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मायावती से मिलने के लिए लगी UP के ‘बाबुओं’ की लाइन, ‘BSP की वापसी की ‘उम्मीद’

एग्जिट पोल्स में उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-रालोद महागठबंधन और भाजपा के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिल रही है। अगर यूपी की बात करें तो जहाँ एबीपी न्यूज़ की एग्जिट पोल में भाजपा को मात्र 22 सीटें मिलती दिख रही है, इंडिया टुडे-एक्सिस के एग्जिट पोल में पार्टी को 62-68 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है।

सपा-बसपा-रालोद महागठबंधन की तरफ एबीपी ने 56 सीटें जाती हुई दिखाई है वहीँ इंडिया टुडे के अनुसार, महागठबंधन सिर्फ़ 10-16 सीटों पर सिमट जाएगा। उत्तर प्रदेश में एग्जिटपोल्स को लेकर एजेंसियों के अलग-अलग अनुमान होने की स्थिति में दोनों ही पक्षों को उम्मीद है कि उन्हें अधिक सीटें मिलेंगी। कहते हैं, दिल्ली का रास्ता लखनऊ होकर जाता है और पिछली बार राज्य में भाजपा के एकतरफा परफॉरमेंस को देखें तो बात सच भी साबित होती है।

इस बीच एक ऐसी ख़बर आई है, जो चौंकाने वाली है। मायावती के घर के बाहर नेताओं की नहीं बल्कि सरकारी बाबुओं की लाइन लगी हुई है। ये नौकरशाह ‘बहन जी’ से मिलने के लिए उनके पास पहुँच रहे हैं। इनमें कई मौजूदा अधिकारी हैं तो कई वर्तमान में कार्यरत हैं। ‘बेस्ट विशेज’ से लेकर मायावती की ‘उज्जवल भविष्य की कामना’ वाली संदेश लिखी हुई पर्चियों के साथ ‘बहन जी’ को गुलदस्ते भेंट किए जा रहे हैं। अचानक से मायावती के घर के बाहर बाबुओं की लगी लाइन से पत्रकारों सहित कई लोगों की नज़रें उधर गई हैं और लोग अंदेशा लगा तरहे हैं कि इसका कारण क्या होगा?

कई मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि इन नौकरशाहों को मायावती की पार्टी बसपा के अधिक सीटें जीतने का अंदेशा है। उन्हें लगता है कि मायवती राज्य में फिर से प्रासंगिक हो जाएँगी और उनका प्रभाव बढ़ जाएगा। इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक़, मायावती के घर पर कार्यरत एक कर्मचारी ने बताया, “ये अधिकारीगण मायावती से शिष्टाचार मुलाक़ात के लिए पहुँच रहे हैं। इनमें से अधिकतर ऐसे हैं, जिन्होंने उनके मुख्यमंत्रित्व काल में काम किया था। इनमें से कुछ का सम्बन्ध बहुजन समाज से है। ये अधिकारी बहन जी को मौजूदा स्थितियों से अवगत भी करा रहे हैं।

चुनाव परिणाम आने से पहले हुई ऐसी मुलाक़ातों को स्थानीय भाषा में ‘भूल न जाना’ कह कर पुकारा जाता है। 2007 में मुख्यमंत्री सचिवालय में कार्यरत एक अधिकारी ने मायावती से मलकट की ख़बर को स्वीकारते हुए कहा, “मैं उन्हें चुनावों के लिए शुभकामनाएँ देने गया था। बसपा वापसी कर रही है और शुभकामनाएँ देने में कोई बुराई नहीं है। जब नेताओं की स्थिति बुरी हो, तब आप उन्हें विश करने नहीं जाते।” कुछ अधिकारियों ने चुनाव परिणाम आने के बाद मायावती से मिलने की बजाए उन्हें सिर्फ़ गुलदस्ता भेजने का निर्णय लिया है। एक अधिकारी ने कहा कि बसपा एग्जिट पोल में सिखाए गए आँकड़ों से बेहतर प्रदर्शन करेगी।

एक अन्य अधिकारी ने कहा कि वो मायावती से इसीलिए मिल रहे हैं क्योंकि एग्जिट पोल्स के अनुसार, वो कमबैक कर रही हैं। बता दें कि मायावती के कार्यकाल के दौरान कई ऐसे अधिकारी थे, जिनकी तूती बोलती थी। मायावती के सचिव रहे एक अधिकारी भ्रष्टाचार के मामले में सरकारी एजेंसियों की राडार पर हैं और उनके यहाँ छापा भी पड़ा है।

ओडिशा में NDA के साथ गठबंधन में आ सकती है BJD, पार्टी ने दिया संकेत

लोकसभा चुनाव के संपन्न होने के बाद अब चर्चा एग्जिट पोल के निष्कर्षों पर हो रही है। एग्जिट पोल आने के बाद ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के नेतृत्व वाले बीजू जनता दल (बीजेडी) ने भाजपा के साथ गठबंधन के संकेत दिए हैं। बीजेडी के प्रवक्ता अमर पटनायक ने इसे लेकर बयान दिया है। उन्होंने कहा, “अगर चुनावी एग्जिट पोल्स के हिसाब से देखें, तब केंद्र में एनडीए की सरकार बन सकती है और तब हम सरकार का हिस्सा हो सकते हैं।”

अमर पटनायक ने कहा कि उनकी पार्टी उस दल या गठबंधन को समर्थन दे सकती है, जो केंद्र में सरकार बनाएगी और उनके राज्य की भलाई के लिए काम करेगी। उन्होंने कहा कि वो उस पार्टी के साथ गठबंधन करेंगे, जो राज्य की पुरानी माँगों और विवादित मुद्दों को निपटाएगी। इससे पहले, बीजेडी के उपाध्यक्ष और मंत्री एन एन पात्रो ने भी इस बात की और इशारा किया था कि बीजेडी उसी को समर्थन देगी, जो कि ओडिशा की मदद करेगा।

रविवार (मई 19, 2019) को टीवी पर प्रसारित किए गए एग्जिट पोल के अनुसार, एनडीए एक बार फिर से सरकार बनाने में सफल रहेगी। इस एग्जिट पोल में भाजपा को ओडिशा में भी फायदा होता दिख रहा है। 2014 में भाजपा सिर्फ एक सीट जीत सकी थी, जबकि बीजेडी को 20 सीटों पर जीत मिली थी।

