर पश्चिमी ताकतों का उस देश में विस्तार करना… ये इनकी पृष्ठभूमि की कड़वी हकीकत है। ऐसी ही एनजीओ की सूची में एक नाम एमनेस्टी इंटरनेशनल का भी है। जिसकी शुरूआत 1961 में ब्रिटेन से हुई थी और जिसने अपना उद्देश्य मानवीय मूल्यों पर शोध एवं प्रतिरोध करना बताया था और साथ ही जगजाहिर किया था कि वह मानवाधिकारों के लिए लड़ेगा। हालाँकि पिछले कुछ सालों में इस एनजीओ द्वारा की गई करतूतें इसके अस्तित्व की बखिया अपने आप उधेड़ती हैं, जिसके लिए इसे कई देशों से लताड़ भी मिल चुकी है लेकिन फिर भी ये किसी देश के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप करने से बाज नहीं आते।

अभी हाल ही में देख लीजिए। भारत तक अपने पैर पसार लेने वाला ये संगठन अब कश्मीर के मुद्दे को वैश्विक पटल पर ले जा रहा है। जिस मुद्दे को अब तक देश का आंतरिक मामला कह कहकर पाकिस्तान को हड़काया जा रहा था, उस मुद्दे को आधार बनाकर अब ये संगठन ग्लोबल कैंपेन शुरू करने जा रहा है, जिसका उद्देश्य प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कश्मीर में जिहाद का संरक्षण करना ही है। ये संगठन जनहानि का हवाला देकर भारत को विश्व के सामने कठोर, बेहरम, निर्मम दिखाने के लिए 5 अगस्त से प्रयासरत है। भारत में इसके हेड आकार पटेल लगातार अपने झूठों पर कायम हैं और लगातार कश्मीर के फैसले का हवाला देकर बोल रहे हैं कि सरकार के फैसले ने अनिश्चित काल के लिए कश्मीर को अंधकार में झोंक दिया है। इनका कहना है कि भले ही कश्मीर में दूरसंचार सेवाएँ दोबारा से बहाल कर दी गई हैं लेकिन फिर भी 80 लाख लोग इससे प्रभावित हुए हैं। इनका कहना (प्रोपेगेंडा) है कि अब सरकार ने सिर्फ़ कश्मीर के संचार तंत्र पर ही शिकंजा नहीं कसा है बल्कि कश्मीरियों के दिल और दिमाग पर भी अपना शिकंजा कस लिया है।

हालाँकि विरोधियों को एमनेस्टी इंडिया के इस कदम में वाकई मानव-हित दिखाई देगा और देश में मौजूद एक विशेष गिरोह के लोग इसका समर्थन करने से भी पीछे नहीं हटेंगे। लेकिन क्या इस संगठन की करतूत पर ये विमर्श का विषय नहीं है कि आखिर मोदी सरकार ने गलत क्या किया है, जो कश्मीरियों का भविष्य अंधकार में बताया जा रहा है? आखिर आतंकवाद को रोकने की लड़ाई में और कश्मीरियों को उनका अधिकार देने की लड़ाई नें उन्होंने वहाँ से अनुच्छेद 370 का पावर खत्म करने के किसको आहत किया है? घाटी के अलगाववादियों और पत्थरबाजों को छोड़कर वो कौन से कश्मीरी हैं, जो इस फैसले से निराश हैं? सुरक्षा के लिहाज से सुरक्षाबलों की तैनाती से किसे गुरेज है? किसे दिक्कत है कश्मीर के कल को सुधारने के लिए आज लिए गए इस ऐतिहासिक फैसला से? शायद विरोधियों, पाकिस्तानियों, पाकिस्तान-परस्तों और एमनेस्टी जैसे संगठन को छोड़कर किसी को भी नहीं!

