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#Saaho: Huffpost India के एडिटर को क्यों दे रहे हैं लोग पहली फुरसत में निकलने की सलाह

साउथ इंडियन एक्टर प्रभास की फिल्म साहो की रिलीज के बाद इस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। इन्हीं प्रतिक्रिया देने वालों में से एक हैं Huffpost India वेबसाइट के एंटरटेनमेंट एडिटर अंकुर पाठक।

साहो फिल्म में नील नितिन मुकेश ने भी काम किया है। उन्हीं को लेकर साहो फिल्म पर अपनी राय देते हुए अंकुर पाठक ने लिखा- “ये 2019 है, और फिल्म प्रोड्यूसर्स अभी भी नील नितिन मुकेश को फिल्मों में एक्टिंग करने के लिए पेमेंट दे रहे हैं? मुझे जवाब चाहिए।”

अंकुर पाठक के इस ट्वीट पर कई लोगों ने अपनी प्रतिक्रियाएँ दी हैं, जिनमें से एक हैं वजीर फिल्म के डायरेक्टर बिजॉय नाम्बियार। उन्होंने अंकुर को जवाब देते हुए लिखा- “तुम उस पर (नील नितिन मुकेश) उसके फिल्मों के चयन के लिए सवाल कर सकते हो, उसकी परफॉर्मेंस पर सवाल कर सकते हो, लेकिन जब तुम इस तरह से सिर्फ खुद को चतुर साबित करने के लिए ट्वीट करते हो तब सिर्फ यही साबित होता है कि तुम कितने ‘हल्के’ आदमी हो।”

इसके बाद अंकुर पाठक ने अपनी बेइज्जती होती देखकर डैमेज कण्ट्रोल के लिए स्वीकार किया कि उससे गलती हुई है और यह वाकई में बहुत उथला ट्वीट था। और उन्होंने नील नितिन मुकेश से इसके लिए माफ़ी माँगी।

इस पर कुछ लोगों ने अंकुर पाठक को इस ट्वीट के लिए फटकार लगाते हुए उससे कहा कि सस्ती लोकप्रियता के लिए आजकल के जर्नलिस्म की ये दशा देखना दुर्भाग्यपूर्ण है। इसके जवाब में नील नितिन मुकेश ने भी कटाक्ष करते हुए जवाब दिया है- “मुझे आश्चर्य है, तुम्हारे जैसे लालन-पालन वाले लोग ये सब भी जानते हैं।”

अंकुर पाठक के ट्वीट के जवाब में कई ट्विटर यूजर ने अपनी प्रतिक्रियाएँ दी और अपने अपने अंदाज में उन्हें खरी-खोटी सुनाई। हालाँकि, कुछ लोगों ने MEME के जरिए अंकुर के लिए अपशब्दों का भी प्रयोग किया। लेकिन सोशल मीडिया पर ‘MEME कल्चर’ में क्रिया-प्रतिक्रिया का यह चलन आम होता जा रहा है।

मेरठ में पुलिस को पशु तस्करों ने दौड़ा-दौड़ा कर मारा, SHO समेत 8 पुलिसकर्मियों को लगी गंभीर चोटें

उत्तर प्रदेश के मेरठ में पशु-तस्करों द्वारा पुलिसकर्मियों को दौड़ा-दौड़ा कर मारने का मामला सामने आया है। इस दौरान हमलावरों ने पुलिस की जीप भी तोड़ डाली। घटनास्थल पर भारी संख्या में पहुँच पुलिस बल ने एसपी (देहात) अविनाश कुमार पांडे के नेतृत्व में हालात पर क़ाबू पाया। कई लोगों को हिरासत में लिया गया है।

घटना मेरठ के थाना इंचोली क्षेत्र की है। सीखड़े गाँव में पशु-तस्करी की सूचना पर इंचोली थाने की पुलिस दबिश के मक़सद से गई थी। पशु तस्कर के घर में शादी समारोह चल रहा था और उसके घर में दर्जनों लोग इकट्ठा थे। पुलिस को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी। पुलिस ने पशु तस्कर असलम और उसके बेटे अकरम को हिरासत में ले लिया। अचानक पहुंँची पुलिस को देखकर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा।