हालाँकि, दोनों पार्टियों में गठबंधन के संकेत पहले से ही मिल रहे थे। कुछ दिनों पहले, लोकसभा चुनाव के दौरान ही जब ओडिशा में फोनी तूफान आया था, केंद्र की तरफ से राज्य को ₹1341 करोड़ की सहायता प्रदान की गई थी और प्रधानमंत्री मोदी खुद तूफान से होने वाले नुकासान का जायजा लेने के लिए पहुँचे थे। इस दौरान उन्होंने सीएम नवीन पटनायक की जमकर तारीफ की थी।

चुनाव के दौरान दूसरे दल के मुख्यमंत्री की तारीफ करने के साथ ही इसके राजनीतिक मायने निकालने शुरू हो गए थे। खैर, ये तो चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद ही पता चल पाएगा कि किसकी सरकार बन रही है और कौन सी पार्टी किस पार्टी को समर्थन दे रही है।

25 फोटो से सब क्लियर: BJP को कहाँ कितना फायदा, कहाँ हो रहा नुकसान

लोकसभा चुनाव 2019 के सातवें और अंतिम चरण सम्पन्न होने के साथ ही विभिन्न न्यूज़ चैनल्स और सर्वे एजेंसियों द्वारा संयुक्त रूप से एग्जिट पोल के आँकड़ों का दौर शुरू हो गया। इस लेख में हम आपको राज्य-वार सीटों के आँकड़ें (एक्सिस एग्जिट पोल के अनुसार) बताएँगे कि किस राज्य में बीजेपी के खाते में कितनी सीटें आने की उम्मीद हैं।

दिल्ली

दिल्ली की कुल 7 सीटों में से 6 सीट बीजेपी को मिलने की संभावना है और 1 सीट पर बीजेपी-कॉन्ग्रेस के बीच टक्कर हो सकती है।

आंध्र प्रदेश

आंध्र प्रदेश में कुल 25 सीटों में से एक भी सीट बीजेपी को नहीं मिलती दिख रही है।

असम

असम की कुल 14 सीटों में से 10 सीटें बीजेपी को मिलने की संभावना है।

बिहार

बिहार की 40 सीटों में से 16 सीटें बीजेपी को मिलती नज़र आ रही हैं और एक सीट पर यह संशय है कि वो या तो बीजेपी के खाते में जा सकती है या आरजेडी के खाते में।

छत्तीसगढ़

यहाँ कुल 11 सीटों में से 7 सीट बीजेपी को मिल सकती है और 1 सीट पर कॉन्ग्रेस और बीजेपी के बीच टक्कर है।

गुजरात

गुजरात की 26 सीटों में से केवल 2 सीटों पर बीजेपी-कॉन्ग्रेस के बीच कड़ी टक्कर है और बाक़ी सभी सीटें बीजेपी के खाते में जाती दिख रही है।

गोवा

गोवा की 1 सीट बीजेपी को मिलने की संभावना है और 1 सीट पर बीजेपी-कॉन्ग्रेस के बीच कुछ कहा नहीं जा सकता कि किसके खाते में जाए।

हरियाणा

हरियाणा की 10 सीटों में से 9 सीटें बीजेपी को मिलती दिख रही हैं और 1 सीट पर संशय बना हुआ है।

जम्मू-कश्मीर

यहाँ की 6 सीटों में से 3 सीटें बीजेपी को मिलने की संभावना है और 1 सीट को लेकर बीजेपी, जेकेएनसी और कॉन्ग्रेस के बीच कड़ा मुक़ाबला है।

झारखंड

झारखंड में कॉन्ग्रेस का सूपड़ा साफ़ होता दिख रहा है और बीजेपी को 14 में से 12 सीटें मिलती दिख रही हैं। केवल 2 सीट को लेकर संशय है।

हिमाचल प्रदेश

हिमाचल की चारों सीटें बीजेपी को मिल सकती है।

कर्नाटक

कर्नाटक की 28 सीटों में से 21 सीटें बीजेपी को मिल सकती हैं और 1 सीट जेडीएस, 1 सीट कॉन्ग्रेस और 1 सीट आईएनडी के पास जा सकती है। बाक़ी 4 सीटों पर कुछ कहा नहीं जा सकता।

केरल

केरल राज्य में बीजेपी को 1 भी सीट नहीं मिलने का संकेत दिया गया है।

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र की 48 सीटों में से 19 सीटें बीजेपी को मिलने की संभावना है और तीन अन्य सीटों को लेकर संशय बरक़रार है।

मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश में भी कॉन्ग्रेस का सूपड़ा साफ़ होता दिख रहा है और 26 सीटें बीजेपी को मिलने की संभावना है। केवल 2 सीटों पर बीजेपी और कॉन्ग्रेस के बीच कुछ भी हो सकता है।

ओडिशा

ओडिशा की कुल 21 लोकसभा सीट में से 15 बीजेपी को मिलने की उम्मीद है। बाक़ी 6 सीटों पर बीजेपी, कॉन्ग्रेस और बीजेडी की टक्कर है।

राजस्थान

25 सीटों वाले राजस्थान में 21 सीटें बीजेपी को मिलने की संभावना है, और बाक़ी 4 सीटों पर बीजेपी और कॉन्ग्रेस के बीच फैसला होना है, और 1 सीट RLD के खाते में जाती दिख रही है।

पंजाब

पंजाब की 13 सीटों में से बीजेपी को 1 ही सीट मिलने की उम्मीद बताई गई है।

तमिलनाडु

तमिलनाडु की 39 सीट में से केवल 1 ही सीट मिलने की उम्मीद की गई है, लेकिन उस पर भी पर बीजेपी और कॉन्ग्रेस के बीच टक्कर है।

उत्तर प्रदेश

जनसंख्या के आधार पर सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की कुल 80 सीटों में से 55 सीटें बीजेपी को मिलने की उम्मीद है, बाक़ी पर तस्वीर साफ़ नहीं हो सकी।

तेलंगाना

तेलंगाना की 17 सीटों में से केवल 1 सीट बीजेपी को मिलने की संभावना है और इसके अलावा 2 अन्य सीटों पर कॉन्ग्रेस और टीएरएस के साथ कांटे की टक्कर है।