देश की सुरक्षा और उस देश के नागरिकों के उत्थान की जिम्मेदारी सरकार पर होती है। सरकार के छोटे से छोटे फैसले में या तो देशहित छिपा होता है या फिर मानव-हित। मुमकिन है इस समय कश्मीर पर लिए गए फैसले से कई लोग परेशान हो रहे हों, लेकिन ये भी सच है कि जिन्हें परेशानी हो रही है वो लोग वही हैं जो कश्मीर में अराजकता फैलाने के लिए उतावले हैं, जिन्हें चाहिए कि कश्मीर में दिन पर दिन आतंकवादी घटनाएँ घटती रहें, कश्मीरी पंडितों को उनके अधिकारों से वंचित रखा जाए, पत्थरबाजी की घटनाएँ बढ़ती रहें, नौजवान रोजगार ढूँढने की बजाए घाटी तक सीमित रह जाएँ। अब ऐसे में अगर सरकार ने इन लोगों को कुछ दिनों के लिए घर में बंद रखा है या फिर सुरक्षा के लिहाज से क्षेत्र में कुछ पाबंदिया लगाईं हैं तो क्या गलत है? 10 हजार लोगों की जान बचाने के लिए अगर 5 या 10 लोगों को काबू कर लिया जाए तो मुझे नहीं लगता इसका इतना बड़ा बवाल बनाया जाना चाहिए।

जब पाकिस्तान की गुहार पर विश्व के बड़े-बड़े देश इस फैसले को भारत के अधिकार क्षेत्र में आने वाला फैसला बता चुके हैं तो अब एमनेस्टी जैसी विदेशी संस्था को दिकक्त क्या है?

हो सकता है इस बिंदु तक आते-आते किसी पाठक को ये लगने लगे कि यहाँ पर एकतरफा होकर बात हो रही है। लेकिन एमनेस्टी के अजेंडे और प्रोपेगेंडा को उजागर करने के लिए जरूरी है कि उसकी पृष्ठभूमि पर गौर किया जाए और जाना जाए कि अब तक ये संगठन अपनी किन ओछी हरकतों से देश को विभाजित करने की नीतियों पर चलता रहा है और देश का एक तथाकथित पढ़ा-लिखा तबका इसका लगातार अनुसरण करता रहा है।

  • साल 2018 में नसरुद्दीन शाह का मुद्दा जब देश में गर्माया तो इस संस्था ने कुछ दिन बाद उनका इंटरव्यू लिया जिसमें वह अर्बन नक्सलियों के हित के बारे में बात करते नजर आए और उनको गरीबों का रखवाला तक बता दिया।
  • इस वीडियो के जरिए बाद में एमनेस्टी ने गंदा खेल खेला और मानवाधिकारों का हवाला देकर पूरे विश्व को ये बताने की कोशिश की कि भारत में मानवाधिकारों को खतरा है। लोकतंत्र की बात करने वाले जेल में डाले जा रहे हैं और संवैधानिक मूल्यों का कोई पर्याय नहीं रह गया है, इसलिए अब भारत सरकार को बताने की जरूरत है कि उनका ये रवैया नहीं चलेगा।
  • इसके बाद अरुण फेरैरा (Arun Ferreira) की गिरफ्तारी पर भी इस संस्था ने बढ़ चढ़कर हस्तक्षेप किया था। बिना ये तथ्य दिखाए कि उनकी गिरफ्तारी अर्बन नक्सल होने को लेकर नहीं हुई बल्कि भीम कोरेगाँव में हिंसा के संबंध में हुई है।
  • अपने आप को मानवाधिकारों का संरक्षक कहने वाला ये संगठन एफसीआरए के कानूनों के उल्लंघन करने का आरोपित भी करार दिया जा चुका है। जिसके संबंध में पिछले वर्ष अक्टूबर महीने में ईडी ने इनके बंगलुरू दफ्तर पर रेड भी मारी थी।
  • इसके अलावा इस संगठन का एक कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर ब्राहमणों के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने का दोषी भी पाया जा चुका है। और इस संस्था के 2 कर्मचारी यहाँ के माहौल से परेशान होकर आत्महत्या का रास्ता तक अपना चुके हैं।
  • बहुत सी ऐसी रिपोर्ट्स भी मौजूद है, जिसमें यहाँ के प्रबंधक के ख़िलाफ़ शिकायत है कि वो अपने कर्मचारियों को हमेशा दुत्कार के ही बात करता है। जैसे- ‘तुम एकदम बेकार हो’, तुम्हें ये छोड़ देना चाहिए, अगर तुम यहाँ रहे तो तुम्हारी जिंदगी नर्क बन जाएगी।
  • लोगों ने ये भी कहा कि यहाँ होना सम्मान की बात हो सकती है लेकिन यहाँ काम करना बहुत मुश्किल है।
  • इस संस्थान पर बीते दिनों तालिबान से संबंध होने के भी आरोप लगे थे। जहाँ अमनेस्टी इंटरनेश्नल की जेंडर ईकाई की पूर्व मुखिया ने अपने बयान में खुद कहा था कि उन्हें लगता एनमेस्टी इंटरनेशनल मोज्जम बेग के साथ जुड़कर अपने लिए खतरा मोल ले रहा है।

