उत्तराखंड सरकार में वित्त मंत्री प्रकाश पंत का लंबी बीमारी के बाद कल (जून 5, 2019) निधन हो गया। 59 वर्षीय प्रकाश ने अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ टैक्सस के अस्पताल में अपनी आखिरी साँस ली। 30 मई को उन्हें कैंसर के इलाज के लिए अमेरिका ले जाया गया था। बताया जा रहा है कि शनिवार (जून 8, 2019) शाम तक उनका पार्थिव शरीर अमेरिका से देहरादून लेकर आया जा सकता है।
Uttarakhand Finance Minister Prakash Pant passed away in US earlier today. He was undergoing treatment for lung ailment in US. pic.twitter.com/f1Q1BDV67B
पंत के निधन पर सभी राजनैतिक दलों के नेताओं ने अपना शोक जताया है। उत्तराखंड सीएम त्रिवेंद्र रावत ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए गुरुवार (जून 6, 2019) से तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया है। साथ ही इस बात की भी घोषणा की है कि गुरुवार को सभी सरकारी कार्यालय, बैंक और कोषागार बंद रहेंगे।
3 days state mourning declared in Uttarakhand after death of Finance Minister Prakash Pant. One-day public holiday declared for tomorrow https://t.co/3YpTZw6fFD
गौरतलब है कि अमेरिका जाने से कुछ दिन पहले प्रकाश पंत दिल्ली स्थित राजीव गाँधी अस्पताल के आईसीयू में भी भर्ती रहे थे। इस बीच उनकी गंभीर बीमारी के बारे में किसी को भी स्पष्ट जानकारी नहीं थी। ऐसे में उनके आकस्मिक निधन से पूरे प्रदेश में शोक की लहर है।
उत्तराखंड में मेरे वरिष्ठ सहयोगी एवं प्रदेश के वित्तमंत्री श्री प्रकाश पंत जी का अमेरिका में इलाज के दौरान स्वर्गवास होने का समाचार पा कर स्तब्ध भी हूँ और व्यथित भी।प्रकाश जी का जाना मेरे लिए व्यक्तिगत एवं अपूर्णीय क्षति है; उनके निधन से हमारा तीन दशक पुराना साथ यादों में रह गया।
— Trivendra Singh Rawat (@tsrawatbjp) June 5, 2019
पंत की बीमारी के कारण प्रदेश के मुख्यमंत्री उनके सभी विभाग संभाल रहे थे। पंत के विभाग में संसदीय कार्य, विधायी, भाषा, वित्त, आबकारी, पेयजल एवं स्वच्छता, गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग आते थे।
Anguished by the passing away of Uttarakhand’s Finance Minister Shri Prakash Pant. His organisational skills helped strengthen the BJP and administrative skills contributed to Uttarakhand’s progress. My thoughts are with his family and supporters. Om Shanti.
बता दें कि पंत सबसे पहले पिथौरगढ़ विधानसभा से 2002 से 2007 तक निर्वाचित हुए थे। इस दौरान उन्हें बीसी खंडूरी की सरकार में पर्यटन, तीर्थाटन, धर्मस्व कार्य, संस्कृति, संसदीय कार्य, विधायी एवं पुर्नगठन मंत्री बनाया गया था। इसके बाद 2012 के चुनावों में उन्हें हार का मुँह देखना पड़ा था लेकिन 2017 में उन्होंने एक बार फिर से जीत हासिल की। हाल ही में बजट सत्र के दौरान उनकी तबियत बिगड़ने लगी थी, इस कारण वह बजट भाषण तक पूरा नहीं पढ़ पाए थे। यहाँ भी उनका बजट भाषण त्रिवेंद्र सिंह रावत ने ही पूरा किया था।
पीलीभीत स्थित रौहनिया गाँव में देवस्थान पर भजन-कीर्तन में विघ्न डालने और पुजारी की पिटाई करने के मामले में पाँचों आरोपितों को गिरफ़्तार कर लिया गया है। ग्रामीण सौरभ शुक्ला की शिकायत पर मुस्लिम समुदाय के महबूब, आज़ाद, इसराइल, मोनीस और अलानूर को पुलिस ने अपने शिकंजे में लिया। इन लोगों ने देवस्थान में मूर्तियाँ खंडित कर दी थीं, देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ उठा कर ले गए थे और वहाँ जम कर उत्पात मचाया था। इन्हें लाउडस्पीकर पर भजन-कीर्तन होने से ‘दिक्कतें’ थी। गाँव में अभी भी पुलिस बल तैनात है।
क्या थी पूरी घटना?
