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मनमोहन 86 की उम्र में लड़ेंगे चुनाव: कॉन्ग्रेस में सोनिया के साथ ‘ओल्ड गार्ड’ की वापसी!

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की राजयसभा में वापसी होगी। अब तक असम से राज्यसभा जा रहे वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता अब राजस्थान का प्रतिनिधित्व करने की तैयारी कर रहे हैं। वह राज्यसभा उपचुनाव में नामांकन दाखिल करने के लिए राज्य की राजधानी जयपुर पहुँच गए हैं। वह इससे पहले 1991, 1995, 2001, 2007 और 2013 में राज्यसभा जाने के लिए निर्वाचित हो चुके हैं।

निर्वाचन पक्का

200 सदस्यों वाली विधानसभा में 100 कॉन्ग्रेस के तो विधायक हैं ही, राज्य सरकार को 6 बसपाई और 12 निर्दलीय विधायकों का भी समर्थन है, इसलिए डॉ. सिंह के निर्वाचन में कोई अड़चन आने की आशंका नहीं है। यह सीट भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मदनलाल सैनी के मृत्यु से रिक्त हुई है। 2004-14 तक देश का नेतृत्व करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री के खिलाफ अब तक भाजपा ने किसी प्रत्याशी की घोषणा नहीं की है, क्योंकि राज्य में उसके कुल 73 ही विधायक हैं।

86-वर्षीय डॉ. सिंह की पारंपरिक राज्यसभा सीट असम से थी। लेकिन पिछले विधानसभा चुनावों में वहाँ भाजपा का कब्ज़ा हो जाने के बाद वहाँ से अपना कार्यकाल पूरा कर जब डॉ. सिंह राज्यसभा से विदा हुए तो इसे उनका रिटायरमेंट माना जा रहा था। लेकिन अब वह 3 अप्रैल, 2024 तक राज्यसभा सदस्य रहेंगे, और 92 की उम्र तक उनका कार्यकाल होगा।

ओल्ड गार्ड की वापसी

हाल ही में सोनिया गाँधी के कॉन्ग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी अंतरिम तौर पर संभालने को कॉन्ग्रेस में ‘ओल्ड गार्ड’ यानी पुराने कॉन्ग्रेसियों की वापसी के तौर पर देखा जा रहा है। मनमोहन सिंह को सोनिया के सबसे विश्वस्त सिपहसालारों में से एक माना जाता है। ऐसे में कयास यह भी लग रहे हैं कि डॉ. सिंह की राज्यसभा में वापसी सोनिया गाँधी के पार्टी पर नेहरू-गाँधी परिवार की पकड़ मजबूत करने की दिशा में बढ़ाया गया कदम है। राहुल गाँधी के नेतृत्व में ‘युवा तुर्कों’/’न्यू गार्ड’ कहे जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट आदि के समूह ने मनमोहन सिंह, अहमद पटेल, गुलाम नबी आज़ाद आदि को हाशिए पर खिसका दिया था। अब जब सोनिया गाँधी दोबारा कॉन्ग्रेस अध्यक्षा के तौर पर सामने हैं और डॉ. सिंह की राज्यसभा में वापसी होने वाली है, तो यह इस बात का सबूत है कि कॉन्ग्रेस एक बार फिर से ओल्ड गार्ड की ओर रुख कर चुकी है।

₹2000 करोड़ धोखाधड़ी मामला: देश छोड़ कर भाग रहा था पूर्व BSP प्रत्याशी का भाई, गिरफ़्तार

पुणे के बिल्डर डीएस कुलकर्णी के भाई मकरंद कुलकर्णी को गिरफ़्तार कर लिया गया है। डीएसके ग्रुप से जुड़े कई लोगों पर निवेशकों से 2000 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी का आरोप है। मकरंद कुलकर्णी को मुंबई एयरपोर्ट से तब गिरफ़्तार किया गया, जब वह मंगलवार (अगस्त 13, 2019) की सुबह देश छोड़ कर भागने की तैयारी में था। मकरंद की जमानत याचिका पहले ही ख़ारिज की जा चुकी है, जिसके बाद पुलिस ने उसके ख़िलाफ़ लुकआउट सर्कुलर जारी किया था।

