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बरखा दत्त का दु:ख : ‘मेनस्ट्रीम मीडिया अब चुनावों को प्रभावित नहीं कर पाएगा’

अनुभवी पत्रकार बरखा दत्त ने कॉन्ग्रेस मीडिया पैनलिस्ट शमा मोहम्मद के साथ अपनी हालिया बातचीत में इस बात पर अपना ग़़ुस्सा और पीड़ा व्यक्त की कि मुख्यधारा का मीडिया अब चुनावों में मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर पाएगा।

कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल समर्थित HTN तिरंगा टीवी पर शमा मोहम्मद और AAP नेता योगेंद्र यादव के साथ बातचीत करते हुए, बरखा ने कहा कि चुनाव के परिणाम को प्रभावित करने में सक्षम होने के मामले में मीडिया बिल्कुल अप्रासंगिक हो रहा है। उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि मीडिया के साथ जुड़ने के लिए सभी राजनेताओं ने चीखने-चिल्लाने के लिए अपने स्वयं के तंत्र को विकसित कर लिया है। मैं आपसे वादा करती हूँ कि यह कहने पर एक पत्रकार के रूप में मुझे ख़ुशी नहीं होगी। लेकिन मेरा मानना ​​है कि मुख्यधारा का मीडिया आज इस देश में एक मतदाता के वोट को प्रभावित करने में सक्षम होने के लिए पूरी तरह से अप्रासंगिकता की ओर बढ़ रहा है।” अपनी बात को दोहराते हुए बरखा ने कहा, “मैं सचमुच इस पर विश्वास करती हूँ।”

‘मतदाताओं पर प्रभाव’ के अलावा, राजनेताओं को प्रभावित करने और उनकी पैरवी करने का भी आरोप पत्रकारों पर है।

जुलाई 2009 में, लीक हुए ऑडियो टेप, जिन्हें ‘राडिया टेप्स’ के नाम से जाना जाता है, उससे पता चला था कि नैरेटिव कैसे सेट किया जाता है। बरखा दत्त और नीरा राडिया के बीच हुई बातचीत के टेप के अनुसार, राडिया केंद्रीय आईटी और संचार मंत्री के पद पर दयानिधि मारन की फिर से नियुक्ति के ख़िलाफ़ पैरवी कर रही थीं और बरखा ने सक्रिय रूप से गतिरोध समाप्त करने और केंद्र में सरकार बनाने के लिए दोनों दलों के बीच सक्रियता से मध्यस्थता की थी।

पैनल इस बात पर चर्चा कर रहा था कि क्या एग्जिट पोल (2019), जो नरेंद्र मोदी के लिए एक शानदार जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं, सही हैं और क्या वह रिकॉर्ड जीत के लिए तैयार हैं? बरखा ने कॉन्ग्रेस की आलोचना करते हुए कहा कि अगर एक्जिट पोल के आँकड़ें सही साबित हुए, तो यह कॉन्ग्रेस पार्टी के ‘अस्तित्व पर संकट’ साबित हो सकता है। बरखा कॉन्ग्रेस के पैनलिस्ट शमा मोहम्मद से बात कर रही थीं जिसमें कॉन्ग्रेस द्वारा तीन राज्यों (मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़) की जीत का ज़िक्र किया और कहा कि वो बहुत कम अंतर से जीते हुए राज्य थे।

शमा मोहम्मद ने कॉन्ग्रेस का बचाव करने की कोशिश करते हुए कहा कि 2014 तक, “बरखा और कुछ अन्य” को छोड़कर कोई भी ‘मीडिया’ नहीं था। वह कहती हैं, ”विपक्ष द्वारा हमसे पूछताछ की गई। हमसे नीतिगत पक्षाघात के लिए पूछताछ की गई। भ्रष्टाचार के आरोपों के ख़िलाफ़ हमसे पूछताछ की गई। निर्भया के लिए हमसे पूछताछ की गई। हमारे पास कठुआ एक मुद्दा था जो निर्भया के लगभग बराबर था। क्या कुछ लोगों के अलावा किसी ने सवाल किया? उन्होंने (मोदी) इसके ख़िलाफ़ एक शब्द भी नहीं कहा। हमसे पूछा गया कि मनमोहन सिंह चुप क्यों थे? शीला दीक्षित चुप क्यों थी? श्रीमती गाँधी ने हवाई अड्डे पर निर्भया की अगवानी की। कठुआ के लिए क्या किया गया?”

कॉन्ग्रेस के पैनलिस्ट यह भूल गए कि 2014 में, कॉन्ग्रेस सत्ता पक्ष थी, न कि विपक्ष। इसलिए, नीतिगत पक्षाघात और भ्रष्टाचार के आरोपों से संबंधित सवाल ‘विपक्ष’ पर नहीं, बल्कि वास्तव में पार्टी को सत्ता में लाने के लिए थे। इसके बाद शमा मोहम्मद क्रूर बलात्कार के मामलों का राजनीतिकरण करती हैं और वो दोनों मामलों की तुलना करने से भी नहीं चूकतीं।

शमा मोहम्मद ने उत्तर भारतीय राज्यों में कॉन्ग्रेस के ख़राब प्रदर्शन की वजह दक्षिण भारत के लोगों की तरह शिक्षित नहीं होना बताया था। इससे यह बात साफ़ है कि वो उत्तर भारत के लोगों को दक्षिण भारत के लोगों से कमतर समझती हैंं।

36 दलों के नेताओं ने दिल्ली पहुँच BJP का किया समर्थन, ₹100 लाख करोड़ निवेश का लिया संकल्प

मतगणना से ठीक पहले राजग के सभी घटक दलों ने एक मंच पर आकर शक्ति प्रदर्शन किया है। इन दलों में उत्तर-पूर्व के वो दल भी शामिल हैं, जिन्होंने राजग के समर्थन से मोर्चा (नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस) बनाया हुआ है। राजधानी दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी सहयोगी दलों के लिए होटल अशोक में डिनर का आयोजन किया, जिसमें 36 राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने शिरकत की। 3 अन्य पार्टियों ने पत्र भेज कर समर्थन जताया। इस बैठक में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी सम्मिलित हुए। बैठक के दौरान प्रधानमंत्री के पिछले पाँच वर्षों के कार्यकाल की प्रशंसा की गई और सभी दलों ने राजग सरकार की योजनाओं को लेकर संतुष्टि जताई। एग्जिट पोल्स में राजग को बहुमत मिलता दिख रहा है।

पहले कहा जा रहा था कि इस बैठक में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे शामिल नहीं होंगे लेकिन भाजपा ने शिवसेना, जदयू और अकाली दल, तीनों बड़े घटक दलों के अध्यक्षों की मौजूदगी से यह जताने की कोशिश की कि राजग में सब कोई साथ हैं। नीतीश कुमार, उद्धव ठाकरे और प्रकाश सिंह बादल की मौजूदगी से भाजपा को आत्मबल मिला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि राजग गठबंधन भारत की विविधता का प्रतीक है और उसका सम्मिलित अजेंडा भारत का विकास है। पीएम ने क्षेत्रीय आकांक्षाओं की पूर्ति करते हुए राष्ट्र के विकास की बात कही। राजनाथ सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बैठक में चर्चा की गई बातों की जानकारी दी।

