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झूठ, प्रपंच और प्रलाप से भरा है कॉन्ग्रेस का नया घोषणापत्र, अपने निकम्मेपन को स्वीकारा पार्टी ने

कॉन्ग्रेस पार्टी का घोषणापत्र जारी किया जा चुका है। जैसा कि राहुल गाँधी के बारे में प्रचलित है, वो अक्सर झूठ बोलते हैं और अपने आँकड़ों को रह-रह कर बदलते रहते हैं। इसीलिए इस बार आलोचकों को पहले ही चुप कराने के लिए राहुल गाँधी ने पहली ही कह दिया कि उनके घोषणापत्र में झूठ के लिए कोई जगह नहीं है। असुरक्षा की भावना से घिरे राहुल गाँधी ने पहले ही इसका जिक्र कर दिया, क्योंकि उन्हें पता था कि उनके झूठ को पकड़ लिया जाएगा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर रोज बड़ी संख्या में झूठ बोलने का आरोप लगाया। राहुल ने कहा कि उन्होंने घोषणापत्र तैयार करने वाले लोगों को पहले ही कह दिया था कि इसमें लिखी हर एक बात सच्चाई से भरी होनी चाहिए, इसमें झूठ के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

आख़िर क्या कारण है कि राहुल गाँधी को लोगों को ये भरोसा दिलाना पड़ रहा है कि उनके घोषणापत्र में झूठ नहीं है? क्या वजह है कि राहुल को चीख-चीख कर यह बताने की ज़रूरत पड़ गई कि वो नहीं बोलते, उनकी पार्टी झूठ के आधार पर कार्य नहीं करती और उनके घोषणापत्र में लिखी बातें सच है, झूठ नहीं है? अब इससे आगे बढ़ते हैं। इसके अल्वा राहुल गाँधी ने कहा कि किसानों के लिए अलग बजट की व्यवस्था की जाएगी। लेकिन, राहुल गाँधी का यह वादा खोखला है, क्योंकि इसके लिए उन्होंने किसी प्रकार के रोडमैप का जिक्र नहीं किया। किसानों के लिए अलग बजट का वादा करने वाले राहुल गाँधी को जानना चाहिए कि रेलवे बजट को आम बजट में क्यों मिला दिया गया?

पहली बात, रेलवे बजट को ब्रिटिश राज के समय अलग से इसीलिए पेश किया जाता था क्योंकि उस वक्त देश की जीडीपी का सबसे बड़ा हिस्सा रेलवे पर ही निर्भर था। उस समय पूरे बजट का 84% हिस्सा रेलवे का ही हुआ करता था। रेलवे बजट को आम बजट में मिलाने से संसद का समय भी बचा। दूसरी बात, अलग बजट की स्थिति में कृषि क्षेत्र के लिए अलग बजट बनाने से अलग-अलग ‘Appropriation Bill’ बनाना पड़ेगा। रेलवे बजट के दौरान इसे तैयार करने में समय जाया हो जाता था। ये बात एक सरकारी कमेटी ने भी स्वीकारी थी। इसके अलावा आम बजट का आकार घट जाएगा, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं होगा। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राजग सरकार ने पहले ही कृषि क्षेत्र को मिलने वाले बजट के हिस्से में तीन गुना से भी अधिक की बढ़ोतरी की है, अतः, राहुल का वादा वास्तविकता से परे है।

अब एक ऐसे सवाल पर आते हैं, जिससे कॉन्ग्रेस भाग नहीं सकती। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में हुए विधानसभा चुनावों ने पार्टी ने किसानों की क़र्ज़माफ़ी को बड़ा मुद्दा बनाया था और तीनो राज्यों में पार्टी की सरकार भी बनी। इसके बाद असली तमाशा शुरू हुआ, जिसमे पता चला कि क़र्ज़माफ़ी सिर्फ़ एक शिगूफ़ा था, जिसके लिए न तो कोई रोडमैप था और न ही कोई योजना। मध्य प्रदेश में आचार संहिता लागू होने से पहले ही उसका बहाना बनाकर किसानों को कहा आज्ञा कि क़र्ज़माफ़ी में देरी होगी। इसके अलावा कई किसानों का 1 रुपया का क़र्ज़ माफ़ किया गया। बाद में यह भी पता चला कि मार्च 2018 से अब तक, यानि एक वर्ष का ब्याज किसानों को ख़ुद देना पड़ेगा।

कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र में क़र्ज़माफ़ी का जिक्र क्यों नहीं है? क्या कॉन्ग्रेस नई यह मान लिया है कि क़र्ज़माफ़ी फेल हो गई है? अगर नहीं, तो अच्छी योजनाओं को आगे बढ़ाया जाता है, उनपर और अधिक कार्य किया जाता है, उसे लेकर जनता के बीच जाया जाता है। कॉन्ग्रेस ऐसा करने से बच रही है। यह दिखाता है कि जिस मुद्दे को कॉन्ग्रेस ने अपना सबसे बड़ा मुद्दा बनाया था, उसपर अब ख़ुद उसे ही भरोसा नहीं रहा। या तो वो असफल हो गई है, नहीं तो पार्टी को उसकी वास्तविकता या धरातल पर उतरने की संभावना पर विश्वास नहीं रहा। कॉन्ग्रेस को जवाब देना पड़ेगा कि अगर क़र्ज़माफ़ी सफल हुई है तो उसे अपने घोषणापत्र में क्यों नहीं शामिल किया गया है?

कॉन्ग्रेस ने जॉब क्रिएशन पर कहा है कि ऐसे व्यापार जो जॉब्स पैदा करेंगे, उन्हें इफेक्टिव बेनिफिट देकर पुरस्कृत किया जाएगा। लेकिन, प्रधानमंत्री मोदी की ब्रेनचाइल्ड ‘स्टार्टप इंडिया’ और ‘मुद्रा योजना’ यही काम कर रही है। इंस्पेक्टर राज को ख़त्म करने के कारण नई कंपनियों का रजिस्ट्रेशन आसान हो गया है और लोगों को अपनी कम्पनी खोलकर अन्य लोगों को जॉब्स देने प्रोत्साहित किया जा रहा है। छोटे उद्योगों को बढ़ावा देने और स्किल डेवलपमेंट के लिए प्रोग्राम्स चल रहे हैं। ऐसे में, डायरेक्ट टैक्स बेनिफिट का कोई तुक नहीं बनता क्योंकि स्टार्टअप्स के लिए पहहले से ही टैक्स वगैरह में छूट का प्रावधान मोदी सरकार ने कर रखा है।

सिर्फ़ ’20 लाख जॉब्स दे देंगे’ कहने या लिख देने से जॉब्स पैदा नहीं हो जाते, उसके लिए आपको कुछ रोडमैप देना पड़ता है। इस मामले में कॉन्ग्रेस का घोषणापत्र फिसड्डी है और एक-एक लाइन की हज़ारों दावों और वादों की झड़ी है, अजय देवगन के ‘हिम्मतवाला’ की वन-लाइनर्स की तरह। इसमें वो सबकुछ है, जिसके बारे में कॉन्ग्रेस पार्टी ने पाँच दशक तक सोचा भी नहीं। साथ ही नेशनल सिक्योरिटी पर कॉन्ग्रेस ने एनएसए के पर कतरने की योजना भी बनाई है। एनएससी और एनएसए जैसी संस्थाएँ और पद संवेदनशील होते हैं, इसके कई क्रियाकलाप सीक्रेट होते हैं। ऐसे में, उसे नेताओं के बीच उतार देना क्या उचित होगा?

इसके अलावा पार्टी ने आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट, 1958 (AFSPA) में भी संशोधन करने की बात कही है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह ख़ुद इससे छेड़छाड़ करने के विरोधी रहे हैं, ऐसे में क्या ऐसे संवेदनशील एक्ट में संशोधन कर भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को पंगु बना दिया जाएगा? राष्ट्रीय सुरक्षा पर कॉन्ग्रेस का घोषणापत्र असंवदेनशील है, सुरक्षा से खिलवाड़ करने वाला है, एनएसए जैसे अधिकारियों को नेताओं के बीच खड़ा करने वाला है और मानवाधिकार की आड़ में सुरक्षा बलों को पंगु बनाने वाला है। यह भ्रामक है, चंद वोटों के लिए बिना किसी अध्ययन के हड़बड़ी में तैयार किया गया है। कॉन्ग्रेस ने मानवाधिकार के साथ यौन हिंसा का जिक्र कर सुरक्षा बलों को कठघरे में खड़ा करने का कार्य किया है।

कॉन्ग्रेस के मैनिफेस्टो में सुरक्षा बलों को लेकर भ्रामक बातें

विदेश नीति पर कॉन्ग्रेस के मैनिफेस्टो में कुछ भी नया नहीं है। इसमें वही सब बातें कही गई है, जिनपर कॉन्ग्रेस पिछले कार्यकालों में नाकाम रही और जिनपर मोदी सरकार द्वारा आगे बढ़ा जा रहा है। हाँ, कॉंग्रेसने शरणार्थी क़ानून को अंतरराष्ट्रीय संधियों के हिसाब से डिज़ाइन करने की बात कही है। इसपर सवाल उठ सकता है कि क्या अंतरराष्ट्रीय संधियों का आँख बंद कर के पालन करने के चक्कर में रोहिंग्या आतंकियों को भी शरणार्थी बना दिया जाएगा क्या? यह भाजपा सरकार की एनआरसी से कॉन्ग्रेस की घबराहट को दिखाता है। शरणार्थी क़ानून में क्या बदलाव किए जाएँगे और इसे कैसे डिज़ाइन किया जाएगा, इसपर ज्यादा कुछ नहीं कहा गया है।

रवीश कुमार जी वाह! KFC में बैठकर शाकाहार पर प्रवचन…

देसी और विदेशी भाषाओं में अपने फेसबुक पोस्ट का दैनिक अनुवाद करवाने के कारण देश और दुनिया में पत्रकारिता के सबसे बड़े मापदंड बन चुके सबसे निष्पक्ष पत्रकार और कॉन्ग्रेस नेता बृजेश पांडे के भाई श्री रवीश कुमार जी राष्ट्रीय चर्चा बने रहना खूब जानते हैं। रवीश कुमार पिछले दिनों ‘द वायर’ के स्टूडियो में बैठकर निष्पक्षता, गोदी मीडिया और एजेंडा पत्रकारिता पर चर्चा कर रहे थे तो लग रहा था, जैसे KFC रेस्टोरेंट में बैठकर शाकाहार पर प्रवचन कर रहे थे। ये मीडिया गिरोह की टुकड़ी वही ‘द वायर’ है, जो हर दूसरे दिन अपने ही देश को नीचा दिखाने वाले या फिर ‘हिंदू फोबिया’ से ग्रस्त आर्टिकल लाकर पब्लिसिटी बटोरता है, और फ़र्ज़ी आर्टिकल लिखकर लोकतंत्र का प्रहरी बनने की कोशिश करता है।

दिलचस्प बात ये है कि द वायर के फाउंडर सिद्धार्थ वर्धराजन भारत के नहीं बल्कि अमेरिका के नागरिक हैं और इनकी पत्नी हैं नंदिनी सुंदर। वही नंदिनी सुंदर, जिस पर छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की हत्या का केस चल रहा था। हालाँकि, कॉन्ग्रेस की सरकार बनने के बाद सरकार ने वहाँ से वापस ले लिया था। उसी ‘द वायर’ के स्टूडियो में बैठकर रवीश कुमार निष्पक्षता पर नीति वचन सुना रहे थे और अक्सर अपने प्राइम टाइम शो में भी ‘द वायर’ की तारीफ करते देखे जाते हैं। वैसे यह तथाकथित लिबरल लॉबी का पुराना गुण है, जिसमें वह खुद एक दूसरे की तारीफ करते रहते हैं कि तुम मेरी तारीफ करना और बदले में समय आने पर मैं तुम्हारी तारीफ कर दूँगा, फिर दोनों फेमस हो जाएंगे। नॉट सो?