2017 में डीएस कुलकर्णी और उसकी पत्नी हेमंता के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया था। डीएस कुलकर्णी 2009 लोकसभा चुनाव में बसपा के टिकट पर चुनाव भी लड़ चुका है। उस चुनाव में वह चौथे नंबर पर रहा था और कॉन्ग्रेस नेता सुरेश कलमाड़ी ने जीत दर्ज की थी। डीएसके ग्रुप धोखाधड़ी मामले में अब तक 15 लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया जा चुका है। इनमें से 10 आरोपितों को अलग-अलग समय पर गिरफ़्तार कर उनके ख़िलाफ़ चार्जशीट भी दायर की जा चुकी है।

इन 10 लोगों में से डीएस कुलकर्णी और उसकी पत्नी हेमंती सहित 8 आरोपित पुणे की यरवदा जेल में बंद हैं। वहीं अब डीएस कुलकर्णी का भाई गिरफ़्तार होने से बचने के लिए देश छोड़ने की फ़िराक में था। चूँकि, उसके ख़िलाफ़ लुकआउट सर्कुलर जारी था, एयरपोर्ट स्टाफ ने उसे हिरासत में ले लिया। इसके बाद पुणे पुलिस की एक टीम ने एयरपोर्ट पहुँच कर उसे गिरफ़्तार कर लिया। उसे पुणे की अदालत में पेश किया जाएगा।

डीएसके ग्रुप ने डिपाजिट के रूप में निवेशकों से भारी रकम लिया था और उन्हें मासिक एवं वार्षिक रिटर्न देने का वादा किया था। इसके बाद डीएसके ग्रुप ने एक योजना लाई जिसमें पहले घर दिए जाने और बाद में भुगतान करने की बात कही गई। फरवरी 2018 में गिरफ़्तारी से पहले 2 प्रेस कॉन्फ्रेंस कर डीएस कुलकर्णी ने इन आरोपों को नकार दिया था।

कश्मीर में मीडिया प्रोपेगेंडा: BBC-अल जज़ीरा से सरकार ने माँगे असली वीडियो, अभी तक नहीं आया जवाब

गत शुक्रवार (अगस्त 02, 2019) को BBC और अल जज़ीरा ने अपनी रिपोर्ट्स में दावा किया कि कश्मीर में धरना-प्रदर्शन चल रहे हैं। हालाँकि उसी दिन गृह मंत्रालय द्वारा स्पष्ट किया गया था कि कश्मीर में इस प्रकार का कोई भी विरोध नहीं हो रहा है। गृह मंत्रालय ने कश्मीर में दस हजार लोगों के प्रदर्शन की खबरों को सिरे से खारिज करते हुए वहाँ पर ऐसे किसी प्रदर्शन को निराधार और असत्य बताया था। साथ ही स्पष्ट किया था कि प्रदर्शनकारियों पर आँसू गैस के गोले या पैलेट गन का इस्तेमाल किए जाने वाली खबरें भी बेबुनियाद हैं।

इसके बाद BBC ने अल जज़ीरा की रिपोर्ट को आधार बनाते हुए कहा कि सरकार झूठ कह रही है और कश्मीर में विरोध प्रदर्शन जारी है। BBC की इस रिपोर्ट को कई समाचार संस्थाओं ने शेयर किया है। हालाँकि सरकार ने इस वीडियो फुटेज की विश्वसनीयता पर संदेह व्यक्त करते हुए इसे ‘एडिटेड’ बताया है।

