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कॉन्ग्रेस का ‘हिन्दू आतंकवाद’ और बेशर्म राजदीप: PM मोदी के बयान से किया खिलवाड़, लोगों ने लगाई लताड़

राजदीप सरदेसाई ने एक बार फिर से अपना मोदी विरोधी रवैया दिखाया और वो भी झूठ के सहारे। प्रोपेगेंडा परस्त पत्रकारिता के पर्याय माने जाने वाले राजदीप ने पीएम मोदी के ‘हिन्दू आतंकवाद’ पर दिए गए बयान को ट्विटर पर न सिर्फ़ गलत तरीके से पेश किया बल्कि जनता को भी बरगलाने की कोशिश की। वैसे तो अपने अन्य वामपंथी झुकाव वाले पत्रकार साथियों की तरह राजदीप भी 2002 से ही नरेंद्र मोदी के विरोध में दुष्प्रचार चलाने में व्यस्त हैं लेकिन 2014 में मोदी के पीएम बनने के बाद उन्हें कुछ ज्यादा ही मिर्ची लगी हुई है। मोदी के शब्दों को अपने हिसाब से कुटिल ट्विस्ट देकर पेश करने वाले राजदीप के लिए यह सब नया नहीं है।

राजदीप सरदेसाई ने फैलाया झूठ

इस से पहले की हम राजदीप के करतूतों की चर्चा करें, ज़रूरी है कि हम यह जानें कि पीएम मोदी ने वास्तव में क्या कहा था? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महाराष्ट्र में एक विशाल जनसभा को सम्बोधित करते हुए कॉन्ग्रेस शासन काल में उछाले गए ‘हिन्दू आतंकवाद’ को लेकर पार्टी पर निशाना साधा। प्रधानमंत्री ने लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान वर्धा में आयोजित रैली में ये बातें कहीं। पीएम ने कॉन्ग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा:

“वोट-बैंक की राजनीति के लिए एनसीपी और कॉन्ग्रेस किसी भी हद तक जा सकती हैं। इस देश के करोड़ों लोगों पर हिंदू आंतकवाद का दाग लगाने का प्रयास कॉन्ग्रेस ने ही किया है। सुशील कुमार शिंदे जब भारत सरकार में मंत्री थे, तो उन्होंने इसी महाराष्ट्र की धरती से हिंदू आतंकवाद की चर्चा की थी। कुछ दिन पहले कोर्ट का फैसला आया है और इस फैसले से कॉन्ग्रेस की साज़िश की सच्चाई देश के सामने आई है।”

“कॉन्ग्रेस ने हिन्दुओं का जो अपमान किया है, कोटि-कोटि जनता को दुनिया के सामने नीचा दिखाने का जो पाप किया है, ऐसी कॉन्ग्रेस को माफ़ नहीं किया जा सकता है। आप मुझे बताइए, जब आपने हिन्दू आतंकवाद शब्द सुना तो आपको गहरी चोट पहुँची थी कि नहीं। हज़ारों साल के इतिहास में हिन्दू कभी आतंकवाद करे, ऐसी एक भी घटना नहीं है। अंग्रेजी इतिहासकारों ने भी कभी ‘हिन्दू हिंसक हो सकता है’ इस बात का जिक्र तक नहीं किया।”

राजदीप सरदेसाई ने इस सीधे बयान को ग़लत तरीके से पेश करते हुए कहा कि पीएम ‘हम बनाम वो’ की बात कर रहे हैं। ज़ाहिर है, राजदीप का कुटिल इरादा दो सम्प्रदायों के बीच वैमनस्य को बढ़ावा देना था। राजदीप ने अपने ट्वीट में पीएम के बयान को कुछ इस तरह पेश किया, “राहुल गाँधी ने उस क्षेत्र से चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं की जहाँ ‘हम’ बहुमत में हैं, उन्होंने उस क्षेत्र को चुना जहाँ ‘हम’ अल्पसंख्यक हैं।” जबकि पीएम ने ऐसा कुछ कहा भी नहीं था। पीएम मोदी अक्सर ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बातें करते हैं। उन्होंने अपनी कई सभाओं में कहा है कि इस सरकार में उनका भी उतना ही हक़ है, जिन्होंने राजग को वोट नहीं दिया था।

राजदीप ने ‘हम’ को जिस तरह से कोट के अंदर लिखा, उस से साफ पता चलता है कि वो मोदी की छवि कट्टरवादी और मुस्लिम विरोधी पेश करना चाह रहे थे। लेकिन सही समय पर लोगों ने सोशल मीडिया पर उनकी इस करतूत को पकड़ा और उन्हें जमकर लताड़ लगाई। असल में पीएम ने कॉन्ग्रेस पर भारत की पाँच हज़ार वर्ष से भी पुरानी संस्कृति का अपमान करने का आरोप लगाया। साथ ही उन्होंने कॉन्ग्रेस के इस ‘पाप’ की याद दिलाते हुए जनता से यह याद रखने को कहा कि ‘हिन्दू आतंकवाद’ जैसे शब्दों को किसने उछाला था? पीएम ने कहा कि कॉन्ग्रेस ने जिसे आतंकी कहा, वो शांतिप्रिय समाज अब जाग चुका है। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का जिक्र करते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस ने पूरे विश्व को परिवार मानने वाले समाज को आतंकवादी बताया।

असल में प्रधानमंत्री मोदी ने कॉन्ग्रेस के ही दावों पर उसे घेरा। एक कॉन्ग्रेस नेता ने ही साफ़-साफ़ कहा था कि राहुल गाँधी के वायनाड से चुनाव लड़ने के पीछे वहाँ हिन्दुओं का ‘अल्पसंख्यक’ होना है। ख़ुद कॉंग्रेस के नेता ऐसे बयान दे रहे हैं। जबकि प्रधानमंत्री ने तो बस इतना पूछा कि आख़िर जब हिन्दुओं को आतंकवादी करार देने वाली कॉन्ग्रेस को अदालत से भी झटका मिल चुका है, तो ऐसे में राहुल के पास हिन्दू बहुल इलाक़े से लड़ने की हिम्मत क्यों नहीं है? राजदीप द्वारा सोशल मीडिया पर लोगों को निरक्षर समझ कर ऐसी हरकतें की जाती हैं लेकिन अब जागरूक लोग उन्हें सच्चाई का एहसास कराने में देर नहीं लगाते।

कैश में तमिलनाडु टॉप पर, शराब के मामले में महाराष्ट्र सबसे आगे: EC ने बिगाड़ दिया ‘काम’

