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बाज नहीं आया पाक: 2017 में शीशे के स्क्रीन का पर्दा, काउंसलर एक्सेस के दौरान भी जाधव पर बिठाया पहरा

इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (आईसीजे) के आदेश से बॅंधे पाकिस्तान ने मजबूरी में कुलभूषण जाधव तक राजनयिक पहुॅंच की इजाजत तो दी, लेकिन अपनी हरकतों से बाज नहीं आया। दिसंबर 2017 में जब उसने जाधव की पत्नी और मॉं को उनसे मिलने की इजाजत दी थी, तब मुलाकात शीशे के स्क्रीन के पीछे से कराई गई थी। अब इस्लामाबाद में भारत के उप उच्चायुक्त गौरव अहलूवालिया से उनकी मुलाकात के दौरान भी उसने इसी तरह के पैंतरे दिखाए।

पहले तो आखिरी क्षणों में उसने मुलाकात की जगह बदल दी। फिर अपने अधिकारियों को तैनात रखा ताकि जाधव अपनी बात भारतीय अधिकारी को नहीं बता सके। कुछ मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि उसने सीसीटीवी कैमरे में पूरी मुलाकात रिकॉर्ड की। नतीजतन, जाधव बेहद दबाव महसूस कर रहे थे और वे गलत बयानी को मजबूर थे।

जाधव 2016 से पाकिस्तान की जेल में बंद हैं। भारतीय नौसेना के इस पूर्व अधिकारी को उसने ईरान से अगवा किया था जहॉं वे कारोबार के सिलसिले में गए थे। बाद में उसने जासूसी का आरोप लगाते हुए उन्हें मौत की सजा सुनाई। इसके खिलाफ भारत ने आईसीजे का दरवाजा खटखटाया था। इंटरनेशनल कोर्ट ने भारत की दलीलों को मानते हुए मौत की सजा की तामील पर रोक लगा रखी है। कोर्ट ने उन तक राजनयिक पहुॅंच के आदेश भी दिए थे।

इस मुद्दे पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा,

“अभी हमें विस्तृत रिपोर्ट का इंतज़ार है। यह स्पष्ट है कि कुलभूषण जाधव भारी दबाव में थे और उन्हें वही कहने को मजबूर होना पड़ रहा था, जिससे पाकिस्तान के फर्ज़ी दावों को मज़बूती मिले। राजनयिक से पूरी रिपोर्ट मिलने के बाद हम आगे की योजना पर फ़ैसला लेंगे।”

उन्होंने कहा कि इस मुलाक़ात के बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जाधव की मां को घटनाक्रम की जानकारी दी है। उन्होंने कहा, सरकार जाधव को जल्द से जल्द इंसाफ दिलाने और सुरक्षित भारत वापसी के लिए प्रतिबद्ध है और इस दिशा में लगातार काम कर रही है।

गिरफ्तारी के बाद सोमवार को हुई मुलाकात जाधव तक भारत की पहली राजनयिक पहुॅंच थी। भारत ने कहा है कि आईसीजे के प्रावधानों के मद्देनजर इस दौरान पाकिस्तान के किसी भी अधिकारी की मौजूदगी नहीं होनी चाहिए थी।

वहीं, पाकिस्तान के विदेश कार्यालय ने एक बयान में कहा है कि जाधव और अहलूवालिया की मुलाकात करीब दो घंटे तक चली। राजनयिक पहुंच पाकिस्तान सरकार के अधिकारियों की मौजूदगी में उपलब्ध कराई गई। बयान में यह नहीं बताया गया है कि मुलाकात कहॉं कराई गई। हालॉंकि पाकिस्तानी मीडिया ने खबर दी है कि यह इस्लामाबाद के एक उप जेल में हुई थी।

सेना पर हमले के लिए PAK ने बनाया 7 लश्कर आतंकियों का दस्ता, घुसपैठ करते 2 पकड़े गए

जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 को निरस्त किए जाने के बाद पाकिस्तान लगातार घाटी में हिंसा भड़काने की कोशिश कर रहा है। मगर भारतीय सुरक्षा बल भी अलर्ट हैं। जानकारी के मुताबिक, कश्मीर में घुसपैठ की कोशिश कर रहे 2 पाक आतंकी पकड़े गए हैं। सेना के अधिकारियों ने सोमवार (सितंबर 2, 2019) को दोनों आतंकियों के पकड़े जाने की सूचना दी।

बता दें कि, जिन दो आतंकियों को गिरफ्तार किया गया है उनके नाम नाजिम खोखर (25) और खलील अहमद (36) है। इन्हें पिछले हफ्ते गुलमर्ग के पास से गिरफ्तार किया गया है। दोनों ही आतंकियों से पूछताछ की जा रही है। 

दोनों आतंकियों ने जाँच एजेंसियों को बताया है कि उन्हें लश्कर के खचरबन और कोटली कैंप में आतंकी हमले की ट्रेनिंग दी गई थी। आतंकी खलील अहमद और नाजिम खोखर ने कबूल किया है कि रावलपिंडी में पाकिस्तानी सेना के मुख्यालय में उनकी मुलाकात पाक सेना के कुछ बड़े अधिकारियों से कराई गई थी। इसके बाद कश्मीर में हमले के लिए 7 लश्कर आतंकियों के ग्रुप को तैयार किया गया। इनमें 3 अफगानी मूल के भी आतंकी हैं। इन्हें घाटी में सुरक्षा बलों पर हमले के लिए तैयार किया गया है।