कश्मीर को लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, गृह मंत्रालय और इंटेलिजेंस ब्यूरो लगातार नजर रख रहे हैं। इस दौरान उन्होंने अपनी रिपोर्ट में चार वीडियो और सात रिपोर्ट्स को ‘भ्रामक और फेक’ के रूप में चिह्नित किया है। इनमें घाटी में भारत विरोध प्रदर्शन, तनाव और उग्रवाद में वृद्धि जैसे कारक शामिल हैं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि उन्हें विदेशी मीडिया संस्थानों से प्रतिक्रिया का इंतजार है, लेकिन अभी तक वे वीडियो नहीं दे पाए हैं। गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने पुष्टि करते हुए कहा कि सभी लोग बीबीसी उर्दू के वीडियो का जिक्र कर रहे हैं और अब तक रॉ-फुटेज उपलब्ध नहीं करवाए हैं।

सरकार का कहना है कि मीडिया संस्थानों की ओर से रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कश्मीर घाटी में 10,000 से अधिक लोगों ने शुक्रवार सुबह भारत के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में भाग लिया और एक अन्य में कहा गया कि सेना ने पश्चिमी श्रीनगर में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों का मुकाबला करने के लिए हिंसा का सहारा लिया है।

सरकारी अधिकरियों द्वारा की गई पूछताछ में पता चला है कि वीडियो को पहले अल जज़ीरा और फिर बीबीसी ने जारी किया। इसके अलावा बीबीसी ने इसे अपने सभी क्षेत्रीय चैनलों में प्रसारित किया। 

वीडियो में दिख रहे प्रदर्शनकारियों के बैनर हैं संदेहास्पद

इकोनॉमिक टाइम्स की खबर के अनुसार, सरकार का कहना है कि जो वीडियो सबसे ज्यादा चिंताजनक है वह यह है कि बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों ने एक बैनर तले मार्च करते हुए कहा कि वो आजादी चाहते हैं और अनुच्छेद 370 पर फैसले को अस्वीकार करते नजर आ रहे हैं। यह उस समय हुआ है जब कथित तौर पर शुक्रवार की सुबह कुछ घंटों के लिए कर्फ्यू में ढील दी गई।

गृह मंत्रालय ने बीबीसी की इस वीडियो को एडिटेड (Edited) बताते हुए इस पर जाँच करने की बात कही है। सरकार ने इन खबरों का खंडन करते हुए कहा कि केवल श्रीनगर और बारामुला में विरोध प्रदर्शन हुआ, जहाँ 20 से अधिक लोग मौजूद नहीं थे। जम्मू और कश्मीर के मुख्य सचिव बीवीआर सुब्रमण्यम ने बाद में स्पष्ट किया कि पुलिस ने पिछले छह दिनों में एक भी गोली नहीं चलाई गई है और स्थिति शांत है।

गृह मंत्रालय का कहना है कि इन समाचार एजेंसियों द्वारा अभी तक भी कोई जवाब या स्पष्टीकरण नहीं मिला है। BBC को अक्सर इसके देशविरोधी पूर्वग्रहों के लिए जाना जाता है। फरवरी में हुए पुलवामा हमले के बाद भारत द्वारा की गई जवाबी कार्रवाई में भी बीबीसी ने अपने प्रोपेगैंडा को खूब हवा दी थी।

राम का जन्मस्थान कहाँ? बाबरी मस्जिद के गुंबद के नीचे: सुप्रीम कोर्ट से बोले रामलला के वकील

लंबे समय से चल रहे आयोध्या विवाद पर मंगलवार (अगस्त 13, 2019) को भी सुनवाई चल रही है। इस दौरान कोर्ट ने रामलला के वकील से पूछा कि राम का जन्मस्थान कहाँ है? तो वकील एस सी वैद्यनाथन ने इसका जवाब देते हुए कहा कि राम का जन्मस्थान बाबरी मस्जिद के गुंबद के नीचे है। साथ ही वैद्यनाथन ने ये भी कहा कि मुस्लिम पक्ष की तरफ से विवादित स्थल पर उनका मालिकाना हक साबित नहीं किया गया और जब भी हिंदू वहाँ पर पूजा करने की खुली छूट माँगते हैं, तो विवाद होना शुरू हो जाता है।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील वैद्यनाथन ने एक मुस्लिम गवाह का हवाला देते हुए कहा कि 72 साल के मोहम्मद हाशिम ने गवाही में कहा था कि हिंदुओं के लिए अयोध्या उतना ही महत्व रखता है, जितना समुदाय विशेष के लिए मक्का।

