Home Blog Page 5817

20 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली पार्टी को 35+ सीटें: ‘क्रन्तिकारी’ पत्रकार का क्रन्तिकारी Exit Poll

पिछले कुछ दिनों से वह जिस भी मीडिया संस्थान में नौकरी करने जा रहे हैं, वहाँ से उन्हें निकाल बाहर किया जा रहा है। कभी अरविन्द केजरीवाल के साथ अपनी केमिस्ट्री को लेकर ‘क्रन्तिकारी’ का दर्जा पा चुके पुण्य प्रसून वाजपेयी पर अब उम्र के साथ-साथ नौकरी छूटने का असर भी साफ़-साफ़ दिख रहा है। जहाँ कई मीडिया चैनल, सर्वे एजेंसियाँ मिल कर एग्जिट पोल्स जारी कर रही हैं और फिर भी वो चेतावनी दे रहे हैं कि फाइनल नतीजे इससे बिलकुल अलग हो सकते हैं, पुण्य प्रसून वाजपेयी ने ‘अपना ख़ुद का एग्जिट पोल’ जारी किया है। उन्होंने कहाँ-कहाँ जाकर मतदताओं से बात की, इस बारे में कुछ न ही पूछिए तो बेहतर है। वाजपेयी अब टीवी चैनलों से ऊपर उठ कर स्वयं में ही एक संस्थान बन बैठे हैं।

उनके एग्जिट पोल के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी की सीटें 282 से घट कर सीधा 145-152 पर आ जाएगी। कॉन्ग्रेस को 100 से अधिक आएँगी और यूपी महागठबंधन को 50 से ज्यादा सीटें मिलेंगी। उन्होंने तृणमूल को 35 से भी अधिक सीटें मिलने का अनुमान लगाया है। बंगाल में भाजपा केउद्भव को वाजपेयी ने सीधे तौर पर नकार दिया है। लेकिन, वाजपेयी ने इससे भी बड़ी ग़लती या यूँ कहें, ब्लंडर किया है। उन्होंने डीएमके के 35 से भी अधिक सीटें जीतने की बात कही है।

क्या डीएमके 35 से अधिक सीटें जीत सकती है? अगर पुण्य प्रसून वाजपेयी जैसा विरिष्ठ और बड़ा पत्रकार इस तरह के दावे करे, तो भले ही अनुमानों में भिन्नता हो सकती है लेकिन कुछ बेसिक फैक्ट चेक तो उन्होंने किया ही होगा। लेकिन नहीं, पुण्य प्रसून वाजपेयी ने ऐसा करने की ज़रूरत नहीं समझी। ऐसी पार्टी, जो सिर्फ़ 20 सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है, उसे वाजपेयी ने 35 सीटें दे दी है। ऐसा कैसे संभव है? क्या डीएमके द्वारा जीती गई एक सीट को दो या डेढ़ गिना जाएगा? 20 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली पार्टी 35 सीटें कैसे जीत सकती है?

सबसे बड़ी बात कि मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस के आधिकारिक पेज ने इस कथित एग्जिट पोल को शेयर भी किया। हो सकता है पुण्य प्रसून वाजपेयी का इरादा ही यही रहा हो- बिना फैक्ट जाने कुछ भी आँकड़े दे देना, ताकि फाइनल रिजल्ट्स आने तक कॉन्ग्रेस पार्टी के लोग तो उनका वीडियो शेयर करें। अगर डीएमके तमिलनाडु की सारी सीटों पर चुनाव लड़ती तो पुण्य प्रसून वाजपेयी शायद उसे देश में पूर्ण बहुमत देते हुए स्टालिन के भारत का प्रधानमंत्री बनने का अनुमान लगा लेते।

इससे पहले भी वाजपेयी ने अपनी राजनीतिक नासमझी का परिचय तब दिया था, जब उन्होंने कहा था कि आचार संहिता लागू होते मोदी सरकार ‘केयरटेकर सरकार’ की भूमिका में आ जाएगी। इसपर उन्हें लताड़ लगाते हुए एक आईएएस अधिकारी ने उन्हें कहा था, “बाजपेयी जी, एंकरिंग आपको संवैधानिक विशेषज्ञ नहीं बनाती है। लोकसभा भंग होने पर ही सरकार केयर-टेकर बनती है। कृपया भारत में पाकिस्तान और बांग्लादेश का संविधान लागू न करें।” पुण्य प्रसून वाजपेयी बड़े मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं लेकिन उनके ताज़ा कांडों से लगता है कि उन्हें संविधान और राजनीति पर ट्यूशन लेने की ज़रूरत है।

सोनिया, प्रियंका किस हैसियत से हत्यारों को माफ कर रही हैं? 20 अन्य लोगों की जान की कीमत क्या?

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की आज 28वीं पुण्यतिथि है। गाँधी परिवार के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी समेत अन्य पार्टी नेताओं ने वीरभूमि पर उन्हें श्रद्धांजलि दी। प्रधानमंत्री मोदी ने भी उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए ट्वीट किया, “पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि।”

एक तरफ जहाँ देश राजीव गाँधी की हत्या का शोक मना रहा है और उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है, वहीं उन 20 लोगों को पूरी तरह से भुला दिया जिन्होंने श्रीपेरंबदुर विस्फोट में अपनी जान गँवाई थी। जब-जब राजीव गाँधी के हत्यारों को माफ़ करने की बात सामने आती है, तो उन 20 लोगों को क्यों भुला दिया जाता है जिनके नाम के आगे गाँधी नहीं लगा हुआ था? चाहे सोनिया हों या प्रियंका गाँधी वाड्रा, आखिर किस हैसियत से ये लोग उन हत्यारों को रिहा करने या उनकी सजा कम करने की बात करती हैं? क्या ये हत्यारे सिर्फ राजीव गाँधी के हत्यारे थे? या इन्होंने अन्य 20 परिवारों से भी ऐसा करने की अनुमति ले रखी है? अगर नहीं तो कानून को अपना काम करने देना चाहिए और ऐसे मार्मिक मुद्दों पर राजनीति से बचना चाहिए।

हिन्दुस्तान टाइम्स – 22 मई 1991

राजीव गाँधी पहले देश के प्रधानमंत्री थे बाद में पिता या पति – शुद्ध राजनैतिक सिद्धांत यही कहता है। वह जनता के प्रतिनिधियों के प्रतिनिधि थे और उनकी हत्या की माफ़ी का अधिकार किसी को भी नहीं। वस्तुतः किसी भी नागरिक की हत्या की माफी का अधिकार किसी को भी नहीं है। इसलिए देश के 20 आम नागरिक जो उस हादसे की भेंट चढ़ गए थे, उन्हें इस तरह भुला देना कहीं से भी न्यायसंगत नहीं। राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए आप उनके शोक-संतप्त परिवारों की भावनाओं से नहीं खेल सकते।