राजग की बैठक में कई संकल्प लिए गए, जिसे भाजपा की आधिकारिक वेबसाइट पर ‘संकल्प पत्र‘ के रूप में जारी किया गया। संकल्प पत्र में कहा गया कि विपक्षी दलों के शासनकाल के दौरान आतंकी हमले और इनकी पुनरावृत्ति इतिहास बन कर रह गई है। मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकी घोषित किए जाने वाले निर्णय को लेकर भी राजग गठबंधन ने ख़ुद की पीठ थपथपाई। संवैधानिक संस्थाओं पर विपक्ष द्वारा हमले किए जाने को लेकर चिंता जताई गई। गठबंधन ने पश्चिम बंगाल और केरल हुई राजनीतिक हिंसा की निंदा की। इस संकल्प पत्र में कहा गया है:

“आने वाले वर्षों में, हमने इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में 100 लाख करोड़ रुपए की पूंजी निवेश की योजना बनाई है, जिसमें 25 लाख करोड़ रुपए खेती और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए समर्पित होंगे। हम चाहते हैं कि भारत तेजी से विकास के लिए आधुनिक और पर्याप्त बुनियादी ढाँचे के साथ दुनिया में सबसे बड़ा स्टार्ट-अप इको-सिस्टम बन जाए। इन क़दमों के साथ भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है।”

राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि अगर राजग को अपने दम पर बहुमत नहीं मिलता है तो ओडिशा में बीजद, आंध्र में आईएसआर और तेलंगाना में टीआरएस जैसी पार्टियाँ भाजपा को अपना समर्थन दे सकती हैं। फोनी तूफ़ान के बाद हुए राहत कार्यों की समीक्षा के दौरान ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और पीएम मोदी के बीचा अच्छी केमिस्ट्री देखने को मिली थी। तेलंगना के मुख्यमंत्री केसीआर ने अभी तक कॉन्ग्रेस को समर्थन नहीं दिया है और वह तीसरे मोर्चे की ही वकालत करते रहे हैं। आंध्र में बड़ी ताक़त बन कर उभरे जगन मोहन रेड्डी द्वारा शरद पवार का फोन कॉल न उठाया जाना भी चर्चा का विषय है।

‘Tit For Tat’ होगा, एकदम तैयार हैं: कुशवाहा के ख़ून बहाने की धमकी पर बोले रामविलास पासवान

लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान ने पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा के बिगड़े बोल पर प्रतिक्रया देते हुए कहा, “जैसे को तैसा।” रामविलास पासवान और राजनाथ सिंह राजग के 36 घटक दलों की बैठक बाद हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस को सम्बोधित कर रहे थे। एक न्यूज़ चैनल के रिपोर्टर ने जब केंद्रीय उपभोक्ता मामले मंत्री रामविलास पासवान से ‘विपक्ष द्वारा हिंसा फैलाने की साज़िशों’ को लेकर सवाल पूछा तो रामविलास पासवान ने कहा कि वे भी तैयार हैं। पासवान ने फिर मज़ाकिया अंदाज़ में कहा कि राजग के नेता भी मिठाई और फूल लेकर जीत की ख़ुशी मनाने के लिए तैयार बैठे हैं। जब रामविलास पासवान ये बातें बोल रहे थे, तब केंद्र गृह मंत्री राजनाथ सिंह उनका हाथ थामे खड़े थे।

बता दें कि रालोसपा अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने मंगलवार (मई 22, 2019) को धमकी भरे अंदाज़ में कहा था कि लोगों में इस समय आक्रोश है और ऐसे में अगर ‘रिजल्ट लूटने’ की घटना हुई तो सड़कों पर खून बहेगा। उन्होंने अपने समर्थकों से हथियार उठाने के लिए तैयार रहने को भी कहा है। साथ में उन्होंने कहा था कि अगर ऐसी कोई हिंसा होती है तो उसके लिए बिहार और केंद्र की सरकार जिम्मेदार होंगे। राजग की बैठक के बाद विपक्षी नेताओं की तरफ़ से आ रहे ऐसे ही बयानों को लेकर दोनों केंद्रीय मंत्रियों (रामविलास पासवान और राजनाथ सिंह) से सवाल पूछे गए।

ज्ञात हो कि राजधानी दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी सहयोगी दलों के लिए होटल अशोक में डिनर का आयोजन किया, जिसमें 36 राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने शिरकत की। 3 अन्य पार्टियों ने पत्र भेज कर समर्थन जताया। इस बैठक में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी शामिल हुए। बैठक के दौरान प्रधानमंत्री के पिछले पाँच वर्षों के कार्यकाल की प्रशंसा की गई और सभी दलों ने राजग सरकार की योजनाओं को लेकर संतुष्टि जताई।

रामविलास पासवान बिहार में भाजपा के अहम सहयोगी हैं। राज्य में भाजपा ने चुनाव से पहले नीतीश कुमार की जदयू और पासवान की लोजपा के साथ सीटों का समझौता सफलतापूर्वक पूरा किया। उपेंद्र कुशवाहा ने 4 वर्ष सरकार में शामिल होकर अंत में राजग से किनारा कर लिया। वह अभी बिहार में विपक्षी गठबंधन का हिस्सा हैं। पाँच पार्टियों की इस गठबंधन में कॉन्ग्रेस, राजद, वीआईपी, हम (HAM) और रालोसपा शामिल हैं। एग्जिट पोल में राजग एक बड़ी जीत की ओर बढ़ रही है, जबकि महागठबंधन चारों खाने चित हो जाएगा।

‘माँ’ की लाश, बगल में 1 साल की बच्ची और 4 दिन की ‘जंग’: चमत्कार है गुड़िया का बचना

बागपत के अस्पताल में भर्ती एक साल की गुड़िया का जीवन किसी वरदान से कम नहीं। बच्ची के सिर पर पट्टी बँधी है। वो पिछले चार दिनों से भूख-प्यास की जंग जीतकर अस्पताल तक लाई गई। इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के अनुसार, इस बच्ची को अस्पताल में लाए हुए चार दिन हो गए हैं। इसकी माँ कौन है, नहीं पता। यह बच्ची खुद कौन है, नहीं पता। कहानी बहुत मार्मिक है इस बच्ची की।

उत्तर प्रदेश के बागपत के एक खेत में एक महिला की लाश मिली। लाश चार दिन पुरानी, सड़ी-गली। लाश के पास ही यह एक साल की बच्ची चार दिनों तक भूख-प्यास से लड़ती रही। इस बीच दो दिनों की बारिश भी झेली, बादलों की गर्जना भी। अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि मृतका शायद इस बच्ची की माँ है। पुलिस के अनुसार, बच्ची और माँ पर किसी नुकीली चीज से हमला किया गया था।

