Home Blog Page 5793

10 साल की बच्ची को बनाया हवस का शिकार, 55 वर्षीय कलाम अंसारी गिरफ़्तार

नाबालिग बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं। ऐसा ही एक शर्मनाक मामला बिहार में शिवहर क्षेत्र का है जहाँ 10 साल की हिन्दू बच्ची का बलात्कार 55 साल के कलाम अंसारी ने किया। उसे लोगों ने रंगे हाथों पकड़ा और पुलिस के हवाले कर दिया।

यह मामला हिरम्मा थाना क्षेत्र में दर्ज किया गया है। इसकी पुष्टि करते हुए, एसडीपीओ राकेश कुमार ने बताया कि आरोपी का नाम कलाम अंसारी है, जो मस्जिद टोला का निवासी है, उसे पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया है और नाबालिग बच्ची को मेडिकल के लिए भेज दिया गया है।

शिवहर के निवासी अनीस झा ने बताया कि उन्होंने शिवहर के वकीलों से अपील की है कि वो कलाम अंसारी का केस न लड़ें। साथ ही बलात्कारी अंसारी के ख़िलाफ़ कठोर कार्रवाई की माँग भी की।

इस घटना से नाराज़ ग्रामीणों ने अंसारी को कड़ी से कड़ी सज़ा देने की माँग की है। शिवहर क्षेत्र की सांसद रमा देवी, पूर्व सांसद लवली आनंद, पूर्व विधायक ठाकुर रत्नाकर, जेडीयू नेता विजय विकास, फॉरवर्ड ब्लॉक के बिहार प्रदेश महासचिव धर्मेंद्र कुमार, श्री राजपूत करणी सेना के ज़िलाध्यक्ष राजेश टाइगर, बीजेपी युवा मोर्चा के ज़िला मंत्री छोटे कुमार साह ने इस दुष्कर्म मामले को धरती का कलंक कहा और ये पुरज़ोर माँग उठाई कि स्पीडी ट्रायल कराकर दोषी को जल्द से जल्द फाँसी की सज़ा दी जाए।

जानकारी के अनुसार, 12 जून को विश्व हिन्दू परिषद ज़िला कार्यालय में एक बैठक का आयोजन किया गया जिसमें अलीगढ़ और शिवहर में बच्चियों के साथ हुए बलात्कार की घटना की कड़ी निंदा की गई। शिवहर के सभी सामाजिक संगठन के कार्यकर्ताओं के द्वारा सर्व सहमति से यह निर्णय लिया गया कि देश में सुनियोजित तरीके से लड़कियों के साथ जो बलात्कार कि घटना हो रही है, इसके लिए सरकार क़ानून बना कर 30 दिनों के अंदर बलात्कारी को फाँसी की सज़ा का प्रावधान करे। साथ ही यह निर्णय भी लिया गया कि बच्ची को न्याय दिलाने के लिए 14 जून को पूरे शिवहर के बजार पूर्णतः बंद रखे जाएँगे।

सामाजिक संगठन के कार्यकर्ताओं ने सभी व्यापारी बंधुओं से एक दिन के बंद का अनुरोध किया है और कहा है कि इस बंद को सफल बनाएँ, जिससे ज़िला प्रशासन और कोर्ट इसे गंभीरता से ले और बलात्कारी को जल्द से जल्द सज़ा मिले। ऐसा होने से भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर लगाम लग सकेगी। इस बैठक में उपस्थित कार्यकर्ताओं में अशोक उपाध्याय, कमलेश्वरीनंदन सिंह, संजय सिंह, माधुरेंद्र कुमार, संदीप कुमार, कुणाल गुप्ता, संजय गुप्ता, अजय कुमार, अजय आर्य, शिवम सिंह, संतु कुमार, अनिल पटेल, छोटेलाल साह, पंडित वेदप्रकाश शास्त्री के अलावा दर्जनों कार्यकर्ता मौजूद थे।

इसके अलावा, 12 जून को बिहार के बेगूसराय में हुई एक अन्य घटना में, मुस्लिम भीड़ ने एक हिंदू परिवार के घर में घुसकर दो महिलाओं से छेड़छाड़ की और उस समय वहाँ मौजूद अकेले पुरुष सदस्य को मारने की कोशिश की। दूसरे मजहब वाले चाहते थे कि हिंदू अपनी ज़मीन और घर बेचकर इलाक़े को छोड़ दें।

Forbes: दुनिया की शीर्ष 500 कंपनियों में भारत की 10 कम्पनियाँ शामिल, Reliance टॉप 100 में

गुरुवार (जून 14, 2019) को फोर्ब्स की ग्लोबल 2000 लिस्ट 2019 की रिपोर्ट सामने आई। इस रिपोर्ट में दुनिया की 2000 सबसे बड़ी कंपनियों की सूची में भारत की 57 कंपनियों को जगह मिली है। इनमें रिलायंस एक मात्र ऐसी कंपनी है जो शीर्ष 100 कंपनियों में जगह बना पाई है। रिलायंस को इस सूची 71वाँ स्थान प्राप्त हुआ है, जबकि ऑयल एंड गैस सेक्टर की कंपनियों में रिलायंस 11वें नंबर पर है। इसके बाद इस सूची में एचडीएफसी बैंक का नाम है, जिसे 209वाँ स्थान प्राप्त हुआ है। सूची में ओएनजीसी 220वें स्थान पर है, जबकि इंडियन ऑयल 288वें और एचडीएफसी लिमिटेड 332 वें पायदान पर है।

इसके अलावा टीसीएस (374), आईसीआईसीआई बैंक (400), एलएंडटी (438), भारतीय स्टेट बैंक (460) और एनटीपीसी (492) का नाम शीर्ष 500 कंपनियों में शुमार है। इस सूची में कोल इंडिया, कोटक महिंद्रा बैंक, भारत पेट्रोलियम, महिंद्रा एंड महिंद्रा, इंडसइंड बैंक, बजाज फिनसर्व, टाटा स्टील, इंफोसिस, एक्सिस बैंक, टाटा मोटर्स, आईटीसी, भारती एयरटेल, विप्रो, जेएसडब्ल्यू स्टील, पावर ग्रिड, हिंडाल्को, एचसीएल टेक, गेल, पंजाब नेशनल बैंक, ग्रासिम, बैंक ऑफ बड़ौदा, पावर फाइनेंस और केनरा बैंक शामिल हैं।