साथ ही वकील वैद्यनाथन ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने ही अपने एक फैसले में कहा था कि मंदिर के लिए मूर्ति होना जरूरी नहीं है। अब रामजन्मभूमि को लेकर जो आस्था है, वह सभी शर्तों को पूरा करती है। उन्होंने मुस्लिम पक्ष की दलील को पढ़ा और कहा कि उनके (मुस्लिम पक्ष) पास कोई सबूत नहीं है कि उनके पास कब्जा है या कब्जा चला आ रहा है। उन्होंने ये भी कहा कि अगर कोई स्थान देवता है, तो फिर उसके लिए आस्था मान्य होनी चाहिए। इस पर जस्टिस अशोक भूषण ने चित्रकूट में कामदगिरी परिक्रमा का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि लोगों की आस्था और विश्वास है कि वनवास जाते समय भगवान राम, लक्ष्मण और सीता ठहरे थे।

बता दें कि, मध्यस्थता प्रयास विफल हो जाने के बाद चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में 5 सदस्यों की बेंच इस मामले में सुनवाई कर रही है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई में जस्टिस एस ए बोबडे, जस्टिस डी वीई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस ए नजीर की टीम हफ्ते में 5 दिन की सुनवाई की जा रही है। सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से 5 दिन सुनवाई का विरोध किया गया था, मगर अदालत ने इस विरोध को स्वीकार नहीं किया।

मैं कश्मीर मुद्दे पर टीम इंडिया के साथ: US सांसद ने Pak के समर्थन में बोलने के लिए माँगी माफ़ी

कश्मीर मुद्दे पर अमेरिकी विदेश सचिव (भारतीय विदेश मंत्री के समकक्ष) माइक पोम्पिओ से हस्तक्षेप का अनुरोध करने के लिए पत्र लिखने के बाद अमेरिकी-भारतीय समुदाय के निशाने पर आए सांसद थॉमस ‘टॉम’ सुओज़्ज़ी ने माफ़ी माँगी है। उन्होंने कहा कि इस संवेदनशील मुद्दे पर विदेश मंत्रालय से पहले अपने भारतीय-अमेरिकी दोस्तों से सलाह-मशविरा न करना उनकी भूल थी।

9 अगस्त को लिखे अपने पत्र में अमेरिकी संसद के हाउस ऑफ़ रेप्रेज़ेंटेटिव्स के सदस्य सुओज़्ज़ी ने लिखा था कि भारतीय प्रधानमंत्री मोदी की कार्रवाई (राज्य को विशेष दर्जे का खात्मा, और पूर्ण राज्य से केंद्र-शासित प्रदेश में तब्दीली) ने कश्मीर में तनाव को और बढ़ा दिया है, जिससे वे (सुओज़्ज़ी) चिंतित हैं। उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान मुद्दे के साथ भी कश्मीर का घाल-मेल करने की कोशिश की थी। “(पाकिस्तानी) प्रधानमंत्री इमरान खान के हालिया अमेरिकी दौरे ने दिखा दिया कि अफगानिस्तान-पाकिस्तान सरहद पर हमारे दोनों देश (अमेरिका-पाकिस्तान) आतंक-विरोध और अन्य सुरक्षा मुद्दों पर मिलकर काम कर रहे हैं। भारतीय सरकार की जम्मू-कश्मीर में की गई हालिया हरकतों के चलते हमें इन इलाकों पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है।” और मज़े की बात यह है कि खुद तालिबान ने पाकिस्तान से दो-टूक कह दिया है कि कश्मीर मुद्दे को वह अफगानिस्तान से जोड़ कर नहीं देखता। लगभग यही बात अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई भी कह चुके थे।

