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Video वायरल: यूपी में काँवड़िए को हुई थकान, तो SP अजय कुमार ने खुद दबाए पैर

उत्तर प्रदेश के शामली जिले में शनिवार (जुलाई 27, 2019) को प्राकृतिक चिकित्सा सेवा शिविर के उद्घाटन करने पहुँचे एसपी अजय कुमार ने वहाँ एक शिवभक्त को दर्द से कराहता देख पैर दबाकर उसकी सेवा की। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। दरअसल, जब एसपी शिविर का शुभारंभ करके वहाँ से निकलने लगे तो उन्होंने शिविर के अंदर एक काँवड़िए को पैर के दर्द से कराहते देखा। उसे देख एसपी वापस मुड़े और दर्द से कराह रहे शिव भक्त के पैरों को दबाने लगे। उन्होंने पास में रखा एक स्टूल मँगाया और उस पर बैठकर काफी देर तक काँवड़िए का पैर दबाकर उसकी सेवा की और उसकी कुशलता पूछते रहे।

इस वीडियो को शामली पुलिस ने अपने ट्विटर हैंडल से शेयर किया है। वीडियो को शेयर करते हुए शामली पुलिस ने लिखा है, “सुरक्षा के साथ-साथ सेवा भी। एसपी अजय कुमार द्वारा चिकित्सा शिविर का उद्घाटन करने के बाद चिकित्सा शिविर में आए हुए भक्तों की सेवा की गई।” एसपी ने वहाँ से गुजरने वाले शिवभक्तों को अच्छी सेवा दिए जाने की बात कहते हुए कहा कि एक अच्छी पुलिस वही है, जो इंसानी मूल्यों को समझे। जब सिपाही, सब इंस्पेक्टर और इंस्पेक्टर घायलों की मदद कर सकते हैं तो वो कमजोरों को आराम क्यों नहीं पहुँचा सकते हैं।

एसपी अजय कुमार का कहना है कि एक पुलिस अफसर होने के नाते उनका कर्तव्य बनता है कि वो लोगों को अच्छी व्यवस्था उपलब्ध कराएँ। उन्होंने कहा, “मैं अपने पुलिस विभाग के सहकर्मियों से भी कहना चाहता हूँ कि सिर्फ सुरक्षा प्रदान करना हमारी जिम्मेदारी नहीं है, लोगों की सेवा करना भी हमारी जिम्मेदारी है। मेरा उद्देश्य सेवा करना है। दूरदराज से पैदल चलकर लोग हरिद्वार जल लेने जा रहे हैं। मैंने इसी सच्चे मन से काँवड़िए के पैर दबा उनकी थकान उतारने की कोशिश की है।”

काँवड़ियों पर फूल बरसाते एसपी अजय कुमार

बता दें कि इससे पहले शामली के एसपी अजय कुमार की एक फोटो भी सामने आई थी जिसमें वे हेलीकॉप्टर से काँवड़ियों पर फूल बरसाते हुए दिखाई दे रहे हैं। देश भर में काँवड़ यात्रा पूरे जोश और उत्साह के साथ चल रही है। काँवड़ियों की सुरक्षा के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस काफी अलर्ट दिख रही है।

मॉब लिंचिंग के नाम पर हिन्दू धर्म को बदनाम करने की गहरी साजिश: मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार (जुलाई 27, 2019) को वृन्दावन के वात्सल्य ग्राम में आयोजित संघ की अखिल भारतीय सामाजिक सद्भाव समिति की द्विदिवसीय बैठक की शुरुआत करते हुए कहा कि देशभर में हिन्दू धर्म एवं संस्कृति को बदनाम करने की गहरी साजिश रची जा रही है।

उन्होंने कहा कि कहीं भीड़ हिंसा के नाम पर सियासत करके समाज में घृणा फैलाने का काम किया जा रहा है, तो कहीं गाय के नाम पर। कुछ राज्यों में तो एक योजना के तहत धर्म परिवर्तन भी करवाया जा रहा है। भागवत ने कहा कि देश में आज जो हालात हैं, उन्हें देखते हुए सभी प्रचारकों को काफी सतर्क रहने की जरूरत है।

संघ प्रमुख ने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए भिन्न-भिन्न मत-पंथों और उपासना पद्धतियों के लोगों को साथ बैठकर समाज में जाति एवं वर्गों के बीच पनप रहे भेदभाव को समाप्त करने की कोशिश करने के लिए कहा। उनका कहना है कि जब ऐसा होगा तो निश्चित रूप से सामाजिक स्तर पर कई समस्याएँ हल हो जाएँगी। इस बैठक में भारतीय सामाजिक सद्भाव समिति से जुड़े उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, गुजरात, जम्मू कश्मीर, कर्नाटक, केरल, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, त्रिपुरा और मेघालय समेत सभी राज्यों के प्रतिनिधि एवं संघ से जुड़े अन्य संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

संघ के सभी प्रतिनिधियों ने अपने-अपने राज्यों की रिपोर्ट सामने रखी। संघ के सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल, दतात्रेय होसबोले और भैया जी जोशी ने भी इस मौके पर अपने विचार रखे। इस दौरान संघ के पदाधिकारियों ने कहा कि कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जिसमें माहौल बिगाड़ने के लिए एक ही वर्ग के झगड़े को मॉब लिंचिंग का नाम दे दिया गया। बाद में पुलिस जाँच से सच्चाई सामने आई। उन्होंने कहा कि ये सब हिन्दू संस्कृति को बदनाम करने के लिए किया जा रहा है।

बैठक में कहा गया कि अगर भारत में धर्म, संस्कृति व जीवन मूल्य नष्ट हो गए, तो यह विश्व में सभी जगह नष्ट हो जाएँगे। इसलिए इन्हें सुरक्षित रखने के लिए संकुचित विचारों से ऊपर उठना होगा, हिन्दू समाज को शक्तिशाली होना होगा, भेदभाव मिटाना होगा तभी एक बार फिर गौरवशाली हिन्दू समाज बन पाएगा और विश्व का कल्याण होगा।

फैक्ट-चेक: कुत्ते-गाय में नवभारत टाइम्स के पत्रकार ने लगाया हिन्दू-मुस्लिम ‘एंगल’