राजीव गाँधी का संबंध राजनीतिक घराने से था और वर्चस्व राजनीति से। शायद इसलिए हर साल उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है। लेकिन वो 20 लोग आम नागरिक होने ज़्यादा शायद कुछ नहीं थे, इसलिए उन्हें श्रद्धाजंलि देना तो छेड़िए, उनके हत्यारों तक को माफ करने की बात चलती है, माफ कर भी दिया जाता है, विधानसभा से राज्यपाल को चिट्ठी लिखी जाती है लेकिन लगातार हार से परेशान कॉन्ग्रेस तमिलनाडु में जीत (भले ही सहयोगियों द्वारा) का स्वर सुनने में व्यस्त है। विरोध करे भी तो कैसे करे! विरोध मतलब एक मजबूत दिख रहे सहयोगी का चला जाना।

गाँधी परिवार के लिए हो सके राजीव गाँधी को खोने का दर्द हो (और होना भी चाहिए) लेकिन उन्हें यह कतई नहीं मानना चाहिए कि उन 20 लोगों के परिवार का दर्द, गाँधी परिवार के दर्द से कुछ कम है। वो बात अलग है कि उन परिवारों का दर्द कभी सामने नहीं आ सका क्योंकि उन्हें अपना दर्द साझा करने के लिए आज तक कोई राजनीतिक मंच ही नहीं मिला। इसलिए गाँधी परिवार को हत्या और हत्यारों की माफी पर राजनीति नहीं करनी चाहिए।

गाँधी परिवार को कम से कम ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस कमिटी के प्रवक्ता अमेरिकाई वी नारायणन को जरूर पढ़ना चाहिए। 14 जून 2018 को उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए एक आर्टिकल लिखा था। इस लेख में उन्होंने भी राजीव के साथ-साथ मरने वाले अन्य लोगों के परिवार वालों की भावनाओं का सम्मान करने की बात करते हुए सजा माफी पर आपत्ति जताई थी।

मध्य प्रदेश के बाद अब कर्नाटक सरकार पर भी संकट के बादल, राहुल गाँधी ने की बैठक

लोकसभा चुनाव ख़त्म होने के साथ ही विभिन्न न्यूज़ चैनलों द्वारा एग्जिट पोल्स किए गए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाला राजग अधिकांश एग्जिट पोल्स में बहुमत का आँकड़ा पार करता दिख रहा है। मोदी लहर का असर अब भोपाल और बंगलौर के राजनीतिक गलियारों तक पहुँच गया है। दोनों राजधानियों में सियासी पारा उच्च स्तर पर पहुँच गया है। इन राज्यों में सत्ता पर काबिज कॉन्ग्रेस पार्टी के पास ख़ुद के दम पर बहुमत का आँकड़ा नहीं है और सहयोगियों के भरोसे सरकार चल रही है। जहाँ कर्नाटक में भाजपा को रोकने के लिए कॉन्ग्रेस ने अपने से काफ़ी कम विधायकों वाली पार्टी जेडीएस को मुख्यमंत्री पद सौंपा हुआ है, मध्य प्रदेश में बसपा और निर्दलीयों की मदद से कॉन्ग्रेस की सरकार चल रही है।

एग्जिट पोल्स के अनुसार, कर्नाटक में कॉन्ग्रेस-जेडीएस गठबंधन एक बड़ी हार की तरफ बढ़ रहा है। राज्य में 28 लोकसभा सीटें हैं और अधिकतर एग्जिट पोल्स में भाजपा 20 का आँकड़ा पार करती दिख रही है। राज्य की विधानसभा में भी 104 विधायकों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है और 78 विधायकों के साथ दुसरे नंबर की पार्टी कॉन्ग्रेस उससे काफ़ी पीछे है। लोकसभा चुनाव के परिणाम अगर एग्जिट पोल्स के अनुसार आते हैं, फिर राज्य में अधिकांश लोकसभा और विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्ज़ा होने के कारण गठबंधन के लिए सरकार चलाना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

एक वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता ने कहा कि कर्नाटक गठबंधन का पहला लक्ष्य अधिकतम लोकसभा सीट जीतने का था लेकिन अब यह लक्ष्य फेल होता दिख रहा है, ऐसे में गठबंधन को जारी रखने में कोई भलाई नहीं है। कर्नाटक कॉन्ग्रेस की कलह सतह पर न आ जाए, इस डर से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी ने पहले ही राज्य के नेताओं को गठबंधन बचाए रखने की नसीहत दे डाली है। इंडिया टुडे-एक्सिस के एग्जिट पोल की मानें तो भाजपा राज्य में 23 से 25 लोकसभा सीटें जीत सकती है, जबकि कॉन्ग्रेस को 3 से 5 सीटों के साथ संतोष करना पड़ेगा।

उधर मध्य प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता गोपाल भार्गव ने राज्यपाल को पत्र लिख कर कमलनाथ सरकार को विधानसभा में बहुमत साबित करने की माँग की है। राज्य में 114 विधायकों वाली कॉन्ग्रेस और 109 विधायकों वाली भाजपा के बीच ज्यादा गैप नहीं है और कमलनाथ सरकार को समर्थन दे रहे कई अन्य विधायकों ने नाराज़गी जताते हुए लोकसभा चुनाव का परिणाम आने के बाद अपना रुख स्पष्ट करने की बात कही है। मध्य प्रदेश सरकार 6 महीने पूरे हुए हैं, कर्नाटक में 1 वर्ष से कॉन्ग्रेस-जेडीएस की सरकार चल रही है। मार्च में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने कहा था कि अगर उनकी पार्टी को राज्य में 22 लोकसभा सीटें आ जाती हैं तो वो 24 घंटे के भीतर मुख्यमंत्री बन जाएँगे।

कर्नाटक के कई कॉन्ग्रेस नेताओं के साथ दिल्ली में राहुल गाँधी की बैठक भी हुई, जिसमें चुनाव परिणाम के बाद के हालातों से निपटने के तरीकों पर चर्चा की गई। मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने तो एग्जिट पोल्स के लिए भी ईवीएम पर अपना गुस्सा निकाला। मध्य प्रदेश में भाजपा को उम्मीद है कि कॉन्ग्रेस के कुछ विधायक नाराज़ होकर कमलनाथ के पक्ष में वोट नहीं करेंगे और सपा-बसपा के विधायक भाजपा का समर्थन कर सकते हैं। ऐसी स्थिति से बचने के लिए कॉन्ग्रेस द्वारा जल्द ही मंत्रिमंडल विस्तार किए जाने की बातें सामने आ रही हैं।

