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‘मुस्लिमो, दलितों के इस विरोध-प्रदर्शन से सीखो’ – रामभक्त रविदास के नाम पर हिंसा फैलाने वालो, उन्हें पढ़ो तो सही

संत रविदास का मंदिर ढहाए जाने को लेकर दिल्ली में दलितों ने ख़ूब विरोध प्रदर्शन किया। हालत इतने बिगड़ गए कि पुलिस को लाठियाँ भाँजनी पड़ी और आँसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। झंडेवालान से लेकर रामलीला मैदान तक प्रदर्शनकारियों का जमावड़ा रहा। ताज़ा खबर के अनुसार, ‘भीम आर्मी’ संगठन प्रमुख चंद्रशेखर आजाद उर्फ़ रावण सहित 91 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है। पुलिस ने इस आरोपितों के ख़िलाफ़ दंगा फैलाने और सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुँचाने का मामला दर्ज किया है। इस प्रदर्शन में चंद्रशेखर की उपस्थिति शक का कारण है।

सबसे पहले जानते हैं कि मामला शुरू कहाँ से हुआ? दरअसल, दिल्ली में डीडीए केंद्र सरकार के अधीन आती है लेकिन रविदास मंदिर को गिराने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया। इसके बाद इतना हंगामा खड़ा हो गया कि अदालत को इस पर टिप्पणी करनी पड़ी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसके आदेश का राजनीतिक इस्तेमाल किया जा रहा है और इस पूरे मामले को सियासी रंग दिया जा रहा है। कोर्ट ने पंजाब, दिल्ली व हरियाणा की सरकारों से दो टूक कहा कि सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए जाएँ।

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने भी रविदास मंदिर गिराए जाने को लेकर कड़े तेवर दिखाए, जिसके बाद दिल्ली के सीएम अरविन्द केजरीवाल ने उन्हें भरोसा दिलाया कि इसमें दिल्ली सरकार शामिल नहीं है। ये वही नेतागण हैं, जिनकी राम मंदिर के मुद्दे पर घिग्घी बँध जाती है। तुगलकाबाद में रविदास मंदिर गिराया जाना ग़लत था या सही, इस पर बहस हो सकती है। अगर यह सुप्रीम कोर्ट का निर्णय नहीं होता तो इस पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर पहले से भी ज्यादा बढ़ गया होता। यह सही है कि रविदास मंदिर से आस्थाएँ जुड़ी हैं, लेकिन इसमें कुछ ऐसे लोग शामिल हो गए हैं जो अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं।

चंद्रशेखर वही है जिसे सहारनपुर हिंसा मामले में नेशनल सिक्योरिटी एक्ट के तहत गिरफ़्तार किया गया था। यहाँ जानने लायक बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद हुई कार्रवाई से कुछ लोगों के विरोध प्रदर्शन को अब ग़लत रंग देने का कार्य शुरू हो गया है। शेखर गुप्ता के कुख्यात न्यूज़ पोर्टल ‘द प्रिंट’ की पत्रकार ज़ैनब सिकंदर ने इसे ब्राह्मणवाद-विरोधी प्रदर्शन बता दिया। उन्होंने दावा किया कि प्रदर्शनकारियों की इस भीड़ में किसी से भी बात कर लीजिए, आपको एहसास हो जाएगा कि यह ब्राह्मणवाद-विरोधी प्रदर्शन है।

इसके बाद उन्होंने चंद्रशेखर का गुणगान शुरू कर दिया। बकौल ज़ैनब, चंद्रशेखर की उपस्थिति से पता चलता है कि दलित उसके पीछे चलना चाहते हैं और उसके नेतृत्व में काम करना चाहते हैं। ये वही गिरोह है जो किसी भी नए नेता को सिर्फ़ इसीलिए महिमामंडित करना चाहता है ताकि उसे राष्ट्रीय स्तर की मीडिया का लाडला बना कर जनता के सामने पेश किया जा सके। अरविन्द केजरीवाल से लेकर कन्हैया कुमार तक, हर एक छोटे-बड़े नेता को सीधा प्रधानमंत्री के सामने खड़े करने की कोशिश की गई और दावा किया गया कि जनता इन नेताओं के पीछे खड़ी है। आश्चर्य नहीं कि ये हर बार अपने अजेंडे में फेल हुए।

इसके बाद ज़ैनब ने जो लिखा, वह हिंसा भड़काने की श्रेणी में आ सकता है। उन्होंने मुस्लिमों से अपील करते हुए लिखा कि वो भी दलितों के इस विरोध-प्रदर्शन से सीख लें और ऐसा ही करें। ज़ैनब का दावा है कि इससे देश में साम्प्रदायिकता के ख़िलाफ़ लड़ाई को बल मिलेगा। संत रविदास मंदिर पर राजनीति कर रहा चंद्रशेखर वही व्यक्ति है, जिसने अयोध्या में राम मंदिर की जगह बुद्ध मंदिर की माँग की थी। “अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी” लिखने वाले संत रविदास अगर आज ज़िंदा होते तो उनके नाम पर राजनीति करने वाले और दलितों को ‘राम अमंदिर आंदोलन’ से दूर रहने की सलाह देने वाले चंद्रशेखर को अपना भक्त तो नहीं ही मानते।

संत रविदास के सामने ब्राह्मण और सिख, सभी अपना सिर झुकाते थे। फिर उनको लेकर किया जा रहा विरोध-प्रदर्शन ब्राह्मणवाद-विरोधी कैसे हो सकता है? राम नाम का रट लगाने की बात करने वाले संत का भक्त होने का दावा करने वाला राम मंदिर का विरोध कैसे कर सकता है? जो भी लोग संत रविदास के नाम पर हिंसा फैला रहे हैं, उन्हें उनकी ये पंक्तियाँ ज़रूर पढ़नी चाहिए:

जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात,
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात

आगे बढ़ने से पहले इन पंक्तियों का अर्थ जानना ज़रूरी है। संत रविदास ने जातिवाद के अवगुण समझाने के लिए केले के पेड़ का उदाहरण लिया है। वो लिखते हैं कि जाति भी उसी प्रकार है, जैसे केले का पेड़। केले के पेड़ के तने को अगर आप छीलते जाएँ तो पत्ते के नीचे दूसरा पत्ता मिलते चला जाता है और अंत में कुछ भी नहीं निकलता और पूरा पेड़ ख़त्म हो जाता है। फिर रैदास कहते हैं कि जाति भी इसी प्रकार है, मनुष्य तक तक एक-दूसरे से नहीं जुड़ सकता, जब तक जाति न चली जाए। आज इन्हीं पक्तियों के रचयिता के नाम पर जातिवाद को हवा दी जा रही है।