एसपी के मुताबिक़, बुधवार (28 अगस्त) को सिखोड़ा थाना से दो भैंसों की चोरी की सूचना मिली थी। इसमें नामज़द मुकदमा दर्ज कराया गया था, जिसमें अकरम भाटी को आरोपित बनाया गया। इससे पहले भी आरोपित पर पैसा न लौटाने संबंधी आरोप लगते रहे हैं। इसी मामले में पुलिस उसे गिरफ़्तार करने पहुँची थी। ख़बर के अनुसार, पुलिस ने देर रात 26 लोगों को हिरासत में लिया।

न मेरी बहन घर लौटी, न कोई गिरफ्तार हुआ है: आतंकी से जबरन ब्याही गई सिख लड़की का भाई

पाकिस्तान में ननकाना साहिब गुरुद्वारा तंबी साहिब के एक ग्रन्थि (सिख पुजारी) की 19 साल की बेटी अपने घर नहीं लौटी है। न ही इस मामले में किसी को अब तक गिरफ्तार किया गया है। यह जानकारी लड़की के भाई ने दी है। इससे पहले दावा किया जा रहा था कि लड़की को सुरक्षित घर पहुॅंचा दिया गया है।

पीड़िता के भाई ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान, सेना प्रमुख बाजवा और पंजाब के गवर्नर से न्याय की गुहार लगाई है।

लड़की को गुंडे उसके घर से घसीट कर ले गए थे। जबरन इस्लाम क़बूल करवाकर उसका निकाह हाफ़िज सईद के आतंकी संगठन के जमात-उद-दावा के मोहम्मद हसन से करवा दिया गया था।

मामला सामने आने के बाद पाकिस्तान की पूरी दुनिया में थू-थू होने लगी थी। भरपाई के लिए पहले एक वीडियो जारी किया जिसमें पीड़िता अपनी मर्जी से इस्लाम क़बूल कर निक़ाह की बात कह रही थी। फिर लड़की को डराने-धमकाने की बात सामने आई। इस्लाम क़बूल नहीं करने पर उसके पिता और भाई को गोली से मार देने की धमकी दी गई थी। इसके बाद दावा किया गया था कि लड़की अपने घर लौट आई है। लेकिन लड़की के भाई ने बहन के घर लौटने और और आरोपितों की गिरफ्तारी से इनकार किया है।

गौरतलब है कि, लड़की के चार दिन लापता रहने के बाद गुरुवार को उसके धर्मांतरण और निक़ाह की बात सामने आई। इसके बाद केंद्र सरकार ने शुक्रवार (30 अगस्त) को इस मामले में पाकिस्तान सरकार से बात कर तत्काल प्रभाव से ठोस क़दम उठाने की माँग की थी।

दुनिया ने दुत्कारा तो मिमियाने लगा PAK, कहा- भारत से बातचीत को राजी, कोई मध्यस्थता तो करवा दे

वैश्विक दबाव के चलते भारत को परमाणु युद्ध की धमकी देने वाले पाकिस्‍तानी हुक्‍मरानों के सुर बदलने लगे हैं। भारत को जंग की धमकी और परमाणु हमले की धौंस देने वाला पाकिस्तान आखिरकार मुँह लटकाकर बातचीत की टेबल पर आ गया है। कश्मीर मुद्दे पर दुनिया भर में अपना प्रोपगेंडा बेचने में नाकाम रहने के बाद पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कहा है कि भारत से द्विपक्षीय बातचीत में कोई ऐतराज नहीं है। उन्होंने कहा कि उनका मुल्‍क भारत के साथ ‘सशर्त द्विपक्षीय’ बातचीत करने के लिए तैयार है।

