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Article 370: BBC के लिए कश्मीर पर अब सिर्फ यूगांडा-लोसोटो से ही बयान लेना बाकी

देश त्यौहार मना रहा हो और बीबीसी जैसे ‘प्रगतिशील’ मीडिया को इस से समस्या न हो, यह संभव नहीं है। शायद कम लोग यह बात जानते होंगे कि औपनिवेशिक ब्रिटिश साम्राज्य भारत से जाते-जाते यहाँ पर जो विष्ठा छोड़ गए थे, BBC उसी से अंकुरित बीजों का एक उदाहरण मात्र है। जो कसर बाकी थी, वो नेहरुघाटी सभ्यता के विचारकों ने इसे अपने कुत्सित विचारों और कुतर्कों से खूब सींचा।

वास्तव में होना तो यह चाहिए था कि सरकार के अनुच्छेद-370 को इतनी सावधानी और सुरक्षित तरीके से, बिना किसी रक्तपात, हिंसा और विरोध के ही निष्क्रीय करने के फैसले पर मोदी सरकार की इच्छाशक्ति पर उनकी पीठ थपथपाई जाए और कॉन्ग्रेस से पूछा जाए कि जब यही कार्य इतनी आसानी से किया जा सकता था, तो फिर उसने आखिर इतने वर्षों तक इस विषय पर मूक रहकर इतनी सारी लाशें आखिर क्यों बिछने दीं?

लेकिन सिर्फ अपने नमक का कर्ज अदा कर रहे बीबीसी (BBC) का सबसे ताजा मर्म तो यही है, यानी बिना शोर-शराबे के मोदी सरकार द्वारा अनुच्छेद-370 के प्रावधानों को निष्क्रीय कर दिया गया। देखा जाए तो सिर्फ बीबीसी ही नहीं बल्कि देश में एक ऐसा पूरा ‘प्रगतिशील’ वर्ग है जिसे बीबीसी ने आवाज देने का काम किया है। इस वर्ग की ख़ास बात सरकार विरोधी और सदैव असंतुष्ट रहने की प्रवृत्ति है।

BBC की जिंदगी का फिलहाल सिर्फ एक ही मकसद है और वो है ‘पत्थरकारिता’

मसलन, यदि आप कहें कि सूर्य पूरब से उगता है, तो यह वर्ग अपनी फेसबुक प्रोफ़ाइल पिक्चर को यह कहकर काला कर देगा कि आखिर सदियों से चली आ रही पूरब दिशा की पितृसत्ता और मोनोपोली नहीं चल सकती, सूर्योदय पर मात्र पूर्व का एकाधिकार नहीं हो सकता है। आप इसके पीछे तर्क पूछेंगे तो जवाब मिलेगा कि हमें बने बनाए नियमों के विरोध में खड़े होने के लिए कुछ मुद्दा तो पकड़ना ही होगा न साथी? आखिर विचारधारा के अस्तित्व का सवाल है। अपने विरोध के अजेंडे के लिए यह प्रगतिशील विचारक वर्ग सूर्योदय जैसी काल्पनिक घटनाओं में यकीन करता है यही जानकर संतुष्टि कर लेनी चाहिए।

बीबीसी ने अनुच्छेद-370 पर प्रलाप करके इस बार अपने अस्तित्व को बहुत ही सावधानीपूर्वक बचा लिया है। रही बात राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था की तो उस पर तो बाद में भी बात की जा सकती है। बीबीसी ने अल जज़ीरा का सहारा लेकर सौरा-श्रीनगर से एक ऐसे वीडियो को ‘विरोध प्रदर्शन’ बताया, जिसका ओरिजिनल वीडियो गृह मंत्रालय उनसे माँग रहा है लेकिन न ही बीबीसी और न ही अल जज़ीरा ने इस वीडियो का रॉ (Raw/Unedited) वर्जन अभी तक सरकार को सौंपा है।

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वीडियो पर स्पष्टीकरण के उलट, बीबीसी ने अपनी क्लिकबेट पत्रकारिता की करामात से अपनी भ्रामक रिपोर्टिंग को सबूत के तौर पर जरूर पेश किया है, जिसकी हेडलाइन भी उन्हें बाद में बदलनी पड़ी। कठुआ रेप पीड़ितों के नाम पर कथित तौर पर चंदा अकेले डकार जाने वाली जेएनयू की फ्रीलांस प्रोटेस्टर का कहना है कि उन्हें सरकार से ज्यादा बीबीसी पर विश्वास है।

ये वही शेहला रशीद हैं जिन्होंने पुलवामा आतंकी हमले के वक़्त ट्विटर पर अपने फर्जी आरोपों से अफवाह फैलाने का काम किया। हालाँकि, मैं उस दिन देहरादून में ही था और इस वजह से यह बात भी अच्छी तरह से जानता हूँ कि सच्चाई शेहला रशीद के आरोपों से एकदम अलग थी। पुलिस को लगातार स्पष्टीकरण देना पड़ा कि देहरादून में ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है जैसा कि शेहला रशीद और उनका पसंदीदा मीडिया दावा करता रहा। कम से कम यह स्पष्ट था कि शेहला रशीद किस प्रकार की खबर देखना और आगे बढ़ाना पसंद करती हैं।

