Home Blog Page 5529

कबूतरों के बाद पाक की नई करतूत: रेडियो से जैश, लश्कर और अल बद्र के आतंकियों से साध रहा संपर्क

हाल ही में भारतीय खुफिया एजेंसियों ने कुछ कोड वर्ड्स का खुलासा करते हुए बताया है कि पाकिस्तान और वहाँ के आतंकी संगठन, जम्मू और कश्मीर के आंतकवादियों से संपर्क साधने के लिए इनका इस्तेमाल कर रहे हैं, ताकि क्षेत्र में हिंसा फैलाई जा सके।

एजेंसी ने खुलासा करते हुए बताया था कि कोड वर्ड्स POK के नियंत्रण रेखा के पास लगाए गए FM ट्रांसमिशन के जरिए भेजे जाते हैं। इसमें जैश-ए-मोहम्मद के लिए (66/88) Mhz, लश्कर-ए-तैयबा के लिए (ए3) और अल बद्र के लिए (डी 9) बैंड्स रखे गए हैं।

इतना ही नहीं, ये भी मालूम चला है कि 5 अगस्त को अनुच्छेद-370 को निरस्त करने के लगभग एक हफ्ते बाद ये संवाद पाकिस्तान के राष्ट्रगान ‘कौमी तराना’ के माध्यम से स्थापित किया गया था। जिसके बाद ही इस क्षेत्र में लैंडलाइन, मोबाइल फोन और इंटरनेट नेटवर्क को बंद कर दिया गया था। 

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो ये कौमी तराने के कई संस्करणों का इस्तेमाल इस कार्य के लिए बहुत तेजी से किया जा रहा है, इसके जरिए पाक सेना और आतंकवादी समूह एफएम ट्रांसमिशन स्टेशनों के माध्यम से अपने संदेश जम्मू-कश्मीर में अपने छिपे आतंकियों को भेजते हैं।

इसके अलावा खूफिया जानकारी में ये भी बताया गया है कि कौमी तराना बजाने के लिए उच्च आवृति वाले रेडियो स्टेशनों का प्रयोग होता है। इसी के जरिए भारत में नियंत्रण रेखा के नजदीक से सिग्नल भेजे जाते थे और इसी का इस्तेमाल करके स्थानीय आतंकियों से संवाद स्थापित किया जाता था।

इसके बाद ये संदेश इस्तेमाल करके (सूत्रों के अनुसार) स्थानीय आतंकी हिंसा करने व आसपास के गाँव वालों को गुमराह करने के लिए उपयोग करते थे।

यहाँ जानकारी के लिए बता दें कि 28 अगस्त को मिली खुफिया रिपोर्ट के अनुसार कि पाकिस्तानी सेना एफएम रेडियो स्टेशन को नियंत्रण रेखा (LoC) के पास शिफ्ट कर रही है। क्योंकि, पाकिस्तान के 10 कोर कमांडर ने सिंगनल कोर को यह काम दिया है। माना जा रहा है इसका उद्देश्य भारत में आतंकियों को भेजना हैं।

गौरतलब है कि अपनी घटिया हरकतों और पीठ के पीछे से वार करने की आदतों से मजबूर पाकिस्तान Fm ट्रांसमिशन के अलावा कबूतरों के जरिए भी आतंकियों के साथ संपर्क साधने की कोशिश कर रहा चुका हैं। जिसे बीएसएफ 32 बटालियन ने पकड़कर कैद कर लिया था।

PM मोदी को चोर और गौतम गंभीर को जीप से बाँधने वाली शेहला रशीद को पॉर्न स्टार से तकलीफ क्यों?

JNU में पार्ट-टाइम छात्रा, फुल-टाइम नारेबाज रहीं शेहला रशीद ने एक ट्विटर यूज़र @BeingAlhind के खिलाफ दिल्ली पुलिस से शिकायत की है, और उसके खिलाफ कार्रवाई की माँग की है। क्यों? क्योंकि उसने शेहला रशीद की एक तस्वीर फोटोशॉप कर एक (पोर्न) अभिनेता के साथ लगा दी थी, और कैप्शन लिखा था, “शेहला रशीद की हुई तबीयत ख़राब। एस्कॉर्ट के डॉक्टर जॉनी करेंगे इलाज।” 

शेहला और उनके समर्थक इस फोटोशॉप को ‘आपत्तिजनक’ बता रहे हैं, और इस कृत्य को शेहला का ‘उत्पीड़न’। उन्हें न केवल इसमें पीयूष गोयल को (जिनका ‘गुनाह’ केवल शेहला को फोटोशॉप करने की ‘हिमाकत’ करने वाले को ट्विटर पर फॉलो करना भर है) घसीटने में कोई शर्म या झिझक नहीं है, बल्कि शेहला का एक समर्थक लिखता है “Followed by @PiyushGoyalOffc. That explains.” जिसे शेहला रीट्वीट करतीं हैं। इसका सीधा-सीधा मतलब है कि अभिषेक बख्शी नामक यह शख्स इस कथित ‘अपराध’ की जड़ पीयूष गोयल को बता रहा है, और रशीद उसका समर्थन करती हैं रीट्वीट कर।