“कुत्ते ने गाय को काटा, मालिकों में हुआ बवाल” ऑपइंडिया जैसे राष्ट्रीय स्तर पर जाने जाने वाले पोर्टल के कवर करने लायक खबर नहीं है। और यह बात हम किसी दर्प में नहीं, अपनी पत्रकारिक जिम्मेदारी में कह रहे हैं- जिम्मेदारी उन लाखों पाठकों की जो अपना समय हमारे पोर्टल को देते हैं, हमारे साथ आर्थिक सहयोग करते हैं और हमारी खबरें अपने सोशल मीडिया अकाउंट से शेयर करते हैं।

हमने कलम देश में एक गलत लेकिन प्रचलित नैरेटिव का काउंटर-नैरेटिव बनने के लिए उठाई है। लेकिन आज हमें ऐसी ‘छोटी’ खबर इसलिए कवर करनी पड़ रही है, क्योंकि यह दिखाना ज़रूरी है कि जिस नैरेटिव को काउंटर करने के लिए हम लड़ रहे हैं, वह कितने सूक्ष्म स्तर तक पैबश्त है। कितनी गहरी उसकी जड़ें हैं और कैसे वह छोटी-से-छोटी घटना पर अपना ‘एंगल’ लगाने में नहीं हिचकिचाता।

पटना के एक मोहल्ले बाकरगंज में एक व्यक्ति के कुत्ते ने दूसरे पड़ोसी की गाय को काट लिया तो दोनों में बवाल हो गया। यह दुर्भाग्यपूर्ण लेकिन सामान्य बात है। हमारे देश में तो “तेरे पेड़ की छाया मेरे कपड़े नहीं सूखने दे रही” पर हिंसक बवाल होते हैं, लोग ₹20 के विवाद पर ₹60-70 की गोली चलाकर हत्या कर देते हैं। और इसीलिए पुलिस का भी त्वरित पहुँचना कोई ‘बड़ी खबर’ नहीं है।

बड़ी खबर है नवभारत टाइम्स जैसे बड़े समाचार पत्र, जिसकी खबरों का संदर्भ अक्सर ऑपइंडिया भी लेता है, के पत्रकार का इसे ‘मुस्लिम कुत्ते ने हिन्दू के गाय को काटा’ जैसा वाहियात एंगल देना। ट्विटर पर नवभारत टाइम्स के पत्रकार नरेंद्र नाथ मिश्रा ने यही किया। बिना किसी सबूत के उन्होंने यह अफ़वाह उड़ाई कि हिन्दू “मुस्लिम के कुत्ते” की अफ़वाह सुनकर बवाल काटने लगे और बाद में कुत्ते का मालिक हिन्दू निकलने पर शांत हो गए। जिस दैनिक भास्कर की खबर को उन्होंने अपने ट्वीट के साथ लिंक किया है, उसमें ऐसा कुछ नहीं है। विरोध होने पर भी उन्होंने न अपने एंगल के पक्ष में कोई सबूत पेश किया और न ही अपनी गलती मानी।

मिश्रा जी जैसे बड़े पत्रकारों से सत्य और तथ्य की लकीर बड़ी करने की उम्मीद की जाती है, न कि फ़ेक न्यूज़ के दौर में सिकुड़ रही लकीर को और छोटा करते जाने की। बेहतर होगा यह काम मिश्रा जी हिटलर का लिंग नापने वालों और जीजा-साली के प्रेम संबंधों से लेकर नाबालिगों की डॉक्सिंग और छह महीने की बच्ची की स्टॉकिंग का शगल रखने वालों के लिए छोड़ दें। आप ‘गंभीर’ पत्रकार हैं, पत्रकारिता में गंभीरता दिखाएँ।

SCROLL से सीखिए हिमा दास की काबिलियत पर तर्कों के साथ शक करना

जिस देश में तमाम योजनाओं और कोशिशों के बाद भी भ्रूण हत्या के आँकड़ों में गिरावट न देखने को मिल रहा हो उस देश में एक लड़की द्वारा स्कूल कॉम्पीटिशन में जीती गई एक छोटी सी रेस का क्या महत्व होता है, ये शायद पितृसत्ता में जकड़े लोग और ‘स्क्रॉल के पत्रकार’ कभी न समझ पाएँगे।

एक ओर हिमा दास की जीत पर पूरा देश फूला समा रहा है। हर लड़की खुद में और हर परिवार अपनी बेटी में हिमा दास की कल्पना कर रहा है। वहीं दूसरी ओर स्क्रॉल के ‘एक्स्ट्रीम प्रोग्रेसिव’ पत्रकार अपने लेख और हेडलाइन में तर्क इकट्ठा करके यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर क्यों हिमा की जीत पर खुश नहीं होना चाहिए और आखिर क्यों हिमा की इन जीतों का कोई मतलब नहीं है।

इस लेख की शुरुआत विनय सिवाच ने उन मौक़ों और स्थानों का जिक्र है जहाँ इस ‘उड़नपरी’ ने 19 दिन में 5 स्वर्ण पदक हासिल किए। इन जीतों को लेख लिखने वाले पत्रकार तंज का मसला समझते हैं और एक लड़की की जीत को सामान्य समझाने के लिए अपने तर्क देकर लेख गढ़ते हैं। इस लेख में सोशल मीडिया पर वायरल हुई हिमा दास के वीडियो का हवाला दिया जाता है और नेटिजन्स के साथ वरिष्ठ पत्रकारों के बौद्धिक स्तर पर सवाल उठाया गया है।

और ये सब सिर्फ़ इसलिए ताकि एक लड़की की जीत पर होते जश्न को काबू किया जा सके। क्योंकि, उसने लेख लिखने वाले वाले पत्रकार के हिसाब से अभी कोई बड़ी जीत नहीं दर्ज की है। इस लेख को पढ़कर साफ़ पता चलता है कि लेखक को इस बात से बहुत दिक्कत है कि सोशल मीडिया पर हिमा दास को आखिर क्यों इतना सराहा जा रहा है? आखिर क्यों उसकी जीत का पूरा देश जश्न मना रहा है? आखिर क्यों हर घर में बच्ची के हिमा बनने का सपना देखा जाने लगा है? जबकि वे तो अभी ओलंपिक में दौड़ी तक नहीं है।