अब बीबीसी के जीवन का ‘एक्के मकसद’ सिर्फ जनमानस को यह सन्देश देना हो चुका है कि अनुच्छेद-370 के फैसले का श्रीनगर की जनता तो सरकार का विरोध कर ही रही है, लेकिन उनके साथ-साथ पाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान, ‘लोसोटो’, यूगांडा, बुर्किना फासो यहाँ तक कि निकारागुआ तक की जनता भी परेशान है और भयानक प्रदर्शन कर रही है।

हालात ये हैं कि ख़ुदा-न-ख़ास्ता आज की डेट पर अगर यूगांडा में कहीं जोर से 2 लोग खाँस भी दें तो Big BC की खबर यही होगी- “अनुच्छेद-370 पर यूगांडा में भी उठी भारत सरकार की दमनकारी अमानवीय नीतियों के खिलाफ आवाज, जनता पर मोदी सरकार कर रही है आँसू गैस का इस्तेमाल।”

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हमारे देश के प्रगतीशील बुद्धिपीड़ित वर्ग का भी अपना ही अलग दर्द और दुनिया है। मीडिया के इस ख़ास वर्ग का दर्द यह है कि इतना बड़ा ऐतिहासिक फैसला बिना किसी हिंसा और संघर्ष के इतने शानदार होम वर्क के साथ आखिर कैसे सम्भव हो गया? बुद्धिपीड़ितों को तो अभी भी यह उम्मीद है कि काश कहीं तो कुछ खूनखराबा हो, ताकि सरकार के निर्णय पर प्रश्नचिन्ह लगाया जा सके।

एक और ख़ास बात यह कि श्रीनगर के लोगों की आवाज को उठाने की बात वह मीडिया कर रहा है जिसके मालिकों की मानसिक विकृति से हुए मानवाधिकारों के हनन ने युगों तक विश्व के मानचित्र पर अपनी ऐसी छाप छोड़ी है। यह उत्पीड़न इतना भीषण था कि इसका नतीजा लोग आज तक भुगत रहे हैं। ये वही देश है जिसकी नस्लीय और औपनिवेशिक नीतियों की वजह से कई महाद्वीप आज भी प्रभावित हैं।

मीडिया और विपक्षी दलों की ताजातरीन हरकतों पर व्यंग्यकार नीरज बधवार जी लिखते हैं- “कश्मीर में 2 दिन हिंसा और न हुई, तो कॉन्ग्रेसी हवन कराने भी बैठ सकते हैं।” यह व्यंग्य इस वक़्त अनुच्छेद 370 के विरोध में कमर कस कर बैठे हर दूसरे व्यक्ति की मानसिक स्थिति को सटीक रूप से बयाँ करता है। उम्मीद बस इतनी की जा सकती है कि घाटी में शांति और कानून व्यवस्था इसी तरह बनी रहे और यह देखकर उन परम-प्रलापी मीडिया चैनल्स की मानसिक शांति के लिए दुआएँ करते रहिए, जिनके अनुच्छेद-370 जैसे बड़े फैसले को इतना आसानी से लागू होते देखकर डिप्रेशन में जाने के समीकरण बनते जा रहे हैं।

पाकिस्तान पूरे विश्व में इस समय अलग पड़ चुका है। ऐसा लग रहा है मानो अनुच्छेद-370 के फैसले ने पाकिस्तान की विश्व स्तर पर उसकी हैसियत की पोल खोल दी हो। खैर, इस समय पाकिस्तान को मानसिक दिलासा देने की सबसे ज्यादा जरूरत है। ऐसे में बीबीसी और तमाम ऐसे ही संस्थान उसके साथ अगर खड़े हैं भी, तो हमें मानवीय आधार पर कम से कम उनकी तारीफ़ करनी चाहिए। क्योंकि, हारे का सहारा, बीबीसी नेटवर्क हमारा

राजस्थान: अलवर के पहलू खान मामले में कोर्ट ने 6 आरोपितों को किया बरी

राजस्थान के अलवर में पहलू खान केस में अपर जिला एवं सेशन न्यायाधीश (क्रम संख्या-1) सरिता स्वामी ने इस केस में फैसला सुनाते हुए सभी आरोपितों को बरी कर दिया है। गो-तस्करी के शक में अप्रैल 01, 2017 को कथित गोरक्षकों की भीड़ द्वारा पहलू खान की पिटाई की गई थी। डेयरी बिजनस करने वाले पहलू की 2 दिन बाद मौत हो गई थी।

पहलू खान की हत्या के मामले में अलवर जिला न्यायालय ने बुधवार (अगस्त 14, 2019) को अपना फैसला दिया है। पहलू खान की हत्या की वारदात में 9 आरोपित पकड़े गए, जिनमें से 2 नाबालिग हैं। इनमें से बुधवार को कोर्ट ने 6 आरोपितों पर फैसला सुनाया है। विपिन यादव, रविन्द्र कुमार, कालूराम, दयानंद, योगेश कुमार उर्फ धोलिया और भीम राठी को लेकर यह फैसला सुनाया गया है। जबकि, नाबालिग आरोपितों पर सुनवाई जुवेनाइल अदालत में की जा रही है।

फैसला आने के बाद कोर्ट से बाहर निकले पहलू खान पक्ष के वकील कासिम खान ने कहा कि केस की जाँच सही ढंग से नहीं की गई है। उन्होंने पुलिस पर राजनीतिक दबाव में चार्जशीट पेश करने का भी आरोप लगाया।