देश की जनता पर है स्वरा भास्कर को शक, और बातें लोकतंत्र बचाने की करती हैं…

लगभग सभी न्यूज चैनल्स के एग्जिट पोल पर एनडीए के समर्थन में पूर्वानुमान देखकर मोदी विरोधियों के सुर बदलने लगे हैं। जो लोग कल तक इस बात का शोर मचा रहे थे कि इन लोकसभा चुनावों में जनता मोदी सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंकेगी, वही लोग अब अपनी पिछली बातों को सही साबित करने के लिए तरह-तरह की उलाहनाएँ दे रहे हैं। इसी सूची में फिल्म जगत का एक जाना-माना चेहरा स्वरा भास्कर भी शामिल हैं।

यूँ तो आपने चुनावी माहौल में स्वरा को पिछले दिनों उनके ‘दोस्त’ कन्हैया कुमार के समर्थन में प्रचार करते देखा होगा। इसके अलावा आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों की रैली में शामिल होते देखा होगा या फिर लोगों के पोस्ट पर जाकर मोदी के लिए वोट न देने की अपील करते देखा होगा। लेकिन एग्जिट पोल आने के बाद आप स्वरा को नहीं बल्कि उनका एक नया ट्वीट देखिए! जिसमें उन्होंने किसी द्वेपान मित्रा का ट्वीट रिट्वीट करते हुए “BASICALLY…” लिखा है। द्वेपान के मुताबिक अगर लोकसभा की 543 सीटों पर भी भाजपा जीत जाती है, तब भी यह पार्टी कट्टर ही रहेगी, धर्मांध ही रहेगी। और स्वरा ने इसे शेयर करके इस बात पर अपनी सहमति जताई है।

इस ट्वीट पर स्वरा ने ‘बेसिकली’ लिखकर जहाँ भाजपा के ख़िलाफ़ अपनी कुंठा व्यक्त की, वहीं इस एक शब्द ने स्वरा और उनकी ‘क्रांतिकारी’ सोच पर सवालिया निशान लगा दिए। द्वेपान के इस ट्वीट को शेयर करके वो खुद ही अपनी बातोंं में फँस गईं। एक ओर जहाँ वो जनता के बीच जाकर लोकतंत्र और देश को बचाने की बातें करती रहीं, वहीं इस पोस्ट में वो देश की जनता पर अप्रत्यक्ष रूप से उंगली उठाती दिखीं। उन्होंने 543 सीटों पर भाजपा के आने की एक कल्पना की और कहा अगर ऐसा होता भी है तो भी वो पार्टी एक कट्टर पार्टी ही रहेगी। स्वरा की इस आभासी कल्पना का क्या मतलब है?

इसका मतलब है कि एक उनके विचारों के आगे देश की करोड़ों जनता का मत बेकार है। इसका यही पर्याय है कि सिर्फ एक वो ही सेकुलर देश की नागरिक हैं और बाकी सब भाजपा जैसी ‘कट्टर’ पार्टी के अधीन हैं। उनके कहने का क्या मतलब है कि अगर भाजपा को जनता 543 सीट देकर लोकसभा पहुँचाती है तो जनता बेवकूफ़ है! क्या नागरिक अपने मताधिकारों का प्रयोग देश में कट्टरता फैलाने के लिहाज़ से करेंगे?

सोचिए, भाजपा का हिंदूवादी चेहरा देखकर स्वरा को देश में कट्टरता पसरने का डर सताता रहता है! तब तो कन्हैया के जीतने पर हिन्दुओं को अपने धर्म पर खतरा मंडराता दिखना चाहिए! अगर पार्टी और व्यक्ति को विचारधारा से आँका और परखा जाता है तो कन्हैया तो कम्युनिस्ट हैं, हम कैसे मान लें कि कल को देश के उच्च पद पर आसीन होने के बाद कन्हैया इस बात पर जोर नहीं देंगे कि सबको कम्युनिस्ट होना पड़ेगा? कैसे मान लें कि वो ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसे नारे कथित तौर पर दोबारा नहीं लगाएँगे, कैसे यकीन करें कि ऐसा शख्स देश की अखंडता को बचाए रखेगा जो अपनी बात पर ही कायम न रह पाया हो…

स्वरा ने अपने इस ट्वीट से केवल यह बताया है कि वो न चाहते हुए भी जानने-समझने लगी हैं कि देश मोदी के नेतृत्व में भाजपा को ही सत्ता में चाहता है, बल्कि इस बात को भी बताया है कि वो देश की जनता और उनके फैसलों के बारे में क्या सोचती हैं। देश की जनता ने स्वरा का हमेशा साथ दिया है, उनके काम की प्रशंसा की है। उनके नारीवादी जज्बे को सराहाया है। उसके बावजूद बिना सोचे-समझे ऐसा कमेंट उनकी सोच और समझ पर दूसरों को उन पर उँगली उठाने का मौक़ा देता है। ट्वीट कीजिए! लेकिन सोच समझकर। आपको पढ़ने-सुनने वाले लोग बहुत हैं, उसका गलत इस्तेमाल करेंगे तो यूजर्स ट्रोल करेंगे ही।

दब्बू होते हैं उत्तर भारत के वोटर, दक्षिण भारतीयों की तरह शिक्षित भी नहीं: कॉन्ग्रेसी शमा मोहम्मद ने उड़ाया मजाक

कॉन्ग्रेस की नेशनल मीडिया पैनलिस्ट शमा मोहम्मद ने दक्षिण भारतीय मतदाताओं को शिक्षित और उत्तर भारतीय मतदाताओं को अशिक्षित बताया है। हार्वेस्ट टीवी न्यूज़ चैनल पर कॉन्ग्रेस पार्टी की तरफ़ से एक बहस में हिस्सा लेते हुए शमा ने ये बातें कहीं। एग्जिट पोल्स के नतीजों से बौखलाई शमा ने कहा कि उत्तर भारत के मतदाता दक्षिण भारतीय मतदाताओं की तरह शिक्षित नहीं होते और वे मीडिया पर विश्वास जताते हैं। शमा ने कहा कि उत्तर भारतीय मतदाताओं को काफ़ी आसानी से और जल्दी प्रभावित किया जा सकता है। कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल समर्थित हार्वेस्ट टीवी पर बोलते हुए शमा ने ऐसा कहा।

