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कश्मीरियत के नाम पर 370 का रोना रोने वालों को आइना दिखाता Video, आम जनजीवन बेअसर

आम कश्मीरी नागरिकों का हवाला देकर संसद में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल का विरोध करने वाले नेताओं की दलीलें आपने सुनी होगी। राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला की प्रतिक्रियाओं को भी सुना होगा जो उन्होंने 370 के प्रावधानों को निरस्त करने पर कश्मीरी जनता की आड़ लेकर कही थी। लेकिन, श्रीनगर के इस ताजा वीडियो को देखकर साफ है कि कश्मीर के आम लोगों की जिंदगी 370 के निष्प्रभावी होने से बेअसर है।

समाचार एजेंसी ANI ने करीब 38 सेकंड का यह वीडियो जारी किया है। इस वीडियो में श्रीनगर की सड़कों पर सामान्य आवाजाही दिख रही है। ठेले-खोमचे वाले भी अपनी आजीविका कमाने में लगे हैं।

गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर को लेकर ऐतिहासिक फैसला लेने से पहले केन्द्र ने घाटी में एहतियातन सुरक्षा कड़ी कर दी थी। अतिरिक्त जवानों की तैनाती की गई थी। धारा 144 लागू कर इंटरनेट कनेक्शन पर पाबंदी लगा दी गई थी।

आशंका जताई जा रही थी कि 370 के बहाने अलगाववादी और राज्य के नेता लोगों को भड़काने का काम कर सकते हैं। बिल पेश किए जाने से पहले पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला को नजरबंद कर दिया गया था। फिलहाल घाटी पूरी तरह शांत है। हालॉंकि अभी सुरक्षा बलों की तैनाती में कटौती के कोई संकेत नहीं हैं।

J&K : महबूबा, उमर अब्दुल्ला समेत 100 से अधिक नेता-कार्यकर्ता गिरफ्तार

जम्मू-कश्मीर में शांति के लिए खतरा होने का हवाला देते हुए सुरक्षा एजेंसियों ने राजनेताओं, कार्यकर्ताओं सहित 100 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक जम्मू-कश्मीर प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “100 से अधिक राजनेता और कार्यकर्ता अभी तक घाटी में गिरफ्तार किए गए हैं।”

कुछ खबरों के मुताबिक अधिकारियों ने बताया है कि रविवार रात से नजरबंद राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला को सोमवार रात गिरफ्तार कर लिया गया। फिलहाल इन नेताओं को श्रीनगर के हरि निवास गेस्ट हाउस में रखा गया है।

जानकारी के अनुसार पीपल्स कॉन्फ्रेंस के नेता सज्जाद लोन और इमरान अंसारी को भी सुरक्षा एजेंसियों ने गिरफ्तार किया है।

मीडिया रिपोर्टों में अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि घाटी में इन नेताओं की गतिविधियों से शांति में खलल पैदा होने की आशंका के चलते मजिस्ट्रेट ने इनकी गिरफ्तारी के आदेश दिए थे।

गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद इन नेताओं की गिरफ्तारियाँ हुईं हैं। सुरक्षा के लिहाज से यहाँ इंटरनेट कनेक्शन और मोबाइल सेवा अस्थायी रूप से बंद कर दिए गए हैं। साथ ही यहाँ राज्य प्रशासन के आदेश के बाद से धारा 144 भी लागू है।

SC ने माँगा निर्मोही अखाड़ा से जमीन पर दावे का सबूत, जवाब मिला- 1982 में डकैत ले गए

अयोध्या में रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर मंगलवार (अगस्त 07, 2019) से सुप्रीम कोर्ट में रोजाना सुनवाई शुरू हो गई है। इस दौरान कोर्ट ने निर्मोही अखाड़ा से रामजन्मभूमि पर अपना अधिकार साबित करने के लिए दस्तावेज माँगे। इस पर अखाड़ा ने कहा कि 1982 में वहाँ डकैती हुई, जिसमें सारे दस्तावेज गायब हो गए।

ये इस अंतिम सुनवाई का दूसरा दिन है। मंगलवार को निर्मोही अखाड़ा ने पूरी विवादित 2.77 एकड़ जमीन पर अपने नियंत्रण की माँग की थी दूसरे दिन भी निर्मोही अखाड़ा अपनी दलीलें अदालत के सामने रख रहा है। अखाड़ा इस वक्त मामले का इतिहास अदालत को समझा रहा है।