सुओज़्ज़ी यहीं नहीं रुके थे। अपने पत्र में उन्होंने इमरान खान की तरह भारत को आतंकी हमलों की धमकी देने वाली भाषा का भी इस्तेमाल किया था। “राज्य की स्वायत्ता और कश्मीरियों के अधिकारों पर यह नई पाबंदियाँ उग्रवादियों और दहशतगर्दों को भी उकसा सकतीं हैं।”

भारतीय-अमेरिकी समुदाय ने लिया आड़े हाथों

न्यू यॉर्क के डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद सुओज़्ज़ी ने यह पत्र मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कुछ पाकिस्तानी-अमेरिकियों से मिलने के बाद लिखा था। लेकिन करीब 100 भारतीय-अमेरिकियों से मिलने के बाद उन्होंने 12 अगस्त (स्थानीय समय) को एक कथन प्रेस में जारी कर उस पत्र में लिखी लगभग सभी बातों को खुद ही ख़ारिज कर दिया।

“भारतीय-अमेरिकी मित्रों से मुलाकात के बाद मुझे यह अहसास हो गया है कि सचिव पोम्पिओ को वह पत्र लिखने के पहले भारतीय-अमेरिकियों से न मिल लेना एक गलती थी। मैं इसके लिए क्षमा चाहता हूँ। अगर मैं उनसे पत्र लिखने के पहले मिल लेता तो मैं अपनी चिंताओं को अलग तरीके से व्यक्त करता।”

सुओज़्ज़ी ने कहा कि वह हमेशा से भारत के समर्थक रहे हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत-अमेरिका साझेदारी को वह आने वाले कम-से-कम 50 साल तक अमेरिका की सबसे महत्वपूर्ण साझेदारियों में से एक मानते हैं, और इसे आगे बढ़ाने के लिए वह संसद में प्रयास करते रहेंगे।

‘चिदंबरम धरती पर केवल एक बोझ हैं’ – तमिलनाडु के CM का कॉन्ग्रेस नेता पर निशाना

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के पलानीसामी ने आज कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम को धरती पर सबसे बड़ा बोझ बताकर उन पर जुबानी हमला बोला है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो उन्होंने चिदंबरम के लिए कहा, “वह केवल धरती पर बोझ हैं।”

उन्होंने चिदंबरम द्वारा उनकी पार्टी की आलोचना किए जाने पर ये बात कही। जहाँ पूर्व वित्त मंत्री ने तमिलनाडु को केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के AIADMK के स्टैंड की आलोचना की थी। जिसमें AIDMK ने कहा था कि अगर केंद्र जम्मू-कश्मीर की तर्ज पर तमिलनाडु को भी केंद्र शासित प्रदेश बनाता है तो पार्टी उसका विरोध नहीं करेगी।

तमिलनाडु सीएम ने कहा कि लंबे समय तक केंद्रीय मंत्री रहते हुए पी चिदंबरम ने कभी राज्य से संबंधित कावेरी नदी के विवाद को नहीं उठाया। उन्होंने खासतौर पर तमिलनाडु के संदर्भ में पी चिदंबरम से सवाल किया कि ‘वह कौन सी योजनाएँ लेकर आए?’

इसके अलावा के पलानीसामी पूछते हैं, “पी चिदंबरम कितने समय तक केंद्रीय मंत्री रहे? देश को क्या फायदा हुआ… वह सिर्फ़ धरती पर बोझ हैं।”

गौरतलब है कि आर्टिकल 370 के निरस्त होने बाद पी चिदंबरम लगातार भाजपा सरकार पर सवाल कर रहे हैं जिसके कारण भाजपा ने उनको आड़ो हाथों लिया हुआ है। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर भी इससे पहले चिदंबरम के उस बयान पर उन्हें खरी-खोटी सुना चुके हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि जम्मू-कश्मीर हिंदू बहुल राज्य होता तो भाजपा की सरकार इस सरहदी सूबे से विशेष दर्जा नहीं छीनती।

प्रकाश जावड़ेकर ने चिदंबरम के इस बयान के बारे में कहा था कि अब ऐसे तर्कों का कोई मतलब नहीं है। कॉन्ग्रेस बताए कि वह अपने 70 साल के राज के दौरान जम्मू-कश्मीर में अल्पसंख्यक वर्ग को शिक्षण संस्थान चलाने के अधिकार और सफाई कर्मचारियों को न्याय क्यों नहीं दिलवा सकी थी?