रिपोर्ट्स के अनुसार, जिस वक्त पहलू खान पर हमला हुआ, उस वक्त वह राजस्थान में गाय खरीदने के बाद हरियाणा जा रहे थे। पुलिस ने उनको भीड़ से छुड़ाकर बहरोड़ के कैलाश अस्पताल में भर्ती कराया था। वहाँ इलाज के दौरान पहलू खान की अप्रैल 04, 2017 को मौत हो गई थी। इस मामले में कोर्ट में चालान के बाद नियमित सुनवाई हुई थी।

राहुल गाँधी ने लिया U-Turn कहा- अब कोई शर्त नहीं, कश्मीर कब आ सकता हूँ

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और वायनाड सांसद राहुल गाँधी ने कश्मीर दौरे की अपनी सारी शर्तें हटाते हुए कश्मीर के राज्यपाल सत्य पाल मलिक को उन्हें राज्य के दौरे पर आने देने की चुनौती दी है। उन्होंने यह जवाब जम्मू-कश्मीर राज्यपाल के उस बयान के जवाब में दिया है, जिसमें कल रात (13 अगस्त) मलिक ने कहा था कि उन्होंने आकर कश्मीर के हालात अपनी आँखों से देखने का राहुल गाँधी को जो न्यौता दिया था, उसमें तमाम शर्तें लगाकर कॉन्ग्रेस नेता राजनीति कर रहे हैं, इसलिए वे (मलिक) न्यौता वापिस लेते हैं। एक दिलचस्प चीज़ आज सुबह किए गए राहुल गाँधी के ट्वीट में यह है कि उन्होंने मलिक को अंग्रेजी में ‘मालिक जी’ (‘Maalik ji’) से सम्बोधित किया है, जो टाइपिंग की गलती की बजाय सूबे के राज्यपाल पर तंज़ अधिक लगता है

‘प्लेन भेज रहा हूँ, खुद आ कर देख लो’

दरअसल पूरा मामला शुरू तब हुआ जब कॉन्ग्रेस नेताओं के पाकिस्तान के साथ सुर मिलाकर कश्मीर में हो रहे कथित ‘मानवाधिकार हनन’ और अशांति के प्रोपेगंडा को ध्वस्त करने के लिए कश्मीर के राज्यपाल मलिक ने विपक्ष के (फ़िलहाल) सबसे बड़े और मुखर नेताओं में से एक राहुल गाँधी को कश्मीर दौरे का न्यौता भेजा। मीडिया रिपोर्टों के मुताबक उन्होंने कहा था, “मैंने राहुल गाँधी को यहाँ (कश्मीर ) आने का निमंत्रण भेजा है। मैं आपके लिए हवाई जहाज भेजूँगा, ताकि आप यहाँ आकर (स्थिति को) देखें और फिर बोलें। आप एक जिम्मेदार व्यक्ति हैं, और आपको ऐसे नहीं बोलना चाहिए।”

उस समय राहुल गाँधी ने जम्मू-कश्मीर में हिंसा की रिपोर्टों पर टिप्पणी की थी, जिसका मलिक जवाब दे रहे थे

‘आ तो जाऊँगा, लेकिन मेरी एक शर्त है’

सत्य पाल मलिक के बयान की एनडीटीवी रिपोर्ट को रीट्वीट करते हुए राहुल गाँधी ने कहा कि वे राज्यपाल का निमंत्रण स्वीकार कर आने के लिए तैयार हैं लेकिन उन्होंने इसमें अपनी शर्तें भी जोड़ दीं। वे अपने साथ विपक्ष के नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल लेकर आना चाहते थे। उन्होंने चतुराई से सत्य पाल मलिक द्वारा मुहैया कराए जा रहे परिवहन को भी ठुकरा दिया, और बता दिया कि वे (राज्य में लागू सुरक्षा प्रतिबंधों के बावजूद) पूरी ‘आज़ादी’ के साथ राज्य का दौरा करना चाहते हैं। उन्होंने साथ ही आम लोगों, ‘मुख्यधारा’ के नेताओं और सैनिकों से मिलने की भी शर्त रख दी थी।

‘निमंत्रण कैंसल’

सत्य पाल मलिक ने मीडिया से बात करते हुए राहुल गाँधी की शर्तों को सिरे से ख़ारिज कर दिया था। उनके मुताबिक निमंत्रण देते हुए उन्हें राहुल गाँधी की इतनी सारी ‘pre-conditions’ का कोई अंदेशा नहीं था। उन्होंने आरोप लगाया कि अपने साथ प्रतिनिधिमंडल लाकर राहुल गाँधी मामले का राजनीतिकरण कर रहे हैं। यही नहीं, उन्होंने इससे घाटी में उपद्रव फैलने और आम लोगों के लिए दिक्कतें खड़ी होने की आशंका भी जताई

ममता के एक और सहयोगी नेता कोलकाता के पूर्व मेयर ने थामा बीजेपी का हाथ

तृणमूल कॉन्ग्रेस सुप्रीमो को एक और ज़ोरदार झटका लगा है। उनके करीबी माने जाने वाले कोलकाता के पूर्व मेयर और बंगाल के फायर एंड इंजीनियरिंग और हाउसिंग विभागों के पूर्व मंत्री सोवन चटर्जी भाजपा में शामिल हो गए हैं। समाचार एजेंसी ANI ने तृणमूल से भाजपा में आए मुकुल रॉय के साथ बीजेपी के मुख्यालय पर उनकी फ़ोटो ट्विटर पर जारी की है।