बचपन में जानवरों की चमड़ी उतारने और बेचने का काम करने वाले रविदास के परिवार का यह पारम्परिक पेशा था लेकिन उनका मन भक्ति में ऐसा रमा कि मीराबाई जैसी भक्त भी उनसे प्रेरित हुईं। आज उनके नाम पर राजनीति चमकाने वाले तो कम से कम उनसे तो प्रेरणा नहीं ही ले रहे। जिसने भी जातिवाद हटाने की माँग की, उसे ब्राह्मणों का दुश्मन साबित कर दो – यह नया प्रचलन है क्योंकि वो व्यक्ति जवाब देने के लिए अभी मौजूद नहीं है और लोग तो उसका लिखा पढ़ेंगे ही नहीं। बस यहीं से बेवकूफ बनाने का सिलसिला शुरू हो जाता है।

दिल्ली सरकार के मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने कहा कि वह अपने समुदाय के प्रतिनिधि के रूप में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया कि आंबेडकर की मूर्तियाँ ढहाई जा रही हैं और दलित समुदाय के संत रविदास की मंदिर को गिरा दिया गया। संत रविदास ‘भक्ति आंदोलन’ के संतों में से एक थे, जिन्होंने राम और कृष्ण को भजा और दूसरों को भी उनकी भक्ति करने का सन्देश दिया। किसी को एक समुदाय के संत या नेता के रूप में बाँध कर राजनीति चमकाना कहाँ तक उचित है? हो सकता अभी इस पर और नए नाटक हों!

मामला भले ही कुछ और से जुड़ा हो, उसमें मनुवाद घुसेड़ दो। मामला भले ही कुछ भी हो, उसमें ब्राह्मणवाद का छौंक डाल दो। आश्चर्य नहीं होना चाहिए जब गिरोह विशेष के एक्टिविस्ट्स तख्ती लेकर ब्राह्मणवाद और मनुवाद का नाम लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के लिए मोदी को गाली दने निकल आएँ। और हाँ, महिला एक्टिविस्ट्स के पास तो असीमित तरीके हैं विरोध प्रदर्शन करने के। जैसा कि हम देखते आए हैं, उसी परंपरा को फॉलो करते हुए वे अपनी नंगी पीठ पर ब्राह्मणों के विरोध में गालियाँ लिख कर निकल सकती हैं!

अब उत्तराखंड कॉन्ग्रेस में टूट: 3 बड़े नेताओं के साथ 25 ने पद और पार्टी को त्याग थामा BJP का दामन

केंद्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर पर अनुच्छेद-370 पर लिए फ़ैसले के बाद से ही सियासत और तेज़ हो गई है। ख़ासतौर पर कॉन्ग्रेस इस फ़ैसले से काफ़ी नराज़ है। एक तरफ़ तो वो इसके विरोध में है, वहीं दूसरी तरफ़ इस फ़ैसले के समर्थन में कॉन्ग्रेस के कई नेता बीजेपी में शामिल हो रहे हैं।

ख़बर के अनुसार, कॉन्ग्रेस के तीन बड़े नेता अपने पदों और पार्टी की सदस्यता से त्यागपत्र देकर समर्थकों संग बीजेपी में शामिल हो गए। बुधवार (21 अगस्त) को कॉन्ग्रेस पार्टी के उत्तराखंड किसान प्रकोष्ठ के प्रदेश महासचिव वरुण गहलोत, प्रदेश सचिव राजीव चौहान और खेलकूद प्रकोष्ठ के उपाध्यक्ष अजय सिंह ने कॉन्ग्रेस छोड़ बीजेपी का दामन थाम लिया।

मीडिया में ख़बरों के अनुसार, कुल 25 कॉन्ग्रेस नेताओं ने कॉन्ग्रेस छोड़ बीजेपी की सदस्यता ली। सभी ने बुधवार को बीजेपी के सदस्यता प्रमुख एवं पूर्व सांसद प्रतिनिधि धर्मेंद्र कुमार से सदस्यता पत्र प्राप्त किए। उत्तराखंड के रायपुर ग्राम निवासी वरुण गहलोत कॉन्ग्रेस के साथ लंबे समय से जुड़े हुए थे। उन्होंने अपने 25 साथियों के साथ बीजेपी की सदस्यता ली। इनमें कॉन्ग्रेस की पूर्व सांसद प्रतिनिधि शीतल जोशी, कोमल सिंह भी शामिल हैं।

शीतल जोशी ने अपने आवास में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेन्स में पत्रकारों से कहा कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 व 35-A को हटाना केंद्र सरकार का ऐतिहासिक फ़ैसला है। इस दौरान वहाँ कोमल सिंह के अलावा डॉ सुदेश, बलराम तोमर और कमल चौहान भी मौजूद थे।

9 साल पहले जिस CBI दफ्तर में बने थे पी चिदंबरम मुख्य अतिथि, गिरफ्तारी के बाद उसी में गुजरी रात

पूर्व केंद्रीय मंत्री और कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता पी. चिदंबरम को INX मीडिया करप्शन मामले में सीबीआई ने काफी मशक्कत के बाद बुधवार रात दिल्ली के जोर बाग स्थित उनके सरकारी आवास से गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद सीबीआई उन्हें दिल्ली स्थित अपने मुख्यालय लेकर गई। जहाँ रहकर पूर्व वित्त मंत्री ने अपनी पूरी रात गुजारी।

दिलचस्प बात ये है कि जिस मुख्यालय में पी चिदंबरम को रखा गया, उसका उद्घाटन 8 साल पहले 30 जून 2011 को उनकी मौजूदगी में ही किया गया था। वह यहाँ मुख्य अथिति में समारोह में शामिल हुए थे। शायद उस समय उन्हें मालूम नहीं था कि कुछ समय बाद उन्हें यहाँ एक दोषी की तरह लेकर आया जाएगा।

पूर्व वित्त मंत्री की गिरफ्तारी के बाद इस समारोह का वीडियो क्लिप न्यूज एजेंसी एएनआई ने ट्वीट किया है। इस वीडियो में हम पी चिदंबरम को पूर्व मुख्यमंत्री मनमोहन सिंह के साथ देख सकते हैं। इस उद्घाटन में उनके और मनमोहन सिंह के अलावा कपिल सिब्बल, वीरप्पा मोईली, मल्लिकार्जुन खड़गे समेत अन्य नेता भी शामिल थे।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक पूर्व केंद्रीय मंत्री को रात भर इसी सीबीआई के मुख्यालय में रखा गया। अब आज गुरुवार को उनकी पेशी कोर्ट में होनी है। उन्होंने बुधवार देर रात अरेस्ट होने से पहले कॉन्ग्रेस मुख्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सफाई दी कि पिछले 27 घंटों से वह कहाँ थे और क्यों सीबाआई के सामने नहीं आ रहे थे? उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि आजादी के लिए लड़ना पड़ता है।