रजनीकांत को कश्मीर और संविधान की समझ नहीं, इतिहास पढ़ें: चिदंबरम के पुत्र

आर्टिकल 370 पर केन्द्र सरकार के फैसले को धर्म से जोड़ने वाले वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम के सांसद बेटे कार्ति चिदंबरम ने सुपरस्टार रजनीकांत पर निशाना साधा है। कार्ति इस बात से नाराज़ हैं कि रजनीकांत ने अनुच्छेद 370 के मसले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की प्रशंसा की। बता दें कि रजनीकांत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की तुलना कृष्ण एवं अर्जुन की जोड़ी से की थी।

सुपरस्टार ने अपने चिर-परिचित अंदाज में कहा था कि इन दोनों में अर्जुन कौन है और कृष्ण कौन है, इसका जवाब यही दोनों नेता दे सकते हैं। रजनीकांत के सम्बोधन के दौरान अमित शाह भी मंच पर मौजूद थे। रजनीकांत ने कहा था, “मिशन कश्मीर के लिए आपको बधाई।“ रजनीकांत ने कार्यक्रम के दौरान अमित शाह द्वारा संसद में अनुच्छेद 370 पर दिए गए भाषण को भी विलक्षण बताया था।

इसी बात से चिढ़े कार्ति चिदंबरम ने रजनीकांत पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि रजनीकांत ने कश्मीर मसले और भारत के संवैधानिक इतिहास को समझे बिना मोदी-शाह की तुलना कृष्ण-अर्जुन की जोड़ी से कर दी। कार्ति ने कहा कि रजनीकांत को भारत के सभी महत्वपूर्ण मुद्दों पर टिप्पणी करनी चाहिए लेकिन वह सिर्फ़ सेलेक्टिव मसलों पर ही बयान देते हैं। उन्होंने आरटीआई बिल और नीट मसले पर रजनीकांत से टिप्पणी की माँग की। कार्ति चिदंबरम ने कहा:

“पुराण पढ़ने वाले रजनीकांत को कश्मीर का इतिहास पढ़ना चाहिए और 1930-45 के बीच का जर्मनी का इतिहास भी पढ़ना चाहिए। “

जर्मनी के इतिहास से कार्ति का आशय हिटलर के इतिहास से था, क्योंकि उन्होंने जिस कालावधि का जिक्र किया, वह हिटलर का दौर था। कार्ति चिदंबरम और उनके पिता पी चिदंबरम पर एयरसेल-मैक्सिस मामले में गिरफ्तारी की तलवार लटकी हुई है। अदालत द्वारा चिदंबरम पिता-पुत्र को कई बार गिरफ्तारी से राहत प्रदान कर चुकी है।

कार्ति ने पूछा कि अगर पोंगल से पहले तमिलनाडु भी कश्मीर की तरह लॉकडाउन हो जाए तो क्या इसे स्वीकार किया जाएगा? उन्होंने कहा कि भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 सम्बन्धी निर्णय जम्मू-कश्मीर क्षेत्र और वहाँ की मुस्लिम जनसंख्या को अपने नियंत्रण में लेने के लिए किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार इतने बड़े बहुमत का ग़लत इस्तेमाल कर रही है।

