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केंद्रीय बलों की वर्दी में भेजे जा रहे BJP-RSS के कार्यकर्ता, पैसे बाँटने बंगाल आते हैं PM मोदी: ममता

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर सनसनीखेज आरोप लगाए हैं। ममता ने कहा कि सीआरपीएफ व अन्य केंद्रीय बलों की वर्दी में भाजपा व संघ के कार्यकर्ता पश्चिम बंगाल में चुनाव को प्रभावित कर रहे हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने चुनाव आयोग से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चॉपर्स और गाड़ियों की जाँच करने की माँग करते हुए कहा कि भाजपा वोट ख़रीद रही है। उन्होंने कहा कि कई जेड सुरक्षा प्राप्त मंत्री अपनी गाड़ियों में पैसा लेकर चलते हैं। भाजपा नेताओं को बाहरी बताते हुए मतदाताओं को उनसे सचेत रहने को कहा।

भाजपा उम्मीदवार भारती घोष के साथ हुई बदतमीजी के बाद ममता बनर्जी ने कहा कि उनके साथ उनके सुरक्षा में तैनात इंचार्ज की फायरिंग से एक टीएमसी कार्यकर्ता की मौत हुई है। बता दें कि भाजपा की प्रत्याशी भारती घोष के साथ मतदान केंद्र पर तृणमूल के गुंडों ने बदसलूकी की थी। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के भी काफ़िले पर तृणमूल के गुंडों ने हमला किया। इसके बाद प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा कि राज्य में तृणमूल कार्यकर्ता और पुलिस साथ मिल कर काम कर रही है। उन्होंने ममता सरकार पर सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग का आरोप लगाया।

ममता बनर्जी ने फिर से केंद्रीय बलों पर आरोप लगाते हुए कहा कि वे मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में वोट डालने को कह रहे हैं। ममता ने पूछा कि केंद्रीय बलों के जवान ऐसा कैसे कर सकते हैं? उन्होंने कहा कि मोदी सरकार मतदान संपन्न कराने के लिए कुछ रिटायर्ड जवानों की मदद ले रही है, जो भाजपा के लिए कार्य कर रहे हैं। बता दें कि अभी कुछ दिनों पहले ही ममता ने केंद्रीय बलों को धमकाते हुए कहा था कि आज भले ही वो मोदी के अंतर्गत कार्य कर रहे हैं लेकिन बाद में वो भी सत्ता में आएँगी और जवानों को याद रखना चाहिए कि उन्हें विपक्षी पार्टियों के सत्ता में आने के बाद उनके अंतर्गत भी कार्य करना पड़ेगा।

भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि ममता बनर्जी राज्य में लोकतंत्र की हत्या कर राजतंत्र को गुंडातंत्र में तब्दील कर दिया है। 23 मई के बाद जनता ममता बनर्जी को अच्छे से जवाब देगी। ममता बनर्जी ने केंद्रीय बलों के जवानों का अपमान करते हुए आगे कहा:

राज्य में मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए संघ और भाजपा के लोग केंद्रीय बलों की वर्दी पहनकर आ रहे हैं। मैं केंद्रीय बलों का निरादर नहीं करती हूँ। लेकिन, उन्हें निर्देश दिए जा रहे हैं। मुझे शक है कि भाजपा-संघ के कुछ कार्यकर्ताओं को केंद्रीय बलों की वर्दी पहनाकर बंगाल भेजा जा रहा है। नरेंद्र मोदी बार-बार राज्य में क्यों आ रहे हैं? दरअसल वे लोगों को बाँटना चाहते हैं। वे यहाँ पैसे लेकर आते हैं ताकि लोगों को बाँटकर वोट हासिल किए जा सकें। पीएम मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को चुनाव हारने का डर है। मैंने कभी ऐसा प्रधानमंत्री नहीं देखा जो इतने निम्न स्तर पर आकर बयानबाजी करता हो।

पश्चिम बंगाल में लगातार भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं पर हमले हो रहे हैं। राज्य में क़ानून व्यवस्था की कलई खुल गई है और पत्रकारों तक को भी नहीं बख्शा जा रहा है। बंगाल में सुरक्षा की दृष्टि से चुनाव आयोग ने सभी सात चरणों में चुनाव संपन्न कराने का लक्ष्य रखा, लेकिन फिर भी हिंसक वारदातें थमने का नाम नहीं ले रही हैं।

मीडिया को हेडलाइन मैटीरियल न मिले तो लोकतंत्र रुक नहीं जाता: नरेंद्र मोदी की ‘खरी-खरी’ मन की बात

यह ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी’ का इंटरव्यू नहीं था, नरेंद्र दामोदरदास मोदी का था- साफ़, स्पष्ट, कड़वी लेकिन खरी बातों से भरा हुआ, 5 साल तक मीडिया रिपोर्टिंग में अपने साथ हुए अन्याय को लेकर शिकायती लहजे से सराबोर। नरेंद्र मोदी इसमें कोई स्टेट्समैन नहीं, खाँटी नेता थे जो जनता तक अपनी बात पहुँचाने और वोट माँगने निकले थे। इसमें प्रधानमंत्री की धीर-गंभीरता कम, और खुद को गलत तरीके से घिरा पा रहे एक व्यक्ति का क्षोभ अधिक था। आज शायद ठंडा दिमाग नहीं, उबल रहा दिल बोल रहा था।

लिहाजा इंडियन एक्सप्रेस को दिए इस साक्षात्कार में पत्रकारों की गलतियाँ भी गिनाईं, उन्हें यह याद भी दिलाया कि (सोशल मीडिया के दौर में) आज मुख्यधारा का पत्रकार खुद विश्वसनीयता साबित करने के लिए जूझ रहा है। उन्होंने अपने ऊपर लगने वाले हर आरोप- ‘रेवड़ी’-नॉमिक्स से लेकर नोटबंदी के लक्ष्य बदलते रहने और राजीव गाँधी को अपशब्द कहने के बारे में आक्रामक खंडन करते हुए अपना पक्ष सामने रखा। पेश हैं प्रमुख मुद्दों पर प्रधानमंत्री भाजपा नेता नरेंद्र मोदी के विचार:

रिकॉर्ड उठा कर देख लो, मैं निर्वाचन के समय के अलावा राजनीति नहीं करता

सवाल था कि इस आगामी लोकसभा की निर्वाचन प्रक्रिया में इतनी तल्खी हो गई है कि सवाल उठ रहा है क्या सत्ता पक्ष और विपक्ष इसके बाद तालमेल बिठा कर संघीय तंत्र को चला पाएँगे। जवाब में नरेंद्र मोदी ने अपने पाँच साल के प्रधानमंत्रित्व और 13 साल के गुजरात के कार्यकाल का हवाला देकर दावा किया कि निर्वाचन प्रक्रिया के समय प्रचार के दौरान और समसामयिक राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणियों का जवाब देने तक ही उनकी विशुद्ध राजनीतिक गतिविधियाँ सीमित रहीं हैं। “मैं अगर पानी से जुड़े कार्यक्रम में गया तो पानी पर ही बोला। अगर बिजली से जुड़े कार्यक्रम में गया तो बिजली पर ही बोला।”

उन्होंने यह भी दावा किया कि विपक्षी दलों के कई सांसद निजी तौर पर यह मान चुके हैं कि मोदी ने जितना समय उन्हें दिया, किसी और प्रधानमंत्री ने नहीं। उन्होंने उड़ीसा और बंगाल में हालिया चक्रवात का उदाहरण दिया कि कैसे वह अपने राजनीतिक कार्यक्रम रोक कर इसकी समीक्षा बैठकें कर रहे थे। 2016 का भी उदाहरण दिया जब केरल में 18 लोगों की मृत्यु पटाखों के धमाके में हो जाने के बाद वह चोटी के डॉक्टरों की टीम लेकर वहाँ पहुँचे थे जबकि उस समय वहाँ कॉन्ग्रेस की सरकार थी।

यूँ उठी थी राजीव गाँधी वाली बात

मोदी हाल-फ़िलहाल राजीव गाँधी की मृत्यु के समय ‘भ्रष्टाचारी नं. 1’ की छवि होने की बात कहने को लेकर वाम-(छद्म) उदारवादी मीडिया के निशाने पर हैं। उन पर आईएनएस विराट भी ‘गड़े मुर्दे उखाड़ने’ का आरोप है। इन दोनों का भी उन्होंने जवाब दिया और मीडिया के दोहरे मापदण्डों को भी आड़े हाथों लिया। उन्होंने सवाल पूछा कि अगर राहुल गाँधी का एक साल से उन्हें ‘चोर’ कहना लोकतंत्र में अशिष्टता नहीं था तो उनका राजीव गाँधी को ‘भ्रष्टाचारी’ कहना क्यों अपमानजनक हो गया।

“एक आदमी की छवि पर चोर-चोर-चोर-चोर-चोर के सहारे चोट किया जा रहा है, आपको उस पर कोई आपत्ति नहीं है!”

राजीव गाँधी के आईएनएस विराट विवाद का भी परिप्रेक्ष्य उन्होंने दिया कि पहले राहुल गाँधी ने उन्हें ताना मारा था कि सेना उनकी (मोदी की) जागीर नहीं है। तब उन्होंने यह याद दिलाना जरूरी समझा कि सरकारी और सार्वजानिक सम्पत्ति को निजी जागीर बना लिए जाने की असली तस्वीर कैसी होती है, और विराट के दुरुपयोग का मामला उठाया।

मेरी छवि 45 साल के संघर्ष से बनी है, खान मार्केट गैंग से नहीं; यूँ ही नहीं तोड़ लोगे

मोदी ने राहुल गाँधी के हालिया इंटरव्यू का भी जिक्र किया जिसमें राहुल गाँधी ने उनकी साफ़ छवि को छिन्न-भिन्न कर देने को अपनी सबसे बड़ी रणनीति बताया था। मोदी ने तंज कसते हुए कहा,

“मोदी की छवि दिल्ली के खान मार्केट गैंग ने नहीं बनाई है, लुटियंस दिल्ली ने नहीं बनाई है। 45 साल की मोदी की तपस्या ने बनाई है। अच्छी है या बुरी, इसे आप नष्ट नहीं कर सकते।”

नरेंद्र मोदी यहीं नहीं रुके। दिल्ली के सबसे महँगे रियल एस्टेट खान मार्केट में रहने और लुटियंस से सत्ता की दलाली करने वालों पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने यह भी पूछा कि जिस भूतपूर्व प्रधानमंत्री (राजीव गाँधी) की ‘मिस्टर क्लीन, मिस्टर क्लीन’ करके इन्होंने छवि बनाई थी, उनका अंत कैसे (किस छवि के साथ) हुआ?

हम हार कर भी उत्साह से ओत-प्रोत हैं

सवाल था कि लोकसभा निर्वाचन से ठीक पहले तीन राज्यों की सत्ता गँवाकर भाजपा ने क्या सीखा? मोदी ने पलट कर भाजपा को तीन राज्यों में कुल 40 सीटों पर समेटने वाले राजनीतिक गणितज्ञों पर कटाक्ष किया। यह भी याद दिलाया कि छत्तीसगढ़ के अलावा भाजपा को सत्ता-विरोधी लहर के बावजूद भारी जनसमर्थन मिला और मध्य प्रदेश में तो कुल मत प्रतिशत कॉन्ग्रेस से ज्यादा ही रहा।

मोदी ने यह भी याद दिलाया कि कॉन्ग्रेस अपने ‘असली रंग’ में आ गई है, और नोटों के बंडलों की ख़बरें देश भर में फिर से सुनाई पड़ रहीं हैं। उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस की खोजी पत्रकारिता की छवि पर भी तंज कसते हुए पूछा कि कैसे इंडियन एक्सप्रेस को भोपाल में गरीब बच्चों के खाने के कोष में घोटाला नहीं दिखा।

मेरी सरकार को केवल एक-दो चीज़ों से जोड़कर न देखें

जब नरेंद्र मोदी से पूछा गया कि जैसे अटल सरकार को पोखरण, विनिवेश, बिजली सुधार आदि के लिए याद किया जाता है, वैसे उनकी सरकार 20 साल बाद किस चीज़ के लिए याद की जाएगी, तो उन्होंने कहा कि किसी एक-दो चीजों से वह अपनी और अपनी सरकार की छवि नहीं जोड़ना चाहते। उन्होंने आधारभूत ढाँचे से लेकर स्वच्छ भारत और आयुष्मान भारत गिनाते हुए कहा कि उनकी सरकार की (और अटल सरकार की भी) परिकल्पना में हर क्षेत्र में स्तम्भ खड़े करते हुए समग्र विकास के लिए काम करने की रही है।

प्रोत्साहन और आधारभूत सहायता को रेवड़ी मत कहिए, विनिवेश की प्रतिबद्धता दोहराई

मोदी से सवाल किया गया कि पीएम-किसान जैसी जनकल्याणकारी योजनाएँ क्या एक तरह से कॉन्ग्रेस की ही तरह ‘रेवड़ियाँ’ बाँटकर सत्ता पाने का प्रयास नहीं है। जवाब में उन्होंने प्रतिप्रश्न किया कि अगर उनकी सरकार इंडियन एक्सप्रेस में विज्ञापन देती है तो क्या इसे ‘रेवड़ी’ माना जाए। उन्होंने गरीबों के लिए सस्ते मकान बनाने की परियोजना, हेल्थकेयर में आधारभूत चेन बनाने आदि को ‘रेवड़ी’ बताने पर भी आपत्ति जताई। यह समझाया कि उनके दृष्टिकोण से यह सब मूलभूत ढाँचे हैं, जिनके ऊपर निजी भागीदार इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति का निर्माण करेंगे।

विनिवेश के सवाल पर उन्होंने अपना मशहूर नारा “government has no business to be in business” दोहराया और विनिवेश के प्रति प्रतिबद्धता भी जताई। पर यह मजबूरी भी गिनाई कि किसी भी इकाई को बेचने के लिए उसे खरीददारों में उत्सुकता पैदा करने वाला बनाना तो जरूरी है। साथ ही यह भी याद दिलाया कि उनकी सरकार ने ही सबसे ज्यादा विनिवेश किया है। एक PSU द्वारा दूसरे को खरीदने के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह विनिवेश प्रक्रिया का ही हिस्सा है जिसमें छोटी-छोटी इकाइयों को मिलाकर एक बड़ी इकाई बनाई जा रही है। उदाहरण उन्होंने एसबीआई का दिया जिसमें कुछ समय पहले त्रावणकोर स्टेट बैंक समेत 5 छोटे बैंकों का विलय हुआ है।

अधिनायकवाद का खण्डन

नरेंद्र मोदी ने साफ़ कर दिया कि यह अधिनायकवाद की छवि पूरी तरह झूठी है। उन्होंने यूपीए काल की कैबिनेट मीटिंगों से एनडीए-2 की तुलना करते हुए कहा कि (जब ‘रिमोट कंट्रोल’ से सरकार चलती थी तो) यूपीए में 20 मिनट औसतन कैबिनेट मीटिंग होती थी। उनके (मोदी के) समय में यह बढ़कर तीन घंटे के आसपास हो गया है। उन्होंने बताया कि कैबिनेट में कई पूरी तरह तैयार प्रस्ताव ख़ारिज हुए हैं और कई अन्य अस्थाई मंत्री-समूहों के हवाले किए गए हैं।

मीडिया को आईना भी, लताड़ भी

इस समय नरेंद्र मोदी पूरी तरह चुनावी मोड में चल रहे हैं। 5 साल तक मीडिया द्वारा प्रॉक्सी-विपक्ष का रोल अदा करने के बाद भी उन्होंने शायद ही कभी मीडिया पर सीधा निशाना साधा हो। पर आज उन्होंने मीडिया को नहीं बख्शा। हर मुद्दे पर मोदी के लिए अलग मापदंड तय होने की भी जमकर बखिया उधेड़ी।

इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकारों के सामने ही उनके पूर्व सम्पादक द्वारा एक समय दो बैंकों के विलय को ‘बड़ा कदम’ करार दिए जाने और मोदी के 5 और 3 बैंकों के विलय पर सन्नाटा मार लेने पर भी सवाल उठाया। जब उन पर ‘लोकतंत्र के अनिर्वाचित स्तम्भों’ (मीडिया और न्यायपालिका) से असहज होने का आरोप लगा तो उन्होंने बिना लागलपेट साफ़ कर दिया कि हालाँकि वह मीडिया के सवालों से नहीं डरते पर यह उम्मीद जरूर करते हैं कि मीडिया उतने ही सवाल और वैसे ही सवाल दस साल तक रिमोट कंट्रोल से सरकार चलाने वालों से भी पूछने की हिम्मत दिखाए।

उन्होंने मीडिया की तथाकथित ‘निष्पक्षता’ को भी कठघरे में खड़ा किया। उन्हें याद दिलाया कि आज सोशल मीडिया मुख्यधारा के पत्रकारों के पूर्वग्रहों को बेनकाब कर रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्यों मीडिया ने कॉन्ग्रेस-शासित राजस्थान में दलित के बलात्कार की खबर को तभी उठाया जब वहाँ निर्वाचन सम्पन्न हो गए (यानी खबर उछलने से कॉन्ग्रेस को वोटों के नुकसान का खतरा नहीं रहा)। उन्होंने पलट कर मीडिया से सवाल किए जाने को ‘अपमान’ करार देने पर भी सवाल खड़े किए।

‘हेट स्पीच’ के मामले में भी उन्होंने मीडिया द्वारा ‘अप्रूव’ की गई परिभाषा को मानने से इंकार कर दिया। उल्टा मीडिया को कटघरे में खड़ा किया। मोदी ने पूछा कि ‘हेट स्पीच’ की यह कैसी परिभाषा है कि यदि एक व्यक्ति (साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर) खुद को हिरासत में प्रताड़ित किए जाने की बात करे तो वह ‘हेट स्पीच’ है लेकिन सभी हिन्दुओं को ‘भगवा आतंकवाद’ के झूठे नाम पर अपमानित करना हेट स्पीच नहीं है। यहाँ तक कि समुदाय विशेष को अलग-थलग करने का खुद पर आरोप लगाने पर पलट कर उन्होंने पूछा कि कितने (मीडिया हाउस में) आज समुदाय विशेष वालों को मुख्य पत्रकार (सम्पादक) बनाया गया है।

लोकतंत्र पर पत्रकारों की ‘चिंता’ पर भी उन्होंने सीधे-सीधे कहा कि मीडिया की यह चिंता अपारदर्शिता और लोकतंत्र की नहीं, हेडलाइन बनने के लिए खबरें लीक न होने को लेकर है। और इसके लिए कोई ‘आश्वासन देने के बजाय उन्होंने साफ़ कह दिया कि पत्रकारों को खबरें न मिल पाना उनकी (मोदी की) समस्या नहीं है।

देश का नुकसान मतलब देशद्रोह

राष्ट्रवाद और देशद्रोह के मुद्दे पर नरेंद्र मोदी ने बहुत तफ़सील से अपनी परिभाषा बताई भी, और समझाई भी। उन्होंने साफ़ कर दिया कि कोई भी इंसान जो देश का नुकसान करता है उसे वह देशभक्त नहीं मानते। उन्होंने उदाहरण दिया कि पंडित नेहरू द्वारा शुरू किया गया सरदार सरोवर बाँध इतना खिंचा (भ्रष्टाचार के चलते) कि उसका उद्घाटन उन्होंने (मोदी ने) हाल ही में किया। ₹6,000 करोड़ की अनुमानित कीमत से शुरू हुई परियोजना की आखिरी कीमत ₹1 लाख करोड़ बैठी। यह देशद्रोह ही था (मोदी की नजरों में)।

कश्मीर के विकास लिए मुफ़्ती-अब्दुल्ला से मुक्ति जरूरी, नक्सलियों के नेता कार और PhD वाले

नरेंद्र मोदी ने जहाँ एक ओर कश्मीर के विकास के लिए मुफ़्ती और अब्दुल्ला खानदानों के चंगुल से मुक्ति को जरूरी बताया, दूसरी ओर यह साफ़ किया कि नक्सली-माओवादी न गरीब हैं न ही गरीबों के हिमायती। उन्होंने ‘अर्बन नक्सलियों’ की ओर इशारा करते हुए साफ़ किया कि नक्सलियों के छोटे नेता गाड़ियों में घूमते और PhD कर विश्वविद्यालयों में पढ़ाते हैं। वह विकास को भी रोकते हैं क्योंकि अगर विकास होगा तो उनकी विचारधारा का फैलाव नहीं होगा। उन्होंने यह भी बताया कि हिंसा को लेकर उनकी सरकार की ‘जीरो-टॉलरेंस ‘नीति के बावजूद रिकॉर्ड स्तर पर माओवादियों ने हथियार डाले हैं और एक-तिहाई जिले अब वामपंथी चरमपंथ से मुक्त हैं।

पाकिस्तान की गेंद पाकिस्तान के पाले में, चीन समझता है हमारी चिंताएँ

पाकिस्तान के मुद्दे पर मोदी ने केवल इतना ही कहा कि पाकिस्तान का अगला कदम ही भारत के अगले कदम को तय करेगा। चीन के मुद्दे पर हालाँकि उन्होंने देश को आश्वस्त किया कि चीन भारत की आतंक-संबंधी चिंताओं से अनभिज्ञ नहीं है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि चीन और भारत के बीच कुछ असहमतियाँ होते हुए भी बहुत (से महत्वपूर्ण मुद्दों पर) सहमति है।

विदेश नीति में सौभाग्यशाली रहा कि जमीन से जुड़ा रहा, किताबी ज्ञान से नहीं

अपनी अनूठी विदेश नीति के मुद्दे पर भी नरेंद्र मोदी अपने आलोचकों के प्रति ही आलोचनात्मक नजर आए। उन्होंने कहा कि अधिकाँश विदेश नीति ‘विशेषज्ञ’, और यहाँ तक कि विदेश मंत्री, इस विषय को अत्यधिक ‘अकादमिक’ तरीके से देखते हैं। जबकि उनका (मोदी का) दृष्टिकोण यहाँ भी जमीन से जुड़ा हुआ रहा। उन्होंने बताया कि कैसे अपने वर्षों पहले के अमेरिका प्रवास में उन्होंने सस्ते और रियायती टिकट का लाभ उठाते हुए अमेरिका के 23 राज्यों का भ्रमण किया था।

अपनी विदेश नीति के फायदे गिनाते हुए उन्होंने G-20 के इतर हुई भारत की रूस-चीन और जापान-अमेरिका से वार्ताओं को मिल रहे महत्व का उदाहरण दिया। साथ में यह भी जोड़ा कि व्यक्तिगत मित्रताएँ स्थापित करने से पारस्परिक समझ स्थापित होने में सहूलियत होती है

मतदान न कर पाने वाले दिग्विजय सिंह को BJP ने बताया Nervous, साध्वी ने कहा ‘धर्मयुद्ध है यह’

चुनाव प्रचार के लिए कई दिनों से भोपाल में डेरा जमाए दिग्विजय सिंह छठे चरण के दौरान मतदान करने में असफल रहे। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भोपाल में ख़ुद को इसीलिए वोट नहीं दे सके, क्योंकि वह भोपाल लोकसभा क्षेत्र के मतदाता नहीं हैं। मतदाता सूची में दिग्विजय सिंह का नाम मध्य प्रदेश के राजगढ़ लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले उनके पैतृक कस्बे राघौगढ़ में पंजीकृत है। इसकी वजह से वो भोपाल में स्वयं को वोट नहीं दे पाए। दिग्विजय के पैतृक क्षेत्र में भी आज छठे चरण के तहत मतदान हुआ, लेकिन भोपाल से लगभग 150 किलोमीटर दूर अपने गाँव में दिग्विजय वोट डालने के लिए नहीं गए। सोशल मीडिया पर लोगों ने इस पर गुस्सा ज़ाहिर करते हुए पूछा कि सबको वोट देने की अपील करने वाले कुछ नेता ख़ुद मतदान क्यों नहीं करते?

वहीं दूसरी तरफ़ भोपाल लोकसभा क्षेत्र से भाजपा की उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने मतदान में हिस्सा लिया। साध्वी प्रज्ञा ने आज रविवार (मई 12, 2019) को सुबह भोपाल के रेवेरा टाउन मतदान केन्द्र पर अपना वोट डाला। मतदान करने के बाद साध्वी प्रज्ञा ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि यह धर्म युद्ध है। उन्होंने कहा कि पूरे देश में भाजपा को पहले से भी ज्यादा सीटें मिलेंगी और नरेन्द्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री बनेंगे। साध्वी प्रज्ञा वर्ष 2008 में हुए मालेगांव विस्फोट मामले में आरोपित हैं और फिलहाल जमानत पर हैं। साध्वी प्रज्ञा ने कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा ख़ुद को फँसाने और गिरफ़्तारी के बाद उनका टॉर्चर किए जाने को चुनाव में मुद्दा बनाया था।

साध्वी प्रज्ञा ने इस चुनाव को धर्मयुद्ध इसीलिए बताया क्योंकि उन्होंने जनता के बीच जाकर लगातार यह बताया कि दिग्विजय सिंह ‘हिन्दू आतंकवाद’ वाली थ्योरी गढ़ने वालों में प्रमुख नेता थे और साध्वी प्रज्ञा इस नैरेटिव की शिकार बनीं। साध्वी प्रज्ञा द्वारा इन बातों को छेड़ने के बाद भोपाल सहित पूरे देश में उन्हें जनता की सहानुभूति मिली। 1993 से 2003 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह के ख़िलाफ़ उन्हें उतारना भाजपा की हिंदुत्ववादी नीतियों को आगे बढ़ाने में भी सहायक सिद्ध होगा। दिग्विजय सिंह ने वोट न डालने वाले सवाल पर कहा कि उन्हें इसका अफ़सोस है।

वहीं भाजपा खेमे का कहना है कि दिग्विजय बेचैनी और अधीरता के कारण वोट डालने नहीं जा सके। दिग्विजय लगातार भोपाल में कैम्प करते रहे क्योंकि मुख्यमंत्री कमल नाथ ने उन्हें राज्य के सबसे कठिन सीट से लड़ कर जीतने की चुनौती दी थी, ऐसा भाजपा का मानना है। दिग्विजय ने भाजपा के हिंदुत्व की काट के लिए कम्प्यूटर बाबा को प्रचार के लिए बुलाया था और कई साधु-संतों के साथ भगवा कपड़ों में रोड शो भी किया था। दिग्विजय के लिए साधु-संतों ने भोपाल कॉन्ग्रेस के दफ़्तर में हवन किया।

मध्य प्रदेश की आठ लोकसभा सीटों के लिए आज मतदान संपन्न हुआ। शाम 4 बजे तक मध्य प्रदेश में लगभग 53% मतदान हुआ था। पिछली बार भाजपा ने यहाँ अच्छा प्रदर्शन किया था लेकिन विधानसभा चुनाव हारने के बाद पार्टी ने अपनी तैयारियों को एक नया स्वरूप दिया। इसी क्रम में साध्वी प्रज्ञा को पार्टी की सदस्यता दिलाकर भोपाल से उतारा गया।

अयोध्या में भगवान श्रीराम की सबसे ऊँची 221 मीटर की प्रतिमा, अधिकृत होगी 28 हेक्टेयर भूमि

अयोध्या में भगवान श्रीराम की सबसे ऊँची प्रतिमा के लिए 28.284 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहीत की जाएगी। अयोध्या के डीएम अनुझ झा ने इसके लिए ज़मीन चिन्हित करके इसका प्रस्ताव पर्यटन विभाग को भेज दिया है।

ख़बर के अनुसार, सरयू नदी के पास भगवान राम की क़रीब 221 मीटर ऊँची प्रतिमा बनाई जाएगी। इसके अलावा प्रतिमा के आसपास प्रदर्शनी दीर्घा के साथ-साथ वहाँ आने वाले भक्तों के लिए सुविधाएँ भी मुहैया कराई जाएँगी।

सर्किल रेट के तहत ज़मीन की क़ीमत लगभग 38 करोड़ रुपए आँकी गई है। लेकिन यह नियम है कि ग्रामीण क्षेत्र की भूमि का मुआवज़ा सर्किल रेट से चार गुना और शहरी क्षेत्र का मुआवज़ा सर्किल रेट से दोगुना दिया जाना है।

इस प्रतिमा के लिए ज़मीन अधिग्रहण में क़रीब 80 करोड़ से अधिक ख़र्च हो सकता है। फ़िलहाल, देश में लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया जारी है इसलिए ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया चुनाव के बाद आगे बढ़ाई जाएगी। वहीं सरकार ने पहले ही यह साफ़ कर दिया है कि खातेदार की सहमति से ही उसकी भूमि का अधिग्रहण होगा।

भगवान श्रीराम की प्रतिमा 151 मीटर ऊँची होगी, 50 मीटर ऊँचे पैडस्टल और 20 मीटर ऊँचे छत्र के बाद प्रतिमा की कुल ऊँचाई 221 मीटर हो जाएगी। 50 मीटर ऊँचे पैडस्टल के अंदर ही अत्याधुनिक म्यूज़ियम भी बनाना तय हुआ है। इस म्यूज़ियम में अयोध्या का इतिहास, इक्ष्वाकु वंश का इतिहास दिखाया जाएगा। इसके अलावा यहाँ आने वाले भक्त राजा मनु से लेकर श्रीराम तक के बारे पूरी जानकारी से अवगत हो सकेंगे।

‘ज़्यादा हँसो मत, एक दिन रोओगे’- अब्दुल हमीद के कॉमेंट के कारण श्री लंका की मस्जिदों पर अटैक

श्री लंका में स्थिति अभी भी तनावपूर्ण बनी हुई है। स्थानीय आबादी और समुदाय विशेष के बीच ताजा तनातनी एक फेसबुक पोस्ट को लेकर हुई और देखते ही देखते कर्फ्यू लगाने की स्थिति आ गई। यह घटना चिलॉव नाम के शहर में हुई है। स्थानीय पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सोमवार की सुबह 6 बजे तक कर्फ्यू लगा दिया है।

रॉयटर्स के अनुसार, फेसबुक पर एक पोस्ट को लेकर यह मामला इतना बढ़ गया कि चिलॉव स्थित तीन मस्जिदों और सम्प्रदाय विशेष की कुछ दुकानों पर स्थानीय ईसाई समुदाय के लोगों ने पथराव किया।

फेसबुक पर किसी यूजर ने सिंहलीज़ में लिखा – “हमें रुलाना इतना आसान नहीं।” इसके साथ ही उसने समुदाय विशेष के लिए एक स्थानीय गाली का भी प्रयोग किया। इसी पोस्ट पर अब्दुल हमीद मोहम्मद हसमार ने अंग्रेजी में कॉमेंट किया – “Dont laugh more 1 day u will cry.” मतलब ज्यादा हँसो मत, एक दिन तुम रोओगे।

आपको बता दें कि श्री लंका में ईस्टर संडे के मौके पर 21 अप्रैल को हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के बाद सरकार ने बुर्के पर बैन लगाने के बाद अब एक और बड़ा कदम उठाया था। श्री लंका सरकार ने कुल 600 विदेशी नागरिकों को देश से निष्कासित कर दिया था। बता दें कि, देश से बाहर निकाले गए इन लोगों में 200 मौलवी भी शामिल थे।

इस साल ईस्टर संडे की सुबह ने श्रीलंका को हिला कर रख दिया था। 21 अप्रैल 2019 को श्रीलंका में इस्लामी आतंक का कहर बरपा था। लगातार आठ बम धमाकों से 200+ मौतें और करीब 500 से ज्यादा लोग बुरी तरह जख्मी हुए थे।

‘पिंक बूथ’ मतदान केंद्रों पर ‘नारी शक्ति’: बड़ी संख्या में मुस्लिम महिला वोटरों को जोड़ने की पहल

राजधानी दिल्ली में आज (मई 12, 2019) मतदान के दौरान 17 मतदान केंद्रों पर ‘नारी शक्ति’ साफ तौर पर देखने को मिला। इन 17 मतदान केंद्रों को ऐसे बनाया गया था, जिसमें सिर्फ महिला स्टाफ ही थीं। ये महिला मतदान केंद्र दिल्ली की सभी सातों लोकसभा सीटों पर बनाए गए, जिनमें पीठासीन अधिकारी से लेकर अन्य स्टाफ तक सिर्फ महिलाएँ ही थीं। इन मतदान केंद्रों पर महिला वोटर खासकर, मुस्लिम महिला वोटरों की संख्या काफी रही।

दिलचस्प बात ये है कि दिल्ली की सात में से चार जिला निर्वाचन एवं रिटर्निंग ऑफिसर भी महिलाएँ ही हैं। वो इस तरह के सकारात्मक पहल के प्रभाव को देखकर खासी उत्साहित हैं। चांँदनी चौक लोकसभा सीट की रिटर्निंग ऑफिसर तन्वी गर्ग ने कहा कि दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने महिला मतदान केंद्र की कल्पना की थी और इसका मकसद महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देना था, जो कि कारगर साबित हुआ।

तन्वी गर्ग ने बताया कि उन्होंने ऐसे दो मतदान केंद्र बनवाए। एक मटिया महल विधानसभा में और दूसरा मॉडल टाउन विधानसभा में। सभी मतदान कर्मियों ने काफी मेहनत की और सभी महिलाएँ एक अखिल महिला टीम का हिस्सा बनकर काफी खुश हैं। महिला मतदाता भी इससे काफी खुश थीं। बता दें कि 17 मतदान केंद्रों में से 10 पूर्वी दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र में, दो चाँदनी चौक और उत्तर पूर्वी दिल्ली में बनाए गए तो वहीं पश्चिम दिल्ली, दक्षिणी दिल्ली, नई दिल्ली और उत्तर पश्चिम दिल्ली निर्वाचन क्षेत्रों में एक-एक महिला मतदान केंद्र बनाया गया।

उत्तर-पूर्वी दिल्ली की रिटर्निंग अधिकारी शशि कौशल ने कहा कि यह पहल बहुत कामयाब रही। कौशल ने बताया कि उन्होंने मुस्लिम आबादी वाले इलाके के जीनत महल स्कूल में गुलाबी मतदान केंद्र बनाया। सुबह बड़ी संख्या में बुर्के में महिलाएँ वोट डालने के लिए आईं, जहाँ फूल देकर उनका स्वागत किया गया। मगर, व्यक्तिगत सशक्तिकरण से ज्यादा ये “नारी शक्ति” का बड़ा सामाजिक संदेश है, जो समाज को दिया गया है।

इसके साथ ही कौशल ने बताया कि उत्तर पूर्वी जिले में एक मतदान केंद्र में सभी स्टाफ दिव्यांग हैं, जबकि इसी जिले के ताहिरपुर के लेप्रॉसी होम कॉम्प्लेक्स में एक मतदान केंद्र सिर्फ दिव्यांगों के लिए है। तन्वी गर्ग और शिव कौशल के अलावा नई दिल्ली की रिटर्निंग ऑफिसर पूजा जोशी और दक्षिणी दिल्ली की रिटर्निंग ऑफिसर निधि श्रीवास्तव भी महिला ही हैं। राजधानी में 1.43 करोड़ मतदाता हैं, जिनमें से 78,73,022 पुरुष और 64,43,431 महिलाएँ एवं 669 थर्ड जेंडर हैं। ये मतदाता 164 प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला करेंगे, जिनमें 18 महिला प्रत्याशी शामिल हैं।

रॉबर्ट वाड्रा ने तिरंगे की जगह ‘लहरा’ दिया पराग्वे का झंडा, Twitter पर लोगों ने जम कर किया ट्रोल

सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा को ट्विटर पर लोगों के गुस्से का शिकार होना पड़ा। दरअसल, उन्होंने ग़लती ही ऐसी की थी, जिससे वो ख़ुद को ट्विटर पर ट्रोल होने से बचा नहीं सके। आज रविवार (मई 12, 2019) को छठे चरण का मतदान संपन्न हुआ। इस दौरान दिल्ली की सभी सात सीटों पर भी मतदान हुआ। इस दौरान रॉबर्ट वाड्रा और उनकी पत्नी एवं कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी ने भी लोधी एस्टेट स्थित मतदान केंद्र पर अपने मताधिकार का प्रयोग किया। अन्य कई लोगों व सेलेब्स की तरह रॉबर्ट वाड्रा ने भी मतदान करने के बाद सेल्फी पोस्ट की, लेकिन इसमें उन्होंने भारत के झंडे की जगह पराग्वे का झंडा प्रयोग कर दिया। सोशल मीडिया पर लोगों ने इसे नोटिस किया और अंततः वह जमकर ट्रोल हुए।

दरअसल, रॉबर्ट वाड्रा ने जो झंडा पोस्ट किया, उसमें भी भारतीय झंडे की तरह तीन रंग हैं। दक्षिण अमेरिकी देश पराग्वे के इस झंडे में भारत के झंडे की तरह ही ऊपर केसरिया और बीच में सफ़ेद रंग है। इतना ही नहीं, भारत के झंडे की तरह इसके बीचोंबीच भी एक चक्र स्थित है। लेकिन, इस झंडे में नीचे का रंग नीला है, जो भारतीय झंडे से बिलकुल अलग है। भारत के राष्ट्रीय ध्वज में सबसे नीचे हरा रंग होता है। वाड्रा ने अपनी सेल्फी में पराग्वे का झंडा ट्वीट करते हुए लिखा, “हमारा अधिकार, हमारी ताकत! आप सबको बाहर आना चाहिए और वोट डालना चाहिए। अपने प्रिय लोगों के सम्मिलित भविष्य, सेक्युलर, प्रोडक्टिव और देश के सुरक्षित भविष्य के लिए हमें आपके सहयोग की जरूरत है।” ट्रोल होने के बाद वाड्रा ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया। लेकिन तकनीक के समय में स्क्रीनशॉट लेने की सुविधा के कारण बेचारे वाड्रा बच नहीं पाए।

वाड्रा को उंगली दिखाना पड़ा महंगा

ट्विटर पर लोगों ने वाड्रा को ट्रोल करते हुए लिखा कि वह ऐसे व्यक्ति हैं जो भारत और किसी अन्य देश के झंडे में फ़र्क़ नहीं कर सकते हैं। कई लोगों ने वाड्रा की समझ पर भी सवाल खड़े किए। वाड्रा द्वारा इस बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। इसके बाद उन्होने एक दूसरा ट्वीट करते हुए उसमें भारतीय ध्वज का प्रयोग किया।

प्रियंका गाँधी के बेटे रेहान भी इस बार अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं कर सके। पहली बार वोट देने के योग्य हुए 19 वर्षीय रेहान द्वारा अपने मताधिकार का प्रयोग न कर पाने के बारे में बोलते हुए प्रियंका गाँधी ने कहा कि चूँकि वह अपनी परीक्षा के लिए लंदन गया हुआ है, इसीलिए उसने मतदान प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लिया। अभी हाल ही में कुछ दिनों पहले हुई एक कॉन्ग्रेस की रैली में प्रियंका गाँधी और रॉबर्ट वाड्रा के बेटे-बेटी को मंच से हाथ हिलाते देखा गया था। इसके बाद ट्विटर पर यह चर्चा छिड़ गई थी कि क्या कॉन्ग्रेस नेतृत्व के भविष्य का चयन किया जा चुका है? अमेठी में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के नामांकन के दौरान भी रेहान को देखा गया था।

मतदान से पहले कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि यह पूरी तरह स्पष्ट है कि भाजपा हार रही है क्योंकि लोग पूरी तरह दुःखी एवं निराश हैं। प्रियंका ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विकास के मुद्दे पर चर्चा करने की बजाए इधर-उधर की बातें कर रहे हैं। ख़ुद को कॉन्ग्रेस की जीत के प्रति आश्वस्त बताते हुए प्रियंका ने कहा कि पीएम मोदी को राहुल गाँधी की चुनौती स्वीकार करनी चाहिए और रोज़गार पर जवाब देना चाहिए।

लुंगी पहने बुर्जुग, साइकिल में दूध का लटका डब्बा और पैरों में चप्पल: BJP विधायक के पिताजी ने जीता दिल

कर्नाटक में सोशल मीडिया पर एक तस्वीर काफ़ी वायरल हो रही है। आज के दौर में जब विधायक या सांसद का चुनाव जीतना गंगा नहाने के समान होता जा रहा है, इस तस्वीर से हमें काफ़ी कुछ सीखने को मिल सकता है। कर्नाटक में सोशल मीडिया के विभिन्न प्लैटफॉर्म्स पर धूम मचा रही ये तस्वीर एक बुज़ुर्ग की है। तस्वीर में साइकल पर जा रहे यह बुर्जुग लुंगी पहने हुए हैं और इनकी साइकिल में दूध का एक डब्बा लटका हुआ है। टाइम्स नेटवर्क की ख़बर के अनुसार, ये बुज़ुर्ग भाजपा विधायक के पिता हैं। इनका नाम मुथन्ना पूंजा है और इनके बेटे हरीश पूंजा दक्षिण कन्नड़ जिले की बेलथान्गडी सीट से भाजपा विधायक हैं। सोशल मीडिया पर लोग इसे प्रेरणादायी तस्वीर बताते हुए कह रहे हैं कि कैसे बेटे के विधायक होते हुए भी यह बुज़ुर्ग इतना सिंपल जीवन जी रहा है।

पूंजा ने 2018 विधानसभा चुनाव में वसंत बंगेरा को 23,000 के क़रीब मतों से मात दी थी। बेलथान्गडी से 9 बार चुनाव लड़ चुके व पाँच बार विधायक रह चुके वसंत बंगेरा को हराकर चर्चा में आए हरीश पहले भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता हुआ करते थे। वसंत भाजपा से जदएस और फिर कॉन्ग्रेस में आए थे। पूंजा से पहले इस सीट पर ख़ास परिवारों के लोग ही जीतते आए थी, जिस क्रम को पूंजा ने तोड़ दिया। नवभारत टाइम्स के अनुसार, वायरल तस्वीर हरीश पूंजा के पिता मुथन्ना पूंजा की ही है। सफ़ेद शर्ट और घुटने तक मुड़ी धोती पहनकर घूमने वाले मुथन्ना पूंजा सच में काफ़ी सिंपल जीवन जीते हैं।

साभार: टाइम्स ऑफ इंडिया

टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित ख़बर के अनुसार, मुथन्ना ने इस फोटो के बारे में बात करते हुए कहा, “मैंने अभी तक तस्वीर नहीं देखी है। हम अपनी जीविका के लिए कृषि पर निर्भर हैं। मैं हर रोज अपने खेतों में जाता हूं। 30 साल पहले हमारी बीड़ी की एक इकाई थी और मैं साइकल से ही वहाँ जाता था। मैं पास में ही एक डेयरी में दूध के लिए जाता हूँ। यह सब मेरी दिनचर्या में शामिल है।” मुथन्ना के इस बयान से पता चलता है कि बेटे के विधायक बनने के बाद भी उनकी लाइफस्टाइल में कोई बदलाव नहीं आया है और वे अभी भी पहले की तरह ही जीवन जी रहे हैं।

टाइम्स नेटवर्क की रिपोर्ट के अनुसार, विधायक हरीश पूंजा ने भी अपने पिता के इस लाइफस्टाइल को स्वीकारते हुए कहा कि ये ख़बर सच है। विधायक पूंजा ने अपने पिता की वायरल तस्वीर पर बात करते हुए कहा, “हम एक ग़रीब परिवार से ताल्लुक रखते हैं और मेरे पिता किसान हैं। मेरे विधायक बन जाने के बाद भी उनकी जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आया है। उनकी जिंदगी कृषि और डेयरी फार्मिंग के चारों तरफ ही घूमती है। वह आम किसानों की तरह ही वह उठकर डेयरी में दूध का काम करते हैं और फिर खेत में जाकर काम भी करते हैं।

आज के दौर में जब विधायक, सांसद और मंत्री बन जाने के बाद नेतागण महँगी गाड़ियों में घूमने लगते हैं और महँगे बंगलों में रहने लगते हैं, हरीश पूंजा का परिवार एक आदर्श प्रस्तुत करता है। करोड़पति नेताओं के इस दौर में विधायक बनने के बाद भी अगर उनके परिवार ने कृषि व दूध का काम नहीं छोड़ा है, यह सराहनीय बात है।

जब तक दीदी जिंदा है, हम तुम्हें यहाँ घुसने नहीं देंगे: बंगाल BJP अध्यक्ष पर तृणमूल गुंडों का हमला

पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा की वारदातें थमती नज़र नहीं आ रही हैं। तृणमूल के गुंडों द्वारा लगातार विपक्षी पार्टियों, ख़ासकर भाजपा नेताओं को निशाना बनाया जा रहा है। कभी पोलिंग बूथ पर ग्रेनेड फेंकना तो कभी भाजपा कार्यकर्ता को जान से मार देना, लगातार कई हिंसक वारदातों में तृणमूल के गुंडों के नाम आते रहे हैं। अब पश्चिम बंगाल के मिदनापुर संसदीय क्षेत्र के गोपालपुर से हिंसा की ख़बरें आई हैं। यहाँ भाजपा प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष के काफ़िले पर ही हमला कर दिया गया। वहाँ दिलीप घोष के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन चल रहा था। तभी अचानक से उनके काफ़िले पर हमला कर दिया गया और उन्हें खदेड़ा जाने लगा। सूचना मिलने पर पुलिस को बुलाया गया, जिसे भीड़ को काबू करने के लिए काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी।

तृणमूल कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष पर गाली देने का आरोप लगाया। तृणमूल कार्यकर्ताओं ने कहा कि घोष ने उनके तेल निकालने की बात कही है। आक्रोशित तृणमूल कार्यकर्ताओं ने दिलीप घोष के प्रति नाराज़गी जताते हुए कहा, “जब तक ममता बनर्जी जिंदा है हम दिलीप घोष को यहाँ नहीं घुसने देंगे।” बेलगाम तृणमूल कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने घोष के काफ़िले पर पत्थरबाज़ी भी की और गाड़ियों को नुकसान पहुँचाया। इससे आम राहगीरों को भी अच्छी-ख़ासी परेशानी हुई और कई किलोमीटर लम्बा जाम लग गया। बाद में पुलिस व अन्य लोगों के प्रयासों के बाद घोष के काफ़िले को किसी तरह वहाँ से निकाला जा सका।

बता दें कि मिदनापुर संसदीय सीट पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से एक महत्वपूर्ण संसदीय सीट है। यह संसदीय क्षेत्र 1951 में ही अस्तित्व में आया था। मिदनापुर शहर मेदिनीपुर पश्चिम का मुख्यालय भी है। यह कांग्सताबती नदी के किनारे है। यह संसदीय क्षेत्र सीपीएम के कद्दावार नेता इंद्रजीत गुप्ता की कर्मस्थली रहा है। चुनाव प्रचार अभियान के शुरुआती दौर में ही पीएम मोदी ने रैली कर यहाँ का चुनावी माहौल गर्मा दिया था। मिदनापुर से दिलीप घोष की प्रतिष्ठा दाँव पर है। भाजपा के बढ़ते प्रभाव के कारण तृणमूल खेमा बौखलाया हुआ है और इसीलिए भाजपा नेताओं को लगातार निशाना बनाया जा रहा है।

आज छठे चरण के चुनाव के तहत 3 बजे तक मिदनापुर में 69% वोटिंग की ख़बर आई है। दिलीप घोष ने कहा कि अभी चुनाव शुरू भी नहीं हुए थे, तभी से तृणमूल के गुंडों ने भाजपा कार्यकर्ताओं को डराना-धमकाना शुरू कर दिया था। घोष ने ममता सरकार समर्थित गुंडों के बारे में बात करते हुए आगे कहा, “हमारे लोगों को डराया जा रहा है। राज्य पुलिस ने हमारे कुछ लोगों को गिरफ़्तार किया है। हमारे कार्यकर्ताओं को हर तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है। मतदान के दिन हमारे कार्यकर्ताओं को गोली लगने की खबर है। सुबह से ही डर का वातावरण बनाया जा रहा है।” दिलीप घोष ने कहा कि तृणमूल कॉन्ग्रेस हार के डर से हिंसक वारदातों में बढ़ोतरी करते जा रही है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में लम्बे समय तक सक्रिय रहे दिलीप घोष ने कहा कि बंगाल में सत्ताधारी दल और पुलिस साथ मिलकार काम कर रही है। उन्होंने कहा कि हमारे कार्यकर्ता तनाव से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। घोष ने 2016 में खड़गपुर सदर विधानसभा क्षेत्र से जीत दर्ज की थी।

यूपी और महाराष्ट्र में घटेगी NDA की सीटें: PM मोदी के मंत्री की भविष्यवाणी

23 मई को चुनाव के परिणामों की घोषणा होगी, मगर उससे पहले ही सभी पार्टियाँ अपनी-अपनी जीत को लेकर दावा कर रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी लगातार दावा कर रहे हैं कि एनडीए 2014 के चुनाव की अपेक्षा 2019 में ज्यादा सीटों के साथ सत्ता में आएगी। मगर इसी बीच केन्द्रीय मंत्री रामदास अठावले ने यूपी और महाराष्ट्र में एनडीए के सीट की संख्या कम होने की बात कह दी, लेकिन साथ ही उन्होंने केंद्र में एनडीए की सरकार बनने का भी दावा किया।

बता दें कि, रामदास अठावले एनडीए के सहयोगी पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और मोदी कैबिनेट में केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री हैं। अठावले एनडीए में बड़ा दलित चेहरा माने जाते हैं। उनका कहना है कि भाजपा इस बार कम से कम से कम 260 लोकसभा सीटें जीतेगी। महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना के गठबंधन को 37 से 38 सीटें मिलेंगी, जबकि 2014 में उन्हें 42 सीटें मिली थीं। अठावले ने ओडिशा, पश्चिम बंगाल और दक्षिण भारत में भाजपा को अच्छी सीटें मिलने की संभावना जताई है और साथ ही कहा कि इस बार राजग को 330 से 325 सीटें मिलेंगी। हालाँकि रामदास ने एनडीए को पिछले साल की तुलना में कम सीटें मिलने की बात जरूर कही है, लेकिन उन्होंने नरेंद्र मोदी के फिर से प्रधानमंत्री पर भी विश्वास जताया है। इतना ही नहीं, उन्होंने तो एक बार फिर से खुद के मंत्री बनने की भविष्यवाणी भी कर दी।

गौरतलब है कि, पिछले महीने 14 अप्रैल को भी अठावले कुछ इसी तरह की भविष्यवाणी करते हुए कहा था कि लोकसभा चुनाव में एनडीए 350 से ज्यादा सीटें जीतेगा। उन्होंने कहा था कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी 65 से ज्यादा सीटें जीतेंगी क्योंकि यूपी के महागठबंधन में समाजवादी पार्टी (एसपी) और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के साथ कॉन्ग्रेस पार्टी नहीं है। इससे वोट बँट जाएँगे और इसका फायदा भाजपा को होगा। इसके साथ ही उन्होंने एनडीए के केंद्र में दोबारा वापस आने पर नागरिकता विधेयक में बदलाव करने के बारे में पीएम मोदी से बात करने की भी बात कही थी।