पाकिस्‍तानी विदेश मंत्री ने शनिवार (अगस्त 31, 2019) को कहा, “हमने कभी भी भारत के साथ बातचीत से इनकार नहीं किया। पाकिस्‍तान अभी भी भारत के साथ द्विपक्षीय बातचीत के लिए तैयार है। लेकिन भारत बातचीत का माहौल नहीं बना रहा है।”

कुरैशी ने कहा कि इस मसले पर यदि कोई तीसरा मुल्‍क मध्‍यस्‍थता करे तो उन्‍हें खुशी होगी। बातचीत की शर्त रखते हुए कहा कि इसके लिए भारत को कश्‍मीर में नजरबंद अलगाववादी नेताओं को रिहा करना होगा। कुरैशी ने बातचीत के लिए एकपक्षीय शर्त रखते हुए कहा कि उन्हें कश्मीरी नेतृत्व से मिलने की इजाजत दी जाए, ताकि वे उनसे बात कर सकें और फिर कश्मीरी नेतृत्व पर बातचीत के लिए दबाव डाल सकें।

बता दें कि, अभी हाल ही में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने गीदड़ भभकी देते हुए कहा था कि भारत के प्रधानमंत्री को याद रखना चाहिए, दोनों देशों के पास परमाणु हथियार हैं। परमाणु युद्ध में कोई विजेता नहीं होगा। ये न सिर्फ इस क्षेत्र में कहर बरपाएगा बल्कि पूरी दुनिया को इसके परिणाम भुगतने होंगे। 

गौरतलब है कि, कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान ने जितना हो सके दुनिया को बरगलाने की कोशिश की। पाकिस्तान दुनिया के ताकतवर मुल्कों के पास गया, इस्लामिक देशों के संगठन ओआईसी से गुहार लगाई। मानवाधिकार संगठनों के पास जम्मू-कश्मीर की झूठी कहानी सुनाई, लेकिन पाकिस्तान के रुख और पुराने रिकॉर्ड से वाकिफ दुनिया ने पड़ोसी मुल्क का न सिर्फ तर्क मानने से इंकार कर दिया, बल्कि रूस, फ्रांस, अमेरिका और यूएई जैसे देशों ने तो दो टूक कहा कि कश्मीर मुद्दा द्विपक्षीय है, और इसमें किसी के दखल की जरूरत नहीं है।

घोघो रानी… चुल्लू भर ही था पानी, इसलिए छेनू उसमें डूब के मर न सका!

जिस दौर में देश में एनजीओ को लेकर शोर उठ रहा था, करीब-करीब उसी वक्त विदेशों में भी इसे लेकर काफी हंगामा मचा था। अफ़सोस कि ये हंगामा बिलकुल भी वैसा नहीं था, जैसा भारत में उठ रहा था। ये हंगामा ऑक्सफेम नाम की एक संस्था को लेकर था। आरोप था कि इस संस्था के सीइओ ने पीड़ितों का इस्तेमाल देह-व्यापार के लिए किया है। इस काम के लिए संभवतः उन्होंने मदद के लिए भेजे गए पैसों का इस्तेमाल किया था। ऐसा भी माना जा रहा था कि जिनका इस्तेमाल देह-व्यापार में हुआ है, उनमें से कई कम उम्र की, करीब-करीब बच्चियाँ हैं।

ऐसे आरोपों का खुलासा होते ही जमकर बवाल हुआ। शुरुआत में ये रिपोर्ट टाइम्स में आई। बाद में गार्डियन और बीबीसी ने भी इस पर जमकर शोध किया। जैसा कि होना ही था, एनजीओ की तरह काम करने वाली संस्था ऑक्सफेम ने पहले तो इन आरोपों को सिरे से नकारने की कोशिशें कीं। वो ऐसा करने में कामयाब नहीं हो पाए और आख़िरकार पोल खुलने पर ऑक्सफेम जीबी से चीफ एग्जीक्यूटिव मार्क गोल्डरिंग और फिर डिप्टी चीफ एग्जीक्यूटिव पैनी लॉरेन्स को इस्तीफा देना पड़ा। इस विवाद के खुलने का नतीजा ये भी हुआ कि यूके से ऑक्सफेम को मिलने वाले काफी फण्ड रोक दिए गए।

