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ज़मीर बेच कर कॉफ़ी पीने वाली मीडिया और लिबटार्डों का सामूहिक प्रलाप (भाग 2)

मीडिया और डर की खेती

आपको मीडिया के उन्हीं लोगों ने पागल बनाया है जिन्हें आप आदर्श मानते रहे। ऑल्टरनेट जर्नलिज़्म के नाम पर एक पूरी लॉबी खड़ी की गई, जिसका पूरा मक़सद घृणा का माहौल बनाना था। आप याद कीजिए कि कितनी बार आपको उन्हीं मीडिया के लोगों ने बंगाल की हिंसा, वहाँ के दंगों पर उसी मात्रा में रिपोर्टिंग की जितनी रोहित वेमुला, नजीब अहमद, अखलाक, गौरी लंकेश की हत्या पर हुई?

क्या बिहार का राजदेव रंजन पत्रकार नहीं था? फिर क्या कारण है कि बाईस पत्रकारों की हत्या पर एक ट्वीट तक न करने वाले लोग किसी गौरी लंकेश की हत्या पर सड़क पर उतर आते हैं, और कोर्ट से पहले आपको बताते हैं कि इसमें सीधे संघ या मोदी का ही हाथ है? क्या कारण है कि आपके पास सिर्फ ‘ख़ास समुदाय’ के नाम वाले लोगों की मौत की ही ख़बर पहुँचती है और नारंग, पुजारी, राजीव, अंकित जैसे दसियों नाम इस तरह नकारे जाते हैं कि गूगल का एल्गोरिदम भी उन्हें ढूँढे में समय लगाता है? आप ये समझिए कि इन हत्याओं को आप सर्च भी नहीं कर पा रहे क्योंकि इस पर उतनी बात ही नहीं हुई। क्या ये मौतें साम्प्रदायिक नहीं थीं? क्या इस्लामी भीड़ द्वारा हिन्दू की हत्या कम जघन्य हो जाती है?

फिर समुदाय विशेष की मौत को आगे किया जाता रहा और माहौल बनाया गया कि लोगों में डर का माहौल है। एंकर स्टूडियो के भीतर इस तरह का चेहरा लेकर आने लगा कि उसे स्टूडियो के बाहर कुछ हिंदुओं ने थप्पड़ मार कर चेहरा सुजा दिया है। एंकर इस तरह से मरा हुआ मुँह लेकर बैठने लगा, और भद्दे ग्राफ़िक्स की मदद से आपको बताने लगा कि हत्या तो बस ख़ास समुदाय की ही हो रही है, और कैसे डर फैलाया जा रहा है।

जबकि, असल मायनों में डर की खेती तो इन्हीं लोगों ने की। इन लोगों ने सोते-जागते इन बातों को इतनी बार बोला कि सामान्य आदमी उन्माद में आ गया कि सच में ये सरकार यही कर रही है। आखिर आप करेंगे भी तो क्या? अगर बार-बार आपको वही चेहरा दिखे, वैसे ही ट्वीट मिलें, वैसे ही लेख पढ़ना पड़े तो आप तो सोचेंगे ही कि देश में चल क्या रहा है! जबकि आप अपने ऑफिस में, अपने घरों के आस-पास वही माहौल देख रहे होंगे जो सालों से है। लोग शांत हैं, अपना काम कर रहे हैं। लेकिन मीडिया ने इस क़दर धावा बोला कि आपके लिए सूचना के लिए वास्तविक दुनिया से ज़्यादा सही ये आभासी लोग हो गए, जिन्होंने आपको जबरदस्ती बताया कि तुम्हारे पड़ोस का आदमी तुमको कल सुबह सब्जी के ठेले पर काट देगा।

यही अचीवमेंट रही इस मीडिया की। इन्होंने छोटे अपराधों को वैश्विक स्तर तक कवर किया, जहाँ अपराधी हिन्दू था। कठुआ की पीड़िता पर हुए अपराध का ज़िम्मा शिव के त्रिशूल तक चला गया, लेकिन ग़ाज़ियाबाद की पीड़िता के बलात्कार करने वाले मौलवी का पाप किसी लाउडस्पीकर युक्त मीनार पर नहीं टँगा। क्यों? क्योंकि मतलब कठुआ की पीड़िता से कभी था ही नहीं। मतलब मजहबी रंग देने से था।

बड़े मीडिया संस्थानों ने बड़ी ही सूक्ष्म चालाकी से किसी बलात्कारी मौलवी को ‘प्रीस्ट’ लिख कर प्रतीकात्मक चित्र में हिन्दू संत की तस्वीर लगा दी। कोई अल्पसंख्यक, सामान्य सामाजिक अपराध का शिकार हुआ तो उसकी पहचान को हेडलाइन में ऐसे दिखाया गया जैसे कि उसके मजहब के कारण ही उस पर हमला हुआ हो। लेकिन, जिन मामलों में किसी के हिन्दू होने के कारण ही उस पर हमला हुआ हो, वहाँ अपराधियों की पहचान छुपा ली गई। आज भी, अगर आपको किसी ख़बर में, शुरु से अंत तक अपराधी का नाम न मिले, तो आपको समझ जाना चाहिए कि अपराधी किसी मज़हब विशेष का ही होगा। आप सर्च कर लीजिए उस घटना का नाम, किसी छोटे पोर्टल पर आपको सही नाम मिल जाएँगे।

मीडिया ने डर की खेती की, उसे अपने प्रपंचों से सींचा। रतजगा कर के इनके मठाधीशों ने रोजगार के आँकड़ों को नकारा, छोटी झड़पों को दंगा कहा, दंगों पर बात ही नहीं की, भाजपा कार्यकर्ता की हत्या को ऐसे नॉर्मल बनाया कि दूसरे पार्टी के लोगों की भी हत्या हुई है, तो ये तो चलता है। मीडिया का वो हिस्सा, जो अपने आप को स्वघोषित तौर पर आदर्श, निष्पक्ष और महान कहता रहा, उसने इस पूरे चुनाव में लोगों को सिर्फ ठगा है।

इस लगातार चलते रहे झूठ का असर

इस झूठ का असर यह हुआ कि लोगों ने मीडिया पर विश्वास करना बंद कर दिया। उनके लिए व्हाट्सएप्प पर आने वाले मीम और झूठी सूचनाएँ ही सत्य बन कर दिखने लगीं। इस निराशा से नकारात्मकता और अनभिज्ञता से उपेक्षा का जन्म हुआ, जिसका असर यह हुआ कि अफ़वाहों को सच माना जाने लगा। इसका फायदा भी जितना मोदी को विरोधियों ने उठाया, उतना किसी ने नहीं। पिछले साल का अप्रैल याद कीजिए, जब चौदह लोगों की जान एक ऐसे आंदोलन ने ले ली, जिनका संचालन ‘दलित’ कर रहे थे। दलित का मतलब होता है वो लोग; जिनका दमन किया गया हो।

आप जरा सोचिए कि ये लोग सड़कों पर कैसे उतर आए? क्या इन्होंने तय किया कि अब बहुत हो गया, आंदोलन किया जाए? जी नहीं। इनके व्हाट्सएप्प ग्रुपों में यह बात फैलाई गई कि सरकार ने आरक्षण ख़त्म करने का ऐलान किया है। जबकि सही ख़बर यह थी कि सुप्रीम कोर्ट में SC/ST कानून पर चर्चा हुई और कोर्ट ने माना कि इनके कई प्रावधान ऐसे हैं, जिससे ‘नेचुरल जस्टिस’ के आदर्शों को ठेस पहुँचती है। अतः, उन्हें सही करना ज़रूरी है। लोगों में बात फैला दी गई कि आरक्षण ख़त्म हो रहा है, सड़कों पर लोग उतरे और आग लगा दी। फिर कहा गया कि आंदोलन सफल रहा। जितनी हिंसा, उतनी ज़्यादा सफलता होती है ऐसे आंदोलनों की।

मीडिया और विपक्ष ने एक दूसरे के पूरक का रोल निभाया और जनता को लगातार बेवक़ूफ़ समझ कर एक के बाद एक वाहियात काम किए। इसका परिणाम यह रहा कि लोगों ने मीडिया को मृत मान कर सोशल मीडिया की तरफ रुख़ किया। इसके कारण गिरोह के प्रमुख अखबारों, पोर्टलों, चैनलों को देखने वाले कम होते गए, और जो बचे, उनमें से भी अधिकतर वैसे लोग थे जो इसलिए देखते थे कि आज इन्होंने क्या प्रपंच बेचा है।

क्रेडिबिलटी का अभाव विपक्ष के नेताओं तक पहुँचा

पार्टियों ने सोचा कि मीडिया भी उनके साथ है और वो एक दूसरे के लिए मैग्निफायर का काम करेंगे तो जनता उन्हें सच मान लेगी। इस मूर्खता का ख़ामियाज़ा उन्होंने कई बार भुगता जब नोटबंदी पर बाँटे गए प्रपंच को लोगों ने नकार दिया और उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत से भाजपा की सरकार बनी। उसी तरह जीएसटी जैसे पाथब्रेकिंग टैक्सेशन सिस्टम पर जम कर बेहूदगी की गई, लेकिन चुनावों में लोगों ने कई राज्यों में भाजपा को बहुमत दिया।