इस लिस्ट में 61 देशों की कंपनियाँ शामिल है, जिसमें सबसे ज्यादा जगह अमेरिका की कंपनी को मिली है। इस सूची में 575 नाम अमेरीका की कंपनी के हैं। जबकि चीन और हांगकांग की 309 और जापान की 223 कंपनियाँ शामिल हैं। फोर्ब्स ने बिक्री, मुनाफा, संपत्ति और शेयर बाजार के चार पैमानों पर इन कंपनियों की रैंकिंग की है।

टॉप 10 में चीन की आईसीबीसी(1), चाइना कंस्ट्रक्शन बैंक(3), एग्रीकल्चर बैंक ऑफ चाइना (5), पिंग एन इंश्योरेंस ग्रुप(7), बैंक ऑफ चाइना अमेरिका(8); अमेरिका की जेपी मॉर्गन(2), बैंक ऑफ अमेरिका(5), एपल(3), वेल्स फार्गो(10); और नीदरलैंड की रॉयल डच शैल शामिल हैं।

बंगाल में एक साथ 69 डॉक्टरों ने सौंपा इस्तीफा, ममता से बिना शर्त माफ़ी की माँग

पश्चिम बंगाल में डॉक्टरों के हड़ताल का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। राज्य में जूनियर डॉक्टर के साथ हुई मारपीट के बाद साथी डॉक्टरों ने विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और अपनी सुरक्षा की माँग कर रहे हैं। कोलकाता में एनआरएस मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा को लेकर बंगाल में दो प्रोफेसरों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। प्रोफेसर सैबाल कुमार मुखर्जी ने एनआरएस मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल कोलकाता के प्रिंसिपल और मेडिकल सुपरिटेंडेंट के पद से इस्तीफा दिया तो वहीं, प्रोफेसर सौरभ चट्टोपाध्याय ने वाइस-प्रिंसिपल पद से इस्तीफा दे दिया था और अब डॉक्टर्स के इस्तीफे की झड़ी सी लग गई है। सीनियर डॉक्टर भी ममता बनर्जी के विरोध में उतर आए हैं।

कोलकाता के आर जी कर मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पीटल के 80 डॉक्टर्स के इस्तीफा देने की खबर आ रही थी, लेकिन जानकारी के मुताबिक, अब तक कम से कम 69 डॉक्टरों ने अपना इस्तीफा सौंप दिया और साथ ही उन्होंने ममता बनर्जी से कल दिए बयान के लिए के लिए बिना शर्त माफी माँगने की भी बात कही है। आर जी कर कॉलेज के डॉक्टरों का इस्तीफा यहाँ पढ़ा जा सकता है।

बता दें कि, कल ममता बनर्जी ने डॉक्टरों को अल्टीमेटम देते हुए 4 घंटे में वापस काम करने पर लौटने के लिए कहा था और साथ ही कहा था कि अगर वो ऐसा नहीं करते हैं, तो उनके खिलाफ कार्रवाई भी की जाएगी। वहीं, पश्चिम बंगाल में हो रहे विरोध प्रदर्शन का समर्थन करते हुए बेंगलुरु, हैदराबाद, दिल्ली और मुंबई में भी डॉक्टर्स विरोध प्रदर्शन पर उतर आए हैं।

जिस तरह से पिछले पाँच दिनों से यह सब घटित हो रहा है, और ममता सरकार का जो रवैया रहा है, लगता ही नहीं कि उन्हें सिवाय अपनी राजनीति और वोट बैंक के, डॉक्टरों की सुरक्षा या आम मरीज़ के जीवन की कोई चिंता है। ममता ने न सिर्फ इस मुद्दे को राजनैतिक रंग देने की कोशिश की, बल्कि एक आसान सी माँग पर अभी तक कुछ भी ढंग का नहीं बोल पाई है कि क्या उनकी सरकार डॉक्टरों के काम करने हेतु सुरक्षित माहौल दे सकेगी?

जब कोई व्यक्ति अपने बूढ़े अब्बू की हॉस्पिटल में हुई मौत पर 200 लोगों की भीड़ ले आता है, तो पता चलता है कि प्रशासन को समाज का एक हिस्सा कैसे देखता है। उसके बाद ममता का यह कहना कि ‘पुलिस वाले भी तो मरते हैं ड्यूटी पर लेकिन उनके सहकर्मी हड़ताल नहीं करते’, एक मूर्खतापूर्ण बयान है। या फिर यह बयान उस नेत्री का है जो सोचता है कि वो कुछ भी कह सकती है क्योंकि वो चुनी हुई सरकार चला रही है।

डॉक्टरों का इस तरह से हड़ताल पर जाना और दसियों की संख्या में इस्तीफ़ा देना बताता है कि ममता सरकार में काम करते हुए सुरक्षा की उम्मीद उन्हें नहीं दिख रही। जब सरकार आपको धमकाने पर उतर आए और बुनियादी सुविधा मुहैया न करा सके तो फिर डॉक्टरों के पास ज्यादा विकल्प नहीं दिखते।

बशीरहाट में महिला BJP कार्यकर्ता की निर्मम हत्या, लोगों का गुस्सा अब BJP पर फूटा

पश्चिम बंगाल में गुरुवार (मार्च 13, 2019) को नॉर्थ 24 परगना जिले के बशीरहाट इलाके में महिला भाजपा कार्यकर्ता की गोली मारकर निर्मम हत्या कर दी गई। कार्यकर्ता की पहचान सरस्वती दास के रूप में हुई है। भाजपा ने सरस्वती की हत्या के लिए टीएमसी के गुंडों को ज़िम्मेदार बताया है।