डिबेट की एंकरिंग कर रहीं वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त ने जब शमा मोहम्मद से पूछा कि अगर एग्जिट पोल्स सही साबित हो जाते हैं, तब वह क्या कहेंगी? इस पर शमा ने कहा कि उत्तर भारत के वोटर्स व्हाट्सप्प पर आई चीजों पर आसानी से विश्वास करते हैं और जल्दी प्रभावित किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि उत्तर भारतीयों के पास अक्सर व्हाट्सप्प सन्देश आते रहते हैं। भारतीय वायुसेना द्वारा की गई बालाकोट एयर स्ट्राइक पर नाराज़गी जताते हुए शमा मोहम्मद ने कहा कि इसके ऊपर मीडिया द्वारा सवाल नहीं पूछे गए।

शमा मोहम्मद ने आरोप लगाया कि मीडिया के लोग भाजपा प्रवक्ताओं से सवाल नहीं पूछते। उन्होंने दावा किया कि यूपीए के समय में हुए सर्जिकल स्ट्राइक्स को लेकर भी मीडिया ने भाजपा नेताओं से सवाल नहीं पूछे। बहस के दौरान स्वराज इंडिया के संस्थापक योगेंद्र यादव ने कॉन्ग्रेस पर मुद्दों को ठीक से न उठाने का आरोप लगाया। योगेंद्र यादव ने कहा कि मुख्य विपक्षी पार्टी होने के बावजूद कॉन्ग्रेस ने कई मुद्दों को ठीक से जनता के सामने नहीं रखा। बरखा दत्त के शो में शमा ने इजराइल और ऑस्ट्रेलिया के एग्जिट पोल्स का उदाहरण देते हुए सारे एग्जिट ग़लत होने की संभावना जताई।

योगेंद्र यादव के आरोपों का जवाब देते हुए शमा मोहम्मद ने कहा कि राहुल गाँधी ने अपनी हर एक जनसभा में बेरोज़गारी से लेकर किसानों तक के मुद्दे उठाए, कॉन्ग्रेस ने हर मुद्दे को जनता के बीच ले जाने की हरसंभव कोशिश की। शमा ने योगेंद्र यादव को भी खरी-खरी सुनाई। उन्होंने कहा कि यादव ने कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाने की बजाए ख़ुद के प्रत्याशी क्यों नहीं खड़े किए? शमा मोहम्मद ने पूर्व आप नेता से पूछा कि उन्होंने नोटा का समर्थन क्यों किया? उन्होंने योगेंद्र यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि लोकतंत्र में सभी को वोट करने की अनुमति होनी चाहिए।

12:45 के बाद सुनें शमा मोहम्मद का विवादस्पद बयान (साभार: हार्वेस्ट टीवी न्यूज़)

सोमवार (मई 20, 2019) को एक अन्य कॉन्ग्रेस नेता उदित राज ने भी अपने एक विवादस्पद ट्वीट में लिखा था कि केरल के लोग शिक्षित होते हैं, इसीलिए वो भाजपा को वोट नहीं करते। इस पर हमने आँकड़े गिनाए थे कि कैसे भारत से आतंकी संगठन आईएसआईएस ज्वाइन करने वाले सबसे ज्यादा केरल के ही लोग हैं। उदित राज ने इस दौरान साक्षरता और शिक्षा के बीच का अंतर भूलकर अपनी नासमझी का परिचय दिया। एग्जिट पोल्स के सामने आने के बाद कॉन्ग्रेस नेताओं ने अब भाजपा की बजाए जनता को ही निशाना बनाना शुरू कर दिया है, ऐसा प्रतीत होता है।

LS चुनाव में ‘हमारे पक्ष में’ परिणाम और मस्जिदों की सुरक्षा के लिए पढ़े जाएँ विशेष नमाज़: देवबंद

अजीबोगरीब फतवों के लिए मशहूर इस्लामिक यूनिवर्सिटी दारुल उलूम देवबंद ने भी लोकसभा चुनाव 2019 के परिणामों में रूचि दिखानी शुरू कर दी है। इस्लामिक संस्था ने मतगणना के ‘ख़ास परिणामों’ के लिए नमाज़ का आयोजन किया। रविवार (मई 19, 2019) को एग्जिट पोल्स के माध्यम से विभिन्न न्यूज़ एजेंसियों ने चुनाव परिणाम का अनुमान लगाया। अधिकांश एग्जिट पोल्स में भाजपा के नेतृत्व वाले राजग को पूर्ण बहुमत मिलता दिख रहा है। ऐसे में दारुल उलूम देवबंद एग्जिट पोल्स के नतीजों से ख़ुश नहीं है। नाराज़ मुफ़्ती महमूद हसन बुलंशहरी ने कहा, “अभी जैसी परिस्थितियाँ बन रही हैं, ऐसे समय में ज़रूरी है कि देश की शांति व समृद्धि के लिए नमाज़ पढ़ी जाए। मस्जिदों और इस्लामिक शिक्षकों की सुरक्षा के लिए भी यह महत्वपूर्ण है।

मुफ़्ती ने आगे कहा कि आपको इस बात का थोड़ा भी अंदाज़ा नहीं होता कि किसकी प्रार्थना सुनी जा रही है और देश बेहतरी की ओर बढ़ने लगे। उन्होंने सभी संस्थाओं से चुनाव परिणाम ज़ारी होने तक नियमित नमाज़ के बाद ‘ख़ास परिणाम’ के लिए अलग से प्रार्थनाएँ आयोजित करने की अपील की। उन्होंने कहा कि ऐसी प्रार्थनाएँ 3 दिन पहले ही शुरू हो जानी चाहिए। मुफ़्ती ने संस्था के अनुयायियों से अपने पापों के लिए प्रायश्चित करने को कहा और बताया कि आजकल समाज में लालच की भावना बढ़ रही है।

देवबंद के मौलवियों ने मुफ़्ती के सुझाव को गंभीरता से लेते हुए इसका स्वागत किया है और ‘अपने पक्ष में’ चुनाव परिणाम हासिल करने के लिए प्रार्थनाओं का सिलसिला शुरू कर दिया है। मौलाना इशाक़ गोरा ने मुफ़्ती के सुझाव की प्रशंसा करते हुए कहा कि सभी मुस्लिमों को मज़हबी रूप से उनके सुझाव पर अमल करना चाहिए। उन्होंने कहा कि वे लोकसभा चुनाव के परिणामों को लेकर आशंकित हैं। उन्होंने आगे कहा:

हमारे देश को एक ऐसी सरकार की ज़रूरत है जो सबको साथ लेकर चले और भाईचारा, शांति और समरसता को बढ़ावा दे। दुर्भाग्यपूर्ण रूप से, कुछ राजनीतिक पार्टियाँ ऐसी हैं जो धर्म के आधार पर राजनीति करती हैं। ये सही नहीं है और ऐसी पार्टियों को जाना पड़ेगा। इसीलिए मुफ्ती ने जो प्रार्थनाओं की बात कही है, उसे गंभीरता से लेना चाहिए।

हाल ही में विवादित इस्लामिक संस्था देवबंद ने एक फतवे में औरतों के रमजान माह की विशेष नमाज तरावीह की जमात करने और मस्जिद में तरावीह की नमाज़ पढ़ने को ग़लत करार दिया था। देवबंद का तर्क था कि जब नमाज़ पढ़ने के लिए महिलाएँ मस्जिद नहीं जा सकतीं तो तरावीह के लिए उन्हें इजाज़त कैसे दे दी जाए। मुफ़्तियों ने कहा कि महिलाओं को तरावीह की नमाज़ घर के भीतर एकांत में अदा करनी चाहिए। इसके अलावा हाल में एक अन्य अजीब फतवा भी जारी किया गया।

हाल ही में दारुल उलूम देवबंद ने फतवा जारी करते हुए पवित्र रमजान महीने में तरावीह की नमाज़ के दौरान लाइट बंद कर अंधेरा करने को ग़लत करार दिया। मस्जिदों में बिजली गुल कर अंधेरे या मध्यम रोशनी में नमाज़ अदा करने को मुफ्ती-ए-कराम ने रस्मन और ग़लत करार दिया। मुफ़्तियों ने मजहब के लोगों से इस्लाम में ईजाद की जा रही ‘नई-नई रस्मों एवं रिवाजों’ से बचने की सलाह दी।

राजीव गाँधी: PM जो मर कर वापस हुआ ‘ज़िंदा’, जिसे कॉन्ग्रेस ही नहीं दिला सकी ‘न्याय’

इन चुनावों में राजीव गाँधी यकायक मुद्दा बन गए- चुनावी भी, चर्चा का भी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें भ्रष्टाचारी कहा, शेखर गुप्ता ने ‘डैशिंग, बाल-बच्चों वाला, युवा प्रधानमंत्री’, और सैम पित्रोदा के अनुसार उनकी जिंदगी में अर्थ ही राजीव गाँधी के भारत में इंटरनेट लाने से आया।

कभी 19 साल तक शेखर गुप्ता इंडियन एक्सप्रेस के सम्पादक रहे थे, उसी इंडियन एक्सप्रेस के, जिसने राजीव गाँधी की आईएनएस विराट पर छुट्टियों का खुलासा किया, और बदले में उसके ऑफिस पर इनकम टैक्स के नाम पर सैन्य छापेमारी जैसी रेड पड़ी। उन पर इंडियन एक्सप्रेस के इसी ‘दुस्साहस’ के बदले कर्मचारियों को यूनियनबाजी के लिए उकसा कर अख़बार ठप करवाने की कोशिश का भी संदेह किया जाता है। सिख दंगों के भी दाग उन पर हैं।

राफ़ेल पर जब भी कॉन्ग्रेस आक्रामक हुई, उसके सामने पलट कर राजीव के समय का बोफोर्स घोटाला मुँह बाए खड़ा रहा। अगस्ता वेस्टलैंड भी कई लोगों को बोफोर्स 2.0 लगा, और जब क्रिश्चियन मिशेल को भारत लाया गया तो लगा कि काश इसी तरह मरहूम क्वात्रोची को भी पकड़ कर राज़ उगलवाए जा सकते!

और चुनाव खत्म हुए ठीक से दिन भर भी नहीं बीत पाया कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने ऐलान कर दिया कि बस राज्यपाल साइन भर कर दें, उनकी सरकार राजीव गाँधी के कातिलों को रिहा करने के लिए तैयार बैठी है। ऐलान भी उनकी हत्या की तिथि 21 मई की पूर्व-संध्या को। मात्र दुर्योग, या राजनीतिक इशारा?

कातिलों की कानून के साथ कबड्डी

अगर राजीव गाँधी की हत्या के मुकदमे का इतिहास पढ़ा जाए तो यह न्याय कम, न्याय का मखौल ज्यादा लगेगा। पहले तो सुप्रीम कोर्ट में मृत्युदंड पाए 4 मुख्य अभियुक्तों में से नलिनी श्रीहरन के मृत्युदंड को उम्रकैद में केवल इसलिए बदल दिया गया कि वह महिला है, और उसने एक बच्ची को जन्म दिया था। उसकी पैरवी भी किसी और ने नहीं, राजीव की पत्नी श्रीमती सोनिया गाँधी ने की। तीन अन्य आरोपियों के मृत्युदंड को सुप्रीम कोर्ट ने खुद उम्रकैद में बदल दिया था

उसके बाद लगभग 20 साल तक कानून से लुका-छिपी खेलने के बाद बाकी तीन अभियुक्तों मुरुगन, संतन, पेरारीवालन ने अपने मृत्युदंड में देरी के लिए कानून और सरकार को दोषी ठहराते हुए अपना मृत्युदंड भी माफ़ किए जाने की माँग की। तर्क यह दिया कि हम बीस साल कैद पहले ही काट चुके हैं, यह तो एक उम्रकैद के बराबर हो ही गया है। ऊपर से बीस साल से पता नहीं, जिंदगी मिलेगी या मौत इस डर ने जिंदगी और मानसिक संतुलन को तबाह कर दिया है- ऐसे में हमें मृत्यदंड दिया जाना अन्याय होगा। 2014 में उनकी बात मानते हुए अदालत ने उन्हें भी उम्रकैद में डाल दिया

उसके बाद शुरू हुई असली कबड्डी। जिस नलिनी को अगर रहम न मिलता महिला होने के नाते, जिन तीन कातिलों को अगर समय पर मृत्यदंड दे दिया गया होता तो आज होते ही न ज़िंदा, वह अब यह माँग कर रहे हैं कि उन्होंने एक उम्रकैद भर का समय काट लिया है तो उन्हें आज़ाद कर दिया जाए। और उनकी यह माँग पूरी करने के लिए तमिलनाडु की सरकार आतुर दिख रही है। आड़ ले रही है जनभावनाओं की।

सवाल  

पहला सवाल यह कि क्या एक उम्रकैद पूरी कर छूट जाने की सुविधा उन कैदियों को भी मिलनी चाहिए जिन्हें पहले मृत्युदंड मिला था और बाद में फाँसी में देर होने के चलते रहम खा कर उम्रकैद में डाल दिया गया। इस तरह तो उनके लिए दो बार रहम की गुंजाईश हो गई (जबकि आम, सीधे उम्रकैद पाए अपराधी को एक ही बार रहम मिलता है, बीस साल पूरे होने पर), जबकि उन्हें मृत्युदंड दिया ही इसलिए गया क्योंकि उनका अपराध किसी रहम के लायक नहीं समझा गया। यानि कम क्रूर तरीके से हत्या (जिसपर सीधे केवल उम्रकैद होगी) पर केवल एक बार सजा में कमी का मौका, और ज्यादा क्रूर तरीके से हत्या (जिसपर मृत्युदंड होगा) में दो बार सजा में कमी का मौका? क्या यही संदेश देना चाहती है समाज में तमिलनाडु सरकार?