इन मुद्दों को जनता ने लगातार नकारा लेकिन विपक्ष पता नहीं किस ख़ुमारी में था कि इसी की डुगडुगी बजाता रहा और मीडिया भी हो-हो करते हुए इनके पीछे लगी रही। क्या पार्टियों के योजनाकारों को यह बात नहीं दिखी कि लोगों ने उनकी इस योजना को नकार दिया? या वो हिटलर के प्रोपेगेंडा मंत्री के नक़्शेक़दम पर चलने का ठान कर इस कार्य में लगे रहे कि ‘एक झूठ पकड़ो, उसे लगातार बोलते रहे, अतंतः लोग उसे सच मान लेंगे’। यही हुआ लेकिन लोगों ने उसे सच नहीं माना क्योंकि लोगों को सोशल मीडिया के साथ-साथ सही मायनों में ऑल्टरनेटिव मीडिया के दर्शन होने शुरु हो गए।

जबकि, इनकी चालाकी देखिए कि जितनी बातें इन्होंने भाजपा और मोदी के सर पर फेंकी है, वो सारे काम, बहुत ही सहजता और धूर्तता से यही मीडिया वाले खुद ही करते रहे। आपातकाल कह-कह कर इन्होंने इस भयावह शब्द और दौर को मजाक बना दिया। ‘डर का माहौल’ इन्होंने इतना ज़्यादा बाँट दिया कि लोगों ने उसे सामान्य मान कर आगे बढ़ना शुरु कर दिया। कुल मिला कर विपक्ष के पूरे कैम्पेन को अगर किसी ने पटरी से उतारा, तो वह है यहाँ की मेनस्ट्रीम मीडिया का वह हिस्सा जिसने घृणा में डूब कर घटिया पत्रकारिता की।

इस लेख के बाकी तीन हिस्से यहाँ पढ़ें:
भाग 1: विपक्ष और मीडिया का अंतिम तीर, जो कैक्टस बन कर उन्हीं को चुभने वाला है
भाग 3: वास्कोडिगामा की वो गन जो विपक्ष ने अपना नाम लेकर फायर किया
भाग 4: लिबरलों का घमंड, ‘मैं ही सही हूँ, जनता मूर्ख है’ पर जनता का कैक्टस से हमला

लिबरलों का घमंड, ‘मैं ही सही हूँ, जनता मूर्ख है’ पर जनता का कैक्टस से हमला (भाग 4)

EVM और चुनाव आयोग की बात

ईवीएम एक मशीन है। मशीनें खराब होती हैं। लेकिन खराब मशीनों से चुनाव नहीं होता। चुनाव आयोग ने कई बार कहा है कि उनके 5% मशीनों के खराब होने की दर है, जिसके लिए वो रिज़र्व में उतनी ही मशीनें लेकर चलते हैं ताकि किसी भी ऐसी स्थिति में चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से कराया जा सके। हम और आप, सबने, फ़लाँ जगह ईवीएम खराब हुआ, एक ही पार्टी को वोट जा रहे हैं, जैसी खबरें सुनी हैं। ये खबरें सच होती हैं।

जो ख़बर आप नहीं सुन पाते वो यह है कि उन मशीनों को बदला गया, और चुनाव सही तरीके से हो गया। जहाँ तक हैकिंग की बात है, तो वो संभव नहीं है। चुनाव आयोग ने सबको बुलाया और कहा कि वो हैक करके दिखा दें, तो लोग पहुँचे ही नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया है क्योंकि वो संतुष्ट हैं।

ईवीएम के तीन हिस्से होते हैं, जिसमें बैलेट यूनिट, कंट्रोल यूनिट और वीवीपैट होते हैं। वीवीपैट में आपको तीन सेकेंड तक एक पर्ची दिखती है कि आपने जो वोट डाला है, वो उसी पार्टी को गया जिसका आपने बटन दबाया था। बैलेट यूनिट पर आप उँगली से दबाते हैं, कंट्रोल यूनिट बाहर अधिकारी के पास होता है जो आपको वोट देने के लिए निर्देश देता है।

इसकी प्रक्रिया इतनी जटिल है कि पहले के दो स्तर तक किसी को पता नहीं होता कि किस बैलट यूनिट के साथ कौन सी कंट्रोल यूनिट जाएगी। इसलिए आप वहाँ छेड़-छाड़ करके भी कुछ नहीं पाएँगे। फिर, जिला मुख्यालयों में हर ईवीएम से, सारे पार्टियों के पोलिंग एजेंट की मौजूदगी में छद्म-वोटिंग कराई जाती है ताकि सबको तसल्ली हो जाए कि सारी मशीन ठीक हैं। यहाँ कई मशीनें खराब निकलती हैं, जिनको बदल दिया जाता है। उसके बाद, जब बूथ तक मशीन पहुँच जाती हैं, तो वोटिंग शुरु होने से पहले, हर बूथ पर, हर पार्टी के एजेंट की मौजूदगी में फिर से मॉक-वोटिंग होती है कि फिर से देख लिया जाए, सारी मशीनें ठीक काम कर रही हैं।

ये इसलिए होता है कि सबको संतुष्टि भी मिल जाए कि कोई गड़बड़ी नहीं है, और दूसरी बात यह कि मशीन है, आने-जाने में, हो सकता है कि बिगड़ जाए, तो सब लोग जब तक देख न लें, वोटिंग शुरु नहीं होती। इतने स्तर की प्रक्रिया के बाद ईवीएम अपना काम शुरू करती है। जब आम लोगों तक इस तरह की जानकारी पहुँचने लगे, तो उन्होंने भी इस नैरेटिव को नकारना शुरु किया। साथ ही, कई राज्यों में गैर-भाजपा सरकार बनने से भी लोगों ने माना कि हैकिंग की बात गलत है।

नई नौटंकी: स्ट्रॉन्ग रूम के पास लोग घूम रहे हैं

चूँकि, ईवीएम हैकिंग की बात अब विपक्ष की छवि बनाने में व्यस्त मीडिया भी नहीं कर रहा, तो अब नया नैरेटिव बनाने की ज़रूरत पड़ी। नया नैरेटिव मध्य प्रदेश चुनावों के समय में पहली बार जनता के बीच आया था। वो नैरेटिव था कि कुछ लोग स्ट्रॉन्ग रूम, जहाँ चुनावों के बाद ईवीएम रखे जाते हैं, वहाँ घूमते पाए गए। इसमें इनके पास कोई सबूत नहीं होता, बल्कि इन्हें लगता है कि अगर हारेंगे तो यही नैरेटिव चलाया जाएगा ताकि अविश्वास का माहौल बने। बात यह हुई कि कॉन्ग्रेस वहाँ जीत गई और फिर इस नौटंकी को सब भूल गए।

अब लोकसभा चुनावों के सातों चरण निपट गए, एग्जिट पोल में भाजपा को पूर्ण बहुमत की बात हो रही है, तो विपक्ष ने फिर से लोगों में अविश्वास फैलाने की कोशिश की है। ट्विटर और फेसबुक पर तस्वीरों शेयर की जानें लगीं कि गाड़ियों में ईवीएम भर कर कहीं ले जाया जा रहा है। कहीं पर यह कहा गया कि स्ट्रॉन्ग रूम में भाजपा वाले फ़लाँ रात को घुसने वाले हैं, इसलिए चौकसी बढ़ाई जाए।

इसमें दो समस्याएँ हैं। पहली यह है कि स्ट्रॉन्ग रूम में कैमरे से लगातार निगरानी होती है, हर ईवीएम आदि की पूरी विडियो रिकॉर्डिंग होती है, हर पार्टी को प्रतिनिधि की वहाँ मौजूदगी रहती है, अतः ये सब कहना कि वहाँ कुछ होने वाला है, महज़ डर फैलाने की बात है, और कुछ भी नहीं।

दूसरी बात, जब ईवीएम कहीं गए हैं, तो वहाँ से आएँगे भी। उसमें पैर तो हैं नहीं कि बूथों से वो खुद चल कर आएँगे। उन्हें किसी गाड़ी पर रखा जाएगा और वो गाड़ी जिला मुख्यालय जाएगी, वहाँ से कहीं और जाएगी। इस पूरी प्रक्रिया में, हर तरह की गाड़ियों का प्रयोग होता है। छोटी ट्राली से लेकर ट्रक तक। ये किसी जासूस फिल्म की तरह अंधेरे में नहीं लोड होते। अतः, आपको कुछ लोग ऐसी गाड़ियों की तस्वीरें भी शेयर करते नजर आ जाएँगे।

साथ ही, कई बार जिन गाड़ियों की दलील दी जाती है, उनमें ईवीएम नहीं, उनका खाली बक्सा ही रहता है। अब बक्सों के भीतर क्या है, ये जानने की दिलचस्पी न तो नेता में होती है, न जनता में। आपको किसी ने कह दिया कि देखो ट्रक पर ईवीएम है, ये कहाँ जा रहा है। आप भी पूछने लगते हैं कि देखो ट्रक पर ईवीएम है, ये कहाँ जा रहा है! आप अपने कॉमन सेन्स को कहीं परचून की दुकान पर भेज देते हैं, और फिर जो कुछ कहा जा रहा है, लपक लेते हैं।

ये तीर अब विपक्ष को ही लगा है, वो भी इनकी देख-रेख में

हवाई कैम्पेन और झूठ, सनसनी जैसी 1980 के काल की राजनीति से 2019 का चुनाव जीतने निकले विपक्ष को मीडिया ने नुकसान ही पहुँचाया। मीडिया की क्रेडिबिलिटी अगर खराब भी हुई तो, यहाँ तो दूसरा मीडिया तैयार था, लेकिन विपक्ष ने जो अपनी विश्वसनीयता खोई है, उसे पाने की ये लोग सोच भी नहीं रहे। ये इस फ़िराक़ में हैं कि 23 को कैसे, क्या किया जाए कि परिणाम इनकी तरफ हो जाए, या इन्हें कुछ समय मिल जाए।