गुरुवार की रात को बंगाल भाजपा इकाई ने ट्विटर पर इस घटना की जानकारी दी। उन्होंने लिखा, “बशीरहाट में तृणमूल के गुंडों ने सरस्वती दास की निर्मम हत्या कर दी। बंगाल में कानून व्यवस्था पूरी तरह ढह चुकी है, यहाँ कोई भी सुरक्षित नहीं हैं।”

गौरतलब है सरस्वती दास ने लोकसभा चुनावों में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई थी। भाजपा द्वारा इस घटना की जानकारी ट्विटर पर दिए जाने के बाद यूजर्स ममता बनर्जी के साथ भाजपा पर भी जमकर बरस रहे हैं।

लोग बंगाल में राष्ट्रपति शासन गुहार लगाने की माँग कर रहे हैं। कुछ का ये भी कहना है कि पार्टी के शीर्ष नेताओं को जमीनी स्तर पर पार्टी के लिए कार्य करने वालों की अब कदर नहीं रही हैं, तो कुछ का कहना है कि इसके लिए भाजपा पर ऊँगली क्यों उठाई जा रही है, सवाल ममता बनर्जी और बंगाल पुलिस से होना चाहिए।

डॉक्टरों के साथ खड़ा हुआ ममता बनर्जी का भतीजा, हाइकोर्ट पहुँचा हड़ताल का मामला

पश्चिम बंगाल में पिछले चार दिनों से अस्पतालों में ताला लटका हुआ है। डॉक्टरों की हड़ताल जारी है। राज्य में जूनियर डॉक्टर पर हमले के बाद सभी जूनियर डॉक्टर मंगलवार (जून 11, 2019) से आंदोलन कर रहे हैं। डॉक्टरों ने मुख्यमंत्री की अल्टीमेटम को खारिज करने और अपनी माँग पूरी होने तक हड़ताल जारी रखने का भी फैसला किया है। ममता सरकार ने डॉक्टरों की माँग पर अब तक फैसला नहीं किया है।

इस हमले के बाद, देश भर के लाखों डॉक्टरों ने पश्चिम बंगाल में अपने प्रदर्शनकारी सहयोगियों के साथ एकजुटता व्यक्त करने के लिए एक दिन के लिए अपने काम को बहिष्कार करने का फैसला किया है। इंडिया मेडिकल एसोसिएशन ने इस घटना के खिलाफ शुक्रवार को “ऑल इंडिया प्रोटेस्ट डे” घोषित किया है और हड़ताली डॉक्टरों के साथ एकजुटता व्यक्त की है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मामले पर असंवेदनशीलता जाहिर करते हुए डॉक्टरों को चार घंटे का अल्टीमेटम दिया था। जिसमें डॉक्टरों को 4 घंटे के भीतर काम पर लौटने के लिए और ऐसा न करने पर कार्रवाई का सामना करने की बात कही थी। कथित तौर पर, टीएमसी के समर्थक भी इस घटना से नाखुश हैं और ममता बनर्जी के खिलाफ डॉक्टरों के साथ मिलकर प्रदर्शन कर रहे हैं।

हैरानी की बात तो ये है कि ममता बनर्जी डॉक्टरों को धमकी दे रही हैं और उनके भतीजे आबेष बनर्जी डॉक्टरों के समर्थन में प्रदर्शन उतर आए हैं। आबेश बनर्जी, ममता के भाई कार्तिक बनर्जी के बेटे हैं, केपीसी मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर हैं। आबेश ने बुधवार को केपीसी अस्पताल से एनआरएस अस्पताल तक विरोध रैली का नेतृत्व किया।

शब्बा हकीम के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट

पश्चिम बंगाल में मंत्री फिरहाद हकीम की बेटी शब्बा हकीम ने भी डॉक्टरों के प्रदर्शन का समर्थन किया है। शब्बा हकीम खुद भी डॉक्टर हैं और उन्होंने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा कि शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन करना अधिकार है। साथ ही शब्बा ने ये भी कहा कि टीएमसी समर्थक होने के रुप में ममता सरकार की निष्क्रियता और नेताओं की चुप्पी पर शर्म आती है।

इस आंदोलन की आग दिल्ली तक पहुँच गई है। एम्स के डॉक्टर भी अब बंगाल के डॉक्टरों के समर्थन में आ गए हैं। वहीं, कोलकाता के एसएसकेएम अस्पताल के चार प्रोफेसरों ने इस्तीफा दे दिया तो सागर दत्ता मेडिकल कॉलेज के 18 डॉक्टरों ने भी इस्तीफा दे दिया और जिस एनआरएस मेडिकल कॉलेज में हंगामा हुआ उसके प्रिंसिपल ने भी इस्तीफा सौंप दिया है। एम्स के रेजिडेंट डॉक्टरों ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन से मुलाकात की।

जानकारी के मुताबिक, डॉक्टर कुणाल साहा ने डॉक्‍टरों की हड़ताल के खिलाफ कोलकाता हाईकोर्ट में गुरुवार (जून 13, 2019) को याचिका दायर की है। दायर की गई याचिका में हड़ताली डॉक्‍टरों के खिलाफ कड़े कदम उठाने की अपील की गई है। कोलकाता हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश की डिवीजन बेंच में इसकी सुनवाई होगी।

गौरतलब है कि, कोलकाता स्थित नील रतन सरकार मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में सोमवार (10 जून) को एक बुजुर्ग मरीज मोहम्मद शाहिद की मौत के बाद उसके परिजनों ने डॉक्टर परिबाह मुखोपाध्याय पर घातक हमला किया। डॉक्टर्स के मुताबिक, करीब 200 की भीड़ ने मोहम्मद शाहिद की मौत के बाद अस्पताल में जमकर उत्पात मचाया। इस घटना के बाद राज्य के विभिन्न अस्पतालों के डॉक्टर न्याय की माँग करते हुए हड़ताल पर चले गए।