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई में 5 जजों की पीठ इस मामले को सुन रही है। आज एक बार फिर ये सुनवाई आगे बढ़ रही है। मंगलवार को निर्मोही अखाड़े की तरफ से दलीलें रखी गईं और जमीन पर मालिकाना हक माँगा था। हालाँकि, अभी दूसरे पक्ष की ओर से दलीलें रखना बाकी है।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जजों ने निर्मोही अखाड़ा से पूछा कि क्या आपके पास इस बात को कोई सबूत हैं जिससे आप साबित कर सके कि राम जन्मभूमि की जमीन पर आपका कब्जा है? इसके जवाब में निर्मोही अखाड़ा ने कहा कि 1982 में एक डकैती हुई थी, जिसमें उनके कागजात खो गए। इसके बाद जजों ने निर्मोही अखाड़ा से अन्य सबूत पेश करने को कहा।

निर्मोही अखाड़ा ने कहा कि इस मामले में वे असहाय हैं। वर्ष 1982 में अखाड़े में एक डकैती में उन्होंने उस समय पैसे के साथ उक्त दस्तावेजों को भी खो दिया था। इस पर चीफ जस्टिस (CJI) ने पूछा- क्या अन्य सबूत जुटाने के लिए केस से जुड़े दस्तावेजों में फेरबदल किया गया था?

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि आप बिना मालिकाना हक के पूजा-अर्चना कर सकते हैं, लेकिन पूजा करना और मालिकाना हक जताना अलग-अलग बात है। निर्मोही अखाड़ा की तरफ से वकील ने कहा कि सूट फाइल करने का मकसद ये था कि हम अंदर के कोर्टयार्ड में अपना हक जता सकें।

कश्मीर के बारे में आपको नैरेटिव के दलालों ने ये बताया था क्या?

कश्मीर में वाल्मीकि होते हैं। क्या हुआ, कश्मीरी वाल्मीकियों के बारे में नहीं सुना है? कोई बात नहीं, हम बता देते हैं। पुराने ज़माने के सूखे शौचालयों से मल सर पर उठा कर ले जाने वालों की जरुरत होती थी। आजादी के बाद कश्मीर में जब ऐसे सर पर मैला उठाने वालों की जरुरत पड़ी तो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के पंजाब और अन्य प्रान्तों से ले जाकर कई वाल्मीकि परिवारों को Manual Scavenging यानि सर पर मल ढोने के लिए वहाँ की सरकार ने बुला कर बसा लिया।

इन लोगों से ये वादा किया गया कि इन्हें स्थायी नागरिक का दर्जा दिया जायेगा। मगर इस स्थायी नागरिकता के साथ शर्त ये थी कि आने वाले परिवार और उनकी आगे की पीढियाँ सिर्फ सर पर मल ढोने का काम ही करेंगी। शर्त ये थी कि वो लोग और उनकी आने वाली नस्लें अन्य नौकरी-रोजगार-व्यवसाय जैसा काम हरगिज़ नहीं कर सकते!

कश्मीर का वाल्मीकि सर पर मल ढोने के लिए कश्मीरी कानून के हिसाब से बाध्य है। जी हाँ, कश्मीर का संविधान अलग होता है। बाकी भारत में जहाँ किसी से ये काम करवाना अपराध है वहीं कश्मीर में हिन्दू समाज का एक हिस्सा सर पर मल ढोने के लिए क़ानूनी तौर पर बाध्य है। राजनैतिक धोखा इस समुदाय के साथ ये भी हुआ कि उन्हें आज भी स्थायी निवासी का दर्ज़ा नहीं मिला है। कश्मीरी हिन्दुओं के साथ ये अन्याय 1957 से जारी है। साठ साल में तीन पीढियाँ गुजर गई, मगर समाज का एक हिस्सा सर पर मल ढोता है!