इसलिए अब ये अपनी तरकश का अंतिम तीर लिए घूम रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 50 और 100% वीवीपैट वाली याचिकाओं को ख़ारिज कर दिया, तो ये नई बातें फैला रहे हैं। कुछ लोग यह लिख रहे हैं कि अगर सुप्रीम कोर्ट ही ऐसे कर रहा है तो फिर लोगों का विश्वास टूट जाएगा। कुछ लोग यह लिख रहे हैं कि चुनाव आयोग बिक गया है, मोदी के हिसाब से चल रहा है। जबकि अगर देखा जाए तो राहुल गाँधी ‘आदिवासियों को गोली मार सकती है मोदी सरकार’ पर क्लीन चिट पा जाते हैं, और योगी पर 72 घंटे का बैन लग जाता है, तो चुनाव आयोग तो दूसरी तरह से खेलती नजर आ रही है। बंगाल पर चुनाव आयोग की चुप्पी तो अलग स्तर की ही थी। इसके साथ ही फ़िल्मों पर बैन से लेकर शादी के कार्ड पर पार्टी के लिए सपोर्ट जुटाने वालों पर संज्ञान लेने तक चुनाव आयोग इस बार तो विचित्र तरीके से पेश आया है।

इन लोगों को आशा थी कि सुप्रीम कोर्ट तो चार बजे भी ‘लोकतंत्र की हत्या हो रही है’ के चक्कर में खुल जाएगा, तो इन्हें कुछ और टाइम मिल जाएगा नए प्रपंच गढ़ने में। लेकिन कोर्ट ने नकार दिया तो अब ये लोग कोर्ट और आयोग पर ही हमला बोल रहे हैं। वहीं आयोग जिसने इन्हें कई राज्यों में सत्ता दिलाई, इन्हीं ईवीएम की मदद से, वो भी उन राज्यों में जहाँ भाजपा सत्तारूढ़ थी।

‘मैं नहीं खेल रहा’ से लेकर ‘जनता मूर्ख है’ तक

इसलिए विपक्ष अब उस नकारे, उद्दंड बच्चे की तरह आचरण कर रहा है जो हारते वक्त लूडो की सारी गोटियाँ इधर-उधर फेंक कर भाग जाता है। अब चुनाव आयोग की निष्पक्षता से लेकर सुप्रीम कोर्ट की अथॉरिटी पर सवाल बस इसलिए किए जा रहे हैं कि परिणाम इनके हिसाब से नहीं आ रहे। इन्हें अपनी निकृष्टता पर अभी भी विश्वास नहीं हुआ है, ये डिनायल मोड में हैं कि इनकी हार के लिए ये खुद ज़िम्मेदार नहीं है।

मशीनों पर ज़िम्मा फेंकते हुए असफल रहने पर एक एलीट और एन्टायटल्ड हिस्सा नई बातें करने में व्यस्त है। अब वही हो रहा है जिसे अंतिम (कु)तर्क कह सकते हैं: जनता ही पागल है जो मोदी जैसे को सत्ता दे रही है! दुर्भाग्य से भारत में अभी भी अजीत भारती के भी वोट का उतना ही मान है, जितना एपीजे अबुल कलाम साहब का था।

एक घमंड है इन पार्टियों के समर्थकों और मोदी के विरोधियों के भीतर। वो घमंड यह है कि वो जो सोचते हैं, वो जिन्हें चाहते हैं, उन्हें अगर बहुमत नहीं मिल रहा तो जनता पागल है। ये अभिजात्य मानसिकता, ये निम्न स्तर का दंभ, उसी तरीके से दिमाग में चढ़ता है जैसे सत्ता में होने पर पावर का नशा। दो-चार अक्षर पढ़ जाने वाले लोग, कुछ बड़े नामों की नौकरी करने वाले लोग, सोशल मीडिया पर दस-पचास लाइक से आह्लादित होने वाले लोग, ये घमंडी ब्रीड यह सोचने लगती है कि अगर उनकी बातों से कोई इत्तेफाक नहीं रखता तो वो मूर्ख है, जो आगे भुगतेंगे।

ये मानवीय कमजोरी है जिसे एक मुहावरे में ‘खिसियानी बिल्ली खम्भा नोंचे’ से उल्लेखित किया जा सकता है। जब आप किसी चीज को दिल से चाहें, और कायनात मदद के लिए न आए, तो पूरी कायनात ही महामूर्खों की मंडली हो जाती है। तब आप उन्माद में, अपने एरोगेन्स में, इस बात को स्वीकार ही नहीं पाते कि आपने… स्वयं आप ने, आप जैसे समझदार, महान, आदर्श विभूतिए ने, कुछ सोचा और भारत की 42% जनता आपके हिसाब से नहीं चल रही, तो ये देश का, समाज का, ओर पूरी मानवता का दुर्भाग्य हो जाता है।

फिर आप ऐसी बहकी-बहकी बातें करने लगते हैं जिनमें उस व्यक्ति की छवि दिखती है जो अपना काम न होने पर श्राप देने लगता है कि तुम्हारे घर में आग लगे, तुम्हारे बच्चे मर जाएँ, तुम्हें राह चलते कुत्ता काट खाए…

यही है वो अंतिम तीर। ये तीर है अवसाद का, ये तीर है उन्माद के चरम का। ये तीर विपक्ष और उनके समर्थकों ने अपने हाथ में लिया है, और गुस्से में अपने शरीर के तमाम हिस्सों में घुसेड़ लिया है क्योंकि उनके लिए अपने आप को गलत होते देखना, और लोकतंत्र के प्रतिभागी नागरिकों के बड़े प्रतिशत का उनके हिसाब से नहीं चलना, बहुत ही कष्टकारी है। कितना कष्टकारी? बहुत कष्टकारी, बहुत ज़्यादा…

इसलिए, मुन्नी बेगम को सुनिए, और उसे फ़ॉलो कीजिए कि

आवारगी में हद से गुज़र जाना चाहिए
लेकिन कभी-कभार तो घर जाना चाहिए…

इस लेख के बाकी तीन हिस्से यहाँ पढ़ें:
भाग 1: विपक्ष और मीडिया का अंतिम तीर, जो कैक्टस बन कर उन्हीं को चुभने वाला है
भाग 2: ज़मीर बेच कर कॉफ़ी पीने वाली मीडिया और लिबटार्डों का सामूहिक प्रलाप
भाग 3: वास्कोडिगामा की वो गन जो विपक्ष ने अपना नाम लेकर फायर किया

मालेगाँव ब्लास्ट: विशेष अदालत ने साध्वी प्रज्ञा समेत दो अन्य को पेशी से छूट दी

मालेगाँव ब्लास्ट मामले में सुनवाई कर रही NIA की विशेष अदालत ने मामले के आरोपितों प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ़्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित और सुधाकर चतुर्वेदी को कोर्ट में पेशी से छूट दे दी है। इन तीनों ने निजी समस्याओं और परेशानियों का ज़िक्र करते हुए अदालत से रियायत की माँग की थी।

ख़बर के अनुसार, भोपाल से बीजेपी की उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा और मिर्जापुर से निर्दलीय उम्मीदवार सुधाकर चतुर्वेदी ने अपनी याचिकाओं में चुनाव के दौरान अपनी व्यस्तताओं का हवाला दिया था। इनके अलावा कर्नल पुरोहित ने अपनी कुछ व्यक्तिगत परेशानियाँ बताई थीं। कोर्ट ने इन तीनों को पेशी से छूट तो दी ही इसके अलावा आरोपियों के वकीलों को विस्फ़ोट वाली जगह पर जाने की अनुमति भी दी।

हाल ही में, मुंबई की विशेष NIA कोर्ट ने मालेगाँव ब्लास्ट के आरोपितों के ख़िलाफ़ सख़्त रवैया अपनाया था। दरअसल, कोर्ट का यह सख़्त रवैया आरोपितों के कोर्ट में उपस्थित न होने के लिए था। पिछले काफ़ी समय से आरोपित कोर्ट में लगातार अनुपस्थित रहे थे, इसलिए कोर्ट ने सभी आरोपितों को सुनवाई के दौरान सप्ताह में एक बार कोर्ट रूम में हाज़िरी लगाने का निर्देश दिया था।

ख़बर के अनुसार, पिछले साल सितंबर में कर्नल पुरोहित पर आरोप तय करने पर स्टे की माँग ख़ारिज कर दी गई थी। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली शीर्ष अदालत की बेंच ने मालेगाँव ब्लास्ट मामले की SIT से जाँच कराने की याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कहा था कि वो अपनी इस याचिका को ट्रायल कोर्ट में ही दाखिल करें।

इससे पहले साध्वी प्रज्ञा ठाकुर द्वारा चुनाव लड़ने के ख़िलाफ़ भी एनआईए कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। एनआईए की स्पेशल कोर्ट ने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने संबंधी याचिका को ख़ारिज कर दिया था। इस याचिका पर कोर्ट ने फ़ैसला लिया था कि वर्तमान में किसी के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने की ताक़त हमारे पास नहीं है। किसे चुनाव लड़ना है और किसे नहीं, इस बात का निर्णय निर्वाचन चुनाव आयोग करेगा। ऐसी सूरत में मालेगाँव ब्लास्ट की आरोपी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के चुनाव लड़ने पर रोक नहीं लगाई जा सकती, इसलिए कोर्ट इस याचिका को ख़ारिज करती है। 

ग़ौरतलब है कि मालेगाँव में 29 सितंबर 2008 को एक मस्जिद के पास विस्फोट में 6 लोगों की मौत हो गई थी और 100 से अधिक लोग घायल हुए थे।