एक ऐसी संस्था जिसका लक्ष्य केवल एक अजेंडे के तहत काम करना है, जिसका उद्देश्य मानवाधिकारों की आड़ में प्रोपेगेंडा साधना है, जिसकी कार्यनीतियों का खुद उसके कर्मचारी खुलासा करते हैं, जिसका तालिबान से संपर्क है, जो सोशल मीडिया पर एक समुदाय के खिलाफ़ माहौल बनाने में जुटा है। वो संस्था जब लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुनी गई सरकार पर, उसके फैसले पर, उसकी कार्यनीतियों पर सवाल उठाती है तो ये बेहद हास्यास्पद लगता है। और ऐसा भी लगता है जैसे कश्मीर मुद्दे को उछालना और नसरुद्दीन शाह की कवरेज करना सब एक खुन्नस है। क्योंकि एक बात तो सबको मालूम है कि नरेंद्र मोदी सरकार की सख्ती के कारण पिछले चार सालों में ऐसे कई एनजीओ हैं, जिन्हें विदेश से मिलने वाले चंदे में 40 फीसद की कमी आई है और कई के तो लाइसेंसों को भी रद्द कर दिया गया है।

कश्मीरी स्टूडेंट रात को महिलाओं के कपड़े पहन कर घूम रहा था, लोगों ने पीटा, IB कर रही है पूछताछ

कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद माहौल शांति पूर्ण बना हुआ है लेकिन वहाँ या वहाँ के लोगों से जुड़ी हर खबर, ध्यान खींचती ज़रूर है। अभी राजस्थान के अलवर में ऐसी घटना हुई, जिसको कई मीडिया समूहों ने अलग रूप देना चाहा। मामला यह है कि अलवर जिले के नीमराणा कस्बे में बीती रात एक कश्मीरी छात्र लड़की के कपड़े पहन कर घूम रहा था। जहाँ स्थानीय लोगों ने उसे बच्चा चोर समझकर पीट दिया।

हालाँकि, बाद में संदेह के आधार पर उसे पुलिस ने हिरासत में ले लिया है। इस तरह से वेश बदलकर कश्मीरी युवक के घूमने को राजस्थान पुलिस ने गंभीरता से लिया है। इधर लड़के की शिकायत पर पीटने वालों के खिलाफ नीमराना थाना पुलिस ने मुकदमा भी दर्ज किया गया है।

महिलाओं के ड्रेस में कश्मीरी स्टूडेंट

अलवर में पिटाई के शिकार हुए कश्मीरी युवक से खुफिया एजेंसियों ने भी पूछताछ की है। केंद्रीय आईबी और राजस्थान आईबी की टीम नीमराणा थाना पहुँची और पूछताछ कर रही है।

उसके इस तरह से लड़कियों के वेश में घूमने से खुफिया और जाँच एजेंसियाँ भी सतर्क हो गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार जम्मू-कश्मीर के बारामुला जिले के सोपोर निवासी मीर फेद पुत्र अब्दुल सलाम मीर नीमराणा के एरोनॉटिक्स कॉलेज में बीटेक फाइनल ईयर का छात्र है और यह छात्र बुधवार की रात करीब 9 बजे लड़की के ड्रेस सूट पजामी दुपट्टा पहनकर कस्बे के मुख्य बाजार मोतीझील में पीएनबी बैंक कृष्णा टावर के आसपास घूम रहा था। वह बाजार स्थित एटीएम में भी गया था।