निष्पक्ष रविश कुमार और तथाकथित गोदी मीडिया

रवीश कुमार तथाकथित गोदी मीडिया जैसे बिल्कुल नहीं हैं, वह कभी साम्प्रदायिक बातें नहीं करते हैं, बल्कि वह तो हर समय अगड़ा-पिछड़ा ब्राह्मण-दलित करते रहते हैं। पिछले दिनों रवीश कुमार के वैचारिक साझेदारों ने तो पूरा रिकॉर्ड तोड़ दिया था। पुलवामा हमले में बलिदान हुए देश के जवानों के चिता की अग्नि अभी शांत भी नहीं हुई थी, तभी इन लोगों ने यह जानने की कोशिश शुरू कर दी थी कि कौन जवान किस जाति का है। वास्तव में रवीश कुमार हिंदू-मुस्लिम भी करते हैं, लेकिन उसकी एक शर्त है और वो ये कि जब कभी कोई हिंदू धर्म के विषयों की बात आए तो रवीश कुमार पर्यावरण पर चिंता जाहिर करते हैं।

उदाहरण के लिए इखलाक कांड पर रवीश कुमार जी बहुत विचलित हुए थे। लेकिन डॉ. नारंग हत्याकांड, दिल्ली के अंकित सक्सेना हत्याकांड, पश्चिम बंगाल में मालदा और हावड़ा के हिंदू विरोधी दंगे और तत्कालिक रामालिंगम द्वारा धर्म परिवर्तन ना करने पर जिहादी तत्वों द्वारा हत्या कर दिए जाने पर रवीश कुमार साइलेंट मोड में चले जाते हैं। अगर मजबूरन उस दिन उन्हें प्राइम टाइम करना भी हो, तो उस दिन उनकी रिपोर्टिंग का अंदाज़ ही जुदा हो जाता है, इस समय उन्हें पर्यावरण या गरीबी याद आ जाती है। ऐसे मौकों पर ‘बागों में बहार है?’ पूछने वाले रवीश कुमार ‘मैं ना बोलूँगा’ वाले सिद्धांत पर ही काम करते हैं।

रवीश कुमार और उनके लॉबी के दूसरे पत्रकार अपने एजेंडावादी पत्रकारिता के बचाव में कहते हैं, कि पत्रकार का काम है सरकार से सवाल करना। यह सही है कि भारत की जनता भोली-भाली है, लेकिन उसकी याददाश्त इतनी भी कमजोर नहीं है। कसम नीरा राडिया टेप केस की, 2014 से पहले रवीश कुमार कितना सरकार से सवाल पूछते थे? उस पर कुछ ना बोला जाए तो ही अच्छा है। वास्तव में 2014 में देश में मोदी सरकार बनते ही रवीश कुमार का जो कंफर्ट जोन था वह खत्म हो गया। आराम से स्टूडियो में बैठकर ‘कौन जात हो भाई?‘ वाला पत्रकारिता का मॉडल फेल हो गया और इसीलिए 2014 के पहले जो रवीश कुमार कहते थे बागों में बहार है, अब वह उजड़ा चमन में बदल चुके हैं। उस पर बौखलाहट का एक और कारण ये कि अब लगभग हर दर्शक के हाथ में इंटरनेट की सुविधा वाला मोबाइल फोन है,और वे प्रतिक्रिया करना चाहते हैं इसी वजह से सभी रवीश कुमार के दोहरे मापदंड वाली पत्रकारिता पर प्रश्न करते हैं।

निष्पक्ष रवीश

वैसे तो यह लाइन ‘निष्पक्ष रवीश’ ‘मीठा नमक’ और ‘खट्टा चीनी’ के समान विरोधाभासी शब्द लग रहा है और वास्तव में सच्चाई भी यही है। रवीश कुमार आजकल एक बात करते हैं कि सरकार राष्ट्रवाद के नाम पर मूल मुद्दों से ध्यान हटा रही है। पहली बात, दुनिया के जितने भी देश हैं उनके लिए राष्ट्रीय सुरक्षा उनका मूल मुद्दा होता है लेकिन, भारत में इससे क्यों बचा जा रहा है? उसका एक कारण है क्योंकि राष्ट्रवाद विपक्षी पार्टियों के लिए दुखती नस के समान है। राष्ट्रवाद की बात जब भी आएगी, लोगों को ध्यान में आने लगेगा JNU कांड के समय बिना कुछ सोचे समझे राहुल गाँधी का और अरविन्द केजरीवाल का JNU में चला जाना, मणि शंकर अय्यर के कुंठित बयानों की तो लंबी लिस्ट है ही, इसके अलावा संदीप दीक्षित द्वारा आर्मी चीफ को सड़क का गुंडा बताना, संजय निरूपम द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक को फर्जीकल स्ट्राइक बताना। यही हाल अधिकांश राजनीतिक दलों का है। इसीलिए राष्ट्रवाद के मुद्दे से वह चुनाव में बचना चाहेंगे क्योंकि राष्ट्रवाद का जहाँ नाम लिया जाएगा, उतना ही जनता इन पार्टियों खिलाफ भड़केगी। इसलिए कॉन्ग्रेस सहित विपक्षी पार्टियाँ और उनके प्रति सहानुभूति रखने वाले पत्रकार भी राष्ट्रवाद के मुद्दे से भागने की कोशिश करते हैं।

रवीश कुमार आजकल बेरोजगारी की बात करते हैं। UP में जब 2017 में बीजेपी की सरकार बनी तो स्लॉटरहाउस (बूचड़खाने) सख्ताई से बंद किए जाने लगे। जिसके कारण लखनऊ के टुंडे कबाब की दुकान एक-दो दिन के लिए बंद हो गई, फिर क्या था! देश में कोहराम मच गया। रवीश कुमार और उनके लॉबी के पत्रकार और बुद्धिजीवी हो-हल्ला मचाने लगे कि सरकार लोगों के रोजगार छीन रही है। जीरो लॉस थ्योरी के प्रवर्तक कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने तो यहाँ तक कहा कि मोदी सरकार भारत का संस्कृति खत्म कर रही है। टुंडे-कबाब की दुकान के बंद होने से यह बात भी खत्म हो गई।

टुंडे-कवाब का रोजगार बंद हो जाने के कुछ समय बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक इंटरव्यू में स्वरोजगार का जिक्र करते हुए पकौड़ा बनाने वाले का उदाहरण दिया था। बुद्विजीवी गिरोहों में एक बार फिर कोहराम मच गया। रवीश कुमार और उनके लॉबी के पत्रकार प्रधानमंत्री के बयान का मजाक उड़ाने लगे कि पकोड़े तलने का बयान कैसे दिया। तब मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ है कि यह वही लोग थे जो टुंडे-कबाब को बोल रहे थे कि यह लोगों का रोजगार है, लेकिन पकोड़े के ऊपर मजाक उड़ा रहे हैं। बहुत देर बाद में समझ में आया शायद अंतर कबाब और पकोड़े के नेचर में हैं। असल में कबाब सेक्यूलर है और पकौड़ा कम्युनल, इसीलिए यह लोग कबाब बेचने को तो रोजगार मानते हैं, लेकिन पकौड़ा बेचने पर व्यंग्य कस रहे हैं। रोजगार पर याद आया कि मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस की सरकार रोजगार के ऊपर बहुत अच्छे कार्य कर रही है, जैसे पशुओं को चराना। इसके अलावा शादियों में बैंड बाजा बजाना। रवीश कुमार जी ने पता नहीं इसके ऊपर कोई प्रोग्राम किया या नहीं?

इसके अलावा रवीश कुमार आजकल भारत की अर्थव्यवस्था पर भी काफी दिलचस्पी लेने लगे हैं। और खासकर 2014 के बाद से। यह वही रवीश कुमार और उनकी लिबरल लॉबी है, जिसने अभी डेढ़ साल पहले रेटिंग एजेंसी मूडीज द्वारा भारत की तारीफ करने पर मूडीज की प्रासंगिकता पर ही सवाल खड़ा कर दिया था। वह इतने पर ही नहीं रुके। चूँकी ‘मूडीज’ ने मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत की आर्थिक नीतियों की तारीफ कर डाली थी, इसलिए ‘मूडीज’ को दंड भी देना था। लेकिन मूडीज कोई व्यक्ति विशेष तो है नहीं, यह तो एक संस्था है। लिबरल गिरोह में संकट फ़ैल गया कि अब किसे सजा दी जाए, तो यह तथाकथित बुद्धिजीवियों के लिबरल समर्थक ऑस्ट्रेलिया के क्रिकेट खिलाड़ी ‘टॉम मूडी’ को जा कर गाली दे रहे थे। शायद इस आधार पर कि रेटिंग एजेंसी मूडीज और टॉम मूडी का नाम समान है। यह तो इनके लिबरल समर्थकों का बौद्धिक स्तर। मूल बात थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में रेटिंग एजेंसी मूडीज द्वारा भारत की तारीफ होने पर यह लोग उसकी प्रासंगिकता पर भी सवाल खड़े कर देते हैं। वहीं अगर किसी छोटे-मोटे छुटभैय्या अर्थशास्त्री या पेड कॉमेडियन द्वारा अगर मोदी की किसी नीति से असहमति या फिर आंशिक विरोधी हो, तो उसपर मीडिया का यही समुदाय विशेष आसमान सर पर उठा लेता है।

