सोशल मीडिया पर पूर्व भारतीय सलामी बल्लेबाज़ गौतम गंभीर और जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती के बीच तीखी नोंकझोंक हुई। दरअसल, ये सब शुरू हुआ फ़ारूक़ अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती के ख़िलाफ़ दिल्ली हाईकोर्ट में एक पीआईएल दाख़िल करने के बाद। दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर कर नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता फ़ारूक़ अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और पीडीपी सुप्रीमो महबूबा मुफ़्ती को लोकसभा चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने की माँग की गई। वकील संजीव कुमार द्वारा दायर इस याचिका में इन तीनों नेताओं के हालिया देश-विरोधी बयानों के मद्देनज़र इन्हें चुनाव लड़ने से रोकने की माँग की गई। याचिका में कहा गया है कि इन तीनों नेताओं की निष्ठा देश के संविधान के प्रति न होकर किसी और के लिए है।
@MehboobaMufti यह भारत है, कोई आप जैसा धब्बा नहीं जो मिट जाएगा!
इस जनहित याचिका से बौखलाई महबूबा मुफ़्ती ने ट्विटर पर अनाप-शनाप बकना शुरू कर दिया। महबूबा ने लिखा कि अदालत में समय बर्बाद करने से क्या फ़ायदा? उन्होंने दावा किया कि भाजपा द्वारा धारा 370 हटाने के साथ ही जम्मू कश्मीर में भारत का संविधान लागू नहीं होगा। ऐसे में वो लोग स्वतः ही चुनाव लड़ने से वंचित हो जाएँगे। इसके बाद उन्होंने पूरे भारत को धमकी देते हुए लिखा, “ना समझोगे तो मिट जाओगे हिन्दुस्तान वालों, तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में।“
Oh! So you have unblocked my twitter handle! U needed 10 hours to respond to my tweet and come up with such a pedestrian analogy!!! Too slow. It shows the lack of depth in ur personality. No wonder you guys have struggled to solve the issues at hand.
इसके बाद गौतम गंभीर कहाँ चुप रहने वाले थे। हाल ही में भाजपा में शामिल हुए पूर्व भारतीय ओपनिंग बैट्समैन ने महबूबा की गेंद को ऐसे ही छक्के के लिए उठाया, जैसे उन्होंने 2007 टी-20 वर्ल्ड कप फाइनल में बेसबॉल स्टाइल में पाकिस्तानी गेंदबाज़ उमर गुल की गेंद को लेग साइड के ऊपर से छक्के के लिए भेजा था। दिल्ली रणजी टीम, भारतीय टीम और कोलकाता नाइट राइडर्स की कप्तानी कर चुके गौतम ने महबूबा मुफ़्ती को याद दिलाया था कि ये भारत देश है, उनकी तरह कोई धब्बा नहीं जो मिट जाए।
फिर क्या था, महबूबा मुफ़्ती ने अपने ख़राब क्रिकेट ज्ञान का परिचय देते हुए गंभीर को नसीहत दे डाली कि कहीं उनका राजनीतिक करियर भी उनके क्रिकेट करियर की तरह बहुत बुरा न हो। लगातार पाँच मैचों में टेस्ट शतक जड़ने का रिकॉर्ड अपने नाम कर चुके गंभीर भी कहाँ चुप रहने वाले थे। उन्होंने महबूबा को तड़ाक से जवाब दिया कि क्या उन्हें 10 घंटे सिर्फ़ यही जवाब देने में लग गए? वर्ल्ड कप 2011 के फाइनल में दो विकेट गिरने के बाद जब टीम मुश्किल में थी, तब तीन घंटे से भी अधिक समय तक टिककर श्रीलंकाई गेंदबाज़ों की ख़बर लेने वाले गौती ने महबूबा की व्यक्तित्व में गहराई की कमी बताते हुए उनसे कहा कि यही कारण है कि वे लोग (कश्मीरी नेता) आज तक इस समस्या का हल नहीं निकाल पाए।
Most welcome @MehboobaMufti Ma’am, happy to be blocked by a callous individual. By the way, at the time of writing this tweet there are 1,365,386,456 Indians. How will you block them?
इसके बाद तिलमिलाई महबूबा मुफ़्ती ने गंभीर की मानसिक हालत पर कमेंट करना शुरू कर दिया। उन्होंने गंभीर पर उनका पीछा करने और ट्रोल करने का आरोप मढ़ा। उन्होंने कहा कि गंभीर कश्मीर के बारे में कुछ नहीं जानते। उन्होंने गंभीर के ट्वीट की क़ीमत दो रुपए लगाते हुए ब्लॉक कर दिया। महबूबा द्वारा ब्लॉक किए जाने पर गंभीर ख़ुश ही नज़र आए और उन्होंने कहा कि ऐसे बेदिल इंसान द्वारा उन्हें ब्लॉक करना अच्छी बात है। हालाँकि, उन्होंने महबूबा से पुछा कि वो 135 करोड़ भारतीयों को कैसे ब्लॉक करेंगी?
बता दें कि महबूबा समय-समय पर ऐसी धमकी देती आई हैं और आजकल कश्मीर के सारे नेता देश-विरोधी बयान दे रहे हैं। महबूबा ने हाल ही में कहा था कि अगर धारा 370 से छेड़छाड़ की गई तो पूरा देश जल कर खाक हो जाएगा। उस से पहले उन्होंने कहा था कि अगर 370 हटाया गया तो कश्मीर के लोग न जाने कौन सा झंडा उठाने को मज़बूर हो जाएँगे।
इनकम टैक्स विभाग और ED ऑफिस द्वारा पिछले एक सप्ताह के अंदर मध्य प्रदेश के अलावा कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में भी विभिन्न राजनेताओं और उनके करीबी सहयोगियों के खिलाफ अवैध रूप से जमा की गई संपत्ति और पैसे की तलाशी के लिये छापेमारी की गई है। हमेशा की तरह ही विपक्ष द्वारा इसे जबरदस्ती की गई कार्रवाई बताया जा रहा है। हालाँकि, करोड़ों में बरामद की जा रही बड़ी रकमों के बाद भी इसे कॉन्ग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों ने सत्तारूढ़ भाजपा के उकसावे पर की गई कार्रवाई बताया है।
गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने विपक्ष के लगाए आरोपों पर जवाब देते हुए कहा, “ये छापेमारी एजेंसी अपने इनपुट के आधार पर कर रही है। इसमें केंद्र सरकार का किसी तरह का हाथ नहीं है। सरकार को दोष देना गलत बात है। ऐसा कई वर्षों से हो रहा है, आज अचानक तो शुरू नहीं हुआ है। इसके पीछे की तरह की राजनीतिक शक्ति का इस्तेमाल नहीं किया गया है। देश में आचार संहिता लागू है। हम क्या करें?”
