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चिदंबरम मामले में ED को झटका: सोमवार तक नहीं कर सकती हिरासत में लेकर पूछताछ

INX मीडिया और एयरसेल-मैक्सिस मामलों में पूर्व वित्त मंत्री की कस्टडी पाने की कोशिश में लगी ED (प्रवर्तन निदेशालय) को सुप्रीम कोर्ट ने झटका दिया है। ED को सोमवार तक कॉन्ग्रेस नेता को गिरफ्तार करने से रोकते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उनकी ED के खिलाफ अग्रिम ज़मानत याचिका और सीबीआई द्वारा गिरफ़्तारी के खिलाफ याचिका को भी सोमवार को सुनने का निश्चय किया है। हालाँकि अदालत ने उनकी सीबीआई को मिली सोमवार तक की रिमांड में हस्तक्षेप नहीं किया है, इसलिए फ़िलहाल चिदंबरम सीबीआई की हिरासत में ही रहेंगे।

सीबीआई जज ED के पक्ष में biased

चिदंबरम के पक्ष में वकील के तौर पर पेश हुए कॉन्ग्रेस नेताओं अभिषेक मनु सिंघवी और कपिल सिब्बल ने ED को गिरफ़्तारी की अनुमति देने का पुरज़ोर विरोध किया। जस्टिस आर बानुमति और एएस बोपन्ना की बेंच के सामने सीबीआई द्वारा भ्रष्टाचार-निरोधी अधिनियम और भारतीय दंड विधान (आईपीसी) के अंतर्गत दर्ज किया गया मामला था, और ED ने मनी-लॉन्ड्रिंग निरोधी कानून के अंतर्गत मामला दर्ज किया था। दोनों ही एजेंसियों की तरफ से बहस भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता कर रहे थे।

सिब्बल ने चिदंबरम का पक्ष रखते हुए कहा कि उनकी अग्रिम ज़मानत याचिका सुनवाई के लिए बुधवार को ही लगा दी गई थी, जिस पर सुनवाई हो नहीं पाई थी और फायदा उठाकर चिदंबरम को उसी शाम सीबीआई ने उसपर फैसला आने का इंतज़ार किए बिना ही गिरफ्तार कर लिया। उन्होंने दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले मूलभूत अधिकारों के अंतर्गत चिदंबरम को भी बहस सुने जाने का अधिकार है।

ED द्वारा संभावित गिरफ़्तारी के खिलाफ सिब्बल ने दलील दी कि हाई कोर्ट के जज का झुकाव पहले से ही ED के पक्ष में है। अपनी दलील के पक्ष में उन्होंने दावा किया कि ED ने बहस खत्म होने के बाद उच्च न्यायालय के जज को एक नोट दिया था, जिसके कुछ हिस्से जज ने अपने फैसले में ‘कॉपी-पेस्ट’ कर दिए। इसको लेकर सिब्बल और मेहता के बीच छोटी-सी बहस भी हो गई। अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि जबकि हाई कोर्ट में मुकदमा INX मीडिया का चल रहा था, लेकिन उच्च न्यायालय के जज ने उससे किसी भी तरह से नहीं जुड़े मामले एयरसेल मैक्सिस का उल्लेख ज़मानत याचिका ख़ारिज करते हुए किया।

पूरी दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट बेंच ने सोमवार तक ED द्वारा गिरफ़्तारी पर सोमवार तक अंतरिम रोक लगाते हुए कहा कि आगे की सुनवाई उसी दिन होगी।

आरोपित शातिर, हिरासत में ही हो सकती है ढंग से पूछताछ

इसके पहले तुषार मेहता ने सभी ज़मानत याचिकाओं का सीबीआई और ED की तरफ से विभिन्न पहलुओं के आधार पर विरोध किया। अंतरिम ज़मानत याचिका का विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि यह तो गिरफ़्तारी से बचने के लिए होती है, और चिदंबरम को तो पहले ही सीबीआई की हिरासत में दिया जा चुका है। ऐसे में इस याचिका का कोई मतलब ही नहीं है।

इसके बाद ED के पक्ष में दलील देते हुए उन्होंने कहा कि आरोपित की (तीक्ष्ण) मानसिक क्षमताओं के देखते हुए बिना हिरासत में लिए ढंग से पूछताछ नहीं हो सकती। उनका इशारा चिदंबरम की कानून की डिग्री, हार्वर्ड विश्वविद्यालय से MBA और सालों तक देश के चोटी के वकीलों में से एक के रूप में अनुभव से था। इसके अलावा उन्होंने अदालत से सीलबंद लिफाफे में मौजूद केस-डायरी को स्वीकार कर और उसका अध्ययन करने के बाद सोमवार को ही किसी नतीजे पर पहुँचने का अनुरोध किया। लेकिन बेंच ने डायरी लेने से इंकार कर दिया।