क्या दल-हित चिंतकों ने आपको उनके बारे में बताया है? नहीं बताया होगा। उनकी आय के स्रोत विदेशी हैं, तो एजेंडा भी कहीं और के आदेश पर ही तय होता है। जाहिर है कानून बना कर कश्मीरी हिन्दुओं के शोषण पर उनके कलम कि स्याही सूख जाती है। उनकी नजर दिल्ली में अपना दरबार सजाने के सपने देखती है, इसलिए दलहित चिंतकों को दिल्ली से उत्तर में कश्मीरी वाल्मीकि समाज की ओर देखते ही रतौंधी हो जाती है। नोटों की भारी गड्डियाँ भारत को तोड़ने के लिए जबान पर रखी जाती है, उसके वजन से कश्मीरी हिन्दुओं कि बात करते वक्त उनकी जबान नहीं चल पाती।

जबरन दलित-सवर्ण के मुद्दे खड़े करते दलहित चिंतकों कि दहाड़ती आवाज को हम कश्मीरी वाल्मीकियों के मुद्दे पर खौफ़नाक ख़ामोशी में बदलते देखते हैं। हमें भारत निस्संदेह एक मजेदार देश लगता है।

मुंबई के मेयर ने महिला का हाथ मरोड़कर बोला- ‘तुम मुझे नहीं जानती, मैं…’, वीडियो वायरल

मुंबई के मेयर विश्वनाथ महाडेश्वर का एक वीडियो सोशल मीडिया पर इस समय खूब तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में मेयर एक महिला का हाथ मरोड़ते हुए नजर आ रहे हैं। जानकारी के मुताबिक जिस महिला के साथ मेयर ऐसी बद्तमीजी करते दिख रहे हैं वो सांता क्रूज इलाके में प्रदर्शन करने आए लोगों में शामिल थी।

ये घटना सोमवार को गोलीबार क्षेत्र की है। जहाँ कुछ लोग 52 वर्षीय एक महिला और उसके 23 वर्षीय पुत्र की बिजली के करंट लगने से हुई मौत पर गुस्सा प्रकट करने के लिए एकत्रित हुए थे। इन लोगों ने घटना के विरोध में प्रदर्शनकारियों ने वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे पर रास्ता जाम कर दिया था। जिसके बाद लोगों की नाराज़गी दूर करने के लिए मेयर वहाँ मौक़े पर पहुँचे थे। लेकिन यहाँ बातचीत के दौरान मेयर और स्थानीय लोगों के बीच झड़प हो गई। और मेयर महिला पर हाथ उठाते देखे गए।

मीडिया खबरों के मुताबिक इस प्रदर्शन में अधिकतर महिलाएँ थी। वीडियों में महिलाओं और मेयर के बीच हुई बहस को सुना जा सकता है। पूरी घटना के दौरान प्रदर्शनकारी महाडेश्वर से सवाल कर रहे थे कि वे जिस क्षेत्र की नुमाइंदगी करते हैं, वहाँ मौजूद क्यों नहीं थे? इस पर महाडेश्वर कहते हैं कि वो अस्पताल में मौजूद थे। साथ ही मेयर ये भी कहते हैं कि उनकी ज़िम्मेदारी पूरे मुंबई शहर को देखने की है।

इसपर प्रदर्शन कर रही महिला में से एक महाडेश्वर से बात करने की कोशिश में आगे बढ़ती है कि तभी महाडेश्वर उस महिला का हाथ पकड़ कर मरोड़ते दिखते हैं। महाडेश्वर को वायरल होती वीडियो में ये भी कहते सुना जा सकता है- “तुम मुझे नहीं जानती, मैं कौन हूँ क्या तुम यहाँ होशियारी दिखाने की कोशिश कर रही हो?”

बता दें कि जब मेयर से इस मामले में पूछा गया तो वह भड़क गए और कहा मुझे इस बात की जानकारी है कि किसके साथ कैसे पेश होना चाहिए। लेकिन जब मामले को उन्होंने गर्म होते देखा तो मेयर वहाँ से निकल गए और बाद में लोगों के बीच अपनी सफाई दी। उन्होंने कहा,”मेरे पास भी एक माँ है, पत्नी है और बेटी है। ऐसे में मुझे पता है कि महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। रविवार को जो दुर्भाग्यपूर्ण हादसा हुआ वह बारिश के पानी की वजह से नहीं बल्कि बिजली तार के लोहे के दरवाजे से सट जाने के कारण हुआ, जिसकी चपेट में माँ-बेटे आ गए।”