सोचिए! एक ओर जहाँ देश की ‘गोल्डन गर्ल’ को हर तरफ से बधाई मिल रही है, वहीं लेख लिखने वाले सिवाच इस बात का फैक्ट चेक करने में जुटे हैं कि जो वीडियो हिमा की वायरल हो रही है, जिस पर लोग वाह-वाह करते नहीं थक रहे, वो इस साल की नहीं बल्कि पिछले साल की है।

मुझे समझ नहीं आता आखिर कैसे कोई गर्व के इन पलों में इतना ‘बुद्धिजीवी’ होने की कोशिश कर सकता है कि उसे समझ ही न आए, इसका लोगों में क्या संदेश जा रहा है। उस देश में जहाँ लड़की को तेज चलने पर धीरे कदम रखने की सलाह दी जाती है और आगे बढ़ने पर पीछे कर दिया जाता है, वहाँ हिमा की गति और उनके प्रदर्शन को कमतर आँकने का औचित्य क्या है?

हिमा ने एशियन ऐथलेटिक्स चैंपियनशिप के दौरान लगी चोट के बावजूद 19 दिन के भीतर अलग-अलग स्पर्धाओं में पाँच गोल्ड मेडल जीते हैं। इसमें उनकी पसंदीदा 400 मीटर दौड़ भी शामिल है। उनकी इन जीतों को देखते हुए हर भारतीय उनसे ओलंपिक्स में भी मेडल की उम्मीद लगाए बैठा है। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति कोविंद से लेकर बॉलीवुड सितारे भी हिमा को बधाई दे रहे हैं, लेकिन पत्रकार महोदय से ये औपचारिकता भी नहीं निभाई जा रही।

विनय आगे अपने लेख में अपनी बौद्धिकता का प्रमाण देने के लिए एक टॉप जर्नलिस्ट का जिक्र सिर्फ़ इसलिए करते हैं, क्योंकि उन्होंने हिमा की ‘पुरानी वीडियो’ को शेयर किया और उसके नीचे “goosebumps and tears” लिख दिया। बस इतनी सी बात के लिए पत्रकार महोदय भावों को दरकिनार करते हुए वरिष्ठ पत्रकार की समसामायिक मुद्दों को लेकर समझ पर सवाल उठा देते हैं। और बताते हैं कि इससे पता चलता है हम ट्रेंडिग विषयों को लेकर तो सचेत हैं लेकिन खिलाड़ियों और उनकी उपलब्धियों को लेकर नहीं।

लेख को ध्यान से पढ़ें तो मालूम चलेगा कि इन महोदय को उन लोगों से भी दिक्कत है जो इस बात की सच्चाई जानते हैं कि सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा वायरल वीडियो पुराना है लेकिन फिर भी वे उसे अपनी वॉल से नहीं हटा रहे।

घोर निराशाओं से घिरे विनय सिवाच अपने पाठकों को लेख में समझाते है कि कैसे 200 मीटर की रेस को 23. 25 सेकेंड में पूरी करने वाली हिमा अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन के बाद भी विश्व के टॉप 100 में अपनी जगह नहीं बना पाईं है और कैसे उनके आगे चुनौतियों का पहाड़ है, जो उनकी जीत पर संदेह खड़े करता है। उनकी मानें तो चाहे हिमा ने कितनी ही कोशिश क्यों न की हो लेकिन जब वैश्विक स्तर पर उन्हें पहचान ही नहीं मिली, तो क्या फायदा ऐसी जीत का और क्या फायदा उन इवेंट्स का जिन्हें वैश्विक स्तर पर मान्यता ही नहीं है।

विनय की ये बात सच है हिमा दास ने जिन प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया, वे वर्ल्ड चैंपियनशिप के रैंकिंग पॉइंट्स सिस्टम में काफी नीचे आती हैं। लेकिन उनकी महता और मान्यता को खारिज कर देना बिलकुल ऐसा है जैसे इंटरनेशनल क्रिकेट से पहले रणजी ट्रॉफी खेलने वाले ख़िलाड़ी के प्रयासों को नजरअंदाज करना। हिमा ने जिन प्रतियोगिताओं में जीत हासिल की उस सिस्टम को इसी साल इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ ऐथलेटिक्स फेडरेशन (IAAF) ने शुरू किया है। जिसमें हिमा ने ई और एफ कैटिगरी के इवेंट में हिस्सा लिया। हिमा का 400 मीटर की दौड़ में आईएएएफ रैंकिंग में स्कोर 1121 का है, जिसमें हाल का स्कोर शामिल नहीं है। लेकिन सिर्फ़ इन कारणों से उनकी उपलब्धि और उस पर मनाए जाने वाले जश्न पर सवाल खड़े कर देना कहाँ तक उचित है? ये एक बड़ा सवाल है।

हमें याद रखना चाहिए कि हमारे देश की क्रिकेट टीम को अपने संघर्षों के समय में सचिन जैसा ख़िलाड़ी मिलना, कहीं न कहीं से हुई एक शुरुआत का नतीजा था। अगर ये शुरुआत ऐथलेटिक्स में हिमा कर रही हैं, तो आखिर उन्हें सराहे जाने में परेशानी क्या है? क्यों न जश्न मनाया जाए उनकी जीत का?