यह फोटोशॉप-विशेष, जो तकनीकी रूप से अपराध है या नहीं, यह तो पुलिस और अदालत ही तय करेंगे, लेकिन इस बात पर विचार करना आवश्यक है कि अगर @BeingAlhind ने शेहला रशीद की तस्वीर एक ऐसी परिस्थिति के साथ जोड़कर अपराध किया है, जिसमें उनके मौजूद होने का कोई कानूनी साक्ष्य नहीं है, तो शेहला रशीद को भी कुछ समय पहले उनके द्वारा शेयर किए गए इस मीम का जवाब देना चाहिए:

जैसे शेहला रशीद के अभिनेता जॉनी सिन्स से अपनी ‘मेडिकल जाँच’ कराने का मीम झूठा है, वैसे ही गौतम गंभीर को जीप से बाँधे जाने का यह मीम भी तथ्यात्मक रूप से झूठा है। साथ ही, @BeingAlhind के मीम में तो शेहला के साथ किसी भी तरह की हिंसा या उन्हें नुकसान पहुँचाने की बात नहीं हो रही है, जबकि इस मीम को तो गंभीर के साथ हिंसा के लिए उकसावे के तौर पर भी देखा जा सकता है (क्योंकि जिस इंसान पर शेहला का बनाया मीम आधारित है, उसे जीप से बाँधे जाने को शेहला के लिबरल गैंग ने उसके साथ ‘हिंसा’ ही बताया था)! या फिर एक अभिनेता (जो हमारी और शेहला की ही तरह एक इंसान है, और शायद शेहला से अधिक नैतिकता/ईमानदारी से अपनी जीविका कमाता है) के साथ मीम बनाना एक ‘हिंसक’ मीम से अधिक बुरा है?

ऐसे में शेहला रशीद को जवाब देना चाहिए कि अगर उन्हें अपने खिलाफ बने मीम में किसी भी तरह की हिंसा या हमले के बिना भी पुलिस कार्रवाई की दरकार है, तो क्यों न गंभीर भी इस मीम के लिए उनके खिलाफ थाने चले जाएँ? और अगर कानूनी दाँव-पेंच परे भी हटा दें तो आज अपना मीम बनने पर इतना बुरा लगने के बाद शेहला गंभीर को ट्वीट कर उनसे माफ़ी माँगेंगी?

शेहला रसीद की कहानी और भी है। वो यह मीम कांड सिर्फ गंभीर के साथ ही नहीं बल्कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम के साथ भी कर चुकी हैं।

जिस इंसान को “मेरा पीएम चोर है” वाला टीशर्ट फोटोशॉप करके पहनाने का काम शेहला ने किया है, उस शख्स ने आज तक ऐसी कोई टी-शर्ट पहनी ही नहीं है। तो फिर देश के प्रधानमंत्री (लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए, वही लोकतंत्र जिसके लिए वो हिजाब लपेट कश्मीर में राजनीतिक पार्टी लॉन्च करती हैं) को चोर बोलने वाली शेहला के साथ इस अपराध के लिए क्या किया जाए?

हर फिदायीन आतंकी मदरसा का छात्र, यही कड़वी सच्चाई: पाक मंत्री फवाद चौधरी ने कबूली थी असलियत

अपने उल-जुलूल बयानों के कारण सुर्खियाँ बटोरने वाले पाकिस्तान के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री चौधरी फवाद हुसैन एक बार फिर से अपनी बात के कारण चर्चा का विषय बने हैं। दरअसल, उन्होंने एक ट्वीट में माना है कि हर फिदायीन हमले में मदरसे का ही छात्र शामिल होता है।

उन्होंने ट्विटर पर एक ट्वीट के रिप्लाई में लिखा था, “मदरसों में पढ़ने वाले सभी छात्र आत्मघाती हमलावर नहीं होते। लेकिन, यह एक कड़वी सच्चाई है कि सभी आत्मघाती हमलावर मदरसों के छात्र होते हैं।”

हालाँकि, ये ट्वीट 5 साल पुराना है, लेकिन कल से सोशल मीडिया पर इसे प्रासंगिक बनाकर तेजी से शेयर किया जा रहा है और फवाद हुसैन लगातार ट्रोल हो रहे हैं।

कुछ ट्विटर यूजर फवाद के इस बयान के बाद पाकिस्तान की चुटकी लेते हुए, उसे धन्यवाद कह रहे हैं कि उसने फवाद जैसा नेता चुना, जो उनके देश की फजीहत ही करवाता रहता है। तो कुछ कह रहे हैं कि पहले फवाद ठीक शख्सियत थे लेकिन इमरान खान की पार्टी में आने के बाद वो पूरे पागल हो चुके हैं।

कुछ यूजर ऐसे भी हैं जो फवाद हुसैन के इस बयान पर भारत में तथाकथित लिबरल्स को घेर रहे हैं। उनका कहना है कि जब कोई भारतीय इस संबंध में अपनी मिलती-जुलती राय रखता है तो उसे भारत के छद्म सेकुलरों द्वारा ‘सांप्रदायिक’ घोषित कर दिया जाता है।

गौरतलब है कि ये ट्वीट तो उनका पुराना है, जिसके कारण पाकिस्तान को शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है। लेकिन, अभी हाल में भी उन्होंने श्रीलंकाई क्रिकेटर्स को लेकर अफवाह उड़ाने की कोशिश की थी, जब खुद श्रीलंका के खेल मंत्री को उन्हें झूठा बोलना पड़ा था।