ख़बर के अनुसार, जब मृतका का शरीर सड़ने-गलने लगा, बारिश थम गई लेकिन भूख-प्यास हावी हुआ तो यह बच्ची रेंगते हुए, माँ का मोह छोड़ते हुए खेत से बाहर एक मंदिर के पास जा पहुँची। यहाँ कुछ भक्तों की नज़र इस बच्ची पर गई। उन्होंने पुलिस को इसकी सूचना दी और बच्ची को अस्पताल तक पहुँचाया।

फ़िलहाल, बच्ची और माँ की पहचान का ख़ुलासा नहीं हो सका है, इसलिए अस्पताल के कर्मचारियों ने इस मासूम बच्ची को ‘गुड़िया’ नाम दे दिया। बड़ौत पुलिस स्टेशन की महिला कॉन्स्टेबल, रेखा नागर को इस बच्ची की देखभाल का ज़िम्मा सौंपा गया है।

रेखा नागर ने बताया, “मैं सुबह लगभग 10 बजे आती हूँ और रात को 9 बजे तक जाती हूँ। गुड़िया एक बहादुर और प्यारी बच्ची है। वह बच गई है और हम सभी उम्मीद कर रहे हैं कि वह बेहतर हो जाएगी। गुड़िया को पहले दिन लाने के बाद से उसकी स्थिति में सुधार हुआ है।” रेखा नागर खुद भी माँ हैं। उनका एक 5 साल का बच्चा भी है।

बागपत के आस्था मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल के डॉक्टरों ने बताया कि गुड़िया के माथे के बाएँ हिस्से में किसी नुकीली चीज से चोट के कारण घाव हो गया था। आस्था अस्पताल के डॉक्टर अजय गर्ग ने कहा, “हमने एक सीटी स्कैन किया और पाया कि बच्ची की सिर की हड्डी की संरचना को भी नुकसान पहुँचा है। यह एक प्रकार की चोट है, जिसे देखकर लगता है कि उसके सिर पर चोट की गई हो। सिर के घाव में संक्रमण के कारण, हम उसमें टाँके नहीं लगा सके। लेकिन, हमे उम्मीद है कि चोट जल्द ठीक हो जाएगी।”

इसके अलावा डॉक्टरों ने यह बताया कि बच्ची के शरीर में कीड़ों की वजह से संक्रमण हो गया था। नर्सों के अनुसार, वह भर्ती होने के बाद कई घंटों तक बेहोश रही और जागने के तुरंत बाद वह दूध और पानी की पूरी बोतल पी गई। इससे पता चलता है कि वो बहुत भूखी-प्यासी थी। डॉक्टरों ने बच्ची के घाव को ठीक करने के बाद एंटीबायटिक दवाओं का इस्तेमाल करके फैले संक्रमण का इलाज करने की योजना बनाई है, क्योंकि कीड़ों की वजह से गुड़िया को काफी नुकसान पहुँचा है।

कई लोग इस मासूम बच्ची को गोद लेना चाहते हैं। इसके लिए वो बाल कल्याण आयोग से भी संपर्क कर रहे हैं।

पुलिस की तमाम कोशिशों के बावजूद मृतका और बच्ची की पहचान का ख़ुलासा अब तक नहीं हो सका है। पुलिस ने अपनी कोशिशों में 25 गाँवों में पूछताछ की और ग्राम प्रधानों को महिला की तस्वीर भी दिखाई बावजूद इसके उन्हें कोई क़ामयाबी नहीं मिल सकी। दिल्ली से दो व्यक्ति एक बच्चे के बारे में पूछ रहे थे, लेकिन गुड़िया उनके बताए विवरण से मेल नहीं खाती है। महिला की हत्या की जाँच करने वाले अधिकारी धर्मेंद्र संधू ने बताया कि स्थानीय मीडिया, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पुलिस के व्हाट्सएप ग्रुपों पर बच्ची के संबंध में संदेश भेजे गए हैं। ताकी जल्द से जल्द इनकी पहचान उजागर हो सके।

पंजाब के 5 मंत्रियों ने सिद्धू पर बोला हमला, आलाकमान ले सकता है कड़ा फैसला

पंजाब की सभी सीटों पर रविवार (मई 19, 2019) को लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण के तहत मतदान हुआ। सिद्धू द्वारा सीधा पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह पर निशाना साधना उन्हें भारी पड़ सकता है क्योंकि पार्टी की पंजाब प्रभारी आशा कुमारी ने प्रदेश कॉन्ग्रेस से सिद्धू को लेकर रिपोर्ट माँगी है। कहा जा रहा है कि अधिकतर नेता मुख्यमंत्री अमरिंदर के साथ हैं। गुरदासपुर से सनी देवल के ख़िलाफ़ कड़े चुनावी युद्ध में फँसे प्रदेश अध्यक्ष बलराम जाखड़ चुनावी प्रक्रिया से फ्री होते ही रिपोर्ट तैयार करेंगे। बता दें कि कम्प्टन अमरिंदर सिंह ने नवजोत सिंह सिद्धू पर महत्वाकांक्षी होने और उनको अपदस्थ कर के ख़ुद मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रखने का आरोप लगाया था।

पंजाब कॉन्ग्रेस के दो शीर्ष नेताओं के इस झगड़े में पार्टी को नुकसान उठाना पड़ रहा है। लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद इस सम्बन्ध में हाईकमान आगे की कार्रवाई कर सकता है। पंजाब के ग्रामीण विकास मंत्री तृप्त राजिंदर सिंह बाजवा ने नवजोत सिंह सिद्धू से दो टूक कहा है कि अगर वह कैप्टन के अंतर्गत कार्य करने में असमर्थ हैं तो उन्हें मंत्रिमण्डल से इस्तीफा दे देना चाहिए। उन्होंने कहा कि सिद्धू अगर कैप्टन को नेता नहीं मानते तो इस्तीफा दें। बाजवा ने कहा कि सिद्धू को जब पता ही नहीं है कि जहाज का कप्तान कौन है, तो उन्हें मंत्रिमंडल से निकाल बाहर किया जाए।

बाजवा सिद्धू पर निशाना साधने वाले पंजाब कैबिनेट के पाँचवें मंत्री हैं। उनसे पहले पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री ब्रह्मा मोहिंद्रा ने राज्य के पर्यटन मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू पर निशाना साधते हु पार्टी हाईकमान से उन पर कार्रवाई करने की माँग की थी। मंत्री मोहिंद्रा ने सिद्धू पर पीठ में छुरा घोपने का आरोप लगाते हुए कहा कि वह बेवक़्त बयान देते जा रहे हैं। उन्होंने सिद्धू के बारे में कहा कि वो सिर्फ़ 2 सालों से ही कॉन्ग्रेस में हैं और अपना नियम झाड़ते हुए अपना अजेंडा लागू करना चाह रहे हैं। मोहिंद्रा के अलावा ख़ुद कैप्टेन और पंजाब मंत्रिमंडल के उनके अन्य साथी भी सिद्धू की आलोचना कर चुके हैं।