हाँ, ये बात और है कि पत्रकार महोदय यही सोचकर बैठे हों कि हिमा की उपलब्धि तभी मान्य होगी जब वो ओलंपिक में उसेन बोल्ट के साथ रेस लगाएँगी, तो उनके विचारों पर टिप्पणी करना बेकार है।

लेख में हिमा के स्तर को बताना, जीत पर संदेह जताना, पाठकों को अपने तर्कों से दुविधा में जाने के लिए बाधित करना पत्रकार की मानसिकता और उनकी विचारधारा का प्रमाण है। जो लोग आज हिमा की जीत पर खुश हैं वो जाने-अनजाने ही सही लेकिन अपने बीते कल से आगे बढ़ रहे हैं, जहाँ लोगों के लिए लड़कियाँ सिर्फ़ चार दिवारी में रखने वाली वस्तु और बच्चे पैदा करने वाली मशीन थी, वो आज विदेश जाने वाली खिलाड़ी भी हैं। लेकिन अफसोस! विनय जैसे लोग पत्रकार का तमगा पाने के बाद भी पीछे जाते जा रहे हैं जो निस्संदेह समाज के लिए ज्यादा खतरनाक है।

विनय की गणित के मुताबिक भले ही इतनी जीतों के बावजूद भी हिमा योग्य नहीं हैं, लेकिन हमें फिर भी उम्मीद है कि टोक्यो ओलंपिक में मेडल आएगा। इसका ये मतलब नहीं है कि हम उनके 5 मेडल की चमक में अंधे होकर उनसे आस लगा रहे हैं, बल्कि इसका ये अर्थ है कि हमने अपना विश्वास उन पर सौंपा है, जो निस्वार्थ है। वो ओलंपिक में इसी तरह तिरंगा फहराएँगी या फिर बहुत सारे अनुभव लेकर आएँगी। ये उन पर निर्भर है। लेकिन, फिलहाल हम उन्हें आँकने से ज्यादा उन्हें शुभकामनाएँ भेजेंगे। क्योंकि आपसे या हमसे ज्यादा उन्हें मालूम है कि उनका स्तर क्या है और उन्हें अपने आगे आने वाली चुनौतियों के लिए खुद को कैसे तैयार करना है। जब हिमा यहाँ तक पहुँची हैं तो आगे भी जाएँगी।

विनय जैसे लोगों के लिए हिमा की तारीफ़ आज कर पाना मुश्किल काम है, क्योंकि उन्होंने महसूस ही नहीं किया कि जब हिमा दौड़ रही होंगी, तो उनके भीतर और उनके परिवार के भीतर क्या चल रहा होगा। क्या चल रहा होगा हिमा की माँ के भीतर जिन्होंने उस लड़की की मेहनत और लगन को न सिर्फ़ देखा बल्कि जिया भी। विनय जैसे लोगों के लिए मुमकिन है पहली उपलब्धि और स्कूल-कॉलेज में मिलने वाले पहले मेडल का कोई मोल न हो, लेकिन हिमा जैसी लड़कियों के लिए इनसे जुड़ी भावनाओं का और सरहानाओं का मोल होता है। बुद्धिजीवियों के लिए व्यवहारिक होकर तर्क देना आसान है कि वर्तमान प्रदर्शन के आधार पर आगे जीत पाना बड़ा मुश्किल काम है, लेकिन हिमा और उनसे जुड़े लोगों की भावनाओं के लिए ऐसा सोचना भी विकल्प की कैटेगरी भी नहीं आता…उन्हें सिर्फ़ आगे बढ़ने के लिए लगातार खुद में संभावनाएँ तलाशनी होती हैं कि आखिर वो अगला लक्ष्य क्या तय करें।

ये बात बिलकुल ठीक बात है कि हमें भविष्य के बारे में कल्पना करते रहना चाहिए ताकि आने वाली चुनौतियों के बारे हमें पता रहे और हम उसके लिए खुद को तैयार कर सकें। लेकिन किसी की जीत को इस तरह नकार देना लेख लिखने वाले की डरी हुई और नकारात्मक सोच के ठोस उदाहरण से अधिक कुछ भी नहीं हैं। मेरे लिए और मेरे जैसे अनेकों के लिए हिमा की जीत गौरव की बात है। और वो इसलिए, क्योंकि हिमा अव्वल एक लड़की हैं और साथ ही वे देश के उस नॉर्थ ईस्ट इलाके से आती हैं जिसे भूले-बिसरे भी मीडिया अपने ब्रैकेट में जगह नहीं देता।

नंगे पाँव से एडिडास का ब्रॉंड एम्बेस्डर बनना पत्रकारों के लिए छोटी बात हो सकती है, हमारे लिए नहीं। हिमा हमारे लिए संघर्ष का चेहरा हैं। हिम्मत का उदाहरण हैं। हमारी प्रेरणा हैं। हिमा हमारा भविष्य हैं। हम उनसे उम्मीद करेंगे और तब तक उम्मीद करेंगे जब तक वो विनय जैसे बुद्धिजीवी को चुप रहने की वजह नहीं दे दें। जब तक हिमा और उनसे प्रेरित होकर कई लड़कियाँ इतिहास रचकर ये न साबित कर दें कि वैश्विक स्तर की मान्यता न मिलने के भी बाद एक लड़की द्वारा विदेश में झंडा फहराने का क्या पर्याय है? और एक लड़की के लिए ट्रैक पर रेस के साथ जीवन में ‘दौड़’ कितना मायने रखता है।

वैसे, यह सब जानने-समझने के लिए विनय को दूसरे के घर में तॉंक-झॉंक करने की भी जरूरत नहीं है। जिस स्क्रॉल पर उनका लेख हुआ प्रकाशित हुआ है उसी गोत्र-मूल का हिन्दी पोर्टल सत्याग्रह नाम से है। सत्याग्रह हमें बताता है कि हिमा की जीत खास क्यों है।

प्रोपगेंडा स्क्रॉल और सत्याग्रह की पहचान है। लेकिन, पीत पत्रकारिता का यह कैसा नमूना है, यह कैसी संपादकीय नीति है जो हिन्दी के पाठक को कहती है जीत का जश्न मनाओ और अंग्रेजी के पाठकों से कहती है जश्न मनाने वाले मूर्ख हैं। आखिर इन प्रोपगेंडा वेबसाइट के कथित पत्रकार सोचते कहॉं से हैं। यकीनन, दिमाग से नहीं!