फवाद हुसैन ने लिखा था, “कमेंटेटर्स ने मुझे बताया कि भारत ने श्रीलंकाई खिलाड़ियों को धमकी दी है कि अगर उन्होंने पाकिस्तान दौरे से इनकार नहीं किया तो उन्हें आईपीएल से बाहर कर दिया जाएगा।” जिस पर स्वयं श्रीलंका के खेल मंत्री हरिन फर्नांडो ने हुसैन का दावा झूठा बताया। उन्होंने कहा था कि 2009 में हमारे खिलाड़ियों पर पाकिस्तान में जो हमला हुआ था, उसकी वजह से कुछ कुछ प्लेयर्स ने दौरे पर न जाने का फैसला किया।

इसके अलावा चंद्रयान-2 पर भी जब पूरा विश्व भारत के प्रयासों पर नतमस्तक था, तब पाकिस्तान के ही इन मंत्री ने कहा था, “जो काम आता नहीं है उससे पंगा नहीं लेते डियर इंडिया।” जिसके बाद न केवल भारतीयों ने बल्कि विश्व के कोने-कोने से उनको शर्मिंदा होना पड़ा था।

मंदिर जा रही नाबालिग का राजस्थान में दिन दहाड़े गैंगरेप, आधे किलोमीटर तक बिना कपड़ों के भागी

राजस्थान के जयपुर से 250 किलोमीटर दूर भिलवाड़ा जिले में एक बार फिर इंसानियत को शर्मसार करने वाली घटना सामने आई है। यहाँ 15 साली की एक बच्ची का 3 लोगों ने शराब के नशे में अपहरण करके गैंगरेप किया है। घटना सोमवार शाम की है, जब बच्ची अपने 2 दोस्तों के साथ मंदिर जा रही थी।

जानकारी के मुताबिक लड़की का अपहरण होते ही उसका एक दोस्त भागकर पास के बाजार गया और वहाँ एक दुकानदार को सारा वाकया बताकर उनसे मदद माँगी। जैसे ही मदद के लिहाज से वो दुकानदार वहाँ पहुँचा तो तीनों आरोपित लड़की को छोड़कर भाग गए। लेकिन बच्ची इतनी डर चुकी थी कि वो मदद को आए दुकानदार से भी दूर भागने लगी। बिना कपड़ों के पीड़ित बच्ची करीब आधा किलोमीटर तक भागती रही। किसी तरह समझाने-बुझाने के बाद जब वो रुकी, तो उस दुकानदार ने उसे कपड़ों से ढका और उसे घर लेकर गया।

पुलिस के मुताबिक इस मामले में तीनों आरोपितों की गिरफ्तारी हो चुकी है। आरोपितों की पहचान राजू कहर, कैलाश कहर और नारायण गुर्जर के रूप में हुई है। इनमें राजू और कैलाश की उम्र 20 के आसपास की बताई जा रही हैं, जबकि नारायण 40 वर्ष का है।

जिस युवक ने बच्ची को बचाया उन्होंने बताया, “मैं सोमवार की शाम अपनी दुकान पर बैठा था, जब एक डरा-सहमा लड़का मेरे पास आया। उसने बताया कि वो अपनी दो दोस्तों के साथ मंदिर जा रहा था कि तभी टहनल रोड पर 3 लोगों ने उसे रोक लिया। उन्होंने लड़के से उसकी बाइक छीनी और उसकी एक दोस्त को सुनसान जगह पर उसका बलात्कार करने ले गए।”

मीडिया से बातचीत में दुकानदार ने बताया, “जब मैं अपनी बाइक से उस जगह पर पहुँचा तो तीनों आरोपित लड़की को मार रहे थे। लेकिन मुझे देखते ही वो फरार हो गए। लड़की बहुत डरी हुई थी। वो मुझे भी देखकर वहाँ से भागने लगी, करीब आधा किलोमीटर वो बिन कपड़े भागी। मैं समझाता रहा कि मैं उसकी मदद के लिए आया हूँ, लेकिन उसने विश्वास नहीं किया। कुछ देर बाद जब उसने मुझ पर यकीन किया, तो वो रुकी, मैं उसे कपड़े दिए और वापस शहर लेकर आया। मैंने उसे अस्पताल ले जाने की बात कही, लेकिन उसने कहा कि उसे घर जाना है, क्योंकि उसके पिता की तबीयत खराब है।”

लेकिन, जब लड़की के घरवालों ने इस घटना के बारे में सुना,उन्होंने तत्काल पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई, जिसके बाद तीनों की गिरफ्तारी हुई। डीएसपी भरत सिंह, जो इस की जाँच कर रहे हैं, उन्होंने बताया कि तीनों आरोपित शाहपुर के रहने वाले हैं। इसके अलावा उन्होंने ये भी बताया कि उन्हें अपनी जाँच में घटनास्थल से चूड़ियों के टुकड़े, शराब की बोटल और खून के निशाने मिले हैं। लड़की के कपड़ों को भी बरामद कर लिया गया और लड़की का मेडिकल चेकअप करवाया गया है, जिसमें लड़की के शरीर पर हर जगह खरोंच के निशान हैं।

‘कहाँ है वेदों में शिव?’ देवदत्त ‘नालायक’ ने जब यह पूछा तो वेद का उदाहरण दे लोगों ने रगड़ दिया