दूसरा सवाल यह कि यह ‘जनभावना’ के आधार पर कातिलों, आतंकियों की रिहाई का क्या मतलब है? यह ऐसी खतरनाक नज़ीर है जिसे कश्मीर जैसे संवेदनशील इलाके वाले, जेएनयू जैसे अर्बन नक्सलियों के गढ़ वाले देश में कैसे दुरुपयोग में लाया जाएगा, यह बताने की जरूरत नहीं है।

और तीसरा सवाल यह कि जरा पलानिस्वामी खुद को राजीव गाँधी, या उस हमले में मारे गए 13 अन्य बेगुनाहों की जगह रख कर देखें? अगर उनके साथ ऐसा कुछ हो जाए, तो क्या वह अपने कातिलों का ऐसे बच निकलना पसंद करेंगे? राजीव गाँधी भ्रष्ट थे, इस ओर इशारा करने वाले पर्याप्त सबूत हैं। उनपर सिख दंगों समेत बहुत सारे ऐसे आरोप हैं जिनके लिए शायद वह जेल में होते अगर जिन्दा होते। लेकिन इस मामले में वह एक न्याय माँगते पीड़ित हैं, भारत के पूर्व प्रधानमंत्री हैं। इतिहास अगर उन्हें उनके गुनाहों के लिए नहीं माफ़ करेगा तो हमें भी उनके कातिलों को ऐसे बच जाने देने के लिए जवाबदेह ठहराएगा।

नोट: मैं व्यक्तिगत तौर पर मृत्युदंड का विरोधी हूँ। पर यहाँ सवाल मृत्युदंड बनाम उम्रकैद का नहीं है। यहाँ सवाल है कम गंभीर अपराध और ज्यादा गंभीर अपराध के न्याय में विसंगति का।

2019 नहीं, अब 2024 में ‘पकेंगे’ राहुल गाँधी: BBC ने अपने ‘लाडले’ की प्रोफाइल में किया बदलाव

बीबीसी को राहुल गाँधी से काफ़ी उम्मीदें थी। अभी भी मीडिया संस्थान को राहुल गाँधी से काफ़ी उम्मीदें हैं। अंतर इतना है कि पहले बीबीसी वालों को उनसे 2019 लोकसभा चुनाव में उम्मीदें थी, अब 2024 लोकसभा चुनाव में उम्मीदें हैं। तभी तो बीबीसी ने चुपके से अपनी वेबसाइट पर राहुल गाँधी की प्रोफाइल में उनकी वापसी की तारीख़ बदल दी।

पहले उन्हें 2019 लक्ष्य था, अब 2024 लोकसभा चुनाव को उनके लिए वास्तविक लक्ष्य रखा गया है। एग्जिट पोल्स आने के बाद बीबीसी को भी पता चल गया है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाला राजग पूरी ताक़त के साथ केंद्र में वापसी कर रहा है। अतः, उसने अपनी उम्मीदों की नई समयसीमा तय कर दी। इतना ही नहीं, इस प्रोफाइल में राहुल गाँधी के बारे में और भी कई अन्य रोचक चीजें हैं, जिन्हें जानकार आप थोड़ा-सा मनोरंजनात्मक लुत्फ़ उठा सकते हैं।

राहुल गाँधी को बीबीसी ‘डार्क हॉर्स’ बताता है। उन्हें उम्मीद भी है कि कभी न कभी तो ये घोड़ा दौड़ेगा ज़रूर। लेकिन, यहाँ कुछ ऐसे विशेषज्ञ भी हैं, जिन्होंने बीबीसी को राहुल गाँधी के बारे में कुछ ऐसा बताया है, जो हमें या आपको नहीं पता। बीबीसी के अनुसार, राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा है कि राहुल गाँधी के पास व्यापक राजनीतिक समझ है। जिन्होंने राहुल को बोलते देखा है, उनके भाषण और इंटरव्यू वगैरह से जो एक बार भी गुजरा है, उसे पता है कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के पास कितनी विस्तृत और व्यापक राजनीतिक समझ है। विशेषज्ञों ने उन्हें बैकरूम से ऑपरेट करने वाला नेता बताया। अनाम विशेषज्ञों के हवाले से और भी बहुत कुछ लिखा जा सकता था लेकिन गनीमत यह कि बीबीसी इतने पर ही रुक गया।

कॉन्ग्रेस में अहमद पटेल बैकरूम से ऑपरेट करते रहे हैं। भाजपा में ये भूमिका अरुण जेटली निभाते आ रहे हैं। लेकिन, राहुल गाँधी के बारे में बैकरूम ऑपरेटर होने की नई बात शायद ही किसी को पता हो। ये भी अच्छा है। कुछ ऐसी तारीफ़ करने की रणनीति में भी दम है क्योंकि इसे कोई देखने नहीं जा सकता। अगर वे लिखते कि ‘राहुल अच्छे वक्ता हैं’ या ‘अच्छा भाषण देते हैं’, तब सबकुछ लोगों के सामने आ जाता। लेकिन, उन्हें ‘Practiced Backroom Operator’ बताकर बीबीसी ने एक ऐसी दक्षता की बात की, जिसका सबूत देने की ज़रूरत ही नहीं है।

इसके अलावा प्रोफाइल में राहुल गाँधी को राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस की सफलता का क्रेडिट भी दिया गया है। हाँ, उनकी अध्यक्षता में किन राज्यों में कॉन्ग्रेस को हार मिली है, इसकी चर्चा करनी ज़रूरी नहीं समझी गई है। बस एक लाइन में लिखा गया है कि कॉन्ग्रेस की स्थिति तो पहले से ही डाँवाडोल थी, कुछ राज्यों में हार मिली। मंद अर्थव्यवस्था, नोटबंदी, राफेल, असहिष्णुता और रोज़गार पर राहुल द्वारा सोशल मीडिया पर लगातार पूछे गए सवालों को उनके स्मार्ट चुनाव प्रचार अभियान के रूप में देखा गया है। शायद बीबीसी ही इसका जवाब दे पाए कि जिन मुद्दों पर राहुल ट्विटर पर सर्वज्ञानी बन जाते हैं, उन्हीं मुद्दों पर इंटरव्यू और भाषणों में उनके पास जवाब क्यों नहीं होते।