The Times में प्रकाशित खबर

भारत में भी उस दौर में फण्ड के रोके जाने का ही विवाद चल रहा था। ये अलग बात है कि जहाँ विदेशों में ये चर्चा थी कि ऐसी हरकतें करने वाले लोगों को आखिर फण्ड दिए ही क्यों जाएँ, वहीं भारत में फण्ड की जाँच को असहिष्णुता का जामा पहना दिया गया था। विदेशों में नीचता करने के लिए जहाँ संस्था माफ़ी माँग रही थी वहीं भारत में फण्ड रोके जाने को सवर्ण हिन्दू पुरुषों द्वारा किया जा रहा अत्याचार घोषित किया जा रहा था। भारत में उनके दलाल स्क्रीन काली करके ये बता रहे थे कि ये अँधेरा ही कल की तस्वीर है, और विदेशों में ओक्सफेम अपनी माफ़ी अख़बारों में छपवा रही थी।

Oxfam का माफीनामा

भारतीय पत्रकारों की एक अभिजात्य, खानदानी, बिरादरी जिस पोस्ट ट्रुथ के दौर की बात करती है, उसी की तर्ज पर देखें तो हम भी असहिष्णुता के बाद के दौर में हैं। उनके पास लाल माइक है, उनके पास रेडियो चैनल हैं, उनके पास काले करने को पन्ने वाले अखबार भी हैं। दर्जनों सोशल मीडिया पेज और वेबसाइट के जरिए वो इन्टरनेट पर भी छाए हैं। सवाल है कि उनका जवाब देने के लिए एक साधारण आदमी के पास क्या है? और ये सवाल बहुत बड़ा सवाल इसलिए है क्योंकि भारत का संविधान लिखित तौर पर तो आम आदमी की आवाज को भी बड़े लोगों की बराबरी का हक़ देता है, लेकिन ये हक़ जमीन पर उतरा भी है या कागजों पर ही रह गया, ये कोई नहीं पूछता।

आलम ये है कि एक आम आदमी तो अपने हकों के लिए आखिरी दरवाजे की तरह अदालतों का दरवाजा खटखटाता है, मगर उसी के फैसले जब आते हैं तो आश्चर्यजनक रूप से एक फैसला “न्याय की जीत” और बिलकुल वैसा ही दूसरा फैसला “इन्साफ का क़त्ल” करार दिया जाता है। लोकतंत्र के चार खम्भे जब गिनवाए जाते हैं तो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद पत्रकारिता का नंबर भी आता है। जब पहले तीन से जनता सवाल कर सकती है तो आखिर ऐसा क्यों है कि पत्रकारिता सीजर्स वाइफ की तरह सवालों से बिलकुल परे करार दी जाती है?

हाल के दौर में बड़े चैनलों के फर्जी खबरें छापने के कम से कम तीन बड़े मामले प्रकाश में आए हैं। पहला मामला तत्कालीन आरएसएस प्रमुख के बयान को तोड़ने-मरोड़ने का था, जिसमें बड़े चैनल सामने आए थे। कुछ दिन बाद बीबीसी ने “वॉर एंड पीस” को लेकर एक खबर चलाई, जिसका न्यायालय से कोई लेना देना नहीं था। अब सामने आ रहा है कि वायर, क्विंट जैसे तथाकथित रूप से समाचार चलाने वाले पोर्टल करीब साल भर पहले जो अमित शाह के पुत्र के बारे में छाप रहे थे, वो भी फर्जी था। मानहानि के दावे के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से सिब्बल ने याचिका वापस ले ली है।

इस पूरे वाकये में एनडीटीवी और उससे जुड़े लोगों की याद इसलिए आती है क्योंकि एक चैनल एनडीटीवी गुड टाइम्स भी आता था। उसका किंगफ़िशर के साथ कुछ करार था और किंगफ़िशर कैलेंडर छापने वाले लोग आजकल फरार चल रहे हैं। बाकी मेरे ख़याल से अगर बचपन के खेल वाली घोघो रानी ये पूछे कि पानी कितना है? तो बताइयेगा कि चुल्लू भर ही था, इसलिए छेनू उसमें डूब के मर न सका!