राजनाथ सिंह ने अपने इंटरव्यू में कहा, “आज जो एजेंसी रेड कर रही है, वो पहले भी करती रही हैं। उनके ऊपर आचार संहिता लागू नहीं होता है। जहाँ से उन्हें जो इनपुट मिलता है, उस आधार पर वे कार्रवाई करते हैं। हम उनको कैसे रोके। यदि किसी ने गलत पैसा इकट्ठा कर रखा है, गलत तरीके से उसका उपयोग करना चाहता है, तो ऐसे में ये स्वतंत्र संगठन अपनी-अपनी जिम्मेदारी संभालते हुए कार्रवाई कर रहे हैं। इस छापेमारी को लेकर केंद्र सरकार को दोष देना उचित नहीं होगा और सरकार के साथ न्याय भी नहीं होगा। यह एक सतत प्रक्रिया है। यदि कोई मानता है कि किसी के कहने पर हो रहा है, यह कहना न्यायसंगत नहीं होगा। गृहमंत्रालय सिर्फ उपलब्धता के आधार पर केंद्रीय सुरक्षाकर्मियों को सहायता के लिए भेजता है।”
चुनाव आयोग ने आयकर विभाग की पिछले 2 दिनों से जारी छापेमारी को कॉन्ग्रेस द्वारा सत्तारूढ़ भाजपा के उकसावे पर की गयी कार्रवाई बताए जाने संबंधी आरोपों पर संज्ञान लेते हुय राजस्व सचिव और केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के अध्यक्ष से विस्तृत जानकारी माँगी है। रविवार (अप्रैल 07, 2019) को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के करीबी सहयोगियों के ठिकानों पर छापेमारी की कार्रवाई, जिसमें ₹281 करोड़ की बेहिसाब नकदी के बाद भी आयोग ने वित्त मंत्रालय को इस बारे में सख्त परामर्श जारी किया था। इसमें आयोग ने मंत्रालय से उसकी जाँच एजेंसियों की चुनाव के दौरान कोई भी कार्रवाई निष्पक्ष और भेदभाव रहित होने निर्देश दिया था। इसके साथ ही चुनाव आयोग ने आदर्श आचार संहिता का हवाला देते हुए इस तरह की कार्रवाई से पहले आयोग से भी संपर्क करने को कहा था।
ओबीसी समुदाय में पैदा होने के बाद भी दलित पहचान जबरिया हड़पने वाले काँचा इलैया शेफर्ड ने ‘द वायर’ में लिखा, ‘मोदी की तरह चौकीदार बनने से इंकार कर सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी जातिवादी-ब्राह्मणवादी मानसिकता जताई!’
और ब्राह्मणवाद को (और इसके बहाने ब्राह्मणों को) गरियाना इतना जरूरी हो गया कि जो वायर मोदी को संघ के ‘गुंडा हिन्दूवाद’ का वाहन बताता था, वही आज मोदी को ‘ब्राह्मणवादी’ भाजपा के अन्दर ‘बेचारा’ दिखाने को तैयार हो गया। मतलब ब्राह्मणों के प्रति नफरत फैलानी इतनी जरूरी है कि मोदी से सहानुभूति भी चलेगी?
हार्वर्ड, कैम्ब्रिज, और हार्ड वर्क- तीनों से ज्यादा बड़ा होता है परिप्रेक्ष्य
काँचा इलैया शुरू में ही हमें याद दिलाते हैं कि कैसे मोदी ने एक बार ‘हार्ड वर्क’ (परिश्रम) को हार्वर्ड (विश्वविद्यालय) से बड़ा बताया था, और बताते हैं कि आज हार्वर्ड से पढ़े सुब्रमण्यम स्वामी मोदी का अपमान कर रहे हैं। तो काँचा इलैया जी, परिप्रेक्ष्य देखिए, परिप्रेक्ष्य। मोदी ने ‘हार्वर्ड’ नाम के पीछे केवल अमर्त्य सेन या पी चिदंबरम को नहीं घेरा था बल्कि अपने आलोचकों की उस पूरी लॉबी को निशाने पर लिया था जिनका मोदी का विरोध करने के लिए एक ही तर्क था, ‘हम हार्वर्ड (या ऐसे ही ‘एलीट’ विश्विद्यालय) से पढ़े हैं/में पढ़ाते हैं, इसलिए हमारी बात ‘अनपढ़’ मोदी से बेहतर है…’
वहीं यहाँ इस मसले में सुब्रमण्यम स्वामी ने कहीं भी अपने ‘हार्वर्डत्व’ का हवाला नहीं दिया। ऐसे में आपको एक ‘कैची हेडलाइन’ देने के अलावा इस “हार्वर्ड-हार्ड वर्क” की हाय-हत्या का यहाँ कोई काम नहीं था।
रही बात जो आप मणिशंकर अय्यर के ‘कैम्ब्रिज वाला ब्राह्मण’ होकर मोदी के चायवाले होने के अपमान की बात करते हैं, तो यह भी मणिशंकर अय्यर का दोष था- न कैंब्रिज का, न उनके ब्राह्मण घर में पैदा होने का।
आइए मूल मुद्दे पर- ब्राह्मणों से racist नफरत
काँचा इलैया जी, आपके अनुसार सुब्रमण्यम स्वामी का कथन समूची भाजपा और वृहद् संघ परिवार में मौजूद ‘जातिवादी’ मानसिकता का सबूत है।
इसमें कोई दोराय नहीं कि डॉ स्वामी कुछ मामलों में पुराने ख्यालात के हैं- वह समलैंगिकता के सार्वजनिक प्रदर्शन पर भी आपत्ति खुल कर जता चुके हैं, पर इसे पूरे एक राजनीतिक दल से आपने किस आधार पर जोड़ दिया?
क्या भाजपा में और किसी ने अपने ट्विटर हैंडल को बदलने से इस आधार पर इंकार किया कि उसके जन्मना-वर्ण में चौकीदारी नहीं हो सकती?
आप संघ को भी लपेटे में ले लेते हैं। क्या संघ चुनाव लड़ रहा है?
‘मैं भी चौकीदार’ राहुल गाँधी के भाजपा पर एक राजनीतिक आरोप के जवाब में शुरू किया गया था। क्या राहुल गाँधी ने संघ पर ‘चोरी’ का आरोप लगाया था?
संघ खुद को एक सांस्कृतिक संगठन कहता है- वह भाजपा ही नहीं, करीब दर्जन भर अनुषांगिक संगठनों के चलने के लिए मार्ग की सलाह भर देता है। क्यों बदले ट्विटर हैंडल वह, या उसके स्वयंसेवक?
इसके अलावा, अगर आप कथनों के आधार पर ही चलना चाहते हैं तो आपको यह पता है या नहीं कि मोदी प्रशासन में लाख मीन-मेख निकालने के बाद भी सुब्रमण्यम स्वामी मोदी को ही एस देश की इकलौती उम्मीद बताते हैं आगामी चुनावों में। कौन जातिवादी ऐसा करता है?
और अगर एक मिनट के लिए सुब्रमण्यम स्वामी को ‘दुष्ट जातिवादी-ब्राह्मणवादी’ मान भी लिया जाए, तो सुब्रमण्यम स्वामी के ऐसे होने से भाजपा-संघ के और इस देश के सभी ब्राह्मण सुब्रमण्यम स्वामी जैसे ही हो गए? ऐसे तो आप पत्रकारिता के जिस समुदाय विशेष में घूम रहे हैं, उसके काले कारनामों की फेहरिस्त के चलते सभी पत्रकारों को बौद्धिक रूप से दिवालिया और नैतिक रूप से पतित मान लिया जाए?