नमाज के लिए सड़क जाम, अयोध्या से लौट रहे बजरंगी आगरा में पढ़ने लगे हनुमान चालीसा

उत्तर प्रदेश के आगरा में सोमवार (अगस्त 12, 2019) को नमाज के लिए सड़क जाम किए जाने से गुस्साए बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने चौराहे पर ही हनुमान चालीसा का पाठ करना शुरू कर दिया। आगरा के अलीगढ़ हाइवे पर स्थित खंदौली कस्बे में ईदगाह के बाहर सड़क पर लोग बकरीद की नमाज अता कर रहे थे। इस दौरान प्रशासन ने ट्रैफिक को रोक दिया था। जिसकी वजह से सड़क पर दोनों ओर बड़ी संख्या में वाहन खड़े हो गए थे। रोके गए ट्रैफिक में बजरंग दल के सदस्‍यों से भरी बस भी फँसी हुई थी।

दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर का स्क्रीनशॉट

खबर के मुताबिक, अलीगढ़ के बजरंगदल के 80 पदाधिकारी और कार्यकर्ता अयोध्या में रामलला के दर्शन करने गए थे। सोमवार को बस से आगरा-अलीगढ़ हाईवे से लौट रहे थे। इसी दौरान उनकी बस ट्रैफिक में फँस गई। नमाज खत्म होने के बाद वाहन धीरे-धीरे निकाले जा रहे थे। इसी दौरान चौराहे पर तैनात दारोगा ने बस चालक से अभद्रता कर दी। बस में सवार बजरंग दल के चार पदाधिकारी बात करने गए तो उनसे भी अभद्र व्यवहार किया गया।

इससे गुस्साए कार्यकर्ता हाईवे पर बैठकर हनुमान चालीसा पढ़ने लगे। उनका कहना था कि अगर नमाज के लिए वाहन को रोका जा सकता है तो वे भी रोड पर बैठकर हनुमान चालीसा पढ़ेंगे। करीब 20 मिनट तक हंगामे के बाद सीओ एत्मादपुर अतुल सोनकर के समझाने पर कार्यकर्ता शांत हुए। बस में सवार अलीगढ़ बजरंग दल के गौरक्षा प्रमुख केदार सिंह का कहना था कि पुलिस की अभद्रता पर विरोध दर्ज कराया गया था।

अरुंधति रॉय, ममता बनर्जी और कॉन्ग्रेस के भरोसे पाकिस्तान: कश्मीर पर Pak सीनेटर का कबूलनामा

आज जब दुनिया भर में पाकिस्तान की फजीहत हो रही है और भारत उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग करने में लगा हुआ है, पाकिस्तान को आतंकियों और अलगाववादियों ने नहीं बल्कि भारत के कुछ बुद्धिजीवियों और नेताओं से ज्यादा उम्मीदें हैं। अनुच्छेद 370 के अहम प्रावधानों को ख़त्म करने के साथ ही जम्मू कश्मीर को मिला विशेषाधिकार भी नहीं रहा। राज्य को पुनर्गठित कर के इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया। लद्दाख विधायिका रहित केंद्र शासित प्रदेश होगा। पाकिस्तान ने इस निर्णय के ख़िलाफ़ चीन का दरवाजा खटखटाया लेकिन उसे अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।

तालिबान ने भी पाकिस्तान को डाँट पिलाई। रूस ने भारत के निर्णय को संवैधानिक दायरे में रह कर लिया गया फैसला बताया। मालदीव और यूएई जैसे मुस्लिम देशों ने भी भारत का ही समर्थन किया। अब बौखलाए पाकिस्तान को अरुंधति रॉय, ममता बनर्जी और कॉन्ग्रेस पार्टी से उम्मीदें हैं। लेखिका अरुंधति रॉय अक्सर भारतीय सेना के ख़िलाफ़ बयान देती रहती हैं और कश्मीर पर भारतीय रुख के विपरीत बोलने का उनका पुराना इतिहास रहा है।