नीमराणा में रात करीब 9 बजे उसे यूँ टहलता देख, स्थानीय लोगों को शक हुआ। भीड़ में से किसी ने कहा कि यह पुरुष है जबकि महिलाओं जैसा कपड़ा पहना है। तो स्थानीय लोगों ने उसे बच्चा चोर समझकर उसकी जमकर पिटाई कर दी। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कहा जा रहा है, इस दौरान युवक मोबाइल से लोगों को कुछ सफाई में बताता हुआ भी दिखाई दिया, लेकिन भीड़ ने उसकी एक नहीं सुनी।

पिटाई के दौरान ही किसी ने नीमराणा थाना पुलिस को सूचना दे दी। जिसके बाद मौके पर पहुँची पुलिस ने युवक को भीड़ से बचा लिया और कोई बड़ा हादसा होने से टल गया। भीड़ से बचाकर पुलिस कश्मीरी युवक को अपने साथ थाने ले गई और वहाँ उससे पूछताछ की। कॉलेज प्रशासन और छात्रों को बुलाकर भी उनसे 25 साल के कश्मीरी छात्र मीर फेद के बारे में पुलिस ने जानकारी हासिल की।

पुलिस की गिरफ्त में कश्मीरी युवक (फोटो साभार – आज तक )

हालाँकि, अभी तक के बयान में मीडिया रिपोर्ट के ही अनुसार, पुलिस को उसकी बातें झूठी लग रही हैं। वो अलग-अलग तरीके के बयान दे रहा है। पुलिस ने बताया कि पहले तो उसने बताया कि बाजार में घूम रहा था तभी दो लड़के बाइक पर आए और लड़की के कपड़े दिए जिसे उसने पहन लिए। हालाँकि, उसके पास जो स्कार्फ मिला है वो कश्मीरी है। जिससे उसकी बात साफ झूठी लग रही है। अभी तक पूछताछ के दौरान वह ये नहीं बता पाया कि आखिर वह महिलाओं के कपड़े पहनकर क्यों घूम रहा था। इसलिए उस पर शक गहराता जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियाँ उससे पूछताछ कर जल्द ही इस बारे में कोई सूचना देंगी ऐसा कुछ मीडिया रिपोर्टों में कहा जा रहा है।

बाढ़, चमकी बुखार और बेरोज़गार… हर दिन मर्डर और बलात्कार… आखिर ठीके कैसे है नीतीश कुमार?

बिहार में अगले साल विधानसभा चुनाव होना है और इसकी कैंपेनिंग अलग-अलग तरीक़े से अभी से शुरू हो गई है। इन दिनों जेडीयू (जनता दल यूनाइटेड) और आरजेडी (राष्ट्रीय जनता दल) के बीच पोस्टर जंग छिड़ी हुई है। दोनों ही पार्टियाँ जनता को एक ऐसा आइना दिखाने की कोशिश कर रही हैं जिससे वो जनता का ध्यान अपनी और आकर्षित कर सकें। जनता को लुभाने के इस हथकंडे में वो अपनी कोई कोर-कसर बाक़ी नहीं रख छोड़ रहे हैं।

चलिए आगे बढ़ते हैं और बात करते हैं जेडीयू और आरजेडी के उन पोस्टर्स की जिस पर लिखा संदेश चर्चा का विषय बना हुआ है। नीतीश के पोस्टर पर लिखा है, ‘क्यूँ करें विचार, ठीके तो है नीतीश कुमार‘। इसके जवाब में आरजेडी ने अपने पोस्टर में लिखा है, “क्यों न करें विचार, बिहार जो है बीमार।”

सवाल यह है कि आख़िर नीतीश बाबू को बिहार में सब ठीके क्यों लगता है, जबकि सच्चाई यह है कि बिहार की जनता आज भी चौतरफ़ा मार झेलने को मजबूर है। फिर चाहे वो राज्य की क़ानून व्यवस्था हो, स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएँ हों, रोज़गार और शिक्षा हो या हर साल बाढ़ से ढह जाने वाला जीवन हो।