मालेगाँव ब्लास्ट: बॉम्बे हाईकोर्ट ने चार आरोपितों को दी ज़मानत

मालेगाँव ब्लास्ट मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने चार आरोपितों को ज़नानत दे दी है। इन चार आरोपितों में लोकेश शर्मा, धन सिंह, राजेंद्र चौधरी और मनोहर नरवरिया के नाम शामिल हैं। इससे पहले, राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) की विशेष अदालत ने सोमवार (3 जून) को मालेगाँव विस्फोट मामले के इन चारों आरोपितों की ज़मानत याचिका ख़ारिज कर दी थी।

स्पेशल जज वीवी पाटिल ने ज़मानत याचिका यह कहते हुए ख़ारिज कर दी थी कि अपराध की गंभीरता और आरोपी व्यक्तियों के ख़िलाफ़ लगाए गए आरोपों को ध्यान में रखते हुए, वे ज़मानत के लायक नहीं हैं।

अदालत ने इन आरोपितों के संदर्भ में कहा था कि NIA द्वारा एकत्र किए गए सबूतों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि ये सभी आरोपी, फरार अभियुक्तों के साथ बम तैयार करते थे, जो 8 सितंबर 2006 को मालेगाँव में लगाए गए। इस विस्फोट में 31 लोगों ने अपनी जान गंवाई और 312 लोग घायल हुए थे। वहीं, बचाव पक्ष के अधिवक्ता जेपी मिश्रा और प्रशांत माघुल ने इन चारों के शामिल होने का कोई ठोस सबूत नहीं होने का हवाला दिया था।

हाल ही में, मुंबई की विशेष NIA कोर्ट ने मालेगाँव ब्लास्ट के आरोपितों के ख़िलाफ़ सख़्त रवैया अपनाया था। दरअसल, कोर्ट का यह सख़्त रवैया आरोपितों के कोर्ट में उपस्थित न होने के लिए था। पिछले काफ़ी समय से आरोपित कोर्ट में लगातार अनुपस्थित रहे थे, इसलिए कोर्ट ने सभी आरोपितों को सुनवाई के दौरान सप्ताह में एक बार कोर्ट रूम में हाज़िरी लगाने का निर्देश दिया था।

हलाल बैंकिंग फर्म के सात निदेशक गिरफ्तार, सरगना ‘जगुआर’ से पहुँचा एयरपोर्ट, फरार

बेंगलुरु में ‘आई मॉनेटरी एडवाइजरी’ (I Monetary Advisory) के नाम से फर्जी इस्लामिक बैंक चलाने वाले मोहम्मद मंसूर खान की फर्म के सात निदेशकों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। इन निदेशकों को पुलिस ने बुधवार (जून 12, 2019) को अलग-अलग जगहों से गिरफ्तार किया। इस दौरान पुलिस को एक निदेशक के घर के बाहर से सफेद रंग की एसयूवी बरामद हुई है, जिसके बारे में बताया जा रहा है कि ये मंसूर खान की है। फर्म का मालिक मंसूर खान अभी भी फरार चल रहा है।

खबर के मुताबिक, कल शाम 6:45 तक खान का इमिग्रेशन क्लियर हो गया था और 8:45 पर उसने दुबई के लिए उड़ान भरी। इस दौरान खान अकेला था। इससे पहले, शनिवार (जून 8, 2019) को खुद अपनी पसंदीदा जगुआर से केम्पेगौड़ा हवाई अड्डे पर पहुँचा था। पुलिस ने बताया कि खान ने बिज़नेस क्लास की सीट बुक की थी। खान के जगुआर (KA 05 MW 41) और रेंज रोवर (PY 05 C777) को बुधवार को गिरफ्तार किए गए सात IMA निदेशकों में से एक, निजामुद्दीन अज़ीमुद्दीन के शिवाजीनगर निवास से जब्त किया गया।

मंसूर खान निवेशकों का सैकड़ों करोड़ रुपया लेकर फरार हो गया है। उसके फरार होने के बाद महज 5 घंटों के अंदर 3300 शिकायतें दर्ज की गई थी, जिसमें से अधिकतर शिकायतकर्ता बेंगलुरु के मुस्लिम समुदाय के लोग थे। वहीं, मामला के सामने आने के बाद  तीसरे दिन भी काफी संख्या में लोग शिवाजीनगर स्थित फर्म के ऑफिस पहुँचे और फर्म के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई। अब तक इस फर्म के खिलाफ 26 हजार लोगों ने शिकायत दर्ज करवाई है। इस शिकायत में मालिक और निदेशकों पर सख्त कार्रवाई की माँग की गई है।

गौरतलब है कि, साल 2006 में खाड़ी से लौटे मोहम्मद मंसूर खान ने इस्लामिक बैंकिंग और हलाल निवेश के नाम पर एक फर्म बनाई जिसका नाम रखा ‘आई मॉनेटरी एडवाइजरी’ (I Monetary Advisory)। इस्लामिक बैंकिंग के नाम पर मंसूर खान ने अपने समुदाय के लोगों से इस फर्म में निवेश करने को कहा। मंसूर खान ने लोगों को बड़े रिटर्न का वादा करके निवेश करने का लालच दिया और जब लोगों ने बड़ी संख्या में निवेश किया, तो उसने उस पैसे से ज्वेलरी, रियल एस्टेट, बुलियन ट्रेडिंग, फार्मेसी, प्रकाशन, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में जमकर व्यवसाय किया और धन कमाया और फिर देश छोड़कर फरार हो गया। फर्म में तकरीबन 10 हजार निवेशकों ने 2,000 करोड़ रुपये का निवेश किया था। मंसूर खान ने लोगों से 14% से 18% तक के रिटर्न का वादा किया था।