उत्तराखंड

उत्तराखंड की पाँचों सीटें बीजेपी को मिलने की उम्मीद है।

अंडमान निकोबार, चंडीगढ, दादरा और नागर हवेली, दमन और दीव और पुडुचेरी

यहाँ की कुल 6 सीटों में से 4 सीटें बीजेपी को मिलने की संभावना जताई गई है।

अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा

सेवन सिस्टर (सात बहनें) नाम से विख्यात इन राज्यों की कुल 14 लोकसभा सीटों में से 6 सीटें बीजेपी को मिल सकती हैं।

पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल में कुल लोकसभा सीटें 42 हैं। इनमें से 16 सीटें बीजेपी को मिलने की उम्मीद है और 8 सीटों पर TMC के साथ कड़ी टक्कर है। वहीं 1 सीट को लेकर बीजेपी और कॉन्ग्रेस बीच टक्कर है।

विभिन्न एजेंसियों के एग्जिट पोल द्वारा जुटाए गए इन सभी आँकड़ों को देखकर लगता है कि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार का गठन होगा। फ़िलहाल तो इस बात पर केवल कयास ही लगाया जा सकता है, क्योंकि असली तस्वीर तो 23 मई को ही सबके सामने आएगी।

PS: इस लेख में केवल BJP के सीटों के आँकड़े दिए गए हैं। सहयोगी पार्टियों के आँकड़ों को इसमें सम्मिलित नहीं किया गया है।

मोदी जीत गए तो क्या हुआ, उसके पंख कतर दिए जाएँगे: कॉन्ग्रेस ने स्वीकारी ‘Moral Victory’

कॉन्ग्रेस ने शायद अब सार्वजनिक रूप से अपनी हार स्वीकार कर ली है। पार्टी के मुखपत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ के एक लेख का विश्लेषण करें तो यही पता चलता है। हेराल्ड ने एक लेख लिखा है, जिसका शीर्षक ही यह बताने के लिए काफ़ी है कि कॉन्ग्रेस और उसके लोग लोकसभा चुनाव 2019 के विभिन्न एग्जिट पोल्स के जारी होने के बाद कितने सदमे में हैं। इस लेख का शीर्षक कहता है कि क्या हो जाएगा अगर मोदी जीत भी जाए, उसके पंख को कतर दिए जाएँगे। शीर्षक कहता है कि यह बात मोदी को भी पता है। कुल मिलाकर देखें तो कॉन्ग्रेस अब इसी बात से ख़ुश है कि मोदी-भाजपा की सीटें पिछली बार से कम होंगी (एग्जिट पोल्स के अनुसार)। लेख की शुरुआत ही होती है एग्जिट पोल्स जारी करने वाली एजेंसियों को गाली देने के साथ।

इस लेख में विभिन्न एजेंसियों द्वारा जारी किए गए एग्जिट पोल्स का विश्लेषण करते हुए उनकी सफलता प्रतिशत का जिक्र किया गया है। कहा गया है कि 2014 में बड़े राज्यों के चुनावों में ये अधिकतर बुरी तरह ग़लत साबित हुए थे। वैसे, ये कोई नई बात नहीं है क्योंकि एग्जिट पोल कोई फाइनल नतीजे नहीं होते और इसे मतदाताओं के सैम्पल के आधार पर जारी किया जाता है। अपने दावों की पुष्टि के लिए कॉन्ग्रेस के मुखपत्र ने पार्टी के ‘डाटा एनालिटिक्स विंग’ के प्रमुख का ट्वीट लगाया है। इसके बाद लेख में एग्जिट पोल पर बहस करने वाले एंकरों की तुलना कार्टून से की गई है।

इस लेख को आगे पढ़ते-पढ़ते पता चल जाता है कि लेखक रात भर सोया नहीं है। एजेंसियों को गाली देने से लेकर एंकरों का मज़ाक उड़ाने तक, सब कुछ एक ख़ास अवसाद से ग्रसित होकर लिखा गया लगता है। भाजपा के बड़े नेताओं के बॉडी लैंग्वेज की पड़ताल करने का दावा करते हुए हेराल्ड ने कहा है कि इससे साफ़-साफ़ दिख रहा है कि सब कुछ ठीक नहीं है। उदाहरण के लिए उसने प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष द्वारा की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस को लिया है। इसमें कहा गया है कि मोदी ने सारा लाइमलाइट भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को दे दिया। अव्वल तो यह कि अगर मोदी ख़ुद ही बोलते रहते और अमित शाह को बोलने का मौक़ा नहीं मिलता तो कॉन्ग्रेस के सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष मुखपत्र भाजपा में लोकतंत्र न होने का रोना रो रहे होते।

मोदी ने अमित शाह को क्यों बोलने दिया, उन्हें क्यों लाइमलाइट दिया, इस पर भी हेराल्ड को आपत्ति है। इसका कारण भी हेराल्ड ने काफ़ी अजीब सा गिनाया है। हेराल्ड के अनुसार, मोदी को कुछ ऐसा पता है जो मेन स्ट्रीम मीडिया को नहीं पता। लेख के अनुसार, मोदी को पता है कि उनकी छवि अब ख़राब होती जा रही है, इसीलिए उन्होंने अमित शाह को बोलने दिया। इससे आगे का कारण हँसी पैदा करने वाला है। लेख में कहा गया है कि मोदी को यह भी पता है कि राहुल गाँधी की छवि काफ़ी अच्छी होती जा रही है, उनका क़द बढ़ता जा रहा है, इसीलिए मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुप रहे। इस कारण में लॉजिक ढूँढने का ज़िम्मा पाठकों पर छोड़ते हुए आगे बढ़ते हैं।

आगे हेराल्ड इस बात पर ताली पीटता है कि उन्हें शिवसेना और जदयू जैसे अस्त-व्यस्त गठबंधन दलों के साथ सरकार चलाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। हेराल्ड ने लिखा है कि जिन एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियों को सबसे ज्यादा पैसे दिए गए, उन्होंने भी भाजपा को उम्मीद से कम सीटें दी हैं। हेराल्ड का सीधा मानना है कि जिस भी न्यूज़ चैनल या एजेंसी ने भाजपा को एग्जिट पोल में ज्यादा सीटें दी, उन्हें पैसे दिए गए थे। हेराल्ड इस बात पर ताली पीटने में ही व्यस्त है कि मोदी गठबंधन साथियों के साथ उतनी स्वतंत्रता से सरकार नहीं चला पाएँगे, जैसा उन्होंने पिछले पाँच वर्षों में किया था।