दरअसल, पीलीभीत में समुदाय विशेष के लोगों को भजन-कीर्तन इतना नागवार गुजरा था कि उन्होंने मंदिर में पहुँच कर तोड़फोड़ की। घटना उत्तर प्रदेश के पीलीभीत स्थित रौहनिया गाँव की है। मंगलवार को जब वहाँ स्थित एक मंदिर में भजन-कीर्तन चल रहा था, तब समुदाय विशेष के लोग वहाँ पहुँच गए और पूजा में विघ्न डाला। बेख़ौफ़ आरोपितों ने न सिर्फ़ लाउडस्पीकर को तोड़ डाला बल्कि धार्मिक कैलेंडर को भी फाड़ डाला। वहाँ भजन-कीर्तन करते लोग असहाय बने रहे और बदमाश वहाँ से देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ उठा कर ले गए। पुलिस ने भी इस बात की पुष्टि की है।
ताज़ा सूचना के अनुसार, किसी भी प्रकार की सांप्रदायिक तनाव की स्थिति से बचने के लिए पुलिस ने मौके पर अभी भी कैम्प किया हुआ है। लोगों को समझा-बुझा कर स्थिति को शांत कराया गया। ये घटना रौहनिया गाँव के बाहर स्थित एक देवस्थान की है, जहाँ रोज भजन-कीर्तन होता है। ऐसा पहली बार नहीं था, जब लाउडस्पीकर से भजन गया जा रहा हो। शाम के शाम वहाँ लोग धार्मिक कार्यक्रमों में व्यस्त रहते हैं। गाँव में हिन्दू और मुस्लिम, दोनों ही समुदाय के लोग रहते हैं। इसके बावजूद मुस्लिम गुंडों ने पुजारी की पिटाई भी की।
रात के करीब 9 बजे समुदाय विशेष के लोगों ने लाउडस्पीकर से भजन-कीर्तन किए जाने का विरोध शुरू कर दिया। भजन-कीर्तन कर रहे लोगों में कई साधू भी शामिल थे। समुदाय विशेष के लोगों ने ईद होने और नमाज़ का समय हो जाने की बात करते हुए कहा कि अब उनका त्यौहार आ गया है, इसीलिए लाउडस्पीकर पर भजन नहीं होना चाहिए। श्रद्धालुओं का तर्क था कि वे गाँव के बाहर आकर भजन-कीर्तन कर रहे हैं, जबकि नमाज़ गाँव के भीतर पढ़ी जाती है। इसी बात को लेकर कहासुनी हुई और फिर उत्पात मचाया गया।
कल (जून 5, 2019) देश भर में ईद का त्यौहार बड़ी धूम-धाम से मनाया गया। बड़े-बड़े नेताओं से लेकर आम लोगों ने ईद को अपने ढंग से सेलीब्रेट किया। लेकिन, इस बीच हैदराबाद से ईद की बधाई देने पर हुए विवाद की खबर भी सामने आई। ये विवाद इतना ज्यादा बढ़ गया कि हैदराबाद की गोशामहल सीट से भाजपा विधायक राजा सिंह ने एसएचओ के ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग कर डाली।
दरअसल, ईद के मौक़े पर मुबारकबाद देते हुए फलकनुमा थाने के एसएचओ श्रीनिवासन ने सिर पर जालीदार टोपी पहन रखी थी। भाजपा विधायक ने इसे नियमों का उल्लंघन बताया। विधायक राजा सिंह ने ट्विटर पर एसएचओ का वीडियो शेयर किया है। उन्होंने इस ट्वीट में तेलंगाना के डीजीपी से एसएचओ के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की माँग की है।
I would like to ask @TelanganaDGP and @hydcitypolice is this even allowed, he removed his police cap and wore skull cap seating inside his cabin in police station.
Hindu’s are being targeted during Diwali & Dusherra is friendly policing for minorities only? pic.twitter.com/Rexe6hPMcs
नवभारत टाइम्स की खबर के अनुसार राजा सिंह ने कहा कि ईद की बधाइयाँ देते हुए उन्हें फलकनुमा थाने के एसएचओ श्रीनिवास का एक वीडियो दिखा। इस वीडियो में उन्होंने अपनी यूनिफॉर्म वाली टोपी की जगह जालीदार टोपी लगा रखी थी, जो नियमों के ख़िलाफ़ था। राजा सिंह के मुताबिक एसएचओ के ख़िलाफ़ कार्रवाई होनी ही चाहिए।
सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स, राजा सिंह की इस शिकायत पर उनसे सवाल करते नजर आए। यूजर्स का कहना था कि अगर एसएचओ तिलक लगाकर और सिर पर चुनरी बाँधकर किसी हिंदू त्यौहार की शुभकामना देते, तब भी क्या उन्हें इसी तरह से आपत्ति होती, क्या तब भी वो कड़ी कार्रवाई की माँग करते? इस सवाल पर विधायक ने यूजर्स को सटीक जवाब देते हुए कहा कि उनकी आपत्ति नियमों के उल्लंघन पर है। जो कि यूनिफॉर्म वाली टोपी उतारकर सिर पर भगवा कपड़ा बाँधकर हिंदू त्योहार की बधाई देने से भी होती। राजा सिंह का कहना है कि वो तब भी विरोध करते और अगर भविष्य में ऐसा कुछ हुआ, तो वो इसका विरोध जरूर करेंगें।
Wishing Eid is Okay but if a Govt Officer wears overtly religious dresses, the next you will see that the other community members will also remember it and if he misses any of the festivals next time, he will be made to remember, will he be able to do his duty properly then?
— Intolerant Infidel (@IntolrntInfidel) June 5, 2019
कुछ लोगों ने ट्विटर पर राजा सिंह की शिकायत पर अपना समर्थन दिखाया है। उन लोगों का भी मानना है कि ईद की बधाई देने में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन सरकारी कर्मचारी होने पर जालीदार टोपी लगाकर बधाई देना एसएचओ को शोभा नहीं देता। एक यूजर का कहना है कि जब तक कोई भी व्यक्ति किसी सरकारी विभागों में काम कर रहा हो तो उसका सबसे बड़ा धर्म संविधान है जो हमे धर्मनिरपेक्ष रहने की शपथ दिलाता है उम्मीद है उचित कार्यवाही होगी।
ये गलत है जब तक कोई भी व्यक्ति किसी सरकारी विभागों में काम कर रहा हो तो उसका सबसे बड़ा धर्म संविधान है जो हमे धर्मनिरपेक्ष रहने की शपथ दिलाता है उम्मीद है उचित कार्यवाही होगी जय हिंद जय भारत
— Jitendra Kumar Pal (@Jitendra222142) June 5, 2019
उत्तर प्रदेश स्थित हमीरपुर से रिश्ते-नातों को तार-तार कर देने वाली घटना समाने आई है। वहाँ एक भतीजे ने अपनी चाची की ही हत्या कर डाली। परिजनों का कहना है कि अवैध सम्बन्ध बनाने में असफल रहने के कारण इस हत्याकांड को अंजाम दिया गया। मृतका का नाम शबनम है, वहीं आरोपित की पहचान निसार के रूप में हुई है। आजतक की रिपोर्ट के अनुसार, जब चाची ने भतीजे की इच्छानुसार उसके साथ अवैध सम्बन्ध बनाने से इनकार कर दिया, तब निसार ने गड़ासे से उनकी हत्या कर दी। यह हत्या निर्ममतापूर्वक गर्दन काट कर की गई है।
मृतका की उम्र 29 वर्ष थी। हत्या की ख़बर के बाद गाँव के कई लोग घटनास्थल पर जमा हो गए और जिस परिवार में यह घटना हुई, उस घर के बाहर बड़ी भीड़ जमा हो गई। हालाँकि, पुलिस ने अभी तक साफ़-साफ़ कुछ नहीं बताया है। परिजनों का रो-रो कर बुरा हाल है और वे लगातार कहते रहे कि आरोपित भतीजा अपनी चाची पर बुरी निगाह रखता था, जिस कारण उसने हत्या कर दी। घटना के समय मृतका के परिजन खेत की तरफ गए हुए थे। ख़बर मिलने पर उसका पति जब भागा-भागा घर पहुँचा तो खून देख कर उसके होश उड़ गए।
सनकी भतीजे को परिजनों ने स्टेशन से पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया। हालाँकि, पुलिस ने इसकी पुष्टि अभी तक नहीं की है। वह भागने की कोशिश कर रहा था। मृतका का परिवार झाड़ू बनाने का काम करता है। नासिर की अभी शादी नहीं हुई है और परिजनों व गाँववालों के अनुसार, वह सनकी स्वाभाव का है। वह काफ़ी समय से अपनी शादी को लेकर परेशान था और घरवालों को अपनी शादी कराने बोलता रहता था। वह अपनी चाची शबनम से भी शादी करने की बातें कहता था, जिसे वह टाल जाती थी। निसार को लगता था कि उसकी शादी न होने के पीछे उसकी चाची का ही हाथ है।
मंगलवार की सुबह (जून 4, 2019) जब शबनम का पति बबलू खेतों की तरफ गया तो शबनम को कमरे में अकेला पाकर निसार ने धारदार हथियार से उसकी गर्दन पर वार कर दिया। उस समय वह लेटी हुई थी। उसकी गर्दन से खून का फव्वारा फूट पड़ा। शबनम व बबलू की शादी को 10 वर्ष हो गए थे। दोनों की कोई संतान नहीं थी। परिजनों के मुताबिक़, दोनों हँसी-ख़ुशी अपना जीवन बसर कर रहे थे। मृतका के पिता मुश्ताक को शक है कि इस घटना में अकेले निसार ही नहीं बल्कि कुछ और लोग भी शामिल हैं, जिसकी जाँच होनी चाहिए।
पुलिस ने कहा कि आरोपित घर-घर घूम कर अपनी शादी की बातें करता रहता था। उसे लगता था कि उसकी चाची ही उसकी राह में रोड़ा है। उसके पास कोई घर-मकान नहीं है और उसकी माली हालत भी ठीक नहीं है। वह कोई ख़ास काम-धंधा भी नहीं करता था।
राजस्थान के बाद अब हरियाणा में भी कॉन्ग्रेस नेताओं के बीच कलह की शुरुआत हो गई है। दिल्ली में वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद की मौजूदगी में हुई बैठक में काफ़ी कुछ ऐसा देखने को मिला, जिससे हरियाणा में पार्टी नेताओं के बीच कलह की पोल खुलती है। हार की समीक्षा के लिए बुलाई गई बैठक बेनतीजा ख़त्म हुई। राज्य में कॉन्ग्रेस सभी 10 सीटें हार चुकी हैं। इसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के खेमे के नेता लगातार प्रदेश अध्यक्ष डॉक्टर अशोक तँवर के इस्तीफे पर अड़े हैं। हालाँकि, यह गुटबाजी आज की नहीं है बल्कि पिछले 6 वर्षों से चल रही है। गुलाम नबी आज़ाद हरियाणा कॉन्ग्रेस के प्रभारी हैं।
दैनिक जागरण के सूत्रों के अनुसार, बैठक में परेशान आज़ाद ने कहा कि अगर प्रदेश अध्यक्ष अपना इस्तीफा सौंपेंगे भी तो किसे? उन्होंने कहा कि अभी परिस्थितियाँ सही नहीं हैं और राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी ने ख़ुद इस्तीफा दिया हुआ है, ऐसे में नेता अपना इस्तीफा किसे देंगे? गुलाम नबी आज़ाद नेताओं को लगातार अपना घर मजबूत करने की सलाह देते रहे और गुटबाजी छोड़ने को कहा। एक घंटे तक चली बैठक में आज़ाद ने नेताओं को जानकारियाँ सार्वजनिक न करने को कहा, इसके बाद वे निकल लिए। गुलाम नबी ने मीडिया से भी बात नहीं की।
लोकसभा चुनाव में करारी हार के साइड इफैक्ट्स : हरियाणा कांग्रेस की बैठक में बवाल प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर गुस्स में मीटिंग से उठकर चले गए, तभी मीटिंग बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गई कुलदीप शर्मा, करण सिंह दलाल, डॉ. रघुवीर सिंह कादियान ने संगठन, प्रदेश नेतृत्व में बदलने की मांग की pic.twitter.com/mio91UOuri
उधर इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक़ प्रदेश अध्यक्ष अशोक तँवर ने अजीब सा बयान देते हुए बीच बैठक में ख़ुद को गोली मारे दिए जाने की बात कहीं। ख़बर के अनुसार, प्रदेश अध्यक्ष ने कहा, “अगर मेरे को ख़त्म करना है, तो मुझे गोली मार दो।” बैठक में आज़ाद ने कहा कि पार्टी के भीतर कुछ बड़े संगठनात्मक बदलाव किया जाने वाला है, जिसके लिए जिला स्तर पर योजनाएँ तैयार की गई हैं। उनकी बात को नज़रअंदाज़ करते हुए कॉन्ग्रेस नेता आपस में लड़ते रहे। हुड्डा कैम्प के एक विधायक ने तँवर पर तंज कसा और फिर एक लोकसभा प्रत्याशी ने भी तँवर द्वारा नज़रअंदाज़ किए जाने की बात उठाई। जवाब में तँवर ने कहा कि उक्त प्रत्याशी उनका फोन ही नहीं उठाते हैं।
कॉन्ग्रेस विधायक किरण चौधरी द्वारा विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर ख़ुद को नेता प्रतिपक्ष घोषित किए जाने निवेदन किया गया था। इसपर भी बवाल हुआ। नेताओं ने कहा कि बिना प्रदेश अध्यक्ष से बात किए यह क़दम उठाना ग़लत है और पार्टी को उन पर अनुशासत्मक कार्रवाई करनी चाहिए। नेताओं का आरोप था कि ख़ुद को बड़ा साबित करने के चक्कर में उन्होंने यह पत्र लिखा है। हंगामे के कारण बैठक बीच में ही ख़त्म करनी पड़ी और ग़ुलाम नबी आज़ाद इस कलह को दूर करने में नाकाम रहे।
बगल के राज्य पंजाब में अच्छे प्रदर्शन के बावजूद हरियाणा में कॉन्ग्रेस का प्रदर्शन बाकि अन्य राज्यों की तरह बहुत बुरा रहा और पार्टी के कई कद्दावर नेता चुनाव हार गए। राजस्थान में पहले से ही पार्टी में घनघोर कलह चल रही है और सीएम व डिप्टी सीएम के खेमों के बीच मतभेद की बातें सामने आ रही हैं। ऐसे में, संगठनात्मक बदलाव की बात तो हो रही है लेकिन इस पर अमल कब तक हो पाएगा, यह देखने लायक बात होगी।
₹50 लाख में लड़की ‘खरीद’ कर उसके साथ बलात्कार के आरोप में फँसे गोवा कॉन्ग्रेस के पणजी से विधायक अतानासियो मोनसेराते की अभियोग हटाने की अपील गोवा के न्यायालय ने ख़ारिज कर दी है। सत्र न्यायालय की जज शेरीन पॉल को 2016 के इस मामले की चार्जशीट में मामला चलाने लायक दम दिखा है। उन्होंने आरोप तय करने की आधिकारिक तारीख 12 जून घोषित की है।
376, पॉक्सो का मामला, विधायक ने कहा, ‘खुद चाहता हूँ जल्द फैसला’
अतानासियो ‘बाबुश’ मोनसेराते पर आरोप है कि उन्होंने एक नाबालिग किशोरी को नशे की दवा देकर 2016 में उसके साथ बलात्कार किया। उन पर अब इस मामले में पॉक्सो एक्ट के अंतर्गत नाबालिग से बलात्कार के अलावा गैर-कानूनी तौर पर किशोरी को अपने कब्जे में रखने का भी मुकदमा चलेगा। पहले भी रंगदारी के मामले में फँस चुके अतानासियो को उस समय समर्पण करने पर आठ दिन हवालात में बिताने के बाद जमानत मिल गई थी। उस समय उन्होंने तत्कालीन गोवा सरकार की राजनीतिक दुर्भावना से मामले को प्रेरित बताया था।
अपने खिलाफ आरोप तय होने की खबर पर नाखुशी जताते हुए अतानासियो ने कहा कि उनके वकील ने पहले ही इसका अंदेशा जता दिया था। उन्होंने यह भी जोड़ा कि उनके वकील अब इस मामले को जल्दी-से-जल्दी निपटने के लिए उच्च न्यायालय से अपील करेंगे। वह रोज़ाना सुनवाई के लिए भी तैयार हैं।
31 को एक और छेड़छाड़ का मामला
31 मई को अतानासियो, मेयर उदय मडकईकर और पूर्व मेयर यतिन पारेख के खिलाफ एक महिला के साथ छेड़छाड़ (मोलेस्टेशन) और अभद्रता का नया मामला भी दर्ज हुआ है। यह एक अवैध कब्जा हटाने की कार्रवाई के दौरान का वाकया है। विधायक ने इस मामले में भी खुद को निर्दोष बताते हुए 1 जून को अग्रिम जमानत याचिका दायर कर दी थी। इस मामले में उन पर भारतीय दंड संहिता की धाराओं 323 (जानबूझकर चोट पहुँचाना), 354 (शील भंग), 504 (शांति भंग), 506 (आपराधिक धमकी) के तहत मामला दर्ज हुआ था।
दिल्ली पुलिस ने मीडिया द्वारा फैलाई जा रही झूठी खबर की एक तेज रफ़्तार कार ने नमाजियों को टक्कर मार दी है, जिसमें 17 नमाज़ी घायल हो गए हैं, से साफ इनकार कर दिया। यह घटना पूर्वी दिल्ली की खुरेजी की बताई जा रही थी। न्यूज़ एजेंसी IANS ने सबसे पहले यह ख़बर चलाई थी जो उस समय विभिन्न स्रोतों से उठाई गई थी।
IANS की रिपोर्ट में, शहादरा की DCP मेघा यादव के हवाले से लिखा था कि 17 लोग इसमें घायल हैं। इस रिपोर्ट को तुरंत ही कई मीडिया समूहों जैसे The Quint, India Today, India TV और Business Standard द्वारा हाथों-हाथ लिया गया।
जबकि, DCP मेघा यादव ने ऐसे किसी भी दावे से इनकार किया है। ऑपइंडिया ने मेघा यादव से इस सम्बन्ध में बात की तो उन्होंने किसी भी न्यूज़ एजेंसी को ऐसी कोई भी सूचना देने से इनकार किया। उन्होंने इसे पूरी तरह से झूठ करारा दिया।
मेघा यादव ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा, “जो मीडिया समूह या मीडिया पोर्टल मेरे नाम से यह स्टेटमेंट जारी कर रहे हैं कि 17 लोग घायल हुए हैं, वह गलत है। वहाँ कोई भी घायल नहीं है। उन्होंने आगे जोड़ा कि तीन लोग बाद में पुलिस स्टेशन आए थे कि वह घायल हैं लेकिन उन्हें देखकर यह साफ था कि कोई भी घायल नहीं था।”
हालाँकि, ये तीनों लोग जो दावे कर रहे थे कि वह घायल है, उन्हें बाद में मेडिकल जाँच के लिए भी भेज दिया गया।
यादव ने आगे कहा जहाँ पर यह घटना घटी अक्सर वहाँ पर भीड़ रहती है लेकिन जिस समय कार वहाँ से गुज़री, उस समय वहाँ कोई नमाज़ अदा नहीं हो रही थी। बल्कि नमाज़ बहुत पहले ही ख़त्म हो चुकी थी और लोग वहाँ से है चुके थे।
कमाल की बात यह है कि जहाँ ज़्यादातर इंग्लिश मीडिया ने 17 नमाजियों के घायल होने की झूठी ख़बर छापी और चलाई वहीं कुछ हिंदी मीडिया ने ऐसा लिखा कि वहाँ कोई घायल नहीं हुआ है। और इस खबर की सच्चाई बताने की कोशिश की।
उदहारण के लिए Amar Ujala की एक रिपोर्ट में दिल्ली पुलिस अधिकारी के हवाले से लिखा गया था कि कोई भी घायल नहीं हुआ है। इसी रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि तेजी से गुज़रने वाली कार का विरोध करने के लिए इकट्ठी हुई भीड़ ने पत्थर फेंक कर और तोड़-फोड़ कर अपना विरोध जताया। जिससे आम लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ा।
चीन में वहाँ की सरकार की मुस्लिमों के प्रति दमनकारी नीतियों के चलते शिनजियांग प्रान्त में ईद पर ज्यादा चहलपहल नहीं रही। उइगुर मुस्लिम सुरक्षाकर्मियों की भारी मात्रा में मौजूदगी और सरकार की दमनकारी नीतियों के कड़ाई से लागू करने की नीति के चलते डरे हुए हैं। चीन सरकार 2017 से अब तक मस्जिदों समेत 36 उपासना-स्थलों को ढहा चुकी है।
मस्जिदों के अंदर कैमरे, मेटल डिटेक्टर
चीन में बची-खुची मस्जिदों में प्रवेश करने के लिए मुस्लिमों को मेटल-डिटेक्टर का सामना करना पड़ता है। उन पर लगातार निगरानी रखी जाती है। इसके आलावा चीन सरकार सार्वजनिक तौर पर पंथिक आस्था के प्रदर्शन को भी हतोत्साहित करती है। शिनजियांग में जब मुस्लिमों के रोज़े चल रहे थे, तो भोजन की दुकानों पर उमड़ी भीड़ को दिन भर भोजन परोसा जाता था।
दरअसल आतंकी हमले के डर से चीन की सरकार ने जगह-जगह कैमरे लगा रखे हैं। इसके अलावा सादे कपड़ों में तैनात पुलिसकर्मी भी आते-जाते मुस्लिमों पर कड़ी नज़र रखते हैं। इसके अलावा वहाँ की सरकार और सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी मज़हब को खतरा मानती है।
व्यवसायिक शिक्षा केंद्रों पर भी पंथिक प्रदर्शन पर रोक
चरमपंथ के रास्ते पर लोगों को जाने से रोकने के लिए चीन की सरकार व्यवसायिक शिक्षा केंद्र चला रही है, जिनमें उइगुर और तुर्की-भाषी मुस्लिमों को रखा गया है। वहाँ उन्हें मंदारिन भाषा और चीन के कायदे-कानूनों से वाकिफ कराया जाता है। शैक्षिक केंद्रों पर भी पंथिक और मज़हबी गतिविधियों की इजाजत नहीं है। यह चीनी कानून के खिलाफ है। लेकिन शिनजियांग सरकार का यह भी कहना है कि यह लोग जब सप्ताहांत में वापस जाएँगे तब उनके ऐसा करने पर कोई रोक नहीं है।
आगामी अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के लिए प्रधानमंत्री ने अभी से तैयारियाँ शुरू कर दीं हैं। उन्होंने अपना एक एनिमेटेड कार्टून जारी कर लोगों से योग को अपने जीवन में शामिल करने और दूसरों को भी प्रेरित करने की अपील की है। इस वीडियो में वह त्रिकोणासन कर रहे हैं।
ट्विटर पर योग करता अपना कार्टून जारी कर मोदी ने लोगों को याद दिलाया कि आगामी 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस है। संयुक्त राष्ट्र में इसके लिए दिसंबर, 2014 में प्रस्ताव पारित हुआ था। भारत के अलावा 177 अन्य-देश इस प्रस्ताव के संयुक्त राष्ट्र महासभा में सह-प्रस्तावक बने। यह किसी भी प्रस्ताव के लिए एक रिकॉर्ड संख्या थी। इसके बाद 21 जून, 2015 को पहला योग दिवस मनाया गया था।
पहले भी जारी कर चुके हैं कार्टून
मोदी इससे पहले भी लोगों को योग करने के लिए कई तरीके से प्रोत्साहित कर चुके हैं। इससे पहले पिछले वर्ष भी उन्होंने विभिन्न आसनों को करने का तरीका सिखाते अपने कार्टून जारी किए थे। इसके अलावा उन्होंने प्रधानमंत्री निवास पर अपने योगाभ्यास का वीडियो भी जारी किया था।
स्क्रॉल की रिपोर्ट में बताया गया है कि राम नवमी झारखण्ड में साम्प्रदायिकता का बहाना बनती जा रही है। (ज़ाहिर तौर पर इस साम्प्रदायिकता के लिए दोषी हिन्दू ही हैं, और इसे रोकने का तरीका यह है कि राम नवमी मनाना ही बंद कर दिया जाए।)
जिन घटनाओं का हवाला दिया, वह झूठ
लेख की शुरुआत में एक-एक हत्या की घटना का हवाला दिया जाता है ‘मॉब-लिंचिंग’ के तौर पर। जबकि यह मॉब-लिंचिंग या भीड़ द्वारा (जातिगत/मज़हबी) नफरत के चलते हुई हत्या की घटना नहीं थी। जिस आदमी मोहम्मद शालिक की हत्या का जिक्र इस लेख में है, उसका एक स्थानीय नाबालिग लड़की के साथ प्रेम-प्रसंग चल रहा था। शालिक 19 साल का था और लड़की महज़ 15 साल की। इसी प्रसंग में लड़की के ही परिजनों ने अपनी नाबालिग लड़की पर डोरे डाल रहे लड़के की पीट-पीट कर हत्या कर दी।
उनका कानून हाथ में लेना बिलकुल गलत था, इसमें शायद ही कोई दोराय हो सकती है; और नाबालिग किशोरों/किशोरियों के प्रेम-प्रसंग और यौन-संबंध पर आप जितनी चाहें उतनी दोराय बना सकते हैं- लेकिन इस घटना का हिन्दू धर्म, राम नवमी या शालिक के समुदाय विशेष से होने से कोई संबंध नहीं था। और यही बात पुलिस जाँच में भी निकल कर आई– इसके बावजूद कि मामले का साम्प्रदायिक न होना घटना के 4 दिन के भीतर ही साफ हो चुका था, स्क्रॉल ने मामले को साम्प्रदायिक हिंसा बताकर झूठ बोला। यह अधिक-से-अधिक ऑनर-किलिंग का मामला हो सकता था, लेकिन वह ‘हेट-क्राइम’ नहीं है- दूर-दूर तक नहीं।
राम नवमी की भूमिका पर न ही कोई आँकड़े, न ही दावा करने वाले की पहचान
“अन्य पाँच ‘हेट-क्राइम’ के घटनास्थलों पर भी राम नवमी की सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका रही” यह दावा इस लेख में अनाम पुलिस अफसरों और स्थानीय देखने वालों के हवाले से किया गया है। अनाम पुलिस अफसरों, अनाम लोगों के हवाले से गोल-मोल दावा, और उसके आधार पर हिन्दुओं के त्यौहार को गुंडागर्दी ठहरा देना- यही स्क्रॉल की पत्रकारिता है।
अपनी मनमर्जी से बनाया हुआ ‘हेट-क्राइम’ डाटाबेस
इस लेखक कुणाल पुरोहित और उनकी संस्था ‘फैक्ट-चेकर डॉट इन’ के अनुसार “झारखण्ड में 2009 से अब तक 16 ‘हेट-क्राइम’ हुए हैं, जोकि साम्प्रदायिक नीयत से किए गए, और इनमें 12 लोगों की जान गई है।” इसमें छेद-ही-छेद हैं।
पहली बात तो यह कि इस कथन का स्रोत क्या है? कौन से स्वतंत्र डाटाबेस का इस्तेमाल इस दावे के लिए किया गया है? अगर खुद के बनाए डाटाबेस के आधार पर फैक्टचेकर राम नवमी बंद करने के लिए पर्याप्त कारण ढूँढ़ कर ले आ रहा है और उम्मीद कर रहा है कि उसे ही अंतिम सत्य मान लिया जाए तो मैं भी कल सुबह तक अपने ‘आंतरिक सर्वे’ से यह निष्कर्ष निकाल सकता हूँ कि फैक्टचेकर को अपनी दुकान बंद कर लेनी चाहिए। करेंगे अपनी दुकान बंद?
दूसरी बात, फैक्टचेकर यह तो बताता है कि वह ‘क्राइम’ की परिभाषा सरकारी ही रखता है, और वही मामले देखता है जिनमें असल में अपराध यानि हिंसा हुआ हो, लेकिन यह बात गोल कर जाता है कि उसकी ‘हेट’ की परिभाषा क्या है? और उसमें भी ‘साम्प्रदायिकता पर आधारित नफरत‘ मापने या ढ़ूँढ़ने का पैमाना क्या है? क्या उन्होंने पुलिस रिपोर्ट का सहारा लिया, अदालत के निष्कर्ष का इंतजार किया, किसी मनोवैज्ञानिक या समाजशास्त्री का ऑन-रिकॉर्ड दावा है? या यह सब कुछ नहीं, खाली देखा कि हिन्दू-मुस्लिम ऐंगल है, वह भी सुविधाजनक (हिन्दू अपराधी, मुस्लिम भुक्तभोगी) तो उसे अपने डाटाबेस में चिपका लिया?
यहाँ बहस के लिए कोई बहस कर सकता है कि फैक्टचेकर की खुद की हेट-क्राइम की परिभाषा क्यों नहीं विश्वसनीय है। तो इसका जवाब होगा कि यह ऊपर मोहम्मद शालिक के मामले में साफ हो चुका है कि जब उन्होंने आशनाई में हुई हत्या को ‘साम्प्रदायिकता पर आधारित नफरत’ का नाम दे दिया तो ज़ाहिर तौर पर या तो उनकी परिभाषा में खोट है, या उनकी नीयत में।
अगर उनके डाटाबेस पर भरोसा कर भी लें तो इसकी क्या गारंटी है कि उनके डाटाबेस में कुछ, या फिर शायद अधिकाँश, ‘हेट-क्राइम’ के भुक्तभोगी चंदन गुप्ता, अंकित सक्सेना जैसे हिन्दू ही न हों? अगर ऐसा निकला तो भी गलती हिन्दुओं की ही होगी कि वो ऐसी राम नवमी मनाते ही क्यों हैं जिससे नाराज़ होकर ‘समुदाय विशेष’ को उनके खिलाफ ‘हेट-क्राइम’ करने पर मजबूर होना पड़ता है?
अपने ही ‘हेट-क्राइम’ डाटाबेस की ‘जाँच’ छापने के बाद?
लेख में यह भी कहा गया है कि फैक्टचेकर ‘हेट-क्राइम वॉच’ के डाटाबेस की ‘जाँच’ करने निकली थी। हालाँकि साथ में ‘फॉलो-अप’, ‘लॉन्ग-टर्म इम्पैक्ट’ जैसे भारी-भरकम शब्द भी देकर बात को घुमाने की कोशिश की गई, लेकिन तथ्य यह है कि फैक्ट-चेकर को अपने ‘हेट-क्राइम वॉच’ के डाटाबेस में कुछ ऐसी घटनाओं के होने का अंदेशा था, जो शायद तहकीकात में ‘हेट-क्राइम’ न निकलतीं। तो क्या फैक्ट-चेकर को उन सन्देहास्पद घटनाओं को छापने से, उनसे वेबसाइट ट्रैफिक, फंडिंग आदि कमाने के पहले, उनके जरिए भारत को बदनाम करने के पहले ही जाँच नहीं कर लेनी चाहिए थी?
‘हेट-क्राइम वॉच’ का डाटाबेस खोटा
‘हेट-क्राइम वॉच’ के डाटाबेस की विश्वसनीयता ही शून्य है। इस डाटाबेस में ‘हेट-क्राइम’ के तौर पर सूचीबद्ध लगभग एक-तिहाई (30%) घटनाओं में उन्हें हमलावरों का मज़हब/पंथ ही नहीं पता।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब मारने वाले का मज़हब नहीं पता तो यह कैसे पता लगा लिया गया कि हत्या नफरत के चलते ही हुई है, छिनैती में नहीं? और ऐसे किसी भी अपराध को बिना जाँचे-परखे, बिना पूरी जानकारी इकठ्ठा हुए हेट-क्राइम बता देने वाला या तो बहुत ही मूर्ख होगा, या बहुत ही धूर्त! कुणाल जी और फैक्ट-चेकर बता दें कि हम अपने डाटाबेस में उनकी एंट्री किस खाने में करें।
नाबालिग का आशिक पुलिस से बचने के लिए कुएँ में कूदा, दोष श्री राम का?