मंसूर के फरार होने के 24 घंटे बाद ही एक ऑडियो क्लिप वायरल हो गई जिसमें मंसूर खान कह रहा था कि वो भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों को रिश्वत देते-देते थक चुका है, इसलिए आत्महत्या करने जा रहा है। साथ ही इस ऑडियो क्लिप में मंसूर खान ने ये भी कहा कि बेंगलुरु के एक कॉन्ग्रेसी विधायक रोशन बेग ने उसके 400 करोड़ रुपए हड़प लिए हैं। ऑडियो क्लिप के वायरल होने के बाद सैकड़ों की संख्या में निवेशक आईएमए के ऑफिस पहुँचे और हमला करने की कोशिश की। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने काफी संख्या में जवानों को तैनात किया, जिसके बाद स्थिति नियंत्रण में आई।

साल के अंत तक अमित शाह ही रहेंगे BJP अध्यक्ष, ये है वजह

भाजपा ने घोषणा की है कि साल के अंत में होने वाले तीन राज्यों (महाराष्ट्र, झारखंड व हरियाणा) के विधानसभा चुनाव तक अमित शाह ही संगठन की कमान संभालेंगे। खबरों के अनुसार इन तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव बेहद महत्वपूर्ण हैं, जिसके कारण पार्टी किसी तरह का कोई खतरा नहीं उठा सकती। जरूरत पड़ने पर अमित शाह की सहायता के लिए पार्टी किसी को कार्यकारी अध्यक्ष भी बना सकती है।

अमर उजाला में प्रकाशित खबर के मुताबिक पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा है कि 3 राज्यों (जिनमें विधानसभा चुनाव होने वाले हैं) में अमित शाह की जमीनी स्तर पर मजबूत पकड़ है। ऐसे में अगर संगठन की जिम्मेदारी किसी नए चेहरे को सौंपी जाएगी, तो उसे माहौल समझने में समय लगेगा, जबकि पार्टी के पास इसके लिए बिलकुल वक्त नहीं है।

भारतीय जनता पार्टी की बैठक का ब्यौरा देते हुए भूपेंद्र यादव ने बताया कि अमित शाह ने 2014 में अध्यक्ष बनते हुए कहा था कि पार्टी का सबसे अच्छा समय अभी नहीं आया है और आज एक बार फिर उन्होंने अपनी बात को दोहराया है। भूपेंद्र यादव के अनुसार अमित शाह ने फिर कहा है कि पार्टी का ‘पीक’ अभी नहीं आया है, जिन क्षेत्रों में पार्टी अभी नहीं पहुँची है उन सबमें पार्टी पहुँचेगी।

याद दिला दें कि लोकसभा चुनाव में 300 का आँकड़ा पार करके ऐतिहासिक जीत दर्ज कराने वाली भाजपा ने जीत का पूरा श्रेय अमित शाह की रणनीति और उनकी रणनीति को दिया था। गृह मंत्री पद संभालते ही ऐसी अटकलें लगनी शुरू हो गई थी कि उनके लिए अब मंत्रालय और पार्टी दोनों का कार्यभार संभाल पाना थोड़ा मुश्किल होगा। लेकिन फिर भी आगामी चुनावों को देखते हुए ये बड़ा फैसला लिया गया।

हालाँकि, बता दें भाजपा अध्यक्ष के रूप में अमित शाह का 3 वर्षीय कार्यकाल इस साल की शुरुआत में ही समाप्त हो गया था, लेकिन तब भी पार्टी ने उनसे चुनाव तक पद पर बने रहने को कहा था। भाजपा के संविधान के अनुसार किसी व्यक्ति को लगातार 2 कार्यकाल के लिए अध्यक्ष चुना जा सकता है। उस हिसाब से अभी शाह के पास 1 कार्यकाल बाकी है।

हड़ताल पर बैठे डॉक्टरों को मिला दिल्ली से समर्थन, सफदरजंग और AIIMS भी ‘बंद’

पश्चिम बंगाल में जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल का असर देश के अन्य राज्यों में भी दिखने लगा है। दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन (DMA) ने भी शुक्रवार (जून 14, 2019) को बंद रखने का फैसला किया है, वहीं महाराष्ट्र के रेजीडेंट डॉक्टर भी शुक्रवार को सांकेतिक हड़ताल पर रहेंगे।

हड़ताल के चलते मरीजों और उनके परिजनों को संकट का सामना करना पड़ रहा है। बंगाल में डॉक्टरों द्वारा की जा रही हड़ताल को हर ओर से समर्थन प्राप्त हो रहा है। इस हड़ताल के कारण कई सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में हड़ताल के तीसरे दिन भी ओपीडी सेवाएँ, पैथोलॉजिकल इकाइयाँ और आपातकालीन वार्ड बंद रहे। इसके अलावा निजी अस्पतालों में भी हड़ताल के चलते चिकित्सीय सेवाएँ बंद रहीं।

बंगाल के डॉक्टर कोलकाता में एनआरएस मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में एक 75 वर्षीय मरीज की मौत के बाद, 200 लोगों की भीड़ द्वारा डॉक्टरों पर हमले के मद्देनजर प्रदर्शन कर रहे हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने भी घटना के ख़िलाफ़ हड़ताल कर रहे डॉक्टरों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए शुक्रवार को अखिल भारतीय विरोध दिवस घोषित किया है।

दिल्ली में एम्स और सफदरजंग हॉस्पिटल के रेजिडेंट डॉक्टरों के साथ कई संस्थाओं ने शुक्रवार को हड़ताल का आह्वान किया है। सफदरजंग अस्पताल की रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन (RDA) ने भी बंद का आह्वान किया है। आरडीए के अध्यक्ष डॉ. प्रकाश ठाकुर के मुताबिक, डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा नहीं रुकी तो वे अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने को मजबूर होंगे। हालाँकि एम्स के महासचिव डॉक्टर के अनुसार इस बीच आपातकालीन सेवाएँ जारी रहेंगी, लेकिन ओपीडी, रूटीन सर्जरी और लैब में होने वाली जाँच बंद रहेगी।