उपचुनाव से पहले अखिलेश यादव ने पार्टी की सभी इकाइयों को किया भंग, सपा में मची खलबली

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने तत्काल प्रभाव से समाजवादी पार्टी के सभी युवा संगठनों, छात्र सभा, महिला संगठन एवं सभी प्रकोष्ठों के राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष सहित राष्ट्रीय, राज्य कार्यकारिणी भंग कर दी है।

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने पीटीआई को बताया, “पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सभी राज्य कार्यकारिणी को भंग कर दिया है। सभी ज़िला, युवा और अन्य इकाइयों को भी भंग कर दिया है।

प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल के पद को छोड़कर अखिलेश ने सभी के पद ख़त्म कर दिए हैं। पार्टी अब नए सिरे से लोगों को ज़िम्मेदारी सौंपने का काम करेगी। ऐसी संभावना जताई जा रही है जल्द ही राष्ट्रीय स्तर पर भी बड़े बदलाव किए जा सकते हैं। अब पार्टी नए सिरे से प्रदेश के ज़िलाध्यक्ष और प्रवक्ताओं समेत अन्य सदस्यों की नियुक्ति करेगी।

ग़ौरतलब है कि लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे आने के साथ ही अखिलेश यादव ने सबसे पहले अपने प्रवक्ता पैनल को भंग किया था। पार्टी की ओर से दिशा-निर्देश जारी किया गया था कि मीडिया में पार्टी के संदर्भ में कोई भी अधिकृत बयान जारी नहीं करेगा और हर किसी को मीडिया से दूर रहने की हिदायत दी गई थी।

पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनिल यादव के अनुसार, यह फ़ैसला रूटीन प्रक्रिया के तहत लिया गया है। हर बार चुनाव के बाद इन इकाइयों को भंग कर दिया जाता है। इससे पार्टी मेें नए लोगों को आने का मौक़ा मिलता है। उन्होंने बताया कि अब लोगों की मेहनत देखकर उन्हें पद दिया जाएगा। ऐसा माना जा रहा है कि यूपी में होने वाले उप चुनाव के मद्देनज़र यह फ़ैसला लिया गया है।

कॉन्ग्रेस नेताओं ने माना, बेवजह गरियाने से बढ़ता है मोदी का जनाधार

जयराम रमेश के बाद कॉन्ग्रेस के अन्य बड़े नेताओं से भी मानना शुरू कर दिया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बिना कारण गरियाने, विरोध-के-लिए-विरोध करने से न केवल कॉन्ग्रेस की विश्वसनीयता खत्म हो रही है, बल्कि मोदी को उलटे इसका फायदा मिल रहा है। इन नेताओं के बयानों का समय भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि लोकसभा 2019 के नतीजों के बाद से कॉन्ग्रेस लगातार नकार की मुद्रा में ही चल रही है- यहाँ तक कि कश्मीर मुद्दे पर उसके स्टैंड को भी कोई वैचारिक, नैतिक या तार्किक विरोध नहीं, केवल बदले और असहयोग की राजनीति के रूप में देखा जा रहा है। उसके खुद के कई बड़े नेताओं, जिनमें ‘टीम राहुल’ के माने जाने वाले सिंधिया और देवड़ा शामिल हैं, ने पार्टी लाइन से हटकर कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म करने का समर्थन किया था।

रमेश हैं पहला मुँह खोलने वाले

सबसे पहले यह उद्गार व्यक्त करने वाले कॉन्ग्रेस नेता हैं पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश, जिन्होंने कहा था कि कॉन्ग्रेस को मोदी के 2014-19 के बीच किए हुए काम को स्वीकार करना चाहिए, जिसके कारण उन्हें 30% वोटरों ने दोबारा मत दिया। उन्होंने यह बयान एक किताब की लॉन्चिंग के दौरान दिया। उन्होंने यह भी माना कि प्रधानमंत्री वह भाषा बोल रहे हैं, जो लोगों को उनसे जोड़ती है। “जब तक कि हम यह नहीं पहचानते कि वे ऐसे काम कर रहे हैं जिन्हें लोग मान रहे हैं, और जो भूतकाल में नहीं हुए, हम उनसे टक्कर नहीं ले पाएंगे। अगर उन्हें हर समय किसी दानव की तरह पेश करेंगे, तो उनका सामना नहीं कर पाएंगे।” रमेश ने यह भी साफ किया कि वे मोदी के लिए तालियाँ बजाने के लिए नहीं कह रहे हैं, बल्कि उन सचमुच में अच्छी चीज़ों को मानने की बात कर रहे हैं, जो मोदी प्रशासन में लेकर आए हैं।

‘उज्ज्वला सहित अच्छे काम भी हैं मोदी के’