गौरतलब है कि, जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक के सलाहकार फारूक खान ने रविवार (सितंबर 1, 2019) को जम्मू में पत्रकारों से बात करते हुए बताया था कि घाटी में सक्रिय आतंकियों की संख्या पहले से काफी कम हो गई है। उन्होंने बताया था कि कभी घाटी में हजारों की संख्या में सक्रिय रहने वाले आतंकियों की संख्या घटकर महज 150 से 200 के बीच रह गई है। इसके साथ ही उन्होंने आतंकियों को चेतावनी देते हुए कहा था कि आतंकियों को या तो जेल या फिर कड़ी सजा झेलने के लिए तैयार रहना पड़ेगा।

मोहम्मद शमी हो सकते हैं गिरफ्ताार, BCCI ने कहा- चार्जशीट देख होगी कार्रवाई

भारतीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी के खिलाफ पत्नी हसीन जहॉं के साथ घरेलू हिंसा करने के आरोप में सोमवार को अरेस्ट वारंट जारी हुआ। वारंट पश्चिम बंगाल के अलीपुर कोर्ट ने जारी किया है। शमी के अलावा उनके भाई हसीद अहमद के खिलाफ भी वारंट जारी हुआ है। सरेंडर करने के लिए कोर्ट ने 15 दिन का समय दिया है। ऐसा नहीं करने पर दोनों गिरफ्तार हो सकते हैं।

शमी फिलहाल भारतीय टीम के साथ वेस्टइंडीज दौरे पर हैं। बीसीसीआई ने साफ़ कर दिया है कि उनके ख़िलाफ़ तब तक कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी जब तक वे चार्जशीट नहीं देख लेते। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो बीसीसीआई के एक अधिकारी ने कहा है कि अभी कोई कार्रवाई करना जल्दबाजी होगी। मामले में चार्जशीट देखने के बाद ही वह कुछ फैसला ले पाएँगे।

अधिकारी के मुताबिक, “हम समझते हैं कि गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है। लेकिन हमें नहीं लगता कि अभी इस मामले में दखल देने की जरूरत है। एक बार हम चार्जशीट देख लें तब हम तय करेंगे कि क्या बीसीसीआई के संविधान के अनुसार कोई ऐक्शन लेने की जरूरत है। लेकिन इस समय तो कह सकते हैं कि कुछ भी करना जल्दबाजी होगी।’ “

2018 में दर्ज हुआ था मामला

उल्लेखनीय है कि पिछले साल 2018 में शमी की पत्नी ने उनके ऊपर मारपीट, रेप, हत्या की कोशिश, घरेलू हिंसा और दूसरी औरतों से अवैध संबंध जैसे कई गंभीर आरोप लगाए थे। इसके आधार पर शमी व उनके भाई के खिलाफ आइपीसी की धारा 498 ए (दहेज उत्पीड़न) के तहत मामला दर्ज किया गया था।

इस मामले में बीते मार्च में चार्जशीट दाखिल हुई थी। जिसपर कोर्ट में सुनवाई चल रही थी। लेकिन पेश नहीं होने के कारण कोर्ट ने गिरफ्तारी वारंट जारी किया है।

2.5 बिहारियों के मंतर से सुतली के भाव एटम बम… फ्री हूर का जंतर भी फुस्स

मैं समय हूॅं। जिन्ना के जमूरों की कहानी सुनाने जा रहा हूॅं। ये कथा मेरे सिवाय कोई सुना नहीं सकता। क्योंकि मैं ही बिहारी हूॅं। यह कथा मियॉं मुशर्रफ से लेकर इमरान तक की है। एटम बम के सुतली बम के भाव गिरने की है।

यह कथा 2.5 बिहारियों की भी है, जिनके मंतर से जमूरों के हाथ कटोरा आया। 1.5 ने तो ‘आतंक के अन्नदाता’ की उनके ही घर लैंड कर लंका लगाई। 1 ने वाया-मार्फत मंतर भेजा, क्योंकि विरोधी कहते हैं उसके आँत में दॉंत है। तीनों के पराक्रम से आज एटम बम पाव, आधा पाव का हो चुका है।

एटम बम का नाम सुन देह सिहर गया। पर उन 2.5 देह का सोचिए जिनसे एटम बम सिहर गया। बत्ती नहीं जली। पर्दा उठाता हूॅं परिचय कराता हूॅं। एक बिहारी अपने लालू, दूसरे सुशासन वाले नीतीशे कुमार और आधे मौसम विज्ञानी रामविलास, जिनके बंगले मने लोजपा का चुनाव निशान में ही सत्ता की चाबी रहती है।

परिचय हो गया तो कथा 16 बरस पीछे ले चलता हूॅं। 2003 का साल। महीना अगस्त। तब लालू आईआईएम- हार्वर्ड मास्टरी करने नहीं गए थे। रामविलास नाखून कटा शहीद ही हुए थे। 1.5 बिहारी की इस जुगल जोड़ी को मियॉं परवेज मुशर्रफ ने घर बुलाया। मियॉं साहेब चच्चा सैम के कम होते खैरात से दुबले थे।