‘हमें भरतनाट्यम सीखना है लेकिन नटराजा-सरस्वती को प्रणाम नहीं करेंगे, जीसस वाले स्टेप डालो’

निहारिका गौड़ा नाम की एक ट्विटर यूज़र ने अपनी माँ, जो कि भरतनाट्यम शिक्षिका भी हैं, के साथ हुई एक घटना लिखी है, जिसे पढ़कर कोई भी हैरान रह जाएगा। निहारिका द्वारा शेयर की गई घटना से हमें पता चलता है कि समाज में असहिष्णुता और पंथिक कट्टरता कितनी ज्यादा बढ़ती जा रही है।

दरअसल, एक ईसाई दंपती ने अपने बच्चों को भरतनाट्यम में दाखिला दिलाने के बाद नटराजा की आरती करने से मना कर दिया। उन्होंने अपने पंथ से जुड़ी हुई चीज़ें भरतनाट्यम में जोड़कर सिखाए जाने की मॉंग भी की।

पूजा का सामान खुद लेकर आए

निहारिका के अनुसार, जब कोई भरतनाट्यम क्लास ज्वाइन करता है, तो उसे नटराजा की पूजा करनी होती है, यही प्रचलन है। जब 2 नए बच्चों ने क्लास ज्वाइन की, तो इसके बारे में शिक्षिका (निहारिका की माँ) ने पहले ही उनके पैरेंट्स को बता दिया था। निहारिका के अनुसार, उन अभिवावकों ने इसके लिए एडवाँस धनराशि दी और पूजा का सामान भी बच्चों के लिए खरीद कर लाए।

लेकिन, शिक्षिका ने जब पूजा के बाद उन बच्चों से आरती करने के लिए कहा तो महज़ दूसरी कक्षा में पढ़ने वाले उन बच्चों ने आरती करने से सिर्फ इसलिए मना कर दिया, क्योंकि वे ईसाई हैं। इस पर भरतनाट्यम शिक्षिका ने उनके अभिवावकों को समझाने की कोशिश की कि अगर वे महज़ आरती से इतना बिदक रहे हैं, तो भरतनाट्यम सीखेंगे कैसे? चूँकि भरतनाट्यम में अधिकाँश नृत्य तो गणेश, सरस्वती, कृष्ण आदि के बारे में ही होते हैं।

“आपकी ज़िम्मेदारी है हमारे मज़हब के बारे में भी सिखाओ”

निहारिका अपने ट्वीट में लिखतीं हैं, नृत्य और पूजा के मामले पर तार्किक रूप से सोचने की बजाय दोनों बच्चों के अभिवावक माँग करने लगे कि उनके मज़हब से जुड़ी चीज़ें, जीसस से जुड़े गाने भरतनाट्यम के रूप में सिखाए जाने चाहिए। यही नहीं, इसे उन्होंने निहारिका की माँ (भरतनाट्यम शिक्षिका) की ‘ज़िम्मेदारी’ बताया और बखेड़ा करने लगे।

निहारिका लिखतीं हैं कि हालाँकि, इस ईसाई दंपती को भरतनाट्यम में जो-जो चीज़ें आतीं हैं- श्लोक, आरती, देवी-देवताओं के गाने आदि, उन सभी से समस्या है और इसके बावजूद भी वे अपने बच्चों को भरतनाट्यम सिखाना चाहते हैं।