रमेश के बाद अब अभिषेक मनु सिंघवी ने भी ट्वीट कर कहा कि हर समय मोदी को गाली देना न केवल इसलिए गलत है क्योंकि वे देश के प्रधानमंत्री हैं, बल्कि इससे उन्हें फायदा हो जाता है। उनके हर कार्य को उस काम के व्यक्तिगत पैमाने पर तौला जाना चाहिए, मोदी व्यक्ति के आधार पर नहीं। उन्होंने उज्ज्वला समेत भाजपा के कई अच्छे काम होने की बात मानी।

‘मैं सबसे पहले आया’

शशि थरूर ने भी एक ट्विटर यूज़र के सवाल के जवाब में लिखा कि वे तो 6 साल से मोदी की न्यायोचित तारीफ पर ज़ोर दे रहे हैं, ताकि जब वे आलोचना करें तो उसमें कोई विश्वसनीयता हो।

पूर्व गृहमंत्री के बेटी का अपहरण व 5 सैनिकों की हत्या के मामले में टाडा कोर्ट में पेश होंगे यासीन मलिक

जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के अध्यक्ष यासीन मलिक को टाडा कोर्ट ने अदालत में पेश होने के आदेश दिए हैं। यासीन पर पूर्व मुख्यमंत्री और बाद में गृहमंत्री मुफ्ती सईद की बेटी रुबिया सईद के अपहरण और वायुसेना कर्मियों की हत्या के आरोप में केस दर्ज हैं। कोर्ट ने इस संबंध में तिहाड़ जेल के प्रभारी को हिदायत दी है कि 11 सितंबर को अगली सुनवाई में उन्हें कोर्ट में पेश किया जाए।

उल्लेखनीय है कि कोर्ट ने पिछली सुनवाई के दौरान ही मलिक को कोर्ट में पेश करने के आदेश दिए थे, लेकिन जाँच एजेंसी सीबीआई ने समय की कमी बताते हुए गुरुवार को उसे कोर्ट में पेश करने में असमर्थता दिखाई। जिसकी जानकारी कोर्ट के पीठासीन अधिकारी की ओर से जारी ताजा पेशी वारंट में भी है।

इस वारंट में कहा गया है कि 17 अगस्त को यासीन की पेशी को लेकर वारंट जारी किया गया था जो कि तिहाड़ जेल के डाक विभाग को सौंपा गया था। लेकिन समय कम होने की वजह से आरोपित की पेशी नहीं हो पाई। इसलिए सीबीआई के वकील को ताजा पेशी वारंट तामील करने की हिदायत गई है। साथ ही इसमें यह भी कहा गया है कि इस बार वारंट जेल अधीक्षक को दिया जाए।

बता दें यासीन मलिक के ख़िलाफ़ इस समय जिन दो मामलों में केस चल रहा है, वह काफ़ी पुराने हैं। रुबिया सईद के अपहरण के दौरान सीबीआई द्वारा दाखिल चालान के मुताबिक श्रीनगर के सदर पुलिस स्टेशन में आठ दिसंबर 1989 को रिपोर्ट दर्ज हुई थी। जबकि सैनिको की हत्या वाला मामला 25 जनवरी 1990 का है।

सईद के मामले में दर्ज हुई रिपोर्ट में पूरे वाकये का जिक्र था। इसमें बताया गया कि कैसे 1989 में अस्पताल से घर लौटने के दौरान मुख्यमंत्री की बेटी का कैसे कुछ बंदूक लिए लोगों ने उनका अपहरण कर लिया। इस मामले में सीबीआई ने जाँच पूरी होने के बाद 18 सितंबर 1990 को जम्मू की टाडा कोर्ट में आरोपितों के खिलाफ चालान पेश किया था।

वहीं, यासीन के ख़िलाफ़ सीबीआई के दूसरे चालान के मुताबिक 25 जनवरी 1990 की शाम के लगभग साढ़े सात बजे रावलपोरा इलाके के सनतनगर क्रॉसिंग पर एयरपोर्ट की बस का इंतजार कर रहे एयरपोर्ट कर्मियों पर आतंकियों ने अंधाधुंध गोलियाँ बरसाई थीं। इसमें 40 लोग घायल हुए थे, जिनमें से दो की मौके पर ही मौत हो गई थी। कुल पाँच एयरफोर्स कर्मचारियों की इस घटना में मौत हुई थी।  

पीरियड आते ही मुस्लिम लड़कियों की शादी जायज: कब बदलेगा कट्टरपंथियों का कानून

माहवारी क्या है?

माहवारी महिलाओं के शरीर में होने वाली एक सामान्य वैज्ञानिक क्रिया है। किशोरवय से शुरू होकर अमूमन अधेड़ावस्था तक यह मासिक प्रक्रिया चलती है। विज्ञान के नजरिए से देखें तो पीरियड गर्भाशय की आंतरिक सतह एंडोमेट्रियम के टूटने से होने वाला रक्त स्राव है। गर्भधारण और शरीर में हार्मोन नियंत्रण के लिए इस प्रक्रिया का सामान्य होना आवश्यक है।

क्या माहवारी का शादी की उम्र से कोई रिश्ता है?