1.5 बिहारी ने मौका लपक मियॉं साहेब का कान फूॅंक दिया। धीरे-धीरे आउ-माउ-चाउ मॉडल आया। तेजी से मियाँ साहब रुखसत हो गए। इधर, सुशासन आया और चच्चा सैम का खुला बाजार लाने वाले के कैबिनेट में 1.5 इन थे। खान साहेब के आते-आते आतंक का अन्नदाता समझ चुका था कि आउ-माउ-चाउ में चच्चा बला बॉंटने का जिगरा नहीं है। इधर, सुशासन में विदेशी बिजनेस मॉडल परचम लहरा शटर गिरा चुका था।

इस मॉडल की खोज सुशासन की जोत पहली बार जगने से हुई। चौक-चौक पर ठेका सजा। सवा रुपए का भॉंग पचाने वालों पर विदेशी जादू करने आई। लेकिन, जेब अठन्नी-चवन्नी से भरे थे और विदेशी भाव गिराने को तैयार नहीं। सो सुशासन की किरपा से ‘ठेकादारों’ ने नया नुस्खा खोजा। पव्वा का सील टूटा और 5-10 के भाव बूॅंदों में बिकने लगी विदेशी। वो भी ऐसी चढ़ती कि पूछिए मत जनाब!

फिर बहार आई। विदेशी बंद हो गई। ठेकादार भी सुशासन का बिजनेस मॉडल ले गिरिराज मेल पर सवार हो पाकिस्तान पहुॅंच गए, जहॉं कटोरा में चवन्नी गिराने वाले कद्रदान भी न थे। ठेकादारों से खान साहब को सुशासन का विदेशी बेचो फॉर्मूला हाथ लगा। खान साहेब को पहली बीवी विदेशी लाने का अनुभव भी था। इसलिए फॉर्मूला चोखा लगा।

लेकिन, बेचने को कुछ न था। आखिर में गोदाम से एटम बम निकला। खान साहेब चिल्लाए एटम बम मार दूॅंगा। भाव न चढ़ा। छुक-छुक करते रेल वाले शेख साहेब आए। अंडा और करंट खाकर शेख साहेब ने मुनादी की- हमने एटम बम काट लिया। छोटे-छोटे। पाव-आधा पाव के।

खान साहेब ने भी ताव खाया। टोकरी में सजाए एटम बम। बीच बाजार खड़े हुए। आवाज लगाई ले लो…एटम बम। 5 का 2 ले लो। पाव भर ले लो…आधा पाव ले लो। लाल-नीले-हरे ले लो। लेकिन, सुतली के भाव आया चीनी बाग के एटम बम का बाजार न चढ़ा। कब फुस्स हो जाए चीनी भी न जाने!

खान साहेब ऑफर लाए। बाय एटम बम गेट हूर फ्री। वही हूर जिसे पाने की लबलबाहट में लौंडे खुद को उड़ा लेते हैं। तब भी भाव ना चढ़ा। खान साहेब ने नया पासा फेंका। भाजी में टिमाटर के बदले ही डाल लेना। वैसे भी अब कबाब कहॉं नसीब। भाजी बनाने के लिए हूर तो पहले से ही फ्री दे रहा हूॅं। लेकिन, लौंडे न आएँ।

इधर, सुशासन का नया फॉर्मूला आ गया “क्यूँ करें विचार, ठीके तो है नीतीश कुमार।” उधर, 2.5 कॉकटेल के असर से जिहाद भड़ाम और हूर के ख्वाब भी दूभर। थक हार खान साहेब भी बोले- हम से न हो पाएगा।

कहते हैं एक बिहारी सौ पर भारी। कहते तो यह भी हैं कि तीन तिगाड़ा, काम बिगाड़ा। यहॉं तो 2.5 ही 20 करोड़ पर भारी पड़े। अब मैग्सेसे वाले बिहारी चाहे तो अपने 2.5 बंधु-बांधव के इस पराक्रम पर स्क्रीन काली कर लें। मैं तो अपनी गति में हूॅं, सो कथा को पूर्णविराम लगाता हूॅं।

हमारे पास आधा पाव से लेकर 1 पाव तक के परमाणु बम: करंट लगने के बाद पाक मंत्री का नया बयान

पाकिस्तान के रेल मंत्री शेख रशीद अहमद लगातार अपनी ही फौज और देश का मज़ाक बनवा रहे हैं। अब वह परमाणु बम का आकार मापने में भी लग गए हैं। उन्होंने दावा किया है कि पाकिस्तान के पास आधा पाव से लेकर एक पाव तक के एटम बम हैं। शेख रशीद ने 125 ग्राम से लेकर 250 ग्राम तक के वजन वाले एटम बेम होने की बात कही। हाल ही में उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान की फ़ौज ने अपनी तैयारियों की घोषणा करने के लिए उन्हें रखा हुआ है।

ये वही मंत्री हैं, जिन्हें मोदी का नाम लेते ही करंट लगा था। जम्मू कश्मीर के लोगों के साथ कथित एकता दिखाने के लिए आयोजित कार्यक्रम में जैसे ही उन्होंने पीएम मोदी को कोसना शुरू किया, उन्हें माइक से जोरदार करंट का झटका लगा। पाकिस्तानी मंत्री ने पंजाब के नानकाना साहिब में बोलते हुए गर्व से बताया कि जम्मू कश्मीर पर भारत के निर्णय के बाद पाकिस्तान ने पड़ोसी देश के साथ सारी बातचीत रोक दी है।

उधर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा है कि अगर युद्ध हुआ तो पाकिस्तान पहले परमाणु बम का प्रयोग नहीं करेगा। लगातार आ रही युद्ध की धमकियों के बीच पाकिस्तान के नेता एक से बढ़ कर एक बयान दे रहे हैं।