ट्विटर पर फ़िलहाल जिन लोगों को सबसे ज्यादा ‘अच्छे दिन’ की दरकार है, उनमें देवदत्त पटनायक का नाम चोटी में शुमार होना चाहिए। आजकल वे जो भी ट्वीट कर रहे हैं, वह बर्र के छत्ते की तरह उन्हें महँगा ही पड़ता जा रहा है। वे चाहे राखीगढ़ी में आर्य-आक्रमण-सिद्धांत की कब्र खुद जाने के बाद भी उसकी पैरवी कर रहे हों, या किसी के माँ-बाप को याद कर रहे हों, सारे दाँव उलटे ही पड़ रहे हैं।

इन्हीं ‘उलटफेरों’ की शृंखला में उनका वह ट्वीट भी है, जिसमें पटनायक दावा करते हैं कि वेदों में कहीं भगवान शिव का ज़िक्र ही नहीं है। और कुछ ही देर में भारतीय इतिहास के बारे में ट्वीट करने वाला मशहूर ट्विटर हैंडल ‘true Indology’ उन्हें पलट कर जवाब में वह वैदिक ऋचा बता देता है, जिसमें भगवान शिव को उनके अन्य नामों शम्भु, शंकर, पशुपति के अलावा “शिव” नाम से भी नमस्कार किया गया है।

यही नहीं, हिंदुत्व/हिन्दू धर्म का सबसे प्रचलित मंत्र “ॐ नमः शिवाय” भी कृष्ण यजुर्वेद के ही अंश श्री रुद्र चमकम् से ही लिया गया है।

बदज़ुबानी के चलते बन चुके हैं ‘नालायक’

हालाँकि देवदत्त को उनके घरवालों का दिया हुआ उपनाम तो पटनायक है, लेकिन आजकल ट्विटर पर अपनी हरकतों और बदज़ुबानी के चलते वह ‘देवदत्त नालायक’ के नाम से अधिक जाने जा रहे हैं।

दरअसल एक ट्विटर यूजर ने पटनायक को आइना दिखाते हुए उनके द्वारा की गई आपत्तिनजक टिप्पणियों का स्क्रीनशॉट ट्वीट किया और उनसे जवाब माँगा। ट्विटर यूजर ने लिखा कि अगर आपकी माँ आज ज़िंदा होतीं तो आपकी हरकतों के कारण अपना सिर शर्म से झुका लेतीं।

इसका जवाब देते हुए देवदत्त पटनायक ने अजीबोगरीब भाषा का इस्तेमाल किया। उन्होंने लिखा कि उन्होंने आज ही अपनी माँ (जो मर चुकी हैं) से बात की है और वह बिलकुल खुश हैं। साथ ही उन्होंने दावा किया कि उनके सभी पूर्वज स्वर्ग में हैं और हँसी-ख़ुशी हैं। उन्होंने ट्विटर ट्विटर यूजर को लिखा कि तुम्हारे सारे पूर्वक नरक में बिलख-बिलख कर रो रहे हैं।

सवाल पूछने वालों से लगातार दुर्व्यवहार करने और उनके ख़िलाफ़ आपत्तिजनक टिप्पणियाँ करने के लिए कुख्यात देवदत्त पटनायक को लोगों ने उनकी ताज़ा हरकत के बाद ‘देवदत्त नालायक’ और ‘देवदत्त खलनायक’ जैसे विशेषणों से नवाजा है।

पाक: सिख लड़की के अपहरण, जबरन धर्मांतरण मामले में पुलिस ने की FIR रद्द

पाकिस्तान में सिख लड़की का अपहरण करके जबरदस्ती इस्लाम कबूल करवाने के मामले पर जहाँ भारत समेत पूरी दुनिया की पाकिस्तान पर निगाहें थी, उस मामले में एक नया मोड़ आ गया है। दरअसल, जानकारी के अनुसार पाक के पंजाब प्रांत में पुलिस ने आरोपित युवक और अन्य के ख़िलाफ़ अपहरण, जबरन धर्मांतरण के आरोप में हुई FIR को रद्द कर दिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो पाकिस्तान में पंजाब प्रांत के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बुधवार (सितंबर 11, 2019) को जानकारी साझा करते हुए कहा, “लड़की और हसन के परिवारों ने एक लिखित समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें उन्होंने मामले को आपस में सुलझाने की बात कही है। लड़की के परिवार ने हसन और उसके परिवार के सदस्य एवं मित्रों के खिलाफ सभी आरोप वापस ले लिए हैं, इसलिए उनके खिलाफ प्राथमिकी रद्द हो गई है।”

अधिकारी ने बताया कि इसके बाद हसन और उसके परिवार के कुछ सदस्यों ने समझौता देखते हुए अपनी ऐहतियाती जमानत को भी वापस ले लिया है।

खबरों की मानें, तो इस समझौते में निर्णय लिया गया है कि हसन लड़की को अपने साथ रहने के लिए बाध्य नहीं करेगा और यदि वो कहेगी तो उसे तलाक भी दे देगा। इसके अलावा लड़की के परिवार वालों की ओर से कहा गया है कि जब लड़की उनके पास आएगी, तो वह उसे किसी तरह का नुकसान नहीं पहुँचाएँगे।

यहाँ जानकारी के लिए बता दें कि फिलहाल लड़की अभी भी लाहौर के आश्रयगृह में है। क्योंकि, वह अभी ननकाना साहिब में अपने घरवालों के पास लौटने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हैं। लेकिन पुलिस अधिकारी के मुताबिक इस समझौते में इस बात को लेकर सहमति बन गई है कि हसन यदि लड़की को तलाक न भी दे, तो भी वो लड़के के सामने नहीं आएगा और लड़की भी लड़के के सामने नहीं आएगी।