बड़े दिनों से लग रहे थे दिल्ली के चक्कर

चटर्जी के पार्टी बदलने के कयास बहुत दिनों से लगाए जा रहे थे। दिल्ली के उनके कई दौरों ने कयासों को और हवा दे रखी थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार भाजपा में शामिल होने के लिए दिल्ली निकलने के पहले उन्होंने पश्चिम बंगाल विधानसभा की मत्स्यपालन पर स्टैंडिंग कमेटी से इस्तीफ़ा मंगलवार को ही भेज दिया। पिछले साल नवंबर में ममता बनर्जी ने उन्हें कोलकाता के मेयर के पद से इस्तीफ़ा देने को कहा था, जिसके बाद से वह तृणमूल नेताओं से कटे-कटे चल रहे थे

मनाने की हुईं कोशिशें

भाजपा में शामिल होने के समय सोवन चटर्जी के साथ उनकी करीबी सहयोगी बैसाखी बनर्जी भी थीं। माना जा रहा है कि सोवन को वापस तृणमूल में सक्रिय कराने के लिए मंयता बनर्जी ने कई कोशिशें की थीं। मुख्यमंत्री के संदेशवाहक और बंगाल के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी ने कई बार सोवन से मुलाकात की लेकिन वे नहीं पिघले।

एक समय ममता के बहुत करीबी सहयोगी माने जाने वाले सोवन के ममता के साथ सियासी रिश्तों में खटास का कारण मीडिया में उनके निजी जीवन की समस्याओं का सुर्खियाँ बन जाना माना जाता है। इसके अलावा उनपर आरोप यह भी था कि सोवन मंत्रिपद पर होते हुए भी, और मेयर के तौर पर भी, अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरतापूर्वक नहीं ले रहे थे।

कविता कृष्णन के साथ चरम-वामपंथी गिरोह कश्मीर पर फैलाना चाहता था प्रोपेगंडा, प्रेस क्लब ने भगाया

जम्मू-कश्मीर पर प्रोपेगंडा फ़ैलाने की कोशिश कर रहे एक्टिविस्टों का एक समूह अपना-सा मुँह लेकर रह गया, जब प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया ने उन्हें प्रोपेगंडा करने के लिए अपने प्रांगण का इस्तेमाल करने देने से मना कर दिया।

टाइम्स नाउ के अनुसार प्रेस-क्लब ने चरम-वामपंथी एक्टिविस्टों के एक समूह को अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से जम्मू-कश्मीर के हालातों पर झूठा प्रोपेगंडा फ़ैलाने देने से मना कर दिया। इस गिरोह में कविता कृष्णन, सोनिया गाँधी के पूर्व सहयोगी ज्याँ द्रेज़, और दो अन्य भारत-विरोधी ब्रिगेड के सदस्य थे।

इन ‘एक्टिविस्टों’ का दावा था कि उन्होंने कश्मीर जाकर 370 हटने के बाद से उसके हालात का जायज़ा लिया था, और उसे रिकॉर्ड किया था। चरम-वामपंथियों का यह समूह प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इनका इरादा भड़काऊ वीडियो और फ़ोटो रिलीज़ कर जनता को उकसाने का था। कविता कृष्णन ने इस बाबत ट्वीट भी किया:

कविता कृष्णन के 5-दिनी ‘दौरे’ की रिपोर्ट जारी करने के लिए उनके साथ ज्यां द्रेज़ के अलावा मैमूना मुल्ला और विमल भी थे। लेकिन प्रेस क्लब ने फुर्ती से हरकत में आते हुए उनकी रिपोर्ट की रिलीज़ रोक दी। जब सरकार जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य बनाने की कोशिश कर रही है, तो यह ‘एक्टिविस्ट’ घाटी की एक नकारात्मक छवि बनाने में लगे हुए हैं। इसीलिए प्रेस क्लब ने उन्हें उन रिपोर्टों की रिलीज़ के लिए ज़मीन देने से मना कर दिया, जिनकी पुष्टि नहीं की जा सकती।

हैदराबाद के बालाजी मंदिर ने लड़कियों- महिलाओं की रक्षा के लिए तैयार की ‘जटायु सेना’

हैदराबाद के प्रसिद्ध चिलकुर बालाजी मंदिर ने महिलाओं और लड़कियों के ख़िलाफ़ अत्याचार रोकने के लिए मंगलवार (अगस्त 13, 2019) को ‘जटायु सेना’ का गठन किया।

बता दें जटायु हिंदू धर्मग्रंथ रामायण का प्रसिद्ध पात्र है, जिसने पंछी होने के बावजूद रावण द्वारा सीताहरण के समय रावण से सीता को छुड़ाने के लिए अपनी आखिरी साँस तक प्रयास किया।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस सेना के गठन के दौरान चिलकुर बालाजी मंदिर के प्रधान पुजारी सी एस रंगराजन ने बताया कि विशेष अनुष्ठान में मंदिर में महिलाओं और लड़कियों की कलाइयों पर धागे बाँधे गए और लड़कियों तथा महिलाओं की हिफाजत के लिए जटायु सेना की प्रतीकात्मक शुरूआत की गई।