आम चुनाव आने वाला है और आदर्श आचार संहिता भी लागू हो चुकी है। ऐसे में, चुनाव आयोग भी नियम-क़ानून के पालन के लिए सक्रिय नज़र आ रहा है। अब तक हुए छापों में कई राज्यों से कुल मिलकर ₹1400 करोड़ रुपए से भी अधिक की सामग्रियाँ ज़ब्त की गई हैं। संदिग्ध नकदी, अवैध शराब और नशीली दवाएँ सहित कई ऐसी चीजें भारी मात्रा में ज़ब्त की जा चुकी है, जो चुनाव के दौरान ग़लत तरीके से प्रयोग किए जाने वाले थे। वोटरों को प्रलोभन देने की ख़ातिर प्रयोग की जाने वाली इन सामग्रियों की सबसे बड़ी मात्रा गुजरात में ज़ब्त की गई। कुल ₹509 करोड़ की चीजें राज्य में ज़ब्त की गई, किसी भी राज्य से ज्यादा।

विभिन्न राज्यों में चुनाव आयोग द्वारा ज़ब्त की गई संपत्तियों और सामग्रियों में से सिर्फ कैश की बात करें तो 108.75 करोड़ रुपए के साथ तमिलनाडु सबसे ऊपर है। दूसरे स्थान पर 95.79 करोड़ रुपए के साथ आंध्र प्रदेश है। ज़ब्त हुए शराब की मात्रा के मामले में 18.07 लाख लीटर के साथ महाराष्ट्र टॉप पर है। इसके बाद 11.26 लाख लीटर के साथ यूपी का नंबर आता है। जबकि कीमत के मामले में 31.98 करोड़ रुपए की शराब के साथ यूपी टॉप पर है और 13.64 करोड़ की शराब के साथ महाराष्ट्र का नंबर बहुत नीचे है। मतलब महाराष्ट्र में पकड़ी गई शराब सस्ती है।

किस राज्य से कितनी मात्रा में और कितने मूल्य की सामग्रियाँ ज़ब्त की गई

हाल ही में गुजरात तट से 100 किलोग्राम वजन वाला मादक पदार्थ ज़ब्त किया गया, जिसकी क़ीमत ₹500 करोड़ के क़रीब बताई जाती है। आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद राज्य में यह सबसे बड़ी ज़ब्ती है। इसी तरह से दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु में भी ₹208.55 करोड़ की सामग्रियाँ ज़ब्त की गई। इनका प्रयोग मतदाताओं को प्रोभन देने के लिए किया जाने वाला था। आज जब पार्टियाँ जीतने पर किसी न किसी रूप में लोगों को पैसे देने की बात करती हैं, इस कारण चुनाव पूर्व प्रलोभन देने का चलन भी बढ़ा है। ऐसे में, वोटरों को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए उन्हें मुफ़्त में चीजें वितरित की जाती है, जो आचार संहिता के विरुद्ध है।

इसी तरह से आंध्र प्रदेश में ₹158.61 करोड़, पंजाब में ₹144.39 करोड़ और उत्तर प्रदेश में ₹135.13 करोड़ मूल्य की सामग्रियों की ज़ब्ती की गई। चुनाव आयोग के एक अधिकारी ने बताया कि एक अप्रैल तक कुल ₹1,460.02 करोड़ के सामान की जब्ती हो चुकी है। चुनाव आयोग ने ऐसे कई अधिकारी और टीमें तैनात की है, जो उम्मीदवारों के ख़र्च पर नज़र रख रही है। ऐसे सैकड़ों अधिकारी चुनाव के दौरान कालाधन या अवैध धन के प्रवाह पर नज़र रखे हुए हैं। मोबाइल सर्विलांस टीमें भी तैनीत की गई है, जो त्वरित एक्शन लेते हुए कार्य करती हैं।

उमर अब्दुल्ला ने की कश्मीर के लिए अलग PM की माँग, मोदी ने विपक्ष से पूछा ‘आप सहमत हो?’

जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने देश में दो प्रधानमंत्रियों की माँग की है। एक जम्मू कश्मीर के लिए और एक शेष भारत के लिए। उमर अब्दुल्ला के इस बयान के बाद सियासी बवाल खड़ा हो गया और इसमें सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर कड़ी प्रतिक्रया दी। उमर अब्दुल्ला ने एक रैली को सम्बोधित करते हुए कहा कि वो वज़ीर-ए-आज़म और वज़ीर-ए-सदर वाली पुरानी व्यवस्था फिर से लागू करेंगे।

उमर अब्दुल्ला ने जनसभा को सम्बोधित करते हुए कहा:

“आज हमारे ऊपर तरह-तरह के हमले हो रहे हैं। हमारे ख़िलाफ़ कई तरह की साज़िशें हो रही हैं। कई ताक़तें लगी हुई हैं जम्मू-कश्मीर की पहचान मिटाने के लिए। कल की बात है जब अमित शाह साहब ने किसी इंटरव्यू में कहा कि हम 2020 तक जम्मू-कश्मीर से 35ए को खत्म कर देंगे। जम्मू-कश्मीर बाकी रियासतों की तरह नहीं है। बाकी रियासतें बिना शर्त रखे हिंदुस्तान में मिल गईं, लेकिन हमने शर्त रखी और मुफ़्त में नहीं आए। हम बिना शर्त मुल्क़ में नहीं आए। हमने अपनी पहचान बनाए रखने के लिए आईन (संविधान) में कुछ चीजें दर्ज कराईं और कहा कि हमारा संविधान और झंडा अपना होगा। उस वक्त हमनें अपना सदर-ए-रियासत और वजीर-ए-आजम भी रखा था, अब हम उसे भी वापस ले आएँगे।”

इस पर कड़ी प्रतिक्रया देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष से पूछा कि क्या वे उमर अब्दुल्ला के बयानों से सहमत हैं? उन्होंने ,पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार और पूर्व मुख्यमंत्री एचडी देवेगौड़ा से पूछा कि क्या वो सभी अब्दुल्ला के इस बयान से सहमत हैं? दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केरीवाल का बिना नाम लिए मोदी ने पूछा कि क्या यू-टर्न बाबू अब्दुल्ला के इस बयान से सहमत हैं? उन्होंने विपक्ष को बेशर्म बताते हुए कहा कि जब तक मोदी यहाँ पर है, तब तक कोई भी भारत को विभाजित भी नहीं सकता।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस कड़ी प्रतिक्रिया के बाद सोशल मीडिया पर भी लोगों ने उमर अब्दुल्ला को घेरा और उन पर भारत को विभाजित करने के स्वप्न देखने का आरोप लगाया। बता दें कि हाल ही में जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने भी आर्टिकल 35A को लेकर कुछ ऐसा ही विवादित बयान दिया था। उन्होंने केंद्र सरकार को धमकी भरे अंदाज में कहा था कि अगर इस आर्टिकल से छेड़छाड़ की गई तो देश वो देखेगा जो उसने कभी नहीं देखा। साथ ही उन्होंने कहा था कि उसके बाद कश्मीर के लोग तिरंगा छोड़कर कौन सा झंडा उठाएँगे, उन्हें नहीं पता।