कॉन्ग्रेस यहाँ अपनी हार मानती नज़र आ रही है और इसी बात से ख़ुश है कि राजग को बहुमत मिला तो क्या हो गया, सरकार ठीक से थोड़ी न चल पाएगी, हेराल्ड को उम्मीद है कि गठबंधन साथी तो ज़रूर परेशान करेंगे। अर्थात, अब कॉन्ग्रेस अपनी हार से दुःखी नहीं है लेकिन मोदी को थोड़ी परेशानी तो होगी, इस उम्मीद में ख़ुश है। लेकिन, हेराल्ड ने ख़ुद का सबसे ज्यादा मज़ाक तो बंगाल चुनाव का विश्लेषण करते हुए उड़वाया है। लेख का दावा है कि सारे संसाधन और सारी मेहनत झोंकने के बावजूद भाजपा यहाँ तृणमूल से पीछे नज़र आ रही है। असल में जिन्हें भी राजनीति की जरा भी समझ है, उन्हें पता है कि बंगाल में अगर भाजपा को 10 सीटों के क़रीब भी मिलती है तो यह बड़ी सफलता है, एग्जिट पोल्स में तो 23 तक दिए गए हैं।

बंगाल में कभी बराबर की लड़ाई तो थी ही नहीं। यह वहाँ सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी, उनकी पूरी सरकारी मशीनरी और गुंडागिरी में दक्ष पार्टी कार्यकर्ताओं से एक ऐसी पार्टी की लड़ाई थी, जिसका राज्य में अब से पहले कोई कैडर ही नहीं था। बावजूद इसके भाजपा के अच्छे प्रदर्शन को Downplay कर के दिखाने के चक्कर में नेशनल हेराल्ड अपनी राजनीतिक नासमझी का परिचय दे रहा है। कॉन्ग्रेस के मुखपत्र का यह भी दावा है कि दमदम, जौनपुर और आजमगढ़ की रैलियों में पीएम मोदी को जनता से ठंडी प्रतिक्रिया मिली। अगर दमदम में मोदी की रैली फ्लॉप रही तो तृणमूल के गुंडों ने रैली के तुरंत बाद वहाँ से भाजपा प्रत्याशी मुकुल रॉय पर हमला क्यों किया?

आजमगढ़ और जौनपुर के सपा और बसपा का गढ़ होने के बावजूद मोदी की रैली में यहाँ अच्छी-ख़ासी भीड़ जुटी और नेशनल हेराल्ड के दावे यहाँ भी झूठे साबित होते हैं। मोदी ने जनता के रुख को देखते हुए सातवें चरण के मतदान के दौरान केदारनाथ का दौरा किया, ऐसा नेशनल हेराल्ड का दावा है। इसके बाद इसने भी लिबरलों के उसी मुद्दे को उठाया, पीएम मोदी जब मंदिर में गए तो रेड कार्पेट क्यों बिछाया गया, कैमरे उनके साथ क्यों थे, वगैरह-वगैरह। इस बारे में हमने भी एक लेख प्रकाशित किया था, जिसमें इस बात पर चिंतन किया गया था किचश्मा पहन कर ध्यान लगाने को लेकर गिरोह विशेष के निशाने पर आए मोदी को अपनी आध्यात्मिक साधना कैसे करनी चाहिए और क्या-क्या पहनना चाहिए, वे वामपंथी भी अब इस पर चर्चा कर रहे हैं, जिन्हें सनातन हिन्दू परंपरा पर कोई विश्वास ही नहीं।

नेशनल हेराल्ड लेख का अंत होते-होते कॉन्ग्रेस की ‘मोरल जीत’ स्वीकार कर लेता है और भाजपा सरकार ठीक से तो चला नहीं पाएगी, इस उम्मीद में ख़ुश होने की झूठी कोशिश करता है। इसके बाद चुनाव आयोग की आलोचना का भी सिलसिला शुरू हो जाता है, जिसमें पूछा जाता है कि मोदी को केदारनाथ दौरे की अनुमति क्यों दी गई? नेशनल हेराल्ड की चले तो किसी व्यक्ति को अपनी व्यक्तिगत धार्मिक आस्था के लिए मंदिरों के दर्शन के भी लाले पड़ जाएँ। इस लेख का विश्लेषण इसीलिए ज़रूरी था, क्योंकि कॉन्ग्रेस ने अपनी नैतिक जीत स्वीकार करते हुए भाजपा के गठबंधनों से यह उम्मीद रखी है कि वो मोदी को सरकार चलाने के दौरान परेशान करें।

नेशनल हेराल्ड ने मोदी की जीत को ‘Pyrrhic Victory’ कहा है। इसका अर्थ हुआ कि ऐसी जीत, जो हार के बराबर हो (सम्राट अशोक के कलिंग विजय की तुलना इससे कर सकते हैं, इसका अर्थ हुआ कि ऐसी जीत जिसमें विजेता को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा हो)। नेशनल हेराल्ड को उम्मीद है कि मोदी जीत कर भी हार सकते हैं। ऐसे शब्दों के चयन के साथ ही नेशनल हेराल्ड ने जता दिया है कि आएगा तो मोदी ही।

‘राजीव गाँधी के कातिलों को छोड़ना है, जनता की है यही माँग… राज्यपाल को भेज दिया है प्रस्ताव’

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के पलानिस्वामी ने राजीव गाँधी के कत्ल के आरोप में उम्रकैद की सजा काट रहे कातिलों को रिहा करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। साथ ही यह भी कहा है कि यही तमिलनाडु की जनता की माँग है, और उन्होंने इसके लिए राज्यपाल को प्रस्ताव भेज दिया है। अब गेंद राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित के पाले में ही है और दहशतगर्दों की आजादी में केवल वही अंतिम रुकावट हैं।