मंदिर के पुजारी ने बताया कि इस दौरान कई पुरूष श्रद्धालुओं ने जटायु सेना का सदस्य बनने का संकल्प लिया। जिसके बाद वह लड़कियों और महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध रोकने के लिए सक्रिय रहेंगे।

जानकारी के मुताबिक इस दौरान मंदिर के पुजारियों ने करवान इलाके के नदीम को सम्मानित भी किया, क्योंकि हैदराबाद के वो पहले शख्स थे जिन्होंने तेलंगाना के रंग रेड्डी गाँव में मोइनबाद मंडल के पास एक छोटी बच्ची का बलात्कार होने से बचाया था। पुजारियों ने उन्हें इस दौरान आशीर्वाद के साथ ‘जटायु सेना’ का पहला सदस्य होने का सम्मान दिया।

जाकिर नाइक को मलेशिया में हिंदुओं के खिलाफ़ बोलना पड़ा भारी, मंत्री ने कहा ‘भगौड़े’ को भारत भेजने की बात

विवादित और भड़काऊ उपदेशक जाकिर नाईक अपने विवादित बयानों कारण देश से भागा फिर रहा है। लेकिन इस बार मलेशियाई सरकार ने उन्हें लेकर एक बड़ा बयान दिया है। दरअसल, भारत में आतंकी गतिविधियों और धनशोधन के वांछित मामलों के आरोपित जाकिर ने मलेशिया में रहते हुए वहाँ के हिंदुओं के ऊपर विवादस्पद टिप्पणी की। जिसके बाद मलेशिया सरकार के एचआरडी मंत्री कुलसेगरन ने कहा कि मलेशियाई हिंदुओं पर सवाल उठाने वाले जाकिर नाइक पर तुरंत एक्शन लिया जाए।

मलेशिया एचआरडी मंत्री का जारी बयान

मलेशिया के एचआरडी मंत्री ने बुधवार को जारी किए बयान में कहा, “जाकिर नाइक एक बाहरी व्यक्ति है, जो एक भगोड़ा है और उसे मलेशियाई इतिहास की बहुत कम जानकारी है, इसलिए, उसे मलेशियाई लोगों को नीचा दिखाने जैसा विशेषाधिकार नहीं दिया जाना चाहिए। इससे ज्यादा उनकी देश के प्रति वफादारी भी संदिग्ध है।”

कुलसेरगन ने आगे कहा, “जाकिर नाईक का यह बयान किसी भी तरह से मलेशिया के स्थायी निवासी होने के पैमाने पर खरा नहीं उतरता है। अगली कैबिनेट बैठक में इस मुद्दे को उठाया जाएगा।”

जाकिर के इस बयान पर उन्होंने यह भी कहा, “अब समय आ गया है कि मलेशियाई लोग अपने सहिष्णु और सामंजस्यपूर्ण देश में धार्मिक और नस्लीय भावनाओं का उपयोग करने वाली ज़ाकिर नाईक की रणनीति को उजागर करके राष्ट्र की शांति और स्थिरता को एकजुट और सुरक्षित करें।”

विवादस्पद बयान से नाराज एचआरडी मंत्री ने जाकिर के संबंध में कहा कि अब इस भगौड़े के मलेशिया छोड़ने का समय आ गया है। अब ये भारत जाकर आतंकवाद और मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों का सामना करें।

उल्लेखनीय है कि जाकिर नाईक भारत में नफरत फैलाने वाले अपने भाषणों से युवाओं को आतंकवादी गतिविधयों के लिए उकसाने और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे मामलों का आरोपित है। जिसपर भारत में एनआईए जाँच चल रही है। जाँच एजेंसी ने आतंकरोधी कानून के तहत 2016 में सर्वप्रथनम नाईक के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया था। इसके अलावा बांग्लादेश की राजधानी ढाका में हुए हमले को लेकर भी नाईक पर जाँच चल रही है।

इन्हीं आरोपों के संबंध में भारत ने जनवरी में मलेशिया सरकार से जाकिर को भारत भेजने का औपचारिक अनुरोध किया था लेकिन तब वहाँ के प्रधानमंत्री ने महातिर मोहम्मद ने जाकिर का समर्थन कर दिया था।

फेक न्यूज़ की रानी: पुराने माल के सहारे सेना और कश्मीर को बदनाम कर रही सागरिका घोष

लिबरल गैंग की राजकुमारी सागरिका घोष ने कश्मीर में शांति-भंग करने का ज़िम्मा अपने कंधों पर ले लिया है। ट्विटर पर एक तीन साल पुरानी रिपोर्ट को शेयर कर सागरिका ने पाकिस्तान का कश्मीरियों के साथ क्रूरता का प्रोपेगंडा आगे बढ़ाया है। इसके ज़रिए ऐसा जताने की कोशिश की कि कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के बाद से शांति नहीं विद्रोह और असंतोष है, और भारतीय सुरक्षा बल उसे क्रूरतापूर्वक कुचल रहे हैं।