अब अपराध नहीं करूँगा: इनामी अपराधी निज़ाम ने गले में तख्ती लगा UP पुलिस के सामने किया सरेंडर

उत्तर प्रदेश पुलिस का खौफ अपराधियों के सर चढ़ कर बोल रहा है, तभी तो अपराधी ख़ुद-ब-ख़ुद आत्मसमर्पण करने पहुँच रहे हैं। ऐसा ही एक वाकया बुलंदशहर में देखने को मिला। खुर्जा में निज़ाम ने ख़ुद थाना पहुँच कर पुलिस को बताया कि वह अपराधी है और उसे गिरफ़्तार कर लिया जाए। 25,000 रुपए के इनामी निज़ाम ने गले में एक पर्ची लटका रखी थी। उस पर लिखा था, “साहब मैं अपराधी हूँ, मुझे गिरफ़्तार कर लो।” यह देख कर पुलिस भी एक पल के लिए भौंचक रह गई।

फिलहाल पुलिस ने निज़ाम को कब्जे में लेकर उसे जेल भेज दिया है। वह पिछले माह (जुलाई 2019) की एक घटना में सम्मिलित था, जिसमें बदमाशों द्वारा कैंटर, मोबाइल और रुपए लूट लिए गए थे। इस मामले में पुलिस ने समीर नामक अपराधी को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया था लेकिन बाकि अपराधी पुलिस के शिकंजे से बाहर थे और उन्हें पकड़ने के लिए इनाम रखा गया था।

सोमवार (अगस्त 19, 2019) को पुलिस और अपराधियों की एक मुठभेड़ हुई, जिसमें एक अन्य इनामी अपराधी विजय पुलिस के शिकंजे में आ गया था। उसके पैर में पुलिस की गोली लगने से वह घायल हो गया था, जिसके बाद उसे गिरफ़्तार कर लिया गया। अपने दोनों साथियों का हश्र देख कर निज़ाम के अंदर पुलिस का डर बैठ गया और उसने आत्मसमर्पण करने में भी भलाई समझी। उसने सरेंडर करने के दौरान अपना पिस्तौल भी पुलिस को सौंप दिया। निज़ाम के ख़िलाफ़ 4 मुक़दमे दर्ज हैं।

निज़ाम ने स्वीकार किया कि उसने पुलिस के डर से आत्मसमर्पण किया है। उसने कहा कि अपने दोनों साथियों को गोली लगने की ख़बर के बाद वह घबराया हुआ था। निज़ाम ने बताया कि वह पहले अपने भाइयों के पास गया और उनसे कहा कि वे उसका आत्मसमर्पण करा दें। उसने कहा कि वह ख़ुद चल कर पुलिस थाने तक आया है।

निज़ाम ने गले में लटकाई हुई पट्टी में यह भी लिख रखा था कि वह आगे से अपराध नहीं करेगा। उत्तर प्रदेश में पुलिस और अपराधियों के बीच एनकाउंटर की कई वारदातों के कारण बदमाशों में हड़कंप है और वे आत्मसमर्पण कर रहे हैं। जुलाई में ख़बर आई थी कि अकेले रामपुर जिले में 45 दिनों के भीतर 145 से भी अधिक आरोपितों ने आत्मसमर्पण किया था। उन सबके ख़िलाफ़ अपहरण और लूट से लेकर गोहत्या तक के मामले दर्ज थे।

विवेकानंद का ‘सर्व-धर्म-समभाव’ इस्लाम के लिए एक मौका था, कट्टरपंथियों को सोचना होगा क्यों गँवा दिया

ज़्यादा नहीं, केवल लोकसभा चुनाव के पहले तक हिन्दुओं को बरगलाने के लिए “ज़रा सोचो गाँधी जी अगर होते तो तुम्हारे बारे में क्या सोचते?” का चूरन चटाया जाता था, इमोशनल ब्लैकमेलिंग होती थी। मोहनदास गाँधी की भावनात्मक गुलामी का वह जुआ करोड़ों आम हिन्दुओं ने अपने गले से निकाल कर फेंक दिया है (गाँधीवादी नरेंद्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री चुनने के बावजूद), और यह धमक लेफ्ट-इललिबरलों (छद्म-उदारवादियों) को साफ़ सुनाई दे रही है। इसीलिए अब यह गिरोह खोद-खाद के स्वामी विवेकांनद को निकाल लाया है अपने नए आदर्श के रूप में, “बताओ ‘ये’ होते तो क्या कहते” का बरगलाना चालू रखने के लिए।

और यही विवेकानंद थे जो कुछ साल पहले तक 1946 में कलकत्ता में ‘Direct Action Day’ पर मुस्लिमों द्वारा हिन्दुओं के सामूहिक हत्याकांड के लिए ज़िम्मेदार ठहराए जाते थे, बावजूद इसके कि 1902 में खुद उनकी मृत्यु हो चुकी थी, वह भी महज़ इसलिए क्योंकि उन्होंने देशप्रेम को हिन्दुओं के धर्म से जोड़ने का ‘हराम’ कर्म कर दिया था। वही विवेकानंद जिन पर साम्प्रदायिक असहिष्णुता और ब्राह्मणवादी-जातिवादी अभिमान में आकर पुराणों को नकार कर ‘शुद्ध’ वेदों-उपनिषदों को बढ़ावा देने का कीचड़ उछाला जाता था। आज उन्हीं विवेकानंद का हवाला देकर ‘द हिन्दू’ अख़बार हिन्दुओं को ज्ञान दे रहा है कि अगर विवेकानंद ज़िंदा होते तो हिंदूवादी राजनीति से नाराज़ होते।

देखने में यह भारी-भरकम ज्ञान ज़रूर है लेकिन अगर तह-तह अलग-अलग छीली जाए तो वैसे ही खोखला है, जैसे खोखले तर्कों का पुलिंदा बनाकर आजकल लेफ्ट मारता है, इस उम्मीद में कि कोई एक-आधी अंधी-चुक्की सही बैठ जाए।