तमिल जनता का एक बड़ा धड़ा, विपक्ष भी साथ

पलानिस्वामी का यह बयान बयान उस समय आया है जब विपक्ष के अलावा तमिलनाडु की जनता का एक बड़ा धड़ा भी इस माँग के समर्थन में है। 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राजीव गाँधी की आत्मघाती हमलावर ने मानव बम का इस्तेमाल कर हत्या कर दी थी। हमले में श्री गाँधी और हमलावर तेनमोली राजरत्नम के अतिरिक्त 13 और लोगों की भी मृत्यु हो गई थी। उस समय वह तमिलनाडु के ही श्रीपेरुम्बुदुर में लोकसभा निर्वाचन के लिए प्रचार कर रहे थे।

मामले के षड्यंत्रकारियों के खिलाफ टाडा एक्ट के तहत मुकदमा चला था। सभी 26 आरोपियों को चेन्नै की टाडा अदालत ने 1998 में मृत्युदंड दिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट में केवल चार मुख्य आरोपियों को मृत्युदंड कायम रखा गया। उनमें से भी नलिनी नामक महिला आरोपी को कॉन्ग्रेस की पूर्व अध्यक्षा और राजीव गाँधी की विधवा श्रीमती सोनिया गाँधी की पैरवी पर मृत्युदंड की बजाय उम्रकैद की सजा सुना दी गई। बाकी तीन आरोपियों के मृत्युदंड पर 2011 में मद्रास हाईकोर्ट ने आठ हफ़्तों की रोक लगा दी

पिछले सितंबर से ही राज्यपाल के पास प्रस्ताव लंबित

तमिलनाडु के कैबिनेट ने पिछले सितंबर में ही इस मामले में जेल में बंद सात आतंकियों मुरुगन, संतन, पेरारिवालन, जयकुमार, रविचंद्रन, रॉबर्ट पायस और नलिनी को रिहा करने के लिए प्रस्ताव पारित कर दिया था। पत्रकारों से बात करते हुए पलानिस्वामी ने यह कहा कि वह प्रस्ताव आम जनता की भावनाओं के अनुरूप ही था। उन्होंने आगे का निर्णय राज्यपाल के द्वारा लिए जाने की भी बात कही। राजीव गाँधी की हत्या की बरसी कल 21 मई को ही है।

साक्षरता और शिक्षा के बीच का फ़र्क़ भूल ‘सबसे बड़े दलित नेता’ ने BJP के वोटरों को कहा अशिक्षित

भाजपा से कॉन्ग्रेस में गए नार्थ-वेस्ट दिल्ली के सांसद उदित राज ने नया राग छेड़ा है। भाजपा द्वारा उनका टिकट काटने के पीछे का एक कारण यह भी था कि वह ग़लतबयानी को लेकर मशहूर हो चुके थे। अपने ही पार्टी के बड़े नेता योगी आदित्यनाथ पर निशाना साधने से लेकर भाजपा के विरोध में आयोजित रैली का हिस्सा बनने तक, ख़ुद को देश का सबसे बड़ा दलित नेता बताने वाले उदित राज को भाजपा ने भाव देना बंद कर दिया और अंततः उन्हें पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। उदित राज के जाने से भाजपा को कोई नुकसान नहीं हुआ क्योंकि शायद ही किसी क्षेत्र में उनका जनाधार हो। लेकिन हाँ, इससे कॉन्ग्रेस को सिद्धू के अलावा एक नया बयानवीर ज़रूर मिल गया। उदित राज ने अब फिर से बिना सिर-पैर वाली बात की है।

उन्होंने ट्विटर पर लिखा कि केरल में भाजपा आज तक एक भी सीट इसीलिए नहीं जीत पाई क्योंकि वहाँ के लोग अंधभक्त न होकर शिक्षित हैं। ऐसे अजीबोग़रीब कारण देने के साथ ही उदित राज ने यह भी साबित कर दिया कि उन्हें साक्षरता (Literacy) और शिक्षा (Education) के बीच का कोई अंतर पता नहीं है। अर्थात, किसे शिक्षित कहा जाता है और किसे साक्षर, इस बारे में उन्हें कुछ नहीं पता। सबसे पहले उन्हें इन दोनों का अर्थ समझना चाहिए, उसके बाद हम उनके इस बिना सिर-पैर वाले बयान के दूसरे पहलुओं की चर्चा करेंगे। असल में राजनीति में लगभग अप्रासंगिक हो चुके उदित राज ने राजनाथ सिंह से भाजपा का टिकट पाने के लिए पैरवी भी की थी लेकिन वो असफल रहे। अगर जेएनयू से पढ़ कर ऐसे बयान देना शिक्षित होने की पहचान है तो उदित राज जैसी शिक्षा किसी को न मिले।

उदित राज अब शिक्षित हो गए हैं। फरवरी 2014 से लेकर अप्रैल 2019 तक वह अशिक्षित थे। जी हाँ, आपने बिलकुल सही सुना। शिक्षा की उदित राज वाली परिभाषा के अनुसार वे अब कॉन्ग्रेस में जाकर शिक्षित हुए हैं। अगर भाजपा को वोट भर देने वाला व्यक्ति अशिक्षित है तो फिर भाजपा में पाँच वर्ष रह कर मलाई चाँपने वाले को क्या कहा जाए? क्या उदित राज अपनी परिभाषा में ख़ुद को फिट करते हुए स्वयं को सबसे बड़ा मूर्ख, अज्ञानी और अशिक्षित समझते हैं? साक्षरता दर को शिक्षा और शिक्षित से जोड़ कर कन्फ्यूजन के पुजारी बन चुके उदित राज का ये ट्वीट उनके बड़बोलेपन के सिवा और कुछ नहीं।

साक्षर होने का अर्थ होता है लिखने एवं पढ़ने की क्षमता होना। अर्थात, अगर मैं अपनी भाषा में लिखने और पढ़ने की क्षमता रखता हूँ, तो मैं साक्षर कहलाऊँगा। वहीं दूसरी तरफ़ शिक्षित होने का अर्थ है कि किसी व्यक्ति के पास कौन-सा स्किल है और उसने किस कक्षा या कोर्स की पढ़ाई कहाँ तक की है। इसका मतलब यह हुआ कि हर शिक्षित व्यक्ति साक्षर होता है लेकिन ज़रूरी नहीं है कि प्रत्येक साक्षर व्यक्ति शिक्षित हो ही हो। केरल साक्षरता के मामले में पूरे भारत में पहले स्थान पर आता है, शिक्षा के मामले में नहीं। उच्च शिक्षा के मामले में केरल टॉप पर नहीं आता।