उमर अब्दुल्ला ने पीएम की प्रक्रिया के बावजूद अपने स्टैंड पर कायम रहने की बात कहते हुए विपक्ष से बिना उनका समर्थन किए पीएम मोदी की आलोचना करने की अपील की। उन्होंने पीएम के उस वीडियो को रीट्वीट भी किया, जिसमे उन्होंने अब्दुल्ला को खरी-खरी सुनाया था। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी कश्मीर की दोनों नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी को ऐसे बयानों के लिए निशाने पर लेते हुए आर्टिकल 35A की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए। बता दें कि जेटली इसे लेकर एक विस्तृत ब्लॉग भी लिख चुके हैं।

Make In India का कमाल, एक वर्ष में हुआ 6000 से भी अधिक रेलवे कोच का निर्माण

मेक इन इंडिया के अंतर्गत रेलवे कोच बनाने में भी भारत का मैन्युफैक्चरिंग उद्योग आसमान छू रहा है। रेलवे की इंडियन कोच फैक्ट्री (ICF), मॉडर्न कोच फैक्ट्री (MCF) और रेल कोच फैक्ट्री (RCF) ने मिलकर वित्त वर्ष 2018-19 में रिकॉर्ड संख्या में रेलवे कोच का निर्माण किया है। इस वर्ष कुल 6037 कोच बनाए गए, जो पिछले वित्त वर्ष में बनाए गए 4470 कोच की संख्या से कुल 35% ज्यादा है। पिछले वर्ष भी रिकॉर्ड कोच का निर्माण किया गया था। इस बार भारतीय रेलवे ने अपने उस रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया है।

चेन्नई स्थित इंडियन कोच फैक्ट्री ने तो कोच बनाने के मामले में चीन को भी पीछे छोड़ दिया है। ये अब विश्व के सबसे बड़े रेलकार निर्माताओं में से एक बन गया है। इसने चीन के अग्रणी रेलकोच निर्माताओं को पीछे छोड़ते हुए इस बार इस वर्ष 2600 से भी अधिक रेलवे कोच का निर्माण किया। आपको बता दें कि ये सब रिकार्ड्स तब हासिल किए गए हैं जब रेलवे कई तरह की मुश्किलों का सामना कर रहा है और उसे कई अन्य तरह के कोच भी बनाने पड़ रहे हैं। उदाहरण के तौर पर वन्दे भारत एक्सप्रेस सहित अन्य आधुनिक तीनों के लिए अलग तरह के कोच बनाए जाते हैं।

रायबरेली स्थित मॉडर्न कोच फैक्ट्री ने भी इस वित्त वर्ष 1425 कोच का निर्माण कर एक नया रिकॉर्ड सेट किया। इस तरह से उसने लक्ष्य से ज्यादा कोच का निर्माण किया। पिछले वित्त वर्ष 2017-18 में भी फैक्ट्री ने 710 कोच बनाने का लक्ष्य रखा था लेकिन वर्षांत तक उसने उस से एक ज्यादा कोच का निर्माण किया। इस वर्ष 1422 कोच बनाने का टारगेट रखा गया था लेकिन फैक्ट्री ने उस से 3 अधिक कोच बना कर अपनी उत्पादन क्षमता से सबको प्रभावित किया। एमसीएफ ने एसी पैंट्री (हॉट बफेट) कार, अंडर स्लंग पॉवर कार, नॉन-एसी चेयर कार, आरडीएसओ (Research Designs and Standards Organisation, RDSO) के लिए ट्रैक रिकॉर्डिंग कार सहित विभिन्न प्रकार के रेलवे कोच का निर्माण किया।

इस तरह से एमसीएफ ने न सिर्फ़ ज्यादा संख्या में कोच बनाए बल्कि कई वैरायटी के भी कोच बनाए। न सिर्फ़ राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्टार पर भी रायबरेली का एमसीएफ रेलवे कोच निर्माण के मामलों में नए मापदंडों को छू रहा है। ख़बर आई थी कि इस वर्ष अकेले जनवरी महीने में एमसीएफ ने 152 Linke Hofmann Busch (LHB) कोच का निर्माण किया। ये फैक्ट्री के लिए अब तक का सर्वाधिक उत्पादन है। इन आँकड़ों को देखकर अंदाजा लगाया जा रहा है कि वित्त वर्ष 2019-20 में ये रिकॉर्ड भी टूट जाएगा और इस से कहीं अधिक रेलवे कोच का निर्माण होगा।

70000 ‘बेचारे शांतिदूत’ असम से उड़नछू, पत्रकारिता का समुदाय विशेष अब देगा जवाब?

असम में जब एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर) का पहला ड्राफ्ट जारी हुआ तो भावनाओं और सहानुभूति का ऐसा सैलाब उमड़ा कि लगा मानों असम की सारी नदियों को मिलाकर भी उतना पानी नहीं होगा, जितना वामपंथी-(छद्म) उदारवादी गिरोह की आँखों से बह रहा था।

बात ही कुछ ऐसी थी- 40 लाख “यूनेस्को-सर्टिफाइड सबसे शांतिप्रिय मज़हब” के बाशिंदों को दरिंदे मोदी ने दरबदर करने की साजिश की थी! और संयुक्त राष्ट्र भी चुप बैठा था!! इसीलिए मजबूरन पत्रकारिता के समुदाय विशेष को रुदाली की तलवार भाँजते हुए फासिस्टों से लड़ना पड़ा…

इस दारुण कथा को जरा फ़ास्ट-फॉरवर्ड कर 2019 में आते हैं जहाँ असम सरकार सुप्रीम कोर्ट को यह बता रही है कि उनमें से 70,000 लोग उसे गच्चा देकर गायब हो चुके हैं, और सरकार उन्हें तलाश नहीं पा रही है- और यह संख्या आधी-अधूरी ही है क्योंकि यह जिस शपथ पत्र से आई है, उसे सुप्रीम कोर्ट ने नाकाफी और कोरम पूरा करने वाला बताया है।

(एक वाक्य में मामला यह है कि कोर्ट ने असम सरकार से पूछा था कि अब तक उसने कितने घुसपैठियों को पहचान कर निर्वासित कर दिया है। जवाब में सरकार ने आधा-तिहा शपथ पत्र दिया, जिसमें एक बात इन 70,000 के लापता होने की भी है।)

अब जरा सोचिए- 70,000 की संख्या अपने आप में डरावनी है, और सुप्रीम कोर्ट ने इसे अधूरा माना है। तो असली संख्या क्या होगी? 40 लाख लोगों को एनआरसी मामले में अपनी नागरिकता साबित करने की नोटिस जारी हुई थी। उनमें से 15% को भी मान लें तो यह संख्या है 6 लाख। आधा भी कर दें तो 3 लाख। और जरा कम कर दें तो 2 से 2.5 लाख।

2 से 2.5 लाख जो इस देश के नागरिक नहीं हैं, जिनकी इस देश में शुरुआत ही एक अपराध (घुसपैठ) से हुई, और जो चेन छिनैती और एटीएम डकैती से लेकर 1993 के बम धमाके और कश्मीर में पत्थरबाजी या दंतेवाड़ा की तरह सैनिकों की बस पर घात लगाकर हमला तक चाहे जो गुनाह करें, उन्हें मौका-ए-वारदात पर पकड़ने के अलावा उनकी कोई पहचान नहीं हो सकती।