नहीं। अमूमन माहवारी 15 साल की उम्र में शुरू हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्ययन बताते हैं कि 20 साल की उम्र से पहले शादी और मॉं बनने का महिलाओं के आगे के जीवन पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

फिर पीरियड शुरू होते ही लड़कियों की शादी क्यों जायज है?

दकियानूसी सोच, कठमुल्लों के दबाव और मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट 1937 की वजह से यह स्थिति है। यूनिसेफ के आँकड़े बताते हैं कि भारत में 27 फीसदी लड़कियों की शादी 18 साल और 7 फीसदी की 15 साल की उम्र से पहले हो जाती है। इसमें एक बड़ा हिस्सा समुदाय विशेष का है।

क्या बाल विवाह निषेध कानून (पीसीएमए) 2006 समुदाय विशेष पर लागू होता है?

जवाब हाँ भी है और ना भी है। कानूनी स्थिति बेहद स्पष्ट नहीं है। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2012 में एक 15 साल की लड़की की अपनी मर्जी से शादी को वैलिड मानते हुए कहा था कि इस्लामिक कानून के मुताबिक लड़की मासिक धर्म शुरू होने के बाद अपनी इच्छा के मुताबिक शादी कर सकती है। गुजरात हाई कोर्ट ने 2015 में कहा था कि बाल विवाह निषेध कानून 2006 के दायरे में समुदाय विशेष वाले भी आते हैं। अक्टूबर 2017 में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस एमबी लोकुर और दीपक गुप्ता ने समुदाय विशेष के अलग विवाह कानून को पीसीएमए के साथ मजाक बताया था। सितंबर 2018 में पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने कहा था कि समुदाय विशेष पर यह कानून लागू नहीं होता। अदालत का कहना था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ स्पेशल एक्ट है, जबकि पीसीएमए एक सामान्य एक्ट है।

तीन तलाक की तरह लड़कियों को इस कलंक से भी मिलेगा छुटकारा?

उम्मीद बॅंधी है। दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर सभी धर्मों में शादी की उम्र को लड़के और लड़कियों के लिए एक समान न्यूनतम 21 साल करने की माँग की गई है। इस पर अगली सुनवाई 30 अक्टूबर को होनी है।

याचिका दाखिल होने से उम्मीदें जगने का कारण भी तीन तलाक का ही मामला देता है। फरवरी 2016 में उत्तराखंड की शायरा बानो ने तीन तलाक, बहुविवाह और निकाह हलाला पर प्रतिबंध की मॉंग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। अगस्त 2017 सुप्रीम कोर्ट ने एक साथ तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया। जुलाई 2019 मोदी सरकार ने एक साथ तीन तलाक को अपराध बनाने वाला कानून बनाया।

ब्याह की उम्र कितनी, बहस पुरानी

शादी की न्यूनतम उम्र कितनी हो इस पर भारत में अरसे से बहस चल रही है। अंग्रेजी राज में इस संबंध में पहली बार कानून बना। बाद में कई बार बदलाव हुए। लेकिन, समुदाय विशेष के लोग बदलाव से अछूते रहे।

1860 के इंडियन पीनल कोड में शादी की उम्र का कोई जिक्र नहीं था, लेकिन 10 साल से कम उम्र की लड़की के साथ शारीरिक संबंध को गैरकानूनी बताया गया था। फिर धर्म के आधार पर शादी की उम्र को लेकर कानून आए। इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट 1872 में लड़के की न्यूनतम उम्र 16 साल और लड़की की न्यूनतम उम्र 13 साल तय की गई। 1875 में आए मेजोरिटी एक्ट में पहली बार बालिग होने की उम्र 18 साल तय की गई। इसमें शादी की न्यूनतम उम्र का तो कोई जिक्र नहीं था, लेकिन लड़के और लड़की दोनों के बालिग होने की उम्र 18 साल मानी गई।

1927 में ‘एज ऑफ कंसेट बिल’ लाकर 12 साल से कम उम्र की लड़की की शादी को प्रतिबंधित किया गया। 1929 में पहली बार शादी की उम्र को लेकर कानून बना। बाल विवाह निरोधक कानून 1929 के अनुसार शादी के लिए लड़के की न्यूनतम आयु 18 साल और लड़की की न्यूनतम आयु 16 साल तय की गई।

1955 में हिंदू मैरिज एक्ट बना जो हिंदुओं के साथ जैन, बौद्ध और सिखों पर भी लागू था। इसके मुताबिक शादी के लिए लड़के की न्यूनतम उम्र 18 साल और लड़की की 15 साल रखी गई। पारसी मैरिज एक्ट में भी लड़के की उम्र 18 और लड़की की उम्र 15 साल रखी गई।