अगर उच्च शिक्षा में ग्रॉस एनरोलमेन्ट रेश्यो (Gross Enrollment Ratio) की बात करें तो तमिलनाडु पूरे देश में नंबर एक पर आता है। इसके बाद दिल्ली और चंडीगढ़ का स्थान आता है। दिल्ली में अभी लोकसभा की सातों सीटों पर भाजपा काबिज़ है, यहाँ भाजपा की सरकार भी रही है और चंडीगढ़ में भी भाजपा की सांसद हैं। लेकिन, क्या किसी पार्टी के जीतने या न जीतने का यही पैमाना होता है क्या? अगर उदित राज की ही परिभाषा चुनें तो हम कह सकते हैं कि उच्च शिक्षा प्राप्त लोग भाजपा को पसंद करते हैं। लेकिन नहीं, ये परिभाषा ही ग़लत है। अगर साक्षरता की भी बात करें तो केरल के बाद टॉप पाँच में आने वाले राज्य जैसे कि गोवा और त्रिपुरा में भाजपा की सरकार है। शीर्ष पाँच में एक अन्य राज्य मिजोरम में राजग की सरकार है।

केरल की साक्षरता को भाजपा द्वारा वहाँ विफल रहने को जोड़ने उदित राज की राजनीतिक नासमझी के साथ-साथ साक्षरता और शिक्षा के बीच अंतर न समझ पाने की क्षमता का भी परिचायक है। दिल्ली में तो लोगों ने भाजपा के टिकट पर उन्हें जीत दिलाई, इसका अर्थ उन्हें वोट करने वाली जनता शिक्षित नहीं थी क्या? उदित राज ने यह नहीं लिखा कि केरल के लोग ज्यादा शिक्षित हैं और न ही ये लिखा कि वहाँ साक्षरता दर ज्यादा है, उन्होंने लिखा कि ‘केरल के लोग शिक्षित हैं’। तो क्या उनका इशारा यह था कि बाकी भारत के लोग अशिक्षित हैं? अगर भाजपा को वोट करने वाले अशिक्षित हैं तो पूरे भारत की जनता ही उनकी नज़र में अशिक्षित हो गई?

भारत में एक बड़ी आबादी अभी भी साक्षरता से दूर है, शिक्षा से दूर है, उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाती है। ख़ुद को दलित नेता बताने वाले उदित राज को उनका मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिए। इसमें एक बड़ी संख्या दलितों की है। अगर वह ख़ुद को सबसे बड़ा दलित नेता मानते हैं तो उनके भले के लिए, उनके लिए चल रही योजनाओं के लिए आवाज़ उठानी चाहिए। अशिक्षा को भाजपा व किसी पार्टी से जोड़ने से पहले उन्हें जानना चाहिए कि व्यक्ति शिक्षित हो या अशिक्षित, उसे अपनी समझ के आधार पर किसी भी पार्टी को वोट देने का अधिकार है। हो सकता है कि किसी निरक्षर या व्यक्ति को बरगला लिया जाए लेकिन ऐसी भी कोई रिसर्च सामने नहीं आई है जहाँ ये लिखा हो कि साक्षर व्यक्ति पैसे लेकर वोट नहीं करता।

साक्षरता से पढ़ने और लिखने की क्षमता आती है, शिक्षा से समझ आती है। आज उदित राज भले ही अशिक्षा को भाजपा से जोड़ रहे हों लेकिन ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने आतंकवाद और नक्सलवाद को भी अशिक्षा से जोड़ा है। जब उन्हें दुनिया भर के शीर्ष आतंकियों की डिग्रियों और अकादमिक रिकॉर्ड्स के बारे में बताया जाता है तो उनकी घिग्घी बंध जाती है। अगर उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति भी आतंक का रुख कर सकता है तो क्या ये कहना सही है कि अशिक्षा के कारण आतंकवाद फ़ैल रहा है। ठीक इसी तरह, अगर कोई मतदाता भाजपा को वोट देता है तो वह शिक्षित है या अशिक्षित, इस बात का पता कैसे लगाया जा सकता है?

अगर केरल में साक्षरता दर सबसे ज्यादा है तो खूँखार वैश्विक आतंकी संगठन आईएसआईएस से जुडी गतिविधियाँ भी इसी राज्य में सबसे ज्यादा देखी जा रही हैं। अगर केरल की साक्षरता दर सबसे ज्यादा है तो भारत में आईएसआईएस में शामिल होने वालों की संख्या भी इसी राज्य से सबसे ज्यादा है। 2016 में राज्य के 21 लोग आतंकी बन गए थे, जिनमें से 5 आईएस के लिए लड़ते हुए मारे गए। क्या साक्षरता दर से इन समस्याओं का समाधान हो जाता है? क्या भाजपा को वोट देने या न देने से इसका कोई सम्बन्ध है?

ऐश्वर्या, अभिषेक और सलमान: विवेक ओबरॉय ने तीनों के साथ की छिछोरापंती, जम कर हुए ट्रोल

मतदान का आखिरी चरण सम्पन्न होने के बाद रविवार (19 मई 2019) को हर न्यूज चैनल ने एग्जिट पोल दिखाकर खूब टीआरपी बटोरी। 10 में से 9 एग्जिट पोल ने दोबारा मोदी सरकार के आने का दावा किया। सोशल मीडिया पर यूजर्स ने एग्जिट पोल के अनुमानों पर जमकर डिस्कशन किया। तरह-तरह के मीम बने जो जगह-जगह वायरल हुए। ऐसे में भाजपा के स्टार प्रचारक और नरेंद्र मोदी की बायोपिक में उनकी भूमिका निभाने वाले बॉलीवुड अभिनेता विवेक ओबरॉय ने भी ‘एग्जिट पोल’ के नाम पर कुछ क्रिएटिव करने की कोशिश की, लेकिन ट्विटर पर उन्हें बुरी तरह ट्रोल होना पड़ा। और होते भी क्यों न? हरकत ही उन्होंने इतनी ओछी की।

विवेक ओबरॉय ने एग्जिट पोल आने के एक दिन बाद यानी सोमवार को ट्विटर पर एक मीम शेयर किया। जिसका क्रेडिट उन्होंने पवन सिंह को दिया है। इस मीम को शेयर करके उन्होंने अपनी सह-अभिनेत्री ऐश्वर्या राय के बीते कल को उछालने का प्रयास किया। इस मीम में ऐश्वर्या की तीन तस्वीरें हैं। एक में वो सलमान खान के साथ, दूसरी में विवेक के साथ और तीसरी में अभिषेक बच्चन के साथ हैं।