गौरतलब है कि अभी कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर लड़की के घरवालों का वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया उनके मकान पर हमला करके उनकी बेटी को अगवा कर लिया गया हैं और हसन नाम के युवक ने उसे जबरदस्ती इस्लाम कबूल करवाके उससे शादी भी कर ली है। लेकिन इसके बाद लड़की का भी एक वीडियो सामने आया था, जिसमें वो कहते नजर आ रही थी उसने इस्लाम अपनी मर्जी से स्वीकारा है और उस पर किसी का दबाव नहीं है। हालाँकि, उसके हाव-भाव डर को ही बयान कर रहे थे। इस मामले के वायरल होने के बाद भारत में भी इसका खूब विरोध हुआ था और पुलिस हसन के मित्र अरसलान को गिरफ्तार कर लिया था। सिख समुदाय की नाराजगी और कड़े विरोध के बाद पंजाब के मुख्य मंत्री उस्मान बुजदार और गवर्नर चौधरी सरवार ने मामले में हस्तक्षेप किया था। बीच-बीच में खबरे आ रही थीं कि लड़की को उसके घर भेज दिया गया, लेकिन लड़की के भाई ने सही जानकारी देते हुए बताया था कि उनकी बहन न ही घर पहुँची है और न ही मामले में गिरफ्तारी हुई है।

‘मेरी ऑटो में बैठो’… लेकिन महिला ने मना कर दिया तो मो. शकील ने दिखाते हुए हस्तमैथुन शुरू कर दिया

मुंबई के रहने वाले 32-वर्षीय मोहम्मद शकील अब्दुल कादिर मेमन को मुंबई क्राइम ब्रांच ने मालवानी में एक महिला के सामने, उसे दिखाकर हस्तमैथुन करने के जुर्म में गिरफ़्तार कर लिया है। पेशे से ऑटो-चालक मेमन को गिरफ़्तार कल (11 सितंबर, 2019) को किया गया, और अपराध की तारीख पुलिस ने 1 सितंबर बताई है। आरोपित मलाड (पश्चिमी), मालवानी का ही निवासी बताया जा रहा है।

ऑटो में न बैठने की दी ‘सज़ा’

20-वर्षीया महिला के अनुसार 1 तारीख को वह लिंक रोड स्थित चिंचोली बुंदेर बस स्टॉप पर बस का इंतज़ार कर रही थी, जब आरोपित ने अपना ऑटो उसके पास रोका और उसे ऑटो में बैठने के लिए कहा। महिला के मुताबिक उसके मना करने पर आरोपित मेमन ने अपनी पैंट की ज़िप खोलकर अपना गुप्तांग निकाला और महिला को दिखाने लगा। पुलिस के मुताबिक महिला ने उन्हें बताया कि तब महिला ने अपनी माँ को फ़ोन किया और घटना के बारे में बताया, और इसके बावजूद वहाँ से चले जाने की बजाय मेमन ने वहीं हस्तमैथुन शुरू कर दिया। महिला के शोर मचाने पर वह अपना ऑटो छोड़ कर भाग खड़ा हुआ। इसके बाद महिला और उसकी माँ ने बांगुर नगर पुलिस थाने जाकर रिपोर्ट दर्ज कराई।

सीसीटीवी फुटेज बेनतीजा

पुलिस ने बताया है कि हिरासत में लेकर मेमन को बांगुर नगर पुलिस थाने के हवाले कर दिया गया है, जहाँ उस पर कानूनी कार्रवाई होगी। यूनिट 11 के पुलिस इंस्पेक्टर चिमनजी आधव ने बताया कि जब महिला ने FIR की, तब उन्होंने तफ्तीश शुरू की और पता चला कि मेमन किसी और का ऑटो शिफ्ट पर चलाता था। इलाके के सीसीटीवी फुटेज की जाँच में कुछ नहीं मिला, लेकिन मलाड, गोरेगाँव और दहिसार चेक नाका इलाकों के ऑटो वालों से पूछताछ के आधार पर मेमन की शिनाख्त हुई, उसका पता मिला और उसे पुलिस ने धर दबोचा।

एशियन एज पोर्टल ने पुलिस के हवाले से दावा किया है कि मेमन आदतन अपराधी है। इसके पहले भी कई महिलाओं के साथ ऐसा ही अभद्र व्यवहार वह कर चुका है।

‘दाढ़ी वाला ऑटो ड्राइवर मुझे देखकर हस्तमैथुन कर रहा था’: MBA कर रही 19 साल की लड़की की आपबीती

कॉन्ग्रेस के CM और डेप्यूटी CM आमने-सामने: राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति खराब

राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच मतभेद एक बार फिर खुलकर सामने आए हैं। दरअसल, इस बार उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने अपनी ही सरकार की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने राज्य में बिगड़ती कानून व्यवस्था पर अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि कई जगह कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब हुई है, इसको गंभीरता से लेना चाहिए। ऐसा कहते हुए पायलट का इशारा जयपुर में हुई पत्थरबाजी और अलवर के बहरोड़ जेलब्रेक कांड की तरफ था।