देश बाद में, पहले एजेंडा

फरवरी 2019 में हुए पुलवामा आतंकी हमले के समय भी रवीश की रिपोर्टिंग अपने एजेंडे पर ही चल रही थी। जब देश के 40 से अधिक जवान बलिदान हो गए हों, उस देश में सबका आक्रोशित होना स्वभाविक है। उसके उपरांत सामान्य देशवासी सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे थे। उसे रवीश कुमार ने उन्माद बताया। जब 6 फुट का CRPF का जवान अपने घर 200 ग्राम के मांस के बंडल में पहुँच रहा है, उसकी स्थिति को देखकर जो लोग दुखी हैं, उनको रवीश कुमार अपने प्राइम टाइम में उन्मादी बता रहे हैं। इस पर तो कुछ बोलना ही शेष नहीं रह जाता और यह वही रवीश कुमार हैं, जो JNU कांड के समय अफजल गुरु का फोटो लेकर नारे लगाने वालों के बचाव में अपनी स्क्रीन काली कर रहे थे।

इसके बाद IAF द्वारा बालाकोट एयर स्ट्राइक की घटना के बादविंग कमांडर अभिनंदन का पाकिस्तान के द्वारा पकड़े जाने के बाद देश में बहुत सारे लिबरल खुश हुए थे। इनका मानना था कि अगर लोकसभा चुनाव तक विंग कमांडर अभिनंदन की वतन वापसी नहीं होती है तो विपक्ष और मीडिया गिरोह के लिए यह बड़ी जीत थी क्योंकि मोदी सरकार को घेरने के लिए इसी मीडिया गिरोह ने ’56 इंच की सरकार’ पर खूब कटाक्ष किया था। लेकिन भारत सरकार की वैश्विक कूटनीति ने अपना असर दिखाया। पाकिस्तान को मात्र 72 घंटे के अंदर विंग कमांडर अभिनंदन को रिहा करना पड़ा। अब चूँकि इसका क्रेडिट मोदी सरकार को जाता, तो फिर पाक ऑकुपाइड पत्रकारों ने एक दूसरी योजना शुरू की जिसके अंतर्गत इमरान खान को धन्यवाद देना तय हुआ।

रवीश कुमार ने भी अपने प्राइम टाइम शो में कहा कि अगर लोग इस पर इमरान को धन्यवाद नहीं दे रहे हैं तो यह दुखद है। यानी, सिर्फ इस वजह से कि इस बड़ी जीत के लिए नरेंद्र मोदी को तारीफ न मिल जाए, ये लोग इमरान खान की तारीफ करने के लिए तैयार हो गए। सवाल ये है कि आखिर किस मुँह से कोई भारतीय पाकिस्तान की तारीफ करने को राजी हो सकता है? भारत ने 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के एक लाख से अधिक जवान रिहा किए, लेकिन पाकिस्तान ने हमारे एक कैप्टन सौरभ कालिया को पकड़ लिया और उनके साथ उस तरह का सलूक किया, जैसा शायद ही कोई इंसान करता हो।

पाकिस्तान ने कैप्टेन सौरभ कालिया के कान के पर्दे फाड़ डाले, उनके जिंदा रहते ही उनके हाथ के नाखून नोचे गए, तड़पा-तड़पा कर उन्हें मारा गया, जिससे समझ नहीं आया कि पाकिस्तान की आर्मी कोई प्रोफेशनल आर्मी है या फिर दो पैरों पर चलने वाले कोई जानवरों का समूह! कोई जिंदा इंसान की तरह इस तरह हैवानियत कैसे कर सकता है। वह इमरान खान जो खुद पाकिस्तान में तालिबान खान के नाम से मशहूर है, जिनके साथ पाकिस्तान की हिंदू लड़कियों को टारगेट करने वाले मियाँ मिट्ठू के साथ इमरान खान की फोटो वायरल हो ही रही है। आजकल उसी इमरान खान के लिए नोबेल शान्ति पुरस्कार तक की माँग की गई, वो भी सिर्फ मोदी विरोध के नाम पर।

NDTV: एजेंडा तू न गई मेरे मन से

वास्तव में यदि देखा जाए, तो रवीश कुमार मात्र एक प्रोडक्ट हैं, मुख्य फैक्ट्री तो NDTV है। जिसमें इस तरह के प्रोडक्ट बन रहे हैं, जिनकी तारीफ भारत का सबसे बड़ा दुश्मन हाफिज सईद करता है। जिस चैनल के एक पत्रकार निधि सेठी ने अभी हाल ही में पुलवामा हमले पर बलिदान हुए जवानों का मजाक उड़ाया। वास्तव में NDTV से ज्यादा भारत का पक्ष तो कई बार लगता है कि पाकिस्तान का जिओ न्यूज़ ले लेता होगा। 26/11 हमले के बाद जिओ न्यूज के रिपोर्टर कसाब के गाँव गए थे और उस पर प्रोग्राम किया था। जिसके बाद पाकिस्तान चाह कर भी 26/11 हमले में अपनी भूमिका को नकार नहीं पाया और एक तरफ NDTV पाक ऑकुपाइड पत्रकार बरखा दत्त थी, जो बुरहान वानी को हेड मास्टर का बेटा बता रही थी। अब आप तय कीजिए, क्या रवीश कुमार KFC रेस्टोरेंट में बैठकर शाकाहार पर प्रवचन करते हैं या नहीं करते हैं?

अदृश्य शत्रु हमारे जैसा ही दिखेगा, बोलेगा, रहन-सहन करेगा, ‘नज़र’ रखना जरूरी: अजित डोभाल

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल ने हाल ही में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के चीफ इनोवेशन ऑफिसर डॉ अभय जेरे को एक साक्षात्कार दिया था। लोकसभा टीवी द्वारा प्रसारित यह साक्षात्कार डोवाल का एनएसए बनने के बाद संभवतः पहला विस्तृत साक्षात्कार था। इसे हम दो हिस्सों में प्रकाशित कर रहे हैं। पहला हिस्सा आप यहाँ पढ़ सकते हैं

दूसरे हिस्से के महत्वपूर्ण अंश:

‘जिसकी योजना न बना के चले हों…’

अगला सवाल था कि अजित डोवाल को अजित डोवाल क्या किसी एक घटना ने बनाया, और क्या उन्होंने चैतन्य रूप से अपनी उस मानसिकता का निर्माण किया, जिसके बारे में उन्होंने थोड़ी देर पहले बताया था। जवाब में डोवाल ने कहा कि पहली बात तो उनके चरित्र, मन और मानसिक स्थिति का निर्माण किसी एक घटना या कारण से नहीं हुआ। दूसरे, इसे चैतन्य रूप से, किसी योजना के तहत नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि जिस चीज़ की हम योजना पहले ही बना चुके हैं, उसका हमारे मन पर न्यूनतम प्रभाव होता है।

असल में मन का निर्माण और विकास उन चीजों से होता है जो हमारी योजना का हिस्सा नहीं होतीं। वह मिसाल अपने बचपन की देते हैं कि मिलिट्रीमैन पिता के पुत्र होने के बावजूद वो थोड़े से बिगड़े हुए और हद से अधिक संवेदनशील बच्चे थे क्योंकि बचपन से वह अपनी बहनों और बुआओं के प्यारे रहे। ऐसे में उन्हें हॉस्टल के जीवन से तालमेल बिठाने में शुरू में दिक्कत हुई। साथ ही यह अहसास भी हुआ कि यहाँ उनकी माँ बचाने नहीं आ सकतीं और वह अपने लिए खुद जिम्मेदार हैं। उस अहसास ने उन्हें स्वतंत्र स्वभाव का बनाया और एकांत को उनका मित्र। और सालों बाद जाकर यह एकान्तप्रियता और स्वातंत्र्य उन्हें गुप्तचर जीवन में सफल होने में सहायक बने।

अगली जो चीज उन्होंने योजना से नहीं की बल्कि हो गई और बाद में बहुत उपयोगी निकली, वह था मुक्केबाजी में चयन। डोवाल के अनुसार उनके स्कूल में हर छात्र का चयन एक खेल में होता था। उनके टीचर ने उन्हें मुक्केबाजी के लिए चुना। बकौल डोवाल, “मेरे सर ने कहा कि तुम हार नहीं मानते, मैदान नहीं छोड़ते। चाहे तुम दोस्तों से लड़ाई में कितनी भी बुरी तरह पिट जाओ, तुम हमेशा उठ कर एक बार फ़िर लड़ने जाने की कोशिश करते हो। और एक मुक्केबाज के लिए यही सबसे बड़ा गुण होना चाहिए। स्कूल में तुमसे भी ज्यादा कस कर मुक्का मार सकने वाले बहुतेरे छात्र हैं, पर उन्हें जब पलट कर 1-2 मुक्के पड़ेंगे तो वे बिलबिलाकर रिंग से बाहर निकल भागना चाहेंगे- जो कि तेरे साथ बिलकुल नहीं है।”

डोवाल के अनुसार मुक्केबाजी ने उनमें चोट सहने की क्षमता के अलावा धैर्य का भी विकास किया। और यह उनके तब काम आया, जब वो 7-7 साल तक पाकिस्तान में और उत्तर-पूर्व में तैनात रहे। इस दौरान वो बड़ी आसानी से इतने समय तक बैठकर योजना के आगे बढ़ने का इंतजार कर पाए। डोवाल ने पाक या उत्तर-पूर्व में दुश्मन के हाथों प्रताड़ित किए जाने की ओर भी हल्का-सा इशारा करते हुए कहा कि दुश्मन जितना चाहे उतना उन्हें प्रताड़ित कर लेता, लेकिन वो धैर्यपूर्वक समय बीतने की प्रतीक्षा करते थे। उन्होंने कहा, “मैंने यह सीखा कि आप पिट-पिटा कर भी अंत में विजेता बन कर उभर सकते हो।”

परिस्थितिजन्य बनाम ‘सही’ निर्णय के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह ‘बनाम’ एक false-binary होगा; यानि हर बार ऐसा जरूरी नहीं कि चैतन्य होकर जो ‘सही’ निर्णय लिया जाए, उसमें परिस्थिति का सहयोग न हो। असल में कई बार तो परिस्थिति इतनी महत्वपूर्ण हो जाती है कि ‘सही’ और ‘गलत’ केवल आपकी प्रतिक्रिया भर बचती है, और परिणाम परिस्थितियों के हाथ में चला जाता है।

‘इलेक्ट्रॉनिक्स: ताकत भी, कमजोरी भी’