जैसे, राफेल पर उन्होंने ट्विटर पर कई सवाल पूछे, वहाँ उन्हें राफेल की सर्विस और उपकरणों सहित सभी चीजों के मूल्य पता होते हैं, उन्हें अदालत द्वारा सुनाए गए निर्णयों के छोटे से छोटे विवरणों की भी जानकारी होती है, लेकिन इंटरव्यू के दौरान वह वायुसेना से पूछने की बात करते हैं और कहते हैं कि उनके पास details नहीं है। सोशल मीडिया पर सर्वज्ञानी और कैमरे के सामने डिटेल्स पता नहीं होना- ये दोनों ही बातें विरोधाभाषी हैं और बीबीसी को इन्हीं में स्मार्टनेस की गूँज सुनाई दे जाती है।

इससे भी ज्यादा बीबीसी ने प्रियंका की तारीफ़ों के पुल बाँधे हैं। प्रियंका ने आज तक अपनी लोकप्रियता साबित नहीं की है, एक भी चुनाव नहीं जीता है, अपनी देखरेख में पार्टी को भी एक भी चुनाव नहीं जितवाया है, फिर भी बीबीसी उन्हें चमत्कारिक और लोकप्रिय बताता है। प्रियंका ने कौन सा चमत्कार किया है और उनकी लोकप्रियता का पैमाना क्या है, ये तो शायद बीबीसी उनके लिए 2029 का लक्ष्य तय कर के ही बता सकता है। प्रियंका ‘Popular & Charismatic’ हैं- किनके बीच हैं, किस क्षेत्र में हैं, इस बारे में कोई ख़ास जानकारी नहीं दी गई है। बस विशेषण ठूँस दिए गए हैं।

बीबीसी ने ठीक लिखा है कि चुनाव प्रचार अभियान के मामले में राहुल गाँधी ने इस बार ख़ासी मेहनत की है। जहाँ पीएम मोदी ने इस लोकसभा चुनाव के चुनाव प्रचार अभियान के दौरान 144 रैलियाँ की, राहुल 125 रैलियों के साथ ज्यादा पीछे नहीं रहे। अगर इतने के बाद भी कॉन्ग्रेस की बुरी हार हो रही है (एग्जिट पोल्स के अनुसार), तो ज़िम्मेदारी किसकी बनती है? क्या इसके बाद बीबीसी एक लेख लिखेगा, जिसमें कॉन्ग्रेस अध्यक्ष को कॉन्ग्रेस की विफलता के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा? वो भी उस दौर में, जब एक पंचायत चुनाव हारने को सीधा पीएम की लोकप्रियता कम होने से जोड़ दिया जाता है।

बीबीसी की हमेशा से आदत रही है कि उसने राहुल गाँधी के मामले में ‘Nepotism’ या वंशवाद को ‘Royalty’ या राहुल को ‘Royal Scion’ कहा है। ऐसे शब्द इसीलिए चुने जाते हैं, ताकि राहुल को और ‘Glorify’ किया जा सके। चूँकि बीबीसी ऐसे फैंसी अंग्रेजी शब्द चुनता है, इसीलिए हमनें यहाँ अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग किया। मोदी के ख़िलाफ़ बीबीसी द्वारा चलाया जा रहा दुष्प्रचार अभियान किसी से छिपा नहीं है। हाल ही में गिरोह विशेष के अन्य मीडिया संस्थानों का अनुसरण करते हुए बीबीसी ने भी एक लम्बी-चौड़ी रिपोर्ट के माध्यम से समझाया कि कैसे ‘मोदी के भारत’ में मुस्लिमों को डर लग रहा है और उनके पूरे मज़हब पर ही आक्रमण किया जा रहा है। इस रिपोर्ट में विश्लेषकों के नाम पर अरुंधति रॉय जैसे प्रोपेगंडाबाज़ों की राय ली गई थी।

अगर मोदी के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार करना है तो उनके विरोधी, जैसे कि राहुल गाँधी का महिमामंडन तो करना ही पड़ेगा, भले ही उनकी सफलता का वास्तविक लक्ष्य 2029 से होकर 2034 ही क्यों न पहुँच जाए। कभी बीबीसी की रिपोर्ट में प्रियंका को कॉन्ग्रेस का ‘Mythical Weapon‘ बताया जाता है तो कभी मीडिया द्वारा राहुल को नकारात्मक अटेंशन देने को लेकर नाराज़गी जताई जाती है। इससे पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल भी अपने ‘क्रन्तिकारी’ दौर में मीडिया के लाडले रह चुके हैं लेकिन राहुल पर लम्बे समय तक दाँव खेलना ज्यादा सुरक्षित है क्योंकि वो एक स्थापित पार्टी के नेता हैं। उसी पार्टी के, जिसमें वंशवाद मीडिया के लिए रॉयल्टी हो जाता है।

एग्जिट पोल और पुरषार्थ: फर्जी लिबरल गैंग वो शब्द इस्तेमाल कर रही है, जिसका अर्थ भी उसे नहीं पता

स्वघोषित लिबरलों और पत्रकारिता के समुदाय विशेष को कितना जोर का सदमा धीरे से लगा है एग्जिट पोल से, यह परत-दर-परत निकल रहा है। पहले तो एग्जिट पोल के आने से पहले ही उन्हें नकारने की कसरत शुरू हो गई, फिर ABP-Nielsen के इकलौते सर्वे जिसमें एनडीए का बहुमत कम होता दिखा, उसे ही सबसे ‘क्रांतीकारी’ प्रचारित कर डूबती नब्ज़ संभालने का प्रयास किया गया। और अब लिबरल महिला रेवती लौल एग्जिट पोल करने की बात को ही ‘मर्दों का नंबरों से खेल अपने पुरुष-अहं को तुष्ट करना’ करार दे रहीं हैं।