1978 में बाल विवाह कानून में संशोधन किया गया। इसमें लड़के की शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल और लड़की की 18 साल कर दी गई। 2012 में सिखों के लिए अलग से आनंद मैरिज बिल लागू किया गया।

1929 के बाल विवाह निषेध अधिनियम को निरस्त कर केंद्र सरकार बाल विवाह निषेध कानून 2006 लेकर आई। नवंबर 2007 से यह कानून लागू किया गया। यह कानून सभी धर्मों पर लागू होता है। लेकिन, मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट 1937 की वजह से यह पूरी तरह कारगर साबित नहीं हो पा रहा।

दिल्ली हाई कोर्ट में शादी के समान उम्र को लेकर याचिका दाखिल करने वाले वकील अश्विनी उपाध्याय के मुताबिक भारत में मुस्लिम लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 15 साल है, क्योंकि भारत में इसे मासिक धर्म शुरू होने की उम्र माना गया है। बीते साल लॉ कमीशन ने भी शादी की उम्र लड़के-लड़कियों के लिए समान करने की सलाह दी थी। कमीशन ने कहा था कि शादी की उम्र में अंतर रखना रूढ़िवाद को बढ़ावा देता है और इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।

तुष्टिकरण नीति से कठमुल्लों की बल्ले-बल्ले

1929 के कानून का समुदाय विशेष ने विरोध किया। अंग्रेजों ने भारत में सांप्रदायिकता की लकीर खींचने के लिए, जो बाद में देश के विभाजन की वजह बनी, उनकी मॉंग मान ली। मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट 1937 अमल में आया। इसके मुताबिक समुदाय विशेष की लड़कियों की शादी की कोई न्यूनतम उम्र नहीं होगी। मासिक धर्म शुरू होने की उम्र पर पहुॅंचने के बाद मुस्लिम लड़कियों की इच्छा के मुताबिक किसी भी उम्र पर शादी की जा सकेगी।

अंग्रेज गए, नेहरू-गाँधी आ गए

दुर्भाग्य देखिए। अंग्रेज चले गए और उनके बाद सत्ता में कॉन्ग्रेस आई। ज्यादातर समय कमान नेहरू और गॉंधी परिवार के सदस्यों के हाथ रही। इन्होंने भी अंग्रेजों की तरह सियासी फायदे के लिए तुष्टिकरण की नीति को जोर-शोर से बढ़ाया। शाहबानो प्रकरण में राजीव गॉंधी की सरकार द्वारा अदालत का फैसला पलटना इसकी एक नजीर है। यही कारण है कि आजाद भारत में बाल विवाह अधिनियम में बदलाव के बावजूद मुस्लिम पर्सनल लॉ को छुआ भी नहीं गया।

लेकिन, तीन तलाक के मामले में जिस तरह मोदी सरकार ने विपक्ष की आलोचनाओं और कठमुल्लों के विरोध को नजरंदाज कर मुस्लिमों महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को तरजीह देते हुए कानून बनाया है, उससे मुस्लिम लड़कियों को इस कलंक से भी जल्द ही मुक्ति मिलने की उम्मीद की जा सकती है।

पाकिस्तान ‘ब्लैक लिस्ट’ में डाला गया: टेरर फंडिंग रोकने में बुरी तरह विफल इमरान खान की मुसीबतें बढ़ी

आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को एक के एक बाद कई झटके लग रहे हैं, इसी बीच उसे एक और बड़ा झटका लगने की ख़बर सामने आई है। अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के वित्तपोषण की निगरानी करने वाली संस्था, ‘फाइनेंनिशियल एक्शन टॉस्क फोर्स’ (FATF) के ग्रे लिस्ट में डालने के बाद अब FATF की एशिया प्रशांत इकाई (APG) ने उसे ‘ब्लैक लिस्ट’ में डाल दिया है। यह फ़ैसला ऑस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा में आयोजित FATF की एशिया प्रशांत इकाई की बैठक में लिया गया।

दरअसल, संस्था ने पाया कि टेरर फंडिंग, मनी लॉन्ड्रिंग और आंतकवादियों को वित्तपोषण से जुड़े 40 में से 32 मानकों को पाकिस्तान ने पूरा नहीं किया है। APG, FATF की क्षेत्रीय इकाई है और ऐसा माना जाता है कि पाकिस्तान को ब्लैक लिस्ट में डालने के फ़ैसले का असर व्यापक स्तर पर पड़ेगा। कयास लगाए जा रहे हैं कि FATF भी अक्टूबर में होने वाली बैठक में पाकिस्तान को ब्लैक लिस्ट में डालने का फ़ैसला लेगा।