पूर्व पाकिस्तानी उच्चायुक्त ने की ‘कश्मीरी’ पोर्न स्टार की फोटो रीट्वीट, जॉनी सीन्स को बताया पेलेट गन्स पीड़ित

पाकिस्तान की जनता से लेकर उसके मंत्री और अधिकारी अपनी अर्थव्यवस्था, नान-रोटी और ‘टिमाटर’ के भाव तय करने के बजाय कश्मीर मुद्दे पर सक्रीय भूमिका निभा रहे हैं। सोशल मीडिया पर भारत के ट्विटर यूज़र्स भी पाकिस्तान के मजे लेने से पीछे नहीं हट रहे हैं। सोशल मीडिया पूरी तरह से कॉमेडी सर्कस बनकर रह गया है जहाँ तमाम लोग पकिस्तान पर चुटकुले बना रहे हैं और हँस भी रहे हैं। इस बार ट्विटर यूजर्स के जाल में फँसे हैं भारत में पाकिस्तान के पूर्व उच्चायुक्त अब्दुल बासित।

दरअसल, ट्विटर पर अब्दुल बासित ने एक ऐसा ट्वीट रीट्वीट किया है, जिसमें एक अडल्ट फिल्म कलाकार के स्क्रीनशॉट को कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद वहाँ की पीड़ित जनता बताकर दिखाया जा रहा है।

भारत में पाकिस्तान के पूर्व उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने ट्विटर पर शेयर की जा रही तस्वीरों को कश्मीर में पेलेट गन्स से पीड़ित लोगों की तस्वीर समझकर रीट्वीट किया। जबकि इस तरह की तस्वीरें आजकल सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के लोगों का मजाक बनाने के लिए ट्विटर यूजर्स इस्तेमाल कर रहे हैं।

अब्दुल बासित द्वारा रीट्वीट की गई तस्वीरों में पोर्न स्टार जॉनी सीन्स की तस्वीरें दिखाई गई हैं, जो कि बिना किसी शक के कश्मीरी नागरिक नहीं है। इस तस्वीर में दिखाया गया है कि यूसुफ़ अनंतनाग का रहने वाला है, जिसकी आँखों की रौशनी पेलेट गन्स की वजह से चली गई।

पाकिस्तान भारत को कश्मीर मुद्दे पर दुनिया के सामने घेरने के लिए हर तरह के प्रयास कर रहा है। हालाँकि, वह लगातार इस प्रयास में असफल हो रहा है और बदले में उसे विश्वस्तर पर इसके लिए जलील भी किया जा रहा है।

ये वही अब्दुल बासित हैं जिन्होंने हाल ही में एक विवादास्पद बयान में कहा है कि 2016 में आतंकी बुरहान वानी की हत्या के बाद उन्होंने प्रख्यात सोशलाइट-कॉलमनिस्ट शोभा डे से जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह के पक्ष में वकालत करवाई। हालाँकि, शोभा डे ने इस दावे का खंडन किया है।

BBC का नया ज़हर: रोहिग्याओं की तरह प्रवासी भारतीयों को भगाने का सपना देख रहे हैं वुसतुल्लाह

बीबीसी ने एक लेख प्रकाशित किया है। इस लेख को वुसतुल्लाह ख़ान ने लिखा है। ख़ान भारतीयों को धमकी दे रहे हैं। बीबीसी हमें धमका रही है। बीबीसी कह रही है कि अगर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बॉरिस जॉनसन अपने देश में रह रहे सभी भारतीयों को बोरिया-बिस्तर समेटने का आदेश दे दें तो क्या होगा? इसी तरह कनाडा और अमेरिका में भी किया जाए तो क्या होगा? रोहिंग्या घुसपैठियों के प्रति सहानुभूति जताते हुए बीबीसी लिखता है कि भारतीयों को भी विदेशों से निकाला जा सकता है।

हालाँकि, बीबीसी यहाँ रोहिंग्या घुसपैठियों और प्रवासी भारतीयों की तुलना करते समय इस बात को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर देता है कि भारतीय नागरिक जहाँ भी रहते हैं, वहाँ की अर्थव्यवस्था में अहम योगदान देते हैं। वे आतंकवादी नहीं बनते। एक प्रकार से वुसतुल्लाह ख़ान बीबीसी के मध्य से ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बॉरिस जॉनसन, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और कनाडा के राष्ट्रपति जस्टिन ट्रुडो को यह आईडिया दे रहे हैं कि प्रवासी भारतीयों को निकाल बाहर किया जाए।

यह इतना आसान है क्या? आइए, देखते हैं। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में 30 लाख के क़रीब भारतीय मूल के लोग रहते हैं। भारतीय कम्पनियाँ अमेरिका की जीडीपी में सालाना 57 बिलियन डॉलर से भी अधिक का योगदान देती हैं। अमेरिका में रहने वाले भारतीयों की हाउसहोल्ड इनकम सभी प्रवासियों में सबसे ज्यादा है। इसके अलावा वे सबसे ज्यादा व्यापार-पसंद भी हैं। गूगल, फेसबुक, ओरेकल, एडोबी, सॉफ्टबैंक, कॉग्निजेंट और मास्टरकार्ड सहित कई बड़ी कंपनियों में सर्वोच्च पदों पर भारतीय काबिज हैं।