बता दें बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के तानाशाही रवैये के बाद भी डॉक्टर अपने काम पर नहीं लौटे। गुरुवार को दोपहर 2 बजे की समय सीमा ममता बनर्जी ने डॉक्टरों के काम पर लौटने के लिए रखी थी, लेकिन डॉक्टर फिर भी हड़ताल पर बैठे रहे। इस हड़ताल के लिए ममता सरकार और भाजपा एक दूसरे पर आरोप मढ़ने में लगे हैं। ममता बनर्जी ने जहाँ डॉक्टरों के इस हड़ताल की निंदा करते हुए इसे माकपा और भाजपा का षडयंत्र बताया, वही विपक्ष का भी कहना है कि ममता हिटलर की तरह काम करती हैं।

सरकारी डॉक्टर की जान बनाम मुस्लिम वोटबैंक को निहारती निर्मम ममता जो दंगे पीती, खाती और सोती है

भारत में डॉक्टर बहुत कम हैं। जनसंख्या बहुत ज़्यादा है। जनसंख्या के पास धैर्य बहुत कम है। लोग हॉस्पिटल जाते हैं। कुछ लोग इलाज कराने जाते हैं, कुछ जान बचाने जाते हैं। कुछ तो लगभग मृतप्राय शरीर के साथ पहुँचते हैं। मरीज़ रास्ते में मर जाता है। मरीज़ डॉक्टर के आला छाती पर सटाने के दो मिनट बाद मर जाता है। मरीज़ ऑपरेशन थिएटर में टेबल पर मर जाता है।

क्या डॉक्टर कभी चाहता है कि उसका मरीज़ मर जाए? वही डॉक्टर जो आपका सरदर्द भी ठीक कर देता है तो आप उसे दुआएँ देते रहते हैं, वही डॉक्टर क्या आपके परिजन को जान-बूझ कर मार देगा? वही डॉक्टर जो हर जान बचाने पर लगभग भगवान का रूप बता दिया जाता है, कभी चाहेगा कि उसके सामने छाती पकड़ कर कराहता मरीज़ प्राण त्याग दे?

अब आपका एक आर्गुमेंट आएगा कि डॉक्टर आज-कल पैसा बनाने में व्यस्त हो गए हैं, बिना काम के टेस्ट लिख देते हैं आदि। पैसा बनाने में हम में से निन्यानवे प्रतिशत लोग व्यस्त हैं, बस हमें दूसरों के बनते पैसों में लगता है कि वो शॉर्टकट से बना रहा है। इसलिए ये कुतर्क तो बाहर रहने दीजिए। हाँ, इस बात पर मैं सहमत हूँ कि कई बड़े हॉस्पिटलों में जबरदस्ती ऐसे टेस्ट लिख दिए जाते हैं जिसकी ज़रूरत नहीं होती।

उसका दूसरा पहलू यह है कि आज-कल मेडिको-लीगल कोर्ट केस इतने बढ़ गए हैं कि जब सामने वाला वकील आपसे यह पूछे कि क्या आप विश्वास के साथ कह सकते हैं कि फ़लाँ टेस्ट, जो आपने नहीं किया, उसी के कारण यह व्यक्ति नहीं मरा, तो आप जवाब नहीं दे पाएँगे। आपसे पूछ लिया जाए कि आप किस शोध के आधार पर कह रहे हैं कि सरदर्द के लिए ख़ून के जाँच की ज़रूरत नहीं होती और आपने जो टेस्ट नहीं किया उससे कुछ ऐसा नहीं निकलता जिससे इसकी जान बच जाती, तो आप निरुत्तर हो जाएँगे। फिर आपकी नौकरी जाएगी, और शायद लाइसेंस भी। इसलिए, अब ऐसे मामलों से बचने के लिए भी बिना काम के टेस्ट करा लिए जाते हैं।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बड़े हॉस्पिटल इससे पैसा नहीं बना रहे। बिलकुल बना रहे हैं, लेकिन हम दूसरे पक्ष को पूरी तरह इग्नोर नहीं कर सकते। कई बार यह ख़बर भी आती है कि फ़लाँ हॉस्पिटल में सर दर्द के साथ गए थे, और पचास दिन आईसीयू में रखने के बाद लाश के साथ सत्रह लाख का बिल देकर हॉस्पिटल ने विदा किया। ऐसी खबरें गलत नहीं होतीं और बिजनेस की क्रूर दुनिया में हॉस्पिटल मैनेजमेंट इस तरह के कुकृत्य करते हुए कई बार पकड़े गए हैं। इनसे इनकार नहीं है।

ये सब एक तरफ, और दूसरी तरफ भारत सरकार की शिक्षा पद्धति से पढ़ा डॉक्टर, कम संसाधन में किसी सरकारी चिकित्सालय में अपनी सेवाएँ दे रहा होता है। उसने कड़ी मेहनत की, और सरकारी हॉस्पिटल में कम सैलरी पर काम करने लगा। वो सिर्फ डॉक्टर रह जाता है, उसकी जाति, उसका धर्म, उसका मज़हब, उसका क्षेत्र और उसकी तमाम आईडेंटिटीज़ गौण हो जाती हैं। वो समाज के उन तबक़ों के लोगों का इलाज करता है जो बेहतर जगहों पर नहीं जा सकते।

ऐसी जगहों पर वो लोग भी आते हैं जिनकी साध्य बीमारियाँ पैसों के अभाव में असाध्य हो जाती हैं। परिजन सोचते हैं कि ये तो कैंसर नहीं है, फिर ये कैसे मर गया। वो पूछते हैं कि डॉक्टर ने उसे बचाया क्यों नहीं? जबकि डॉक्टर के हाथ में कुछ नहीं रहा हो, वो उस स्थिति में पहुँच चुका हो कि उसकी मृत्यु का उपक्रम उसी डॉक्टर की टेबल पर होना बचा हो। तब आवेश में परिवार वाले डॉक्टर को पीट देते हैं, गालियाँ देते हैं, और कई बार सारा दोष उस पर डाल कर उसकी हत्या तक कर देते हैं।

प्रोफेशनल हजार्ड या मजहबी आतंक का एक रूप?