साक्षातकर्ता डॉ जेरे ने जब उन्हें बताया कि बहुत से छात्रों और युवाओं ने तकनीक की भविष्य के युद्धों में भूमिका के बारे में पूछा है तो डोवाल ने कहा कि पारंपरिक युद्ध तो अब जान-माल की कीमत के कारण और नाभिकीय हथियारों के प्रसार के चलते, लगभग नगण्य हो चुके हैं। ऐसे में आने वाला युद्ध क्षेत्र तकनीकी युद्धभूमि पर ही लड़ा जाना है।

डोवाल ने साफ़ किया कि पारंपरिक युद्ध न केवल बेवजह का विनाश करते हैं बल्कि उनसे इच्छित राजनीतिक और सामरिक परिणाम पाना भी मुश्किल होता जा रहा है। उन्होंने सोवियत रूस की तालिबान के हाथों और अमेरिका की वियतनाम के हाथों हार का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि कैसे विषम परिस्थितियों में अक्सर पारंपरिक रूप से ताकतवर सेनाएँ (रूस-अमेरिका) ‘कमज़ोर’ शत्रु (तालिबान-वियतनामी) से पार न पाकर अपने सामरिक लक्ष्य (आतंकवादियों का सफाया या वियतनाम को कम्युनिस्ट देश बनने से रोकना) पूरे नहीं कर पाईं।

आधुनिक और आगामी युद्ध-शैली को डोवाल ने चौथी पीढ़ी का युद्ध बताया, जिनमें शत्रु ‘अदृश्य’ होगा, और उसे देखने-पहचानने में सक्षम होना ही सबसे महत्वपूर्ण युद्ध-कौशल। ऐसे में गुप्त सूचनाओं का महत्व पहले से बढ़ जाता है। यह अदृश्य शत्रु हमारे जैसा ही दिखेगा, बोलेगा, रहन-सहन करेगा। लेकिन तब भी इसे 130 करोड़ की आबादी में तलाश पाने में गुप्त सूचना की महती भूमिका पर डोवाल ने जोर दिया।

साइबर को उन्होंने सीमाविहीन युद्धक्षेत्र की संज्ञा दी और कहा कि यहाँ पर एक बार घुसपैठ कर लेने पर यदि हम चाहें तो दुश्मन की विद्युत, आर्थिक, नागरिक उड्डयन, संचार आदि सभी क्षमताओं को एक ही झटके में ध्वस्त कर सकते हैं।

और इसीलिए इलेक्ट्रॉनिक्स एक ही समय पर दुश्मन के खिलाफ हमारा सबसे बड़ा हथियार भी है, और हमारी सबसे बड़ी कमजोरी भी।

‘फ़िल्में नहीं देखता, मॉल कभी गया नहीं, सामाजिक जीवन शून्य है’

एक छात्र का सवाल था कि जैसे उड़ी फ़िल्म में युवाओं का सर्जिकल स्ट्राइक में तकनीकी सपोर्ट द्वारा योगदान था, उस तरह क्या असल में भी छात्र और युवा महत्वपूर्ण सामरिक योगदान देते हैं। डोवाल ने जवाब में हालाँकि फ़िल्म पर टिप्पणी करने से मना कर दिया पर इसकी पुष्टि की कि सरकार, गुप्तचर एजेंसियाँ और डीआरडीओ युवा वैज्ञानिकों के शोधों और उनके द्वारा विकसित की जा रही उपयोगी नई टेक्नोलॉजी का स्वागत करते हैं। उन्होंने बताया कि हाल ही में उनके संज्ञान में आईआईटी मद्रास द्वारा विकसित की जा रही एक संभावित रूप से उपयोगी ड्रोन तकनीक आई है, और उन्होंने डीआरडीओ से उस तकनीक का विकास कर रही टीम का संपर्क कराया है।

उन्होंने यह साथ में जोड़ा कि ज्यादातर गुप्तचर एजेंसियाँ ज्यादा पसंद यह करतीं हैं कि अपने काम की टेक्नोलॉजी वे अपने आप से विकसित करें क्योंकि यह ज्यादा सुरक्षित उपाय है। पर अगर बाहर से कोई तकनीक लेनी ही पड़ती है तो हमेशा उसमें महत्वपूर्ण और अच्छे-खासे बदलाव कर दिए जाते हैं ताकि अविष्कारकर्ता की एजेंसी के तंत्र में संभावित तकनीकी घुसपैठ को रोका जा सके। साथ ही अविष्कारकर्ता को कभी यह पता नहीं होता कि वह जो तकनीक बेच रहा है, उसका अन्ततोगत्वा उपयोग कौन और कैसे करेगा।

अपने आधुनिक तकनीक से निजी सम्बन्ध के बारे में अजित डोवाल ने खुलासा किया कि न ही उनके पास कभी मोबाईल रहा, और न ही उन्होंने कभी इंटरनेट का प्रयोग कंप्यूटर पर किया है। वह इलेक्ट्रॉनिक संचार जैसे ईमेल, सोशल मीडिया आदि से भी दूर रहते हैं। कारण उन्होंने यह बताया कि उन्हें इस क्षेत्र से होने के कारण पता है कि इन उपकरणों में सामरिक सेंध कितनी आसान है। इसी में उन्होंने यह भी जोड़ा कि उन्होंने न कभी किसी पिक्चर हॉल में फ़िल्म देखी है न ही कभी किसी मॉल में कदम रखा है। यहाँ कारण यह था कि जब तक वह आईबी में थे, तब तक उनकी ड्यूटी का तकाजा यह था कि वे सार्वजनिक स्थलों पर, परिवार के साथ आदि कम-से-कम दिखें। और जब तक वह रिटायर हुए (2005), तब तक इन सब की इच्छा ही नहीं बची। अतः उन्होंने फ़िल्में केवल कभी-कभार टीवी पर ही देखी हैं।

युवाओं द्वारा अपने विचार जानने और अपने नाम से ‘उड़’ रही सामग्री पर उन्होंने बताया कि उन्होंने सार्वजनिक बयान बहुत कम दिए हैं। 2005 में रिटायर होकर 2009 में उन्होंने ‘विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन’ नामक थिंक-टैंक बनाया और कुछ किताबें व शोध पत्र लिखे, कुछ भाषण दिए। बस इतना ही उनके द्वारा दिए बयान हैं। 2014 से वह एनएसए हैं और बहुत कम मौकों पर सार्वजनिक तौर पर उन्होंने कुछ बोला है।

उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल उन्हें जो कहना होता है, वह प्रधानमंत्री से सीधे कहते हैं। और लोग भी कहते हैं और प्रधानमंत्री उसके आधार पर निर्णय लेते हैं। देशहित में यही है कि देश प्रधानमंत्री की आवाज़ और उनके निर्णय, उनके विचार सुने, प्रधानमंत्री के सलाहकारों के नहीं।

‘अपनी पहचान देश से जोड़ो’

अंत में देश के छात्रों और युवाओं के नाम सन्देश में डोवाल ने उनसे आग्रह किया कि वे अपनी पहचान देश की पहचान से जोड़ें क्योंकि यह मानव का स्वभाव है कि जिस चीज़ से उसकी पहचान जुड़ जाती है, वह चीज़ की रक्षा वह स्वयंस्फूर्त हो करने लगता है। वह स्वामी विवेकानंद का संस्मरण सुनाते हैं कि कैसे एक बार एक जापानी जहाज पर यात्रा के दौरान स्वामीजी ने देखा कि एक भारतीय जापान को गाली दे रहा था क्योंकि उसे किसी कारणवश एक समय का भोजन नहीं मिल रहा था। एक जापानी ने उसे अपना एक वक्त का खाना देने की पेशकश की, और साथ में धमकी भी दी कि यदि उस भारतीय को जापानी ने जापान के विरुद्ध एक भी शब्द बोलते सुन लिया तो उसे उठा कर जहाज से पानी में फेंक देगा। डोवाल ने भारतीयों से भी अपने देश के प्रति ऐसी ही प्रचण्ड लगन उत्पन्न करने का आग्रह किया।

प्रिय फेसबुक, चोरों को चौधरी नहीं बनना चाहिए

कल सुबह से सोशल मीडिया पर एक खबर नाच रही है, और हमारे भोले-भाले तथाकथित ‘राईट-विंग’ वाले उस पर ख़ुशी में नाच रहे हैं, जबकि उन्हें कायदे से दुश्चिंता में डूब जाना चाहिए।

खबर यह है कि फेसबुक ने हिंदुस्तान में 1,000 से अधिक पेजों, ग्रुपों आदि को हटा देने की घोषणा की। इनमें से दो-तिहाई से अधिक (687/1023) पर फेसबुक ने कॉन्ग्रेस आईटी सेल से जुड़े होने का आरोप लगाया, 15 को फेसबुक ने भाजपा आईटी सेल का मुखौटा बताया, और 321 पर अनचाहे सन्देश भेजने (spamming) का आरोप था।

इस पर ‘राष्ट्रवादियों’ की सेना ने ऐसे जश्न मनाना शुरू कर दिया है जैसे मार्क जुकरबर्ग ने फेसबुक मुख्यालय को कैलिफोर्निया की सिलिकॉन वैली से उठाकर भाजपा मुख्यालय के बेसमेंट में फोटोकॉपी वाले के बगल में लगा दिया है।

जबकि सच्चाई ठीक उलटी है- कॉन्ग्रेस/वामपंथियों को टिपली मारकर यह या तो दक्षिणपंथियों के मुँह पर हथौड़ा मारने का मंच तैयार हो रहा है, और या फिर उससे भी चिंताजनक (क्योंकि देश भाजपा-कॉन्ग्रेस से ज्यादा जरूरी है) निहितार्थ यह होगा कि फेसबुक हिंदुस्तान के चुनावों और राजनीतिक संवाद का चौधरी बनना चाहता है।

पेज हटाने के पीछे के कारण प्रश्नवाचक

कॉन्ग्रेस के पेजों को ‘अप्रमाणिक व्यवहार’ (Inauthentic behavior) के नाम पर हटाया। साथ ही इस शब्द से फेसबुक का तात्पर्य क्या है, इसके उदाहरण के तौर पर जिन पोस्ट्स के कारण कॉन्ग्रेस-समर्थक एकाउंट्स को बंद किया है, उनमें से कुछ दिखाए।

यह पोस्ट्स कॉन्ग्रेस के भाजपा के खिलाफ राजनीतिक दुष्प्रचार का हिसा जरूर हैं, पर इनमें ‘फेक न्यूज़’ (जिसे कि रोकना फेसबुक से अपेक्षित है) जैसा कुछ नहीं है- राहुल गाँधी ने ₹72,000 देने का वादा बिलकुल किया था (हालाँकि इसमें कोई दो-राय नहीं कि कॉन्ग्रेस के भीतर ही इस बात को लेकर कोई स्पष्टता नहीं कि यह राशि किसे, कब, कैसे दी जाएगी, पर यह नीतिगत विफलता है, फेक न्यूज़ नहीं)।

यह भी तथ्य है कि मोदी और जेटली समेत पूरी-की-पूरी भाजपा इस अजीब योजना के खिलाफ हैं- यह तथ्य कहना किसी भी प्रकार से ‘Inauthentic behavior’ कैसे हो गया?