पाकिस्तानी टीवी चैनल पर बहस

कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता अधीर रंजन चौधरी ने जिस तरह से संसद में जम्मू कश्मीर को द्विपक्षीय मुद्दा साबित करने की कोशिश कर के भारतीय स्टैंड के ख़िलाफ़ बयान दिया, उससे पाकिस्तान को ज़रूर बल मिला होगा और इसीलिए अब वहाँ कॉन्ग्रेस को पाकिस्तान के प्रति सहानुभूति जताने वालों में देखा जा रहा है। पाकिस्तानी राजनेता और पत्रकार मुशाहिद हुसैन ने अरुंधति, कॉन्ग्रेस, कम्युनिष्ट पार्टी (वामदल) और ममता से समर्थन की उम्मीद जताई। उन्होंने कहा कि ये सब आपके (पाकिस्तान के) साथ हैं।

मुशाहिद ने कहा कि ये तीनों पाकिस्तान से सहानुभूति रखते हैं और पाकिस्तान के हित में वो मददगार साबित हो सकते हैं। वीडियो में (17 मिनट 40 सेकंड पर) आप देख सकते हैं कि एंकर पूछता है कि कश्मीर में मुस्लिमों की समस्याएँ किस तरह से ख़त्म होंगी? इस सवाल के जवाब में हुसैन ने कहा कि भारत एक बहुत बड़ा देश है और वहाँ सब कोई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन नहीं करता। हुसैन ने कहा कि पाकिस्तान को धैर्य रखना होगा क्योंकि अरुंधति, ममता और कॉन्ग्रेस नेताओं जैसे कुछ पाकिस्तान के प्रति सहानुभूति रखने वाले लोग हैं।

हुसैन ने दावा किया कि पूरा भारत मोदी के साथ नहीं है। इससे पहले तारिक़ पीरजादा नामक पाकिस्तानी विश्लेषक ने हिन्दुओं के नरसंहार की बात करते हुए कहा था कि कश्मीर में जाकर बसने वाले किसी भी हिन्दू को एक मिनट भी जिन्दा रहने का अधिकार नहीं है। टीवी बहस के दौरान पीरजादा ने ये बातें कही थीं।

J&K में बैन हटाने से SC का इनकार, कहा- मामला संवेदनशील है सरकार को समय दिया जाना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर में लगे प्रतिबंध हटाने के बारे में तत्काल कोई भी आदेश देने से मना कर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि यह मामला बेहद संवेदनशील है। सरकार द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने को लेकर दायर याचिकाओं पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि सरकार को सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए कुछ समय दिया जाना चाहिए। कोर्ट प्रशासन के हर मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा कि हम स्थिति का रोजाना रिव्यू कर रहे हैं और मानवाधिकार का कोई हनन नहीं हो रहा है।

जम्मू-कश्मीर को स्पेशल स्टेटस देने वाले संविधान के अनुच्छेद-370 (Article-370) के प्रावधानों में बदलाव करने के बाद कुछ लोगों ने विरोध प्रकट किया है। इसके बाद सरकार ने राज्य में कुछ अल्पकालिक प्रतिबन्ध लगा रखे हैं। कोर्ट ने फिलहाल इन प्रतिबंधों को हटाने से इनकार कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार रोजाना स्थिति का जायजा ले रही है और ऐसे में स्थिति सामान्य होने का इंतजार किया जाए। अगर ऐसा ही रहा तो आप बाद में बताना हम तब मामले को देखेंगे। फि‍लहाल सुनवाई 2 हफ्ते के लिए टाल दी गई है।

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल पास होने के बाद से सरकार ने ऐहतिहातन पूरे जम्मू और श्रीनगर में धारा-144 लगा रखी है और कश्मीर घाटी में भी सुरक्षा बढ़ा दी गई है। सरकार ने मोबाइल फोन कनेक्शन और इंटरनेट सेवाओं पर भी रोक लगाई हुई है।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल से पूछा कि ये कब तक चलेगा? इस पर अटॉर्नी जनरल ने जवाब देते हुए कहा कि जैसे ही स्थिति सामान्य होगी, व्यवस्था भी सामान्य हो जाएगी। अटॉर्नी जनरल ने कहा कि हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि लोगों को कम से कम असुविधा हो।