ये सब विवाद तभी से चला आ रहा है जब पंजाब के पर्यटन मंत्री सिद्धू की पत्नी नवजोत कौर ने मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह पर उनका टिकट काटने के आरोप लगाया था। बाद में सिद्धू ने अपनी पत्नी के बयान का समर्थन किया था। नवजोत सिंह सिद्धू पर हमला बोलते हुए मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने कहा था, “सिद्धू मेरी जगह सीएम बनना चाहते हैं। सिद्धू कॉन्ग्रेस की छवि बिगाड़ रहे हैं, पार्टी को उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी चाहिए। अगर वह असली कॉन्ग्रेसी होते तो वह अपनी शिकायतों के लिए पंजाब चुनाव का वक्त नहीं चुनते।

अभी हाल ही में आवाज़ जाने के ख़तरों के कारण सिद्धू अस्पताल में भर्ती थे जब 70 से अधिक चुनावी सभाओं को सम्बोधित करने के कारण उनकी स्वर तंत्रिका को नुकसान हुआ था। बाजवा ने सिद्धू की आलोचना करते हुए आगे कहा, “अगर वो सच में कॉन्ग्रेसी होते तो उन्होंने अपनी शिकायतों को सार्वजनिक करने का बेहतर समय चुना होता। उन्होंने पंजाब में मतदान से ठीक पहले ये बातें कही। ये सिर्फ़ उनका नहीं बल्कि पूरे कॉन्ग्रेस का चुनाव है। कॉन्ग्रेस अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं करती।” पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने भी सिद्धू को ‘कॉन्ग्रेस की संस्कृति’ समझने की सलाह दी।

बंगाल में चुनाव बाद भी हिंसा का दौर जारी, BJP ने राज्यपाल से मिल की सेना तैनात करने की माँग

लोकसभा चुनाव के अंतर्गत सातों चरण के चुनाव ख़त्म होने के बावजूद पश्चिम बंगाल में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। सातवें चरण के मतदान के दिन हुई कई हिंसक वारदातों के बाद अभी भी वहाँ राजनीतिक हिंसा का दौर थमता नहीं दिख रहा है। रविवार (मई 19, 2019) को भाटपारा विधानसभा क्षेत्र में मतदान हुआ। इसके अंतर्गत आने वाले कांकिनारा में रेल सेवा को बाधित किया गया। यहाँ तृणमूल कॉन्ग्रेस और भाजपा के कार्यकर्ताओं के बीच तीखी झड़प हुई, जिसके बाद सियालदह डिवीजन में रेल सेवा बाधित किए जाने के बाद यात्रियों में अफरातफरी का माहौल रहा। इतना ही नहीं, कांकिनारा रेलवे स्टेशन परिसर में क्रूड बम भी फेंके गए।

सबसे बड़ी बात तो यह कि पहले से ही प्रशासन को अलर्ट पर रखे जाने के बावजूद हिंसा की ये वारदातें हुईं। इसके अलावा विधाननगर विधानसभा के अंतर्गत सॉल्टलेक और दक्षिण 24 परगना जिले में भी तृणमूल और भाजपा समर्थक आपस में भिड़े। इस संघर्ष में भाजपा के कई कार्यकर्ताओं के घायल होने की सूचना है। इसके अलावा रविवार को भी भाजपा के 4 पोलिंग एजेंटों पर हमला किया गया था। शराब के नशे में धुत हमलावरों ने घर में घुस कर बेख़ौफ़ तोड़फोड़ मचाया और धारदार हथियारों से हमला भी किया। इस घटना के पीछे पीड़ितों ने तृणमूल कॉन्ग्रेस का हाथ बताया है।

एक अन्य घटना बासंती स्थित चड़विद्या में घटी। यहाँ तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों ने बबलू नामक भाजपा कार्यकर्ता को निशाना बनाया। हमले में बबलू बाल-बाल बच गए। पड़ोसियों के पहुँचने के बाद हमलावर बाइक छोड़ भाग खड़े हुए। भाजपा कार्यकर्ता बबलू का अस्पताल में इलाज चल रहा है। बंगाल भाजपा के अध्यक्ष दिलीप घोष की अध्यक्षता में एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी से राज्य में सेना तैनात करने की माँग की। इस मुलाक़ात के बाद घोष ने कहा:

“तृणमूल कॉन्ग्रेस ने जिस तरह से अपने गुंडों को खुला छोड़ रखा है, उससे तो लगता है कि वे बंगाल में अराजकता का माहौल बनाना चाहते हैं। यदि ऐसी स्थिति जारी रही तो केंद्र को स्थिति नियंत्रित करने के लिए तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए। यदि ज़रूरत पड़े तो भाटपारा में सेना बुलाई जाए। पुलिस तो तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं के रूप में कार्य कर रही है। इस मामले पर राज्यपाल ने हमारी माँगों को सुना है और इन्हें देखने का भरोसा भी दिया है। न केवल भाटपारा बल्कि उत्तर बंगाल के कई हिस्सों में तृणमूल कॉन्ग्रेस हमारे खिलाफ हिंसा कर रही है।”

उधर तृणमूल के वरिष्ठ नेता डेरेक ओ ब्रायन ने चुनाव आयोग से पूछा है कि क्या केंद्रीय बलों को राज्य में एक सप्ताह अतिरिक्त रखने का निर्णय आपातकाल लगाने के लिए लिया गया है? राज्यसभा सांसद डेरेक ने कहा कि बंगाल के लिए विशेष नियम बनाए जा रहे हैं और यह उनके लिए स्वीकार्य नहीं है। भाजपा द्वारा कई मतदान केंद्रों पर दुबारा मतदान कराने की माँगों के बीच डेरेक ने केंद्रीय बलों के वेश में भाजपा और संघ कार्यकर्ताओं के होने की बात दुहराई। भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि ममता सरकार भाजपा प्रत्याशी अर्जुन सिंह का एनकाउंटर करवा सकती है। उन्होंने कहा कि सिंह की जान को ख़तरा है और उन्हें कुछ भी नुकसान होता है तो इसकी ज़िम्मेदार बंगाल की मुख्यमंत्री ख़ुद होंगी।

RISAT-2B: आतंकियों पर नजर के लिए तीसरी आँख, ISRO की बड़ी कामयाबी

खुफिया निगरानी, कृषि, वन और आपदा प्रबंधन में सहयोग जैसे क्षेत्रों के लिए इसरो ने सुबह साढ़े पाँच बजे श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से RISAT-2B लॉन्च किया। हर तरह के मौसम में काम करने की क्षमता वाले रडार इमेजिंग पृथ्वी निगरानी उपग्रह को प्रक्षेपण यान पीएसएलवी-सी46 के जरिए भेजा गया। RISAT-2B को पृथ्वी की निचली कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट) में स्थापित किया गया।

RISAT-2B उपग्रह का भार 615 किलोग्राम है। इस उपग्रह की खूबी है – सिंथेटिक अपर्चर रडार (synthetic aperture radar) – जिसके कारण यह किसी भी मौसम में काम करता रहेगा, निगरानी रखता रहेगा। RISAT-2B में पूर्णतः स्वदेशी विक्रम प्रोसेसर लगा हुआ है।