राष्ट्रवाद मिथक नहीं, जीवित सत्य है

सबसे पहले तो लेखक राहुल मुखर्जी राष्ट्रवाद को जो ‘मिथक’ (‘myth’) कहते हैं, उस पर बात करनी ज़रूरी है। हालाँकि ‘myth’ के कुछ सूक्ष्म अर्थ (nuances) सकारात्मक भी होते हैं, लेकिन चूँकि यह द हिन्दू में छपा लेख है, और मंतव्य भी हिन्दुओं पर हमला है, अतः यह मानने में कोई बुराई नहीं कि जब राहुल मुखर्जी राष्ट्रवाद को ‘राष्ट्रनिर्माण करने वाले मिथकों में संघर्ष’ कहते हैं, तो उनका अर्थ राष्ट्रवाद को नकारात्मक, खोखला झूठ बताना ही होता है।

तो राहुल मुखर्जी जी, आप गलत हैं: भारत का राष्ट्रवाद कोई असत्य मिथक नहीं, जीवित सत्य है, जो हज़ारों राजनीतिक इकाईयों में बंटे होने के बावजूद समरकंद और ईरान से वर्तमान बाली-सुमात्रा-इंडोनेशिया तक के भूभाग को एक सभ्यता, एक राष्ट्र के रूप में अपनी ज़बान में स्वीकार्यता देने के लिए मजबूर करता था। असम, गुजरात, कंधार और केरल के रजवाड़ों के लिए अलग-अलग शब्द की बजाय हर भाषा में इस सभ्यता के लिए, इस भूभाग के लिए हमेशा से एक ही शब्द होना अपने आप में इस राष्ट्रवाद की सच्चाई का सबूत है।

विवेकानंद का सर्व-धर्म-समभाव

यह सत्य है कि कुछ मौकों पर विवेकानंद ने इस्लाम और ईसाईयत को भी शैवत्व, वैष्णव सम्प्रदाय, शक्तोपासना जैसा ही ‘एक अन्य धर्म’ माना था; केवल उन्होंने ही नहीं, जब इस्लाम और ईसाईयत पहली बार भारत की दहलीज़ पर आए तो हमने उन्हें उसी तरह स्वीकार किया जैसे हज़ारों सालों से हम मिस्रियों, ग्रीको-रोमन उपासकों, जापानी और चीनी बौद्धों, शिंटो मतावलम्बियों से लेकर हमें अपनी आस्था में ‘पापी’ मानने वाले लेकिन हमारे धर्म के खिलाफ आक्रामक न होने वाले यहूदियों और ‘अहुरों’ के उपासक पारसियों को स्वीकार किया था। इस ‘स्वीकार’ में एक उम्मीद थी- कि जैसे उपरोक्त मतावलम्बी भारत में अपनी आस्था अपने घर और अपने तक सीमित रखकर स्थानीय लोगों की आस्था का सभ्य लोगों की तरह सम्मान करते रहे हैं, वैसे ही इस्लामी और ईसाई भी करेंगे। लेकिन इसके बदले ईसाईयों और इस्लामियों ने हमारा ऋण कैसे ‘चुकाया’, यह इतिहास किसी को पढ़ाए जाने की ज़रूरत नहीं है।

वापिस विवेकानंद पर आएँ तो वे इस इतिहास से अनभिज्ञ नहीं थे। उन्होंने कुछ बार इस्लाम स्वीकार किए जाने और अंतरराष्ट्रीय धर्म सभा में “सहिष्णुता नहीं, स्वीकार करना” भले कहा हो, लेकिन वे वहाँ हिन्दू क्या सोचते हैं, यह कह रह थे; इस्लाम को लेकर उनकी समझ, कि इस्लाम क्या चाहता है, कुछ अन्य स्थानों पर साफ़ है। इस्लाम की दूसरों पर अल्लाह को ‘थोपने’ की प्रवृत्ति को वह स्पष्ट रूप से स्वीकार करते थे। उनके अनुसार जिन्हें आज हम “मॉडरेट मुस्लिम” कहते हैं, जो दूसरों की आस्था को भी इस्लाम जितना सही मानने की बात करे, वह अपने पिता की आस्था/उपासना पद्धति (इस्लाम) की भाषा नहीं, सीधे सत्य बोल रहा है। यानी वे यह मानते थे कि इस्लाम कभी दूसरी आस्था को अपने विचारों में तो सम्मलित कर ही नहीं सकता।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि अगर वे यह मानते थे कि इस्लाम की आस्था/आध्यात्मिक विचारधारा में तो अल्लाह के अलावा कोई और भी सत्य हो सकता है, ऐसा मानने का स्थान नहीं है तो उनका ‘सर्व-धर्म-समभाव’ आखिर था क्या? और इसका जवाब यह होगा कि यह इस्लाम से नहीं, मुस्लिमों से उम्मीद थी। यह मुस्लिमों से उम्मीद थी कि यद्यपि वे हिन्दुओं को अपनी आस्था, अपने मन और विचार में मूर्ति-पूजा के लिए, मोसेस को 10 हिदायतें (commandments) देने वाले अब्राहमिक पंथों के ‘ईर्ष्यालु’ देवता (for I, the LORD your God, am a jealous God; Exodus 20:5) के अलावा अन्य की पूजा करने के लिए हमारे नर्क में जाने की कामना करें, लेकिन सार्वजनिक व्यवहार में अपनी आस्था को उतारने न लगें। विवेकानंद के ‘सर्व-धर्म-समभाव’ में मुस्लिमों को ‘benefit of doubt’ दिया गया था कि भले ही उनके पूर्वजों ने इस्लामी आयतों का, कुरान, हदीस और शरीयत का हवाला देकर हज़ारों मंदिर तोड़े, अनगिनत हत्याएँ और बलात्कार किए, लेकिन ऐसा नहीं है कि आधुनिक मुस्लिम इस पंथिक आक्रामकता के व्यवहार के अतिरिक्त और किसी तरह का व्यवहार कर ही नहीं सकते।

विवेकानंद का ‘सर्व-धर्म-समभाव’ उम्मीद थी कि शायद उसी Exodus के पहाड़ वाले jealous God को मानने वाले, लेकिन हिन्दुओं के साथ सैकड़ों वर्षों तक शांति से रहने वाले यहूदियों जैसा बर्ताव मुस्लिम अब जाकर सीख जाएँगे।

किसने किया विवेकानंद को निराश?