और कॉन्ग्रेस के ये फुटकर पेज हटाने की सीढ़ी पर खड़े होकर फेसबुक ने इसी बहाने भाजपा के समर्थक बड़े-बड़े पेजों पर भी झाड़ू चला दी। The India Eye नामक एक ही हटाए हुए फेसबुक पेज का उदहारण लें तो 20 लाख से ज्यादा followers वाले इस एक पेज का हटना दक्षिणपंथियों के लिए ज्यादा नुकसानदेह साबित हुआ, बजाय कॉन्ग्रेस के कमज़ोर 600+ पेजों के हट जाने के।

इसके अलावा फेसबुक ने मीडिया आउटलेट्स को भी निशाना बनाने की कोशिश की। खबरिया पोर्टल My Nation का पेज हटने की बात कुछ मीडिया रिपोर्ट्स से लेकर स्वराज्य पत्रिका से जुड़े रहे रक्षा विश्लेषक अभिजीत अय्यर-मित्रा ने कही।

पर इसी मुद्दे पर खुद My Nation की खबर में अपने पेज के हटाए जाने का जिक्र नहीं है। इसके अलावा My Nation से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार सुरजीत दासगुप्ता ने भी सोशल मीडिया पर इस बारे में कुछ नहीं बोला है।

दण्ड जनता या चुनाव आयोग को देना चाहिए, फेसबुक कौन होता है?  

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने विश्वासमत हारने के बाद के अपने मशहूर भाषण में कहा था कि पार्टियाँ बनेंगी-बिखरेंगी, सरकारें आएँगी-जाएँगी, पर यह देश जीवित रहना चाहिए, इस देश का लोकतंत्र जीवित रहना चाहिए। और कॉन्ग्रेस के पेजों का इस तरह से, इस गलत आधार पर सफाया इस देश के लोकतंत्र के लिए कतई सही नहीं है।

कॉन्ग्रेस बेशक भाजपा के खिलाफ दुष्प्रचार कर रही है, पर वह सामान्य राजनीतिक संवाद का हिस्सा है- सभी पार्टियाँ, और भाजपा कोई अपवाद नहीं है, अपनी योजनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर दिखातीं हैं और विरोधियों पर कीचड़ उछालतीं हैं। दुनिया के सबसे बड़े, जीवंत लोकतंत्र में रहने की यह बहुत छोटी-सी कीमत है।

और अगर उसकी नीतियाँ गलत हैं तो यह आने वाले चुनावों में जनता तय कर देगी। अगर वह चुनाव के नियमों का उल्लंघन कर रही है तो उसे सजा सुनाने के लिए चुनाव आयोग और अदालत है, और अदालत की बात न मानने वालों के लिए पुलिस और सेना हैं।

इन सबके बीच में फेसबुक को चौधराहट फैलाने के लिए किसने आमंत्रित किया है? फेसबुक को जिस चीज़ पर असल में अपनी तरफ से रोक लगाने का प्रयास करना चाहिए, यानि तथ्यात्मक रूप से फर्जी फेक न्यूज़, उसमें तो वह लगातार नाकाम साबित हो रही है। और अब वह इसे छुपाने के लिए (और या फिर हिंदुस्तान की सियासत में अपना दखल बढ़ाने के लिए?) हमारे देश के राजनीतिक संवाद की पुलिसिंग कर रही है।

कॉन्ग्रेस प्रत्याशी पर PNB का ₹116 करोड़ का कर्जा, बैंक ने चुनाव आयोग से लगाई गुहार

कॉन्ग्रेस द्वारा लोकसभा चुनाव के लिए गलत प्रत्याशियों का चयन, पार्टी की गंभीरता पर लगातार सवाल उठा रहा है। बीते कुछ दिनों पहले दूसरी पार्टी की प्रत्याक्षी घोषित हो चुकीं तनुश्री को टिकट देकर कॉन्ग्रेस की सोशल मीडिया पर खूब हँसी उड़ी थी। और अब मणिपुर में अपने उम्मीदवार को लेकर पार्टी को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है।

दरअसल, आउटर मणिपुर से कॉन्ग्रेस पार्टी के उम्मीदवार के जेम्स पर पंजाब नेशनल बैंक ने आरोप लगाया है कि उनपर बैंक के ₹100 करोड़ बकाया है, जिन्हें लौटाने में वो अब तक असफल रहे हैं। बैंक ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पत्र लिखकर इसकी शिकायत की है। बैंक के अनुसार साल 2017 में जेम्स ने नॉर्थइस्ट रीजन फिन सर्विसेज लिमिटेड नाम की एक फर्म के निदेशक और निजी गारंटर के तौर पर ₹100 करोड़ उधार लिए थे।

बैक की शिकायत है कि जेम्स ने बिना बैंक को बताए ही फर्म से इस्तीफ़ा दे दिया, जो कि नियमों के उल्लंघन में आता है। बैंक का आरोप है कि जेम्स ने अपने पद से इसलिए इस्तीफ़ा दिया है क्योंकि वह कर्ज़ लेने की बात को छिपाना चाहते थे।

चुनाव आयोग को पत्र लिखते हुए बैंक ने जेम्स के चुनाव न लड़ने पर प्रतिबंध लगाने की माँग की है। साथ ही बैंक जेम्स को जान-बूझकर कर्ज न चुकाने वाले ‘डिफॉल्टर’ की सूची में भी डालने वाला है। बैंक का कहना है कि कर्ज़ न चुकाने से उनका अकॉउंट एनपीए में बदल गया है। लेकिन उसके तीन साल बाद भी कर्ज नहीं चुकाया जा सका।

बैंक द्वारा दी जानकारी के अनुसार अब जेम्स पर कुल ₹116 करोड़ बकाया है। बैंक की इस शिकायत पर मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने एक्शन लेते हुए आउटर मणिपुर के लोकसभा क्षेत्र के रिटर्निंग अधिकारी को मामले में लगे आरोपों पर जाँच करने को कहा है। बता दें कि जेम्स का पहले राजनैतिक बैकग्राउंड नहीं रहा है। वो फाइनेंस सर्विसेज के पूर्व अधिकारी रह चुके हैं।

मायावती ने मूर्ति बनवाने पर खर्च हुए ₹6000 करोड़ लौटाने से किया SC को साफ़ मना

बसपा सुप्रीमो मायावती ने मंगलवार (अप्रैल 2, 2019) को उत्तर प्रदेश में अपनी प्रतिमाओं और हाथी की मूर्तियों की स्थापना में खर्च को सही ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष हलफनामा दायर किया। इस हलफनामे में मायावती ने कहा कि ये लोगों की जनभावना थी कि उनकी मूर्तियाँ बने, बसपा के संस्थापक कांशीराम की भी इच्छा थी कि उनकी मूर्तियाँ बने। उन्होंने कहा कि दलित आंदोलन में उनके योगदान की वजह से मूर्तियाँ लगवाई गई हैं। मायावती का कहना है कि विधानसभा के विधायक चाहते थे कि कांशी राम और दलित महिला के रूप में मायावती के संघर्षों को दर्शाने के लिए मूर्तियाँ स्थापित की जाएँ। इसके साथ ही मायावती ने मूर्तियों और स्मारकों पर खर्च होने वाले रकम को भी लौटाने से मना कर दिया है।

गौरतलब है कि मायावती ने उत्तर प्रदेश में अपनी सरकार के कार्यकाल के दौरान नोएडा, ग्रेटर नोएडा और लखनऊ में कई पार्क बनवाए। इनमें मायावती, कांशीराम, भीमराव अंबेडकर और हाथियों की बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ बनवाई गईं हैं। इन पर तकरीबन ₹6000 करोड़ खर्च हुआ है। इसी बाबत सुप्रीम कोर्ट ने 8 फरवरी 2019 को मायावती द्वारा लगाई गई मूर्तियों पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि मायावती ने हाथियों और अपनी मूर्तियों को बनाने पर जो पैसा खर्च किया है, उसे वापस लौटाना चाहिए।

वैसे देश में मूर्तियों के नाम पर राजनीति का चलन नया नहीं है। राजनीतिक दल सत्ता में आने पर अपने-अपने हिसाब से चयनित नेताओं और विचारधारा वाले व्यक्तियों की मूर्तियाँ लगवाती आई हैं। इसी कड़ी में जब उत्तर प्रदेश में बसपा की सरकार आई तो मायावती ने भी पार्क और मूर्तियाँ बनवाईं थी और अब मायावती ने मूर्तियों पर खर्च की गई सरकारी रकम को न्यायोचित ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दायर किए गए हलफनामे में कहा है कि विधानसभा में चर्चा के बाद मूर्तियाँ लगवाई गईं और इसके लिए बाकायदा सदन से बजट भी पास कराया गया था। यहाँ पर अगर मायावती के द्वारा दिए गए तर्क पर गौर किया जाए, तो उनका ये तर्क सही लगता है। क्योंकि बिना सदन में बजट पास कराए किसी प्रकार की कोई मूर्ति या फिर पार्क बनाना संभव नहीं है।

हाँ, ये बात सही है कि आपने नियमों का पालन करते हुए ही पार्क या फिर मूर्तियों को बनवाया और इसे जनभावना बताया। लेकिन अगर आप वाकई में जनभावना का सम्मान करना चाहती हैं या फिर कांशीराम के प्रति आभार और सम्मान व्यक्त करना चाहती थी तो आप इन पार्कों और मूर्तियों की बजाए उनके नाम से कांशीराम अस्पताल, कांशीराम स्कूल या फिर कांशीराम कॉलेज की स्थापना करवा सकती थीं। इससे लोग स्कूल, कॉलेज और अस्पतालों का उपभोग कर सकते। इससे राज्य के शिक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार होता। इसके साथ ही मायावती दलितों को लेकर आरक्षण देने का काम कर सकती थी, जिससे उनकी स्थिति में सुधार हो पाता।