RISAT-2B अपने प्रक्षेपण के 15वें मिनट के बाद 555 किलोमीटर के सर्कुलर ऑर्बिट में 37 डिग्री के झुकाव पर सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया गया। यह उपग्रह अगले 5 साल तक के लिए काम करेगा।

पीएसएलवी की बात करें तो यह इस प्रक्षेपण यान का 48वाँ मिशन था। साल 2019 में इसरो द्वारा यह तीसरा प्रक्षेपण है। अभी तक 350 उपग्रहों के जरिए PSLV प्रक्षेपण यानों से 50 टन का पेलोड अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक भेजा जा चुका है – जो एक रिकॉर्ड है।

इसरो के प्रमुख के शिवन ने RISAT-2B के सफल प्रक्षेपण पर खुशी जताई। उन्होंने इसे ‘बहुत बहुत महत्वपूर्ण’ बताया। आपको बता दें कि प्रक्षेपण से पहले उन्होंने तिरूपति के प्रसिद्ध भगवान वेंकटेश्वर मंदिर में पूजा अर्चना भी की। RISAT-2B के बाद, इसरो चंद्रयान-2 पर काम करेगा, जिसका 9 से 16 जुलाई के बीच प्रक्षेपण का कार्यक्रम है।

यूट्यूब पर लोग KRK, दीपक कलाल और रवीश को ही देखते हैं और कारण बस एक ही है

KRK यानी, कमाल रशीद खान बॉलीवुड से लेकर भोजपुरी फिल्मों का एक बेहद जाना-पहचाना नाम है। कुछ साल पहले ही दीपिका पादुकोण के ‘माय लाइफ माय रूल्ज़’ के जवाब में KRK ने अपने विचार पेश किए थे। इन विचारों को जानने की लोगों में इतनी उत्सुकता रही कि लोगों ने जा-जाकर KRK को यूट्यूब पर तलाशा और उनको सब्स्क्राइब करने लगे। इतना ही नहीं, KRK के रोचक और महीन जानकारियों से भरपूर फिल्म रिव्यु देखने वालों का भी एक बड़ा फैन वर्ग है। फिल्म रिलीज बाद में होती है और दर्शक रिव्यु के लिए KRK के पास
पहले पहुँच जाते हैं।

फिल्म रिव्यु के मामले में KRK को एक ही बार ट्रैफिक और TRP से जूझना पड़ा था, जब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल नए-नवेले मुख्यमंत्री हुआ करते थे। लेकिन फिर अरविन्द केजरीवाल को जबसे सड़कों पर कंटाप पड़ने लगे उन्होंने फिल्म रिव्यु देने ही बंद कर दिए और KRK के यूट्यूब पर आने वाले ट्रैफिक में जबरदस्त बढ़ोत्तरी देखने को मिली।

KRK के बाद यूट्यूब पर दीपक कलाल नाम के एक सज्जन को भी देखने के लिए लोग खूब दैनिक इंटरनेट का हिस्सा खर्च करते हैं। इस प्रकार यह तय कर पाना भी एक बड़ा चैलेंज है कि यूट्यूब पर आखिर किसके लिए लोग ज्यादा दीवाने हैं, KRK या फिर दीपक कलाल?

… लेकिन मैदान में अब एक और सिपाही भी है

अम्बानी द्वारा दिए जा रहे दैनिक सस्ते इंटरनेट का लाभ उठाते हुए कई लोगों ने आजकल ना जाने कितनों की ही आत्ममुग्धता में चार चाँद लगाए हैं। इनमें कुछ कॉन्ग्रेस द्वारा मोदी की इमेज की धज्जियाँ उड़ाने के लिए रखे गए कुणाल कामरा जैसे सस्ते कॉमेडियंस हैं, तो कुछ इंटरनेट ट्रोल और आम आदमी पार्टी के प्रोपेगैंडा मंत्री ध्रुव राठी जैसे ‘फैक्ट एंड फिगर्स’ में बात कर के विश्वसनीयता साबित कर चुके लोग भी हैं। मोदी घृणा में इतनी शक्ति है कि फर्जी न्यूज़ फैलाने की ध्रुव राठी की अद्भुत क्षमता को आँकते हुए NDTV और BBC जैसे निष्पक्ष मीडिया संस्थानों ने उन्हें अपना प्रोपेगैंडा पत्रकार बना लिया है।

लेकिन ये सब नए लोग हैं, इनकी आत्ममुग्धता माफ़ की जा सकती है क्योंकि ये लोग कैमरा के सामने नए आए हैं। लेकिन एक ऐसे वयस्क पत्रकार को आत्ममुग्धता ने घेर लिया है, जो दशकों से (जैसा कि उनका लेटेस्ट फेसबुक पोस्ट बताता है) रोजाना TV पर बैठकर दर्शकों से TV ना देखने की अपील करता रहता है। ये नाम है NDTV के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार।

रवीश कुमार एग्जिट पोल के दिन से ही खुद को और दूसरों का हौंसला बढ़ाते नजर आ रहे हैं। ऑपइंडिया तीखीमिर्ची सेल ने यह भविष्यवाणी कर डाली थी कि रवीश एग्जिट पोल देखकर शायद अब किसी अज्ञात गुफा की ओर ‘कुछ नहीं रखा है दुनियादारी में’ कहते हुए रवाना हो जाएँ। ऐसा ही हुआ भी। वो एग्जिट पोल के दिन से ही लोगों से लम्बी साँसे खींचकर श्वसन करने की अपील कर रहे हैं। ताकि कम से कम एग्जिट पोल और 23 तारीख के बीच के समय को तो इस वहम में गुजार सकें कि कोई मोदी लहर इस देश में नहीं है और मोदी दोबारा प्रधानमंत्री नहीं बन रहे हैं।

यूँ ही नहीं मैं जीरो TRP एंकर बन जाता हूँ

रवीश ने आज एक फेसबुक पोस्ट लिखा है और अभी उम्मीद है कि वो इसका भी विभिन्न भाषाओं में अनुवाद करवाएँगे। लेकिन मैं हिंदी का पाठक हूँ और मैने बिना चतुराई दिखाए ही इस पोस्ट को समझ लिया है। एग्जिट पोल्स के नतीजों तक को वहम मानकर चल रहे रवीश कुमार के पास अब आखिरी विकल्प यही बच गया है कि वो घर बैठकर अपनी लोकप्रियता का हिसाब लगाएँ।

इस लेख को पढ़कर ही पता चल जाता है कि यह वरिष्ठ पत्रकार ना ही विद्यार्थियों के लिए चिंतित हैं, ना ही इन्हें सत्ता पक्ष और विपक्ष से फर्क पड़ता है। यह पत्रकार संन्यासी किस्म का है, जो अब सिर्फ भाड़ में जाए दुनियादारी कहकर खुद तक सीमित हो चुका है। रवीश कुमार यहाँ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पीछे छोड़ चुके हैं। नरेंद्र मोदी को लेकर उनके कैमरा पर नजर आने को खूब मुद्दा बनाया गया है। रवीश कुमार पर इससे एक कदम आगे जाते हुए अपने यूट्यूब चैनल्स के व्यूज तलाशने का जुनून सवार हो चुका है। लेकिन जिस पत्रकार को देशवासियों ने सर पर बिठाया था, जिसे लोग TV पर देखने को उत्साहित रहते थे, वो पत्रकार अपनी पहचान यूट्यूब में क्यों समेट रहा है?