EVM को लेकर विपक्ष की नौटंकी जारी, चुनाव आयोग से मिलकर रखेंगे अपनी बात

लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे आने में अभी वक़्त है और विपक्षी दलों में हलचल का दौर तेज़ हो चला है। ख़बर के अनुसार, मंगलवार (21 मई) को EVM और VVPAT के मुद्दे पर कॉन्ग्रेस, सपा, बसपा, तृणमूल कॉन्ग्रेस समेत सभी दलों के नेताओं ने मिलकर बैठक की। इस बैठक के बाद सभी चुनाव आयोग के पास जाएँगे और वे VVPAT की पर्चियों का मिलान सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार करने और कई जगहों पर स्ट्रांगरूम से EVM के कथित स्थानांतरण से जुड़ी शिकायतों पर कार्रवाई की माँग करेंगे।

बता दें कि विपक्षी दलों ने मतगणना के समय किसी भी मतदान केंद्र पर गड़बड़ी पाए जाने की स्थिति में देशभर में सभी विधानसभा क्षेत्रों में EVM के आँकड़ों के साथ VVPAT मशीन की पर्चियों से मिलान की माँग की थी। इस पर कोर्ट ने मतगणना के समय पूरे देश में हर विधानसभा क्षेत्र के पाँच मतदान केंद्रों के EVM आंकड़ों का मिलान VVPAT की पर्ची से करने के लिए निर्वाचन आयोग को कहा था, जिससे चुनाव के नतीजे आने में देरी हो सकती है।

दिल्ली में हुई इस बैठक में कॉन्ग्रेस से अहमद पटेल, अशोक गहलोत, गुलाम नबी आज़ाद और अभिषेक मनु सिंघवी, माकपा (मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी) से सीताराम येचुरी, तृणमूल कॉन्ग्रेस से डेरेक ओ ब्रायन, तेलुगू देशम पार्टी (TDP) से चंद्रबाबू नायडू, आम आदमी पार्टी (आप) से अरविंद केजरीवाल, सपा (समाजवादी पार्टी) से रामगोपाल यादव, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से सतीश चंद्र मिश्रा और दानिश अली, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) से कनिमोझी, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) से मनोज झा, राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (राकांपा) से प्रफुल्ल पटेल और माजिद मेमन समेत कई अन्य पार्टियों के नेता भी इस बैठक का हिस्सा थे।

केंद्र में बीजेपी की नेतृत्व वाली सरकार गठित ना हो सके, इस बात को लेकर पूरा विपक्ष एकजुट होता दिख रहा है। फिर भले ही इनके बीच पीएम और डिप्टी पीएम के पद को लेकर शर्तों का दौर लगातार जारी हो। EVM और VVPAT के नाम पर इकट्ठे हुए यह सभी विपक्षी दल केवल बीजेपी को हाशिये पर जाते देखने के इच्छुक है, जो शायद अभी संभव नहीं है। इसकी वजह एग्जिट पोल के वो आँकड़े हैं जो इस बात की ओर इशारा करते हैं कि केंद्र में दोबारा मोदी सरकार बन सकती है। अब यह देखना बाक़ी है कि जब 23 मई को चुनाव के परिणाम घोषित होने के बाद विपक्षी दल कौन-सा मुद्दा उठाएँगे जिस पर वो अपनी सियासत गरमा सकें।

विपक्ष और मीडिया का अंतिम तीर, जो कैक्टस बन कर उन्हीं को चुभने वाला है (भाग 1)

आवारगी में हद से गुज़र जाना चाहिए,
लेकिन कभी-कभार तो घर जाना चाहिए

देश में दस लाख पोलिंग बूथ थे, लाखों EVM का इस्तेमाल हुआ, लगभग 60 करोड़ लोगों ने मतदान किया, हजारों सुरक्षा बलों और चुनाव कर्मचारियों ने इसे संपन्न कराया। पूरे चुनाव तक माहौल यही रहा कि राज्यवार गठबंधन काम कर जाएँगे, कॉन्ग्रेस ने तीन राज्य जीते तो क्या पता लोकसभा में भी चकित कर दे, क्या पता लोग राफेल और ‘चौकीदार चोर है’ को सच मान लें…

एक ओर ये चलता रहा और दूसरी ओर एग्जिट पोल्स ने कुछ और ही मामला बना दिया। मूर्ख-से-मूर्ख व्यक्ति भी उमर अब्दुल्ला की सलाह मान कर ये मन बना लेगा कि दस में से नौ संस्था भाजपा को बहुमत दे रही है तो, कुछ तो कारण रहा होगा। लेकिन कुछ लोगों ने एक अंतिम जोर लगाना बेहतर समझा है। वो लोग कौन हैं, उन्हें किसका समर्थन प्राप्त है, उनका लक्ष्य क्या है, ये हम और आप जानते हैं। फिर भी इस पर विस्तार से चर्चा बहुत आवश्यक है क्योंकि यही तय करेगा कि भारत का भविष्य क्या है।

विपक्ष का ‘बुलशिट’ वाला मिसाइल, जो इन्हीं की तरफ पलट गया है

विपक्ष की पूरा जोर इस बात पर रहा कि किसी भी तरह सत्ता उनमें से किसी भी के हाथ एक बार लग जाए, ताकि जो बड़े बदलाव इस देश में हो रहे हैं, जिससे इन पार्टियों को सीधे तौर पर नुकसान हुआ है, उन फ़ैसलों को पलट दिया जाए। जो केस चल रहे हैं, उन्हें रोक दिया जाए। जो फ़ंडिंग क़ानून की मदद से रोकी गई है, उसमें ढील दी जाए। पैसा इनका सूख चुका है, और जो कैश रिज़र्व था वो नोटबंदी में बेकार हो गया। अगर बेकार नहीं भी हुआ, तो उन्हें इसका हिसाब इनकम टैक्स वालों को देना ही होगा।

विपक्ष ने मुद्दे नहीं उठाए। विपक्ष ने सनसनी बनाने पर ज़्यादा ध्यान दिया। विपक्ष को समर्थन देने वाली मीडिया में भी वही सारी बातें होती रहीं जिनका आम जनता से कम, और विपक्ष की इमेज को बेहतर करने से ज्यादा वास्ता था। जस्टिस लोया की मौत को मुद्दा बनाया गया, गलत वित्तीय ज्ञान परोस कर अमित शाह के बेटे की कम्पनी को मुद्दा बनाया गया, अजित डोभाल के बेटों पर माहौल बनाने की कोशिशें हुई, नोटबंदी पर लाशें पैदा की गईं, जीएसटी पर उन व्यापारियों के नुकसान की बात हुई जो कहीं थे ही नहीं! कई ऐसी बातें कही गईं जिसे सुप्रीम कोर्ट ने कई बार नकार दिया गया।

डर और साम्प्रदायिकता का ज़हर विपक्ष ने फैलाया

अगर आप गौर से देखें तो साम्प्रदायिकता और समुदाय विशेष को डराने के नाम पर जो ज़हर विपक्ष और इनके समर्थन वाले मीडिया ने फैलाया है, वो सिर्फ ‘फ़ियर मॉन्गरिंग’ ही है। इस मामले में वामपंथी और छद्म-लिबरल गिरोह, पाक अकुपाइड पत्रकार और पत्रकारिता का समुदाय विशेष जिस तरह से नमक-पानी और सत्तू लेकर अपनी घृणा को तर्क और तथ्य बना कर बेचा है, वो गहन शोध का विषय है।

आप गौर से कुछ तथ्यों को देखिए। आप इस बात पर सवाल कीजिए कि आखिर जिस साम्प्रदायिकता की बात इन मीडियावालों ने खूब बेची है, वो आखिर है क्या? उसका आधार क्या है? क्या भाजपा से ताल्लुक़ रखना, मोदी के समर्थन में खड़े होना, भगवा कपड़े पहनना, तिलक लगाना ही साम्प्रदायिकता है? दंगे इस देश में सबसे ज़्यादा किन पार्टियों ने कराए? एक पैटर्न है दंगों का इस देश में। एक सपोर्ट सिस्टम है कान्ग्रेस और उनकी समर्थित पार्टियों का यहाँ पर।

अगर दंगे नहीं होंगे तो फिर ये तथाकथित सेकुलर पार्टियाँ वोट कैसे माँगेंगी? समुदाय विशेष को सिर्फ यह कहते रहना कि हिन्दू तुम्हें मार देगा, काम नहीं करता। इसलिए, मस्जिदों के बाहर सूअर और मंदिरों के बाहर गाय का सर फेंक कर दंगे कराना जरूरी हो जाता है कि अल्पसंख्यक इस नैरेटिव को सच मान ले। आप यह बात जान लीजिए कि दंगे स्वयं नहीं होते। दंगों के लिए पूरी व्यवस्था होती है। इस देश के सारे बड़े दंगे, कॉन्ग्रेस के केन्द्र या राज्य में रहते हुए ही हुए हैं। गोधरा में भी कारसेवकों को जलाया नहीं जाता, तो वो दंगा नहीं होता। कुछ दंगे एक पार्टी पर दाग लगाने के लिए किए गए।

अगर ऐसा नहीं है तो आप मुझे यह बताइए कि पिछले पंद्रह सालों में आपने किस दंगे की चर्चा सबसे ज्यादा सुनी? आप याद कीजिए कि गोधरा को दंगों का पर्याय कैसे बना दिया गया। आप यह याद कीजिए कि कैसे राजीव गाँधी जैसा दंगाई व्यक्ति इस देश की मीडिया का लाड़ला हो जाता है, और उसे डैशिंग और हैंडसम कह कर, उसके पापों को क्यूटनेस से धोने की बात की जाती है।

साम्प्रदायिकता और भाजपा दो अलग ध्रुव हैं। भाजपा कभी भी साम्प्रदायिक रही ही नहीं। अगर भाजपा साम्प्रदायिक है, तो फिर भारत की बाकी हर पार्टी उससे ज्यादा कट्टरपंथी रही है। हिन्दुओं को हितों की बात करना साम्प्रदायिकता नहीं है। पेपरों में भाजपा और भगवा को कम्यूनल होने का पर्याय बना देने से वो ऐसे नहीं हो जाते। क्या आपने इनसे आँकड़े माँगे कि बताओ और तुलनात्मक अध्ययन करो कि भाजपा ही साम्प्रदायिक क्यों है तुम्हारे लिए, और बाकी की पार्टियाँ कैसे साफ हो जाती हैं?