और ब्राह्मणों को आप इतना गरिया ही रहे हैं तो एक बात यह भी बताइए – अगर पुरानी जाति व्यवस्था ब्राह्मणों ने ही अपने स्वार्थ और एकाधिकार के लिए बना रखी थी तो केवल ब्राह्मणों से ही फटेहाल-कंगाल होने की उम्मीद क्यों होती थी पुरातन काल में? क्यों उनके भिक्षावृत्ति के अलावा हर अन्य प्रकार से धनोपार्जन पर रोक थी? क्यों हर अपराध में उन्हीं के लिए सबसे ज्यादा समय तक के कारावास का निर्धारण था? क्यों ‘स्वादिष्ट’ माँस-मछली-मदिरा केवल उन्हीं के लिए अभक्ष्य था? आज भी बिहार निकल जाइए तो ऐसे गाँवों की फ़ेहरिस्त है जहाँ का ब्राह्मण बाकी जगह दलित (यानि दबाया हुआ) कहलाने वाले समुदाय से ज्यादा बदहाल है।
इसके अलावा और सबूत चाहिए तो अपने (छद्म)-उदारवादी गैंग के आधे-दुलारे शशि थरूर की किताब ‘Era of Darkness’ का चौथा चैप्टर ‘Divide et Impera’ पढ़ लीजिए, कि कैसे वह अंग्रेज थे जिन्होंने जाति को एक गतिमान, परिवर्तनशील सामाजिक व्यवस्था से एक रूढ़ियों में जकड़ी उत्पीड़न व्यवस्था में बदल दिया।
सच्चाई यह है कि पुरानी वर्ण-व्यवस्था में जकड़न से बनी जाति-व्यवस्था में सभी जातियों के लिए किसी न किसी प्रकार की समस्या निहित थी। इसीलिए आज उसे पीछे छोड़ समाज आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है। यह सच है कि एक समय (पाँच हजार साल पहले से नहीं, केवल अंग्रेजों की मौजूदगी वाली कुछ सदियों में) कुछ जातियों ने अन्य जातियों का सामाजिक उत्पीड़न किया, यह भी सच है कि कुछ स्थानों पर यह आज भी जारी है। पर आज का समाज इन्हें प्रश्रय या बढ़ावा नहीं दे रहा, इनका प्रतिकार और उन्मूलन कर रहा है।
पर आपके जैसे लोग हैं असली जातिवादी, जो अपनी NGO-वादी, victimology पर आधारित मुफ़्त की रोटी बचाने के लिए जाति का मसला ख़त्म नहीं होने देना चाहते। आपके जैसे लोग एक-दो साल के लिए अपने सुर या तो बदल दें या शांत हो जाएँ जातिवाद प्राकृतिक मौत मर जाएगा।
नई वाली राजनीति के नाम पर नए-नए काण्ड रचकर चर्चा में बने रहने वाले JNU के विद्यार्थी कन्हैया कुमार पहले व्यक्ति नहीं हैं। इससे पहले आम आदमी पार्टी अध्यक्ष और दिल्ली के CM अरविन्द केजरीवाल जी भी नई वाली राजनीति के नाम पर जनता को अच्छे चुटकुले सुना चुके हैं।
लोकसभा चुनाव 2019 में इस बार बिहार का बेगूसराय खासा चर्चाओं में है। लोगों के मेहनत की कमाई से कटने वाले टैक्स के रुपयों द्वारा मिलने वाली सब्सिडी पर JNU में देशविरोधी नारे लगाने वाले कन्हैया कुमार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की बेगूसराय सीट से लोकसभा चुनाव के उम्मीवार हैं। इस सीट से भाजपा नेता गिरिराज सिंह और महागठबंधन के तनवीर हसन भी चुनावी मैदान में हैं।
जबकि आम चुनाव की तारीख एकदम करीब है, ऐसे में मीडिया के विभिन्न स्रोतों में कन्हैया कुमार को लेकर विशेष प्रचार-प्रसार के हथकंडे देखने को मिल रहे हैं। माँ की कसम खाकर वोट माँगने वाले JNU नेता कॉमरेड कन्हैया कुमार और उनके समर्थक सोशल मीडिया और व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी पर भी लोकप्रियता बटोरने के लिए अजीबोगरीब हथकंडे इस्तेमाल करते नजर आ रहे हैं, शायद इसी तरह के ‘क्रिएटिव चुनाव प्रचार’ के तरीकों के कारण ही उन पर कुछ दिन पहले बेगूसराय की जनता ने हाथ छोड़कर चुनाव के शुरूआती रुझान की झलक दे डाली थी।
कन्हैया कुमार और उनके समर्थकों ने अपने प्रचार के लिए एक नया क्रिएटिव तरीका ईजाद किया है। सोशल मीडिया पर कन्हैया कुमार के लिए कुछ तस्वीरें बड़े स्तर पर शेयर की जा रही हैं। इन तस्वीरों में ये सन्देश देते हुए शेयर किया जा रहा है कि कॉन्ग्रेस MLA अदिति सिंह बेगूसराय में लोगों से CPI नेता कन्हैया कुमार को वोट देने की अपील कर रही हैं।
वास्तव में कॉन्ग्रेस विधायक अदिति सिंह कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की मम्मी सोनिया गाँधी जी के लिए रायबरेली में चुनाव प्रचार कर रही हैं। लेकिन कन्हैया कुमार के समर्थक सोशल मीडिया और व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी पर बड़े स्तर पर यह फेक न्यूज़ फैला रहे हैं कि अदिति CPI नेता कन्हैया कुमार के पक्ष में बेगूसराय की चिलचिलाती धूप में पसीने बहा रही हैं। ख़ास बात यह है कि क्रान्ति ही जीने, क्रान्ति ही खाने-ओढ़ने और पहनने वाले कॉमरेड कन्हैया की चुनावी तैयारी की इन फ़र्ज़ी तस्वीरों को सबसे ज्यादा कॉमरेड चंद्रशेखर के नाम पर बने पुस्तकालय के पेज द्वारा चलाई जा रही है।
वह पुस्तकालय जिसके द्वारा कॉन्ग्रेस के MLA को कन्हैया कुमार के प्रचार के लिए CPI में तदील किया जा रहा है (व्यंग्य)
आज सदर विधानसभा रायबरेली के विकास खण्ड राही के ग्राम भैदपुर, बालेपुर, सनही एवं मेजरगंज और शहर क्षेत्र के किशुनपुर, गजोधरपुर व श्याम नगर में जनसम्पर्क कर माननीय सांसद सोनिया गाँधी जी को समर्थन देने अपील की। #Raebarelipic.twitter.com/rjL9bKoIGl
इसी तरह की खबरें मीडिया गिरोहों द्वारा आजकल कन्हैया कुमार के पक्ष में हवा बनाने के लिए पढ़ने को मिली हैं, जिनमें बताया जा रहा था कि 10 दिन में कन्हैया कुमार ने 10 लाख रुपए जुटा लिए हैं। व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी से आने वाली सूचनाओं के आँकड़ों की प्रमाणिकता हमेशा संदेह का विषय रहती हैं।
समर्थकों का उन्माद अपने नेताओं के प्रति अक्सर देखने को मिलता है, लेकिन कन्हैया कुमार को लेकर कुछ मीडिया गिरोह जज्बाती होकर यह तक भूल गए हैं कि कॉन्ग्रेस MLA CPI नेता के लिए वोट माँगने की अपील करने रायबरेली से बेगूसराय आखिर क्यों जाएगी? जागरूक बनिए और अपने विवेक का परिचय देते हुए ही इस तरह की वायरल तस्वीरों के जाल में यकीन करने से बचिए।