चलिए, अब विनय को अपने घर की गुत्थी सुलझाने के लिए छोड़ देते हैं और हम सब डूब जाते हैं खुशी के उन पलों में जो हमें हिमा दास ने दिए हैं।

जम्मू-कश्मीर: टेरर फंडिंग पर मोदी सरकार का प्रहार, बारामूला में 4 ठिकानों पर NIA की छापेमारी

टेरर फंडिंग मामले में रविवार (28 जुलाई 2019) को सुबह राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने जम्मू-कश्मीर के चार ठिकानों पर छापेमारी की। सीआरपीएफ और स्थानीय पुलिस की के साथ NIA ने इस छापेमारी को अंजाम दिया। जानकारी के अनुसार, NIA की टीम ने उत्तरी कश्मीर के बारामूला ज़िले में चार व्यापारियों के घर छापा मारा। इनमें अलगाववादी नेता सज्जाद लोन के क़रीबी व्यापारी आसिफ़ लोन, तनवीर अहमद, तारिक अहमद और बिलाल भट शामिल हैं। फ़िलहाल, सभी दस्तावेज़ों का जाँच की जा रही है।

हवाला नेटवर्क और पाकिस्तान से टेरर फंडिंग की साज़िश में संलिप्त होने के शक़ में NIA पिछले कुछ दिनों से लगातार अलग-अलग ठिकानों पर छापेमारी कर रही है। इससे पहले, NIA ने 23 जुलाई को दक्षिण कश्मीर के पुलवामा ज़िले में स्थित केलर इलाक़े में बिजनेसमैन गुलाम वानी के घर पर छापेमारी की थी। NIA के सूत्रों ने कहा, “एक अन्य छापेमारी श्रीनगर में परिमपोरा फल मंडी में की गई।” NIA कश्मीर के नामी उद्योगपति जहूर वटाली और कई अन्य अलगाववादी नेताओं को पहले ही गिरफ़्तार कर चुकी है।

ख़बर के अनुसार, NIA ने जमात-उद-दावा, दुखतारन-ए-मिल्लत, लश्कर-ए-तैयबा, हिज़्बुल मुजाहिदीन और जम्मू-कश्मीर के दूसरे अलगाववादी समूहों के ख़िलाफ़ फंड जुटाने को लेकर 20 मई 2017 को एक मामला दर्ज किया था। इसमें अलगाववादी नेता, हवाला कारोबारी और पत्थरबाज़ भी शामिल हैं।

NIA ने पिछले महीने कहा था कि कश्मीर घाटी में अलगाववादी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए  पाकिस्तान से टेरर फंडिंग होती रही है। NIA ने यह बात हुर्रियत कॉन्फ्रेन्स और अन्य अलगाववादी नेताओं से पूछताछ के बाद किया था। NIA के अनुसार, मुस्लीम लीग नेता मसर्रत आलम ने अधिकारियों को बताया था कि पाकिस्तान समर्थित एजेंट ने विदेश से पैसों का बंदोबस्त किया था और फिर हवाला ऑपरेटर्स के माध्यम से जम्मू-कश्मीर भेज दिया।

सागरिका हम समझते हैं, कुंठा छिपाने और अपनी किताब बेचने का यह तरीका पुराना है

अगर टीवी देखने वाले आम भारतीय लोगों से पूछा जाए कि “अंधे का पुत्र अँधा” किसने कहा था? तो पूरी संभावना है कि कई लोग बता बैठेंगे कि ये द्रौपदी ने कहा था। हो सकता है कुछ लोग आगे बढ़कर ये भी बताएं कि इन्द्रप्रस्थ नाम की पांडवों की नई राजधानी देखने जब दुर्योधन पहुँचे तो मय राक्षस द्वारा बनाए गए उनके महल को देखकर आश्चर्यचकित हुए। ये महल कुछ ऐसा था जहाँ सूखी जमीन पर पानी का वहम होता था और पानी से भरे स्थान सूखे लगते थे। बच-बचाकर चलने के प्रयास में बेचारा दुर्योधन गिर पड़ा और उसे देखकर द्रौपदी ने हँसकर कहा था, अंधे का पुत्र अँधा!

वो आगे बढ़कर ये भी बता सकते हैं कि ये “अंधे का पुत्र अँधा” कहकर दुर्योधन का मजाक उड़ाना ही दुर्योधन के क्रोध का कारण था। शायद वो ये भी कहें कि इसी एक वाक्य से महाभारत के युद्ध की नींव पड़ी थी! भारत में ऐसे कम पढ़े लिखे, सफ़ेद बालों वाले बच्चों की कोई कमी नहीं। द्रौपदी के एक वाक्य को महाभारत के युद्ध का कारण बताते समय वो अंगूठा चूसने वाले भूल जाते हैं कि इस इन्द्रप्रस्थ के बनने से काफी पहले ही दुर्योधन भीम को जहर देकर मारने का प्रयास कर चुका था। इसके अलावा वो लाक्षागृह बनवाकर उसमें सभी पांडवों को कुंती सहित जलाकर मारने का प्रयास भी कर चुका था।

जब ये सारे कुकर्म वो पहले ही कर चुका था, तब एक वाक्य पर उसके क्रुद्ध होने की क्या वजह हो सकती है? इर्ष्या-द्वेष की वजह से तो वो पहले से ही पांडवों को मार डालने का प्रयास करता आ रहा था! अब सवाल है कि क्या द्रौपदी ने सचमुच ऐसा कहा भी था? इसका जवाब है नहीं। ऋषि व्यास ने जिस महाभारत की रचना की थी उसके मुताबिक दुर्योधन जब इन्द्रप्रस्थ आया तो भीम उसे लेने पहुँचे थे और द्रौपदी उस समय अन्तःपुर में दूसरी तैयारियों में व्यस्त थी। भीम के साथ महल में आए दुर्योधन से द्रौपदी की भेंट भी नहीं हुई होगी। महाभारत के मुताबिक ऐसा कुछ नहीं हुआ था।

फिर ये हुआ कैसे? काफी पहले “धर्मयुग” नाम की एक पत्रिका आती थी, जिसके संपादक ने “अँधा-युग” नाम से एक धारावाहिक नाटक उसी पत्रिका में लिखा। ये महाभारत पर आधारित नाटक था जो अलग किताब के रूप में भी प्रकाशित हुआ। इसके लेखक महोदय के बारे में माना जाता है कि वो अपनी पत्नी को पीटते थे। इसी नाटक का एक डायलॉग था “अंधे का पुत्र अँधा”। संभवतः पत्नी से द्वेष के कारण उन्होंने सभी स्त्रियों के प्रति दुर्भावना पाल रखी थी। अंग्रेजी में ऐसे व्यवहार को “मिसोगायनी” भी कहते हैं। इसलिए अपने नाटक में उन्होंने युद्ध का इल्ज़ाम एक स्त्री पर डाल देने की कोशिश की। यही नाटक का डायलॉग बाद में टीवी श्रृंखला में भी इस्तेमाल किया गया था।