क़ानून-व्यवस्था की पोल खोलते आँकड़े

सबसे पहले बात करते हैं बिहार की क़ानून-व्यवस्था की, जिसमें लूट, हत्या, डकैती और अपहरण जैसे संगीन अपराधों को अंजाम दिया जाना शामिल है। इन सभी वारदातों पर विराम लगाने का ज़िम्मा पुलिस प्रशासन के सिर होता है। जून 2019 में न्यूज-18 में छपी एक ख़बर के अनुसार, बिहार की 54% जनता का कहना है कि पुलिस ख़ुद भ्रष्टाचार में लिप्त होती है, जबकि 34% जनता का मानना है कि पुलिस ख़ुद क़ानून-व्यवस्था का उल्लंघन करती है और एक पक्षपाती भूमिका निभाती है। बिहार की एक बड़ी संख्या (लगभग 77% जनता) यह मानती है कि राजनीतिक दल पुलिस के कामकाज में हस्तक्षेप करते हैं। इन सब कारणों से यह पता चलता है कि बिहार की जनता को क़ानून-व्यवस्था पर बहुत कम या न के बराबर भरोसा है।

बिहार पुलिस के आँकड़े

जनता कभी सरकार से उब कर, तो कभी राजनीतिक कारणों से झूठ भी बोल सकती है। लेकिन आँकड़े झूठ नहीं बोलते हैं, वो भी सरकारी आँकड़ें! बिहार पुलिस का आँकड़ा कहता है कि जनवरी 2019 से मई 2019 तक 1277 हत्याएँ, 605 बलात्कार, 3001 दंगे, 4589 अपहरण जैसे संगीन जुर्म इस राज्य में हुए (हुए शायद ज्यादा होंगे!) और जो आधिकारिक तौर पर दर्ज किए गए।

10वीं के बाद पढ़ाई छोड़ने में नंबर-1 है बिहार

चलिए, अब शिक्षा की बात करते हैं, जिसके आँकड़े कुछ इस तरह हैं। दिसंबर 2018 में हिन्दुस्तान में छपी ख़बर के अनुसार, 10वीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ने वाले छात्रों में बिहार और झारखंड सबसे आगे है। इस ख़बर में यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फ़ॉर एजुकेशन (U-DIS) से मिले वर्ष 2014-15 से लेकर 2016-17 तक के आंकड़ों का ख़ुलासा किया गया था। आँकड़े के अनुसार, 2014-15 में माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने वाले छात्र-छात्राओं का प्रतिशत 25% रहा।

वहीं, 2016-17 के दौरान यह आँकड़ा बढ़कर 39.73% हो गया। ख़बर में छात्राओं के स्कूल छोड़ने के पीछे मुख्य वजह शौचालय का अभाव बताई गई थी। इससे पता चलता है कि बिहार में शिक्षा के स्तर पर कुछ ठीक नहीं है, फिर भी नीतीश बाबू का कहना है कि सब ठीके तो है…

हर साल आती है बाढ़, लेकिन नहीं होता कोई पुख़्ता इंतज़ाम

बिहार में बाढ़ की समस्या हर साल की है। हालिया सन्दर्भ की बात करें तो राज्य के क़रीब 12 ज़िले बाढ़ से बेहाल रहे। इन ज़िलों में लगभग 50 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हुए। इन ज़िलों में  शिवहर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, पूर्वी चंपारण, मधुबनी, दरभंगा, सहरसा, सुपौल, किशनगंज, अररिया, पूर्णिया के हालात बेहद ख़राब रहे। कहने को तो साल 1980 में बाढ़ नियंत्रण बोर्ड बनाया गया था, लेकिन आज तक बाढ़ से निपटने का पुख़्ता इंतज़ाम वाला ऐसा कोई सिस्टम नहीं बनाया गया जिससे राज्य की जनता को बाढ़ से बचाया जा सके।