रवीश का कहना है कि EVM पर उनके शो को यूट्यूब पर जमकर देखा जा रहा है। उन्हें यह ध्यान देना चाहिए कि यूट्यूब पर KRK और दीपक कलाल को भी खूब देखा जाता है। इस तरह से अब तीन लोग यूट्यूब पर अम्बानी द्वारा दिए जा रहे दैनिक सस्ते इंटरनेट से जमकर देखे जाएँगे; KRK, दीपक कलाल और वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार।

इन तीनों में एक बात कॉमन है, लोग इन तीनों को करतब दिखाते देखना पसंद करने लगे हैं। लोग इन्तजार करते हैं कि कब ये तीनों कोई नया करतब दिखाएँ और वो सब वाह-वाही करते हुए इनके मजे लूट सकें। रवीश कुमार अब व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी के कुलपति होने के साथ-साथ ट्रोलाचार्य भी हो चुके हैं। अब उन्हें कला दिखाते रहना होगा वरना वो भुला दिए जाएँगे। वो उसी तरह से भुला दिए जाएँगे जिस तरह से उन्होंने रवीश को भुला दिया।

रवीश कुमार का त्याग बड़ा है, उन्होंने ट्रोलाचार्य बनने के लिए ‘रवीश की रिपोर्ट’ वाले रवीश को नकार दिया। रवीश ने उस रवीश की केंचुली को सिर्फ इसलिए उतार फेंका है क्योंकि वो अब घृणा में बहुत दूर निकल चुके हैं। रवीश कुमार की पत्रकारिता में विश्वास करने वाला मेरे जैसा दर्शक उनको यूट्यूब पर अपने व्यूज पर खुश होता देख निराश है।

वास्तव में देखा जाए तो रवीश के प्रशंसक का प्रेम में धोखा खाए प्रेमी जैसा हाल है। प्रेमिका अब बदल चुकी है, उसे प्रेमी के साथ कुछ भी अच्छा नहीं लगता। अब प्रेमी दफ्तर से छुट्टी लेकर प्रेमिका को लाजपत नगर में शॉपिंग करवाना चाहता है, लेकिन प्रेमिका को सरोजिनी नगर ही जाना है। रवीश कुमार की पत्रकारिता ने उनके प्रशंसकों के साथ ऐसा धोखा किया है, जिससे उनका प्रेमी प्रशंसक अब उबर नहीं पाएगा और ना ही किसी और खुदको पत्रकार कहने वाले पर यकीन कर पाएगा।

रवीश अब अपने दर्शकों से लगभग ब्रेकअप को उतारू प्रेमिका की तरह ब्लॉक करने लगे हैं, वो कहने लगे हैं कि तुम्हारी ही सब गलती थी, तुमने मुझे TRP नहीं दी, तुमने मेरे एजेंडा को प्राथमिकता नहीं माना। जब मुझे तुम्हारी जरूरत थी, तब तुम देशभक्त हो गए।

रवीश कुमार पत्रकारिता की निराशा हैं। उन्हें जो यूट्यूब व्यूज के नंबर अपनी प्रशंसा लग रही है असल में ये वो लोग हैं जो रवीश कुमार का चेहरा देखना चाहते हैं। लाख बार EVM को कोसने और फासीवाद, लोकतंत्र की हत्या, गोदी मीडिया, बिकाऊ मीडिया चिल्लाने के बाद भी एग्जिट पोल ने उन्हें नकार दिया है। यदि 23 तारीख को एग्जिट पोल वाली भविष्यवाणी सच साबित होती है तो अभी रवीश के यूट्यूब चैनल्स के व्यूज और उछाल मारने वाले हैं।

23 मई को रवीश कुमार को देखने उनका एक एक समर्थक, आलोचक और विरोधी उनको देखना चाहेगा। इसलिए हो सकता है कि वो आँकड़े रवीश कुमार को चौंका दें। सम्भावना यही हैं कि असल ट्रैफिक जीरो टीआरपी एंकर के यूट्यूब चैनल पर 23 मई को आने वाला है, आप कमर कसकर बैठ जाइए। हो सकता है कि 23 मई की शाम तक रवीश कुमार के पास गर्व करने के लिए कम से कम यूट्यूब पर देखे जाने वाले आँकड़े तो होंगे।

अशोक लवासा: कॉन्ग्रेस घोटालों से पुराने सम्बन्ध, चुनाव आयोग के कमिश्नर हैं

इलेक्शन कमिश्नर अशोक लवासा ने पहले भी यह कहकर तूफान उठाने की कोशिश की थी कि वह इलेक्शन कमीशन ऑफ़ इंडिया के भारतीय जनता पार्टी, प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह को मॉडल कोड ऑफ़ कंडक्ट के उल्लंघन पर दिए गए क्लीन चिट के निर्णय से सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा वह तब तक चुनाव आयोग की मीटिंग अटेंड नहीं करेंगे जब तक उनकी असहमति दर्ज़ नहीं की जाती। सुनील अरोड़ा लवासा के इस कमेंट पर टिप्पणी कर चुके हैं।

अब, टाइम्स नाउ की रिपोर्ट, कि लवासा चुनाव आयोग की मीटिंग अटेंड करने के लिए सहमत हो गए हैं, लवासा की असहमति खुद संदेह के घेरे में है।

बता दें कि पूरा का पूरा कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम ने लवासा की असहमति का उपयोग यह आरोप लगाने के लिए किया कि इलेक्शन कमीशन बायस्ड है और मोदी, बीजेपी को सपोर्ट कर रही है। इससे पहले राहुल गाँधी भी अशोक लवासा के बोलने से बहुत पहले ही इलेक्शन कमीशन पर बायस्ड होने का आरोप लगा चुके हैं।

चलिए जानते हैं, कौन हैं अशोक लवासा, किसके साथ वह मीडिया में छाए रहे, नीचे उनके और उनके परिवार के बारे में कुछ विशेष खुलासे किए गए हैं।

अशोक लवासा-चिदम्बरम: खास कनेक्शन

1980 बैच के हरियाणा कैडर के आईएएस अधिकारी अशोक लवासा, जिनकी अप्रैल 2009 में पी चिदंबरम के गृहमंत्री के दौर में जॉइंट सेक्रेटरी के रूप में गृह मंत्रालय में एंट्री होती है। 2010 में ही पी चिदम्बरम ने “An Uncivil Servant” नामक अशोक लवासा की किताब का विमोचन भी किया था। इसके आलावा अशोक लवासा और उनकी पत्नी के ‘Travel photo exhibition’ का भी उद्घाटन किया था।