अपनी निजी कुंठा को इस तरह पूरे समाज पर थोपने का प्रयास कोई इकलौता नहीं है। ऐसी कोशिशें बार बार की जाती रही हैं। हाल में ही इसका एक उदाहरण ट्विटर पर चलने वाली मुडभेड़ में दिखाई दे गया। पिता, चाचा, बुआ इत्यादि के नाम पर अपनी किराए की कलम चलाती एक तथाकथित लेखिका सागरिका घोष ने युद्धों पर कुछ लिखने का प्रयास किया। भारत में सैनिक को ज्यादा सम्मान मिलना आम बात है। जहाँ घर के कई लोग (पति सहित) पत्रकारिता के व्यवसाय से जुड़े हों, वहां शायद उन्हें लगा होगा कि उन्हें इतना अमीर होने के बाद भी कम और सेना के मध्यमवर्गीय आय के व्यक्ति को ज्यादा सम्मान क्यों मिलता है?

अपनी निजी कुंठा में उन्होंने घोषणा शुरू कि युद्धों में मरने वाले सभी गरीबों के बच्चे होते हैं और अमीरों के बच्चे तो एसी कमरों में (उनकी ही तरह) बैठे रहते हैं। इस पर एक सैन्य अधिकारी ने ही उन्हें जवाब दे दिया और बताया कि सेना में ऐसा नहीं होता। जनरल अक्सर सिपाही के साथ ही खड़ा होता है और कोई गरीब होने की वजह से नहीं, देशप्रेम के कारण सेना में भर्ती होता है। अपने तर्क को काटा जाता देख तथाकथित लेखिका बिलकुल वैसे ही बिलबिलाई जैसे पूँछ पर पैर रख दिए जाने पर कोई कुत्ता! किस्म-किस्म के आरोप उन्होंने सैन्य अधिकारी पर मढ़ने शुरू ही किए कि कई दूसरे सैन्य अधिकारियों ने उन्हें अपनी भाषा सुधारने को कहना शुरू कर दिया। मगर अहंकारी तथाकथित लेखिका क्यों मानती?

वो युद्धों के बारे में अपनी जानकारी को थल सेना के एक अधिकारी से ज्यादा सिद्ध करने की मूर्खतापूर्ण कोशिश में लगी रही। ये अलग बात है कि युद्धों का उनका कुल अनुभव शून्य ही होगा। हाँ, उनके पति महोदय का न्यूयॉर्क में कुछ नागरिकों से हाथापाई का अनुभव जरूर है। जहाँ तक मुझे याद आता है, उस मामले में भी राजदीप पिटकर ही लौटे थे। तथाकथित लेखिका को समझना चाहिए कि ज्ञान या सम्मान दोनों अर्जित किए जाने की चीज़ें हैं, ये अपने-आप किसी परिवार में जन्म लेने से पैतृक संपत्ति की तरह नहीं मिलती। उन्हें कम सम्मान क्यों और सैन्य अधिकारियों को ज्यादा क्यों, ये भी कोई कुंठित होने का विषय नहीं होता।

बाकी अपनी कुंठा छुपाने के लिए या प्रकाशित होने से पहले ही अपनी किताब को विवादित बनाने के लिए ऐसी बहसें आम बात हैं और लोग अब इसे आसानी से पहचानने भी लगे हैं। कहीं ऐसा न हो कि बायकॉट जैसा कोई गांधीवादी तरीका फिर चले, और लेने के देने पड़ जाएँ!

हिन्दू बनकर नेशनल शूटर तारा शाहदेव से शादी करने वाले रकीबुल हसन समेत 5 पर आरोप तय

नेशनल शूटर तारा शाहदेव से खुद को हिन्दू बता कर धोखे से शादी करने वाले रकीबुल हसन उर्फ रंजीत सिंह कोहली और उसके 4 साथियों पर शुक्रवार (जुलाई 26, 2019) को सीबीआई के विशेष न्यायिक दंडाधिकारी अजय कुमार गुड़िया की अदालत में आरोप तय किए गए। तारा ने आरोप लगाया था कि रकीबुल ने खुद को रंजीत बताकर उससे शादी की। शादी के बाद उसके साथ मारपीट होती थी और धर्म परिवर्तन करने का दबाव बनाया जाता था। बीते साल दोनों का तलाक हुआ था।

रकीबुल के उसकी माँ कौशल रानी, पूर्व जज पंकज श्रीवास्तव, गया सिविल कोर्ट के तत्कालीन न्यायिक दंडाधिकारी राजेश प्रसाद और रोहित रमन (रकीबुल का दोस्त) पर आरोप तय किए गए हैं। पाँचों आरोपित अदालत में उपस्थित थे। न्यायाधीश ने आरोपितों को उनके खिलाफ लगे आरोपों को पढ़कर सुनाया। आरोपितों के खिलाफ अदालत ने आईपीसी की धारा 120 बी और 212 के तहत आरोप तय किए हैं। हालाँकि, आरोपितों ने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया। जिसके बाद अदालत ने मामले में गवाही शुरू करने के लिए 23 अगस्त की तारीख निर्धारित की।

इस मामले में एक अन्य आरोपी सिपाही अजय कुमार अदालत में उपस्थित नहीं हुआ। अजय कुमार की ओर से अदालत में आवेदन दिया गया था कि उसने हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन दायर किया है। इस पर कभी भी सुनवाई हो सकती है, इसलिए उसे समय दिया जाए। मगर, अदालत ने अजय कुमार को समय नहीं दिया और उसकी फाइल अलग करने का निर्देश दिया।

गौरतलब है कि, तारा शाहदेव ने 2014 में रंजीत कोहली (रकीबुल हसन) से शादी की थी। पुलिस को दिए बयान के अनुसार शादी के कुछ दिन बाद से ही उस पर अत्याचार होने लगे। तारा को कुछ दिन बाद पता चला कि उसके पति का नाम रंजीत सिंह नहीं है। तारा का आरोप है कि उसके साथ मारपीट होती थी और धर्म परिवर्तन करने का दबाव बनाया जाता था।