पुरानी रिपोर्ट, कोई संदर्भ नहीं

न केवल सागरिका घोष द्वारा शेयर की गई रिपोर्ट पुरानी थी बल्कि संदर्भ का भी नितांत अभाव जबकि मूल रिपोर्ट, सागरिका की शेयरिंग में भी है। यह रिपोर्ट केवल दुराग्रह से लिथड़ी हुई एकतरफ़ा रिपोर्टिंग है। इसमें यह तो बताया गया है कि सेना और पुलिस वाले कश्मीरियों की भीड़ को तितर-बितर करने के लिए गुलेल से पत्थर, काँच की गोलियाँ और मिर्ची पाउडर इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन यह नहीं बताया जाता है कि भीड़ कोई शांतिपूर्ण गाँधी बाबा के चेलों की नहीं बल्कि हिंसक, पत्थरबाज जिहादियों की थी, और न ही यह बताया जाता है कि गुलेल के अलावा सुरक्षा बलों के पास दूसरा विकल्प पैलेट गन और जानलेवा असॉल्ट राइफलों का था।

इसके अलावा यह रिपोर्ट तीन साल पुरानी थी, और सागरिका घोष ने इसे शेयर करते हुए यह बात नहीं बताई। और-तो-और, गुलेल से भीड़-नियंत्रण के इस तरीके को (तुलनात्मक रूप से) civilized (सभ्य) बताने को ‘ ‘ में डालकर भी उन्होंने सुरक्षा बलों के दानवीकरण (demonization) की कोशिश की।

चोरी के बाद सीनाज़ोरी

सागरिका घोष की बेशर्मी यहीं नहीं रुकी। जब एक ट्विटर यूज़र ने उनके प्रोपेगंडा पर ऊँगली उठाई और रिपोर्ट के पुराने होने का ज़िक्र किया तो भी उन्होंने अपनी गलती नहीं सुधारी। उलटे, वे उसी ट्विटर यूज़र को यह कुतर्क देने लगीं कि यह तो 2009 से ही चल रहा है। अपने इस दावे का भी उन्होंने कोई प्रमाण नहीं दिया।

प्रियंका गाँधी के गुर्गों पर चुप्पी जायज है, क्योंकि पीड़ित पत्रकार ने सेनाध्यक्ष को जनरल डायर नहीं कहा था

पत्रकरिता बँट गई है। इतनी बँट गई है कि पत्रकारों के हितों की बात करने का दावा करने वाला संगठन एडिटर्स गिल्ड भी अपने पास एक ऐसी सूची रखता है जिसमें इस बात का विवरण होता है कि फलाँ पत्रकार को अगर मार भी डाला जाए तो चूँ तक नहीं करना है और फलाँ पत्रकार को छींक भी आए तो 2-4 बयान यूँ ही जारी कर देने हैं। यह हद दर्जे का दोहरा रवैया है। बंगाल में एक टीवी चैनल के पत्रकारों को मार-मार कर घायल कर दिया जाता है लेकिन मीडिया के तमाम बड़े महारथी आँख मूँद लेते हैं। कर्नाटक में सीएम के बेटे के बारे में लिखने पर संपादक पर ही कार्रवाई हो जाती है लेकिन कहीं से कोई आवाज़ नहीं आती।

सोनभद्र में प्रियंका गाँधी के गुर्गों द्वारा एबीपी पत्रकार के साथ की गई अभद्रता पर चुप्पी भी इसकी ही एक कड़ी है। पत्रकार नीतीश पांडेय ने तो बस एक सवाल पूछा था। मामूली सा सवाल। इसमें अनुच्छेद 370 पर कॉन्ग्रेस की आपत्ति के बारे में पूछा गया था। प्रियंका गाँधी ने जवाब नहीं दिया। इसमें कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि जिस तरह किसी पत्रकार को हक़ है किसी राजनेता से सवाल करने का, उसी तरह राजनेता को भी पूरा अधिकार है कि वह सवाल को दरकिनार कर दे। लेकिन, इसके कई तरीके होते हैं।

अलग-अलग राजनेताओं ने इसके लिए विभिन्न प्रकार की बानगी पेश की है। पुराने उदाहरण की बात करें तो दिवंगत कांशीराम ने झापड़ लगाया था। ताज़ा उदाहरण की बात करें तो मणिशंकर अय्यर ने पत्रकार के पाँव छू कर माफ़ी माँगी। हाल ही में बाढ़ पर बुलाए गए प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल ने अनुच्छेद 370 पर टिप्पणी करने से मना कर दिया। आइए सबसे पहले जानते हैं कि प्रियंका गाँधी वाले मामले में हुआ क्या? प्रियंका सोनभद्र के दौरे पर थीं। वहाँ आदिवासियों की ज़मीन को लेकर ख़ून-ख़राबा हुआ था। प्रियंका पीड़ित परिवारों से मिलने गई थीं। इसी बीच एबीपी के रिपोर्टर ने उनसे सवाल पूछा।

प्रियंका ने सवाल का जवाब देने से मना कर दिया और कहा कि वो यहाँ लोगों से मिलने आई हैं। असली खेल इसके बाद शुरू हुआ। वामपंथी से कॉन्ग्रेसी बने संदीप सिंह ने रिपोर्टर को धमकाते हुए कहा, “सुनो-सुनो, ठोक के यहीं बजा दूँगा। मारूँगा तो गिर जाओगे।” रिपोर्टर ने प्रियंका से हस्तक्षेप करने को कहा और बताया कि उनके गुर्गे किस तरह से व्यवहार कर रहे हैं? प्रियंका गाँधी ने आसपास होते हुए भी उसे अनसुना कर दिया। प्रियंका के सहयोगी संदीप ने कहा कि उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता और कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। क्या पूछा जा सकता है कि इस आत्मविश्वास की वजह क्या है?