केंद्र सरकार पर विपक्ष का हमला लगातार बढ़ता जा रहा है। ममता से लेकर मायावती तक इस समय मोदी सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनाने में प्रयासरत है। इसी कड़ी में राहुल गाँधी जैसी ‘शख्सियत’ ने भी मोदी के लिए डरपोक और चोर जैसे शब्दों का एक बार फिर इस्तेमाल किया है।
प्रधानमंत्री पर आरोपों की झड़ी लगाते हुए मंगलवार (अप्रैल 9, 2019) को राहुल गाँधी ने अपनी असम रैली में कहा, “नरेंद्र मोदी और उनकी योजनाएँ सिर्फ़ उनके अमीर उद्योगपतियों (मेहुल चॉकसी, नीरव मोदी, अनिल अंबानी) दोस्तों के लिए हैं।”
जानकार हैरानी होगी लेकिन इन दिनों घोटालों और जमीनों की खरीद-फरोख्त के मामलों में बुरी तरह से फँस चुके गाँधी परिवार के ‘चिराग’ ने अपने भाषण में कहा, “चौकीदार सिर्फ़ चोर ही नहीं हैं, बल्कि डरपोक भी हैं। क्योंकि वो हमेशा भ्रष्टाचार पर बात करते हैं इसलिए मैनें चौकीदार से मुझसे डिबेट करने को कहा, लकिन वो भाग गए।”
बात सिर्फ़ यही पर खत्म नहीं होती है, राहुल गाँधी ने इस रैली के दौरान मोदी पर आरोप लगाया कि उन्होंने 2 करोड़ जॉब, किसानों के लिए वादे और 15 लाख देने के बारे में झूठ बोला था। इस रैली में राहुल गाँधी ने कहा कि नोटबंदी और जीएसटी के जरिए चौकीदार सारा पैसा ले गया। बैंकों की चाभी भी अनिल अंबानी जैसे चोरों के हाथ में दे दी गई। यहाँ उन्होंने बराक वैली के लोगों को आश्वासन भी दिया कि अगर कॉन्ग्रेस सरकार सत्ता में आती है तो वह उस चाभी को अनिल अंबानी से छीनकर बराक वैली के नौजवानों को दे देंगे।
यहाँ राहुल गाँधी ने मोदी के बारे में कहा कि पिछले 5 सालों में मोदी सरकार ने 15 लोगों को फायदा पहुँचाया है और देश के सभी अमीरों को बेतहाशा रुपया दिया है। उन्होंने कहा, जब कॉन्ग्रेस 2019 में सत्ता में आएगी तो हेडलाइन आएगी कि “गरीबों को पैसा दिया गया।”
अब राहुल की रैली में कही एक-एक बिंदु पर विचार करिए कि यह पूरी बातचीत कितनी ज्यादा हास्यास्पद और निराधार है। जिस कॉन्ग्रेस के पास खुद के दस सालों में किए घोटालों का जवाब नहीं है, उसके अध्यक्ष चाहते हैं कि मोदी उनसे भ्रष्टाचार पर बात करें। इसके अलावा देश के सबसे काबिल वक्ता को उस व्यक्ति द्वारा डिबेट के लिए ललकारा जा रहा है, जिसे भारतीय विद्यापीठ के छात्रों ने कुछ दिन पहले बच्चों ने ही ‘बच्चों जैसी बात करने वाला‘ करार दे दिया था। साथ ही राहुल की हर बात को स्क्रिप्ट की तरह पहले से तय बताया था।
अब रही बात मोदी सरकार द्वारा अमीरों को 5 सालों में पैसे देने की तो नीरव को जमानत न मिलना और माल्या की लंदन कोर्ट में प्रत्यर्पण की याचिका खारिज होना दर्शाता है कि इन भगौड़ों के खिलाफ़ मोदी सरकार चुुप नही बैठी है। लेकिन राहुल को समझने की जरूरत है कि अगस्ता वेस्टलैंड के मिशेल बिचौलिए की हकीकत, भोपाल गैस त्रासदी के जिम्मेदारों को देश से भगाने और बचाने का सच, यूपीए कार्यकाल में राहुल की संपत्ति में हुई 1600 गुनावृद्धि का सच अब किसी से भी छिपा नहीं है।
इसलिए बेहतर हैं कि वो ऐसी बातें उस शख्स के बारे में तो बिलकुल भी न करें जिसके साथ मुकाबले में उनकी जीत शून्य से गिरके नेगटिव पैरामीटर्स तक पहुँच जाए। अब मतदान शुरू होने में सिर्फ़ दो दिन बचे हैं। 11 तारीख़ को मतादन का पहला चरण है और आखिरी 19 मई है। 23 मई को नतीजे भी आ जाएँगे। जरूरी है कि अब विपक्ष अपनी ओछी और राहुल अपनी बचकानी राजनीति करने से बाज आ जाएँ और 2024 की तैयारी करें।
छत्तीसगढ़ के अतिसंवेदनशील नक्सल प्रभावित जिले दंतेवाड़ा में मंगलवार (अप्रैल 9, 2019) की शाम नक्सलियों ने एक बड़े हमले को अंजाम दिया। नक्सलियों द्वारा लगाए गए आईईडी की चपेट में आने से भाजपा विधायक भीमा मंडावी की मौत हो गई। उनके साथ ही घटना में सुरक्षा में तैनात 5 जवान भी वीरगति को प्राप्त हो गए।
P Sundar Raj, DIG-Anti-Naxal Ops: BJP MLA Bheema Mandavi killed in naxal attack in Dantewada pic.twitter.com/CcYVeKHwXT
मिली जानकारी के मुताबिक, भीमा मंडावी कुआकोण्डा ब्लॉक के श्यामगिरी गाँव में चुनावी सभा को संबोधित करने के बाद वापस नकुलनार लौट रहे थे, तभी सड़क पर नक्सलियों द्वारा लगाए गए लैंडमाइन्स (आईईडी) के ऊपर से उनका वाहन गुजरा और विस्फोट हो गया। विस्फोट में वाहन पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। इस हमले में विधायक भीमा मंडावी की मौके पर ही मौत हो गई, जो कि विपक्ष के उपनेता थे। ब्लास्ट के बाद नक्सलियों ने काफिले की गाड़ियों पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी।
#SpotVisuals: Convoy of BJP MLA Bheema Mandavi attacked by Naxals in Dantewada. The escort vehicle of Chhattisgarh State Police also came under the blast. 5 personnel of Chhattisgarh State Police are critically injured. pic.twitter.com/ZastP8hrQe
वाहन में विधायक की सुरक्षा में तैनात 5 जवान भी सवार थे, जो इस घटना में वीरगति को प्राप्त हो गए। बता दें कि श्यामगिरी में आज वार्षिक मड़ई मेले का भी आयोजन किया गया था। इसी मेले के दौरान आयोजित जनसभा को संबोधित करने वे जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर स्थित इस गाँव में गए थे। इस हमले के बाद काफिले में शामिल अन्य लोगों के बीच अफरा-तफरी मच गई। इसके बाद सीआरपीएफ और राज्य पुलिस की टीमों को तत्काल मौके पर भेजा गया। जिसके बाद घटनास्थल के आसपास के इलाके को सीज कर दिया गया है। इसके अलावा हमलावरों की तलाश में यहाँ पर सर्च ऑपरेशन भी चलाया गया है।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में इससे पहले भी कई बार नक्सली हमलावरों ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों को निशाना बनाया है। जुलाई 2018 में नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में बीएसएफ के जवानों पर हमला किया था। इस हमले में बीएसएफ के 2 जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे। इससे पहले 13 मार्च 2018 को राज्य के सुकमा जिले में सीआरपीएफ की 212वीं बटालियन के जवानों पर हमला हुआ था। आईईडी लगाकर किए गए इस नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 9 जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे।