विवेक द्वारा शेयर इस मीम में सलमान के साथ ऐश्वर्या की तस्वीर को ‘ओपिनियन पोल’ बताया गया, खुद के साथ की तस्वीर को ‘एग्जिट पोल’ बताया गया और अभिषेक के साथ वाली तस्वीर को ‘रिजल्ट’ दर्शाया गया। हालाँकि इस तस्वीर पर लिखा पोस्ट देखकर हम अंदाजा लगा सकते हैं कि उन्होंने अपनी छिछोरी हरकत को बहुत सामान्य समझकर शेयर किया। इस पर उन्होंने “Haha! creative! No politics here….just life” जैसा लाइट कैप्शन भी दिया लेकिन सोशल मीडिया पर मौजूद यूजर्स ने इसे गंभीरता से लिया और इस हरकत के लिए उन्हें आड़े हाथों ले लिया।

एक महिला के बीते कल को लेकर मजाक बनाने पर लोगों ने उन्हें जमकर सुनाया। रोहित जैसवाल नाम के शख्स ने खुद को उनका (विवेक) का फॉलोअर बताते हुए उन्हें समझाया कि वो इस तरह की तस्वीरों को डिलीट कर दें, क्योंकि ऐसा करना वाकई किसी महिला की छवि को बिगाड़ने वाली हरकत के बराबर है।

ट्विटर पर सामाजिक कार्यकर्ताओं से लेकर बड़े पत्रकारों ने विवेक की इस हरकत की आलोचना की। किसी ने उनकी इस हरकत को शर्मसार करने वाला बताया तो किसी का मानना है कि वो अब तक अपने बीते कल से उबर नहीं पाए हैं इसलिए ऐसी हरकतें कर रहे हैं।

मीम का प्रयोग करके किसी की जिंदगी को लेकर निजी भड़ास निकालना विवेक को बहुत भारी पड़ा। लोगों ने उनकी इस हरकत पर यहाँ तक बोल दिया कि ये शर्म की बात है कि उन्होंने माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक में उनका किरदार निभाया है।

मिशन खिचड़ी सरकार: पवार ने दिया नायडू को झटका, मायावती नहीं मिलेंगी सोनिया से

एग्जिट पोल्स के सामने आने के बाद विपक्ष नए सिरे से अपनी रणनीति तैयार करने में लगा हुआ है। जहाँ इससे पहले तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ख़ासे सक्रिय थे, अब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू जोड़-तोड़ की कोशिश में दिख रहे हैं। ताज़ा ख़बर के अनुसार, नायडू ने महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार से मुलाक़ात की है। एनसीपी सुप्रीमो ने हालाँकि अपना रुख अस्पष्ट रखा है। उनकी पार्टी यूपीए का हिस्सा ज़रूर है लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन को 48 में से 38 सीटें तक मिलती दिखाई जा रही है, इससे उनकी बेचैनी बढ़ गई है। उनके गढ़ बारामती में अमित शाह के ज़ोरदार प्रचार अभियान ने उन्हें पहले ही चिंतित कर रखा था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, शरद पवार ने फाइनल नतीजों से पहले किसी भी प्रकार की विपक्षी बैठक में हिस्सा न लेने का फ़ैसला लिया है। उन्होंने नायडू से साफ़-साफ़ कह दिया कि वो चुनाव परिणाम आने के बाद ही इस सम्बन्ध में कोई भी निर्णय लेंगे। नायडू अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाक़ात करेंगे। विपक्षी एकता के सूत्रधार बनने के चक्कर में राज्यों का दौरा कर रहे नायडू ने राहुल गाँधी से भी पिछले 2 दिनों में 2 बार मुलाक़ात की है। यूपीए अध्यक्षा सोनिया गाँधी के साथ उनकी बैठक प्रस्तावित है, जिसमें आगे की रणनीति बनाई जाएगी।

इतना ही नहीं, नायडू ने माकपा नेता सीताराम येचुरी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल से मुलाक़ात की थी। कॉन्ग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी के साथ भी उनकी मुलाक़ात हुई है। एग्जिट पोल्स में आम आदमी पार्टी को शून्य से एक सीटें दी जा रही हैं, ऐसे में अगर नतीजे यही रहे तो पार्टी की नई सरकार बनाने में कोई भूमिका नहीं रहेगी। बीते दिनों में नायडू ने उत्तर प्रदेश के दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों अखिलेश यादव और मायावती से मुलाक़ात की। मायावती के साथ बैठक के बाद उन्हें गिफ्ट में आम मिला था। नायडू की कोशिश है कि नतीजे आने के तुरंत बाद हड़बड़ी न हो, इसीलिए पहले ही बैठक कर के विपक्षी दलों को एक कर लिया जाए।

इधर बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपना दिल्ली दौरा आज रद्द कर दिया। आज उनकी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी से मुलाक़ात होने की बात कही जा रही थी लेकिन नतीजों को देखते हुए उन्होंने लखनऊ में ही रहने का निर्णय लिया है। बसपा ने साफ़ कर दिया कि उनकी कॉन्ग्रेस के नेताओं से कोई मुलाक़ात नहीं होगी। मायावती ने चुनाव प्रचार अभियान के दौरान भाजपा और कॉन्ग्रेस के साथ समान दूरी बनाए रखने की बात कही थी। उधर तृणमूल प्रमुख ममता ने भी विपक्षी नेताओं से एक रहने की अपील की है। एग्जिट पोल्स की मानें तो राजग को पूर्ण बहुमत मिल रहा है और पूरा विपक्ष एक हो जाए, फिर भी खिचड़ी सरकार की कोई संभावना नहीं बनती।

EVM को सही साबित करने के लिए 3 राज्यों में कॉन्ग्रेस के जीत की रची गई थी साजिश: राशिद अल्वी

कॉन्ग्रेस नेता राशिद ने एग्जिट पोल और चुनाव परिणाम को लेकर एक बयान देते हुए कहा कि अगर एग्जिट पोल के नतीजे सही साबित हुए, तो इसका मतलब ईवीएम में धांधली हुई है। उनका कहना है कि सभी एग्जिट पोल में एकतरफा नतीजे दिखाए जा रहे हैं, इसलिए वो उस पर भरोसा नहीं कर रहे।