कितना गंभीर है यह खतरा

2 से 2.5 लाख लोग जिन्हें पता है कि इस देश में उनकी कोई पक्की पहचान नहीं है और इसलिए वे जो चाहें करने के लिए स्वतंत्र हैं बशर्ते बस वे मौका-ए-वारदात पर पकड़े जाने से बच निकलें। इस वाक्य को बार-बार, तब तक पढ़िए जब तक इसका पूरा भावार्थ आपकी कनपटी की नसों में टपकन न बन जाए

आप कह सकते हैं कि क्या सबूत है कि वह ऐसा करेंगे ही। बिलकुल कहिए- और सबूत भी देखिए। इस लिंक पर जाइए। 1974 में एक महिला परफॉरमेंस आर्टिस्ट ने स्टूडियो के कमरे में खड़े होकर यह घोषणा की कि अगले 6 घंटे तक आगंतुक उसके शरीर के साथ कुछ भी कर सकते हैं- वह क़ानूनी कार्रवाई नही करेंगी। और लोगों ने जो-जो किया, वह यहाँ लिखा नहीं जा सकता- आप खुद पढ़ लीजिए। नहीं पढ़ना चाहते तो 6 घंटे बाद के उसके अनुभव यह थे, “मैं बलात्कृत महसूस कर रही हूँ, लोगों ने मेरे कपड़े फाड़ दिए, शरीर में गुलाब के काँटे घोंपे, सर पर बन्दूक तानी…”

कहने का तात्पर्य है कि कानून का डर ही है, जिससे इंसान के अंदर बैठे जानवर को क़ाबू में किया जा सकता है। जब कोई गुनाह करता है तो वो क़ानून का डर ही होता है जो उसे हर पल सताता है कि न जाने कब उसके दरवाज़े पर दस्तक होगी और पुलिस उसे पकड़ कर ले जाएगी। गुनहगार को पकड़ने की क़वायद में उसके सभी दस्तावेज़ों की खोजबीन शुरू हो जाती और अंतत: क़ानून के हाथ दोषी के गिरेबान तक पहुँच ही जाते हैं।

उस महिला कलाकार ने यही डर हटा कर देखा तो लोगों ने उसकी दुर्गति कर दी। और यही डर उन 70,000/ 2.5 लाख लोगों में से शायद अब ख़त्म हो चुका होगा।

इन लोगों के हिमायती लेंगे इनके गुनाह की जिम्मेदारी?

वापस आते हैं पत्रकारिता के समुदाय विशेष पर। इसलिए कि यही सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक इस समूह के अधिवक्ता बन जाते हैं। और इसलिए बन जाते हैं क्योंकि यह घुसपैठिए ‘समुदाय विशेष’ से होते हैं।

अपनी “पर्सनल स्पेस”, “माह लाइफ, माह चॉइस” का गाना गाने वालों को रोहिंग्याओं और बंगलादेशियों के इस देश की “boundary violation” में कोई खोट नहीं दिखता, और अगर गलती से कभी कोई सरकार कहीं से जूते खाकर आए कुछ हिन्दुओं की ओर नागरिकता का राग गाए तो उसमें ‘थाम्पलदयिकता फैल लई ऐ’ का खटराग बजाने का मुहूर्त दिख जाता है

‘बेचारे रोहिंग्या’ का narrative बुनने वाले ‘विद्वज्जन’ इन 2.5 लाख ‘अदृश्य’ अवैध अप्रवासियों के द्वारा अगर कोई गुनाह किया जाता है तो उसकी गठरी अपने सर बाँधेंगे?

यह बिलकुल संभव है कि सारे-के-सारे 2.5 लाख /70,000 गायब अप्रवासी आपराधिक न हों- हो सकता है 10 से भी कम अपराधी हों।

पर अगर 5 अपराधी भी कानून से केवल इसलिए बच निकलें कि अपने राजनीतिक आकाओं के वोट बैंक को खाद-पानी देने के लिए उन्हें संरक्षण दिया गया तो यह कहाँ का न्याय है? या शायद ‘समुदाय विशेष’ (चाहे वह पत्रकारिता का हो या समाज का) के अन्याय अन्याय नहीं, अल्लाह का प्रसाद हैं जिन्हें श्रद्धा-भक्ति से ग्रहण कर लेना हिन्दू समाज की नियति है…

अभिजित बनर्जी का ‘टैक्स बढ़ाएँगे’ बयान राहुल गाँधी की कमज़ोर नेतृत्व क्षमता दर्शाता है

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी प्रधानमंत्री मोदी पर जिन आरोपों को सबसे ज्यादा लगाते हैं (राफेल और ‘गुण्डे’ हिन्दूवाद के सरासर झूठ के बाद), उनमें से एक सत्ता का केन्द्रीकरण है। उनके अनुसार मोदी सरकार में एक आदमी का ‘आई, मी, माइसेल्फ़’ है और वह हैं ख़ुद मोदी। उनके नए ‘चचा’ अरुण शौरी भी मोदी को आत्ममुग्ध (narcissistic) कहते हैं। इसी तरह अमित शाह को भी माइक्रोमैनेजमेंट के नाम पर तानाशाही फ़ैलाने और वन-मैन-शो के रूप में पार्टी चलाने का आरोप लगता रहा है।

आत्ममुग्धता और तानाशाही का जवाब तो मोदी-शाह ही देंगे, पर इस तथ्य में सच्चाई है कि मोदी-शाह बहुत सारे उत्तरदायित्व (और उन उत्तरदायित्वों से जुड़े अधिकार) अपने हाथ में रखते हैं- यह नेतृत्व करने का एक तरीका होता है, केन्द्रीयकृत तरीका, जहाँ प्रमुख नेता सबसे ज़रूरी कार्यों को अपने हाथ में रखता है।

दूसरा तरीका होता है नियुक्तिकरण (delegation of work)- जहाँ आप अलग-अलग लोगों को उनकी क्षमता और कार्य की आवश्यकता के हिसाब से नियुक्त कर देते हैं और आप एक फ़ासले से नज़र रखते हैं।

इन दोनों में से आप अपनी आवश्यकता के हिसाब से कोई भी एक तरीका पकड़ सकते हैं, कोई बुराई नहीं। पर यह तय है कि यदि आप एक कोई तरीका पकड़ने को किसी के ख़िलाफ़ चुनावी मुद्दा बना देंगे तो आप को इसका जवाब तो देना होगा कि वैकल्पिक तरीके में आप कितने पारंगत हैं।

बयान अभिजित का भले था, पर गलती राहुल गाँधी की थी

मैंने सोशल मीडिया पर देखा कि राजनीतिक टिप्पणीकार और डीयू के शिक्षक अभिनव प्रकाश ने लिखा था ‘(विशुद्ध) अकादमीशियन को टीवी डिबेट में नहीं भेजना चाहिए… अभिजित बनर्जी के बयान ने यह साबित कर दिया…’