सऊदी अरब सहित कई मुस्लिम देशों ने पाकिस्तानी डॉक्टरों पर लगाई रोक, डिग्री पर उठे सवाल

सऊदी अरब सहित कई मुस्लिम देशों ने पाकिस्तान को झटका देते हुए उसके द्वारा दी जाने वाली मेडिकल पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री की मान्यता रद्द कर दी है। इससे पाकिस्तान में पढ़ाई करने वाली कई मेडिकल छात्रों के सामने भविष्य का संकट खड़ा हो गया है। सऊदी में प्रैक्टिस कर रहे पाकिस्तानी डॉक्टर्स को देश छोड़ने का आदेश दिया गया है।

2016 में सऊदी अरब ने पाकिस्तान के कई बड़े शहरों में इंटरव्यू कर डॉक्टरों की बहाली की थी। इसके अलावा पाकिस्तान के डॉक्टर्स अरब देशों में प्रैक्टिस करने जाते हैं और आगे की पढ़ाई के लिए भी वहाँ का रुख करते हैं। पाकिस्तान की एमएस और एमडी की डिग्री में खामियाँ गिनाते हुए सऊदी के स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा है कि ऐसे कोर्सेज में वहाँ स्ट्रक्चर्ड ट्रेनिंग प्रोग्राम की कमी है, जिससे वहाँ के डॉक्टर्स विभिन्न पदों पर बहाल किए जाने योग्य नहीं हैं। क़तर, यूएई और बहरीन ने भी पाकिस्तान की एमएस और एमडी की डिग्री की मान्यता रद्द कर दी।

सऊदी में कार्यरत कई डॉक्टरों को नोटिस थमा दिया गया है। इस नोटिस में कहा गया है कि यहाँ के नियम-क़ानून के मुताबिक आपकी डिग्री मान्य नहीं है। पाकिस्तान ने इन आरोपों पर जवाब देते हुए कहा कि ये देश के सबसे योग्य व जानकार डॉक्टरों का अपमान है। पाकिस्तान ने इसे झटका बताते हुए कहा है कि उसकी यूनिवर्सिटी के बारे में मनगढंत तथ्य पेश किए जा रहे हैं।

कई पाकिस्तानी डॉक्टरों ने दुःख व्यक्ति करते हुए कहा है कि उन्होंने पाकिस्तान में मेडिकल की डिग्री ली और फिर ट्रेनिंग में हिस्सा लिया, जिसके आधार पर उन्हें सऊदी अरब में नौकरी मिली। इस पूरी प्रक्रिया में कई वर्ष लग गए। अब ताज़ा निर्णय के बाद उनकी नौकरियाँ छिन गई हैं और वह देश लौटने को मजबूर हैं। पंजाब यूनिवर्सिटी में एमएस/एमडी प्रोग्राम 1914 में प्रारम्भ किया गया था और डॉक्टर जीबी कपूर इस डिग्री को प्राप्त करने वाले प्रथम व्यक्ति थे।

आतंक पर फिर बेनकाब हुआ पाकिस्तान, 26/11 का गुनाहगार हाफिज सईद जेल से बाहर

पाकिस्तान ने 26/11 मुंबई हमले के साजिशकर्ता हाफिज सईद को रिहा कर दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स में ऐसा दावा किया गया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के अमेरिका दौरे से पहले 17 जुलाई को वह गिरफ्तार किया गया था। वह रावलपिंडी के कोट लखपत जेल में बंद था।

कई लोगों का मानना था कि इमरान खान के अमेरिका दौरे के मद्देनजर ही जमात-उद-दावा का मुखिया सईद गिरफ्तार किया गया है। हालॉंकि न्यूज एजेंसी एएनआई ने पाकिस्तानी मीडिया के हवाले से बताया है कि अब उसका मामला गुजरांवाला कोर्ट से पाकिस्तान के गुजरात ट्रांसफर कर दिया गया है। उसकी रिहाई की खबर ऐसे वक्त में आई है जब जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल पास हुआ है।

अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी होने के बावजूद हाफिज सईद के पाकिस्तान में खुलेआम घूमते रहने की खबरें पहले भी आती रही हैं। भारत द्वारा कई बार सबूत दिए जाने के बाद भी पाकिस्तान उस पर कार्रवाई करने से हिचकता रहा है। पहले भी उसे कई बार दिखावटी तौर पर कुछ दिनों के लिए गिरफ्तार किया जा चुका है।