मायावती के द्वारा बनवाई गईं मूर्तियाँ

मायावती ने अपने हलफनामे में इस बात का भी जिक्र किया है कि इन मूर्तियों और पार्कों को बनाने में जो रकम खर्च की गई है, उसे लौटाने का सवाल ही नहीं उठता है। दरअसल, 8 फरवरी को केस की सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा था कि कोर्ट का विचार है कि मायावती को मूर्तियों पर हुए खर्च को अपने पास से सरकारी खजाने में अदा करना चाहिए। मगर मायावती ने अपने हलफनामे में इसे जमा करने से मना कर दिया। मायावती का रकम को वापस न करना इसलिए भी सही प्रतीत हो रहा है, क्योंकि मायावती ने ये सारी चीजें उस समय बनवाईं थीं, जब उनकी सरकार थी और इन मूर्तियों और पार्कों को बनाने पर जो रकम खर्च की थी, उसके लिए बाकायदा सदन से बजट पास करवाया गया था। इसलिए अब इस रकम को अपने पास से जमा कराना नामुमकिन सा लगता है।

इसके साथ ही मायावती ने सुप्रीम कोर्ट को भेजे जवाब में साफ कहा है कि पैसा शिक्षा, अस्पताल या फिर मूर्तियों पर खर्च हो, यह बहस का विषय है, इसे अदालत द्वारा तय नहीं किया जा सकता। हालाँकि मायावती की यह बात सही है, मगर यदि इन पैसों को मूर्तियों के बजाए शिक्षा व्यवस्था को दुरूस्त करने के लिए स्कूल- कॉलेज की स्थापना की जाती या फिर अस्पतालों का निर्माण किया जाता, पुरानी सड़कों का जीर्णोद्धार करने में खर्च किया जाता तो जनता इससे ज्यादा लाभान्वित होती।

पार्क में मूर्तियों से तो जनता का तो कोई भला होता हुआ नहीं दिख रहा है। ज्यादा से ज्यादा पार्क में घूमने गए लोग मूर्तियों के साथ सेल्फी ले लेते हैं। इससे ज्यादा तो उसकी कोई उपयोगिता दिखाई नहीं देती है। इनकी जगह अगर स्कूल या अस्पताल पर रकम खर्च की गई होती तो लोगों को इसका फायदा मिलता रहता और इनका नाम भी होता, क्योंकि ये स्कूल-कॉलेज होता तो इन्हीं के नाम पर। इसका एक फायदा ये भी मिलता कि लोगों के दिलों में इनके लिए जगह तो बनती ही, साथ ही इससे किसी को कोई आपत्ति भी नहीं होती।

इस मामले पर आज (अप्रैल 2. 2019) कोर्ट में सुनवाई होने वाली है। तो देखना होगा कि मायावती की तरफ से सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दायर किए गए हलफनामे पर कोर्ट किस तरह से सुनवाई करती है और क्या फैसला सुनाती है। बता दें कि, मायावती और उनकी पार्टी के चिन्ह हाथी की प्रतिमाएँ नोएडा और लखनऊ में बनवाई गई थीं। एक वकील ने इस मामले में याचिका दाखिल की थी। याचिका में कहा गया है कि नेताओं द्वारा अपनी और पार्टी के चिह्न की प्रतिमाएँ बनाने पर जनता का पैसा खर्च ना करने के निर्देश दिए जाएँ।

दंगों के नाम पर डराने वाली कॉन्ग्रेस का इतिहास 16000+ हिंदू-मुस्लिम-सिख के खून से लथपथ है

गुजरात में जब नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री थे, तब हुए दंगों को लेकर अक्सर भ्रम फैलाने की कोशिश की जाती रही है। बड़ी चालाकी से इन सबके बीच में कॉन्ग्रेस के शासनकाल में हुए दंगों को भुला दिए जाते हैं। गुजरात में हुए एक दंगे की आड़ में उन हज़ारों लोगों को याद भी नहीं किया जाता, जो कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में हुए दंगों में मौत की भेंट चढ़ गए। अक्सर कहा जाता है कि केंद्र और उत्तर प्रदेश में मोदी-योगी के आने के बाद सबसे ज्यादा
सांप्रदायिक हिंसक वारदातें हुई। लेकिन, अगर आँकड़ों की बात करें तो 2013 में जब यूपी में अखिलेश और केंद्र में मनमोहन की सरकार थी, तब वहाँ सबसे ज्यादा सांप्रदायिक वारदातें हुई थीं।

2017 में उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा की 195 वारदातें हुईं जबकि 2013 में यह आँकड़ा 247 का था। उस समय न तो यूपी में योगी थे और न ही केंद्र में मोदी। लेकिन, कुछ विश्लेषक झूठ के आधार पर यह कहते नहीं हिचकते कि मोदी राज में ऐसी घटनाएँ बढ़ गई हैं। इसी तरह 2008-2017 के दशक की बात करें तो महाराष्ट्र में भी सबसे ज्यादा सांप्रदायिक हिंसक वारदातें 2009 में हुई थी। उस वर्ष वहाँ 128 ऐसी घटनाएँ हुईं थीं। उस समय केंद्र और राज्य दोनों ही जगहों पर कॉन्ग्रेस की सरकार थी। इसी तरह 2010 में वहाँ 117 और 2008 में 109 ऐसी वारदातें हुईं। जबकि 2014 से 2017 के बीच किसी भी वर्ष में सांप्रदायिक हिंसा के आँकड़े इतने नहीं गए। उलटा 2016 में यह आँकड़ा घट कर 68 और फिर 2017 में 46 पर पहुँच गया।

2013 में यूपी में ऐसी घटनाओं में 77 लोग मारे गए। महाराष्ट्र में 2008 और 2009 में सांप्रदायिक हिंसा के कारण क्रमशः 26 और 22 लोग मारे गए। 2015, 16 और 17 में ये आँकड़ा घटते-घटते क्रमशः 14, 6 और 2 पर पहुँच गया। 2014 से 2017 के बीच इन आँकड़ों में कमी आई। अब हम आपको हाल ही में यूपीए के शासनकाल में हुए उन दंगों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसमें भारी जान-माल की क्षति हुई। लेकिन कई पत्रकार आज भी गुजरात-गुजरात की रट लगाए बैठे हैं। इसके बाद हम पुराने समय में कॉन्ग्रेस के शासनकाल में हुए बड़े दंगों की बात करेंगे।

मुज़फ्फरनगर दंगा, यूपी (2013 )

2013 में यूपी के मुज़फ्फरनगर में हुए दंगों में जानमाल की भारी क्षति हुई थी। उस समय केंद्र में कॉन्ग्रेस की सरकार थी और राज्य में अखिलेश यादव (सपा) की सरकार थी। अगस्त-सितम्बर में हुए इन दंगों में 60 से भी अधिक लोग मारे गए थे और कई घायल हुए थे। सुप्रीम कोर्ट ने इस दंगे को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को फटकार भी लगाई थी।

भरतपुर दंगा, राजस्थान (2011)

2011 में अशोक गहलोत के मुख्यमंत्रित्व काल में भरतपुर में हुए दंगों में 8 लोग मारे गए थे और क़रीब 25 लोग जख़्मी हुए थे। इस दंगे की जाँच सीबीआई को सौंपी गई थी। अशोक गहलोत फिर से राजस्थान के मुख्यमंत्री बने हैं। हैरत यह कि उनसे इस दंगे को लेकर सवाल नहीं पूछे जाते।

अब हम आगे कॉन्ग्रेस राज में हुए उन भीषण दंगों के बारे में बात करेंगे, जो इतने भयावह थे कि उनके सामने छिटपुट घटनाओं को दंगे का रूप देने वाले शर्म से अपना मुँह छुपा लें।

1993 बॉम्बे दंगा, महाराष्ट्र

इस दंगे में 900 के क़रीब लोग काल के गाल में समा गए थे। उस समय शरद पवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे। दिसंबर 1992 और जनवरी 1993 में हुए इन दंगों को सबसे भीषण दंगों में से एक माना जाता है। तब केंद्र में नरसिम्हा राव के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार थी।

हैदराबाद दंगा, आंध्र प्रदेश (1990)

1990 में आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद में हुए सांप्रदायिक दंगों में 200 से भी अधिक लोग मारे गए थे। उस दौरान आंध्र प्रदेश में कॉन्ग्रेस की सरकार थी। हैदराबाद दंगे के बारे में कहा जाता है कि तब एक भी दोषी को गिरफ़्तार नहीं किया गया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री मारी चेन्ना रेड्डी ने कहा था कि ये दंगे उनकी अपनी ही पार्टी के प्रतिद्वंद्वियों द्वारा भड़काए गए हैं। इस दंगे में मारे गए और घायल लोगों में आधे से ज्यादा हिन्दू थे।

1984 सिख दंगा

1984 में दिल्ली और पंजाब में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद सिखों को चुन-चुन कर मारा गया था। इस दंगे में कई कॉन्ग्रेस नेताओं पर आज तक मुक़दमे चल रहे हैं। इस दंगे में 10,000 के क़रीब सिख मारे गए थे। पूरे भारतीय में शायद ही कभी इस तरह एकतरफा रूप से इतने लोगों को मारने की कोई अन्य घटना घटी हो। अकेले दिल्ली में हज़ारों सिखों को मार डाला गया था, उनकी बस्तियाँ जला डाली गईं थीं और महिलाओं तक को नहीं छोड़ा गया था।

मामला अभी तक कोर्ट में लंबित है। हालाँकि किसी से छिपा नहीं है कि इस दंगे को कॉन्ग्रेस नेताओं (याद कीजिए राजीव गाँधी का धरती डोलने वाला वाक्य) द्वारा अंजाम दिया गया था। विकीलीक्स के ख़ुलासे के मुताबिक, अमेरिका तक ने भी इस दंगे में पूर्ण रूप से कॉन्ग्रेस का हाथ माना था। अमेरिका ने माना था कि कॉन्ग्रेस और उसके नेता सिखों को घृणाभाव से देखते थे। सिख समाज आज तक उस दंगे के दंश को झेल रहा है जबकि कई आरोपित खुला घूम रहे हैं।

नेली दंगा, असम (1983)

फरवरी 1983 में इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थीं और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा था। ऐसे में 3000 से भी अधिक लोगों का दंगे में मारा जाना कॉन्ग्रेस सरकार की अक्षमता का परिचायक है। अनाधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक़, इस दंगे में 10,000 के क़रीब लोग मारे गए थे। स्थानीय निवासियों और मुस्लिमों के इस ख़ूनी संघर्ष को रोकने में तत्कालीन सुरक्षा व्यवस्था नाकाम साबित हुई थी।

यह स्वतंत्र भारत का तब तक का सबसे बड़ा नरसंहार था। सरकारी तौर पर मृतकों के परिजनों को मुआवजे के नाम पर 5-5 हज़ार रुपए दिए गए थे। नेली नरसंहार के लिए शुरू में कई सौ रिपोर्ट दर्ज की गई थी। कुछ लोग गिरफ़्तार भी हुए लेकिन देश के सबसे जघन्य नरसंहार के अपराधियों को सजा तो एक तरफ, उनके ख़िलाफ़ मुकदमा तक नहीं चला। बंगाली विरोधी आंदोलन के बाद जो सरकार सत्ता में आई, उसने एक समझौते के तहत नेली नरसंहार के सारे मामले वापस ले लिए।