इस दौरान कैमरे को भी ढँकने का प्रयास किया गया ताकि चीजें ठीक से रिकॉर्ड न हो पाएँ। कैमरे को धक्का भी दिया गया। रिपोर्टर पर भाजपा से रुपए लेकर सवाल पूछ्ने यानी बिकाऊ होने के आरोप लगाए गए। अब आते हैं इस घटना के बाद इसे लेकर उठे सवाल पर। जैसा कि स्पष्ट है, एडिटर्स गिल्ड का कोई बयान नहीं आया। भाजपा सरकार के कार्यकाल में मीडिया की स्वतंत्रता के खतरे में होने का रोना रोने वाले गिरोह विशेष के सदस्यों ने इस घटना की निंदा तक नहीं की। क्यों नहीं की? इसके पीछे बहुतेरे कारण हो सकते हैं, जिनमें से 2 प्रमुख है।

कारण नंबर एक- वह पत्रकार डिज़ाइनर गिरोह का सदस्य नहीं था। उसने कभी सेनाध्यक्ष की तुलना जलियाँवाला नरसंहार कराने वाले जनरल डायर से नहीं की थी। वही सेना जो कन्याकुमारी से कश्मीर तक और असम से लेकर केरल तक में हर एक आपदा में लोगों के लिए रक्षक बन कर आती है। उस पत्रकार ने किसी आतंकी के मारे जाने के बाद उसके परिवार की ‘हालत’ दिखा कर उसके प्रति सहानुभूति उपजाने की कोशिश नहीं की थी। उस पत्रकार ने कभी पाकिस्तानी एजेंडा नहीं चलाया था। उसके लिए आउटरेज कर के क्या फायदा मिलता? अगर उसने मोदी को सुबह-शाम गाली दी होती तो शायद उसके पक्ष में पत्रकारिता के सभी पुरोधा आवाज़ उठाते।

कारण, नंबर दो- प्रियंका गाँधी कॉन्ग्रेस के शीर्ष परिवार से आती हैं, उनकी जगह अगर कोई भाजपा वार्ड सदस्य के साले के फूफे की बहन का भतीजा होता तो न्यूयॉर्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट में भी इस पर एकाध लेख लिखा जा चुका होता कि कैसे भारत की ‘राइट विंग हिंदुत्व पार्टी’ ने मीडिया की स्वतंत्रता पर ग्रहण लगा दिया है और देश में पत्रकारों को खतरा है। यह खेल नैरेटिव का है। ‘द प्रिंट’ की पत्रकार को चिदंबरम बेइज्जत भी कर दें तो चलता है क्योंकि वह ‘अपने’ हैं। वह दो-चार झापड़ लगा भी दें तो चलेगा। ताज़ा मामले में शेखर गुप्ता ने घटना की निंदा तो की लेकिन प्रियंका गाँधी को ‘सो पोलाइट’ बता कर।

मीडिया की स्वतंत्रता का अर्थ मीडिया कारोबारियों को अच्छी तरह पता है। शेयर्स की धोखाधड़ी से लेकर इनकम टैक्स चोरी तक, किसी न्यूज़ चैनल के ख़िलाफ़ सरकारी एजेंसियाँ जाँच करें तो बवाल खड़ा हो जाता है क्योंकि यह मीडिया की स्वतंत्रता का हनन है। हजारों करोड़ के मालिक भी ख़ुद को पत्रकार बता कर इस लिबर्टी को एन्जॉय करना चाहते हैं। पूरी बिरादरी एक हो जाती है, जैसे उनके ख़िलाफ़ सारे संवैधानिक नियम-क़ानून बौने हैं। ऐसे डिज़ाइनर पत्रकार जो भी करें, उनकी कम्पनी जो भी करे और उनके रिश्तेदार जो भी करें- किसी भी संवैधानिक संस्था को उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का हक़ नहीं है, क्योंकि यह मीडिया की स्वतंत्रता का मामला है।

अव्वल तो यह कि राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी की ट्वीट्स में अक्सर पत्रकारों व मीडिया हितों से जुड़े मुद्दे उठते हैं। दोहरेपन की पराकाष्ठा इतनी ऊपर पहुँच चुकी है कि एक ट्वीट से उन्हें गिरोह विशेष की वाहवाही भी मिल जाती है और पत्रकारों की बेइज्जती व उनके साथ बदतमीजी करने का सर्टिफिकेट भी। और हाँ, एडिटर्स गिल्ड तो इतना निष्पक्ष है कि कश्मीर में सुरक्षा-व्यवस्था को लेकर की गई व्यवस्थाओं को भी मीडिया से जोड़ कर देखता है और कहता है कि पत्रकारों को सही से रिपोर्टिंग नहीं करने दिया जा रहा। जब यह ख़बर आती है कि वित्त मंत्रालय में अपॉइंटमेंट लेने के बाद ही पत्रकारों को मिलने दिया जाएगा तो एडिटर्स गिल्ड उसकी निंदा करने लगता है।