मामला यह था कि टाइम्स नाउ के टीवी डिबेट में अभिजित यह सीधे-सीधे बोल आए कि राहुल गाँधी की चर्चित स्कीम ‘न्याय’ तभी लागू हो सकती है, जब मौजूदा करों की दरें बढ़ा दी जाएँ। उन्होंने महंगाई टैक्स को भी वापस लाने की वकालत कर दी। अभिनव प्रकाश के अनुसार लोगों ने उसमें से यह अर्थ निकाला कि यदि कॉन्ग्रेस वापस आई तो टैक्स बढ़ जाएँगे, और लोगों का यह सोचना कॉन्ग्रेस के लिए घातक साबित हो सकता है।

एक मिनट के लिए इस स्कीम के ख़ुद के फायदे-नुक़सान को भूलकर केवल इस बयान को देने के अभिजित के कृत्य के बारे में सोचिए। चुनाव के बीचों-बीच मध्यवर्ग की बदहाली के लिए अपने विरोधी को जिम्मदार ठहरा रही पार्टी की योजना का बचाव कर रहा इन्सान यह कहता है कि उसके नेता की सरकार आई तो मध्यम वर्ग पर और ज्यादा टैक्स लगाकर उससे ‘रेवड़ियाँ’ बाँटी जाएंगी!!

अभिजित बनर्जी की इस ‘गलती’ के लिए उन्हें नहीं, राहुल गाँधी को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। एक नेता के लिए यह जानना बेहद ज़रूरी है कि उसकी टीम में कौन सा व्यक्ति किस कम के लिए सही है। जितना मैंने अभिजित बनर्जी के बारे में देखा-सुना-पढ़ा, उसके हिसाब से वह कॉन्ग्रेस को वामपंथी रेवड़ी-नॉमिक्स राह पर सलाह देने के लिए तो सही व्यक्ति थे, पर राजनीतिक रूप से टीवी डिबेट में उसका बचाव करने के लिए नहीं।

वह तो कॉन्ग्रेस के शायद आधिकारिक सदस्य भी नहीं हैं। एक सलाहकार ( consultant) को राहुल गाँधी ने चुनावी सरगर्मी के बीच इतनी विवादास्पद स्कीम के बचाव के लिए भेज दिया? बिना यह सोचे-समझे कि अभिजित बनर्जी को राजनीति का न इतना अनुभव होगा न ज्ञान कि वह जनता के बीच स्वीकार्य रूप से कॉन्ग्रेस की बता रख पाएँ?

राहुल गाँधी का अभिजित बनर्जी को भेजना न केवल यह दिखाता है कि उनमें महत्वपूर्ण नेतृत्व गुण ‘नियुक्तिकरण’ (delegtation skills) का अभाव है बल्कि यह भी दिखाता है कि या तो कॉन्ग्रेस में इस स्कीम का बचाव करने के लिए राजनीतिक रूप से कुशल लोग ही नहीं मिल रहे, और अगर मिल रहे हैं तो राहुल गाँधी शायद अपनी और कॉन्ग्रेस की स्थिति की गंभीरता को इतना समझ नहीं पा रहे हैं कि उन लोगों को मैदान में उतारें।

नियुक्ति करनी आपको आती नहीं, केन्द्रीकरण से आपको दिक्कत है

इसके अलावा एक सवाल राहुल गाँधी से किसी को भी पूछना चाहिए कि अगर सही लोगों की सही नियुक्ति करना आपको आ नहीं रहा है, और मोदी-शाह के सब काम खुद करने से आपको समस्या है तो देश चले कैसे? किसी न किसी को कम तो करना पड़ेगा न?

या वह इस देश को फिर से 10 साल के उसी पक्षाघात (paralysis) में झोंक देना चाहते हैं जहाँ उनके रक्षा मंत्री एंटनी को जब सही निर्णय लेना नहीं आता था तो वे पद छोड़ने की बजाय फाइलें दबा कर बैठे रहे और उनकी अकर्मण्य ईमानदारी की शेखी कॉन्ग्रेस बघारती रही?

लोकतंत्र का लहसुन: रावण से रा.टू होने तक मायावती का मनुवादी होना ज़रूरी है

मनुस्मृति उन लोगों ने तो बिल्कुल ही नहीं पढ़ी है जो A4 साइज पेपर पर मनुस्मृति लिखवा कर, मोटे काले बॉर्डर में प्रिंट लेकर, किसी भी किताब की जिल्द पर चिपका देते हैं, और उसमें आग लगा देते हैं। पढ़ना तो छोड़िए, एक सर्वेक्षण करा लिया जाए कि कितने घरों में यह किताब है जिसके नाम पर इस ‘वाद’ का मवाद बह रहा है, तो पता चलेगा कि यह ग्रंथ न तो प्रचलन में, न ही लोग इसके हिसाब से चलते हैं। 

साथ ही, स्मृति होने के कारण, और इस्लामी आतंकियों के पूर्वजों, यानी इस्लामी आक्रांताओं, द्वारा हमारी संस्कृति के निशान मिटाने हेतु तमाम पुस्तकालयों, ग्रंथागारों में आग लगाने के बाद, जो बचा है उसमें से दर्जनों श्लोक गायब हैं। दूसरी बात यह भी है कि लोग श्लोक वाले महाकाव्य, शास्त्र या ग्रंथों के श्लोकों को पढ़ते या समझते वक्त सबसे बड़ी गलती यह करते हैं कि उसके ऊपर और नीचे के श्लोकों से संदर्भ हटा कर, उसे सिर्फ एक श्लोक के तौर पर देखते हैं। 

यह बात एक सामान्य बुद्धि का व्यक्ति जानता है कि ‘रॉबर्ट ने चाकू उठा लिया, और गुस्ताव की तरफ देखने लगा’ में रॉबर्ट एक दरिंदा ही नजर आएगा, जबकि उससे पहले की दो लाइनों में गुस्ताव ने चाकू निकाल कर रॉबर्ट पर हमला करने की कोशिश की थी, और चाकू नीचे गिर गया था, जिसे रॉबर्ट ने आत्मरक्षा के लिए उठाया। इसके बाद पता चले कि फिल्म की शूटिंग चल रही थी। इसीलिए, संदर्भ बहुत ज़रूरी होते हैं। इसीलिए, जब भी आप पर कोई मनुस्मृति की बातें कहे तो श्लोक माँगिए, पन्ने माँगिए, उससे ऊपर और नीचे के संदर्भ माँगिए, उस समय के समाज का ब्यौरा माँगिए, उस समय किसका राज्य था यह माँगिए, और इन सारी चीज़ों के संदर्भ में श्लोक को समझने की कोशिश कीजिए। 