ईसाई भी विरोध में

जिन्हें लग रहा है कि वह ईसाई दंपती गलत नहीं कर रहे हैं, उन्हें देखना चाहिए कि कैसे बहुत से ईसाई धर्म के लोग भी सोशल मीडिया पर इस दंपती की बुराई और निहारिका की माँ का समर्थन कर रहे हैं। अनीता लोबो के मुताबिक, जब उन्होंने संगीत सीखना शुरू किया तो वे रोज़ भगवती सरस्वती की आरती करतीं थीं और उनके परिवार ने कभी भी इस पर आपत्ति नहीं की। उन्होंने बताया कि उनकी बहन भी भरतनाट्यम और कथक की प्रशिक्षित नृत्यांगना हैं।

‘दूसरी औरत’ पर थरूर और सुनंदा में रोज होता था झगड़ा, कॉन्ग्रेस सांसद पर हत्या का मामला चलाने की मॉंगी इजाजत

क्या मरने से पहले सुनंदा पुष्कर अपने पति शशि थरूर के राज खोलना चाहती थीं? दिल्ली पुलिस ने कॉन्ग्रेस सांसद के खिलाफ हत्या का मामला चलाने की इजाजत मॉंगते हुए शनिवार को अदालत को बताया कि सुनंदा आईपीएल मामले को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाली थी।

थरूर को आईपीएल की कोच्चि टीम की फ्रेंचाइजी से जुड़े विवाद में घिरने के बाद 2010 में मनमोहन सिंह की कैबिनेट से इस्तीफा देना पड़ा था। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक दिल्ली पुलिस के वकील ने बताया कि एक महिला को लेकर मौत से पहले सुनंदा और थरूर के बीच रोज झगड़ा होता था।

उन्होंने अदालत से इस मामले में थरूर के खिलाफ आईपीसी की धारा 498-A (पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा महिला के साथ क्रूरतम व्यवहार) और 306 (आत्महत्या के लिए उकसाने) के तहत आरोप तय करने का आग्रह किया।

दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत में चल रही सुनवाई के दौरान सुनंदा के भाई आशीष दास ने भी अपना बयान दर्ज कराया। उन्होंने कहा, “वह (सुनंदा) शादीशुदा ज़िंदगी से खुश थीं। अपने आख़िरी दिनों में वह बहुत परेशान रहने लगी थी। लेकिन वह कभी भी आत्महत्या करने के बारे में नहीं सोच सकती थी।”

पिछली सुनवाई के दौरान भी थरूर पर घरेलू हिंसा के आरोप लगाए गए थे। बताया गया था कि मौत के समय सुनंदा के शरीर पर मारपीट के छोटे-बड़े मिलाकर 15 निशान थे, जो कम से कम 12 घंटा और अधिक से अधिक 4 दिन पुराने थे।

उल्लेखनीय है कि 17 जनवरी 2014 को दिल्ली के होटल लीला में 51 वर्षीय सुनंदा पुष्कर मृत मिली थीं। उनकी मौत के बाद से पुलिस ने थरूर के खिलाफ़ आईपीसी की धारा 498-A और धारा -306 के तहत मामला दर्ज किया। फिलहाल वह जमानत पर हैं।

केरल: मुस्लिम छात्र मोर्चा ने कॉलेज में फहराया PAK का झंडा, बीजेपी ने कहा-परिसर में घुसे आतंकी

केरल के एक कॉलेज के कैंपस के अंदर पाकिस्तान का झंडा फहराने के आरोप में 30 से अधिक छात्रों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। जानकारी के मुताबिक, यह घटना गुरुवार (अगस्त 29, 2019) को हुई, जब मुस्लिम छात्र मोर्चा (MSF) के छात्र पेरम्बरा सिल्वर कॉलेज परिसर के अंदर संघ चुनाव के तहत जुलूस निकाल रहे थे।

बता दें कि, केरल के कोझीकोड जिले के पेरम्बरा पुलिस ने कॉलेज परिसर के भीतर पाकिस्तानी झंडा लहराने के लिए उनके खिलाफ मामला दर्ज किया है। मुस्लिम छात्र मोर्चा के आरोपित छात्रों पर आईपीसी की धारा 143, 147, 153 और 149 के तहत मामला दर्ज किया गया। इस घटना में शामिल छात्रों की पहचान की पुष्टि करने के बाद आगे की कार्यवाही की जाएगी।