FATF ने पाकिस्तान से अक्टूबर 2019 तक अपने एक्शन प्लान को पूरा करने के लिए कहा था, इसके लिए पाकिस्तान के प्रति FATF का रुख़ बेहद सख़्त था। एक्शन प्लान में जमात-उद-दावा, फलाही-इंसानियत, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हक्कानी नेटवर्क और अफ़गान तालिबान जैसे आतंकी संगठनों की फंडिंग पर रोक लगाने जैसे कई क़दम शामिल थे।

APG की फाइनल रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान टेरर फंडिंग के ख़िलाफ़ सुरक्षा उपायों के लिए 11 मापदंडों में से 10 को पूरा करने में विफल रहा है। APG ने यह भी पाया है कि इस्लामाबाद की तरफ से कई मोर्चों पर खामियाँ हैं। साथ ही मनी लॉड्रिंग और टेरर फंडिंग को रोकने के लिए पाकिस्तान की तरफ से की जाने वाली कोशिशों में तमाम ख़ामियाँ हैं। पाकिस्तान की तरफ से 50 पैमानोंं पर सुधार के दावों को लेकर कोई समर्थन नहीं मिल रहा है। बता दें कि APG एक अंतर सरकारी संगठन है जो क्षेत्र में टेरर फंडिंग और मनी लॉड्रिंग पर नज़र रखता है।

ग़ौरतलब है कि FATF ने जून, 2018 में पाकिस्तान को संदिग्ध सूची में डाल दिया था। इसका कारण अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी और इंग्लैंड द्वारा दबाव बनाया जाना था। आपको बता दें कि FATF की ओर से ब्लैक लिस्ट करने का मतलब होता है कि उक्त देश मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवादियों को वित्तपोषण के ख़िलाफ़ मुहीम में अपना सहयोग नहीं कर रहा है। 

अगर पाकिस्तान को FATF द्वारा भी ब्लैक लिस्ट कर दिया गया तो उसे वर्ल्ड बैंक, IMF, ADB, यूरोपियन यूनियन जैसी संस्थाओं से क़र्ज़ मिलना मुश्किल पड़ जाएगा। इसके अलावा मूडीज, स्टैंंडर्ड एंड पूअर और फिच जैसी एजेंसियाँ उसकी रेटिंग भी घटा सकती हैं।

लोकनाथ मंदिर में जन्माष्टमी के अवसर पर दीवार गिरने से भगदड़, 6 की मौत, 27 घायल

पश्चिम बंगाल में जन्माष्टमी के उत्सव के दौरान एक मंदिर में दीवार गिरने से 6 लोगों की मौत हो गई। इस हादसे में 27 लोग घायल हुए। घटना शुक्रवार सुबह नॉर्थ 24 परगना के कचुआ इलाके में स्थित लोकनाथ मंदिर में घटी। मृतकों के परिजन को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 5 लाख रुपए मुआवजा देने की घोषणा की।

जानकारी के मुताबिक लोकनाथ मंदिर में जन्माष्टमी के मौक़े पर श्रद्धालु एकत्रित हुए थे, लेकिन इसी दौरान वहाँ एक जर्जर दीवार ढह गई। जिसे देखकर वहाँ भगदड़ मच गई। कई श्रद्धालु इसकी चपेट में आए। पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित किया और मलबे में दबे लोगों को बाहर निकाला। बाद में 6 लोगों को मृत घोषित कर दिया गया, जबकि बाकी घायलों को एसएसकेएम अस्पताल में भर्ती करवाया गया।

बंगाल मुख्यमंत्री ने इस हादसे में मरने वालों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त की। उन्होंने कहा कि उनके लिए फिलहाल वर्तमान परिस्थियों में बचाव कार्य सबसे बड़ी प्राथमिकता हैं। वो इस मामले पर निजी स्तर पर निगरानी कर रही हैं साथ ही मृतकों के परिजनों को 5-5 लाख देने की घोषणा भी की। उन्होंने गंभीर रूप से घायलों को 1-1 लाख और घायल लोगों को 50-50 हजार रुपए देने की बात की।

ममता बनर्जी ने बताया, “इस बार कछुआ लोकनाथ मंदिर में भारी भीड़ जमा थी। तभी सुबह-सुबह बारिश होने लगी, जिसके कारण लोग बाँस के अस्थायी स्टॉलों में छुपने की कोशिश करने लगे। भारी बारिश के कारण बाँस के स्टॉल टूट गए। वहाँ जगह बहुत ही संकरी है, जिस कारण हड़बड़ी में बहुत लोग मंदिर के पास के तालाब में गिर गए। इससे वहाँ भगदड़ की स्थिति पैदा हो गई।

गौरतलब है कि हर साल लोकनाथ ब्रह्मचारी का जन्मदिन मनाने के लिए कछुआ मंदिर में बड़ी संख्या में लोग जमा होते हैं । इस साल भी वहाँ इसी उद्देश्य से भीड़ लगी थी।