रावण, मायावती और लालू से लेकर अखिलेश और तमाम लाल सलाम वाले लम्पट पार्टियों तक, संदर्भ हटा दिया जाता है, कल्पना को सत्य की तरह इतनी बार बोला जाता है, बुद्धिजीवियों से इतनी बार बुलवाया जाता है कि आम जनता बिना शोध किए, बिना मेहनत किए, उसे सच मानकर अप्रैल 2018 में आंदोलन कर देती है और आंदोलन में बारह लोगों की जान ले लेती है। उसे न तो मनुस्मृति से कुछ लेना देना है, न ही इस बात से कि सरकार ने कभी भी आरक्षण हटाने की बात नहीं की थी। 

इसी तरीके से नए लोगों का जनाधार बनता है। इसके पीछे के व्यवस्थित इंतजाम इतने व्यापक होते हैं, कि आग लगाने की मशाल के पेट्रोल से लेकर, आग लगने के बाद हुई हिंसा के पैमाने को इस बात के सबूत मानने तक कि आंदोलन कितना सफल रहा, किसको क्या और कैसे कहना है, सब तय होता है। हिंसा ज़ायज ठहरा दी जाती है, क्योंकि तंत्र में शब्दों के धार से हमला करना एक अपेक्षित गुण माना जाता है। ऐसे ही आंदोलनों की नाजायज़ औलादें, लाशों पर पैर रख कर संसद तक पहुँचती है। ऐसी भीड़ें ही इन नाजायज़ बच्चों को जनती है जो बाद में इन्हीं के लिए बने संसाधनों को पत्थर से बने पर्स में, और पार्कों के पिलर पर बने हाथियों में खपा देते हैं। 

हज़ार के नोटों की मालाएँ याद हैं न आपको? दलित के गले में वो माला, नकली नोटों की भी हो, तो भी बहुत बड़ा संदेश देती है। वो दलितों के रीढ़ों के कशेरुकों को अपनी एड़ियों से चकनाचूर करके आगे बढ़ने वाली उस महाशक्ति का उदाहरण बनती है जो बताती है कि सर्वहारा की क्रांति का नेता रॉल्स रॉयस से चलता है, और दलितों की नेत्री भारत के सबसे अमीर नेताओं में से एक हो जाती है। 

समस्या ऐसे नेताओं की अमीरी नहीं है, समस्या यह है कि तुमने उन दलितों के लिए क्या किया? उत्तर प्रदेश और बिहार में समाजिक न्याय के मसीहाओं ने इन समाजों के लिए क्या किया है, इसका पता इसी से चलता है कि कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियाँ आज भी ‘गरीबी हटाओ’ के वैरिएशन वाले नारे लेकर ही चल रही है। लालू की फैलाई बर्बादी और माया-मुलायम के राज में व्याप्त गुंडई से नेताओं के पेट तो इतने भर गए कि छींके तो नाक से सोने का चावल निकल आए, लेकिन गरीब के लिए आज भी एक वक्त चावल खाना एक लग्ज़री है। 

इन्होंने बहुत लहरिया लूटा, दशकों तक लूटा, बदल-बदल कर लूटा, कह-कह कर लूटा और अपने आप को अपने राज्यों में इन जातियों का एक मात्र मसीहा बताकर लूटा। लेकिन पावर, या सत्ता, समाज को हर 25-30 साल में रीसायकल करता है। एक पीढ़ी निकल जाती है, दूसरी पीढ़ी बाप के बनाए राज-पाट को जनाधार की बुनियाद पर नहीं, अपने बेटे या बेटी होने के बुनियाद पर उत्तराधिकार में पाती है। 

यहाँ एक सोशल डिसकनेक्ट पैदा होता है। अंग्रेज़ी शब्द इसलिए कह रहा हूँ कि आप मुझे गम्भीरता से लें। हें, हें , हें… ये जो डिसकनेक्ट है, जहाँ जनता आपके बाप को जानती है इसलिए आपको भी मानती है, वो ट्रान्जिशन वाले दौर में, जब बाप की उम्र ढलती है, और बेटे-भतीजों में सत्ता के एकाधिकार को लेकर ठनती है, प्रबल होकर दिखती है। फिर अखिलेश रूठ जाता है, तेज प्रताप लालू राबड़ी पार्टी की घोषणा कर देता है, मायावती बुआ बन जाती है…

ये जो ट्रान्जिशन का दौर होता है, ये वो साल होते हैं जब क्षत्रप के किले में दरार के लिए पहली चोट अपना ख़ून ही करता है। फिर दूसरी पीढ़ी का कोई रावण इस अवसर को भाँप कर, अपने आप को लालू-मुलायम-कांशीराम की तरह देखने लगता है। उसका मोडस ऑपरेंडाय, यानी कार्यशैली, पुरानी ज़रूर होती है लेकिन बेहतर संसाधनों के प्रयोग से वो बहुत तेज़ी से उभरता है।

अब वो स्वयं को एक आशा की तरह बेचने लगता है; वो आंदोलन कराता है; जेल जाता है; बीमार हो जाता है; बड़े नेताओं को अकारण ही भारत की सारी समस्याओं का जड़ मान लेता है। वो हर जगह एक ही बात, बार-बार बोलता है, और मीडिया का एक हिस्सा उसे उम्मीद की तरह भुनाने लगता है। दो सौ लोगों की मोटरसायकिलों में तेल भरवा कर वो रैली निकालता है। ग़रीबों के सब्जी के ठेलों पर दलितों का उत्पात होता है, झूठी ख़बर पर आग लगाई जाती है, घरों में घुस कर निजी दुश्मनी के कारण आंदोलन की आड़ में गोली मारी जाती है। फिर एक नेता हिट हो जाता है।

ये नेता पुराने लोगों को खटकने लगता है। दोनों के लिए लड़ाई अस्तित्व की हो जाती है लेकिन गरियाने के लिए किताब तो एक ही है, नए शब्द तो बुद्धिजीवियों ने गढ़े ही नहीं! फिर नया रावण रा टू प्वाइंट ज़ीरो बनने के लिए उसी नेत्री को मनुवादी कह देता है जिसकी पूरी राजनीति खाली पन्नों की फ़ोटोकॉपी पर मनुस्मृति लिख कर जलाने से शुरु हुई। 

‘वाद’ एक ही है, ब्राह्मण ही शत्रु है जिसके पास खेत के नाम पर कट्ठों में ज़मीन है, और पुरोहित का काम करके दक्षिणा से मिले पैसों या अन्न से घर चलाने की जद्दोजहद, लेकिन घेरना तो है ही किसी को। प्रचलित शब्द भी ब्राह्मणवाद है क्योंकि यही बार-बार लिखा और बोला गया है। किसी ने न तो प्रतिशत निकाला, न उनकी सामाजिक स्थिति पता करने की कोशिश की, पाँच हजार सालों के पाप उनके नाम कर दिए गए, जबकि उस काल की किताबों में ऐसा एक वाक़या नहीं है जो यह साबित कर सके। 

यह बात गलत नहीं है कि दलितों की स्थिति बहुत खराब है, और सवर्णों द्वारा बहुत ही घटिया स्तर के भेदभाव हुए हैं, हो रहे हैं, लेकिन इसके नाम पर राजनीति चमकाने वालों ने जब ब्राह्मण वोटों के लिए, ब्राह्मणों को साधना शुरु किया तब समझ में आने लगा कि राजनीति का अपना रंग होता है, उसकी अपनी आइडेंटिटी होती है, जो विचारधारा, धर्म, जाति और निजी दुश्मनी से भी परे होती है। कितने दलित नेता ब्राह्मण जाति के लोगों से दूर हैं, और कितनी रैलियों में वो ब्राह्मणों को गालियाँ नहीं देते? 