आशा की राजनीति

इस देश में आशाओं को भुनाने के लिए नायाब तरीके ढूँढ़े गए। इंदिरा ने गरीब को गरीब ही रहने दिया, ताकि ‘गरीबी हटाओ’ का नारा चिरकाल तक ‘न्याय’ के नाम से उनके पोते तक भुनाते रहें। लालू ने बिहार को साज़िशन निरक्षर रखने की योजना बनाई क्योंकि पढ़ा-लिखा बिहारी किसी घोटालेबाज़ को वोट क्यों देता! मायावती, मुलायम आदि ने एक जाति को दूसरे का डर दिखा कर अपनी नेतागीरी चमकाई।

किस पार्टी ने विशुद्ध विकास के मुद्दे पर राजनीति की है? किस पार्टी को सच में देश को हित से मतलब रहा है? आप गिनेंगे तो शायद उत्तर-पूर्व के कुछ मुख्यमंत्रियों और भाजपा को छोड़ कर आपको कोई याद नहीं आएगा। आखिर चुनावों में साम्प्रदायिकता सबसे बड़ा मुद्दा कैसे हो जाता है?

आखिर स्टूडियो में बैठे एंकर स्वयं ही यह रोना क्यों रोते हैं कि मुद्दों पर बात नहीं हो रही! वो खुद ही मुद्दे क्यों नहीं उठाते?

एडिटर्स गिल्ड और प्रेस क्लब क्या हैप्पी आवर में दारू और फ़िश फिंगर्स खाने के लिए बना है? कब इन संस्थाओं ने नेताओं को खिलाफ मोर्चा खोला और कहा कि बात इस पर होगी कि स्कूलों के शिक्षकों को वेतन नहीं मिल रहा, बात इस पर होगी कि अस्पतालों में बेड कम क्यों हैं, बात इस पर होगी कि शोध में पैसा कम क्यों है, बात इस पर होगी कि किसानों से सरकार सीधे उत्पाद क्यों नहीं ख़रीदती…

ऐसा नहीं होता क्योंकि मीडिया के चाटुकार-चम्पक-एंकरों का गिरोह राहुल गाँधी जैसे नालायक व्यक्ति को देश का भविष्य बताने पर तुला हुआ था। ऐसा नहीं होता क्योंकि ये पत्रकार अपना ज़मीर बेच कर एक व्यक्ति से खुले तौर पर घृणा करते हुए, नेताओं के साथ स्टेज पर खड़े दिखे। ऐसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि पत्रकारों के भीतर की नैतिकता मर चुकी थी, और संस्थानों की विचारधारा सर्वोपरि हो गई थी। यही कारण है कि ये एंकर, ये पत्रकार, ये रिपोर्टर, ये आलोचक, ये विश्लेषक हर बार उन बातों पर नैरेटिव बनाने की कोशिश में लगे हुए दिखे, जिससे किसी एक नेता की छवि बिगाड़ दी जाए।

मीडिया पूरी तरह से जनसामान्य से कटा हुआ दिखा, और स्टूडियो से कैम्पेनिंग में लगे लोगों ने बग़ल के गमले को छूकर भारत के खेतों की हालत पर रिपोर्टिंग कर दी। ये लोग कमरों में बैठ कर वोटरों का मूड और अंडरकरेंट बताने में लीन थे। जिन्हें धान और गेहूँ का फ़र्क़ नहीं पता, उन्होंने किसानों की स्थिति पर लेख लिखे। जिन्हें लोगों को किसी के व्यक्ति होने से पहले उनके मजहब में रुचि थी, उन्होंने बताया कि निकाह हलाला में मौलवी के साथ किसी महिला को इच्छा के विरुद्ध भी सोना पड़े तो वो उनका अपना मसला है।

ये है आपकी मीडिया जिसे आपने अपना समय दिया, अपने विचार इन्हें सुन कर बनाए, जिन्हें सच मान कर दोस्तों से लड़ाइयाँ कीं। याद कीजिए कि कितनी बार आपने सच जानने के लिए दूसरी तरह की बातें खोजीं? ध्यान से सोचिए कि जब आप एक ही तरह के, एक ही जगह से, एक ही व्यक्ति से प्रभावित हो कर उसी आधार पर अपनी सूचना का चुनाव करते हैं, तो क्या आप सही मायनों में सच जानने को उत्सुक होते हैं, या फिर आपके लिए जो सही ‘लग’ रहा हो, जो सही होने का चोला ओढ़े हो, जो आपने पूर्वग्रहों को संतुष्ट करता है, उसे चाहते हैं कि वही सच हो?

दोनों स्थिति में बहुत अंतर है। आप जो चाहते हैं कि वो सच हो जाए, वो कई बार सच नहीं होता। आपको लगता होगा कि जुनैद की हत्या गोमाँस के कारण हुई, जबकि सत्य यह है कि वो सीट के झगड़े में मारा गया। आपको लगता होगा कि रोहित वेमुला की आत्महत्या राजनीतिक थी, जबकि उसने अपने सुसाइड लेटर में लिखा कि उसके नाम पर राजनीति न हो। आपको लगता रहा कि अखलाख की भीड़ हत्या का पाप सारे हिन्दुओं के सर है, लेकिन सत्य यह है कि भले ही सारे आतंकी हमलों का सूत्रधार, धरती को ख़लीफ़ा के शासन में लाने की चाह रखने वाले एक खास मज़हब के दरिंदे करते हैं, लेकिन उस पाप का बोझ वो मज़हब नहीं उठाता।

इस लेख के बाकी तीन हिस्से यहाँ पढ़ें:
भाग 2: ज़मीर बेच कर कॉफ़ी पीने वाली मीडिया और लिबटार्डों का सामूहिक प्रलाप
भाग 3: वास्कोडिगामा की वो गन जो विपक्ष ने अपना नाम लेकर फायर किया
भाग 4: लिबरलों का घमंड, ‘मैं ही सही हूँ, जनता मूर्ख है’ पर जनता का कैक्टस से हमला

MEME और फेकिंग न्यूज के Fact Check की बेरोजगारी से बढ़िया है, मुद्रा लोन लेकर स्वरोजगार अपनाओ

मोदी सरकार के दौरान देश में रोजगार के अनाप-शनाप आँकड़े जुटाकर बेरोजगारी-बेरोजगारी चिल्लाने वाले कुछ गिरोहों ने ये बात कबूल करने में समय लगाया है कि उन्हें सबसे ज्यादा रोजगार के अवसर मोदी सरकार ने ही लाकर दिए हैं। फैक्ट चेक के नाम पर जो खिलवाड़ अपने पाठकों के साथ इन मीडिया गिरोहों ने किया है और करते जा रहे हैं वह फैक्ट चेक के इतिहास में शर्मनाक कहानियों की तरह याद किया जाएगा।

राजनीति के खानदान विशेष के आदेशों पर उनकी प्रेस वार्ताओं में राफेल डील को घोटाला साबित करने के लिए घटिया और वाहियात सबूत जुटाए। प्रधानमंत्री की गरिमा को नुकसान पहुँचाने और व्यक्ति विशेष के तौर पर नरेंद्र मोदी की छवि ख़राब करने के प्रयास के लिए कुछ विशेष सस्ती कॉमेडी करने वाले सचल दस्ते बड़ी मात्रा में तैयार किए गए। फिर भी रोजगार की कमी को मुद्दा बनाया गया। अभिजात्यों ने पकौड़े बनाने वालों से लेकर चौकीदारों तक का भरपूर मजाक बनाया।

लेकिन विगत कुछ दिनों में एक नया ट्रेंड सोशल मीडिया में देखने को मिला है। देशभर में मेनस्ट्रीम मीडिया ने सदियों से पत्रकारिता और विचारधारा को अपनी बपौती समझकर इकतरफा समाचार, मनगढ़ंत आरोप और दुष्प्रचार का जमकर इस्तेमाल किया। इसमें TOI से लेकर द हिन्दू जैसे बड़े मीडिया घरानों ने वाहवाही भी लूटी। मौजूदा सरकार के खिलाफ भड़ास को प्रमुखता से बड़ी हेडलाइन पर छापने के बाद माफीनामा 10 दिन बाद आखिरी के किसी पन्ने पर छापने का खूब बढ़िया धंधा चलाया गया। यह भी कहना जरुरी है कि माफ़ी माँगने का सिलसिला भी तब जाकर शुरू हुआ, जब सोशल मीडिया देश में अपने पाँव पसार रहा था। और दूसरी तरफ के लोगों को भी प्रतिक्रिया करने का अवसर मिलना शुरू हुआ।

आप सोचिए, आप संचार के माध्यम हैं। लेकिन आपको इस बात पर गर्व के बजाय घमंड है कि आपकी बात कितने लोगों को प्रभावित कर सकती है। फिर भी आप किसी संस्थान, नेता, व्यवस्था पर बिना सोचे-समझे आरोप लगा देते हैं। बाकायदा इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के माध्यम से किसी सूचना को एक बड़े वर्ग को पढ़वाकर आप बड़े स्तर पर जो हानि कर चुके होते हैं, क्या उसकी भरपाई एक छोटे से और लगभग अदृश्य माफीनामे से की जा सकती है?