क्या बीबीसी की बातों में आकर डोनाल्ड ट्रम्प सत्य नडेला और सुन्दर पिचाई को यूएस से निकाल देंगे क्या? कोई भी देश सबसे ज्यादा आय वाले प्रवासी समाज, जो उस देश की जीडीपी में अहम योगदान दे रहा है, उसे निकाल सकता है क्या? अमेरिका में भारतीय सभी प्रवासी व एथनिक समूहों में सबसे ज्यादा शिक्षित हैं। वुसतुल्लाह ने सस्ता नशा कर के अमेरिका में रहने वाले भारतीयों की उन रोहिंग्याओं से तुलना की है, जिनमें से कई आए दिन चोरी-डकैती से लेकर अन्य वारदातों में पुलिस के हत्थे चढ़ते रहते हैं।

यहाँ तक कि ख़ुद बीबीसी का अपना देश ब्रिटेन उसकी बात को नहीं मानेगा। बॉरिस जॉनसन ने वो सस्ता नशा नहीं किया है, जो बीबीसी के अधिकतर पत्रकार कर के आर्टिकल लिखने बैठते हैं। उर्दू वाले जम्मू कश्मीर को लेकर झूठी ख़बरें चलाते हैं, हिंदी वाले प्रवासी भारतीयों को धमकाते हैं। 15 लाख के क़रीब भारतीय रहते हैं ब्रिटेन में, जो राजनीति से लेकर मनोरंजन इंडस्ट्री तक में सक्रिय हैं। वे चोरी-डकैती नहीं करते, आतंक नहीं फैलाते। ब्रिटेन में भारतीय सबसे कम ग़रीबी दर वाले एथनिक समाज हैं।

जहाँ यूके में रोज़गार दर 74% है, वहाँ रहने वाला भारतीय समाज 73% रोज़गार दर के साथ कड़ी टक्कर देते हुए दिखता है। मीडियन टोटल संपत्ति की बात करें तो वाइट ब्रिटिशर्स के बाद प्रवासी भारतीय ही आते हैं। बीबीसी के इस भ्रामक लेख को देख कर तो यही लगता है कि इन्हें यही नहीं पता कि इनके देश की जीडीपी में भारतीयों का क्या योगदान है? इसी तरह कनाडा की भी बात की गई है। बीबीसी को यह बता देना ज़रूरी है कि 2015 में जब कनाडा में जब जस्टिन ट्रुडो की सरकार बनी थी, तो 4 सिख मंत्रियों ने शपथ ली थी।

जहाँ के 4 अहम मंत्रालय भारतीय मूल के लोग सँभाल रहे हों, वहाँ से भारतीयों को निकालने वाली बात या तो बीबीसी जैसा प्रोपेगंडाबाज पत्रकार ही कर सकता है और नहीं तो वुसतुल्लाह ख़ान जैसा कोई ऐसा व्यक्ति, जो भारतीयों से घृणा करता हो, भारतीयों के प्रति गन्दी सोच रखता हो। जिस देश की सत्ता भारतीय चला रहे हों, उस देश से भारतीयों को निकालोगे! वाह! अव्वल तो यह कि बीबीसी पूछता है कि ऐसी स्थिति में गृहमंत्री अमित शाह क्या करेंगे?

पहली बात तो यह कि ऐसी स्थिति आ ही नहीं सकती। ऊपर से अगर विदेश में रह रहे भारतीयों पर कोई आँच आती भी है तो भारत सरकार किस प्रकार का एक्शन लेती है, सुषमा स्वराज के मंत्रित्वकाल में हमने देखा है। उससे पहले भी जब ऐसी कोई भी दिक्कत आई, भारत सरकार ने कुवैत से लेकर यमन तक हस्तक्षेप किया है। अब आपको इस आर्टिकल की एक ऐसी बात बताते हैं, जिसकी चर्चा हमने अब तक इसीलिए नहीं की क्योंकि पहले हम डेटा के माध्यम से बीबीसी को जवाब देना चाहते हैं।

बीबीसी ने अपनी बात साबित करने के लिए बेहूदा उदाहरण लिया है। युगांडा का उदाहरण लेकर दिखाया गया है कि वहाँ से भारतीयों को निकाल दिया गया था और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी कुछ नहीं कर पाई थीं। लेकिन, बीबीसी ने इस कार्य को अंजाम देने वाले जिस सनकी तानाशाह का जिक्र किया है, उसे ‘युगांडा का कसाई’ भी कहते हैं। जी हाँ, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की पूर्ण बहुमत से चुनी गई सरकार द्वारा लिए गए निर्णय की तुलना अफ्रीका के एक ख़ूनी तानाशाह से की गई है।

क्या मोदी सरकार द्वारा लिया गया निर्णय ‘युगांडा के तानाशाह कसाई’ के निर्णय से मेल खता है? बीबीसी के पूरे लेख का सार यही है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ और मानवाधिकार संगठनों की मानें तो ईदी अमीन ने अपने कार्यकाल में 5 लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिया। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। मोदी सरकार जो भी अहम निर्णय ले रही है, वे सभी पार्टी के चुनावी घोषणापत्र में शामिल थे। भाजपा ने अप्रैल 2018 में लोकसंभा चुनाव से एक वर्ष पहले ही ऐलान किया था कि फेज के आधार पर पूरे भारत में एनआरसी लागू की जाएगी।