इसीलिए लोकतंत्र में लहसुन का ज़ायक़ा आ जाता है। रावण जब रा.टू बनने निकलता है तो उसे पता है कि वोट कहाँ से आएँगे, और उसे यह भी पता है कि किसकी राजनीति पर उसे हमला करना है। उसके लिए नए विशेषण बनाने का समय नहीं होता। वो नए ‘वाद’ को लोकसभा चुनावों के पंद्रह दिन पहले नहीं गढ़ सकता। उसके लिए ये मौका डेस्पेरेशन वाला हो जाता है। और तब वह बोल देता है कि मायावती मनुवादी है। 

उसे यह साबित नहीं करना है, क्योंकि साबित करने की ज़रूरत नहीं है। ज़रूरत इसलिए नहीं है क्योंकि दलितों की स्थिति में कोई खास सुधार हुआ नहीं है। किसी भी दलित व्यक्ति को, जो सही मायनों में वंचित और पिछड़े हैं, बताने की आवश्यकता नहीं कि उसके जीवन में मायावती ने क्या बदलाव किए हैं। मायावती ने हाथी बनवाए, मुलायम पुत्र ने ज़मीन हथियाई और दलितों का जीवन वैसे ही चलता रहा, जैसे चलता रहा था। 

आशा बेचकर नेता बनना सबसे आसान है। इस उत्पाद को बेचना तब बेहद आसान हो जाता है जब लोगों में निराशा होती है। जब लोगों में निराशा होती है, और जब लोगों ने नेताओं को लगातार देख लिया हो, तो नई पीढ़ी यह सोचने लगती है कि किसी और को भी मौका देना चाहिए। यही वो ट्रान्जिशन का दौर होता है, जब सत्ताधीशों की नई पीढ़ी और वोटरों की नई पीढ़ी के बीच रावण भी अवतार लेकर किसी का भला करने की बात करने लगता है। 

आज मनुवाद फिर से चर्चा में है। मनुवाद का मतलब मनुवाद बोलने वालों को ठीक से पता नहीं, तो गाँव के ग़रीबों और वंचितों को क्या पता होगा। आप में से एक प्रतिशत भी लोग ऐसे नहीं होंगे जिनके घरों में मनुस्मृति रखी हो, और आपके पिता या दादा मनु की बात करते हों। फिर ये मनुवाद आता कहाँ से है? 

ये वहीं से आता है जहाँ से एकतरफ़ा संवाद के ज़रिए झूठों की उत्पत्ति होती है। अस्तित्व की लड़ाई करता व्यक्ति हर वो पैंतरा आज़माता है जिससे वो किसी भी तरह सत्ता पा सके। इसके लिए उसे फर्जी सेमिनार कराना पड़े, तो विलियम जोन्स सेमिनार कराता है और मैक्समूलर से लेकर तमाम तथाकथित विद्वानों की मदद से कल्पना को इतिहास बनाकर भारतीय जनता के लिए भारत के इतिहास के आधार पर रखकर चला जाता है। फिर एक बहुत बड़ी साज़िश के तहत आर्य और द्रविड़ पैदा होते हैं, फिर गोरे और काले चमड़ी के नाम पर नोआ और हैम की बातों के ज़रिए हमारे भीतर ज़हर भरा जाता है। 

इसलिए आपके फ़िल्मों में रहीम चाचा, फ़ादर दिस दैट हमेशा दरियादिल दिखते हैं, और ब्राह्मण हमेशा व्यभिचारी दिखाया जाता है, लाला हमेशा सूदखोर बताया जाता है। इस पूरे नैरेटिव में एक भी बार बदलाव नहीं आता, जबकि समाज में इसके उलट कुछ और ही चल रहा होता है। 

इसीलिए, लोकतंत्र में एक लहसुनतंत्र बनता है। इसकी कलियाँ एक साथ, बिना किसी गैप के, अपनी भीतरी सच को सफ़ेद लैमिनेशन से ढके, चिपकी एक बनी रहती हैं। ये सारे चोर, एक भाषा बोलते हैं। सारे लहसुन हर नैरेटिव में, हर भाषण में, हर रैली में, हर चर्चा में, हर पैनल डिस्कशन में, हर प्राइम टाइम में एक भाषा बोलते हैं। 

तब, सारे सामाजिक अपराध राजनैतिक हो जाते हैं। तब, सारे सामाजिक अपराध धार्मिक हो जाते हैं। तब सीट का झगड़ा बीफ का झगड़ा हो जाता है। तब, आतंकी भटके हुए नौजवान हो जाते हैं। तब, भीड़ हत्या के रिकॉर्ड से सिर्फ समुदाय विशेष के ही नाम निकाले जाते हैं। तब, किसी दलित की पिटाई के लिए हर सवर्ण ज़िम्मेदार हो जाता है। तब, कठुआ की पीड़िता के लिए पूरा हिन्दू समाज उत्तरदायी होता है, और गीता के बलात्कारियों पर चर्चा नहीं होती।

तब, सारी समस्या की जड़ में वो व्यक्ति हो जाता है जिसके होने का सच स्वीकारने पर दिक्कत है, लेकिन उसकी लिखी बातों के नाम पर मनुवाद फैलाकर लोग चुनाव जीत जाते हैं। तब दलितों की भीम आर्मी का रावण, दलितों की सबसे बड़ी नेत्री पर मनुवाद खींच कर फेंकता है और इकोसिस्टम लहालोट हो जाता है। 

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वायनाड से संसद की राह ‘जलेबी’ जैसी सीधी, यह समीकरण देख लीजिए राहुल G

उत्तरी केरल के वायनाड लोकसभा क्षेत्र से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद से ही यह पहाड़ी जिला राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गया है। करीब एक हफ्ते के संशय के बाद कॉन्ग्रेस ने रविवार (मार्च 31, 2019) को औपचारिक रूप से घोषणा कर दी है कि राहुल गाँधी उत्तर प्रदेश में अमेठी के अलावा वायनाड से भी चुनावी मैदान में उतरेंगे। राहुल पहली बार किसी दक्षिण भारतीय राज्य से चुनाव लड़ने जा रहे हैं।