सूर्योपासना का महापर्व चैती छठ मंगलवार (अप्रैल 9, 2019) से नहाय-खाय के साथ शुरू हो गया। यह पर्व साल में दो बार मनाया जाता है। हिंदी पंचांग के अनुसार यह पर्व चैत्र माह और कार्तिक माह में मनाया जाता है। चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने की वजह से इस छठ को चैती छठ कहते हैं और कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले छठ पर्व को कार्तिक छठ कहा जाता है। यह त्योहार विशेष रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वांचल आदि क्षेत्रों में विशेष धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इसे बिहार, झारखंड के मुख्य पर्व के रूप में भी जाना जाता है।
छठ पूजा और व्रत पारिवारिक सुख-समृद्धि एवं मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए किया जाता है। स्त्री और पुरुष समान रूप से इसे कर सकते हैं। बता दें कि छठ पूजा का उत्सव चार दिनों तक चलता है। पहले दिन की शुरुआत नहाय-खाय के साथ चतुर्थी के दिन से होती है। नहाय-खाय के दिन छठ व्रती कच्चा चावल यानी अरवा चावल को पकाकर कद्दू (लौकी या घिया) की सब्जी और दाल के साथ खाते हैं। यह खाना नहाने के बाद खाया जाता है। व्रती इसी प्रसाद रूपी खाने को फिर लगभग 12 घंटे बाद रात में खाते हैं।
इस दिन इस खाने का विशेष महत्व होता है। परिवार के सभी सदस्य व्रत धारण करने वाले व्यक्ति के प्रसाद ग्रहण करने के बाद ही भोजन को प्रसाद के रूप में खाते हैं। नहाय-खाय के दिन से ही सूर्य देव के लिए प्रसाद बनाने के लिए गेहूँ, चावल आदि को धोकर धूप में सुखाया जाता है और फिर इसे हाथ से पीसकर प्रसाद बनाया जाता है।
दूसरे दिन पंचमी को खरना होता है। जिसे पूजा का दूसरा और कठिन चरण माना जाता है। इस दिन व्रती निर्जला उपवास रखते हैं। मतलब पिछले दिन की रात से लेकर खरना के रात तक व्रती को लगभग 24 घंटे निर्जला रहना होता है। पूरे दिन बिना जलग्रहण किए उपवास रखने के बाद सूर्यास्त होने पर व्रती पूजा करते हैं और उसके बाद एक ही बार दूध और गुड़ से बनी खीर खाते हैं। यह खीर मिट्टी के चूल्हे पर आम के पेड़ की लकड़ी जलाकर तैयार की जाती है। इसके बाद से व्रती का करीब 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।
खरना के बाद तीसरे दिन षष्ठी को व्रती डूबते सूरज को अर्घ्य देते हैं। दिन भर घर में चहल-पहल का माहौल रहता है। इसी दिन व्रती ठेकुआ, खजूर, पूरी आदि बनाते हैं। फिर सभी व्रती सूप (डगरा) में नाना प्रकार के फल, ठेकुआ, खजूर, चावल के आटे के लड्डू और कई तरह की मिठाईयों के साथ तालाब या नदी पर जाकर पानी में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर आराधना करते हैं।
अंत में चौथे दिन यानि सप्तमी को सुबह सूर्योदय के समय भी सूर्यास्त वाली उपासना की प्रक्रिया को दोहराया जाता है। चौथे और अंतिम दिन छठ व्रती को सूर्य उगने के पहले ही फिर से उसी तालाब या नदी पर जाना होता है, जहाँ वे तीसरे दिन गए थे। इस दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर व्रती भगवान सूर्य से सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं और फिर परिवार के अन्य सदस्य भी सूर्यदेव को अर्घ्य देते हैं। इसके बाद विधिवत पूजा कर प्रसाद बाँट कर छठ पूजा संपन्न की जाती है। मतलब जो व्रती पंचमी की रात को दूध-गुड़ की खीर प्रसाद रूप में खाए थे और पानी पिए थे, वो फिर सप्तमी के दिन सुबह ही मुँह में पानी या प्रसाद जैसी कोई चीज ले सकते हैं – लगभग 36 घंटे नर्जला।
छठ पर्व में साफ-सफाई और पवित्रता का खासा ख्याल रखा जाता है। पूजा के चारों दिन उपवास के साथ नियम और संयम का पालन करना होता है। इस पूजा में कोरे और बिना सिले वस्त्र पहनने की परंपरा है।
चैती छठ में खासा धूम-धाम देखने को नहीं मिलता है। जबकि कार्तिक छठ में ज्यादा चहल-पहल होती है। ऐसा इसलिए क्योंकि कम ही व्रती चैती छठ करते हैं। गरमी के कारण कार्तिक छठ से ज्यादा मुश्किल होता है चैती छठ करना। 12 घंटे के बाद 24 घंटे और उसके बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत रखना गरमी के समय आसान नहीं होता। इस वजह से कार्तिक छठ की अपेक्षा चैती छठ करना थोड़ा सा मुश्किल हो जाता है।
केरल नन रेप केस मामले में पुलिस की विशेष जाँच दल (एसआईटी) ने आरोपित फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दिया है। जाँच टीम के प्रमुख पुलिस महानिरीक्षक विजय साखरे ने कहा है कि बिशप फ्रैंको मुलक्कल पर 2014 से 2016 के बीच कई बार बलात्कार करने का आरोप है। ऐसे में अगर आरोप सिद्ध हुआ तो बिशप को उम्रकैद तक की सजा का सामना करना पड़ सकता है।
Kerala nun-rape case: Special Investigation Team of Kerala Police files charge sheet against rape accused Franco Mullakal pic.twitter.com/sCxosg9rfZ
जाँच दल की ओर से दाखिल आरोप पत्र में 83 गवाहों के बयान शामिल हैं, जिसमें एक कार्डिनल, तीन बिशप, 11 प्रीस्ट और 25 नन शामिल हैं। बता दें कि बलात्कार और अप्राकृतिक यौन संबंध के आरोप में जालंधर के बिशप फ्रैंको मुलक्कल को गिरफ्तार भी किया गया था। कैथोलिक चर्च में यौन शोषण के खिलाफ आवाज उठाने के लिए ननों ने काफी कोशिश की है।