मैक्डॉनल्ड्स ने कहा वो सिर्फ हलाल मांस ही बेचते हैं, स्वीकारा ग़ैर-मुस्लिमों के साथ करता है भेदभाव

ग्लोबल फ़ास्ट-फ़ूड चेन मैक्डॉनल्ड्स ने स्वीकार कर लिया है कि गैर-मुस्लिमों के साथ भेद- भाव करना उनके भारत में बिज़नेस मॉडल का हिस्सा है। हमने इस पर पहले ही रिपोर्ट किया था कि कैसे किसी जानवर को किसी गैर-मुस्लिम द्वारा मारा जाना हलाल हो ही नहीं सकता।

हलाल केवल एक मुस्लिम व्यक्ति ही कर सकता है। इसका मतलब साफ़ है कि हलाल फर्म में गैर-मुस्लिमों को रोज़गार से वंचित रखा जाता है। इसके अलावा कुछ और भी शर्तें हैं, जिन्हें अवश्य पूरा किया जाना चाहिए। यह स्पष्ट है कि हलाल पूरी तरह से एक इस्लामी प्रथा है। भारत में हलाल के एक प्रमाणीकरण और प्राधिकरण की आधिकारिक वेबसाइट पर दिशानिर्देश उपलब्ध हैं जिनमें यह स्पष्ट है कि पशु वध प्रक्रिया (हलाल) के किसी भी हिस्से में गैर-मुस्लिम कर्मचारियों को रोज़गार नहीं दिया जा सकता है।

पूरे दस्तावेज़ में इस्लामी पशु वध के दिशानिर्देशों को सूचीबद्ध किया गया है, इसमें शामिल कर्मचारियों के मज़हब/आस्था का उल्लेख करने के लिए ध्यान रखा गया है। यह स्पष्ट करता है कि केवल मुस्लिम कर्मचारियों को ही हलाल के हर चरण में भाग लेने की अनुमति है। यहाँ तक ​​कि मांस का लेबल लगाने का काम भी मुस्लिम ही कर सकते हैं।

इस मामले की हमारी विस्तृत रिपोर्ट आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

हलाल-झटका का विवाद ज़ोमैटो विवाद के दौरान खुल कर सामने आया था। इसमें रेस्त्रां से घर पर खाने की डिलीवरी सर्विस देने वाली, ऍप-आधारित कंपनी पर आरोप लगा था कि एक तरफ वह ‘खाने का कोई मज़हब नहीं होता’ जैसी नैतिकता का ज्ञान बाँचती है, दूसरी ओर मुस्लिमों का तुष्टिकरण करने के लिए, उनकी ‘हलाल माँस ही चाहिए’ की माँग पूरा करने के लिए वह हर तरीके से तैयार रहता है।

हलाल, जैसा कि ऊपर गिनाए गए बिंदुओं से साबित हो जाता है, अपनी मूल प्रकृति से ही भेदभाव वाली प्रथा है, जो गैर-मुस्लिमों को रोजगार के अवसर से वंचित करती है। यानि हलाल माँस को वरीयता देने वाले ज़ोमैटो, मैक्डॉनल्ड्स आदि कॉर्पोरेट खुल कर कार्यस्थल पर भेदभाव (वर्कप्लेस डिस्क्रिमिनेशन) को बढ़ावा देते हैं, और बराबर के अवसरों (ईक्वल ऑपर्च्युनिटी) के सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं। ऐसे में उनकी सामाजिक न्याय और एक्टिविज़्म आदि की बातों को इसी प्रकार के सबूतों के अलोक में रखकर देखे जाने की ज़रूरत है।

बड़े डिफॉल्टरों के अख़बार में नाम छाप दो, लोन लेकर वापस न करने वालों पर बिहार सरकार सख्त

बिहार सरकार ने बैंकों से मोटी रकम का लोन लेकर न लौटाने वालों पर एक्शन लेने के लिए बैंकों को सुझाव दिया है। इस सुझाव में बिहार सरकार ने बैंक से कहा कि वह कर्ज न लौटाने वाले 25 लाख से बड़े कर्जदारो की सूची पब्लिक करें। जिससे सरकार बैंकों को लोन वापसी करवाने में हर संभव मदद कर पाए।

बिहार की राजधानी पटना में गुरुवार को राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति की 69वीं त्रैमासिक बैठक हुई। इसमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी भी शामिल हुए। सीएम नीतीश ने बैंकर्स के सामने बैंकों के रवैये को लेकर अपनी पीड़ा व्यक्त की और कहा कि बैंक राज्य सरकार की बात सुनते ही नहीं हैं। उन्होंने कहा कि बिहार में लोग बैंक पर भरोसा करते हैं लेकिन यहाँ बैंक ऋण देने में पीछे हैं। इस बीच बैंकर्स ने भी मुख्यमंत्री से अपनी पीड़ा को साझा किया और बताया ऐसा क्यों है। बैंकर्स ने बताया कि लोन देकर वापस न मिलना बैंक के सामने एक बड़ी समस्या है।