यहाँ उल्लेखनीय है कि पॉयलट का ये बयान उस समय आया है जब विपक्ष के नेता गुलाब चंद कटारिया एक दिन पहले ही उनकी सरकार द्वारा कानून व्यवस्था को लेकर बनाई खराब नीतियों और राज्यभर में हो रही घटनाओं पर उन्हें घेर चुके हैं। ऐसे में पॉयलट ने कहा है, “विपक्ष के नेताओं ने हो सकता है सरकार पर अपने मकसद से निशाना साधा हो, लेकिन ये सच है कि हमें अब कानून-व्यवस्था पर गंभीरता दिखानी होगी। धौलपुर और अलवर जैसी परेशान करने वाली कई घटनाएँ पिछले कुछ समय के दौरान हुई हैं। कोशिश होनी चाहिए कि भविष्य में इस तरह की घटनाएँ न हों।”

हालाँकि, इसके बाद जब सचिन पायलट से जब पूछा गया कि जब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खुद राज्य में गृह मंत्री की भूमिका में हैं, तो क्या ऐसे में पार्ट टाइम गृह मंत्री होने की वजह से कानून-व्यवस्था बिगड़ गई है, तो इस पर पॉयलट चुप रहे और उन्होंने कोई कमेंट नहीं किया। उन्होंने सिर्फ़ यही कहा कि हमें कानून-व्यवस्था को और ठीक करने पर ध्यान देना चाहिए।

गौरतलब है कि ये पहला मामला नहीं है जब पॉयलट ने अपनी ही सरकार के ख़िलाफ़ उलट जाकर ऐसा कोई बयान दिया हो। इससे पहले भी वो अशोक गहलोत पर अपने जन्मदिन के मौक़े पर ये कहकर निशाना साध चुके हैं कि वो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठकर क्या करेंगें, अगर वो लोगों के आँसू नहीं पोंछ सकते। इसके अलावा वह पहलू खान पर सरकार को घेरते हुए बयान दे चुके हैं कि सरकार ने देरी की है, मामले में जाँच टीम का गठन पहले ही हो जाना चाहिए था। इतना ही नहीं, अभी बीते मंगलवार को पूर्व मुख्यमंत्री के बंगले को खाली कराने को लेकर भी सचिन पॉयलट का एक बयान सामने आया था, जिसमें उनके और गहलोत के बयान में विरोधाभास दिखा था।

‘केसरी’ का महत्व अक्षय कुमार की पगड़ी का रंग नहीं, बल्कि सारागढ़ी की याद दिलाना है

इतिहास के दो हिस्से होते हैं- भाषा और नैरेटिव तथा रूखे-सूखे तथ्य। दोनों की ही अपनी-अपनी भूमिकाएँ और महत्ताएँ हैं। लेकिन जब इतिहास किताबों और शोध-पत्रों के पन्नों से निकल कर ‘पॉपुलर कल्चर’ का हिस्सा बनना चाहता है, फिल्मों का, वो भी ‘आर्ट’ नहीं, बल्कि सौ-करोड़ी फिल्मों का विषय बनना चाहता है, तो कथानक यानी नैरेटिव का पलड़ा ज़ाहिर तौर पर भारी हो जाता है और तथ्यों की ‘technicality’ के साथ 19-20 हो ही जाता है।

लेकिन इससे न इतिहास बदलता है और न ही इतिहास पर बनी मसाला फिल्मों की महत्ता खत्म हो जाती है। वह ज़रूरी इसलिए नहीं होतीं क्योंकि उनसे ही इतिहास सीखना-पढ़ना है। यह काम नॉन-फ़िक्शन मीडिया, किताबों और ब्लॉगों, शोध-पत्रों का ही रहेगा। इन फिल्मों का काम इतिहास पढ़ाना नहीं, किसी विषय के प्रति जागरुकता पैदा करना है, उस विषय को समाज की चेतना में, उसके अंतस में लाना है। सारागढ़ी की लड़ाई के लिए ‘केसरी’ फिल्म यह काम बखूबी करती है।

आज यानी 12 सितम्बर को सारागढ़ी की बरसी है। 122 साल पहले इसी दिन 21 सिख सैनिकों और उनके खानसामे ‘दाद’ ने हवलदार ईशर सिंह के नेतृत्व में 10,000 के करीब की पठान सेना को सारागढ़ी का किला जीतने से 6 घंटे के करीब रोककर रखा और आखिरी दम, आखिरी गोली, आखिरी जवान तक लड़ते रहे। उनमें सबसे कम उम्र के गुरमुख सिंह ने अपने साथियों के वीरगति को प्राप्त होने के बाद भी लड़ना जारी रखा। उन्होंने 20 के करीब पठान सैनिकों को मीनार से छिप-छिप कर मार गिराया। अंत में पठानों को उसे मारने के लिए पूरी मीनार ही जला देनी पड़ी। असैनिक ‘दाद’ ने भी जब मौत सामने देखी तो गिड़गिड़ाते हुए, जान की भीख माँगते हुए जिबह होने की बजाय लड़ना उचित समझा और 5-6 पठानों को ले बीता।

सैन्य इतिहास में इसे ‘लास्ट स्टैंड’ कहते हैं- जब जंग में गुत्थमगुत्था हुए पड़े, या होने जा रहे, दो धड़ों में से एक को यह आभास हो जाए कि उसकी जीत तो किसी भी तरह नहीं हो सकती और उस धड़े के सैनिक तय करें कि जान की भीख माँगने, जान बचाकर भागने, या कैदी/गुलाम को मिलने वाली ज़िल्लत और यातना की मौत से बेहतर लड़ते हुए मरना है; और वे इसी मौत को गले लगाने समर में कूद पड़ते हैं।