भागलपुर दंगा, बिहार (1987)

केंद्र में राजीव गाँधी के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार चल रही थी। बिहार में भी सत्येंद्र नारायण सिन्हा के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस ही सत्तासीन थी। ऐसे में, बिहार के इतिहास का सबसे भीषण दंगा भड़का और हज़ार से भी अधिक लोग मारे गए। 50,000 से भी अधिक लोगों को अपना घर-बार छोड़ कर भागना पड़ा। इस दंगे के बाद ही लालू यादव ने मुस्लिम-यादव समीकरण को बुना और बिहार की गद्दी को जीतने में कामयाब रहे।

शहर में शांति बहाली के लिए तत्कालीन सिने स्टार सुनील दत्त और शत्रुघन सिन्हा को कई बार भागलपुर आना पड़ा था। गंभीरता को भाँपकर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी भी आए थे पर उन्हें अस्पताल से ही लौट जाना पड़ा था। तब कर्फ्यू तोड़कर लोग तिलकामांझी चौराहे पर आ गए थे और उनके काफिले को रोक एसपी के तबादले को रद्द करने को सरकार को मजबूर कर दिया था। कॉन्ग्रेस इस घटना के बाद से बिहार की सत्ता पर कभी काबिज़ नहीं हो सकी।

गुजरात दंगा, 1969

2002 के गुजरात दंगों की चर्चा तो की जाती है लेकिन बड़ी चालाकी से 1969 में उसी गुजरात में हुए भीषण दंगों को याद तक नहीं किया जाता। कारण उस दौरान केंद्र और राज्य, दोनों में ही कॉन्ग्रेस की सरकार थी। इस दंगे में 500 के आसपास लोग मारे गए थे और लगभग इतने ही घायल भी हुए थे। हिन्दू दलितों और मुस्लिमों के इस संघर्ष को भड़काने में जमात उलेमा नामक मजहबी संगठन के नेताओं द्वारा भड़काऊ बयान का हाथ था।

1980 में यहाँ फिर सांप्रदायिकता की आग भड़की और 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद भी हिन्दू-मुस्लिमों में हिंसक संघर्ष हुआ। इन दंगों को लेकर कॉन्ग्रेस नेताओं से सवाल नहीं पूछे गए!

मोरादाबाद दंगा, यूपी (1989)

मोरादाबाद में दूसरे मजहब वालों द्वारा एक दलित लड़की के अपहरण के बाद उपजे तनाव में 500 के क़रीब लोग मारे गए थे। हालाँकि, अनाधिकारिक आँकड़ों की बात करें तो इसमें 2500 से भी ज्यादा लोगों के मारे जाने की बात कही गई। राज्य में नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस सत्तासीन थी और केंद्र में राजीव गाँधी प्रधानमंत्री थे। ऐसे में, देश के सबसे बड़े राज्य और राजधानी दिल्ली से सटे इस क्षेत्र में हज़ारों लोगों का मारा जाना कॉन्ग्रेस नेतृत्व पर सवाल खड़े करता है और उन पर भी जिन्होंने इस दंगे को लेकर उतने सवाल नहीं पूछे, जितने गुजरात को लेकर पूछे गए।

इस तरह से कॉन्ग्रेस शासनकाल में कई भीषण दंगे हुए, जिनको लेकर उन पर सवाल नहीं दागे गए। भाजपा शासनकाल में देश अपेक्षाकृत शांत है और ऐसी घटनाओं में कमी आई है। अगर हम 2011-2013 की बात करें तो उस दौरान भी कॉन्ग्रेस शासित राज्य सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में सबसे ज्यादा थे। उस दौरान कॉन्ग्रेस शासित महाराष्ट्र में 270 ऐसे मामले आए, जो देश में सबसे ज्यादा था। 2013 में तो देश में जितनी भी सांप्रदायिक हिंसा की वारदातें हुई, उनमें से 35% सपा शासित यूपी में हुई। इसीलिए, एक दो घटनाओं को बार-बार रट कर ये बस एक भ्रम फैलाया जाता है कि भाजपा के शासनकाल में सांप्रदायिक हिंसा की वारदातें बढ़ जाती हैं।

‘हेट पॉलिटिक्स’ के नाम पर जिन्होंने साधा BJP पर निशाना, वो केरल में बढ़ते अपराधों पर हमेशा क्यों चुप रहे?

कल लेखकों के गिरोह द्वारा भारतियों से एक अपील की गई। जिसमें कहा गया कि ‘हेट पॉलिटिक्स’ फैलाने वालों को भारत की जनता इस बार सत्ता से वोट आउट कर दे। ये थोड़ा सुनने में अजीब लग सकता है लेकिन ये सच है कि अब कुछ लेखकों द्वारा इस तरह के ‘जागरूकता अभियान’ भी चलाए जाने लगे हैं। हालाँकि अभी कुछ दिन पहले ये अपील 100 से ज्यादा फिल्ममेकर्स द्वारा भी की गई थी। लेकिन अब ये आवाज़ 200 लेखकों के बीच से उठी है। इन लेखकों में अरूंदती रॉय, अमिताव घोष, नयनतारा सहगल, टीएम कृष्णा जैसे बड़े नाम हैं।

आगामी लोकसभा चुनावों को मद्देनज़र रखते हुए सोमवार (अप्रैल 1, 2019) को 200 भारतीय लेखकों द्वारा इस अपील को अंग्रेजी, हिंदी, मराठी, गुजराती, उर्दू, बंग्ला, मलयालम, तमिल, कन्नड़, और तेलगु भाषाओं में निकाला गया। इस अपील में कहा गया कि ‘हेट पॉलिटिक्स’ को वोट आउट कर दिया जाए और ‘विभिन्न और समान भारत’ के लिए वोट किया जाए। हालाँकि इसमें ये कहीं भी स्पष्ट नहीं किया गया कि ‘विभिन्न और समान भारत’ को वोट करने से उनका अभिप्राय किस पार्टी को वोट देने से हैं। लेकिन हेट पॉलिटिक्स पर इस अपील में खुलकर बात हुई।

इस अपील में याद दिलाया गया कि हमारा संविधान नागरिकों को समान अधिकार देता है। चाहे फिर वो खाने का अधिकार को, इबादत का अधिकार हो, या फिर असहमति का अधिकार हो। लेखकों के इस गिरोह की यदि मानें तो पिछले कुछ वर्षों में समुदाय, जाति, लिंग और क्षेत्र विशेष के कारण नागरिकों के साथ मारपीट और भेदभाव हुआ है।

इनकी अपील के सार से अब तक आपको समझ आ चुका होगा कि लेखकों के इस विशेष समुदाय ने अपनी पूरी बात में सिर्फ़ भाजपा सरकार पर निशाना साधा है। और इनके द्वारा ऐसा किया भी क्यों न जाए, आखिर इनकी विचारधारा और भाजपा की विचारधारा में जमीन आसमान का फर्क़ है। कम से कम भाजपा अपने एजेंडे को लेकर क्लियर तो हैं, लेकिन इनकी चाल ही दो-मुँहे साँप जैसी है। इनका आरोप है कि आज अगर कोई सत्ता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है तो उसे खतरा है कि कहीं वो झूठ और घटिया आरोपों में गिरफ्तार न कर लिया जाए।

इनका कहना है भारत को बाँटने के लिए नफरत की राजनीति यानि की हेट पॉलिटिक्स का इस्तेमाल किया गया है। वामपंथी विचारधारा से लबरेज़ लेखकों द्वारा हेट पॉलिटिक्स पर इस तरह की अपील थोड़ी हैरान करने से ज्यादा हास्यास्पद मालूम होती हैं। केरल जैसे राज्य में जहाँ इसी विचारधारा के लोगों का शासन है, वहाँ आए दिन भाजपा/ आरएसएस के कार्यकर्ताओं की निर्मम हत्याओं की खबरें आती हैं। तब वहाँ हेट पॉलिटिक्स पर लेक्चर देना किसी से भी संभव नहीं हो पाता और न ही कोई अपील हो पाती है। 2012 में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है कि केरल में सर्वाधिक 455.8 संज्ञेय अपराध दर्ज किए गए हैं। लेकिन फिर भी इनके लिए भाजपा ही हेट पॉलिटिक्स का पर्याय है।

इसके अलावा भाजपा नेतृत्व में महिलाओं, दलितों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों पर खतरे का हवाला देकर जनता से जिस तरह की अब अपील की जा रही हैं, उसको मद्देनज़र रखते हुए इन वामी गिरोह के लेखकों को याद दिलाना जरूरी है कि 2017 में नवभारत टाइम्स में छपी एक खबर के अनुसार पिछले एक दशक में केरल में बलात्कार के कुल 16,755 मामले सामने आए हैं। शायद अब ये संख्या और भी बढ़ गई है, लेकिन वहाँ की सरकार को वोट आउट करने की अपील एक भी बार इनमें से किसी भी बुद्धिजीवी से नहीं हुई क्योंकि वहाँ इन्हीं की विचारधारा का फैलाव है।

आज मंदिर जाने वाले लोगों पर, भगवा धारण करने वालों पर खूब सवाल उठाए जाते हैं। लेकिन केरल के चर्च में ननों के साथ होते उत्पीड़न पर एक टक चुप्पी साध ली जाती है। आखिर क्यों? शायद सिर्फ़ इसलिए क्योंकि तथाकथित सेकुलरों/कम्यूनिस्टों का प्रश्रय पाकर व्यक्ति किसी भी अपराध को करने के लिए उपयुक्त हो जाता है।

इन पर सवाल उठाने का मतलब आज प्रत्यक्ष रूप से सिर्फ़ लोकतंत्र पर खतरा बन चुका है। यदि आज आप सनातन धर्म को छोड़कर किसी भी धर्म का पालन करते हैं, तो आपको इस गिरोह का सहारा भी प्राप्त होगा और सहानुभूति भी, लेकिन वहीं अगर आप हिंदू धर्म पर अपनी निष्ठा दिखाते हैं। तब आप घोषित रूप से हेट पॉलिटिक्स का समर्थन करने वाला चेहरा बनकर उभरेंगे।

कॉन्ग्रेस के पतन के लिए पप्पू ने लगाया जोर: अखबार के शीर्षक पर बवाल, ‘अमूल बेबी’ अब भी प्रासंगिक