उन्होंने बताया कि बिहार के छोटे ऋण लेने वाले कर्ज अदा कर देते हैं, लेकिन जो बड़ी रकम लेते हैं वो आना-कानी करते हैं। बैंकर्स की शिकायत को मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री ने गंभीरता से सुना और आश्वासन दिया कि उनकी सरकार बैंको को लोन वापसी में मदद करेगी।

सुशील मोदी ने बैंकर्स से कहा कि वे उन कर्ज लेने वालों की सूची अखबारों में सार्वजनिक करें, जो बड़े कर्ज लेकर वापस नहीं करते। ताकि उन्हें शर्मिंदगी महसूस हो। साथ ही उन्होंने इन ऋणधारकों की एक सूची सरकार को उपलब्ध कराने की सलाह दी, जिससे ऐसे कर्जदारों पर शिकंजा कसा जाए।

बता दें बैंकों की इस बैठक में बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने सभी बैकों से कहा कि प्रदेश की हर ग्राम पंचायत में बैंक शाखा खोली जानी चाहिए। इसके लिए खुद राज्य सरकार उनकी सहायता करेगी। उन्हें बताया कि पंचायत भवन में उन्हें जगह उपलब्ध कराई जा सकती है। इससे लोगों को काफी सुविधा होगी। उन्होंने कहा कि बैंकों का ऋण जमा अनुपात का राष्ट्रीय औसत 75 प्रतिशत है जबकि बिहार के मामले में यह 45 प्रतिशत है।

‘एक रात साथ में सोओ तभी बिल पास करूँगा’ – डॉ. जावेद आलम पर ममताकर्मियों ने लगाया गंभीर आरोप

बिहार में महिलाओं का सम्मान केवल एक भ्रम मात्र लगता है, इसका जीता-जागता सबूत है अररिया क्षेत्र की ममताकर्मियों द्वारा डीएम (ज़िलाधिकारी) को लिखी गई वो चिट्टी, जिसमें उन्होंने ख़ुद के प्रति हो रहे अभद्र व्यवहार के बारे में लिखा है। इस लिखित शिक़ायत में आधा दर्जन से अधिक ममताकर्मियों ने जोकीहाट रेफरल अस्पताल के प्रभारी मोहम्मद जावेद आलम द्वारा किए जाने वाले अभद्र, अमानवीय और अमर्यादित व्यवहार का ज़िक्र किया है।

ममताकर्मियों ने न्यूज़-18 से हुई बातचीत में आपबीती सुनाई। अस्पताल से अवैध उगाही न किए जाने पर उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित भी किया जाता है। ममताकर्मियों के अनुसार, मो. जावेद उनके बिल पास करवाने के बदले में एक रात उनके साथ सोने तक के लिए कहता है। ममताकर्मियों को तुच्छ समझते हुए उनसे गाली-गलौच के साथ बात करता है। इतना ही नहीं वो अस्पताल से अवैध रुपयों की उगाही करने का दबाव भी ममताकर्मियों पर बनाता है।

ममताकर्मियों ने मो. जावेद पर आरोप लगाते हुए कहा कि जब से वो नौकरी कर रही हैं तब से वो उनसे घूस ले रहा है। घूस के तौर पर जावेद ने कभी 1 लाख रुपए लिए तो कभी 30 हज़ार रुपए लिए। ममताकर्मी ने कहा, “अभी पेमेंट (सैलरी) नहीं बना रहा है, वही रुपया के कारण। पहले रुपया दो तब पेमेंट बनाएगा। गाली-गलौच करता है, हर तरह की बात बोलता है।” जावेद के बारे में बताते हुए ममताकर्मी ने कहा कि उसे किसी का डर नहीं है, वो कहता है कि CS क्या कर लेगा, DM क्या कर लेगा।

एक ममताकर्मी ने अस्पताल प्रभारी मो. जावेद के बारे में बताया कि वो एक मीटिंग में गईं थीं, जहाँ उनसे पूछताछ में बहस के बाद जावेद ने कहा, “तुम इतना बोलती हो, मारेंगे लात तो बाहर छिटका देंगे, निकाल देंगे।”

ममताकर्मियों के गंभीर आरोपों के संबंध में जब मो. जावेद आलम से पूछा गया तो उन्होंने इन आरोपों को नकार दिया और जाँच से नहीं डरने का दंभ भी भरा।

इस मामले पर अररिया सदर अस्पताल के ACMO डॉक्टर एमपी गुप्ता से जब पूछताछ की गई, तो उन्होंने सही जानकारी से अवगत कराने के बजाए पत्रकारिता का पाठ पढ़ाना शुरू कर दिया। अपनी इस से हरक़त वो आरोपित को बचाते दिखे।