विवेकानंद का ‘सर्व-धर्म-समभाव’ को हिन्दुओं ने नहीं, समुदाय विशेष ने निराश किया है। उनकी उम्मीद को निराश किया क्योंकि अगर हिन्दू कुछ समय और उन्हें benefit of doubt दे दें, कि इतिहास में बहा खून शायद पंथिक कारणों से कम, राजनीतिक कारणों से अधिक बहा, तो समुदाय विशेष इस उद्गार का प्रत्युत्तर अपना व्यवहार हिन्दुओं की उम्मीदों के मुताबिक शांतिपूर्ण कर देंगे।

समुदाय विशेष ने समाज के तौर पर क्या उत्तर दिया, यह भी इतिहास के हर पन्ने में लिखित है। विभाजन के खून से, कश्मीरी पंडितों के खून से, कैप्टेन सौरभ कालिया के खून के साथ-साथ उनकी चीखों से, करोड़ों पाकिस्तानी मुस्लिमों के खून से, यहाँ तक कि राइफलमैन औरंगज़ेब के भी खून से।

ऐसे में हिन्दुओं को नहीं, समुदाय विशेष को यह सोचने की ज़रूरत है कि हज़ार साल की हिंसा से बाद जब विवेकानंद ने रक्तिम स्लेट को अपने भगवा वस्त्र से पोंछ कर एक नया, ताज़ा पन्ना दिया, हिन्दुओं की आस्था का सम्मान करते हुए रहने के लिए, हिन्दुओं का जबरन मतांतरण न करते हुए अपनी आस्था की अन्य हिदायतों का पूरा पालन करने की आज़ादी के साथ, तो उनके पूर्वजों में से अधिकाँश ने उस पन्ने पर क्यों विभाजन की एक नई खूनी दास्ताँ लिख दी, क्यों मुस्लिम-बहुल कश्मीर को हिन्दू-बहुल भारत का साथ मंज़ूर नहीं हुआ और उन्होंने कश्मीरी पंडितों के साथ वो किया जो उन्हें नहीं करना चाहिए था।

हिन्दुओं ने विवेकानंद को निराश ज़रूर किया है, राहुल मुखर्जी जी, लेकिन निरर्थक साबित हुए ‘सर्व-धर्म-समभाव’ की टोकरी सर से फेंककर नहीं, उनकी वह हिदायत याद न रखकर कि “हिन्दू धर्म से बाहर जाने वाला (मतांतरण करने वाला, ज़ाहिर तौर पर इस्लाम या ईसाईयत में) हर इंसान केवल (हमारी संख्या में) एक कम नहीं, (धर्म के) शत्रुओं में एक अधिक है।” बाकी साथ में गाँधी जी का सम्पुट लगाना तो बंद कर ही दें तो बेहतर होगा; गाँधी राजनीतिक नेता भले रह जाएँ, हिन्दुओं के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक नेता की पदवी उनसे छिन ही नहीं रही है, बल्कि छिन चुकी है।

‘…अगर आप शारीरिक संबंध बनाती हैं, यह जानते हुए कि उसके साथ शादी निश्चित नहीं है तो वह रेप नहीं होगा’

बलात्कार मामलों के मद्देनजर सर्वोच्च न्यायालय ने बड़ा फैसला लिया है। कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई महिला भविष्य में शादी की सुनिश्चता जाने बिना किसी शख्स के साथ लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाती है तो वह उस पर ये कहकर बलात्कार का आरोप नहीं लगा सकती कि उस आदमी ने उससे शादी का वादा किया था।

न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूण और जस्टिस इंदिरा बनर्जी ने ये फैसला सेल्स टैक्स की असिसटेंट कमिश्नर द्वारा दायर मामले को केंद्र में रखकर लिया। जानकारी के मुताबिक महिला अधिकारी ने सीआरपीएफ के डेप्यूटी कमांडेंट पर बलात्कार का आरोप लगाया था। इस मामले पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने बताया कि दोनों पिछले 6 साल से रिश्ते में थे और अलग-अलग मौक़ो पर एक दूसरे के घर में भी रहते थे। जिससे पता चलता है कि दोनों के बीच सहमति वाले संबंध थे। इसलिए उन्होंने कमांडेंट पर लगे सभी आरोपों को खारिज कर दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो याचिकाकार्ता सीआरपीएफ ऑफिसर को 1998 से जानती हैं। महिला का आरोप है कि सीआरपीएफ ऑफिसर ने उनसे शादी का झूठा वादा करके जबरन साल 2008 में संबंध स्थापित किए। उसके बाद उनका रिश्ता 2016 तक चलता रहा। वो दोनों एक दूसरे के घर आते-जाते और एक दूसरे के साथ रहते। साल 2014 में पुरुष अधिकारी ने महिला की जाति के आधार पर उनकी शादी होने में आशंका जताई, उसके बावजूद भी दोनों का रिश्ता बरकरार रहा। लेकिन साल 2016 में जब CRPF ऑफिसर ने किसी और महिला से अपनी सगाई की बात बताई तो महिला अधिकारी ने उस पर केस कर दिया।

मामले के मद्देनजर बेंच ने कहा कि वादा करना और किन्हीं परिस्थितियों में उसे नहीं निभा पाना वादा कर धोखा देना नहीं है। कोर्ट ने कहा, ” झूठे वादे कर महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाने में और आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाने में फर्क है। झूठा वादा कर धोखा देना वह स्थिति है, जिसमें वादा करने वाले शख्स के मन में जुबान देते वक्त उसे निभाने की सिरे से कोई योजना ही न हो।”

कोर्ट ने महिला की शिकायत पर बारीकी से अध्य्यन करते हुए कहा कि 2008 में किया गया शादी का वादा 2016 में पूरा नहीं किया जा सका। सिर्फ इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता है कि शादी का वादा महज शारीरिक संबंध बनाने के लिए था। कोर्ट ने यह भी कहा कि महिला शिकायतकर्ता को भी इस बात का पता था कि शादी में कई किस्म की अड़चनें हैं। वह पूरी तरह से परिस्थितियों से अवगत थीं।

धमकी का असर: 2 दिन के भीतर ही 50% से ज्यादा पूर्व सांसदों ने खाली किया सरकारी बंगला

पानी और बिजली के कनेक्शन काट दिए जाने के निर्देश के कारण, या यूँ कहें कि डर के कारण सरकारी बंगलों में रहने वाले 50% से अधिक पूर्व सांसदों ने अपना-अपना सरकारी आवास खाली कर दिया है।

ख़बर के अनुसार, जिन पूर्व सांसदों ने अभी अपना सरकारी आवास खाली नहीं किया है, उनकी संख्या अब घटकर केवल 109 रह गई है। अधिकारियों के मुताबिक़, अधिकांश पूर्व क़ानून निर्माताओं ने अपने आवास खाली कर दिए हैं। दरअसल, हाउसिंग कमिटी ने सभी पूर्व सांसदों को सरकारी आवास खाली करने के लिए 7 दिनों की समय-सीमा दी गई थी।