एक विशेषज्ञ ने कहा था कि अब मनमोहन सिंह वाला दौर बीत चुका है और पत्रकारों को विशेष विमान में बैठा कर पीएम व मंत्रियों के विदेश दौरे पर साथ नहीं ले जाया जा रहा है। उन्हें इसी बात की खुन्नस है। या फिर अब उन्हें मंत्रियों व अधिकारियों से मिलने के लिए अपॉइंटमेंट लेना होता है, इसीलिए वे पुराने दिनों को याद कर उसी हताशा में जी रहे हैं। इससे पता चलता है कि 2014 में सरकार ही नहीं बदली बल्कि बहुत कुछ बदल गया है।

भाजपा के पिछले सदस्यता अभियान में 10 करोड़ से भी अधिक लोगों ने पार्टी की सदस्यता ग्रहण की थी। लगभग इतनी ही बिहार की जनसंख्या है। इतनी बड़ी पार्टी से जुड़ा कोई अदना सा व्यक्ति भी कुछ कह दे तो प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ जाती है। आनी भी चाहिए। लेकिन प्रियंका गाँधी के गुर्गों द्वारा एक रिपोर्टर के साथ की गई बदतमीजी और दुर्व्यवहार पर गिरोह विशेष की चुप्पी खलती है। उम्मीद है अगली बार ऐसी को घटना आया-वाया भाजपा जुड़ी तो यह चुप्पी टूटेगी।

कश्मीरी पंडितों की व्यथा ‘The Kashmir Files’ 15 Aug 2020 को होगी रिलीज़ विवेक अग्निहोत्री ने की घोषणा

फ़िल्मकार विवेक अग्निहोत्री ने अगले स्वतंत्रता दिवस पर फ़िल्म रिलीज़ की घोषणा कर दी है। ‘The Kashmir Files’ नाम की इस फ़िल्म का विषय उनके ट्वीट के अनुसार 90 के दशक में जिहादियों द्वारा किया गया कश्मीरी पंडितों का सामूहिक नरसंहार होगा।

इसके अलावा उन्होंने आम जनता से इस विषय पर रिसर्च करने के लिए उनकी सहायता करने की भी अपील की है।

ताशकंद फाइल्स, बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम, और अर्बन नक्सल्स के बाद अब…

विवेक अग्निहोत्री इसके पहले विवादास्पद और बहुचर्चित द ताशकंद फाइल्स और ‘बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम’ फ़िल्में भी बना चुके हैं। शहरी नक्सलियों के गिरोह के काम करने के त्रिकोण और उनके दोगलेपन का भंडाफोड़ करने वाली ‘बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम’ को लेकर विवेक अग्निहोत्री लिबरल गैंग के साथ-साथ अपने बॉलीवुड के साथियों के ही निशाने पर आ गए थे। उन्हें ‘राईट विंग ट्रोल’, ‘असफल फ़िल्मकार’ वगैरह कहा गया। इसी साल रिलीज़ ‘द ताशकंद फाइल्स’ पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की संदेहास्पद मौत और उसकी जाँच न होने की परिस्थितियों के बारे में थी। कॉन्ग्रेस और लिबरल गैंग ने फिल्म से भाजपा को चुनावी लाभ होने की आशंका से पुरज़ोर विरोध किया था।

2018 की उनकी किताब ‘अर्बन नक्सल्स’ भी 2014 की फिल्म ‘बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम’ के ही विषय का विस्तार थी। इस किताब में ‘बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम’ के निर्माण की कहानी के अलावा शहरों और तथाकथित ‘संभ्रांत’ लोगों के बीच फैल रही नक्सली विचारधारा के फैलाव की भी बात की गई है।

बॉलीवुड, मीडिया ने इस बार किया स्वागत

इन्दु विवेक के पिछले प्रोजेक्ट्स के मुकाबले इस बार बॉलीवुड और मीडिया ने The Kashmir Files की घोषणा का कहीं अधिक उत्साहजनक रूप से स्वागत किया है। फिल्म के लिए विवेक को बधाई देने वालों में ‘फैशन’, ‘जेल’ और ‘इन्दु सरकार’ के फ़िल्मकार मधुर भंडारकर, स्वराज्य की पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा, फिल्म कारोबार समीक्षक तरण आदर्श, 2 फ़िल्मफ़ेयर जीतने वाली लेखिका-निर्देशक ज्योति कपूर दास और मशहूर गायिका मालिनी अवस्थी प्रमुख हैं।

कश्मीर में होगी रियल लोकेशन पर शूटिंग

फिल्म खबरों की वेबसाइट कोईमोई ने दावा किया है कि The Kashmir Files की शूटिंग कश्मीर में ही होगी। यह प्रधानमंत्री की उस अपील के मुताबिक होगा, जिसमें उन्होंने मनोरंजन उद्योग से कश्मीर में शूटिंग को बढ़ावा देने की गुज़ारिश की थी

‘इस्लामी मानसिकता छिपा मत देना’

ट्विटर पर लेखक संक्रांत सानु ने विवेक अग्निहोत्री से अपील की कि ‘बैलेंस’ बनाने के चक्कर में वह उस इस्लामी नफ़रत को न छिपाएँ, जो कश्मीरी पण्डितों के साथ हुई बर्बरता के पीछे थी। विवेक अग्निहोत्री ने ऐसा न करने का संक्रांत सानु को आश्वासन दिया।