एनडीटीवी के शो पर की यह अजीब बात

एनडीटीवी पर रवीश कुमार के एग्जिट पोल के बाद वाले शो पर चर्चा समाप्त करते हुए रेवती ने कहा, “… मैं इस बात के साथ एन्ड करना चाहती हूँ कि जब 23 तारीख को हमें पता चलना ही है और एग्जिट पोल, एग्जिट पोल है ही नहीं तो हम कर क्या रहे हैं? (हम) इस अंजुमन में आते हैं क्यों बार-बार? वो इसलिए क्योंकि ये पुरुषार्थ है…” यहाँ तक तो तब भी ठीक था। आगे उन्होंने ‘पुरुषार्थ’ की बड़ी ही अजीब परिभाषा भी बताई। “और हम, हमें नंबरों… पुरुष, सिर्फ पुरुष नंबरों के साथ खेलें कि मैं बड़ा हूँ या मैं बड़ा हूँ, मैं बड़ा हूँ या मैं बड़ा हूँ… क्यों कर रहे हैं हम ये? एक बुनियादी सवाल इससे ये है कि हम…  जो लोग, जिनमें बहुत ज्यादा डर है, उसके बावजूद कुछ लोग कह रहे हैं कि हमें ये सरकार पसंद नहीं है उसका मतलब है वो…  यही बड़ी बात है। यही आँकड़ा मेरे लिए मायने रखती है। एग्जिट पोल जाए भाड़ में!”

जब अपनी सुविधा हो तो लिबरल गैंग न केवल पुरुषों को ‘नंबर-नंबर रटने वाले’ के रूप में स्टीरियोटाइप कर सकता है, बल्कि साथ में उसे उनकी ‘मेल ईगो’ से भी जोड़ सकता है। और यही बात अगर किसी दक्षिणपंथी (खासकर कि पुरुष दक्षिणपंथी) ने कह दी होती तो वह लाख अपनी बात के पक्ष में तर्क पेश कर-कर के मर जाता लेकिन उसकी ऑनलाइन मॉब-लिंचिंग हो गई होती और महिला आयोग तक उसे घसीट लिया जाता।

और तो और, कहाँ से, किस आधार पर यह नैरेटिव चल रहा है कि ‘लोगों में डर है’? चेहरा बचाने के लिए और नैतिक जीत का दावा करने के लिए लिबरल गैंग को नए बहाने तलाशने शुरू कर देने चाहिए।

सिद्धू पीठ में खंजर घोंपने का काम कर रहे हैं, आलाकमान कार्रवाई करे: कॉन्ग्रेसी मंत्री

एग्जिट पोल्स के सामने आने के साथ ही पंजाब में कॉन्ग्रेस की अंदरूनी कलह भी खुल कर सतह पर आने लगी है। मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह द्वारा नवजोत सिंह सिद्धू को महत्वकांक्षी बताए जाने के बाद अब उनकी कैबिनेट के एक अन्य मंत्री ने भी सिद्धू पर निशाना साधा है।

पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री ब्रह्मा मोहिंद्रा ने राज्य के पर्यटन मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू पर निशाना साधते हुए पार्टी हाईकमान से उन पर कार्रवाई करने की माँग की है। मोहिंद्रा ने कहा कि पार्टी आलाकमान इस पर गंभीरता से निर्णय ले। बता दें कि सिद्धू दम्पति मुख्यमंत्री पर हमलावर है और नवजोत कौर ने कहा था कि मुख्यमंत्री के कारण ही उन्हें टिकट नहीं मिला।

अभी हाल ही में नवजोत सिंह की पत्नी नवजोत कौर ने कहा था कि नवजोत सिंह सिद्धू से पंजाब में इसलिए प्रचार नहीं कराया जा रहा है क्योंकि कैप्टन अमरिंदर सिंह ऐसा नहीं चाहते हैं। बता दें कि मीडिया में ख़बर यह आई थी कि सिद्धू के गले में समस्या है, जिसका इलाज चल रहा है, इसलिए वह प्रचार से दूर हैं। ख़बरों पर गौर करें तो पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू के बीच कई मसलों पर मतभेद बना रहता है। इसके बाद नवजोत कौर ने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी को सिद्धू की जरूरत ही नहीं है, इसीलिए उनसे पंजाब में प्रचार नहीं कराया जा रहा है।

मंत्री मोहिंद्रा ने सिद्धू पर पीठ में छुरा घोपने का आरोप लगाते हुए कहा कि वह बेवक़्त बयान देते जा रहे हैं। उन्होंने सिद्धू के बारे में कहा कि वो सिर्फ़ 2 सालों से ही कॉन्ग्रेस में हैं और अपना नियम झाड़ते हुए अपना अजेंडा लागू करना चाह रहे हैं। उन्होंने कहा कि सिद्धू भूल गए हैं कि वह भाजपा में नहीं बल्कि अब कॉन्ग्रेस में हैं, जहाँ कई मंचों पर अपनी बात रखी जा सकती है। स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि वह कैबिनेट के अन्य साथियों को सिद्धू के ख़िलाफ़ पत्र लिखेंगे।

सिद्धू की पत्नी ने मुख्यमंत्री अमरिंदर पर उनका टिकट काटने के आरोप भी लगाए थे। कैप्टेन ने इन आरोपों को बकवास बताया था। नवजोत सिंह सिद्धू पर हमला बोलते हुए मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने कहा था, “सिद्धू मेरी जगह सीएम बनना चाहते हैं। सिद्धू कॉन्ग्रेस की छवि बिगाड़ रहे हैं, पार्टी को उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी चाहिए। अगर वह असली कॉन्ग्रेसी होते तो वह अपनी शिकायतों के लिए पंजाब चुनाव का वक्त नहीं चुनते।

कैप्टेन ने साथ ही कॉन्ग्रेस आलाकमान कर अनुशासनहीनता बर्दाश्त न करने की सलाह दी थी। उन्होंने कहा था कि यह पार्टी हाईकमान तय करेगा कि क्या कार्रवाई करनी है? सिद्धू को बचपन से जानने की बात करते हुए कैप्टेन ने कहा था कि उन्हें सिद्धू से कोई निजी दुश्मनी नहीं है। कैप्टेन ने कहा था कि सिद्धू संभवतः महत्वकांक्षी हैं और वो मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं।

पंजाब कॉन्ग्रेस की कलह और भी खुल कर सामने आ सकती है क्योंकि कहा जा रहा है कि नेता चुनाव परिणाम के इन्तजार में बैठे हैं। चुनाव परिणाम आते ही कई अन्य ऐसे मंत्री हैं, जो सिद्धू के ख़िलाफ़ मुखर होकर अपनी बात रख सकते हैं। नवजोत सिंह सिद्धू ने कॉन्ग्रेस के लिए राज्य में ताबड़तोड़ सभाएँ की है।