एक अधिकारी ने बताया कि अगले कुछ दिनों में 90% सरकारी आवास खाली होने की संभावना है। बता दें कि सोमवार (19 अगस्त) को, संसदीय पैनल ने चेतावनी दी थी कि जो पूर्व सासंद सरकारी आवास खाली करने में आनाकानी कर रहे हैं, उनके आवास में बिजली-पानी की सप्लाई काट दी जाएगी। लोकसभा सदन समिति ने 300 सांसदों को नए आवास आवंटित किए हैं।

जानकारी के अनुसार, नए सांसदों को कुछ और हफ्तों के लिए पारगमन आवास में रहना होगा क्योंकि खाली आवास में थोड़ी-बहुत मरम्मत की आवश्यकता होती है। मानदंडों के अनुसार, पूर्व सांसदों को लोकसभा भंग होने के एक महीने के भीतर अपना आधिकारिक आवास खाली करना होता है।

फ़िलहाल, कुछ नए मंत्री अपने आधिकारिक आवास की प्रतीक्षा कर रहे हैं क्योंकि अभी पूर्व सांसदों ने अपने आवास खाली नहीं किए हैं। कुछ दोबारा चुने हुए सांसदों को, जिन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली, उन्हें वर्तमान आवास को खाली करने के लिए लोकसभा निकाय से नया आवास लेने की आवश्यकता होगी।

वीर सावरकर की प्रतिमा पर पोती कालिख, पहनाया जूतों का हार: DU में कॉन्ग्रेसी छात्र संगठन की करतूत

कॉन्ग्रेस के छात्र संगठन ‘नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI)’ ने आधी रात में वीर सावरकर की प्रतिमा को जूतों का हार पहनाया और चेहरे पर कालिख पोत दी। मंगलवार (अगस्त 20, 2019) को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैम्पस में आर्ट्स फैकल्टी गेट के बाहर सावरकर की प्रतिमा की स्थापना की थी। दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ के अध्यक्ष और एबीवीपी नेता शक्ति सिंह ने ये प्रतिमा स्थापित करवाई थी।

सोशल मीडिया पर ट्वीट की गई वीडियो के अनुसार, सावरकर की प्रतिमा को एनएसयूआई दिल्ली के प्रदेश अध्यक्ष अक्षय ने जूते की माला पहनाई। अक्षय ने समर्थकों संग मिल कर प्रतिमा के चेहरे पर कालिख पोत दिया। इस दौरान एनएसयूआई के छात्रों की सुरक्षाकर्मियों से झड़प भी हुई।

प्रतिमा की स्थापना के समय शक्ति सिंह ने बताया था कि प्रतिमा की स्थापना से पहले उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन को कई बात पत्र लिख कर अनुमति माँगी लेकिन उनकी तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया। उन्होंने आरोप लगाया था कि विश्वविद्यालय प्रशासन छात्र संघ की बातों को गंभीरता से नहीं ले रहा था। इसलिए छात्र संघ ने अंततः मूर्ति की स्थापना का निर्णय लिया। शक्ति सिंह ने कहा कि मूर्ति की स्थापना इसीलिए की गई है ताकि युवाओं को वीर सावरकर से प्रेरणा मिले।

वीर सावरकर भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे, जिन्हें अंग्रेजों ने कालापानी की कठिन सज़ा दी थी। वह हिंदुत्व विचारक और एक प्रखर लेखक भी थे। वह कॉन्ग्रेस के आलोचक थे, जिन्होंने हिन्दू राष्ट्र की संकल्पना पर जोर दिया। उनके सम्मान में पोर्ट ब्लेयर एयरपोर्ट का नाम 2002 में ‘वीर सावरकर इंटरनेशनल एयरपोर्ट’ रखा गया।

मिस्टर चिदंबरम को, पूर्व गृह मंत्री, वित्त मंत्री को ऐसे उठाया CBI ने… तो? चावल के लोटे में पैर लगवाते?

चिदबंरम को आज, 21 अगस्त, 2019 को देर रात सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया। कोर्ट से बेल पाने की बहुत कोशिश हुई थी दिन में, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब लिस्ट में नंबर आएगा तो आम आदमी की तरह सुनवाई होगी। सीबीआई के पास अधिकार भी थे, मौका भी, उन्होंने चिदंबरम को दिल्ली में गिरफ्तार कर लिया।

इस पूरे प्रकरण पर एनडीटीवी को लाइव देखता रहा। एक घंटे तक बर्दाश्त करने के बाद जो जानकारियाँ मिलीं वो यह थीं कि, बकौल रवीश कुमार, चिदंबरम भाजपा में शामिल हो जाते तो इतना सब देखने से बच जाते। रवीश जी की ये बात बिलकुल सही है। भाजपा ने वाकई कई लोगों पर पहले खूब आरोप लगाए, बाद में शांत हो गई जब वो उसकी पार्टी में शामिल हो गए। ये गलत है, लेकिन यही राजनैतिक वास्तविकता भी है।

आगे, रवीश जी ने खूब मजे लिए, दुखी भी दिखे, आश्चर्यचकित भी। दुखी इस बात पर कि इसे टीवी का इवेंट बना दिया गया। ये बात मुझे कोई बता दे कि आपके पास अपना शो है, बहुत बड़े पत्रकार हैं, क्या आप अपने शो तक को कैसे चलाएँ, उस पर निर्णय नहीं ले सकते? या आप खुद भी लाइव कमेंट्री करेंगे और ज्ञान देंगे कि ‘बताइए, एक अरेस्ट ही होना था, सब लोग इसी को दिखा रहे हैं। मैं तो घंटों तैयारी कर के कुछ और करने आया था। मेहनत बेकार हो गई।’ घंटों की तैयारी थी, तो वही करते। जब खबर आ जाती कि गिरफ्तारी हो गई, या नहीं हुई तो लाइव शो में बोल देते कि क्या हुआ।

यही सब वो मौके हैं जहाँ व्यक्ति खुद को मॉरल हाय ग्राउंड पर खड़ा दिखाता है लेकिन उसे भी उसी कीचड़ में लोटना है जिसमें बाकी सब हैं।

आगे जब एनडीटीवी संवाददाता नीता शर्मा ने बताना शुरु किया तो उनकी पूरी रिपोर्टिंग में मुद्दे से ज़्यादा जोर इस बात पर रहा कि वो चिदंबरम नाम के पहले मिस्टर तो हर बार लगाएँ ही, साथ ही, दुनिया को यह भी बताती रहें कि उन्होंने सीबीआई को खूब कवर किया है लेकिन कभी उन्हें दीवार फाँद कर, एक राज्यसभा सांसद, एक पूर्व गृह मंत्री, एक पूर्व वित्त मंत्री को ऐसे गिरफ्तार करते नहीं देखा।

संवाददाता ने बार-बार बताया कि सीबाआई दरवाजे के खुलने का इंतजार भी तो कर सकती थी। सही बात है। अगर वो लोग इंतज़ार करते तो क्या पता मिस्टर चिदंबरम केस की फाइलें लेकर स्वयं आते और कहते कि ‘लीजिए पढ़ लीजिए, आप लोग यहाँ क्यों आए, मुझे फोन कर लिया होता, मैं स्वयं आ जाता!’