जब कोई सैनिक, कोई योद्धा ‘लास्ट स्टैंड’ लेता है, तो वह इस एक कदम से नैतिक-अनैतिक, सही-गलत से ऊपर उठ जाता है। वह किसके लिए लड़ रहा है, किस विचारधारा का है, या कोई विचारधारा है भी या नहीं- यह सब बातें उसके निर्णय के साहस के आगे गौण हो जाती हैं। इसलिए ब्रिटिश सरकार के किले की रक्षा में पठान विद्रोहियों से लड़ने वाले सारागढ़ी के सिख, महाभारत में रथ का पहिया उठाकर सात महारथियों पर पिल पड़ने वाला अभिमन्यु, लाखों फ़ारसियों से लड़ने वाले मुट्ठी-भर ग्रीक सैनिक हों, वे सभी हर राजनीति और विचारधारा के परे सम्मान के हकदार होते हैं- इसलिए कि वे कुछ ऐसा करने का साहस/दुस्साहस रखते थे, जिसका दम हर किसी में नहीं होता।

तो केसरी पर चुप क्यों रहे हम 70 साल?

इतनी लम्बी-चौड़ी भूमिका का मकसद यही सवाल पूछना है- कि जब अभिमन्यु से लेकर राजा लियोनाइडस तक के बारे में हम जानते हैं, उनकी कहानियाँ पढ़ते और सुनते हैं, तो आखिर हमने कभी हवलदार ईशर सिंह, खानसामे ‘दाद’ या सैनिक चाँद सिंह के बारे में क्यों नहीं सुना? और आज जब कोई सुना रहा है, भले ही उसका मकसद राष्ट्रवाद और सेना-समर्थक वर्तमान जनभावना का फायदा उठाकर पैसा पीटना ही क्यों न हो, तो कहानी सुनाए जाने पर ही सवाल क्यों उठाया जा रहा है।

आप गूगल पर ‘kesri saragarhi battle’ लिख कर सर्च करिए। अधिकाँश वेबसाइटों पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से नाराज़गी ही मिलेगी, कि आखिर सारागढ़ी की कहानी सुनाई ही क्यों जा रही है। जहाँ तक ऐतिहासिक सत्यता को लेकर आपत्तियाँ हैं, मैं उनसे सहमत तो नहीं हूँ, लेकिन उन्हें गलत भी नहीं मानता। सहमत इसलिए नहीं हूँ क्योंकि मेरे हिसाब से यह बेवजह की नुक्ताचीनी है- पॉपुलर सिनेमा का काम केवल यह बताना है कि भाई, सारागढ़ी जैसी लड़ाई भी हुई थी, जाओ, पढ़ो, जानो; उसके आगे वे जितना सटीक हो जाएँ, अच्छी बात। लेकिन न हों तो उसी को लेकर बवाल काटने को मैं सही नहीं मानता।

लेकिन असली दिक्कत उन चुनिंदा तथ्यात्मक आलोचनाओं से नहीं है- वह तो अपने-अपने पसंद की बात है, कि किसी को ईशर सिंह की तथ्यात्मक रूप से सही खाकी पगड़ी पसंद हो सकती है, मुझे अक्षय कुमार की केसरी पग का भाव अधिक पसंद आया। असली दिक्कत उनसे है, जिन्हें इस फिल्म के बनाए जाने से ही दिक्कत है, क्योंकि इस फिल्म में हमलावर इस्लामी हैं और उनके हिसाब से इस्लामी इतिहास में जो कुछ स्याह-सा दिखे, उसे या तो दबा दो, या उस पर सफेद प्लास्टर से रंग-रोगन कर दो।

मैं यहाँ तक भी सहमत हूँ कि अगर सारागढ़ी की लड़ाई का आह्वान करने वाले मुल्ला ने किसी लड़की का सिर कलम नहीं किया था, तो नहीं दिखाया जाना चाहिए था। लेकिन इसके बहाने यह नैरेटिव चलाने की कोशिश करना गलत है कि बॉलीवुड को ऐसे विषयों के प्रति अतिरिक्त ‘संवेदनशील’ होना चाहिए, जिनमें कोई मजहब विशेष वाला नकारात्मक भूमिका में हो। मेरी सबसे ज़्यादा आपत्ति उन लोगों के मुँह खोलने से है, जो दबी-ज़बान यह पूछ रहे थे कि आखिर भगवा रंग के महिमामंडन की, समुदाय विशेष की दूसरे धर्मों से लड़ाई में दूसरे धर्म की वीरता की, (“भाजपा और राष्ट्रवादियों को फायदा पहुँचाने वाली”) फ़िल्में बनाए जाने की ज़रूरत ही क्या है।

लाख गलतियों के बाद भी खुद में गलत नहीं है फिल्म ‘केसरी’

केसरी नामक फिल्म में लाख गलतियाँ हो सकतीं हैं, लेकिन खुद में फिल्म गलत नहीं है। इसका प्रभाव गलत नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि इसने केवल राष्ट्रवादियों के ‘पक्ष में’ गलतियाँ की हैं। इसमें सैनिकों को मस्जिद बनाते हुए दिखाया गया है, जबकि उस समय ऐसा कुछ नहीं हुआ था। लेकिन किसी सिख को या हिन्दू को मैंने इस पर तो बात का बतंगड़ बनाते नहीं देखा! इसमें अंतिम सैनिक गुरुमुख सिंह की बीस पठान सैनिकों को गोली मारने के बाद खुद जलकर मर जाने की बहादुरी को एक कबायली नेता को पकड़ कर आत्मघाती ‘बम’ धमाका करने के उस कालखण्ड में असम्भव कारनामे से बदल दिया गया है।