तारा शाहदेव ने साल 2014 में रकीबुल के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। साल 2015 में केस सीबीआई को सौंप दिया गया। 27 जून, 2018 को फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज बीके गौतम ने सहदेव की तलाक की अपील को मंजूरी दे दी। बीके गौतम ने सहदेव को इस आधार पर तलाक की मंजूरी दी कि उन्हें शादी के लिए झूठी जानकारी और उसके बाद घरेलू और शारीरिक हिंसा का शिकार होना पड़ा।

SC की शरण में भगोड़ा विजय माल्या, संपत्ति जब्त करने पर रोक की लगाई गुहार

जैसे-जैसे शिकंजा कसता जा रहा है भगोड़े कारोबारी विजय माल्या की नींद उड़ती जा रही है। बैंकों का 9 हजार करोड़ रुपया लेकर देश से भागे माल्या ने अब सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई है। उसने शीर्ष अदालत से अपनी और रिश्तेदारों की संपत्ति कुर्क करने की प्रक्रिया पर रोक लगाने की अपील की है।

अपनी याचिका में उसने कहा है कि केवल किंगफिशर कंपनी से संबंधित संपत्ति ही कुर्क की जाए और उसकी निजी और पारिवारिक संपत्ति जब्त न की जाए। याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सोमवार (जुलाई 29, 2019) को सुनवाई करेगा।

माल्या की इस अपील को बॉम्बे हाई कोर्ट ने 11 जुलाई को ख़ारिज कर दिया था।

इस समय ब्रिटेन में प्रत्यर्पण की कार्यवाही का सामना कर रहे माल्या को 5 जनवरी, 2019 को विशेष पीएमएलए अदालत ने भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित किया था। इसके बाद उसकी संपत्तियों को कुर्क करने की कार्रवाई शुरू की गई थी। खुद को आर्थिक भगोड़ा अपराधी घोषित करने के फैसले को माल्या ने चुनौती दे रखी है। उसका कहना है कि जब तक हाई कोर्ट में इस मामले की सुनवाई पूरी नहीं होती, एजेंसियाँ उसकी निजी संपत्तियों को कुर्क न करें।

63 साल के विजय माल्या ने भारतीय बैंकों से 9,000 करोड़ रुपए का लोन लिया था और उसे चुका नहीं पाने के कारण 2 मार्च, 2016 को देश छोड़ दिया था। भारत ने 2017 में प्रत्यर्पण की मांग की थी और फिलहाल वह जमानत पर बाहर है। ब्रिटेन के हाई कोर्ट में प्रत्यर्पण आदेश के खिलाफ उसकी अर्जी पर अगले साल 11 फरवरी से सुनवाई होगी।

आजम खान के बोल अभद्र और असभ्य, ऐसा सबक सिखाएँ कि याद रहे: जावेद अख्तर

लोकसभा में भाजपा सांसद रमा देवी पर की गई टिप्पणी को लेकर आजम खान चौतरफा घिरते जा रहे हैं। गीतकार और पूर्व सांसद जावेद अख्तर ने आजम खान के बयान को अभद्र और असभ्य बताया है।

जावेद अख्तर ने ट्वीट कर कहा है, “मेरा मानना है कि स्पीकर की कुर्सी पर बैठीं सांसद के लिए आजम खान के शब्द पूरी तरह से अस्वीकार्य हैं। यह अभद्र और असभ्य था। सदन के स्पीकर की जिम्मेदारी है कि वह उन्हें (आजम खान) ऐसा सबक सिखाएँ जिसे वह भूल न सकें।”

रामपुर से सपा सांसद आजम खान ने लोकसभा में तीन तलाक बिल पर चर्चा के दौरान कहा था, “आप मुझे इतनी अच्छी लगती हैं कि मेरा मन करता है कि आपकी आँखों में आँखें डाले रहूॅं।” इस टिप्पणी ने उस वक्त सदन की अध्यक्षता कर रहीं रमा देवी को असहज कर दिया था।

इस टिप्पणी को लेकर शुक्रवार (जुलाई 26, 2019) को स्पीकर ओम बिड़ला ने विपक्ष के नेताओं के साथ बैठक की थी। बैठक में तय किया गया कि अपनी टिप्पणी के लिए आजम खान सदन में माफी माँगे। यदि वे ऐसा नहीं करते तो उनके खिलाफ कार्रवाई होगी।

UAPA कानून में बदलाव: आखिर व्यक्ति विशेष को आतंकवादी क्यों घोषित करना चाहते हैं अमित शाह?

मोदी सरकार लगातार यह दोहराती रही है कि आतंकवाद को लेकर उसकी नीति जीरो टॉलरेंस की है। इसी कड़ी में सरकार गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) संशोधन विधेयक 2019 लेकर आई है। आम बोलचाल में इसे UAPA बिल भी कहते हैं।

लोकसभा से 24 जुलाई को पारित यह बिल व्यक्ति विशेष को भी आतंकवादी घोषित करने और उसकी संपत्ति जब्त करने का अधिकार देता है। सरकार का दावा है UAPA कानून में यह संशोधन सुरक्षा एजेंसियों को आतंकवादियों से चार कदम आगे रखेगा।

संशोधन की खास बातें

  • आतंकी गतिविधियों में संलिप्त होने की आशंका पर व्यक्ति विशेष को आतंकवादी घोषित किया जा सकेगा।
  • जो आतंकियों को आर्थिक और वैचारिक मदद देते हैं या आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले विचारों का प्रचार-प्रसार करते हैं, उन्हें आतंकवादी घोषित किया जा सकेगा।
  • राष्ट्रीय जॉंच एजेंसी (एनआईए) के इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी भी आतंकवाद के मामलों की जॉंच कर सकेंगे।
  • एनआईए महानिदेशक को ऐसी संपत्तियों को जब्त करने और उनकी कुर्की का अधिकार होगा जिनका आतंकी गतिविधि में इस्तेमाल हुआ हो।

बदलाव क्यों?