जब रवीश गोदी मीडिया की बात करते हैं तो उसकी प्रकृति ऐसी ही होती है। किसी पर आरोप हैं, और आपकी रिपोर्टिंग का पूरा भार उसे ‘मिस्टर’ और ‘पूर्व मंत्री’ बताने में लगा हुआ है जैसे कि ऐसे लोगों को कानून में कोई अलग व्यवस्था दी गई हो। मुझे याद है कि कारवाँ मैगज़ीन और ‘द वायर’ में छपी तीन फर्जी खबरों पर रवीश ने कितने प्राइम टाइम किए थे। वहाँ भी इसी तरह के सम्माननीय लोग शामिल थे, कोई केस नहीं था, लेकिन रिपोर्टिंग में कहा जाता रहा कि जाँच कराने में क्या जाता है। ये कॉन्ग्रेस के समय में मिस्टर-मिस्टर क्यों होने लगा?

लोग ऐसे अनजान बन रहे हैं जैसे उन्हें पहले की बातें याद ही नहीं हों कि चिदम्बरम के गृह मंत्री रहते अमित शाह के साथ क्या हुआ था। तब बात होने लगती है कि क्या ऐसे ही होता रहेगा? अंतर बस यही है कि चिदम्बरम पर तीन मामले हैं, सुप्रीम कोर्ट में भी इस पर चर्चा हुई और कानूनी रूप से दायरे में रह कर ही कार्रवाई की गई।

वो पूर्व गृह मंत्री हों या सड़क किनारे झालमूढ़ी का ठेला लगाने वाले, गेट नहीं खोलेंगे तो दीवार फाँदना ही एक उपाय है। अगर एनडीटीवी को सीबीआई के दीवार फाँदने पर मर्यादा और ‘तेलगी को भी सम्मान से लाया गया था’ याद आ रहा है तो उसे यह बात भी तो याद रखनी चाहिए पूर्व गृह मंत्री को कानून का सम्मान करते हुए, संविधान पर, कोर्ट पर, सरकारी संस्थाओं पर विश्वास दिखाते हुए, एक उदाहरण पेश करना चाहिए था।

उसके बाद रवीश कुमार अपनी चिरपरिचित हें-हें-हें वाली हंसी के साथ बोलने लगे कि ‘इंद्राणी मुखर्जी तो स्वयं ही हत्या के मामले में आरोपित है, उसकी बात पर चिदंबरम को गिरफ्तार किया जा रहा है।’ आरोपित तो आपके मालिक भी हैं रवीश जी, उन पर जाँच होती है, बुलाया जाता है तो आप ‘प्रेस फ्रीडम पर हमला’ कहने लगते हैं। आरोपित होने से क्या उस व्यक्ति की हर बात झूठी हो जाती है? ये आप तय करेंगे या कोर्ट, या कॉमन सेंस?

ये सब देख कर आदमी अपना सर ही पीट ले कि पत्रकारिता के नाम पर ये किस तरह की ओपनियिनबाजी चल रही है? गेट पर इंतजार कर सकती थी सीबीआई, उन्हें ऐसे क्यों अरेस्ट किया, सुबह में कर लेते, उसकी बात पर क्यों अरेस्ट किया, ऐसे मामलों में तो बीस-बीस साल कुछ होता नहीं… मतलब, कोर्ट में केस खिंचता है तो क्या केस बनना ही बंद हो जाए?

जब बात पोलिटिकल वेन्डेटा, या राजैनतिक बदले की भावना से ही प्रेरित दिख रही है तो उस वास्तवकिता को स्वीकारने में क्या समस्या हो रही है कि जिसके पास सत्ता होती है, वो अगर अपराध साबित न भी कर पाए, लेकिन विरोधियों को पाँच दिन जेल में तो रख ही सकता है। मैं हैरान हो जाता अगर रवीश कुमार अमित शाह के जेल जाते वक्त भी इसी तरह की हल्के-फुल्के सत्संग टाइप के शब्दों के साथ कवर कर रहे होते।

जिस तरह से इस पूरे प्रकरण में एनडीटीवी ने माहौल बनाया है, जैसे इन लोगों ने एक व्यक्ति के नेता होने, मंत्री होने, राज्यसभा सांसद होने पर ज़ोर दिया है लगता तो यही है कि कल अगर प्रणय रॉय, राधिका रॉय आदि को सरकारी संस्थाएँ उठा कर ले जाएँ तो ये कह सकें कि जब पूर्व गृह और वित्त मंत्री को नहीं छोड़ा तो हम तो फिर भी मीडिया के लोग हैं। विक्टिम कार्ड बनाने के लिए पहले ही अप्लाय कर दिया है। ये कहते-कहते रवीश जी कूद जाएँगे कि जब प्रणय रॉय को पकड़ लिया, मीडिया को पकड़ लिया तो आप लोगों की क्या बिसात है।

जो व्यक्ति भ्रष्टाचार जहाँ नहीं था, उस राफ़ेल मामले में ‘जाँच करवाने में क्या जाता है’ कह कर पागल होता रहा, वो व्यक्ति एक एजेंसी को पूछताछ के लिए, घोटालेबाजी का इतिहास सर-मुँह-कमर-कंधे पर लेकर घूमने वाली पार्टी के नेता, पी चिदंबरम को घर से उठाने पर ऐसा कवरेज कर रहा है! फिर जब लोग इनके पोस्ट पर घेरते हैं तो ये कहने लगते हैं कि ट्रोल छोड़ दिया भाजपा वालों ने! अरे भाई, वो ट्रोल नहीं हैं, वो आपके द्वारा एक ही मुद्दे पर दो तरह की रिपोर्टिंग करने की जादूगरी के करतब को देखने वाले लोग हैं।

कॉन्ग्रेस का ‘स्टार्टअप’ डूबा, बोहनी खराब होते ही सभी फरारियों ने कैंसिल कराई बुकिंग!