पी चिदंबरम अशोक लवासा और उनकी पत्नी के साथ

यह तस्वीर अभी वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है। फिर भी तस्वीर के गूगल कैशे वर्जन को यहाँ देखा जा सकता है।

PGurus वेबसाइट का दावा है कि अशोक लवासा UPA सरकार के कई मंत्रियों के चहेते हुआ करते थे। इन सम्बन्धों के बदौलत, इन्हें कई लाभ भी हासिल हुए हैं।

अशोक लवासा की पत्नी का व्यावसायिक समीकरण

अशोक लवासा वित्त मंत्रालय, विदेश मंत्रालय के अलावा हरियाणा सरकार में पावर और रिन्यूएबल एनर्जी में भी थे। अशोक लवासा की पत्नी नॉवेल लवासा ऐसी कई कंपनियों में डायरेक्टर रह चुकी हैं जो रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में काम करती है और अशोक लवासा के कार्यकाल में उनके मंत्रालय से सीधे संपर्क में थी।

PGurus के अनुसार, अशोक लवासा की वाइफ नॉवेल लवासा इंग्लिश में पोस्ट ग्रेजुएट है और 2005 में स्टेट बैंक के मैनेजर के पोस्ट से त्यागपत्र दे चुकीं हैं। उसके बाद से आईएएस ऑफिसर वाइव्स वेलफेयर एसोसिएशन के एक्टिविटीज और कुछ सोशल एक्टिविटीज को मैनेज कर रही थीं। उसके बाद कई कंपनियों में पति के अलग-अलग डिपार्टमेंट में पोस्टिंग के अनुसार डायरेक्टर बनीं।

नीचे, वह कुछ पोस्ट हैं जिन पर अशोक लवासा एक आईएएस अधिकारी के रूप में अपने कार्यकाल में कार्यरत रहे।

अशोक लवासा द्वारा धारण की गई पोस्ट

नॉवेल लवासा, बलरामपुर चीनी मिल्स प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की 6 फरवरी 2015 को डायरेक्टर बनीं। बलरामपुर शुगर मिल न सिर्फ चीनी उत्पादन नहीं बल्कि विद्युत उत्पादन के क्षेत्र में भी सक्रीय रही है।

जब अशोक लवासा की पत्नी चीनी मिल की डायरेक्टर बनीं उस समय अशोक लवासा पर्यावरण मंत्रालय में थे। नॉवेल लवासा, एक कंपनी ‘Omaz Autos Limited’ में डायरेक्टर के रूप में नियुक्त हुईं, जिसका पावर सेक्टर में भी इंटरेस्ट था।

वह एक और कंपनी पॉवेरलिंक्स ट्रांसमिशन लिमिटेड में 2 मई 2017 में डायरेक्टर के रूप में नियुक्त हुईं। कुलमिलाकर, नावेल लवासा ‘Walwhan and Welspun’ ग्रुप की 9 कंपनियों में डायरेक्टर रहीं, जो आपस में कॉमन डायरेक्टर से जुड़ी हैं। इन सभी कंपनियों का इंटरेस्ट रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में रहा है।

कामनवेल्थ गेम स्कैम से जुड़ाव

ऑपइंडिया के पास शुंगलू कमिटी का वह रिपोर्ट है जिसमें अशोक लवासा की बेटी और बेटे के अनुचित लाभ उठाने की बात कही गई है। शुंगलू कमिटी ने ये साफ बताया है कि सिलेक्शन कमिटी द्वारा अन्वी लवासा के प्रोजेक्ट ऑफिसर (PO) के रूप में चयन में उन्हें उनके पॉवरफुल संबंधों की वजह से फेवर किया गया। जिसका विस्तृत वर्णन यहाँ देखा जा सकता है।

शुंगलू कमिटी रिपोर्ट का एक भाग
शुंगलू कमिटी रिपोर्ट का हिस्सा

पहले अन्वी लवासा को APO के रूप में चुना गया, बाद में प्रमोट कर PO अर्थात प्रोजेक्ट ऑफिसर बनाया गया।

अन्वी लवासा को APO से प्रमोट कर PO बनाया गया , उसका आर्डर

इसी रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा है कि अन्वी लवासा के भाई अबीर लवासा का भी APO के रूप में चयन किया गया।

फिलहाल, अन्वी लवासा कपिल सिब्बल के चैनल के साथ एक अनुबंध के तहत अभी लद्दाख में पोस्टेड हैं।

अबीर लवासा का व्यावसायिक जुड़ाव

अबीर लवासा, अशोक लवासा के बेटे हैं। अबीर लवासा ‘Nourish Organic Foods Private Limited’ कंपनी में 14th November 2017 को डायरेक्टर बने। वहाँ के सूत्रों से ऑपइंडिया को पता चला कि अबीर की नियुक्ति जब हुई थी, ठीक उसी समय दो दूसरे डायरेक्टर्स नरेश कुमार और सीमा जाजोदिया ने कंपनी से त्यागपत्र दे दिया।

यह जानना महत्वपूर्ण है यहाँ सीमा जाजोदिया मोनेट इस्पात से जुड़ी हैं जिस पर 1000 करोड़ रुपए के डिफ़ॉल्ट का आरोप है। SBI के अनुसार, कुल 2243 करोड़ रुपए का स्टील कंपनी द्वारा क्लेम किया गया था जबकि, यह डिफ़ॉल्ट केवल 1539 करोड़ का था।

सीमा जाजोदिया का विवाह मोनेट इस्पात एंड एनर्जी के प्रमोटर संदीप जाजोदिया के साथ हुआ है।

द टेलीग्राफ के अनुसार, “सीमा जजोदिया, जिन्हें मोनेट इस्पात के प्रमोटर के रूप में भी सूचीबद्ध किया गया था, ने 24 अक्टूबर को उपहार के रूप में अपने शेयरों को हस्तांतरित किया लेकिन कंपनी ने 27 जनवरी को ही बाउंस होने की सूचना दी। क्योंकि मोनेट के लिए बिड 12 दिसंबर को बंद कर दी गई थी। यह तुरंत पता नहीं लगाया जा सका है कि जब जाजोदिया को बोनेट्स द्वारा मोनेट के प्रमोटर के रूप में घोषित किया गया था। भूषण स्टील के कर्मचारियों द्वारा दायर एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें JSW स्टील एक आवेदक था, ने दावा किया था कि मोनेट में जाजोदिया द्वारा शेयरों का हस्तांतरण एंटीडेटेड था।

मूल रूप से यह आरोप था कि सीमा जाजोदिया ने अपने भाई के जेएसडब्ल्यू स्टील को इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 की धारा 29 ए के तहत यह स्पष्ट करने में सक्षम बनाने के लिए मोनेट इस्पात और ऊर्जा को “एंटीडेट” में अपने शेयर हस्तांतरित कर दिए थे। कारण था, बिना ऋण चुकाए स्ट्रेस एसेट्स से कंपनी को बचाना।