Chargesheet filed against Franco Mulakkal over the Nun rape and intimidation case. pic.twitter.com/ZgzehOWBqD
वहीं, विधायक पीसी जॉर्ज ने आरोपी बिशप का समर्थन करते हुए कहा कि जाँच अधिकारी फ्रैंको मुलक्कल को जबरदस्ती फँसाने की कोशिश कर रहे हैं। पीसी जॉर्ज ने कहा कि मेरे पास मुलक्कल के साथ नन के फोटो और वीडियो हैं, जो कि घटना वाले दिन ही क्लिक किए गए थे। उन्होंने कहा कि इन तस्वीरों में नन बिल्कुल खुश दिखाई दे रही है। पीसी जॉर्ज ने आगे कहा कि कानूनी बाध्यता होने के कारण वो ये तस्वीरें मीडिया के सामने नहीं दिखा सकते, लेकिन वो जाँच टीम के सामने ये सबूत प्रस्तुत करने के लिए तैयार हैं। इसके साथ ही विधायक ने जाँच अधिकारियों पर फोटोग्राफर को डराने का भी आरोप लगाया है।
गौरतलब है कि बीते दिनों पीड़ित नन के समर्थन में आईं 5 अन्य नन ने इंसाफ के लिए कई दिनों तक धरना-प्रदर्शन किया था। इनके समर्थन में आम लोग और कई अन्य संगठन भी प्रदर्शन में शामिल हुए थे। पूर्व बिशप फ्रैंको मुल्लकल के खिलाफ प्रदर्शन कर चुकीं 5 ननों ने कोट्टयम के पुलिस अधीक्षक (एसपी) से मुलाकात की थी। ननों ने उनसे कहा था कि ऐसी स्थिति पैदा न करें कि हमें दोबारा सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करना पड़े।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारास्वामी ने प्रधानमंत्री मोदी के ‘चेहरे की शाइन’ का ‘राजफाश’ किया है। उनके अनुसार इसके पीछे मोदी के चेहरे की रोजाना वैक्सिंग और मेकअप है। इसीलिए मीडिया कुमारास्वामी सहित बाकी नेताओं को टीवी पर नहीं दिखाता, और इसी कारण से भाजपा प्रत्याशी मोदी के चेहरे पर वोट माँगते हैं।
चुनावी सभा में छलका ‘दर्द’
कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमारास्वामी उत्तर बंगलूरु लोकसभा क्षेत्र में कॉन्ग्रेसी प्रत्याशी कृष्ण बी गौड़ा के समर्थन में चुनावी जनसभा को संबोधित कर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने यह कहा कि मोदी का चेहरा इसलिए चमकता रहता है क्योंकि रोज सुबह या किसी से मिलने से पूर्व उनका मेकअप और चेहरे की वैक्सिंग होती है। वहीं वह (और अन्य ‘आम’ नेता) एक बार सुबह नहा कर निकलते हैं तो फिर अगले दिन सुबह ही नहाते हैं। इसीलिए उनका चेहरा टीवी पर अच्छा नहीं लगता और मीडिया उन्हें दिखाना पसंद नहीं करता।
‘मोदी ₹80,000 का मशरूम खाते हैं, पहले काले थे’
यह पहली बार नहीं है जब मोदी के चेहरे के ‘ग्लो’ पर विपक्ष ने अपनी नाराजगी जाहिर की है। इससे पहले गुजरात के पिछले विधानसभा चुनावों (2017) के दौरान कॉन्ग्रेसी नेता अल्पेश ठाकोर ने भी मोदी के चेहरे की चमक पर हमला बोला था।
उन्होंने यह आरोप लगाया था कि मोदी ऐसे महंगे मशरूम मंगा कर खाते हैं जो ₹80,000 प्रति नग के पड़ते हैं, और मोदी ऐसे 5 मशरूम रोज़ खाते हैं। यानि उनके आरोप के अनुसार मोदी ₹4,00,000 के 5 मशरूम रोजाना खाते हैं। उन्होंने यह आरोप भी लगाया था कि मोदी पहले काले थे, और इन्हीं मशरूमों से वह गोरे हुए हैं।
भारत जैसे देश में अक्सर मत, धर्म, सम्प्रदाय आदि पर चर्चा और बहस देखना बहुत स्वाभाविक बात है। इसी क्रम में सरकार पर विपक्ष द्वारा आरोप भी लगाए जाते रहते हैं कि सम्प्रदाय और जातियों और समाज को तोड़ने में उसका हाथ रहता है। जब-जब वर्तमान सरकार पर इस प्रकार के आरोप कॉन्ग्रेस द्वारा लगाए गए, तब ऐसा प्रतीत होता है, मानो क़तील शिफ़ाई की ग़ज़ल पढ़ते हुए कॉन्ग्रेस कह रही हो ‘ले मेरे तजरबों से सबक़ ऐ मिरे रक़ीब, दो-चार साल उम्र में तुझ से बड़ा हूँ मैं।”
चाहे दैनिक सस्ते इंटरनेट को श्रेय दीजिए, नेहरू के समाजवाद को श्रेय दीजिए या फिर कंधे पर ढोकर भारत देश में कंप्यूटर ले आने वाले राजीव गाँधी को श्रेय दीजिए, मोदी सरकार के दौरान डिजिटल इंडिया खूब फला-फूला है। इसी का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर सब लोगों ने अपने अपने तरीके से जमकर किया है।
इसी डिजिटल क्रान्ति का एक नमूना ट्विटर पर आज फिर से ट्रेंड करने लगा और इस विचारधारा के अनुयायियों द्वारा द्वारा बेहद तत्परता से इस तस्वीर को बड़े स्तर पर फैलाया जा रहा है।
इस तस्वीर में किसी कुत्सित मस्तिष्क के रचनाकार ने भारत देश के संविधान के वास्तुकार कहे जाने वाले बाबा साहब अम्बेदकर के हाथों में चाबुक थमाया है और यह दर्शाया गया है कि वो बंधक बनाए गए हिन्दू देवताओं, राम और श्री कृष्ण को कोड़े (चाबुक) मार रहे हैं। निश्चित रूप से यह चित्र घृणित, उन्मादी मानसिकता की उपज से ज्यादा और कुछ भी नहीं है।
अक्टूबर 20, 2018 को ट्विटर पर बाबा साहब के नाम पर चल रहे एक ट्विटर यूज़र ने इस तस्वीर को पोस्ट किया था और आजकल चुनाव से ठीक पहले यह दुबारा शेयर की जा रही है। समाज को तोड़ने के लिए इस तरह के प्रपंच गढ़ने वाले लोग कौन हैं और उन्हें किसने शरण प्रदान की है? सेक्युलर देश में हिन्दुओं की आस्थाओं को निशाना बनाने के लिए इतना उतावलापन क्यों है? इस धर्म निरपेक्ष देश में हर दूसरे मुद्दे पर अक्सर हिन्दू आस्थाओं का अपमान करना क्यों इतना आसान है? कभी हिन्दुओं के त्योहारों का मजाक बनाया जाता है तो कभी त्रिशूल जैसे प्रतीकों का उपहास बनाया जाता है। क्या बाबा साहब का इस तरह से चित्रण करने वाले को यह आभास भी है कि उसकी इस घटिया हरकत पर खुद बाबा साहब कितने दुखी होते? क्या धार्मिक प्रतीकों द्वारा अपनी कुंठा की अभिव्यक्ति करने वाले जानते हैं कि बाबा साहब ने कहा था कि भविष्य में समाज को धर्म से ही नैतिकता सीखनी होगी?