वाकई! अर्थव्यवस्था की स्थिति बेहद भयावह है। देश की सबसे पुरानी पार्टी का स्टार्टअप लॉन्च होने के दो घंटे के भीतर ही डूब गया।

कानून से बच रहे लोगों को मीडिया से मुखातिब होने का मौका देने वाला यह स्टार्टअप बुधवार देर शाम कॉन्ग्रेस के ‘दलाल स्ट्रीट’ यानी नई दिल्ली के 24 अकबर रोड स्थित अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस कमेटी के मुख्यालय में लॉन्च किया गया था।

वैसे, बुधवार शाम जब मीडिया को खबर मिली कि यहॉं 8.15 बजे एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की जाएगी, जिसे कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और सलमान खुर्शीद संबोधित करेंगे, तो किसी को भी भनक नहीं थी कि मंदी को भगाने के लिए नया स्टार्टअप शुरू होने जा रहा है। पता तो तब चला जब शाम 8:18 बजे बीते 27 घंटे से सीबीआई और ईडी से लुकाछिपी खेल रहे पी चिदंबरम इस सेवा का लाभ उठाने वाले पहले कस्टमर बने।

पहला कस्टमर चिदंबरम जैसा हो तो धंधा डूबने का खतरा नहीं होता। जरा उनके प्रोफाइल पर गौर करें। कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता। केन्द्र में वित्त और गृह जैसे हाई प्रोफाइल महकमों को संभालने का अनुभव। कभी चिदंबरम साहब के सामने उनके बेटे के धंधे को चमकाने का मौका पाने के लिए आतुर लोगों की कतार लगी रहती थी। इधर चिदंबरम साहब की कृपा हुई, उधर बंदा उनके बेटे के धंधे को चमकाने में लग जाता था। कहते हैं उस दौर में अर्थव्यवस्था भी उफान मार रही थी। किसानों की आत्महत्या की ख़बरें प्रोपगेंडा थीं।

2014 में मोदी के आने के बाद यह धंधा चौपट हो गया। मंदी आ गई। सूत्र बताते हैं कि तब से ही कॉन्ग्रेस मंदी भगाओ धंधे की तलाश में लग गई थी। लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की सोशल मीडिया हेड रहीं दिव्या स्पंदना ने कहा भी था, “पार्टी के पास पैसे नहीं हैं।”

बुधवार को गोटी फिट बैठ गई और धंधे की तलाश ख़त्म हुई। ‘सदैव आपकी सेवा में तत्पर’ का संदेश चोखा रहे इसलिए पहले कस्टमर की सेवा के लिए अगल-बगल तीन धाकड़ वकील भी बिठाए गए। इससे हर उस शख्स के पास डायरेक्ट मैसेज पहुँचा जो कानून से भागता फिर रहा है। वैसे भी कॉन्ग्रेस धर्म, जाति, संप्रदाय सब से ऊपर है। धंधा ही भगवान है।

स्टार्टअप हिट रहे इसलिए पहले कस्टमर ने खूब रोना रोया। मोदी सरकार पर बदला लेने, कानून का दुरुपयोग करने, विरोधियों को फॅंसाने के लिए एजेंसियों का इस्तेमाल करने जैसे सारे घोड़े एक साथ दौड़ाए। घोड़े से याद आया किसी जमाने में इन साहबों का घोड़ा फर्राटे भरता था। यकीन न हो तो गूगल कर लें। ​कस्टमर के साथ बैठे धाकड़ वकीलों में से एक का सीडी आया था कुछ साल पहले। कानून मुट्ठी में था तो साहब एक महिला वकील को जज बनाने के नाम पर लुभा रहे थे।

सब कुछ वैसा ही हो रहा था जैसा युवराज के सलाहकारों ने सोचा था। लॉन्च होने के चंद मिनट के भीतर ही स्टार्टअप हिट हो गया। सूत्र बताते हैं कि ‘दलाल स्ट्रीट’ की सभी लाइनें व्यस्त हो गईं। फरारियों के एक के बाद एक धड़ाधड़ कॉल आने लगे।

सूत्रों की मानें तो युवराज की सिफारिश पर पहली बुकिंग बिहार के एक निर्दलीय विधायक की कंफर्म हुई। घर से एके 47 मिलने के बाद से विधायक जी गायब हैं। एक वीडियो आया था जिसमें कह रहे थे भागे नहीं हैं, एक साथी बीमार है, उसका हाल जानने आए हैं।

सूत्रों ने बताया कि विधायक जी ने अपने हक के समर्थन में दो दावे किए। पहला, लोकसभा चुनाव के दौरान बिहार में पार्टी की जी-जान से खातिरदारी का। दूसरा, तीन दशक बाद पटना के गॉंधी मैदान में रैली उनके ही प्रताप से हुई थी। सो टोकन मनी लेकर उनकी बुकिंग कंफर्म कर दी गई।

शीर्ष सूत्रों ने बताया है कि चिदंबरम साहब की गिरफ्तारी के साथ स्टार्टअप बैठ गया है। विधायक जी ने बुकिंग कैंसिल कर दी है। दूसरे लोग भी कह रहे हैं जब बोहनी ही खराब हो गई तो हम क्यों आपकी सेवा का लाभ उठाने का जोखिम उठाएँ।

करीबी सूत्र बताते हैं कि इस फीडबैक से युवराज बेहद नाराज हैं। उनका कहना है, “मैंने पहले ही कहा था स्टार्टअप मोदी बोलता है। हम टूजी, जीजाजी टाइप का कुछ नाम रखते हैं। लेकिन, मम्मी आपने ही तो कहा था स्टार्टअप नाम रखेंगे तो मेक इन इंडिया के नाम पर छूट मिलेगी।”

कैमरे पर बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाने वाले एक सूत्र ने मैसेज किया है, “युवराज की इस हाल से लिबरलों का बुरा हाल है।” बकौल लिबरल, “मैं कहता था न साहस की मंदी है। मंदी दूर करने का साहस दिखाया तो आपने क्या किया? स्टार्टअप ही डूबो दिया। ऐसी भी क्या जल्दी थी देश के गृह मंत्री रहे व्यक्ति को उसके घर में घुसकर हिरासत में लेने की। अब आप चुप ही रहिए। बोलिए मत। भले लाखों लोगों की नौकरियॉं चली गईं हों। आप तो व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में खोए रहिए।”

परिवार के भीतर तक दखल रखने वाले सूत्र ने बताया कि ऐसे गमगीन माहौल में बुजुर्ग वोरा का अनुभव काम आ रहा है। वोरा साहब ने युवराज से कहा, “कोई नहीं हम धंधे के पुराने उस्ताद हैं। बोलिए तो दादा-परदादा के टाइम से गिना दूॅं। जुबानी याद है। फिर नया धंधा शुरू करेंगे। अब उसे स्टार्टअप नाम नहीं देंगे।”

सचमुच लोकतंत्र खतरे में है!