ख़बरों के अनुसार, यह नौवीं बार था जब हाफिज सईद को गिरफ्तार किया गया या हिरासत में लिया गया। इस मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी अपनी किरकिरी करा चुके हैं। ट्रम्प ने कहा था कि हाफिज सईद को ‘खोज कर गिरफ्तार’ किया गया जिसके बाद लोगों ने ट्रम्प को याद दिलाया कि वह पाकिस्तान में छिप कर नहीं रहता बल्कि खुला घूमता है।

इस्लामाबाद में लगे शिवसेना के बैनर: ‘आज J&K लिया है, कल POK लेंगे’

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल पर चर्चा के दौरान शिवसेना सांसद संजय राउत के बयान वाले पोस्टर पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में कई जगहों पर लगे मिले। इनमें राजधानी का अतिसुरक्षित माना जाने वाला इलाक़ा भी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक जिन इलाकों में पोस्टर लगाए गए वह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के मुख्यालय के नजदीक हैं।

इस मामले में इस्लामाबाद पुलिस ने अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज किया है। साथ ही रेड जोन इलाके में रेड डालकर तीन लोगों को हिरासत में लिया है। पाकिस्तान के जिला प्रशासन ने इस मामले में नगर निगम को भी नोटिस जारी करके 24 घंटों के अंदर जवाब माँगा है कि पोस्टरों को हटाने में 5 घंटे क्यों लगे?

गौरतलब है कि इस पोस्टर पर शिवसेना नेता संजय राउत का वो बयान लिखा था जिसमें उन्होंने कहा था,”आज जम्मू और कश्मीर लिया है, कल बलूचिस्तान लेंगे, पीओके लेंगे और मुझे उम्मीद है कि प्रधानमंत्री अखंड भारत का सपना पूरा करेंगे।”

मीडिया की खबरों में थाना सेक्रेटिएट के इंचार्ज इंस्पेक्टर असजद महमूद ने बताया कि बैनर सिर्फ़ उनके इलाक़े में ही नहीं लगाए गए, बल्कि अन्य जगहों पर भी लगाए गए हैं। उन्होंने बताया कि जानकारी मिलने के बाद उन्होंने तुरंत बैनरों को उतारना शुरू कर दिया। पत्रकारों को इन पोस्टरों की तस्वीर लेने से मना कर दिया गया।

पुलिस ने रेड जोन में स्थित एक पाँच सितारा होटल के अलावा आसपास की इमारतों पर लगे सीसीटीवी कैमरों से रिकॉर्डिंग हासिल कर ली है, जिसमें एक आदमी को वहाँ के एफ-6 इलाके में ये पोस्टर लगाते दिख रहा है।

बता दें कि इस्लामाबाद में बैनर लगाने के लिए प्रशासन की अनुमति अनिवार्य है। इलाके में धारा 144 भी प्रभावी है।

370 पर पुलवामा दोहराने की धमकी देने के बाद डरे हुए पाकिस्तान ने बंद की अपनी वायुसीमा

प्रधानमंत्री निवास की भैंसे नीलाम कर और नान-रोटी के दामों से अर्थव्यवस्था सुधारने की कोशिश कर रहे इमरान खान ने जम्मू-कश्मीर पर भारत के शख्त निर्णय के बाद पाकिस्तानी संसद के संयुक्त सत्र में भारत को धमकी दी थी कि इसका अंजाम हिंदुस्तान को पुलवामा जैसे हमलों से भुगतना पड़ेगा, लेकिन अब वह खुद रक्षात्मक बैकफ़ुट पर आ गए हैं। पाकिस्तान ने पुलवामा का मज़ा चखाने के लिए हुई बालाकोट एयर-स्ट्राइक जैसे किसी कदम की पुनरावृत्ति की आशंका में अपनी वायुसीमा फिर से हिंदुस्तानी नागरिक हवाई जहाजों के लिए बंद करने की घोषणा की है।