इस तस्वीर को चुनाव से ठीक पहले सोशल मीडिया पर फैलाया जा रहा है, जिसका मकसद सिर्फ प्रायोजित तरीके से सामाजिक टकराव पैदा करना है
नवीन समाज में धर्म की आवश्यकता प्राचीन समाज से कहीं अधिक होगी: अम्बेदकर
अम्बेदकर के नाम पर अपनी घृणित विचारधारा को बेचने वालों को यह जानना आवश्यक है कि हालाँकि अम्बेदकर ने धर्म में निहित सामाजिक भेदभाव की निंदा की लेकिन वो धर्म को समाज का आधार मानते थे। अम्बेदकर एक ओर जहाँ इस बात से असहमत थे कि सभी धर्म अच्छे हैं, वहीं दूसरी ओर उनका विचार था कि धर्म जीवन के लिए अपरिहार्य है और सार्वजनिक जीवन में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
हमारे समय के सबसे बड़े संविधानवादी और विधिक सुधारक यानी, बाबा साहब के ही यह विचार थे, जिन्हें बहुत कम प्रकाश में लाया गया है। हिन्दू देवताओं का अपमान कर सामाजिक सद्भाव बढ़ाने वाले ‘विचारकों’ को जानना चाहिए कि यह बात भी उन्ही बाबा साहब ने ही कही है कि धर्म की आलोचना की जा सकती है लेकिन, उन्होंने धर्म को कभी खारिज नहीं किया और ना ही नकारा।
मार्क्स की तर्ज पर ही ‘मेरा कोई देश नहीं है’ कहने वाले अम्बेदकर के नाम पर हिन्दुओं को अपमानित करने वाले, सड़कों पर उपद्रव मचाने वाले और मनु स्मृति की फोटोकॉपी जलाने वाले शायद अम्बेदकर को वास्तव में नहीं जानते हैं, और यह भी निश्चित है कि उन्होंने मनु स्मृति की तरह ही अपने विचारों के पुरोधा को भी कभी नहीं पढ़ा है। महात्मा गाँधी से जब बाबा साहब ने ‘मेरा कोई देश नहीं है’ कहा था तो उनका तात्पर्य हमेशा श्रमिक से से होता था, यानि श्रमिक वर्ग का कोई देश नहीं होता। ठीक इसी तरह से उन्होंने समाज के किसी देवता के प्रति आस्था नहीं जताई थी, भले ही उन्होंने कभी हिन्दू प्रतीकों को कोड़े मारने के विचार को भी तवज्जो नहीं दी थी।
लेकिन, यह श्रमिक आधुनिक है। इस प्रकार के चित्रण द्वारा अपने मन का द्वेष निकालने वाले ये श्रमिक मात्र अपनी घृणा को कागज पर रख रहे होते हैं। वास्तव में वे एक ऐसा वर्ग तैयार करना चाहते हैं, जो उनकी इसी विचारधारा को युगों तक सराहे, जो बाबा साहब जैसे किसी नाम से जन्म लेकर किसी दुराग्रही की रचनात्मकता के नाम से बाजार में बेची जा सके।
आर्य-अनार्य सिध्दांत से लेकर आरक्षण तक के मूल में कॉमन क्या है?
भारत देश की आज़ादी के संघर्ष में सबसे देर से कूदने वालों में से एक नाम बाबा साहब अम्बेदकर का भी था। आरक्षण जैसी दलीलों के वक़्त कॉन्ग्रेस द्वारा अम्बेदकर से अक्सर यह प्रश्न भी किए गए कि वो भारतीय जनमानस को आखिर कितना समझते हैं? यह वो समय था जब आरक्षण जैसी कमजोर कड़ी को ब्रिटिश हुकूमत ने भाँप लिया था। इस समाज में वर्तमान में दलित और सवर्ण की लड़ाई में मेनस्ट्रीम मीडिया ने बड़े स्तर पर झोंके का प्रयास किया है। कॉन्ग्रेस अक्सर दावे करती है कि सामाजिक एकता को तोड़ने और वोट बैंक की खातिर होने वाले दंगे अक्सर सरकार द्वारा प्रायोजित होते हैं। लेकिन हिन्दू धर्म के भीतर ही इतने बड़े बँटवारे को हवा मात्र एक दिन में ही नहीं दी गई। इसके लिए मैक्समूलर के सिद्धांतों, आर्य-अनार्य सिद्धांत से लेकर बाबा साहब अम्बेदकर को इस विभाजन का पूरा श्रेय दिया जा सकता है। हालाँकि, भीमराव अम्बेदकर को इतने बड़े विभाजन के लिए मैक्समूलर जितना जिम्मेदार इसलिए भी नहीं ठहराया जाना चाहिए क्योंकि अक्सर बाबा साहब के विचारों का सही तरह से जनता और समाज तक प्रतिपादन ही नहीं किया गया।
अम्बेदकर की ‘फिलाॅसफी ऑफ़ हिन्दुइज़्म’ में भी धर्म मानव जीवन का मूल हिस्सा था
वर्तमान समय में दलितों के सबसे बड़े चिंतक माने जाने वाले अम्बेदकर ने 1950 में लिखे अपने लेख ‘फिलाॅसफी ऑफ़ हिन्दुज़्म’ (हिंदुत्व का दर्शन) में लिखा था कि धर्म, मानव समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा इसलिए है, क्योंकि वह मानव जीवन के आधारभूत प्रश्नों से जुड़ा हुआ है, जिनमें जन्म और मृत्यु, भोजन और रोग आदि शामिल हैं। इसमें बाबा साहब ने प्रकाश डालते हुए नवीन और प्राचीन समाज में धर्म की आवश्यकता के विवरण पर लिखा था, “आधुनिक समाज को पुरानी दुनिया की तुलना में धर्म की कहीं अधिक जरूरत है।’’ उनका तात्पर्य था कि नैतिकता के रूप में धर्म, आधुनिकता की जरूरत हमेशा है। शायद इसी वजह से उन्होंने बौद्ध धर्म भी स्वीकारा।
क़ानून समाज को बदलने के लिए काफी नहीं: अम्बेदकर
अम्बेदकर का कहना था कि आधुनिक समाज को धर्म की जरूरत इसलिए है, क्योंकि विधि यानी, कानून, जो कि व्यवस्थाओं का संकलन है और जिसमें हम आधुनिक लोग बहुत अधिक विश्वास करते हैं, समाज को बदलने के उपकरण के रूप में अप्रभावी और अविश्वसनीय है। अम्बेदकर ने लिखा था, ‘‘कानून का उद्धेश्य अल्पसंख्यकों को सामाजिक अनुशासन के दायरे में रखना है। बहुसंख्यकों को तो नैतिकता के सिद्धांतो के आधार पर अपने सामाजिक जीवन का संचालन करने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए और छोड़ देना पड़ता है। इसलिए नैतिकता के अर्थ में धर्म, हर समाज का शासी सिद्धांत होना चाहिए।‘‘
क्या मनुस्मृति जला देने से सामाजिक बराबरी हासिल की जा सकती है?