छात्रों का दावा है कि MSF का झंडा भी पाकिस्तान के राष्ट्रीय ध्वज की तरह दिखता है। कॉलेज के शासी निकाय के अध्यक्ष एके थारुवयी ने कहा कि एमएसएफ ध्वज को उल्टा रखा गया था, जिसकी वजह से वह पाकिस्तान के राष्ट्रीय ध्वज की तरह लग रहा था। उन्होंने कहा कि जुलूस छुट्टी के दिन आयोजित किया गया था। साथ ही उन्होंने सोमवार (सितंबर 2, 2019) को मामले में जाँच का आश्वासन दिया है। हालाँकि, बीजेपी ने आरोप लगाया है कि कॉलेज परिसर में आतंकवादी घुस गए हैं।

कहॉं गए पाकिस्तान के सिख: 15 साल में 40 हजार से 8 हजार हो गए

सिख लड़की को घर से उठाकर आतंकी से निकाह कराने की घटना ने पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचार को फिर से बेनकाब कर दिया है। जिस पाकिस्तान में गुरु नानक देव का जन्मस्थान ननकाना साहिब है वहॉं सिखों के वजूद पर ही खतरा मॅंडरा रहा है।

15 साल में उनकी आबादी घटकर 40 हजार से 8 हजार पर सिमट गई है। सिखों का अस्तित्व खत्म करने के लिए कितनी बड़ी साजिश चल रही है इसे गुरुवार (29 अगस्त) को सामने आई घटना से भी समझा जा सकता है।
ननकाना साहिब गुरुद्वारा तंबी साहिब के एक ग्रन्थि (सिख पुजारी) की 19 साल की बेटी को घर से गुंडे घसीट कर ले गए। जबरन इस्लाम क़बूल करवाया और फिर हाफ़िज सईद के आतंकी संगठन के जमात-उद-दावा के मोहम्मद हसन से उसका निक़ाह करवा दिया गया।

मामले के तूल पकड़ने पर पहले पीड़ित लड़की का एक वीडियो सामने आया। इसमें बताया गया कि उसने अपनी मर्जी से इस्लाम क़बूल कर हसन से निक़ाह की है। फिर लड़की को डराने-धमकाने की बात सामने आई। इस्लाम क़बूल नहीं करने पर उसके पिता और भाई को गोली से मार देने की धमकी दी गई। अब भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बने दबाव के कारण पीड़िता को सुरक्षित उसके घर पहुँचाने की बात सामने आई है।

लेकिन हर मामला न तो इतना तूल पकड़ पाता है और न ही उस तरह से पाकिस्तान पर दबाव बन पाता है। लिहाजा, पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने का सिलसिला दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। ख़बर के अनुसार, पाकिस्तान में 2017 में हुई जनगणना में सिखों की आबादी 8 हजार है। 2002 में पाक में सिखों की आबादी 40 हज़ार होने का अनुमान लगाया गया था।

लाहौर के जीसी कॉलेज यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक और अल्पसंख्यक अधिकार कार्यकर्ता प्रोफेसर कल्याण सिंह के अनुसार सिखों की आबादी घटने का एक बड़ा कारण जबरन धर्म परिवर्तन भी है। विश्व के समृद्ध सिख समुदाय की ओर से पाकिस्तान के सिखों की दशा की अनदेखी को भी वे इसके लिए ज़िम्मेदार मानते ।

उन्होंने कहा कि अफ़गानिस्तान और ईरान में भी सिखों की ऐसी ही हालत है। पाकिस्तान में सिखों या अल्पसंख्यकों के लिए अपना कोई फैमिली लॉ जैसा मज़बूत क़ानून नहीं है। पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों के जबरन धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए कोई ख़ास क़ानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं है। 