बिल पर चर्चा के दौरान लोकसभा में केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह और गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने इस कानून में संशोधन की जरूरत को बिंदुवार स्पष्ट किया। इसके मुताबिक;

  • UAPA या किसी अन्य कानून में व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने का प्रावधान नहीं है। ऐसे में जब किसी आतंकवादी संगठन पर प्रतिबंध लगाया जाता है तो उसके सदस्य नया संगठन बना लेते हैं।
  • आतंकी गतिविधियों, उसके लिए धन मुहैया कराने वालों या उसका प्रचार-प्रसार करने वाले व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करना जरूरी है।
  • आतंकवाद व्यक्ति की मंशा से जुड़ा मसला है न कि संगठन का। इसलिए ऐसी गतिविधियों में संलिप्त लोगों को आतंकवादी घोषित करने के प्रावधान की बेहद जरूरत महसूस की जा रही है।
  • मौजूदा UAPA कानून की धारा 25 के अनुसार आतंकी गतिविधियों से जुड़ी संपत्ति जब्त करने का अधिकार केवल सम्बन्धित राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को है।
  • कई बार आतंकी विभिन्न राज्यों में अपनी संपत्ति रखते हैं। ऐसे मामलों में अलग-अलग राज्यों के डीजीपी की मंजूरी लेना बहुत मुश्किल हो जाता है। देरी के कारण आतंकियों के लिए अपनी संपत्ति दूसरों के नाम ट्रांसफर करना आसान हो जाता है।
  • मौजूदा UAPA कानून की धारा 43 के सेक्शन IV और VI के अनुसार डीएसपी या समकक्ष पद से नीचे के अधिकारी जॉंच नहीं कर सकते। एनआईए में डीएसपी की कमी है, जबकि उसके इंस्पेक्टर भी इस तरह के मामलों की जॉंच में पारंगत हैं।

संशोधन से क्यों सहमा विपक्ष?

लोकसभा में बिल के विरोध में केवल 8 वोट ही पड़े। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि विपक्ष इस कानून में संशोधन के पक्ष में है। बिल पर वोटिंग के दौरान कॉन्ग्रेस सहित कई विपक्षी पार्टियों ने सदन का बहिष्कार किया था। विपक्ष इस बिल को जन विरोधी और संविधान विरोधी बता रहा है। यहां तक कि विपक्ष ने सत्ताधारी दल पर बहुमत के नाम पर विपक्ष की आवाज दबाने का आरोप भी लगाया।

विपक्ष का कहना है कि अब सिर्फ़ संदेह के आधार पर ही किसी को आतंकवादी घोषित कर ऐसे व्यक्तियों की संपत्ति जब्त की जा सकेगी। विपक्ष और आलोचकों का यह भी कहना है कि इसका इस्तेमाल विरोधियों को फँसाने के लिए किए जाने का खतरा है। विपक्ष को डर है कि इससे एनआईए की मनमानी बढ़ेगी और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा।

शंका का समाधान

विपक्ष के संदेहों को दूर करने की कोशिश करते हुए अमित शाह ने कहा कि सरकार इस विचार से कतई सहमत नहीं है कि आतंकवाद पर काबू आतंकियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की बजाए उनसे बातचीत कर पाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि संशोधनों का मकसद तेजी से जॉंच है। उनके अनुसार;

  • संशोधन में कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए बहुत सारी सावधानियॉं रखी गई हैं।
  • यह संशोधन व्यक्तियों को आतंकवादी घोषित करने की इजाजत तभी देता है जब कानूनन पर्याप्त साक्ष्य हो।
  • गिरफ्तारी या जमानत प्रावधानों में कोई बदलाव नहीं किया जा रहा है, इसलिए यह स्पष्ट है कि किसी भी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं होगा।
  • विभिन्न स्तरों पर एनआईए में केस का रिव्यू होता है, इसलिए इंस्पेक्टर स्तर पर जॉंच से किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होगी।

कॉन्ग्रेस राज में बना कानून, तीन बार संशोधन भी

UAPA कोई नया कानून नहीं है। आज भले कॉन्ग्रेस इस कानून में संशोधन का विरोध कर रही हो, लेकिन 1967 में इंदिरा गाँधी की सरकार ही इस बिल को पहली बार लेकर आई थी। कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के कार्यकाल में तीन मौकों पर 2004, 2008 और 2011 में भी इस कानून में संशोधन किया गया था।

ऐसे समझे नुकसान

कानून में व्यक्ति को आतंकी घोषित करने का प्रावधान नहीं होने के कारण हो रहे नुकसान को आप इस तरह समझ सकते हैं। यासीन भटकल इंडियन मुजाहिद्दीन से जुड़ा था। इंडियन मुजाहिद्दीन आतंकवादी संगठन घोषित है। लेकिन, भटकल आतंकवादी घोषित नहीं किया जा सका। इसका फायदा उठा उसने 12 आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया।

व्यक्ति को आतंकी घोषित करने की प्रक्रिया

केन्द्रीय गृह मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार किसी व्यक्ति को आतंकवादी तभी घोषित किया जा सकेगा जब गृह मंत्रालय ऐसा करने की सहमति देगा। आतंकी घोषित व्यक्ति केन्द्रीय गृह सचिव के समक्ष अपील कर सकेगा। वे इस पर 45 दिनों के भीतर फैसला करेंगे। मौजूदा या सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समीक्षा समिति का गठन होगा। इसमें भारत सरकार के कम से कम दो सेवानिवृत्त सचिव होंगे। कोई व्यक्ति खुद को आतंकवादी घोषित करने के खिलाफ यहॉं भी सीधे अपील कर सकेगा।

हाफिज सईद, मसूद अजहर पर कसेगा शिकंजा

प्रस्तावित संशोधनों के लागू होने के बाद सबसे पहला शिकंजा हाफिज सईद और मसूद अजहर पर कसने की तैयारी है। हाफिज सईद साल 2008 के मुंबई आतंकी हमले का मास्टरमाइंड है, जबकि मसूद अजहर साल 2001 में संसद पर हमले में मोस्ट वॉन्टेड है।