कुछ भी चोरी-छिपे नहीं हुआ है। घोषणापत्र से लेकर चुनावी भाषणों तक में जनता का मैंडेट लेकर तब निर्णय लिए गए। ऐसे में भी अगर विश्व की सबसे बड़ी लोकतान्त्रिक पार्टी के मुखिया और सबसे बड़े लोकतंत्र के गृहमंत्री की तुलना एक तानाशाह मिलिट्री कमांडर से की जाती है तो या तो ये पागलपन है नहीं तो घृणा। इस मामले में दोनों है। बीबीसी यह देख कर पागल हो चुका है कि भारत में एक से एक बड़े निर्णय हो रहे हैं और सांस्कृतिक रूप से भी समृद्धता आ रही है। वहीं वुसतुल्लाह की भारतीयों के प्रति घृणा साफ़ झलक रही है।

इससे पता चलता है कि पागलपन में अंधा हो चुका बीबीसी घृणा से पंगु भी हो गया है। बीबीसी तो क्या, अगर उनके गिरोह विशेष के सारे लोग मिल जाएँ फिर भी दुनिया के किसी भी देश से प्रवासी भारतीयों को नहीं निकाला जा सकता। ऐसे घटिया सपने देख कर उन्हें आर्टिकल की शक्ल देने वाले बीबीसी को ही भारत से निकालने का समय आ चुका है। लेकिन नहीं, अभी तो उन्हें घृणा से और पागल होना है। एक बार पागलपन की हदें पार करते हुए इनके सभी एडिटर सड़क पर नंगा नाचने लगे, ये ख़ुद भारत छोड़ने को मजबूर हो जाएँगे।

जाधव पर अत्यधिक दबाव बना कर झूठ बोलने को किया जा रहा मजबूर: भारतीय राजनयिक का खुलासा

आज कुलभूषण जाधव को पाकिस्तान काउंसलर एक्सेस देने को मजबूर हुआ। भारतीय डिप्टी कमिश्नर ने जाधव से मुलाक़ात की। जाधव को पाकिस्तान ने अपहृत कर आतंकवादी ठहरा दिया था। पाक की सैन्य अदालत ने उन्हें मौत की सज़ा सुनाई थी, जिस पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने पुनर्विचार करने को कहा। इंटरनेशनल कोर्ट में किरकिरी होने के बाद पाकिस्तान जाधव को काउंसलर एक्सेस देने को मजबूर हुआ। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है कि ‘अत्यधिक दबाव’ बना कर पकिस्तान ने उन्हें झूठ बोलने को मजबूर किया।

भारतीय राजनयिक ने जाधव से एक जेल में मुलाक़ात के बाद पाया कि उन्हें पाकिस्तान द्वारा अत्यधिक दबाव देकर उसके झूठ को बढ़ावा देने के लिए मजबूर किया जा रहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है कि पूरी रिपोर्ट आने के बाद भारत यह देखेगा कि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के आदेशों का पालन हो रहा है या नहीं।

भारतीय विदेश मंत्रालय ने कुलभूषण जाधव की माँ से बात कर के उन्हें ताज़ा घटनाक्रम की जानकारी दी। भारतीय विदेश मंत्रालय ने जाधव को सुनाई गई सज़ा के लिए जो प्रक्रिया चली, उसे ग़लत ठहराया। मंत्रालय ने कहा कि भारत सरकार इस दिशा में प्रयास कर रही है कि जाधव को जल्द से जल्द न्याय मिले और उनकी सकुशल वतन वापसी हो सके।

सातवाहन और चालुक्य वंश के बाद तिलक ने गणेश चतुर्थी को बना दिया था स्वतन्त्रता का जन आंदोलन

दास कपिताल लिखने वाले जर्मनी के क्रन्तिकारी विचारक कार्ल मार्क्स ने कहा था- ‘History repeats itself, the first as tragedy, then as farce.’ भारतीय इतिहास और भारतीयों के विदेशी आतताइयों से संघर्ष के संदर्भ में यह हमेशा सही साबित होता आया है। हम अक्सर अपने ही इतिहास से सबक सीखने में भूल कर बैठते हैं।

गणेश चतुर्थी की भारतीय इतिहास और स्वतन्त्रता आंदोलन में भूमिका देखकर कुछ समय पहले दिल्ली के हौज काजी स्थित दुर्गा मंदिर में हुई सांप्रदायिक घटना की याद आती है। जब मंदिर में मुस्लिम उग्रवादियों द्वारा मंदिर में तोड़फोड़ कर हिन्दू प्रतीकों को अपमानित करने के बाद कुछ हिन्दू एक्टिविस्ट्स ने मिलकर विशाल जागरण और सुंदरकांड का आयोजन किया था।

कुछ इसी तरह से लोगों को जोड़ने के लिए लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन के दौरान गणेश चतुर्थी को एक विशाल आंदोलन का आकार दे दिया था। गणेश पूजा या गणेशोत्सव महाराष्ट्र का सबसे बड़ा त्यौहार है। यह त्यौहार भाद्रपद मास के चतुर्थी से चतुर्दशी तक कुल दस दिनों तक चलता है। गणेश चतुर्थी की भारतीय इतिहास में अहम भूमिका रही है।