इसके साथ ही, उन्होंने कहा कि अगर चुनाव परिणाम एग्जिट पोल की तरह ही आते हैं, तो इसका मतलब पिछले साल तीन राज्यों के चुनाव में कॉन्ग्रेस जहाँ-जहाँ जीती थी, वह एक साजिश थी। यानी कि पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव के दौरान मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कॉन्ग्रेस की जीत को राशिद अल्वी साजिश मानते हैं। उनका मानना है कि तीन राज्यों में कॉन्ग्रेस की जीत के साथ ये भरोसा दिलाने की कोशिश की गई कि ईवीएम सही है, साथ ही उन्होंने ये भी साबित करने की कोशिश की कि सरकार, चुनाव आयोग के मामले में कोई दखलअंदाजी नहीं करती है।

कल (मई 19, 2019) लोकसभा चुनाव संपन्न हो गया। नतीजे 23 मई को आने वाले हैं, लेकिन विपक्ष का ईवीएम को लेकर रोना-धोना शुरू हो गया है। कल मतदान समाप्त होने के बाद कुछ मीडिया संस्थानों द्वारा एग्जिट पोल प्रसारित किया गया, जिसमें भाजपा सरकार के एक बार फिर से बहुमत के साथ सत्ता में आने की संभावना जताई गई। इस एग्जिट पोल के बाद तो विपक्ष का और भी बुरा हाल हो गया।

हालाँकि एग्जिट पोल का चुनाव के नतीजे से कोई लेना-देना नहीं होता है और इस पर विश्वास करना भी मुश्किल होता है, मगर इसके बावजूद ऐसा लग रहा है, जैसे विपक्ष ने इसे ही फाइनल रिजल्ट मान लिया है और हार भी स्वीकार कर ली है। तभी तो अपने आप ही वो हारने की वजह गिनवाने में जुट गई है और पिछली बार की तरह ही एक बार फिर से ईवीएम पर दोषारोपण करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। चूँकि लगभग हर एग्जिट पोल में एनडीए को बहुमत मिलते हुए दिखाया गया है, तो विपक्ष का इस पर तिलमिलाना भी लाजिमी है।

ABP-Nielsen Exit Poll: BJP की आती ज्यादा सीटें लेकिन… मक्कारी व धूर्तता से ‘संघी’ लोगों को हटाया

जहाँ अधिकांश एग्जिट पोल्स ने भाजपा और एनडीए को स्पष्ट बहुमत और बढ़त दिखाया, वहीं एबीपी न्यूज़-नीलसन का सर्वे उन चुनिंदा सर्वे में है, जिनके नतीजे अलग ही दिशा में जाते दिखे। ABP-नीलसन और NewsX-Neta के अलावा, बाकी सभी के पूर्वानुमानों के मुताबिक, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को स्पष्ट बहुमत मिलता दिख रहा है। जबकि, इन दोनों के द्वारा किए गए एग्जिट पोल में BJP-NDA क्रमशः 267 और 242 पर सिमट रहे हैं।

डूबते को तिनके का सहारा और ग़ालिब के दिल बहलाने वाले ख्वाब की तरह स्वघोषित प्रजाति के बहुत सारे लिबरल्स ABP सर्वे के सहारे उम्मीद लगाए बैठे हैं।

लेकिन, इस सर्वे की सच्चाई कुछ और ही है और यह सच्चाई खुद नीलसन के ही अधिकारी ABP न्यूज़ पर बताते नज़र आए।

‘ज्यादा भाजपा-भाजपा करने वालों को हमने अपने सर्वे में शामिल नहीं किया’

नीलसन में निदेशक पद पर तैनात उमेश झा से जब एंकर ने यह सवाल पूछा कि कैसे उन्हीं के सर्वे में BJP-NDA को बहुमत की कमी पड़ रही है, जबकि बाकी चैनल के एग्जिट पोल्स में तस्वीर बिल्कुल इसके विपरीत है, तो वह बगलें झाँकते नज़र आए। फिर उन्होंने बताया कि वह यह मान कर चल रहे थे कि भाजपा का वोट शेयर तो बढ़ने वाला है ही नहीं- इसलिए उन्होंने उन सभी लोगों के जवाबों को ख़ारिज कर दिया, जिन्होंने यह कहा कि उन्होंने पिछली बार तो भाजपा (या किसी अन्य राजग घटक दल) को वोट नहीं दिया था मगर इस बार दे रहे हैं। उनके मुताबिक, ऐसे लोग ‘डर के मारे’ झूठ बोले, जबकि असल में ऐसा नहीं हुआ होगा। उन्होंने अंदर जाकर EVM पर किसी भाजपा-विरोधी पार्टी का ही बटन दबाया होगा। हालाँकि, वो ये नहीं समझा पाए कि इस नतीजे पर वो किस गणित या फिर चमत्कारित सिद्धांत से पहुँचे?

पहले भी आँकड़ों के विवाद में फँस चुकी है नीलसन  

आँकड़ों का ही व्यापार करने वाली नीलसन गलत आँकड़ों के मामले में पहले भी फँस चुकी है। बिहार में 2015 में हुए विधानसभा चुनावों में मतगणना वाले दिन सुबह-सुबह उसने 18 चैनलों को कथित तौर पर गलत आँकड़े दे दिए थे, जिससे भाजपा को आगे दिखाया जाने लगा था। बाद में जब मतगणना पूरी हुई, तो BJP-NDA हार गए और महागठबंधन की जीत हुई। कई न्यूज़ चैनलों को गलत शुरुआती रुझान दिखाने के लिए शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ा था। एनडीटीवी के मालिक प्रणय रॉय ने गलत रुझान दिखाने के लिए बिना नाम लिए ठीकरा नीलसन के ही सिर पर फोड़ा था। उस समय भी नीलसन के निदेशक उमेश झा ही थे और अपनी सफाई में उन्होंने कहा था कि टाइम्स नॉउ और डीडी न्यूज़ को छोड़कर बाकी चैनलों ने उनके आँकड़ों के अलावा और भी स्रोतों का इस्तेमाल किया था, इसलिए इस त्रुटि के लिए नीलसन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता