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ट्रोल-ट्रोलाचार्य संवाद: स्वधन्य पत्रकारों की वैचारिक नग्नता Vs वामपंथी षड्यंत्रों का रहस्योद्घाटन

सोशल मीडिया के विशाल वटवृक्ष के नीचे बैठे हुए ट्रोलाचार्य का सर झुका हुआ और नयन अधखुले थे, दृष्टि बाएँ हाथ में स्थित मोबाइल की स्क्रीन पर स्थिर थी। स्क्रीन से आता हुआ प्रकाश उनके मुख पर पड़ता तो वे चन्द्रमा के समान दमक उठते थे। यदा-कदा अनुयायी फ़्लैश सहित छायाचित्र खींचकर उनका प्रकाशाभिषेक करते। अनंत अनुयायी सामने बैठे हुए, ट्रोलाचार्य की अगली गतिविधि की प्रतीक्षा में थे। ट्रोलाचार्य सूत्रपात करते और अनुयायी शृंखला अभिक्रिया में जुट जाते।

ऐसे में ट्रोल की संज्ञा प्राप्त कर किसी लुटियन-मोहिनी द्वारा अभी-अभी ब्लॉक हुए एक ट्रोल ने प्रश्न किया, “हे ट्रोलाचार्य! आज मुझे ट्रोल कहलाने का प्रथम अनुभव हुआ है। अब मैं स्वयं को जानना चाहता हूँ। विस्तारपूर्वक मार्गदर्शन करें कि ट्रोल कौन हैं और इन्हें किस प्रकार पहचाना जाता है। इनका प्रादुर्भाव किस प्रकार हुआ?”
ट्रोलाचार्य ने प्रेमपूर्वक कहा, “हे अनुयायी! आपने उत्तम प्रश्न किया है, अब इसके उत्तर का ध्यानपूर्वक श्रवण करो- जब सत्यान्वेषियों के प्रयासों से प्राणियों ने जाना कि स्वधन्य पत्रकार विषवमन करने वाले भयंकर षड्यंत्रकारी हैं।”

“समाज ने स्वयं ही सामाजिक-संचार की व्यवस्था को जन्म दिया। स्वधन्य पत्रकारों के प्रत्येक कथन का परीक्षण होने से उनके अहं पर गंभीर चोट पहुँची। फिर भी असत्य बोलते रहने पर वे और उनके मित्र उपहास का पात्र बने, वे हाहाकार कर उठे। उनका आवरण हटा कर उनकी वैचारिक नग्नता को सामने लाने वालों को उन्होंने ट्रोल की संज्ञा दी। विशेषकर जिसने भी वामपंथ के प्रचारकों के षड्यंत्रों का रहस्योद्घाटन किया वह ट्रोल कहा गया। यह ट्रोलवाद का उदय था। ट्रोल समाज के मार्गदर्शन करने हेतु मैंने यह ट्रोलाचार्य का अवतार लिया है। शृंखला अभिक्रिया ट्रोलवाद का मुख्य लक्षण है।”

“क्या वामपंथियों में कोई ट्रोल नहीं होता ट्रोलाचार्य?”, अनुयायी ट्रोल ने प्रश्न किया। ट्रोलाचार्य ने कहा, “उन्हें स्टैंड-अप-आर्टिस्ट कहा जाता है, और ये विशेष सम्मान प्राप्त करते हैं। लिट्फेस्ट आदि में ससम्मान बुलाए जाते हैं। ये अत्यंत भयानक अपशब्द बोलने वाले व अशिष्ट हो सकते हैं। अश्लीलता ही हास्य है ऐसा मानने वाले स्टैंड-अप-आर्टिस्ट मूलाधार चक्र से ऊपर उठ ही नहीं पाते। इनका सम्पूर्ण जीवन-दर्शन-चिंतन-सृजन मूलाधार चक्र में ही घूमता रहता है। सनातन धार्मिक भावनाओं का उपहास कर ये स्वयं ही स्वयं से आनंदित होते हैं।”

“वामपंथियों द्वारा ट्रोलीकरण की क्रिया को “फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन” कहा जाता है जिससे उन्हें किसी भी प्रकार की निम्नस्तर की बात किसी के भी विरुद्ध करने की स्वतंत्रता प्राप्त होती है। लुटियन सुंदरियाँ उनके अपशब्दों पर अट्टहास करती हैं।”

ट्रोल ने पुनः प्रश्न किया, “मुझे एक ट्रोल के रूप में क्या करना चाहिए और मेरे निहित अधिकार और कर्तव्य क्या हैं?” ट्रोलाचार्य ने उत्तर दिया, “ट्रोल करना ही ट्रोल का परम कर्तव्य है। दोहा से दुपाया, चौपाई से चौपाया जीव को ट्रोलित करते रहना चाहिए। कभी कभी कुछ विभूतियाँ लिखे हुए से कम ट्रोल होती हैं ऐसे में उन पर चित्रकला द्वारा ट्रोल करने का विधान है। चित्र अथवा चलचित्र के माध्यम से ट्रोल करने वाले ट्रोल लोक में पूजनीय होते हैं। ये उन विभूतियों को भी ट्रोल करने में सक्षम होते हैं जो मानव भाषा नहीं समझते।”

“थ्रेड में ट्रोल करने वाले अधम प्रकार के विस्तारवादी ट्रोल होते हैं। ये प्रायः लम्बे थ्रेड लिखकर ट्रोल करते हैं। इन्हें एक बार में उठाकर पटकने में आनंद नहीं आता। जब तक दस बारह बार उठाकर पटक नहीं लेते ये शांत नहीं होते। मध्यम कोटि के ट्रोल एक ट्वीट में चेतना शून्य कर देने वाले होते हैं। उत्तम कोटि के ट्रोल एक वाक्य में ही अचेत कर देते हैं और सर्वोत्तम ट्रोल एक शब्द लिखकर ही नासिका लाल कर कर्णछिद्रों से धूम्र-वाष्प निष्कासन की प्रक्रिया का सूत्रपात कर देते हैं।”

अनुयायी ने पूछा, “हे ट्रोलाचार्य! ट्रोलगति क्या है? ट्रोलगति को कौन प्राप्त होते हैं? ट्रोल को ब्लॉक क्यों किया जाता है?” इस पर ट्रोलाचार्य ने कहा, “किसी का उपहास करने पर दण्डात्मक कार्यवाही का पात्र हो जाना ही ट्रोलगति है। न्यायायिक प्रक्रिया के बिना कारावास प्राप्त होना गंभीर ट्रोलगति है, ब्लॉक किया जाना सामान्य ट्रोलगति है। वे तीक्ष्णबुद्धि जो अपनी छोटी सी बात से बड़े बड़े महलों को हिलाने में सक्षम हैं वे ट्रोलगति को प्राप्त होते हैं। हे ट्रोल! ट्रोल को ब्लॉक किये जाने के अनेक कारण हैं। उसमे प्रमुख कारण ट्रोल का किसी विवाद में विजयी होना प्रमुख है।”

“जब ट्रोलित होने वाले के पास कोई उत्तर न रह जाए, या उसकी गलती पकड़ी जाए, अथवा वह हास्य का पात्र बन जाए तो वह ट्रोल को ब्लॉक कर स्वयं को शांति प्रदान करता है। कभी-कभी ट्रोल भावनाओं में बहकर स्वयं को स्टैंड-अप-आर्टिस्ट के सामान समझकर अश्लीलता कर बैठते हैं, जिससे कुपित होकर ट्रोल को ब्लॉक कर दिया जाता है। ट्रोल को शालीनता के साथ रहने का नियम है, अश्लीलता का अधिकार वामपंथ का है अतः उनके पास ही रहने देना चाहिए।”

अनुयायी ने पुनः प्रश्न किया, “अधिट्रोलः कथं कोऽत्र सोशल-मीडियाऽस्मिन् ट्रोलाचार्य?” (सोशल मीडिया पर ट्रोलित होने का अधिकारी कौन है और किसे ट्रोल नहीं करना चाहिए?) ट्रोलाचार्य ने सहज भाव से उत्तर दिया, “ट्रोल किसी को भी किया जा सकता है, कैसे भी किया जा सकता है, सामाजिक मंच पर जो भी है वह बिना भेदभाव के ट्रोलित होने का अधिकारी है। पूर्व दिशा में स्थित पश्चिम बंगाल में ट्रोल करना दुःख का कारण बनता है। पूर्व में रहते हुए भी पश्चिम हुए जा रहे बंगाल में अलग विधि विधान है।”

“ट्रोल करने पर जेल में ठूंस देने वाली शासक का भयानक आतंक है। वह कभी भी किसी भी बात से स्वयं को ट्रोलित जानकर आक्रामक हो उठती है। एक बार ऐसे ही किसी कन्या ने उस शून्यात्मा का परिहास करते हुए चित्र बनाया जिसपर उसे कारावास में डाल दिया गया। पश्चिम बंगाल में न्यायालय भी मुंह में रोशोगुल्ला भर कर नयन मूँद लेते हैं। किसी को छोड़ देना भी ट्रोलधर्म नहीं है किन्तु ऐसे विषादग्रस्त, जीवन से निराश, सदा खिन्न रहने वालों को ट्रोलित करना आत्मघात के समान है।”

अनुयायी- “फिर ट्रोलधर्म का पालन कैसे किया जाए?”
ट्रोलाचार्य मुस्कुराए, और तत्काल एक ट्वीट किया जिसमे लिखा था- “दीदी, जय श्रीराम!”
शीतल पवन के प्रवाह से वातावरण में आनंद था, पृष्भूमि में झींगुरों का स्वर सुनाई दे रहा था। ट्रोलाचार्य पुनः अपने मोबाइल की स्क्रीन में लीन हो गए।  

गगनयान-2022 में भारतीय वायुसेना के अफसर अंतरिक्षयात्री बनकर जाएँगे

चंद्रयान, मंगलयान, ‘मिशन शक्ति’, PSLV-C37 से 104 उपग्रह एक बार में ले जाने जैसी सफलताओं बाद भारत ने अंतरिक्ष में अपने दम पर अंतरिक्षयात्री भेजने के लिए कमर कस ली है। साल 2022 में स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने पर इस मिशन को लॉन्च करने की तैयारी है। बेंगलुरु स्थित भारतीय वायुसेना के एयरोस्पेस आयुर्विज्ञान संस्थान (IAM) ने दो या तीन सदस्यीय अभियान दल के चयन को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है।

उपरोक्त जानकारी सशस्त्र सेना चिकित्सकीय सेवाओं के महानिदेशक (DG-AFMS) लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन पुरी ने दी। लेफ्टिनेंट जनरल पुरी सेना के कृत्रिम अंग केंद्र के 70 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में उपस्थित थे, और यह बातें उन्होंने समारोह से इतर टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बात करते हुए बताईं। इससे पहले रूसी मिशन के साथ अंतरिक्ष में जाने वाले प्रथम भारतीय स्क्वाड्रन लीडर (तत्कालीन) राकेश शर्मा भी उस समय (1982) में वायुसेना के अधिकारी थे।

IAM और इसरो में हो चुकीं हैं कई बैठकें

अंतरिक्षयात्रियों के चयन को लेकर IAM और इसरो के बीच पिछले कुछ महीनों में कई बैठकें हो चुकीं हैं। बैठकें मुख्यतः अंतरिक्षयात्रियों के चयन में मेडिकल पैमानों के पहलुओं पर स्पष्टता को लेकर हुई हैं। सरकार ने IAM को मिशन में शामिल करने का निर्णय अभियान के लिए उपयुक्त अभ्यर्थियों के चयन के लिए लिया है क्योंकि इसके पास उड़ान और एयरोस्पेस चिकित्सा/शरीरविज्ञान दोनों ही विषयों पर पर्याप्त जानकारी और अनुभव है।

IAM संस्थान के पास विशेषज्ञ शिक्षकीय संकाय भी है, जो एयरोस्पेस मेडिसिन के विभिन्न उपविभागों में सिद्धहस्त हैं। कई अंतरराष्ट्रीय एयरोस्पेस मेडिसिन विशेषज्ञों, मनोविज्ञानियों, एयरोनॉटिकल इंजीनियरों, एविएशन जीवाणु विज्ञानियों आदि के सतत संपर्क में संस्थान रहता है ताकि वर्तमान ट्रेंड्स की उचित समझ विकसित हो सके

“संस्थान ने कई एयरोस्पेस अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है”, एक वरिष्ठ वायुसेना अधिकारी ने कहा, “जिनमें कई-कई घंटों की लड़ाकू विमानों की उड़ानें भी शामिल हैं।”

प्रिय बीबीसी, वेश्यावृति या BC में से एक चुन लो, पत्रकारिता तो तुमसे हो नहीं रही

सबसे पहले तो यह बात साफ कर देना आवश्यक है कि वेश्यावृति से मुझे कोई समस्या नहीं रही। लोगों के सामने ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं, या वो उनमें ढकेल दिए जाते हैं कि उन्हें वो भी करना पड़ता है जो वो करना नहीं चाहते। कुछ के लिए बेहतर विकल्प के अभाव में ऐसा करना उचित जान पड़ता है, कुछ के पास कोई भी विकल्प होता ही नहीं, कुछ लोग (कई देशों में) शायद थोड़े समय में कुछ पैसों के लिए ऐसा करना चाहते हैं। ये मजबूरी हो सकती, विकल्पहीनता हो सकती है, चुनाव हो सकती है।

कारण जो भी हो, उसकी परिणति जैसी भी रही हो, लेकिन जब आप वेश्यालय की ओर रुख़ करते हैं तो आपको पता होता है कि आपको वहाँ क्या मिलेगा। वेश्यालय ईमानदारी से चलता है कि आप वहाँ जो करने जा रहे हैं, वही होगा, न कि आपको जबरदस्ती टूथपेस्ट बेच दिया जाएगा।

ज़्याँ जेने एक फ्रान्सिसी नाटककार हैं जिन्होंने एक नाटक लिखा था ‘ले बालकन’ या ‘द बालकनी’। फ़्रान्स में ‘बालकनी’ शब्द का प्रयोग वेश्यालयों के लिए भी होता है। यह नाटक वेश्यालयों पर आधारित है, लेकिन ये थोड़ा अलग क़िस्म का वेश्यालय है। यहाँ कई तरह के लोग, पावरफुल व्यक्ति आते हैं और अपनी कुंठा को मिटाते हैं। कुंठा कैसे मिटाते हैं? कोई जज बन कर एक चोर को सजा देता है, कोई सेनाधीश बन जाता है, कोई पादरी आदि। ये एक तरह से रोल-प्ले होता है जिसमें आप भीतरी इच्छाओं को नाटकीयता के ज़रिए बाहर निकालते हैं। इसके दूसरे हिस्से में कुछ और होता रहता है, जिससे नाटक के और भी मायने निकल कर आते हैं, लेकिन बीबीसी के कुकृत्यों के लिए इतना ही जानना ज़रूरी है।

बीबीसी, या Big BC, ज़्याँ जेने की इसी बालकनी में फँसा हुआ एक चरित्र सदृश हो गया है। यह मीडिया संस्थान कुंठित है, और यह कुंठा शायद इनके मालिकों द्वारा भारत को अभी भी ग़ुलाम की ही तरह समझने की अभिजात्यता से विकसित होती है। इन्हें लगता है कि ये तो ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन हैं जिनकी मोनेपॉली ऐसी थी कि जो ये लिखते थे, वही सत्य हुआ करता था, तो अब भी जो भी BC या BS करेंगे, वो लोग कान में रेडियो सटा कर सुनेंगे और कहेंगे ‘आह बीबीसी, वाह बीबीसी’।

खैर, भारत में जब से सत्ता परिवर्तन हुआ है, तब से अपनी ज़हर और घृणा को इन्होंने और तेज कर दिया है। हाल ही में इन्होंने एक फर्जी रिसर्च जारी किया था जिसे हमारी टीम ने तथ्यों और तर्कों से इतना बींध दिया कि उन्हें वो पूरी तथाकथित रिसर्च हटानी पड़ी थी। उसके बाद, हमारी टीम ने उनके द्वारा फैलाए गए फेक न्यूज की लिस्ट जारी की तो वो इतनी लम्बी हो गई कि हमने सोचा कि जो फेक न्यूज ही छाप रहा हो, कितने हिस्सों में उसके कुकर्मों को गिनाते रहें! हमने कुछ आर्टिकल लिख कर छोड़ दिया।

साथ ही, बीबीसी की स्थिति अब ऐसी है, खास कर हिन्दी की, कि ये किसी को भी पत्रकार बना देते हैं। योग्यता के लिए पत्रकारिता का अनुभव या ज्ञान नहीं, ‘आप मोदी या भारत से कितना घृणा करते हैं’, का जवाब आपके पास होना चाहिए। यही कारण है कि इन्होंने एक के बाद एक घटिया खबरें लिखीं, बेशर्मी से उसे चलाया और झूठ साबित होने पर माफ़ी नहीं माँगी। इसीलिए, इसे अब Big BC भी कहा जाता है क्योंकि वहाँ खबरें नहीं, BC ही चल रही हैं।

कल आईपीएल फ़ाइनल में मुंबई इंडियन्स की टीम ने चेन्नई को एक रन से हरा दिया। जिसने भी मैच देखा वो जानता है कि ये मैच दोनों में से कोई भी टीम जीत सकती थी, और अधिकतर बार ऐसा लगा कि चेन्नई जीतेगी।

चूँकि ये बीबीसी वाले हैं, और हिन्दी में खबरें बेचने पर उतरे हुए हैं जहाँ इन्हें भारतीय समाचार पोर्टलों से लगातार कम्पटीशन मिल रहा है, तो क्या करेंगे? ऐसे में अपने चमन चिंटुओं पर विश्वास दिखाना जरूरी हो जाता है। फिर, एक खेल के मैच रिपोर्ट की ख़बर इस तरीके से आती है जिसमें किसी भी तरह से मोदी को खींच लिया जाता है।

पत्रकारिता में हेडलाइन से बहुत खेला जाता है। ‘सिंगल कोट्स’ का प्रयोग करते हुए, आप टेक्निकली बच जाते हैं यह कह कर कि आपने जो हेडलाइन लगाया है, वो आपके संस्थान के विचार नहीं बल्कि किसी व्यक्ति के हैं। फिर आप ट्विटर पर जाते हैं, और जहाँ आपके मतलब का ट्वीट दिखता है, जो आपके पूर्वग्रहों पर सटीक बैठता हो, उस चुटकुले को आप हेडलाइन में डाल कर बेच लेते हैं।

किसी अनजान व्यक्ति का ट्वीट, बिना किसी टिप्पणी के लगाना, जो उस आर्टिकल के साथ शेयरिंग के वक्त दिया जाता है, बताता है कि आपकी मंशा क्या है। एक आईपीएल के मैच की रिपोर्ट में मोदी और अम्बानी को घुसाना बताता है कि एडिटर की जगह कोई निहायत ही बेशर्म चिरकुट व्यक्ति बैठा हुआ है जिसे मैच से कुछ नहीं, सस्ती लोकप्रियता से ज़्यादा लेना-देना है।

इस हेडलाइन को बाद में बदल दिया गया, क्योंकि लिंक पर क्लिक करने पर आपको दूसरी हेडलाइन दिखेगी (नीचे तस्वीर में देखें) जो मैच रिपोर्ट जैसी है। लेकिन ट्विटर पर ऐसे शेयर किया है जैसे ये एक रिपोर्ट नहीं, बीबीसी के विचार हों जहाँ यह बताया जा रहा है कि मैच में खिलाड़ियों और टीम का योगदान नहीं था, बल्कि टीम अम्बानी की थी, और राहुल गाँधी कहते हैं कि अम्बानी मोदी का दोस्त है, तो मोदी के कार्यकाल में आखिर अम्बानी की टीम नहीं जीतेगी तो कौन जीतेगा!

BBC हिन्दी का वह ट्वीट जो इन्होंने डिलीट कर दिया।

और, अब तो इन्होंने वो ट्वीट ही डिलीट कर दिया! लेकिन, सोशल मीडिया या इंटरनेट पर जो एक बार लग गया, सो लग गया। ये अब माफ़ी भी नहीं माँगेंगे क्योंकि भारत के ग़ुलाम लोगों की भाषा में ब्रिटेन की किसी बड़ी संस्था ने कुछ लिखा, और गलत लिखा, तो भी क्या! इसके लिए ग़ुलामों से माफ़ी थोड़े माँगेंगे! अरे श्वेत चमड़ी वालों की संस्था है!

ये पत्रकारिता नहीं, ये दोगलापन कहा जा सकता है। मेरे शब्दों के चुनाव पर आपको आपत्ति हो सकती है लेकिन इससे बेहतर शब्द मेरे पास नहीं हैं। ये मेरे निजी विचार हैं जो बीबीसी जैसे घटिया न्यूज पोर्टलों के कारण पूरी पत्रकरिता को ‘प्रेश्या’ या ‘प्रेस्टीट्यूट’ जैसे संबोधनों का शिकार बनाने के कारण उपजे हैं।

बीबीसी को चाहिए कि वो ‘बालकनी’ ही खोल ले। जब पत्रकारिता की जगह ‘रोलप्ले’ ही करना है, तो फिर इतनी टायपिंग की क्या ज़रूरत है। ट्वीट घुसाकर, विचारों जैसे हेडलाइन के साथ, ट्विटर रिएक्शन्स वाली पत्रकारिता ही करनी है, तो वेश्यावृति या सॉफ़्ट पोर्न वाली हेडलाइन से करें, उसमें ज़्यादा हिट्स मिलेंगे।

लेकिन कैसे करेंगे! व्हाइट मेन्स बर्डन है, व्हाइट सुप्रीमैसिज्म का अलग रूप है इनके भीतर। पत्रकारिता के बीकन लाइट हैं ये, पोर्न कैसे बेचेंगे! लेकिन हिट्स भी तो चाहिए। फिर, धूर्त आदमी क्रिकेट की खबरों में मोदी को ले आता है क्योंकि मोदी इनकी दुकान चला देगा।

बीबीसी हिन्दी वालो, विकल्प है तुम्हारे पास: वेश्यावृति की ईमानदारी या पत्रकारिता के नाम पर वैचारिक दोगलापन, चुन लो। प्लीज!

राहुल गाँधी के साथ NDTV की समोसा पत्रकारिता ही आज के टीवी की तस्वीर है

पिछले काफ़ी समय से विपक्ष के लिए एक मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है, वो मुद्दा है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का साक्षात्कार। ऐसा लग रहा है जैसे उनका साक्षात्कार न होकर कोई षड्यंत्र हो जिसकी हर क़दम पर आलोचना की गई। इन आलोचनाओं में कॉन्ग्रेस और उनके कुछ निष्ठावान मीडियाकर्मी यह आरोप लगाते हैं कि पीएम मोदी के साक्षात्कार में उनसे कठिन सवाल नहीं पूछे जाते, केवल हँसी-ठिठोली होती है, मनोरंजन किया जाता है और उनके मनपसंद व्यंजन पूछे जाते हैं।

हाल ही में, रवीश कुमार ने राहुल गाँधी का साक्षात्कार लिया था। रवीश कुमार लंबे समय से NDTV से जुड़े हुए हैं और अपने टीवी शो में वो अक्सर एक प्रश्न ज़रूर उठाते हैं कि साक्षात्कार के नाम पर पीएम मोदी से कोई कठिन सवाल नहीं पूछता, जबकि वो ख़ुद राहुल गाँधी के प्रति बेहद नरम रवैया अपनाते हैं, जो उनके द्वारा लिए गए साक्षात्कार में स्पष्ट दिखा। इस बात की पुष्टि उन्हीं के प्रशंसक निखिल वागले ने सोशल मीडिया पर की, जिन्होंने उन्हें ‘भक्त’ तक की उपाधि दे डाली।

इसी बीच सोशल मीडिया पर एक पुराना वीडियो वायरल हुआ है। इस वीडियो में NDTV का एक पत्रकार अमेठी में राहुल गाँधी के पीछे भागता हुआ दिखाई दे रहा है, जो उनसे एक बेहद मुश्किल सवाल पूछता है कि ‘समोसा का स्वाद कैसा था?’

इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि NDTV के उमाशंकर सिंह नामक पत्रकार ने राहुल गाँधी से समोसे के बारे में पूछा तो राहुल ने उनके मुँह में समोसा डाल दिया। मतलब यह कि, ‘समोसे के सवाल पर जवाब में समोसा ही खिला दिया, यानी इस कठिन सवाल का जवाब तो उन्हें नहीं मिला, लेकिन मिला तो क्या मिला केवल समोसा’।

NDTV के हठी पत्रकार को जब अपने इस सवाल का जवाब नहीं मिला तो वो भीड़तंत्र को चीरते हुए राहुल गाँधी की गाड़ी के पास जा पहुँचा और राहुल गाँधी से शिकायती अंदाज़ में पूछा, “आपने जवाब नहीं दिया, समोसा कैसा था?” लेकिन, इस बार पत्रकार महोदय को जवाब मिल जाता है, और राहुल बताते हैं कि हाँ उन्हें समोसा अच्छा लगा।

सवाल पूछना पत्रकार का काम होता है जिसके लिए जिज्ञासु प्रवृति का होना भी आवश्यक है। इसी का प्रमाण NDTV के पत्रकार उमाशंकर ने भी दिया। उन्होंने अपनी जिज्ञासावश राहुल गाँधी से अगला कठिन सवाल पूछा, “आपके पास जलेबियाँ भी थीं, क्या आपको जलेबियाँ पसंद थीं?” इस बार भी सवाल का जवाब पाने में पत्रकार को सफलता मिली।

इसके बाद NDTV के पत्रकार उमाशंकर ने राहुल गाँधी से अपना अगला कठिन सवाल पूछा, “आपने कुछ जलेबी भी खाई, उसका टेस्ट कैसा था?” इसका जवाब भी मिल गया कि जलेबियाँ अच्छी थीं। पत्रकार साहब को तो ये तक मालूम था कि राहुल गाँधी ने जो जलेबियाँ खाई थी, वो गुड़ की बनी हुई थी। भई वाह! मान गए, पत्रकार महोदय की बुद्धि को और उनके ज्ञान को। इसी बुद्धि और ज्ञान का सम्मिश्रण ही है NDTV, जो आए दिन मोदी-विरोधी ख़बरों को प्रचारित और प्रसारित करने में लगा रहता है। जबकि ख़ुद के दामन के दाग उन्हें आज भी नहीं दिखाई देते, जो अनगिनत हैं।

चलिए अब आगे बढ़ते हैं और NDTV के पत्रकार के कुछ और कठिन सवालों पर नज़र डालते हैं, जिनके कठिन सवालों से तो यही लगता है जैसे कि भारत का भविष्य उन समोसे और जलेबियों पर ही निर्भर करता हो, पत्रकार साहब राहुल से आगे पूछते हैं कि ‘क्या आप अपने स्वास्थ्य के बारे में चिंतित नहीं हैं’? इस पर राहुल की एक स्माइल से ही पत्रकार को संतोष करना पड़ा।  

हाल ही में, राहुल गाँधी का एक और पुराना वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने बड़े धूमधाम से गंगा आरती की थी और उसके बाद NDTV के एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि ‘क्या उन्होंने प्रार्थना की, तो राहुल ने जवाब दिया, “मुझे नहीं पता, मुझे यहाँ आने के लिए कहा गया था, इसलिए मैं यहाँ हूँ।”


वहीं, हम प्रधानमंत्री मोदी की बात करें तो उनसे राजनीतिक और गै़र-राजनीतिक दोनों तरह के साक्षात्कार लिए गए। हाल में तो लगभग हर बड़े मीडिया संस्थान ने उनका साक्षात्कार लिया। लेकिन अगर हम कठिन सवालों भरे साक्षात्कार का रुख़ करें तो न्यूज़ एजेंसी ANI की पत्रकार स्मिता प्रकाश ने पीएम मोदी से एक घंटे से भी अधिक समय तक एनडीए सरकार की आर्थिक नीतियों, विमुद्रीकरण, जीएसटी और अन्य सभी चुनौतियों से जुड़े सवाल पूछे थे, जिन्हें सरल तो नहीं कहा जा सकता था। वहीं राहुल गाँधी ने इस साक्षात्कार को “व्यवहारिकता वाली पत्रकारिता” का नाम दिया था।

ऐसे में राहुल गाँधी ख़ुद से पूछे गए सवालों को किस श्रेणी में रखेंगे, उसकी न तो उन्हें कोई समझ है और न ही वो इतने परिपक्व हैं कि इन पत्रकारों को सही पत्रकारिता से अवगत करा सकें। अच्छा यही होगा कि देश की जनता ख़ुद ‘कठिन सवाल’ और ‘सरल सवालों’ के बीच के अंतर को समझ जाए, जिससे विकास की इस राह में वो अपना सकारात्मक योगदान दे सकें।

जब राजीव गाँधी ने INS विराट की स्टोरी दबाने के लिए मीडिया का गला घोंटने की ठानी थी

बीते दिनों चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की लक्षद्वीप यात्रा का जिक्र करके मामले को दोबारा से जीवित कर दिया। आइएनएस विराट पर पूरे परिवार सहित छुट्टी मनाने पहुँचे राजीव गाँधी की यात्रा ‘वृत्तांत’ पर उस समय इंडियन एक्सप्रेस और इंडियन टुडे ने स्टोरी कवर की थी। अब चूँकि इन दिनों इस मामले ने तूल पकड़ा हुआ है तो इंडियन एक्सप्रेस ने उस पूरे समय को दोबारा से याद किया और बताया कि कैसे उस समय स्टोरी छपने के बाद राजीव गाँधी ने इंडियन एक्सप्रेस से बदला लेने की ठान ली थी।

निरूपमा सुब्रह्मण्यन द्वारा इंडियन एक्सप्रेस में लिखे गए लेख में राजीव गाँधी की उन छुट्टियों पर कवर हुई स्टोरी पर प्रकाश डाला गया। इस लेख की हेडलाइन ही स्पष्ट करती है कि प्रधानमंत्री मोदी ने इस किस्से पर बात करके हमारे समक्ष सवाल छोड़े हैं ताकि हम पूछें कि वास्तव में अपने पद की शक्तियों का दुरुपयोग किसने किया है?

लेख में सुब्रह्मण्यन ने न केवल राजीव गाँधी की उन छुट्टियों को याद किया, बल्कि राजीव गाँधी की उन जरूरतों पर सवाल भी दागे जिनके कारण उन्होंने (राजीव) देश को जरूरी न समझकर, साल भर के लिए छुट्टी पर जाना आवश्यक समझा था। खास बात ये है कि इस रिपोर्ट में निरूपमा ने यह भी बताया कि किस तरह INS विराट पर छुट्टियाँ बिताने के बाद राजीव गाँधी और उनकी सरकार ने इंडियन एक्सप्रेस को सबक सिखाने की सोची थी।

इसका कारण उन दिनों इंडियन एक्सप्रेस में छपा एक कार्टून था। इस कार्टून में राजीव गाँधी नारियल के पेड़ के नीचे बैठकर नारियल पी रहे थे और कह रहे थे,“Ah! To get away from it all!” और देश उनसे पूछ रहा था “कब?”

इस कार्टून के प्रकाशित होने के बाद राजीव गाँधी और उनकी सरकार ने कई महीनों बाद इंडियन एक्सप्रेस पर निशाना साधते हुए एंटी डिफेमेशन बिल 1988 पेश करने की कोशिश की थी जिसका मीडिया समूहों ने जमकर
विरोध किया था। लेकिन, जुलाई 1988 में राजीव गाँधी ने अपमानजनक लेखन पर अंकुश लगाने के लिए एक कड़ा बिल पास कर ही दिया। हालाँकि बाद में मीडिया की प्रतिक्रिया ने उन्हें बिल को रद्द करने के लिए मजबूर कर दिया था।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक कार्टून के छपने के बाद दफ्तर के परिसर में कई बार रेड पड़ी। इसकी फर्जी जाँच करने के लिए कि संस्थान ने कस्टम ड्यूटी से बचने की कोशिश की है। गौरतलब है कि इस लेख में
सुब्रह्मण्यन ने अपने अनुभव साझा करते हुए यह भी बताया है कि उस दौरान इंडियन एक्सप्रेस के दिल्ली कार्यालय में रेड मारने के लिए दिल्ली पुलिस और सीआरपीएफ के इतने सिपाही तैनात किए गए थे जितने टैक्स रेड में कहीं भी नहीं भेजे जाते होंगे।

कर्नाटक में गठबंधन में दरार, JDS अध्यक्ष और विधायक ने कॉन्ग्रेस पर लगाए आरोप

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा ने शुक्रवार (मई 10, 2019) को यह कहते हुए सियासे गलियारे में हलचल मचा दी कि राज्य की वर्तमान कॉन्ग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सरकार से कॉन्ग्रेसी खेमा खुश नहीं है और कॉन्ग्रेस के लगभग 20 विधायक उनके संपर्क में हैं, जो कभी भी कोई फैसला ले सकते हैं। और अब कॉन्ग्रेस और जेडीएस के बीच लगातार अनबन की खबरें आ रही हैं। दोनों के बीच की दरार बढ़ती हुई नज़र आ रही  है। गठबंधन के नेता एक दूसरे पर ही आरोप मढ़ रहे हैं।

जानकारी के मुताबिक, जेडीएस विधायक सुरेश गौड़ा ने कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा है कि कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने मांड्या में भाजपा को वोट दिया है। सुरेश गौड़ा पूछते हैं कि आखिरकार कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता किसे प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं, राहुल गाँधी को या फिर नरेंद्र मोदी को?

वहीं, अब जेडीएस के प्रदेश अध्यक्ष एच विश्वनाथ ने कॉन्ग्रेस को नसीहत देते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस नेताओं को गठबंधन सरकार में बिखराव लाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि वे (कॉन्ग्रेस नेता) 2022 में राजनीति कर सकते हैं, लेकिन अभी सही वक्त नहीं है। विश्वनाथ ने कहा, “हम सिद्धारमैया को कॉन्ग्रेस में लाए थे और हमने ऐसी स्थिति पैदा की, जिसने उन्हें सीएम बना दिया।”

विश्वनाथ की इन बातों पर कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने जवाब देते हुए कहा कि विश्वनाथ के बयान जलन से भरे हैं, जिसके बारे में वो कोऑर्डिनेशन कमेटी में बात करेंगे। उन्होंने कहा कि इससे पहले सीएम जीटी देवगौड़ा ने उनके बारे में बोला और अब एच विश्वनाथ की बातें सामने आई हैं। वो कहते हैं कि उन्हें नहीं पता आगे कौन क्या बोलेगा, इसलिए अच्छा रहेगा कि जेडीएस के सीनियर नेता अपने नेताओं के गैर-जिम्मेदाराना बयानों का संज्ञान लें। सिद्धारमैया ने कहा, “हमारी जुबान बंद है, क्योंकि हम गठबंधन धर्म से बँधे हैं, इसलिए विश्वनाथ की बातों पर प्रतिक्रिया नहीं दूंगा। वे ऐसे बयान देने के लिए जाने जाते हैं। ईश्वर से प्रार्थना है कि उन्हें सद्बुद्धि मिले।”

गौरतलब है कि, जनवरी में खुद मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने भी कहा था कि अगर कॉन्ग्रेस अपने विधायकों को उनके काम करने के तरीके की आलोचना करने से नहीं रोक सकती तो वे अपना इस्तीफा देने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा था कि कॉन्ग्रेस को निश्चित ही अपने विधायकों को नियंत्रित करना चाहिए और मामले को सुलझाना चाहिए। अगर वो खुली बैठकों में उनके खिलाफ टिप्पणी करते रहेंगे तो वो इस्तीफा देना चाहेंगे।

16 साल की सेलेब्रिटी ने भेजा PM मोदी के नाम पर्यावरण बचाने का संदेश

स्वीडन की 16 वर्षीय ग्रेटा थनबर्ग पूरी दुनिया में एक जाना-माना चेहरा बन चुकी है। पर्यावरण संरक्षण को लेकर उनकी चिंता ने उन्हें पूरे विश्व में पहचान दिलाई है। बीते दिनों 105 देशों के स्कूली छात्रों ने पर्यावरण संरक्षण के लिए हड़ताल की थी, इसके पीछे का कारण भी ग्रेटा थनबर्ग ही थीं। उनके द्वारा इस नेक मुहिम में आज कई देश और संगठन जुड़ चुके हैं। ऐसे में टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने भारतीय अखबार को दिए अपने पहले साक्षात्कार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए और देश के बच्चों के लिए संदेश भेजा है।

15 मार्च 2019 को ऐसा पहली बार हुआ कि पर्यावरण को बचाने के लिए 105 देशों के स्कूली छात्र हड़ताल पर गए। विश्व भर के क़रीब 1,500 से अधिक शहरों के स्कूली छात्रों ने इस हड़ताल में भाग लिया था। आप सोच रहे होंगे कि एकदम से स्कूली छात्रों में पर्यावरण को लेकर इतनी जागरूकता कैसे जाग उठी कि एक साथ इतने बच्चों ने हड़ताल करने का फैसला कर लिया। तो आपको बता दें कि इस हड़ताल की वजह के पीछे एक 16 वर्षीय छात्रा है जिसका नाम ग्रेटा थनबर्ग है।

ग्रेटा कहती हैं कि प्रधानमंत्री मोदी को पर्यावरण संरक्षण को बेहद गंभीरता से लेना चाहिए और साथ ही उन्हें इस पर ठोस कदम उठाने चाहिए। उनके ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है और अगर वह इस समस्या के लिए कुछ नहीं करेंगे तो भविष्य में लोग इसके (पर्यावरण समस्या) लिए उन्हें (मोदी) ही दोषी ठहराएँगे।

ग्रेटा ने भारतीय स्कूल के बच्चों की तारीफ़ करते हुए इस साक्षात्कार में कहा कि उन्हें लगता है कि पर्यावरण के लिए भारत के कई स्कूली बच्चे हड़ताल करते हैं जो कि बहुत अच्छी बात है, वो बच्चे बेहद बहादुर है। उन्होंने कहा कि और जो बच्चे हड़ताल नहीं करते हैं उन्हें पर्यावरण की समस्या के बारे में पढ़ना चाहिए और पता करना चाहिए कि आखिर क्या चल रहा है।

लंदन और स्वीडन में उनके लगातार प्रदर्शनों को केंद्र में रखकर जब उनसे सवाल किया गया कि चीन में ऐसी कोई मुहिम क्यों नहीं चलाई जा रही है जबकि वहाँ सबसे अधिक उत्सर्जन हो रहा है तो ग्रेटा ने बताया कि अगर उन्हें इस मामले के मद्देनजर चीन जाने का निमंत्रण मिलता है तो उन्हें बहुत खुशी होगी। वो कहती हैं कि वह हवाई यात्रा नहीं करती हैं, इसलिए उन्हें चीन ट्रेन से जाना होगा, जिसके लिए काफ़ी समय लगेगा और उन्हें काफ़ी तैयारी भी करनी होगी।

इस साक्षात्कार में ग्रेटा ने भारत के बारे में कहा कि भारत ग्रीनहाउस का उत्सर्जन करने वाले देशों में काफ़ी आगे हैं। भारत की जनसंख्या बहुत अधिक है और इस कारण भी यहाँ प्रदूषण का स्तर बहुत अधिक रहता है। साक्षात्कार में जब उनसे पूछा गया कि क्या इस समस्या से जूझने के लिए भारत के पास कोई रणनीति है, तो उन्होंने एक टूक जवाब देते हुए कहा कि उन्हें नहीं लगता इस समस्या को दूर करने के लिए किसी भी देश के पास कोई उपाय है।

ग्रेटा कहती हैं कि इन समस्याओं से जूझने के लिए सबसे बड़ा उपाय है कि हर व्यक्ति को पढ़ना चाहिए और खुद को शिक्षित बनाना चाहिए। तभी लोग समझ पाएँगे कि उन्हें क्या करना है। वो कहती हैं कि वो सिर्फ़ एक बच्ची हैं और संदेशवाहक की भूमिका में है।

‘स्वतंत्र भारत का पहला आतंकवादी एक हिन्दू था’: कमल हासन का वाहियात बयान

कॉन्ग्रेस शासनकाल में उछाला गया शब्द ‘हिंदू आतंकवाद’ इस लोकसभा चुनाव में अहम मुद्दा बन गया है। इसको लेकर सियासत काफी गर्म रही है। जब से भाजपा ने मध्य प्रदेश की भोपाल लोकसभा सीट से मालेगाँव ब्लास्ट की आरोपित साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को उतारा है, तब से इस मुद्दे ने और भी ज्यादा तूल पकड़ लिया। विपक्षी पार्टियाँ लगातार इसका इस्तेमाल वोट बटोरने के लिए कर रही हैं। इसी बीच नेता से अभिनेता बने कमल हासन ने हिंदू आतंकवाद को लेकर एक विवादित बयान दिया है। दरअसल, कमल हासन ने तमिलनाडु में अपनी पार्टी मक्कल निधि मय्यम के उम्मीदवार के लिए चुनाव प्रचार के दौरान कहा कि स्वतंत्र भारत का पहला आतंकवादी एक हिंदू था और उसका नाम नाथूराम गोडसे था। उन्होंने कहा कि वो इसलिए ये नहीं कह रहे हैं, क्योंकि ये मुस्लिम बहुल इलाका है, बल्कि वो ऐसा इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि महात्मा गाँधी की प्रतिमा सामने है।

हिंदू आतंकवाद के नाम पर वोटबैंक की राजनीति करने को लेकर पीएम मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, वित्त मंत्री अरुण जेटली समेत पूरी भाजपा कॉन्ग्रेस को जमकर घेरती रही है। पीएम मोदी ने रविवार (मई 12, 2019) को भी मध्य प्रदेश के खंडवा में कॉन्ग्रेस पर जमकर निशाना साधते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस ने हमारी धार्मिक विरासत को बदनाम करने के लिए ‘हिंदू आतंकवाद’ की साजिश रची। इससे पहले भी उन्होंने एक रैली में कहा था कि वोट-बैंक की राजनीति के लिए एनसीपी और कॉन्ग्रेस किसी भी हद तक जा सकती हैं। इस देश के करोड़ों लोगों पर हिंदू आंतकवाद का दाग लगाने का प्रयास कॉन्ग्रेस ने ही किया है।

अमित शाह ने भी कॉन्ग्रेस को इसी मुद्दे पर घेरा था। यूपी के नगीना में एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए शाह ने कहा था, “समझौता ब्लास्ट को हिन्दू आतंकवाद बोलकर कॉन्ग्रेस ने अपने वोट बैंक के लिए पूरी दुनिया में शांति और सौहार्द के प्रतीक हिन्दू धर्म को बदनाम किया। आतंकवाद को हिंदू धर्म के साथ जोड़ने का पाप कॉन्ग्रेस ने किया। राहुल बाबा, आपको पता नहीं है हम तो चींटियों को भी आटा खिलाने वाले लोग हैं। कॉन्ग्रेस ने इसके साथ ही पाक प्रेरित लश्कर-ए-तैयबा के ब्लास्ट करने वाले असली गुनहगारों को छोड़कर देश की सुरक्षा के साथ भी खिलवाड़ किया।” अरुण जेटली ने भी कहा था कि कॉन्ग्रेस द्वारा इस शब्द का प्रयोग केवल वोटों के लिए किया गया था। उन्होंने कहा कि केवल राजनीतिक लाभ के लिए हिंदू समाज को कलंकित किया गया। इसके साथ ही उन्होंने इसके लिए पूरे हिन्दू समाज से कॉन्ग्रेस को माफी माँगने की भी बात कही थी।

कालाहांडी में 24 घंटों में नक्सलियों ने किए 2 धमाके, 2 जवान घायल

उड़ीसा के कालाहांडी जिले में पिछले 24 घंटों में नक्सलियों ने 2 ब्लास्ट किए है। ये धमाके लांजीगढ़ पुलिस थाने की सीमा के तहत त्रिलोचनपुर और बीजापुर में सीआरपीएफ शिविरों के पास हुए। इन विस्फोटों में 2 जवानों के घायल होने की ख़बर है।

गौरतलब है कि कल (मई 12, 2019) नक्सलियों ने सीआरपीएफ के निर्माणाधीन भवन को विस्फोट से उड़ा दिया था। हालाँकि इस घटना में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं मिली थी। विस्फोट के बाद पुलिस के शीर्ष अधिकारी दल-बल सहित मौके पर पहुँचे थे और सर्च अभियान शुरू हुआ। इस घटना के एक दिन पूर्व मलकानगिरी जिले के मैथिली थाना अंतर्गत बोगापदर पहाड़ में भी नक्सलियों ने विस्फोट किया था जिसमें स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप के 2 जवान घायल हुए थे।

इसके अलावा अभी हाल ही में 1 मई को महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में नक्सलियों द्वारा किए गए धमाके में 15 सुरक्षाकर्मियों वीरगति को प्राप्त हो गए थे। यह घटना तब हुई थी जब गढ़चिरौली के घने जंगलों के बीच से सी 60 कमांडो यूनिट का दस्ता गुजर रहा था।

नक्सलियों ने जिस तरह से इस हमले को अंजाम दिया था, उससे स्पष्ट था कि इस हमले के लिए लंबी प्लानिंग की गई होगी। पहले सुबह महाराष्ट्र दिवस पर 36 गाड़ियों को जलाकर नक्सलियों ने सुरक्षा बलों को अपनी ओर आने का एक तरह से लालच दिया। घटना की सूचना मिलते ही क्विक एक्शन फोर्स घटनास्थल की ओर रवाना हुई। इसी रूट पर नक्सली घात लगा कर बैठे थे। जैसे ही जंबुलखेड़ा गांव से सी 60 कमांडो की टीम गुजर रही थी, नक्सलियों ने IED ब्लास्ट कर उनकी गाड़ी को निशाना बनाया।

मोदी के खिलाफ चुनाव में उतरने वाले अतीक अहमद ने छोड़ा मैदान

वाराणसी की संसदीय सीट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ बतौर निर्दलीय प्रत्याशी नामांकन भरने वाले अतीक अहमद ने आखिरी समय में मैदान से हटने का फैसला किया है। मीडिया खबरों के मुताबिक अतीक ने इसका कारण ‘पैरोल’ न मिलने को बताया है। साथ ही इस चुनाव में उन्होंने किसी उम्मीदवार को समर्थन न देने की भी घोषणा की है।

गौरतलब है कि पूर्व सांसद अतीक अहमद ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर नामांकन भरने के उपरांत पैरोल की अर्जी दी थी, लेकिन कुछ दिनों पहले एमपी-एमएलए विशेष कोर्ट और उच्च न्यायालय ने उनकी अपील खारिज़ कर दी थी। इसके बाद अतीक के चुनाव एजेंट वकील शहनवाज आलम ने रविवार (मई 12,2019) को अतीक की ओर से पत्र लिखा। इस पत्र में उनके चुनावी मैदान से हटने की बात थी।

इस पत्र में अतीक की ओर से लिखा गया कि उन्होंने सांप्रदायिक ताकतों को हराने के लिए सभी दलों से समर्थन माँगा था लेकिन उन्हें न किसी ने समर्थन दिया और न ही अदालत ने पैरोल की अर्जी को मंजूर किया। अब ऐसे में उनका चुनाव लड़ना और लड़कर मतों को विभाजित करना उचित नहीं है।

इस पत्र में अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा पर निशाना साधते हुए अहमद ने कहा कि भारत में लोकतंत्र की जड़ें बहुत मजबूत हैं लेकिन यहाँ ऐसी विचारधारा के लोग भी मौजूद हैं, जो लोकतंत्र को समाप्‍त कर हिटलरशाही लाना चाहते हैं। उन्होंने मतदाताओं से सांप्रदायिक ताकतों को परास्‍त करने की अपील की। इसके अलावा इस पत्र के जरिए उन्होंने बताया कि चुनाव में किसी दल ने उनसे समर्थन नहीं माँगा है इसलिए वह भी किसी को समर्थन नहीं देंगे।

बता दें नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के कारण बैलेट यूनिट में अतीक अहमद का चुनाव चिह्न अंकित रहेगा लेकिन शाहनवाज़ (अतीक के चुनाव एजेंट) ने स्पष्ट किया है कि उनकी ओर से किसी तरह का पास और अनुमति नहीं ली जाएगी।