साल भर में एक दिन की बरसात के लिए छाते की दुकान हैं फैक्ट चेकर वेबसाइट्स

झूठे दावों, घटनाओं और आँकड़ों की वास्तविकता बताने के लिए फैक्ट चेक नामक व्यवस्था ने जन्म लिया था। धीरे-धीरे हुआ यह कि फैक्ट चेक के अच्छे बाजार को देखते हुए उन्हीं लोगों ने फैक्ट चेक को अपना व्यवसाय बना लिया, जो फैक्ट्स और आँकड़ों के लिए सबसे बड़ा खतरा रहे हैं। इसका उदाहरण राफेल को विमानवाहक पोत (एयरक्राफ्ट कॅरियर) बताने वाली अरुंधति रॉय द्वारा फंड किए गए ऑल्ट न्यूज़ जैसी वेबसाइट्स हैं, जिनके झूठे प्रोपेगैंडा और फैक्ट के फैक्ट चेक्स की नग्नता को ऑपइंडिया अक्सर सामने लाता रहता है। दुखद बात यह है कि ऑल्ट न्यूज़ वेबसाइट का फाउंडर नफरत से भरा हुआ एक ऐसा व्यक्ति है, जो सोशल मीडिया से लेकर लोगों के के व्यक्तिगत जीवन में नजर रखता है और उनकी बेहद निजी जानकारियों को सार्वजानिक करते हुए और ज्यादा माँसल हुए जा रहा है।

इंटेरनेट के बढ़ते इस्तेमाल के साथ ही सोशल मीडिया से लेकर व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी पर चलने वाली फर्जी यानी, फेक ख़बरों का बाजार जमकर बढ़ा है। इसी बात का फायदा उठाकर पत्रकारिता के नाम पर दुकान चलाने वाले कुछ लोग उल-जुलूल और बेहद हास्यास्पद ख़बरों तक का फैक्ट चेक करते हुए देखे जा रहे हैं। यहाँ तक कि MEME और फोटोशॉप तस्वीरों तक का फैक्ट चेक करने वाले लोग खूब फलते-फूलते देखे जा रहे हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि वो समय दूर नहीं है जब फैक्ट चेक ही अपने आप में एक MEME बन चुका होगा।

फैक्ट चेक हम शर्मिंदा हैं, दी लल्लनटॉप…

इतिहास का सबसे निराशाजनक दिन वो था जब हिटलर के लिंग की नाप-छाप करने वाले कुछ मीडिया गिरोह फेकिंग न्यूज़ वेबसाइट की ख़बरों का फैक्ट चेक करते पाए गए। इससे भी दुखद यह देखना था कि इस फैक्ट चेक को करने के लिए वो अपने पाठकों को उल्टा समझाते हुए पाए गए कि यह खबर वास्तव में लोगों द्वारा सच समझी जा रही थी, इसलिए इसका फैक्ट चेक किया गया। हालाँकि, दी लल्लनटॉप ने मम्मी कसम खाकर पाठकों को मारक मजा देने की कसम खाई हुई है, इसलिए दी लल्लनटॉप में ये सब चलता रहता है। सिर्फ इस एक घटना के कारण मीडिया के समुदाय विशेष की इस छोटी सी टुकड़ी के विवेक को शंका की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। क्योंकि, चीते की चाल, बाज की नजर और दी लल्लनटॉप की ‘कसम’ पर शक नहीं करते!

फ़ेकिंग न्यूज़ की खबर का फैक्ट चेक, फैक्ट चेक के इतिहास का सबसे शर्मनाक फैक्ट चेक है – ‘यूनेस्को ‘

ट्विटर पर India Today के पत्रकार राहुल कंवल को कल ही एक ऐसे फोटोशॉप का फैक्ट चेक शेयर करते हुए देखा गया, जिसे देखकर उनकी बौद्धिक क्षमता पर सवालिया निशान लगाने की गुंजाइश ही ख़त्म हो जाती है। इस वीडियो को बनाने वालों ने खुद जाकर राहुल कंवल को समझाने का प्रयास किया कि ये सिर्फ Meme है और महज हास्य के लिए ट्विटर पर चलाया गया है।

एक नजर ऐसे ही कुछ वाहियात फैक्ट चेक पर, जिनके जरिए ये मीडिया गिरोह अपने पाठकों को ये जताना चाहते हैं कि उनके पाठक उनके जैसे बेहद बुद्धू और उन्हीं के जैसे दिमाग से पैदल हैं।

एक नजर स्वघोषित फैक्ट चेकर्स की मार्मिक एवं दुखद कहानी पर

मान गए, आपकी पारखी नजर और राहुल कँवल, दोनों को …
ट्विटर पर मोदी की रैलियों को स्पीड-अप कर के चलाने वाले लोग जब फैक्ट चेकर बन जाते हैं तब ऐसी ही बीसी
होती है
राहुल को बचाने में NBT ने भी दिया योगदान!
एग्जिट पोल के रुझान देखते ही फैक्ट चेकर्स के रुझान भी बदल गए
मारक मजा देने के लिए अपनी कसम के अनुसार ,पत्रकारिता के नाम पर संक्रामक रोग परोसते हुए दी लल्लनटॉप
ओ माई गॉड! डिम्पल गाँधी -दी क्यूटेस्ट को घूँसा पड़ा
स्वघोषित जिन्नाजीवी फैक्ट चेकर्स

इस फैक्ट चेक को पढ़ने के बाद अपने आप को ‘फेसबुक पर सुरक्षित’ अवश्य चिन्हित करें

हमारी राय: प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY) है स्वरोजगार का सबसे बेहतर विकल्प

ऐसे समय में, जब देश का एक बड़ा वर्ग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजनाओं का लाभ उठाकर स्वरोजगार की ओर बढ़ रहा है, अपने नाम के आगे बेरोजगार लिखने वालों को भी कुछ स्कीम्स का लाभ जरूर लेना चाहिए। पकौड़े बेचना और ‘चौकीदार’ होना ‘बेराजगार’ होने से कहीं बेहतर विकल्प है।

प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY) में कैसे मिल सकता है लोन?

मुद्रा योजना (PMMY) के तहत लोन के लिए आपको सोशल मीडिया और व्हाट्सएप्प ग्रुप में फेक न्यूज़ का कच्चा माल तलाशने से थोड़ा फुर्सत निकालकर किसी बैंक की शाखा में आवेदन करना होगा। इंटरनेट पर लोगों को भक्त साबित करते हुए अगर आप दिन प्रति दिन चिड़चिड़े होते जा रहे हैं और इसके कारण अगर आप अब निराश होकर खुद का कारोबार शुरू करना चाहते हैं, तो आपको मकान के मालिकाना हक़ या किराए के दस्तावेज, काम से जुड़ी जानकारी, आधार, पैन नंबर सहित कई अन्य दस्तावेज देने होंगे।

नेहरू ने जो बैंक इस देश को दिए थे, उस बैंक का ब्रांच मैनेजर आप से कामकाज से बारे में जानकारी लेता है। ध्यान रखें कि उसे ये मत बताइएगा कि आपके पास आपसे भिन्न विचारधारा रखने वालों को भक्त साबित करने और पकौड़े बनाने वाले और चौकीदारों को गाली देने के अलावा और कोई काम बाकी नहीं है। आपके काम के आधार पर आपको PMMY लोन मंजूर करता है। कामकाज की प्रकृति के हिसाब से बैंक मैनेजर आपसे एक प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनवाने के लिए कह सकता है। उसे मोदी का एजेंट समझकर पारित हो चुके लोन के लिए मना मत कर देना।

इतना सीधा नहीं है ओपी राजभर को हटाने के पीछे का गणित, समझें शाह के व्यूह की तिलिस्मी संरचना

भाजपा ने अमित शाह की अध्यक्षता में एक नया तरीका ईजाद किया है, या यूँ कहें कि एक ऐसा तरीका चुना है, जिससे बागी नेताओं से अच्छी तरह निपटा जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में नवजोत सिंह सिद्धू, शत्रुघ्न सिन्हा और उदित राज जैसे नेताओं ने पार्टी छोड़ी। अगर ध्यान से देखें तो ये तीनों ही बड़े नेता थे। जहाँ शत्रुघ्न वाजपेयी काल के सबसे वफादार नेताओं में से एक रहे थे, वहीं उदित राज को दलितों का बड़ा चेहरा बना कर पेश किया गया था। जबकि नवजोत सिंह सिद्धू पंजाब में पार्टी के कर्ताधर्ताओं में से एक थे। भाजपा ने धीमे-धीमे सोची-समझी रणनीति के तहत इन बाग़ी नेताओं को पार्टी छोड़ने को मज़बूर कर दिया और इन्हें सहानुभूति का पात्र भी नहीं बनने दिया। लेकिन ओम प्रकाश राजभर का मामला थोड़ा अलग है।

आगे बढ़ने से पहले जान लेते हैं कि ओपी राजभर हैं कौन? ओम प्रकाश राजभर अपने समुदाय के सबसे बड़े नेताओं में से एक माने जाते रहे हैं। क्योंकि पूर्वी उत्तर प्रदेश में 18% लोग राजभर समुदाय से आते हैं। राज्य के बाकी हिस्सों में भी इस समुदाय की अच्छी-ख़ासी जनसंख्या है। ओपी राजभर की पार्टी सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी का मुख्यालय पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के अंतर्गत ही आता है, इसीलिए उन्हें हैंडल करने के लिए भाजपा ने अतिरिक्त सावधानी बरती। उन्हें मार्च 2017 में उत्तर प्रदेश का कैबिनेट मंत्री बनाया गया। उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में एक-एक समुदाय के वोट का अलग महत्व होता है, ऐसे में राजभर को भाजपा ने कैसे अप्रासंगिक बनाया?