राजनीति के गलियारे में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तो चलता ही रहता है, मगर चुनाव के समय ये कुछ ज्यादा ही देखने को मिलता है। अक्सर देखा गया है कि चुनावी समय में नेता लोग विपक्षी दल के नेताओं पर कुछ आरोप लगा देते हैं या फिर कोई विवादित बयान दे देते हैं। मगर जब से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने अमेठी के साथ साथ-साथ केरल के वायनाड लोकसभा सीट से भी चुनाव लड़ने का ऐलान किया है, विपक्षी पार्टी भाजपा के साथ-साथ कॉन्ग्रेस के ‘अपने’ यानी कि वाम दल भी उनके खिलाफ हमलावर हो गए हैं। वाम दल के नेता भी राहुल गाँधी के इस फैसले से खफा हैं और उनके खिलाफ विवादित बयान दे रहे हैं।

बता दें कि केरल के पूर्व मुख्यमंत्री एवं कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता वी एस अच्युतानंदन ने सोमवार (अप्रैल 1, 2019) को राहुल और कॉन्ग्रेस पर प्रहार करते हुए कहा कि उन्होंने पहले जो राहुल गाँधी को ‘अमूल बेबी’ कहा था, वह बात आज भी प्रासंगिक है। मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के संस्थापक सदस्यों में से एक 95 वर्षीय अच्युतानंदन ने अपनी एक फेसबुक पोस्ट में कहा कि अप्रैल 2011 में जब उन्होंने राहुल गाँधी को ‘अमूल बेबी’ कहा था, तो यह बेवजह नहीं था। राहुल ने राजनीति में जो बचपना दिखाया, उसकी वजह से उन्होंने ये बात कही थी और जब राहुल ने वायनाड से चुनाव लड़ने का फैसला किया है, तो उनकी बात आज भी सही ठहरती है। अच्युतानंद कहते हैं कि आज, जब राहुल अधेड़ उम्र के हो रहे हैं, तो भी उनका बचपना जारी है और वह भी ऐसे समय में जब देश भाजपा के रूप में सबसे बड़ी समस्या का सामना कर रहा है। इस समय जरूरत भाजपा से लड़ने की है।

‘सेकुलर’ दलों से हाथ मिलाने की बात कहने वाले राहुल गाँधी (जिनकी बात कॉन्ग्रेस में अंतिम मानी जाती है) ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी से हाथ नहीं मिलाया। दक्षिण में राहुल ने वाम मोर्चा से ही लड़ने का फैसला ले लिया! ऐसे में अच्युतानंद का कहना है कि यह तो वैसे ही है जैसे किसी पेड़ की उस शाखा को काटना, जिस पर आप बैठे हैं। इसलिए उन्हें लगता है कि राहुल के बारे में उन्होंने जो सालों पहले ‘अमूल बेबी’ बोला था, वह आज भी वैसे ही लागू होता है।

वीएस अच्युतानंदन वाला बवाल अभी शांत भी नहीं हुआ था कि केरल से ही दूसरा बवाल खड़ा भी हो गया। वहाँ की सत्ताधारी सीपीएम के अखबार ‘देशाभिमानी’ में राहुल गाँधी को ‘पप्पू’ के नाम से प्रकाशित किए जाने को लेकर विवाद पैदा हो गया है। इस अखबार में ‘कॉन्ग्रेस के पतन के लिए पप्पू ने लगाया जोर’ शीर्षक से संपादकीय लिखा गया है। इसमें कहा गया है कि राहुल गाँधी ने उत्तर प्रदेश के अमेठी में हार के डर से वायनाड से चुनाव लड़ने का फैसला किया है।

अब नेताओं के बीच तो एक दूसरे को लेकर बयानबाजी चलती रहती है। राजनीति में तो ये सब एक आम बात है, मगर किसी अखबार का किसी राजनेता को लेकर इस तरह के विवादित शीर्षक ‘कॉन्ग्रेस के पतन के लिए पप्पू ने लगाया जोर’ लिखना कहाँ तक सही है? अखबार सूचनाएँ प्रदान करने का बहुत ही शक्तिशाली और प्रभावी संस्थान होता है, जो देश-समाज में घट रही घटनाओं की संपूर्ण व सटीक जानकारी देता है। ये अखबार के संपादक की जिम्मेदारी होती है कि अखबार में किसी तरह की कोई विवादित सामग्री का प्रकाशन न हो। अगर कोई नेता किसी के बारे में कुछ विवादित टिप्पणी करता है, तो ये उस नेता का निजी विचार होता है, इसलिए उस नेता की टिप्पणी को लेकर संपादकीय लिख देना संपादक के गैर-जिम्मेदराना रवैये को दर्शाता है।

हालाँकि, मामले को बढ़ता देख सीपीएम ने इसे संभालने की कोशिश करते हुए कहा कि असावधानी की वजह से यह भूल हुई है और अखबार के स्थानीय संपादक पीएम मनोज ने भी स्वीकार किया कि ये संदर्भ गलत था और असावधानी के कारण भूल हुई है। उन्होंने माना कि किसी राजनेता के प्रति गलत बात कहना उनकी राजनीति नहीं है और वो इसे आगे ठीक कर लेंगे।

धूर्त और मौकापरस्त हैं आलिया भट्ट की मम्मी… पाकिस्तान जाना चाहती हैं क्योंकि वहाँ का खाना अच्छा है

भारत में कुछ लोगों के भीतर पाकिस्तान के लिए अथाह ‘प्रेम’ समय-समय पर देखने को मिलता रहता है फिर चाहे दोनों देशों के मध्य परिस्थितियाँ कितनी ही गंभीर क्यों न हों। बीते दिनों पुलवामा हमले से बाद देश में पाकिस्तान को लेकर काफ़ी आक्रोश देखने को मिला। बच्चे-बच्चे के मन में पाकिस्तान के प्रति गुस्सा और नाराज़गी थी। ऐसे संवेदनशील माहौल में भी कुछ लोगों को देश की भावनाओं से तनिक भी फर्क़ नहीं पड़ा।

इस सूची में वैसे तो कई नाम हैं, जिन्होंने पाकिस्तान का समर्थन करके राष्ट्रभावना पर निशाना साधा। लेकिन हालिया नाम इसमें बॉलीवुड अदाकारा सोनी राज़दान का है। ‘सर’, ‘सड़क’ और ‘राजी’ जैसी फिल्मों में काम कर चुकीं सोनी राज़दान को आज भारत ने एक ऐसी पहचान दी है, जिसके बलबूते वो आए दिन विवादित बयान देकर चर्चा का विषय बन जाती हैं।

सोनी राज़दान की हाल ही में ‘नो फादर्स इन कश्मीर’ नाम की फिल्म आने वाली है। इसके प्रमोशन पर उन्होंने पाकिस्तान जाकर रहने तक की बात बोल डाली। सोनी राज़दान का कहना है कि जब भी वह कुछ बोलती हैं तो ट्रोल का हिस्सा बन जाती हैं। उन्हें देशद्रोही कहा जाता है। इसलिए कभी-कभी वह सोचती हैं कि उन्हें पाकिस्तान ही चले जाना चाहिए। वह वहाँ पर ज्यादा खुश रहेंगी। सोनी की मानें को पाकिस्तान का खाना भी बहुत अच्छा है।

सोनी राज़दान का इस दौरान यह भी कहना रहा कि वह अपनी मर्जी से पाकिस्तान में छुट्टियाँ भी मनाने जाएँगी। उनकी मानें तो उन्हें ट्रोलर्स के पाकिस्तान भेजने वाली बात से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता।

पाकिस्तान में सुकून-चैन और अच्छा खाना ढूँढने वाली सोनी रज़दान का यह बयान दर्शाता है कि उन्हें देश में क्या हो रहा है और देश में कैसी स्थितियाँ हैं, इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता। अपने पति महेश भट्ट की तरह उनका ज़हन भी पाक की नुमाइंदगी ही करता है।

इस बात में कोई दो-राय नहीं कि यदि वह देश और धर्म की भावनाओं के विरोध में जाकर बयानबाजी करेंगी तो ट्रोल का हिस्सा बनेंगी ही। इसके अलावा जरूरी है कि वह केवल छुट्टियाँ मनाने के लिहाज से ही नहीं बल्कि जीवन बिताने के लिहाज़ से भी पाकिस्तान में जाकर रहें। तभी शायद उन्हें इस बात का अंदाजा होगा कि जिस आतंक को पनाह देने वाली सरजमीं की तारीफों के वे पुलिंदे बाँध रही हैं, वो उन्हें कैसे इस तरह के विवादित बयान देने की छूट देता है।

मलाला जैसी तथाकथित प्रोग्रेसिव फेमिनिस्टों के उदाहरण हमारे सामने पहले ही आ चुके हैं, जिन्होंने पाकिस्तान का नागरिक होने के बावजूद भी पाकिस्तान में ‘हिंदू बहनों’ पर हुए अत्याचार पर सवाल तक नहीं उठाया। क्योंकि उन्हें मालूम था कि वहाँ पर पसरी मजहब और आतंक की कट्टरता उन्हें इसकी छूट नहीं देता है।

गलती सोनी राज़दान जैसे लोगों की नहीं है, गलती हमारे देश में निहित उदारता की है, जिसके कारण आज लोग आलोचना के नाम पर राष्ट्र भावना से खिलवाड़ करते हैं। यदि पाकिस्तान जैसा रवैया भारत में अपनाया जाता तो शायद इस तरह के बोल कभी भी बुलंद न हो पाते जो भारत में रहकर पाकिस्तान में खुशी को ढूँढते फिरते हैं। लेकिन हमारा देश सहिष्णु है और आगे की सोचता है। पाकिस्तान तो अपनी मौत खुद मरेगा – यह बात प्रधानमंत्री मोदी भी कह ही चुके हैं। तो हम वैसे तुच्छ देश की मानसिकता पर गौर ही क्यों करें! गौर तो सोनी राज़दान को करना चाहिए अपने शब्दों पर लेकिन…

जरा गौर कीजिए सोनी राज़दान के शब्दों को, जो उन्होंने अपने बयान में कहा, “मैं भारत के पूरी तरह हिंदू देश बनने के खिलाफ हूं। पाकिस्तान में मिला जुला कल्चर नहीं है, इसी वजह वह बेहतर देश नहीं बन सका।” अरे मैडम! जब वो बेहतर देश नहीं है तो वहाँ क्या घास छिलने जाएँगी आप? और सवाल यह भी कि अगर चली जाती हैं (जिसकी संभावना कम है, क्योंकि आप धूर्त हैं, मौकापरस्त हैं) तो क्या ऐसी ही बातें पाकिस्तान की बहुसंख्यक आबादी वाले समुदाय के बारे में बोल सकती हैं?