अगला उदाहरण इस लेख में झारखण्ड में एक लड़की और उसके माँ-बाप की मॉब-लिंचिंग कर हत्या का है, जिसका दोष राम नवमी के सर ठेला जा रहा है। मामला यूँ है कि हिन्दू परिवार की 17 साल की नाबालिग लड़की का चक्कर ईसाई लड़के नंदलाल करकेट्टा (23 वर्ष) से चल रहा था। उसे पुलिस ने लड़की के अपहरण की शिकायत मिलने पर बुलाया तो उसने पुलिस से बचने के लिए कुएँ में छलाँग लगा दी और मर गया। उसकी मौत का दोषी लड़की के परिवार वालों को मानते हुए करकेट्टा के परिजनों ने लड़की के माँ-बाप लखपती देवी और तहलू राम की और उसकी बड़ी बहन रूनी कुमारी की पीट-पीट कर हत्या कर दी। नाबालिग लड़की और उसकी एक और बहन को भी गंभीर रूप से घायल कर दिया।
इस घटना में मॉब-लिंचिंग करने वाले ईसाई हैं, जबकि मॉब-लिंचिंग के के शिकार हिन्दू, और इस घटना को राम नवमी से स्क्रॉल और फैक्ट-चेकर बिना किसी कारण के जोड़ देते हैं।
हिन्दू लड़की का शौहर के बाप, चाचा गैंगरेप कर कत्ल कर दें, लेकिन यह ‘हेट-क्राइम’ नहीं होता
अगली घटना जिसका स्क्रॉल ज़िक्र करता है, वह एक हिन्दू लड़की के उसके मुस्लिम आशिक के बाप और उसके चाचा द्वारा गैंगरेप कर हत्या कर देने की है। लड़की को केवल इसलिए मार दिया गया क्योंकि उसने इस्लाम कबूल करने से मना कर दिया था। ज़ी न्यूज़ पुलिस द्वारा जारी आशिक आदिल बयान के आधार पर यह जानकारी देता है, लेकिन पुलिस से ज्यादा बड़ी जाँच एजेंसी फैक्ट-चेकर इस्लाम न कबूल करने के बदले हुए गैंगरेप-हत्या में मज़हबी ऐंगल देखने से मना कर देती है।
इसके बाद सीधा बाकी घटनाओं की कोई जानकारी दिए स्क्रॉल राम नवमी को झारखण्ड में बढ़ते साम्प्रदायिक तनाव के लिए जिम्मेदार ठहरा देता है।
हर चीज का घुमा-फिरकर राम-नवमी कनेक्शन
इसके बाद स्क्रॉल कहीं से कुछ भी उठाकर येन-केन-प्रकारेण राम नवमी को एक मुसीबत का दर्जा देने की कवायद शुरू कर देता है। और इसके लिए वह बेहूदा तर्कों का इस्तेमाल करता है; मसलन ‘कभी-कभी राम नवमी वाले अपना रास्ता बदलकर समुदाय विशेष के इलाके से जुलुस निकालने लगते हैं’ (लेकिन यह नहीं बताता कि कुल कितनी घटनाएँ, या सारे जुलूसों में से कितने प्रतिशत जुलुस ऐसा करते हैं), ‘जुलूस में शामिल एक अनाम हिंन्दू राष्ट्रवादी के फ़ोन में भड़काऊ, राम मंदिर के गाने वाली रिंगटोन लगी है’, ‘रामलीला आयोजकों में से दो (इतने सालों की रामलीला में दो, महज़ दो) रामलीला आयोजक किसी मॉब-लिंचिंग वाली भीड़ का हिस्सा थे’, और ऐसी ही बकवास।
मदरसे के नाम पर ऐंठी जमीन पर बनी मस्जिद, हिन्दुओं पर चले पत्थर, फिर भी बंद करो राम नवमी
इसके बाद हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच असल में हुए टकराव का ज़िक्र लेख के सबसे अंत में होता है- महज़ दो बार। एक बार 2017 में, जब हिन्दुओं की भीड़ पर समुदाय विशेष ने पहले थूका, और उसके बाद गुस्साए हिन्दुओं की भीड़ ने मस्जिद में घुस कर हिंसा की। हिन्दू पहले से ही भरे हुए बैठे थे क्योंकि यह जमीन उन्हीं की थी, जो उनसे मदरसा बनाने यानि शिक्षा के नाम पर ऐंठ ली गई, और बाद में उस पर मस्जिद बना दी गई।
दूसरी घटना इसी साल की है, लेकिन इसमें समुदाय विशेष ने ही हिन्दुओं पर पथराव किया था। लेकिन इस सच को दबा कर, “दोनों समुदायों का टकराव” कहकर हिन्दूफ़ोबिया में सने हुए कुणाल पुरोहित, फैक्ट-चेकर और स्क्रॉल इसे भी राम नवमी को बदनाम करने के एक बहाने के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं।
हिन्दू त्यौहारों को बंद कर देने की तैयार हो रही है ज़मीन
स्क्रॉल का यह लेख उसी समय आ रहा है जब पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा पर घटिया सवाल घटिया तरीके से उठाने को लेकर पत्रकारिता के समुदाय विशेष का एक दूसरा सदस्य The Hindu पहले ही घिरा हुआ है। यह महज़ एक संयोग नहीं है। यह इनकी साज़िश है। फार्मूला है हिन्दू त्यौहारों को बंद करने, हिन्दू धर्म को खात्मे की तरफ ढकेलने का- पहले “धर्म के नाम पर फलाना-ढिकाना हो रहा है” की चिंता जताने के बहाने धर्म और त्यौहारों के खिलाफ माहौल तैयार करों, सालों तक त्यौहारों के खिलाफ एक संस्कृति तैयार करो और फिर न्यायिक याचिका डाल कर त्यौहार को खत्म कर दो। उसी के लिए ज़मीन तैयार की जा रही है।