हो सकता है सारागढ़ी पर हमला करने वाले पठान उतने बर्बर और जिहादी न हों जितना फिल्म में दिखाया गया है। हो सकता है वे सच में अंग्रेज़ों से अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहे हों और सारागढ़ी के वे 21 सिख उनके रास्ते में खड़े हों। ऐसा भी हो सकता है कि वे सैनिक कंपनी बहादुर के लिए ही मरे हों, न कि किसी अंग्रेज़ को हिंदुस्तान की ताकत दिखाने के लिए, जैसा कि इस फिल्म में दिखाया गया है। मैं इतिहास का विशेषज्ञ नहीं हूँ, और इसलिए ऐसे विषय पर अंतिम फैसला नहीं दे सकता।

लेकिन पठान सही थे या सिख, यह फैसला करना न केसरी फिल्म का मकसद है, न इतिहास के सारागढ़ी पन्ने का मूल। मूल यह है कि चाहे वे सिख सैनिक अंग्रेज़ों के गुलाम सिपाही बनकर लड़ें हों, या आज़ाद सिख, चाहे उन पर हमला करने वाले पठान आज़ादी के परवाने हों, या जिहादी हमलावर, उन 22 वीरों का वह ‘लास्ट स्टैंड’ इन सब बातों से ऊपर था, इसके परे था- और इसके बारे में हमें पता होना चाहिए था।

अपने पूर्वजों के इस कारनामे के बारे में जानना हमारा हक था, जो हमें 70 साल तक राजनीतिक इशारों पर इतिहास की किताबें लिखने वालों, इतिहास का सिलेबस तय करने वालों के चलते नहीं मिला। आज जब अक्षय कुमार और अनुराग सिंह ने वह हक़ किसी न किसी कारण और माध्यम से दिया है, तो देने पर ही आपत्ति जताने वालों को पहले अपने राजनीतिक और बौद्धिक पूर्वजों के ‘उत्तराधिकारी’ के तौर पर उत्तर देना चाहिए कि 70 साल में ऐसा क्यों नहीं हो पाया? उसके बाद इस पर बहस होगी कि अक्षय कुमार को केसरिया पगड़ी पहननी चाहिए थी कि नहीं।

आतंकियों की हिमायती, हिन्दुओं को गोमूत्र पीने वाला बताने वाली पत्रकार फुरकान ख़ान कम्पनी से बाहर

‘न्यूज़ अलर्ट एंड लाइफ (NPR)’ ने अपने उस पत्रकार को निकाल बाहर किया है, जिसने हिन्दू-विरोधी ट्वीट कर हिन्दुओं के प्रति अपनी घृणा का खुला प्रदर्शन किया था। पत्रकार फुरकान ख़ान इससे पहले भी हिन्दुओं के लिए आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करने के लिए कुख्यात रही हैं। वह नई दिल्ली में एनपीआर की प्रोड्यूसर के तौर पर कार्यरत थीं। एनपीआर ने कहा कि कम्पनी पत्रकार फुरकान ख़ान की ट्वीट में व्यक्त किए गए विचारों से कोई ताल्लुक नहीं रखती।

साथ ही एनपीआर ने कहा है कि फुरकान ख़ान का ट्वीट कम्पनी के नैतिक आदर्शों के ख़िलाफ़ था। कम्पनी ने कहा कि फुरकान ने इसके लिए सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँग ली है और एनपीआर से इस्तीफा दे दिया है। एनपीआर ने एक ईमेल के माध्यम से यह जानकारी दी है।

फुरकान ने विवादस्पद और घृणा भरे ट्वीट में लिखा था कि अगर भारतीयों ने हिंदुत्व छोड़ दिया तो उनकी अधिकतर समस्याएँ ख़त्म हो जाएँगी। साथ ही उन्होंने हिन्दुओं को गोमूत्र पीने वाला और गोबर की पूजा करने वाला बताया था। देखें ट्वीट:

फुरकान ख़ान का वो हिन्दूफ़ोबिक ट्वीट, जिसके कारण मचा बवाल

फुरकान ख़ान के इस घृणा भरे ट्वीट के ख़िलाफ़ दिल्ली के पुलिस कमिश्नर के पास भी शिकायत दर्ज कराई गई थी।सोशल मीडिया पर लोगों ने फुरकान ख़ान के ट्वीट और पुलवामा हमले को अंजाम देने वाले आतंकी की भाषा में समानता देख कर एनपीआर से माँग करते हुए कहा कि उन्हें जल्द से जल्द कम्पनी से निकाला जाए। विरोध के बाद फुरकान ख़ान ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया था।

रंगे हाथों घृणा फैलाते हुए पकड़े जाने के बाद फुरकान ख़ान ने सफाई देते हुए कहा था कि उनका ट्वीट मज़ाकिया था। उन्होंने आलोचकों को ‘ट्रॉल्स’ की संज्ञा देते हुए कहा था कि उनलोगों ने ट्वीट के सन्दर्भ को समझने में ग़लती की।