टाइम्स ऑफ़ इस्लामाबाद में छपी एक खबर में पाकिस्तान एयर लाइन्स के प्रवक्ता मशूद तजवार के हवाले से दावा किया गया है कि चूँकि पाकिस्तान फरवरी के बालाकोट हमले जैसी प्रतिक्रिया से सशंकित है, इसलिए अपनी वायुसीमा को बंद करना ज़रूरी समझता है। उनके हवाले से दावा यह भी किया गया है कि हिंदुस्तान के लिए अपनी एयर-स्पेस खोलने का पाकिस्तान एयर लाइन्स को कोई खास फ़ायदा नहीं हुआ है। हिंदुस्तान जाने वाली फ्लाइटें चलाना कम यात्रियों के चलते घाटे का सौदा है।

अपने इस ट्वीट में बीबीसी से जुड़े रहे पत्रकार जान अचाकज़ाई दावा करते हैं पाकिस्तान ने अपनी हवाई सीमा बंद करने के अलावा अपने हाई कमिश्नर को हिंदुस्तान न लौटने का निर्देश दिया है।

‘ऑपरेशन बंदर’ के छद्म-नाम से हुए बालाकोट हवाई हमले के बाद पाकिस्तान ने अपनी हवाई सीमा हिंदुस्तानी हवाई जहाजों के लिए बंद कर दी थी। एक तरफ वह दावा करता रहा कि हिंदुस्तान की वायु सेना ने ‘केवल कुछ पेड़ जलाए’, दूसरी ओर हवाई सीमा खोलने के लिए शर्त भी लगा दी थी कि हिंदुस्तान वादा करे कि बालाकोट जैसा हमला दोबारा नहीं होगा। जुलाई में जाकर उसने अपनी वायु-सीमा फिर से खोली

2024 तक रहने दो राष्ट्रीय पार्टी: तृणमूल और CPI ने EC से लगाई गुहार

तृणमूल कॉन्ग्रेस और सीपीआई (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया) ने चुनाव आयोग से गुजारिश की है कि 2024 तक राष्ट्रीय पार्टी का उनका दर्जा बरकरार रखा जाए। दोनों दलों ने आयोग से कहा कि इस सम्बन्ध में कोई भी निर्णय 2024 में लोकसभा चुनाव संपन्न हो जाने के बाद ही लिए जाए।

हालिया लोकसभा चुनावों में ख़राब प्रदर्शन के बाद दोनों दलों को मिले ‘राष्ट्रीय पार्टी’ के दर्जे पर तलवार लटक रही है। इन दोनों दलों के अलावा शरद पवार की एनसीपी पर भी तलवार लटक रही है। 18 जुलाई को चुनाव आयोग ने इन तीनों पार्टियों को नोटिस जारी कर पूछा था कि उनका ‘राष्ट्रीय पार्टी’ का दर्जा क्यों ख़त्म नहीं किया जाए? इन दलों से 5 अगस्त तक जवाब देने को कहा गया था।

चुनाव आयोग द्वारा तय मानकों के अनुसार नेशनल पार्टियों को कम से कम चार राज्यों में लोकसभा चुनाव में कम से कम 6% मत प्राप्त करने होते हैं। अगर कम से कम तीन राज्यों में कुल लोकसभा सीटों की संख्या का 2% प्राप्त होता है, तो भी नेशनल पार्टी का दर्जा बरकरार रहता है। अगर कोई पार्टी इन दोनों ही शर्तों को पूरा करने में नाकाम साबित होती है तो उसे स्टेट पार्टी का ही दर्जा मिलेगा। अगर किसी पार्टी को 4 अलग-अलग राज्यों में स्टेट पार्टी का दर्जा मिला हुआ है, तो भी वह नेशनल पार्टी कहलाएगी।

तृणमूल कॉन्ग्रेस ने आयोग की नोटिस का जवाब देते हुए कहा है कि उसे नेशनल पार्टी का दर्जा 2016 में ही मिला है, अतः उसे कम से कम 2024 तक समय दिया जाना चाहिए। बसपा सहित कई अन्य दलों को रियायत देते हुए चुनाव आयोग ने उन्हें नेशनल पार्टी का दर्जा बचाए रखने के लिए अतिरिक्त समय दिया था। अगर किसी पार्टी से राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा छिन जाता है तो वह एक ही चुनाव चिह्न पर पूरे देश में चुनाव लड़ने के योग्य नहीं रह जाती है।