इसे अंग्रेज़ी में प्रोफ़ेशनल हजार्ड बोला जाता है। हिन्दी में अर्थ होता है पेशे में होने के कारण आने वाले ख़तरे। यानी, मान कर चलिए कि ये काम कर रहे हैं तो ऐसा भी हो सकता है। इसलिए क्रिकेटर लोग हेलमेट पहनते हैं। क्रिकेट खेलना उनका पेशा है, और गेंद का सर पर लगना उस पेशे से होने वाला ख़तरा। वही ख़तरा डॉक्टरी में गाली, थप्पड़, घूँसे, जूते से लेकर, अब बंगाल को देखें तो, 200 दंगाईयों की भीड़ द्वारा डंडे और ईंट तक का रूप ले चुका है।

75 साल की उम्र का मोहम्मद सईद नाम का एक व्यक्ति NRS हॉस्पिटल में इलाज के लिए आता है, डॉक्टर उसे बचा नहीं पाते। डॉक्टरों का कहना है कि मौत प्राकृतिक कारणों से हुई। परिवार वालों को जाने क्या सूझी कि वो दो ट्रक में 200 लोग ले आए और हॉस्पिटल के दो डॉक्टरों की लगभग जान ही ले ली। एक के सर पर ईंट लगी और खोपड़ी में फ़्रैक्चर हो गया लेकिन अब वो स्टेबल बताया जा रहा है, दूसरा गंभीर रूप से घायल है।

जब यह हमलावर भीड़ अपना उत्पात मचा रही थी तो प्रशासन इसे क़ाबू करने में पूरी तरह से विफल रहा। दूसरी घटना बर्धमान मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल की बताई जा रही है कि वहाँ भी भीड़ ने डॉक्टरों पर पत्थरबाज़ी की। कई डॉक्टर वहाँ भी घायल हुए। हालाँकि, कुछ मीडिया संस्थान इस ख़बर को नकार रहे हैं लेकिन सोशल मीडिया पर वहाँ के कुछ लोग बता रहे हैं कि स्थिति बहुत तनावपूर्ण है। तीसरी घटना में बताया जा रहा है कि एक डेंटल कॉलेज के छात्र को रास्ते में डॉक्टर वाला निशान देख कर लोगों ने रोक कर पीट दिया।

सोमवार से चल रहे इस घटनाक्रम के परिणामस्वरूप बुधवार को बंगाल के लगभग सारे ओपीडी बंद रहे और कई मेडिकल कॉलेजों के जूनियर डॉक्टर हड़ताल पर डटे रहे। ममता बनर्जी का कोई अता-पता नहीं था। लेकिन जब वो हरकत में आई तो बातचीत के इरादे से नहीं, वरन धमकी के साथ कि अगर चार घंटे में हड़ताल बंद नहीं हुई तो वो एक्शन लेगी। साथ ही, चार दिनों से सोए प्रशासन की प्रमुख ने डॉक्टरों को यह आश्वासन भी नहीं दिया कि उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सरकार लेगी।

उसके बाद ‘ये भाजपा की साज़िश है’ वाला राग अलाप कर ममता ने जो बयान दिया है वो सुन कर लोग सर पकड़ लेंगे कि आखिर ये चाहती क्या हैं? ममता ने कहा कि पुलिस वालों की भी मौत हो जाती है तो क्या वो हड़ताल पर बैठ जाते हैं! ये वाक्य इतना वाहियात है कि इस पर सफ़ाई माँगना भी बेकार है।

जैसे-जैसे समय बीत रहा है, देश के हर राज्य से एक के बाद एक हॉस्पिटल अपने साथी डॉक्टरों के साथ खड़े होते दिख रहे हैं और सांकेतिक हड़ताल कर रहे हैं। बंगाल में स्थिति बहुत ही संवेदनशील बनी हुई है क्योंकि ममता को यह समझ में नहीं आ रहा है कि चार दिन पहले मोहम्मद सईद की मृत्यु के बाद जो दो सौ दंगाईयों ने डॉक्टरों को पीटा और सर तोड़े, उन पर कार्रवाई कैसे करे। समय शायद इसलिए लग रहा है क्योंकि नाम में मोहम्मद है, राम होता तो अभी तक जेल में होते।

इन मौक़ों पर ममता ने एस्मा कानून की दुहाई देते हुए कहा है कि डॉक्टरों को काम पर लौटना ही होगा। और डॉक्टरों ने क्या किया? उन्होंने एक साथ इस्तीफा दे दिया। ममता ने स्वीकार नहीं किया लेकिन वो उन्हें आश्वस्त भी नहीं कर पाईं कि प्रशासन उन्हें सुरक्षित माहौल में काम करने देगा। सुरक्षित माहौल तो छोड़िए उसी हॉस्पिटल में, टाइम्स ऑफ इंडिया की रिर्पोट के अनुसार, पचास गुंडे आठ बजे रात में घुस गए और उस तरफ गए जहाँ डॉक्टर हड़ताल पर बैठे हैं। अंधेरे में उन्हें कोई पहचान नहीं पा रहा। ज़ाहिर है कि ये भी एक तरीक़ा है डराने-धमकाने का।

ममता की राजनैतिक हालत खराब है

ममता की राजनैतिक हालत बहुत खराब है। हिंसा का दौर रुक नहीं रहा, पोलिटिकल कैपिटल ये खो चुकी हैं। एक झटके में भाजपा ने इनसे आधा बंगाल ले लिया और तिलमिलाई-सी यह नेत्री अपना पारम्परिक वोटर बेस खोना नहीं चाहती। इस राजनीति की बलि भाजपा के कार्यकर्ता भी चढ़ रहे हैं, और बंगाल की आम जनता भी। यही राजनीति अब अपने पाँव पसार कर बंगाल के हॉस्पिटल तक पहुँच गई है जहाँ मोहम्मद सईद की मौत पर प्रोपेगेंडा चलाने वाला अख़बार ‘द टेलिग्राफ़’ उसकी बेटी का यह बयान छापता है कि उसकी माँ की मृत्यु भी उसी अस्पताल में हुई थी, जैसे कि वहाँ के डॉक्टर इंतजार में बैठे थे कि सईद ज्यों ही आएगा उसकी जान ले लेनी है।