आरोप यह भी है कि नौरिश ऑर्गेनिक फूड्स प्राइवेट लिमिटेड में वर्तमान निदेशक नाम के निदेशक हैं और कंपनी का पूरा नियंत्रण अबीर लवासा के पास है।

बोनिता ट्रेडर्स प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी द्वारा बड़ी संख्या में नूरिश के शेयर कथित तौर पर रखे गए हैं। अबीर लवासा को नौरिश में निर्देशक के रूप में नियुक्त करने से ठीक पहले सीमा जाजोदिया और निकिता जाजोदिया को बोनिता ट्रेडर्स प्राइवेट लिमिटेड में निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया था।

वास्कोडिगामा की वो गन जो विपक्ष ने अपना नाम लेकर फायर किया (भाग 3)

विकास का नैरेटिव, विकास जो लोगों को दिखता है

एक लोकतंत्र जब आगे बढ़ रहा होता है, जब उसके लोगों तक सूचनाओं को पाने का तरीक़ा बदलता है, तो लोग जागरूक होने लगते हैं। जब आपके पास सिर्फ़ टीवी या अख़बार का ही विकल्प हो तो आप उसी झूठ को सच मानते रहेंगे क्योंकि आपके पास कोई तरीक़ा है ही नहीं सच जानने का। स्मार्टफ़ोन और इंटरनेट के सस्ते होने का सबसे बड़ा फायदा जनता को यह हुआ कि वो हर सूचना पा सकती थी। उसके हाथों में एक ऐसा ग़ज़ब का यंत्र था जो सही मायनों में सूचना का लोकतांत्रीकरण कर रहा था। वो घर बैठे, विडियो, ऑडियो या पाठ्य के ज़रिए जान सकती थी कि कौन सच कह रहा है, कौन झूठ।

यहाँ पर भाजपा और मोदी ने न सिर्फ़ काम किया बल्कि लोगों को जागरूक भी करते रहे कि किस योजना का लाभ कैसे लिया जाए। हर व्यक्ति पर सरकार लगभग 1,08,000 रुपए प्रति वर्ष ख़र्च कर रही है। और, ऐसा पहली बार हो रहा है कि बिना किसी दलाली आदि के सब्सिडी के पैसे लोगों के खाते में पहुँच रहे हैं। ये मामूली बात नहीं है। योजनाओं की जानकारी पहले मुखिया तक आकर बंद हो जाती थी। अगर आपको जानना है तो जिला मुख्यालय जाइए तो वहाँ बड़े-बड़े पीले बोर्ड पर काले अक्षरों में योजनाओं के नाम हुआ करते थे। किसको मिलेगा, कैसे मिलेगा ये तो बाद की बात है, आपके लिए योजना है, आपको वही पता नहीं चलने दिया जाता था।

वो बात जो पूरी तरह से बकवास है: योजना का नाम बदल दिया

योजनाओं के बारे में पहले खूब माहौल बना कि भाजपा ने तो बस नाम बदल दिया है, ये योजनाएँ तो कॉन्ग्रेस के समय से ही थीं। माहौल बनाना हो तो आप राहुल गाँधी को डिफ़ेंड करते हुए कहलवा सकते हैं कि विपक्ष को मीडिया में जगह नहीं मिली जबकि आधी से ज़्यादा मीडिया स्वयं ही विपक्ष बनी बैठी थी। योजनाएँ बना देने, और किसी महिला को जीवन में शौचालय का उपहार पहुँचा देने में बहुत अंतर है।

वित्तीय समावेषण के नाम से योजना बना देने, और ग़रीबों को बैंकिंग सिस्टम से जोड़ कर, उनके खाते में मनरेगा से लेकर सिलिंडर की सब्सिडी तक का पैसा पहुँचा देने में बहुत अतंर है। योजना बना देने और राजीव गाँधी का नाम लगा देने तथा घरों में बिजली पहुँचाने से लेकर एलईडी लाइट तक लगा देने में बहुत अंतर है। इंदिरा आवास लिख देने और करोड़ों के घर पर पक्की छत ढाल देने में बहुत अंतर है।

योजना ही नहीं, देश भी पहले से ही था, तो क्या काम ही न किया जाए? क्या योजना बना देने से ही काम हो जाता है? या फिर पुरानी योजना पर नए तरीके से काम करना और समाज को लाभ पहुँचाना कोई अपराध है? योजना का नाम ही नहीं, उसके क्रियान्वयन को भी मोदी सरकार ने पूरी तरह से बदला। यही कारण है कि सड़कों के बनने की रफ़्तार से लेकर रेल की पटरियों तक, इस सरकार का काम हर शहर में दिखता है। आप आँख मूँद कर गड्ढे में कूद जाएँ और कहें कि मोदी ने धक्का दे दिया, तो ये आपकी समस्या है।

वास्कोडिगामा की उस गन से इन्होंने अपना ही नाम लेकर फायर कर दिया

मीडिया और विपक्ष की सारी पार्टियों को यह लगा कि उनका ये कैम्पेन रंग लाएगा। इन्हें लगा कि भारत की आम जनता मूर्ख है और उनके द्वारा दिया जा रहा धीमा ज़हर अपना असर लोकसभा चुनावों में दिखाएगा जब इनके नेता रैलियों में लगातार रेंकेंगे। नेता रेंकते रहे, और अंत में माहौल ऐसा है कि ये सही मायनों में गधे साबित हो रहे हैं। इन्होंने अपनी ही विश्वसनीयता पर प्रहार कर लिया है। इनका प्रपंच लोगों द्वारा नकारा जा चुका है, और लोगों ने इन्हें एक सीख दे दी है कि मीडिया का काम राहुल गाँधी की भव्य छवि का निर्माण करना नहीं है, बल्कि सच को सच, और झूठ को झूठ कहना है। जबकि, मीडिया ने विपक्ष के झूठ को सच और सत्ता के सच को झूठ की तरह दिखाने की कोशिश की।

इसके बाद इन्होंने एक दो मुद्दे ऐसे पकड़े जो कि भारतीय लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। नेताओं ने ईवीएम को लेकर बयान दिए। शुरू में तो कुछ समय यह चला, लेकिन अपनी हार में मशीन को दोष और जीत में राहुल गाँधी की लीडरशिप का कमाल बताना, सबको समझ में आने लगा। लोगों को लिए यह समझना कठिन नहीं था कि अगर भाजपा ईवीएम हैक कर ही सकती है तो हर जगह दो तिहाई बहुमत क्यों नहीं ला रही? अगर ईवीएम हैक हो ही सकता है तो राज्यों के चुनाव में ममता जैसे लोग कैसे जीत जाते हैं?

इस लेख के बाकी तीन हिस्से यहाँ पढ़ें:
भाग 1: विपक्ष और मीडिया का अंतिम तीर, जो कैक्टस बन कर उन्हीं को चुभने वाला है
भाग 2: ज़मीर बेच कर कॉफ़ी पीने वाली मीडिया और लिबटार्डों का सामूहिक प्रलाप
भाग 4: लिबरलों का घमंड, ‘मैं ही सही हूँ, जनता मूर्ख है’ पर जनता का कैक्टस से हमला