मनुस्मृति जलाकर और हिन्दू आस्थाओं को ठेस पहुँचाकर अल्पकालिक रोष व्यक्त करते हुए अक्सर दलित समाज भूल जाता है कि वह कोई बड़ा परिवर्तन नहीं ला रहे हैं बल्कि इस अंतराल को और बढ़ा रहे हैं। जिस भीमराव अम्बेदकर का हवाला देकर अक्सर हिन्दू देवी देवताओं का अपमान करने वाले आगे बढ़ रहे हैं, उन बाबा साहब के विचार पढ़े जाने चाहिए। अम्बेदकर के अनुसार, “जहाँ तक मेरा संबंध है, मेरे विचार से इस मत का अनुसरण करके आगे बढ़ना उचित होगा कि यदि किसी भी आंदोलन अथवा संस्था का दर्शन जानना है, तब उस संस्था और आंदोलन के अंतर्गत जो क्रांतियाँ आई हैं, उनका आवश्यक रूप से अध्ययन किया जाए। क्रांति दर्शन की जननी है, चाहे उसे दर्शन की जननी न भी माना जाए, फिर भी वह ऐसा दीप है, जो दर्शन को प्रकाशयुक्त बनाता है। धर्म भी इस नियम का अपवाद नहीं हो सकता। इसलिए मेरी दृष्टि से सबसे अच्छा तरीका यही है कि यदि हम किसी धर्म के दर्शन का मूल्यांकन करना चाहते हैं और इसके लिए कोई कसौटी निश्चित करना चाहते हैं, तब उस धर्म में जो क्रांतियाँ आई हैं, उनका अध्ययन करें। यही एक तरीका है, जिसे मैं अपनाना चाहता हूँ।”
सभ्य समाज में नैतिकता को धर्म के कारण पवित्रता प्राप्त होती है: अम्बेदकर
अम्बेदकर के शब्दों को मैं हूबहू रख रहा हूँ, ताकि उन्हें उन्हीं के शब्दों में पढ़कर समझा आ सके। धर्म और नैतिकता पर अम्बेदकर ने लिखा, “धर्म में ईश्वर की कल्पना का उदय कब और कैसे हुआ, यह कहना संभव नहीं है। यह तो हो सकता है कि ईश्वर की कल्पना का मूल समाज के महान व्यक्ति की पूजा में हो, जिससे मनुष्य की जीवित ईश्वर में श्रद्धा का, यानि किसी सर्वश्रेष्ठ को देखकर ईश्वर मानने के आस्तिकवाद का उदय हुआ होगा। यह हो सकता है कि ईश्वर की कल्पना, यह जीवन किसने बनाया है, जैसे दार्शनिक विचार के फलस्वरूप अस्तित्व में आई होगी, जिससे एक सृष्टि के निर्माणकर्ता के रूप में, उसे बिना देखे मानने से ईश्वरवाद का उदय हुआ होगा। धर्म और नैतिकता का संबंध कैसे स्थापित हुआ। यह संबंध धर्म और ईश्वर के बीच स्थापित संबंध से भी अधिक स्वाभाविक और दृढ़ है, परंतु फिर भी धर्म और नैतिकता, इन दोनों का मिलन नियमित रूप से कब हुआ, यह बताना कठिन है। चाहे कुछ भी हो, यह वस्तु स्थिति है कि सभ्य समाज का धर्म और आदिम समाज का धर्म दो महत्त्वपूर्ण कारणों से भिन्न-भिन्न हैं। सभ्य समाज में ईश्वर का धर्म की योजना में समावेश है। सभ्य समाज में नैतिकता को धर्म के कारण पवित्रता प्राप्त होती है।”
इस तरह के विवादित चित्र देखकर पता चलता है कि भीमराव अम्बेदकर को हम सबने कितने गलत तरीके से पढ़ा है। हमने उनके नाम पर समाज को सवर्ण और दलित के टकराव में झोंका है। हमने अम्बेदकर की गलत व्याख्या करने का मार्ग चुना है, उनके नाम पर भड़क कर सड़कों पर अराजकता फैलाई है। पवित्र मानकों को अपमानित कर एक बड़े हिस्से को ठेस लगाकर हम बाबा साहब अम्बेदकर के दोषी बन चुके हैं।
समाज में जाति के नाम पर होने वाले दंगों के बारे में देश की सबसे प्राचीन पार्टी कॉन्ग्रेस की मानें तो यह सब नेताओं द्वारा कराया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि दलित आंदोलन, साम्प्रदायिक हिंसाएँ, ये सब एक तरह से काँग्रेस ने फिरौती की तरह इस्तेमाल की हैं, जिसे वो अपने वोट बैंक से उन्हें सत्ता न सौंपने के जुर्म में वसूलती है। वर्ष 2018 में देखा गया कि अप्रैल के माह बड़े स्तर पर उत्पात और अराजकता फैलाई गई और दोष सरकार पर थोपने के प्रयास किए गए। कॉन्ग्रेस नेताओं ने मौका तलाशकर धरना और अनशन किया, शाम होते ही जमकर दावत उड़ाने की खबरें सोशल मीडिया पर पढ़ने को मिलीं। अनशन के नाम पर छोले-भटूरे उड़ाने वाले कॉन्ग्रेस के नेताओं की तस्वीरें वायरल हुई।
इस तरह से कॉन्ग्रेस के भीतर महात्मा गाँधी आज भी विद्यमान देखे गए, लेकिन कारण इस बार भिन्न थे! एक बापू थे, जिन्होंने जब अनशन किया था तो अंग्रेजों के हाथ-पाँव फूल गए थे, और एक ये कॉन्ग्रेस के नेता भी थे, जिनके अनशन से उनके अपने ही पेट फूल गए थे। देश काल वातावरण कुछ भी हो, कॉन्ग्रेस हमेशा गाँधी के नाम को प्रासंगिक कर ही देती है।
हिन्दुओं की आस्थाओं को ठेस लगाना नहीं है विकल्प
दलित समाज के अग्रणी नेता अक्सर उस संविधान के खिलाफ शहर जला देते हैं, जिसे बाबा साहब अम्बेदकर ने लिखा था। खुद को दलित समर्थक बताकर अपनी आवश्यकतों के अनुरूप बाबा के विचारों को मानना और फिर उनका तिरस्कार करना भी समाज की आस्थाओं का अपमान है। दंगे करना, आग लगाना, शहर जलाना समाधान नहीं है, ना ही सोशल मीडिया पर हिन्दू देवताओं को कोड़े मारने जैसी विकृत मानसिकता से बदलाव आ सकेगा। बाबा को मानने वालों को जानना चाहिए कि ऐसा करना संविधान का अपमान है, वही संविधान जिसके वास्तुकार स्वयं बाबा साहब हैं।
शोषण के मूल को ही जड़ से मिटा दिया जाना एक अच्छा विकल्प हो सकता है, हमें वो जातियाँ सरेंडर कर देनी चाहिए जिनके नाम पर हम कभी आरक्षण लेते हैं, तो कभी विक्टिम कार्ड खेलकर शहर और कस्बों को जला देते हैं। सरकारी काम-काज में जाति वाले कॉलम को छोड़ देने पर परिवर्तन का पहला कदम कहा जा सकता है। वैसे भी संविधानवाद के बावजूद भी वर्ण और जाति व्यवस्थाएँ संविधान का खुला उपहास है और यह संविधान के अस्तित्व को आधारहीन बना देता है।
ऐसा किया जाना जरुरी है, ताकि देश का प्रथम नागरिक भी आजादी के वर्षों बाद भी अपनी जाति के बजाए अपनी योग्यता और पद से पहचाना जा सके, UPSC में नाम लाने वालों को उनकी उपलब्धि के लिए पहचान मिल सके, वरना हमेशा डिबेट का केंद्र संघर्ष से बदलकर जाति में ही तब्दील होता रहेगा। ये उसी तरह की क्रान्ति है, जिसके बारे में बाबा साहब अपनी पुस्तक में लिख चुके हैं। जो परिवर्तन इतने वर्ष नहीं आया, वो किसी घृणित चित्रण को वायरल कर के नहीं बल्कि इस प्रकार के समाधानों से ही आ सकेगा।