सरकारी मिशनरी इस आपदा से अनजान नहीं थी, इसलिए आदेश तो निकाले लेकिन राहत-बचाव की कोई तैयारी नहीं की। आपदा प्रबंधन विभाग ने 3 मई 2019 को बिहार के सभी जिलाधिकारियों को एक पत्र भेजा था। यह पत्र हर साल अप्रैल के अंत या मई की शुरुआत में जारी होता है और जून के आख़िर तक इसमें दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन करना होता है। इनमें कंट्रोल रूम बनाना, नावों का इंतज़ाम, गोताखोरों की बहाली, राहत केंद्र के लिए जगह, राशन, दवा, मोबाइल टीम, तटबंधों की सुरक्षा सुनिश्चित करना वगैरह जैसे काम शामिल होते हैं। सवाल यह है कि अगर दिशा-निर्देशों के तहत काम किया गया होता तो बाढ़ से जो ज़िंदगियाँ तबाह हुईं उन्हें बचाया जा सकता था।

हर साल की तरह इस साल भी बिहार में आई बाढ़ से कई ज़िले बुरी तरह से प्रभावित हुए। यह बेहद दु:खद है कि इस विकट समस्या से निपटने के लिए राज्य के पास अब तक कोई ठोस आपदा प्रबंधन प्रणाली नहीं है, फिर भी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लगता है कि बिहार में सब ठीके तो है!

चमकी बुखार ने ली 200 बच्चों की जान, नीतीश बाबू बाँट रहे थे आम

बिहार की स्वास्थ्य सुविधाएँ कितनी दुरुस्त हैं इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि राज्य में एक्यूट एंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES) यानी चमकी बुखार के प्रकोप से क़रीब 200 बच्चों ने अपनी जान गँवा दी। जहाँ एक तरफ बच्चों पर चमकी का क़हर जारी था, तो वहीं दूसरी तरफ़ मुख्यमंत्री साहब विधानसभा में आम के पौधे बाँट रहे थे। चमकी बुखार के इंतज़ाम पर फेल हो चुकी सरकार ऐसी स्थिति में नहीं थी कि वो कोई स्पष्टीकरण दे पाती। सूबे के मुखिया नीतीश कुमार ख़ुद इस स्थिति में भी नहीं थे कि वो इस समस्या पर एक पत्रकार के सीधे से सवाल का जवाब दे पाते। 

हद तो तब पार हो गई जब बिहार के अस्पताल में पीड़ित बच्चों की संख्या इस क़दर बढ़ गई कि उनके इलाज के लिए बेड की कमी पड़ गई और एक ही बेड पर दो बच्चों को लिटाना पड़ा। श्रीराम कृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड अस्पताल के सुपरिटेंडेंट ने इस बात की पुष्टि की थी कि अस्पताल के हर विभाग में डॉक्टर्स की भी कमी है।

इस कमी को पूरा करने के लिए किसी तरह का कोई ठोस क़दम नहीं उठाया गया, यदि उठाया गया होता तो इतने मासूमों की जान न जाती। अच्छा होता यदि इस बीमारी को रोकने के लिए प्राथमिकी स्वास्थ्य केंद्र के स्तर पर स्वास्थ्य प्रणाली को विकसित किया गया होता।

घर-द्वार छोड़, विदेश तक जाने को मजबूर हैं बेरोज़गार

आइए अब बात कर लेते हैं राज्य में फैली बेरोज़गारी की। हिंदुस्तान की ख़बर में सेंटर फॉर मॉनेटरिंग इंडियन इकोनॉमी के सर्वे का ज़िक्र करते हुए लिखा गया कि बिहार में बेरोज़गारी दर वर्तमान में 8% से भी ज़्यादा है।