भारतीय इतिहास में गणेशोत्सव

बात चाहे ब्राह्मण साहित्य की हो या फिर भारतीय इतिहास में सातवाहन, चालुक्य और राष्ट्रकूट वंशों की, गणेश उत्सव हमेशा ही भारतीय और हिन्दू एकता का प्रमुख केंद्र रहा है। हिन्दू धर्म में पुराणों- अग्नि पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, शिवपुराण, स्कंद पुराण आदि में भगवान गणेश का जिक्र मिलता है। भगवान शिव द्वारा माता पार्वती के प्रहरी बने गणेश का सर उनके धड़ से अलग करने और फिर हाथी के बच्चे का सर जोड़ने की घटना का जिक्र नारद पुराण में मिलता है।

मौर्य साम्राज्य के बाद सातवाहन वंश में गणेश पूजा

अगर भारतीय इतिहास की बात करें तो महाराष्ट्र में सात वाहन, राष्ट्रकूट, चालुक्य जैसे राजाओं ने गणेशोत्सव की प्रथा चलाई थी। सातवाहन एक वंश था जो मौर्य साम्राज्य के बाद उभरा था। महान सम्राट अशोक की मृत्यु के बाद सातवाहनों ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया था। इस वंश की जानकारी मत्स्य पुराण में भी मिलती है। इस वंश ने ईसा पूर्व 230 से लेकर दूसरी सदी (ईसा के बाद) तक केन्द्रीय दक्षिण भारत पर राज किया।

छत्रपति शिवाजी के समय गणेश को राष्ट्रदेव का दर्जा दिया गया था

इसके बाद छत्रपति शिवाजी महाराज भी गणेश की उपासना करते थे। इस दौरान पेशवाओं ने गणेशोत्सव को बढ़ावा दिया। पुणे में कस्बा गणपति की स्थापना राजमाता जीजाबाई ने की थी।

महान मराठा शासक छत्रपति शिवाजी ने गणेशोत्सव को राष्ट्रीयता एवं संस्कृति से जोड़कर एक नई शुरुआत की थी। गणेशोत्सव का यह स्वरूप तब से इसी प्रकार कायम रहा और पेशवाओं के समय में भी जारी रहा। पेशवाओं के समय में गणेशजी को लगभग राष्ट्रदेव के रूप में दर्जा प्राप्त था, क्योंकि वे उनके कुलदेव थे। पेशवाओं के बाद 1818 से 1892 तक के काल में यह पर्व हिन्दू घरों के दायरे में ही सिमटकर रह गया।

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन: बाल गंगाधर तिलक और गणेश चतुर्थी

भारतीय इतिहास में एक समय आया जब भारतीय जनमानस को अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन के अत्याचारों की त्रासदी से गुजरना पड़ा। यही वो समय था जब लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने लोगों के आत्मविश्वास को जगाने और उनके अंदर ब्रिटिश शासन के खिलाफ खड़े होने के लिए गणेश पूजा को फिर से लोगों के बीच लोकप्रिय बनाया। भारत से ब्रिटिश राज की समाप्ति के लिए उन्होंने सामाजिक आंदोलनों के ज़रिए सामाजिक चेतना का प्रवाह तेज़ करके अंग्रेज़ी राज के ख़िलाफ़ जनमत निर्माण का निर्माण किया।

गणेश महोत्सव को सार्वजनिक रूप देते समय तिलक ने उसे केवल धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि आजादी की लड़ाई, छूआछूत दूर करने और समाज को संगठित करने और आम जनता को जागरूक करने का उसे जरिया बनाया और उसे एक आंदोलन का स्वरूप दिया। अंत में इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

हालाँकि, बाल गंगाधर तिलक के इस अभियान से उस दौरान कॉन्ग्रेस सदैव किनारा ही करती रही। 1885 को भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस की स्थापना से ही कॉन्ग्रेस तिलक को निरंतर दरकिनार करती रही क्योंकि तिलक के व्यक्तित्व और उनके प्रति जनता के लगाव को देख अंग्रेज़ों को एहसास था कि अगर तिलक का सामाजिक चेतना का प्रयास मज़बूत हुआ तो, उनकी विदाई का समय और जल्दी आ जाएगा।

गणेश चतुर्थी बन गया था जन आंदोलन

ब्रिटिश काल में कोई भी हिन्दू सांस्कृतिक कार्यक्रम या उत्सव को साथ मिलकर या एक जगह इकट्ठा होकर नहीं मना सकते थे। पहले लोग घरों में ही गणेशोत्सव मनाते थे और गणेश विसर्जन करने का भी कोई रिवाज नहीं था। यही वो समय था जब लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में पुणे में पहली बार सार्वजनिक रूप से गणेशोत्सव मनाया।

आगे चलकर उनका यह प्रयास एक विशाल आंदोलन बना और स्वतंत्रता आंदोलन में इस गणेशोत्सव ने लोगों को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई। आज गणेशोत्सव एक विराट रूप ले चुका है।

तिलक ‘स्वराज’ के लिए संघर्ष कर रहे थे। तिलक के सार्वजनिक गणेशोत्सव से दो फायदे हुए, एक तो वह अपने विचारों को जन-जन तक पहुँचाने में कामयाब रहे और दूसरा यह कि इस उत्सव ने जनता को भी स्वराज के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी और उन्हें आत्मविश्वास दिया।

गणेश पूजा का प्रचलन गणेश चतुर्थी के दिन नियत रहा है, लेकिन इसे विशाल गणेशोत्सव का रूप देने की शुरुआत बाल गंगाधर तिलक ने की। तिलक ने जनमानस को अंग्रेजों के खिलाफ करने के लिए इसे नया रूप दिया और दस दिन के आयोजन के बाद गणेश मूर्ती को चतुर्दशी के दिन जल में विसर्जित कर दिया जाता है। बावजूद इसके कि यह हिन्दू धर्म के अनुसार अनुचित माना गया है।