ओपी राजभर का राजनीतिक कार्यक्षेत्र गाज़ीपुर रहा है। गाज़ीपुर और वाराणसी की दूरी ज्यादा नहीं है, ऐसे में इस मामले में थोड़ी सी भी गड़बड़ी का अर्थ था- पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र या आसपास के क्षेत्रों में चुनाव के दौरान भाजपा को नुकसान। ओपी राजभर मंत्री बनने के बाद कुछ दिनों तक तो शांत रहे लेकिन उसके बाद अचानक से उनकी बयानबाज़ी बढ़ गई। भाजपा ने उन्हें बोलने दिया, उदित राज और शत्रुघ्न सिन्हा की तरह। ऑपइंडिया से भी बात करते हुए राजभर ने कहा था कि वह मोदी को अपना नेता नहीं मानते हैं और वो अपने नेता ख़ुद हैं। ओपी राजभर को अप्रासंगिक बनाने के लिए तीन नए किरदारों की एंट्री होती है। इसके बारे में पहले समझना पड़ेगा।

इस कहानी के पहले किरदार हैं– सकलदीप राजभर। भाजपा ने सकलदीप राजभर को तब आगे बढ़ाया, जब पार्टी किसी भी बड़े नेता को राज्यसभा भेज सकती थी। मार्च 2018 में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा में भेजने के लिए कई बड़े नेताओं का नाम दरकिनार कर सकलदीप को चुना गया। बलिया के रहने वाले और 2002 में विधानसभा चुनाव हार चुके सकलदीप राजभर को राज्यसभा सांसद बना कर भाजपा ने राजभर समुदाय के भीतर यह सन्देश दिया कि अकेले कोई पार्टी उसकी हितैषी नहीं है बल्कि भाजपा ही उनके बारे में सोचती है। चूँकि राजनीति में कई निर्णय जाति के आधार पर लिए जाते रहे हैं, इसलिए यहाँ हमारी विवशता है कि राजनीतिक दलों द्वारा लिए गए ऐसे निर्णयों में जाति का उल्लेख करें।

पुराने संघी सकलदीप राजभर को ‘सड़क’ से उठा कर सांसद बना दिया गया

सकलदीप राजभर संघ और भाजपा से काफ़ी समय से जुड़े रहे हैं लेकिन ग्राम प्रधान से ज्यादा उन्होंने किसी चुनाव में कोई ख़ास प्रदर्शन नहीं किया। यहाँ तक कि 2017 विधानसभा चुनाव में भी उन्हें टिकट नहीं दिया गया था। ओपी राजभर के बड़बोलेपन के बाद भाजपा ने उन्हें अचानक से राज्यसभा भेजकर बड़ा दाँव खेला।पार्टी 2017 विधानसभा चुनाव में राजभर समुदाय के वोटों को लेकर आश्वस्त थी क्योंकि ओपी राजभर गठबंधन साथी थे लेकिन भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को पता चल गया था कि ओपी राजभर के बगावत के कारण लोकसभा चुनाव के दौरान दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। इसीलिए, सकलदीप को आगे किया गया।

इस कहानी के दूसरे किरदार हैं– हरिनारायण राजभर। हरिनारायण ने 2014 लोकसभा चुनाव में घोसी सीट से जीत दर्ज की थी। पूर्वांचल में घोसी सीट के लिए इस बार भाजपा ने उम्मीदवार की घोषणा सबसे अंत में की। इससे पहले पूर्वांचल की सभी सीटों के लिए उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की जा चुकी थी। चूँकि यह सीट सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी को जानी थी, भाजपा ने अंत तक गठबंधन की उम्मीद बनाए रखी। लेकिन, ओपी राजभर की बढ़ती माँगों के आगे झुकने की बजाए भाजपा ने फिर से हरिनारायण राजभर पर दाँव खेला। दरअसल, ओपी राजभर बलिया या घोसी की सीट अपने बेटे अरुण राजभर के लिए चाहते थे, जिसमें उन्हें कामयाबी नहीं मिली।

घोसी सांसद हरिनारायण राजभर को टिकट देकर भाजपा ने ओपी राजभर को उनके घर में ही घेरा

लोकसभा चुनाव का अंतिम चरण आते-आते ओपी राजभर की हालत यह हो गई कि बौखलाहट में उन्होंने अपनी पार्टी के लोगों से भाजपा कार्यकर्ताओं को जूते से पीटने का आह्वान किया। दरअसल, भाजपा ने बड़ी चालाकी से ज़मीनी स्तर पर सुहलदेव समाज पार्टी से गठबंधन टूटने वाली न्यूज़ को फैलने नहीं दिया या फिर रोकने का प्रयास किया ताकि आम लोगों को ऐसा लगे कि भाजपा के विरोध में ओपी राजभर की पार्टी का कोई उम्मीदवार नहीं खड़ा है। जबकि, असल में ओपी राजभर ने यूपी की लगभग आधी सीटों पर उम्मीदवार उतार दिए थे। उनके उम्मीदवारों को लेकर ज़मीनी स्तर पर सूचनाएँ पहुँचनी ही नहीं दी गई (ज़ोर-ज़बरदस्ती से नहीं, रणनीति के तहत), इससे वह बौखला उठे थे।

एक कारण यह भी है कि भाजपा बीच चुनाव में ओपी राजभर पर कार्रवाई कर के उन्हें ख़बरों में लाना नहीं चाहती थी, परिणाम यह हुआ कि वो अधिकतर नेगेटिव कारणों से चर्चा में रहे। धीरे-धीरे भाजपा ने उनकी इमेज को नेगेटिव होने दिया और उनका पर कतर दिया। इस्तीफा पॉकेट में लेकर घूमने वाले राजभर की बातों पर कोई ध्यान ही नहीं दिया गया। घोसी से हरिनारायण राजभर को टिकट दिए जाने के बाद ओपी राजभर अपने ही घर में घिर गए। लोकसभा चुनाव ख़त्म होते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक्शन में आए और उन्होंने ओपी राजभर, उनके बेटे सहित कई बाग़ी नेताओं को निकाल बाहर किया। ओपी राजभर से उनका मंत्रालय छीन लिया गया।

ओपी राजभर के पास कौन सा मंत्रालय था? इसमें भी बहुत कुछ राज़ छिपा है क्योंकि इसे जाने बिना आप ओपी राजभर को निकाले जाने के पीछे की रणनीति को नहीं समझ पाएँगे। उनके पास ‘पिछड़ा वर्ग कल्याण’ मंत्रालय था क्योंकि राजभर समुदाय भी पिछड़ा वर्ग में ही आता है। भाजपा के पास पहले से ही इस बात की रणनीति तैयार थी कि उन्हें हटाने के बाद यह मंत्रालय किसे दिया जाएगा? यहीं पर इस कहानी के तीसरे किरदार की एंट्री होती है– अनिल राजभर। अनिल राजभर का क़द भाजपा में पिछले कई महीनों से ही बढ़ना शुरू हो गया था और इसके पीछे एक सोची-समझी रणनीति थी।

योगी मंत्रिमंडल के सदस्य अनिल राजभर का क़द बढ़ाना कई महीनों से शुरू कर दिया गया था

अनिल राजभर के पिता भी भाजपा के विधायक रहे थे, ऐसे में पार्टी को उनके नाम के साथ राजभर समुदाय के बीच जाने में कोई परेशानी महसूस नहीं हुई। छात्र राजनीति में सक्रिय रहे अनिल को अपने पिता की मृत्यु के बाद पराजय का सामना करना पड़ा था लेकिन 2017 में उन्होंने जीत का परचम लहराया। ओपी राजभर के सभी विभाग उन्हें सौंप दिए गए ताकि राजभर समुदाय के भीतर कोई ग़लत सन्देश न जाए और ओपी राजभर को सहानुभूति पाने का कोई मौक़ा न मिले। इससे एक बात तो साफ़ हो गई – भाजपा ने एक से एक तीर चला कर ओपी राजभर को इस बात के लिए विवश कर दिया कि वो भाजपा पर राजभर समुदाय की उपेक्षा का आरोप न मढ़ सकें। दूसरे मामले में अगर इसका उलटा होता तो पार्टी को ख़ासा नुकसान उठाना पड़ सकता था।

ओपी राजभर को कड़ा जवाब देने के लिए ही अनिल अनिल राजभर को चुना गया। ओपी राजभर को मंत्री पद से हटाए जाने के बाद अनिल राजभर ने कहा, “यह एक बड़ा फ़ैसला है। राजभर समाज की भावनाओं का ख्‍याल करते हुए उनको बरख़ास्त किया है। इसका पूरा राजभर समाज स्वागत करता है। आप जिस सरकार में रहते हैं, उसी सरकार के ख़िलाफ़ बोलते हैं। अगर आप नाख़ुश हैं तो फिर सरकार में बने क्‍यों हैं? वह तो बहुत दिनों से पॉकेट में इस्‍तीफा लेकर घूम रहे थे, आज उनके मन की मुराद मुख्‍यमंत्री जी ने पूरी कर दी।” अनिल राजभर के बयान को गौर से पढ़ें और आपको पता चल जाएगा कि ओपी राजभर को किस तरीके से राजभर समुदाय के उल्लेख करते हुए जवाब दिया गया।