ग़ौरतलब है कि विदेश मंत्रालय कम पढ़े-लिखे कामगारों को देश से बाहर जाने पर इमिग्रेशन देता है। इनमें वही लोग शामिल होते हैं, जिनके पास रोज़गार नहीं होता। अपने ही राज्य में रोज़गार न मिल पाने से मजबूर लोग रोज़गार के लिए अपना घर-द्वार छोड़कर विदेश जाने का रुख़ करते हैं। 2018 में बिहार के 42 हज़ार से अधिक कामगारों को इमिग्रेशन दिया गया। इनमें से 8,600 लोग इमिग्रेशन लेकर विदेश गए। गोपालगंज से 8300, पश्चिमी चम्पारण से 3,000, पटना से 3,600, सारण से 1,600, मुजफ़्फरपुर से 1,500, मधुबनी से 1,900 और दरभंगा से 1,500 कामगार लोगों को इमिग्रेशन दिया गया। 

गली-मौहल्ले में ‘सब ठीके है’ के मात्र पोस्टर लगा देने से ही सब ठीक नहीं हो जाता सुशासन बाबू! अच्छा होता कि आप इस ‘सब ठीके है’ के भ्रमजाल से बाहर निकल आते और राज्य की असली तस्वीर से रुबरू होते। साथ ही अपने अंतर्मन में झाँककर इस सवाल का जवाब तलाशते कि बिहार की जनता आख़िर आपका विकल्प क्यों न तलाशे?

चिदंबरम जाएँगे तिहाड़, जज ने नहीं दी राहत

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने ईडी की कस्टडी में पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया। जिसके बाद अब सीबीआई की हिरासत में मौजूद पूर्व वित्त एवं गृह मंत्री की गुरुवार को रात तिहाड़ जेल या फिर दिल्ली पुलिस के लॉकअप में कटने के कयास लगाए जा रहे थे। जिस पर अब फैसला आ गया राउज एवेन्यू कोर्ट (Rouse Avenue court) ने 19 सितम्बर तक के लिए उन्हें जुडिशल कस्टडी में भेज दिया है।

इससे पहले मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कॉन्ग्रेस नेता पी. चिदंबरम की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज करते हुए कहा, “आमतौर पर आर्थिक अपराधों में अग्रिम जमानत नहीं दी जाती है। तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान रखते हुए यह केस अग्रिम जमानत के लिए उपयुक्त नहीं है।”

फिलहाल अभी जो मौजूदा स्थिति है उसमें अगर चिदंबरम की सीबीआई कस्टडी नहीं बढ़ती और ईडी उन्हें गिरफ्तार कर लेती है तो वह तुगलक रोड पुलिस स्टेशन में रहेंगे, जहाँ कॉन्ग्रेस के एक और दिग्गज नेता डी. के. शिवकुमार पहले से ही मौजूद हैं।

बता दें कि सीबीआई ने कॉन्ग्रेस नेता पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम को राउज एवेन्यू कोर्ट में पेश किया, इस बीच चिदंबरम के वकील कपिल सिब्बल ने अदालत से कहा कि उनके मुवक्किल ईडी के सामने सरेंडर करने के लिए तैयार हैं और उनके मुवक्किल को न्यायिक हिरासत में नहीं भेजा जाना चाहिए।

चिदंबरम की तरफ से उनके वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट से कहा, “जहाँ तक सीबीआई की बात है तो पी. चिदंबरम को न्यायिक हिरासत में क्यों भेजा जाना चाहिए? सीबीआई सभी सवाल पूछ लिए हैं। चिदंबरम ईडी की कस्टडी में जाना चाहते हैं तो उन्हें न्यायिक हिरासत में नहीं भेजा जाना चाहिए।”

बता दें कि अगर कोर्ट चिदंबरम को न्यायिक हिरासत में भेजता है तो उन्हें तिहाड़ सेंट्रल जेल भेजा जाएगा। यहाँ गौर करने लायक बात यह भी है कि चिदंबरम खुद भी तिहाड़ नहीं जाना चाहते इसके लिए उनके वकील कपिल सिब्बल पहले भी एड़ी-चोटी का जोर लगा चुके हैं। लेकिन अब अदालत ने उन्हें 19 सितम्बर तक के लिए जुडिशल कस्टडी में भेजकर उनके तिहाड़ जाने का रास्ता साफ कर दिया है। अब उन्हें 19 सितम्बर तक तिहाड़ में ही रहना होगा।