लेकिन तिलक जनता के हर वर्ग को साथ जोड़कर अंग्रेजों को जो सन्देश देना चाहते थे वो इसमें कामयाब रहे। और कालांतर में अब यही प्रथा धर्म का एक अंग बन गई है।

तिलक उस समय युवा क्रांतिकारी दल के नेता बन गए थे। वह स्पष्ट वक्ता और प्रभावी ढंग से भाषण देने में माहिर थे। यह बात ब्रिटिश अफसर भी अच्छी तरह जानते थे कि अगर किसी मंच से तिलक भाषण देंगे तो वहाँ खिलाफ उग्र होना तय है।

दरअसल, 1857 की क्रांति के बाद स्वाधीनता आंदोलन में तिलक सबसे बड़ी भूमिका में रहे। कई लोग मानते हैं कि तिलक न होते तो आज़ादी पाने में कई दशक और लगते क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले लोगों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक सूत्र में पिरोने का काम किया था। यह भी सत्य है कि कॉन्ग्रेस के भीतर तिलक की घोर अवहेलना हुई। वह मोतीलाल नेहरू जैसे समकालीन नेताओं की तरह ब्रिटिश राज से समझौते की मुद्रा में नहीं रहे।

यही कुछ कारण थे कि वह ब्रिटिश राज के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरे। तिलक की राय थी कि अंग्रेज़ों को यहाँ से किसी भी कीमत पर भगाना है। और वो कॉन्ग्रेस के अन्य नेताओं की तरह ब्रिटिश सत्ता के समक्ष हाथ फैलाने और याचना के बजाय उन्हें भारत से निकाल भगाने के पक्ष में रहते थे।

उनका मानना था कि स्वतंत्रता माँगने से नहीं बल्कि छीनने से मिलेगी और इसके लिए खुला संघर्ष कर बलिदान के लिए हर वक़्त तैयार रहना पड़ेगा। इसी बीच उन्होंने नारा दिया था जो स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे लकप्रिय नारा भी माना जाता है- ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, मैं इसे लेकर रहूँगा।’ तिलक की इस घोषणा ने वर्ष 1914 में जनमानस में ज़बरदस्त जोश भर दिया था। और इस आंदोलन में अंग्रेजों के खिलाफ उनका हथियार बना गणेश चतुर्थी उत्सव।

हिन्दू धर्म के अधिकांश त्यौहार गणेश चतुर्थी की तरह ही लोगों के मन से जातिगत भेदभाव को हटाने से लेकर आपसी सौहार्द विकसित करने के लिए बने हैं। जिनकी प्रासंगिकता हमेशा बनी रहती है।

मैं अपना सीवी नहीं दूँगी: रोमिला थापर ने JNU के नियम-क़ायदों को मानने से किया इनकार

जेएनयू ने अपने संस्थान के नियम-क़ायदों के अनुसार 75 की उम्र पार कर चुके सभी एमेरिटस प्रोफेसरों की सीवी माँगी है। यह एक रूटीन प्रक्रिया है, जिसे वामपंथियों ने रोमिला थापर के ख़िलाफ़ साज़िश कह कर प्रचारित किया। हालाँकि, उनकी पोल तब खुल गई जब यह पता चला कि जेएनयू के नियमानुसार जो भी एमेरिटस प्रोफ़ेसर 75 वर्ष से अधिक उम्र के हो जाते हैं, उनकी मान्यता के सम्बन्ध में समीक्षा की जाती है। उनके स्वास्थ्य, उपस्थिति और क्रियाकलापों को देखते हुए यह निर्णय लिया जाता है। 87 वर्षीय थापर ऑटोमैटिक रूप से इस सूची में आ जाती हैं।

हालाँकि, रोमिला थापर ने यूनिवर्सिटी के नियम-क़ायदों को मानने से साफ़ इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा है कि वह जेएनयू को अपनी सीवी नहीं देंगी। आजतक की एक रिपोर्ट के अनुसार, रोमिला थापर ने चैनल से कहा कि फिलहाल उनका जेएनयू के साथ अपना सीवी साझा करने का कोई इरादा नहीं है। बता दें कि उम्रदराज एमेरिटस प्रोफेसरों की समीक्षा वाले नियम कई अन्य अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में भी मौजूद हैं।

रोमिला थापर ने कहा कि उनको मिली मान्यता जीवन भर के लिए है और जेएनयू उनकी सीवी माँग कर मूल्यों का उल्लंघन कर रहा है। वहीं कॉन्ग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई ने रोमिला थापर का समर्थन करते हुए वीसी से कहा है कि वह उनसे माफ़ी माँगे। जेएनयू ने भी बयान जारी कर के यह साफ़ कर दिया है कि यूनिवर्सिटी को ऐसा क़दम उठाने का अधिकार है और सीवी माँगने का यह अर्थ नहीं है कि किसी एमेरिटस प्रोफेसर की मान्यता ख़त्म ही कर दी जाएगी।

यह भी जानने लायक बात है कि अधिकतर एमेरिटस प्रोफेसरों ने पिछले 3 वर्षों में एक बार भी यूनिवर्सिटी में उपस्थिति दर्ज नहीं कराई है और न ही विश्वविद्यालय के अकादमिक कार्यों में कोई योगदान दिया है।