अब ममता बनर्जी के हाथ में बस तृणमूल की गुंडई और समुदाय विशेष के उत्पात का ही सहारा है। समुदाय विशेष ने ममता की मदद खूब की है। हर त्योहार पर दंगे की शक्ल लेते जुलूस, दुर्गा विसर्जन की इजाज़त न देना, रामनवमी के जुलूस पर पत्थरबाज़ी, दुर्गा पूजा के पंडालों पर ईंट फेंकना, लगभग हर जिले में मजहबी उन्माद की परिणति आगजनी और दंगे में होना… ये सब बंगाल का पर्याय बन चुके हैं। बंगाल जल रहा है और ममता सोच रही है कि इसको कैसे खेला जाए।

सत्ता के लालच में अंधी हो चुकी यह महिला सारे हथकंडे आज़माना चाहती है कि शायद केन्द्र विवश हो कर राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश कर दे और इसे ‘बाहर से आए मोदी ने तुम बंगालियों की लोकतांत्रिक सरकार पर हमला बोला है’ कहने का मौका मिले और इसकी पैठ मजबूत हो। अब ममता के पास यही कार्ड बचा है। हिंसा और दंगे तो इतने आम हो गए हैं कि पहले तो पत्रकारिता का समुदाय विशेष ममता की चाटुकारिता के चक्कर में कवर नहीं करता था, अब ये इतने आम हो गए हैं कि क्या कवर करे, क्या छोड़े, यही सोचकर कवर नहीं कर रहा।

बंगाल में जो हो रहा है वो ऐतिहासिक है। जो बंगाल में हैं वो जानते हैं कि कुछ इलाके ऐसे भी हैं जहाँ हिन्दू परिवार घर में आलू उबाल कर गुज़ारा कर रहा है क्योंकि समुदाय विशेष उनके घर से निकलने पर हमला बोल सकता है। वोट बैंक के चक्कर में मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति करने वाली ममता जो बो रही है, वो उसे काटना होगा। अगर मुस्लिम इकट्ठा होंगे तो उसका सीधा परिणाम हिन्दुओं के एकजुट होने से होगा।

दंगाईयों का दुस्साहस और ममता की गायब पुलिस

बंगाल के लोग जानते हैं कि ममता बनर्जी की आवाज पर जो लोग ट्रकों में रॉड और मशाल लेकर बर्धमान से लेकर मालदा, पुरुलिया, मुर्शीदाबाद, आसनसोल जैसी हर जगह पर आग लगाने निकल जाते हैं वो कौन हैं, कहाँ से आए हैं, और क्यों आए हैं। बंगाल के लोगों ने लोकसभा चुनाव में ममता को अपनी जगह दिखा दी है कि इतनी हिंसा और धमकी के बीच भी अगर तीन साल में भाजपा अपना वोट शेयर तृणमूल के बराबर ले आती है, तो ममता आँख मूँद कर नमाज़ करने की एक्टिंग जितनी कर ले, बंगाल रेत की तरह फिसल रहा है उसकी गिरफ़्त से।

सोचने वाली बात तो यह है कि आखिर एक स्टेशनरी की दुकान चलाने वाले आम व्यक्ति में यह हिम्मत कहाँ से आती है कि वो अपने वृद्ध बाप की प्राकृतिक मौत पर दो सौ गुंडे बुला लेता है और हॉस्पिटल पर धावा बोल देता है? कहीं न कहीं उसने तो यही सोचा होगा कि वो बच जाएगा क्योंकि उसके नाम में रामधोनु वाला राम नहीं तथाकथित सेकुलर रोंगधोनु वाले ‘रोंग’ सेकुलर हैं। ये दुस्साहस कहाँ से आता है कि परिवार नहीं पूरी भीड़ जमा हो जाती है और उसके पास ईंट और पत्थर होते हैं फेंकने के लिए?

ये तो व्यवस्थित तरीके से हमला बोलना हुआ। ये भीड़ इतनी जल्दी कैसे आती है, कहाँ हमला करती है और किधर गायब हो जाती है? क्या पुलिस ने नहीं देखा इन्हें? क्या हॉस्पिटल में सुरक्षा के लिए पुलिस आदि नहीं होती या फिर इस पहचानहीन भीड़ का सामूहिक चेहरा ममता की पुलिस ने पहचान लिया और उन्हें वो करने दिया जो वो कर गए?

इसी भीड़ की हिमाक़त ममता जैसी तानाशाही प्रवृत्ति के राजनेताओं के दिमाग में इतना उन्माद भर देती है कि वो समझदारी से मुद्दे को सुलझाने की जगह धमकी देती है कि डॉक्टरों के रजिस्ट्रेशन कैंसिल किए जाएँगे, इंटर्नशिप का लेटर नहीं दिया जाएगा…

ममता को इतने पर नहीं रुकना चाहिए था। वो सुबह उठ कर यह घोषित कर दे कि बंगाल अपने आप में एक स्वतंत्र राष्ट्र है और वो वहाँ की साम्राज्ञी हैं। बंगाल की पुलिस को रातों-रात आर्मी बना दिया जाए और अपने नाम के विपरीत कार्यों की शृंखला में हर हॉस्पिटल के सामने आर्मी कैंटोनमेंट से तोपें लाकर खड़ी कर दी जाएँ और ऐलान कराया जाए कि काम करो, या टैंक के गोले झेलो।

तब हमारे बड़े-बड़े पत्रकार क़सीदे लिखेंगे कि इस समाज ने हमेशा ही महिला नेत्रियों को आगे बढ़ने से रोका है। वो इसलिए क़सीदे लिखेंगे क्योंकि अभी उनकी आँखों में घोड़े का बाल चला गया है, और वो आज कल बंगाल में जो हो रहा है वो ठीक से देख नहीं पा रहे।