पाकिस्तान की प्रशासनिक व्यवस्था का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जाँचकर्ता से लेकर वकील और जज तक, अधिकतर बहुसंख्यक समुदाय यानी मुस्लिम हैं। इसलिए सिख समुदाय से जुड़े मुद्दों का क़ानूनी तौर पर कोई समधान मौजूद ही नहीं होता। शेष बचे आठ हज़ार सिखों की सबसे बड़ी परेशानियों में शिक्षा, ग़रीबी और भेदभाव जैसे अहम मुद्दे शामिल हैं।

‘बाबरी मस्जिद शिया वक्फ की संपत्ति, हम उसे मंदिर निर्माण के लिए हिंदुओं को देने को तैयार’

शिया वक्फ बोर्ड ने शुक्रवार (अगस्त 30, 2019) को उच्चतम न्यायालय से कहा कि वह अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित जमीन का तिहाई हिस्सा मंदिर निर्माण के लिए हिंदुओं को देने को तैयार है, जो इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मुस्लिम संगठनों को आवंटित किया था। 

शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से पेश वकील एमसी ढिंगरा ने शुक्रवार को अदालत में दलील देते हुए कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए 2010 के फैसले में, विवादित भूमि का एक तिहाई हिस्सा समुदाय विशेष को दिया गया था, न कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को। इसलिए वो अपना हिस्सा हिन्दुओं को देना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि इसका एक आधार यह भी है कि बाबरी मस्जिद शिया वक्फ की संपत्ति है। उन्होंने बताया कि विवादित संपत्ति शियाओं को बिना नोटिस दिए सुन्नी वक्फ के तौर पर पंजीकृत कर दी गई और बाद में शिया बोर्ड 1946 में अदालत में इस आधार पर मामले को हार गया कि उसने एक सुन्नी इमाम नियुक्त कर लिया था।

ढिंगरा ने कहा कि हिंदुओं ने जो दलीलें दी हैं, उनसे पूर्वाग्रह रखे बिना, शिया उस संपत्ति पर अधिकार का दावा नहीं करते। 1936 तक इस पर शियाओं का कब्जा था और इसके पहले तथा अंतिम मुतवल्ली शिया थे और किसी सुन्नी को कभी मुतवल्ली नियुक्त नहीं किया गया।

इसके साथ ही, अखिल भारतीय श्री राम जन्म भूमि पुनरुद्धार समिति की ओर से वरिष्ठ वकील पी एन मिश्रा ने अपनी संक्षिप्त दलीलें रखीं और विवादित स्थल के जमीन रिकॉर्ड में हस्तक्षेप किए जाने का आरोप लगाया। मिश्रा ने कहा कि जमीन पर दावे को लेकर दूसरे समुदाय के पास कोई ठोस पक्ष नहीं है। उन्होंने कहा, ‘‘वाकिफ (वक्फ करने वाला) को जमीन का मालिक होना चाहिए। यहाँ बाबर जमीन का मालिक नहीं था।’’ उन्होंने कहा कि इस्लामी कानून और परंपराओं के तहत जमीन को वैध तरीके से अल्लाह को सौंपा जाना चाहिए और बाबर यह काम मीर बकी के जरिए नहीं कर सकता था क्योंकि इस्लाम में एक एजेंसी के माध्यम से जमीन सौंपना निषिद्ध है। मिश्रा ने कहा कि मस्जिद होने के लिए दिन में दो बार अजान के बाद नमाज पढ़ी जानी चाहिए, जबकि विवादित स्थल के मामले में ऐसा नहीं था।

पी एन मिश्रा ने कहा कि एक मस्जिद में ‘वजू’ करने के लिए पानी की टंकी होनी चाहिए मगर यहाँ पर ऐसा कोई बंदोबस्त नहीं था। उन्होंने कहा कि मस्जिद में सजीवों की कोई तस्वीर, फूलों की डिजाइन आदि नहीं होनी चाहिए जबकि विवादित स्थल पर ये सारी चीजें थीं। अदालत आगे की सुनवाई 2 सितंबर को करेगी जब मुस्लिम पक्ष आगे की दलीलें रखेगा।