तो इस तरह से इन तीन किरदारों की मदद से भाजपा ने ओपी राजभर को अप्रासंगिक बना दिया, यूपी का जीतन राम माँझी बना दिया। उन्हें राष्ट्रीय मीडिया में मज़ाक का पात्र तो बनाया ही गया (जिसके ज़िम्मेदार वह ख़ुद हैं), साथ में उन्हें अपने समुदाय के बीच अपने पक्ष में सहानुभूति लहर पैदा करने का मौक़ा भी नहीं दिया गया। सीएम योगी के कड़े तेवर और अमित शाह की रणनीति से यह सब संभव हो पाया क्योंकि भाजपा अध्यक्ष के बारे में कहा जाता है कि वह बूथ स्तर तक पर पार्टी के मामलों की जानकारी रखते हैं, ख़ासकर यूपी में, जहाँ वो 2014 लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रभारी भी रह चुके हैं।

लेकिन, इसकी पटकथा लिखी जानी कब की शुरू हो गई थी। 29 दिसंबर 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गाज़ीपुर की रैली में उन्हें बुलाया लेकिन वह नहीं आए। इसके बाद इसे सीधा प्रधानमंत्री से पंगा लेने के रूप में देखा गया। पीएम ने यहाँ सुहलदेव पर डाक टिकट जारी कर ओपी राजभर को चारों खाने चित कर दिया। लेकिन, भाजपा के अंदर तभी से इस बात को लेकर चर्चा चल रही थी कि पीएम की रैली स्किप करने का क्या परिणाम हो सकता है! यानी पूरी योजना बनाने और इसे धरातल पर उतारने में 6 महीनों का समय लगा। वहीं अनिल राजभर को पीएम की रैली के लिए राजभर समुदाय के लोगों की भीड़ जुटाने का इनाम मिला। उन्होंने राजभरों की टीम बना कर पीएम की रैली के लिए व्यवस्था की।

238-248 सीट: BJP को नहीं मिलने वाला है पूर्ण बहुमत, करोड़ों-अरबों के सट्टा बाजार का अनुमान

19 तारीख को सभी मीडिया संस्थाओं के एग्जिट पोल आने के बाद अब सट्टा बाजार भी इस बात का दावा कर रहा है कि एक बार फिर 23 मई को देश की सत्ता मोदी सरकार को मिलने वाली है। जनसत्ता में प्रकाशित खबर के मुताबिक केंद्र में दोबारा एनडीए की सरकार बनने वाली है और एक बार फिर देश के प्रधानमंत्री पद को नरेंद्र मोदी संभालेंगे।

मुंबई और दिल्ली सट्टा बाजार ने भाजपा को इन चुनावों में 238-241 सीटें दी हैं, जबकि कॉन्ग्रेस को लेकर अनुमान है कि पार्टी को 78-81 सीटें मिलेंगी।

इसी तरह गुजरात और राजस्थान के सट्टा बाजार में भी बीजेपी के पक्ष में अनुमान लगाए गए हैं। गुजरात के सट्टा बाजार के मुताबिक भाजपा को 242-244 सीटें और कॉन्ग्रेस को 80-82 जीतने के अनुमान हैं। वहीं राजस्थान सट्टा बाजार के अनुसार भाजपा को 242-245 सीटें और कॉन्ग्रेस को 75-80 सीटें मिलने वाली है।

कॉन्ग्रेस शासित राज्य मध्य प्रदेश की राजधानी में भी शहर के पंटर्स का अनुमान है कि भाजपा को 246-248 के बीच सीट मिलेंगी जबकि कॉन्ग्रेस के खाते में 80-82 सीट आएँगी।

हालाँकि, इन सबका कोई आधिकारिक आँकड़ा उपलब्ध नहीं है लेकिन कहा जा रहा है कि चुनावों में पार्टियों के प्रदर्शन पर सट्टा बाजार में करोड़ों के दाँव लगे हुए हैं। इसके अलावा सट्टा बाजार में इस बार नरेंद्र मोदी के पीएम बनने को लेकर, अमेठी में राहुल गाँधी को जीतने को लेकर और यूपी में सपा-बसपा के गठबंधन पर भी खूब पैसे लगे हुए हैं।

खबर के मुताबिक इस चुनाव में सट्टा बाजार का आकार साल 2014 के लोकसभा चुनाव से अच्छा खासा बड़ा है। कुछ पंटर्स के अनुमान के मुताबिक इस बार दुगना पैसा सट्टा में लगा हुआ है। बता दें कि देश के अधिकांश भागों में सट्टा लगाना गैरकाननूनी है। लेकिन ऑनलाइन सट्टेबाजी को लेकर किसी प्रकार की कोई गाइडलाइन नहीं है। सट्टा लगाने वाले मोबाइल फोन, एप्लीकेशन और वेबसाइट के जरिए सट्टा लगाते हैं।

‘सड़कों पर बहेगा खून अगर मनमुताबिक चुनाव परिणाम न आए, समर्थक हथियार उठाने को तैयार’

एग्जिट पोल को ‘गप’ करार देने से शुरू हुआ विपक्ष का स्तर अब खुलेआम हिंसा करने और खून बहाने तक आ गया है। बिहार महागठबंधन के भागीदार और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने मतदान परिणाम मनमुताबिक न होने पर सड़कों पर खून बहा देने की धमकी दी है। साथ ही इस संभावित हिंसा का ठीकरा एक ही साँस में बिहार की नीतीश और केंद्र की मोदी सरकार के सर फोड़ दिया है।

‘हथियार भी उठाना हो तो हथियार उठाना चाहिए’

पत्रकारों से बात करते हुए पूर्व में भाजपा नीत एनडीए के साथ सत्ता की मलाई काट चुके उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि लोगों में इस समय आक्रोश है। ऐसे में अगर ‘रिजल्ट लूटने’ की घटना हुई तो सड़कों पर खून बहेगा। उन्होंने अपने समर्थकों से हथियार उठाने के लिए तैयार रहने को भी कहा है। साथ में कहा कि अगर ऐसी कोई हिंसा होती है तो उसके लिए बिहार और केंद्र की सरकार जिम्मेदार होंगे

निर्वाचन के पहले, इसके दौरान और एग्जिट पोल के नतीजे आने के बाद से विपक्षी नेताओं का EVM और निर्वाचन आयोग पर आरोप लगाना बदस्तूर जारी है। EVM और निर्वाचन आयोग को लेकर जिस तरह से संगठित दुष्प्रचार किया जा रहा है, उसे देखते हुए यह शंका जताई जा सकती है कि नतीजों के समय कहीं बड़े स्तर पर हिंसा करने के लिए पृष्ठभूमि तो नहीं तैयार की जा रही?

मायावती ने करीबी पार्टी MLA को किया निलंबित, भाजपा प्रत्याशी से गले मिलने का आरोप

एग्जिट पोल के नतीजे आने के बाद से ही विपक्ष के नेताओं में सिमटते जनाधार को लेकर चिंता का माहौल है। पहले ममता बनर्जी ने सर्वेक्षणों को ही ‘गॉसिप’ करार दिया, और अब मायावती ने अपनी संभावित हार के लिए बलि के बकरे तलाशने शुरू कर दिए हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश के पूर्व ऊर्जा मंत्री और विधानसभा में पार्टी के विधायक दल के सचेतक (व्हिप – whip) रामवीर उपाध्याय को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। उन पर पार्टी-विरोधी गतिविधियों में भागीदारी का आरोप लगाया गया है।

मिले थे गले, भाई पहले से भाजपाई

सोशल मीडिया पर कुछ दिन पहले भाजपा के आगरा प्रत्याशी एसपी सिंह बघेल को गले लगाते हुए रामवीर उपाध्याय की तस्वीर सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हुई थी। हालाँकि रामवीर उपाध्याय ने सफाई दे दी थी कि बघेल उनसे रास्ते में ‘टकरा’ गए थे और उन्होंने शिष्टाचारवश कुशल-क्षेम पूछा था, लेकिन अटकलबाजियों का दौर शुरू हो ही गया था। इससे पहले पिछले वर्ष रामवीर के भाई मुकुल उपाध्याय पहले ही भाजपा में शामिल हो चुके हैं।

मायावती के माने जाते थे करीबी

पार्टी महासचिव मेवालाल गौतम की ओर से कभी मायावती के करीबी माने जाने वाले रामवीर उपाध्याय को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि कि उन्हें पहले भी पार्टी विरोधी गतिविधियों में भागीदारी को लेकर सचेत किया गया था। इसके बावजूद आगामी लोकसभा के निर्वाचन के समय कई सीटों पर, जिनमें आगरा, फतेहपुर सीकरी, अलीगढ़ शामिल हैं, न केवल उन्होंने पार्टी के प्रत्याशियों का समर्थन नहीं किया बल्कि विरोधी पार्टियों के उम्मीदवारों के पक्ष में समर्थन किया। इसे गंभीर अनुशासनहीनता मानते हुए उन्हें पार्टी से निलंबित किया जाता है। उनसे प्रदेश विधानसभा में पार्टी के विधायक दल के मुख्य सचेतक (व्हिप) के पद से भी पदमुक्त कर दिया गया है। साथ ही, वह पार्टी के किसी भी कार्यक्रम, मीटिंग आदि में भी हिस्सा लेने के अधिकारी नहीं होंगे