सोमवार को एनडीए ने भी केरल के वायनाड लोकसभा सीट पर अपने प्रत्याशी की घोषणा कर दी। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने ट्वीट कर कहा कि तुषार वेल्लापल्ली को वायनाड सीट से प्रत्याशी बनाया गया है। बता दें कि तुषार भारत धर्म जन सेना (बीडीजेएस) के अध्यक्ष और केरल में एनडीए के संयोजक हैं। इसके साथ ही तुषार केरल के इजावा समुदाय के शक्तिशाली संगठन श्री नारायण धर्म परिपालन योगम (एसएनडीपी) के उपाध्यक्ष भी हैं।

राजनीतिक तौर पर मजबूती की बात करें तो केरल में सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) ने इस क्षेत्र से भाकपा के पीपी सुनीर को चुनावी मैदान में उतारा है। वह अपने स्कूल के दिनों में सीपीआई के छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन में शामिल हुए थे और बाद में पार्टी के युवा संगठन ऑल इंडिया यूथ फेडरेशन के राज्य उपाध्यक्ष बने। राहुल के नाम के ऐलान के बाद वाम दलों में हलचल मच गई। वाम दलों ने इसे भाजपा के ख़िलाफ़ लड़ाई को कमजोर करने का प्रयास बताते हुए राहुल को हराने का दावा किया है। भाकपा महासचिव एस. सुधाकर रेड्डी ने राहुल गाँधी के इस फैसले पर ऐतराज जताया और साथ ही कहा कि इस चुनाव में वाम मोर्चा राहुल गाँधी को हराने के सभी प्रयास करेंगे।

यहाँ पर गौर करने वाली बात ये है कि इस सीट पर भाजपा की तरफ से उतारे गए प्रत्याशी तुषार वेल्लापल्ली वहाँ के लोकल प्रत्याशी हैं। तो जाहिर सी बात है कि उनकी उस क्षेत्र के लोगों पर अच्छी पकड़ होगी और इस वजह से उन्हें वहाँ के दक्षिणपंथियों का पूर्ण समर्थन मिलने की संभावना है। वहीं अगर बात करें, वाम दल की तरफ से उतारे गए कैंडिडेट पीपी सुनीर की, तो वो भी वहाँ के लोकल हैं। वहाँ के वाम राजनीति को समर्थन देने वाले वोटरों पर सुनीर की पकड़ मजबूत होगी, इसमें कोई दो राय नहीं। शायद यही वजह रही होगी कि उन्होंने राहुल गाँधी को हराने की चेतावनी भी दी थी।

अब यहाँ पर सवाल ये उठता है कि अगर राहुल गाँधी को वहाँ के वामपंथियों का भी वोट नहीं मिला, तो फिर वो किस आधार पर चुनाव जीतने का ख्वाब देख रहे हैं? राहुल गाँधी की इस समय हालत कुछ ऐसी हो गई है, जिससे वो न तो घर के दिख रहे हैं और न घाट के। वो इसलिए क्योंकि एक तरफ तो अमेठी में स्मृति ईरानी उन्हें कड़ी टक्कर दे रही हैं। और दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस ने राहुल को जिस चाल के तहत वायनाड सीट से चुनाव लड़ाने का फ़ैसला लिया, अब वो उल्टा पड़ता दिख रहा है। देखा जाए तो राहुल की स्थिति को लेकर कॉन्ग्रेस दोनो ही सीटों पर डरी हुई है। कहीं राहुल का हाल ऐसा न हो जाए कि ‘चौबे गए छब्बे बनने दुब्बे बनकर आ गए।’

गौरतलब है कि वायनाड सीट 2008 में हुए परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई है। वायनाड लोकसभा के तहत सात विधानसभा क्षेत्र आते हैं। इनमें से तीन वायनाड जिले के, तीन मल्लापुरम जिले के और एक कोझीकोड जिले से हैं। यहाँ 2009 में कॉन्ग्रेस के एमआई शाहनवाज़ ने जीत हासिल की थी। उन्होंने सीपीआई के उम्मीदवार को सीधी मात दी थी। 2014 में भी उन्होंने इस सीट से जीत हासिल की थी, मगर 2018 में उनके निधन के बाद से यह सीट खाली है। यहाँ पर 23 अप्रैल को मतदान होना है।

मोदी पर Eros Now की वेब सीरीज, सोनू निगम ने PM की लिखी कविता को दी आवाज़

नरेंद्र मोदी पर विवेक ओबेरॉय अभिनीत फ़िल्म के अलावा एक सीरीज भी आ रही है। 10 एपिसोड वाली इस सीरीज में प्रसिद्ध गायक सोनू निगम पीएम मोदी की लिखी कविता को अपनी मधुर आवाज़ से सँवारेंगे। इस सीरीज का ट्रेलर जारी किया जा चुका है और इसे सोशल मीडिया पर लोगों द्वारा काफ़ी पसंद भी किया जा रहा है। ‘ओ माय गॉड’ और ‘102 नॉट आउट’ जैसी अवॉर्ड विनिंग फ़िल्में डायरेक्ट कर चुके उमेश शुक्ला इस सीरीज के निर्देशक हैं। गुजराती नाटक ‘कांजी vs कांजी’ के निर्देशक के रूप में गुजराती थिएटर जगत में प्रसिद्धि कमा चुके शुक्ला इस से पहले कई फ़िल्मों भी कर चुके हैं।

इरोज द्वारा जारी किया गया सीरीज का ट्रेलर

फैसल ख़ान इस सीरीज में किशोर नरेंद्र मोदी की भूमिका में दिखेंगे। लोकप्रिय संगीत निर्देशक सलीम-सुलेमान ने इसका म्यूजिक तैयार किया है। सोनू निगम ने पीएम मोदी की कविता ‘श्याम के रोगन रेले’ की रिकॉर्डिंग भी पूरी कर ली है। निर्देशक शुक्ला ने बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) से नरेंद्र मोदी द्वारा रचित 10 कविताओं को संगीत के रूप में उतारने की अनुमति भी ले ली है। इस सबका प्रयोग आगामी सीरीज में किया जाएगा। इरोज नाउ के इस से जुड़े होने के कारण इस सीरीज को लेकर चर्चाएँ तेज़ हैं। बाजीराव मस्तानी, बजरंगी भाईजान, तनु वेड्स मनु और इंग्लिश इंग्लिश जैसी फ़िल्मों का निर्माण कर चुका इरोज सिनेमा की दुनिया में एक बड़ा नाम है।

सीरीज का दूसरा ट्रेलर

हर एक एपिसोड के ख़त्म होने पर आने वाले क्रेडिट्स में इन कविताओं का प्रयोग किया जाएगा। शुक्ला ने कहा कि सलीम-सुलेमान और सोनू निगम की जुगलबंदी के कारण इस गाने में चार चाँद लग गए हैं। इस वेब सीरीज को अप्रैल में रिलीज किया जाएगा। उमेश शुक्ला ने अंदेशा जताया कि उनकी ये सीरीज भी चुनाव आयोग के रडार पर आ सकती है क्योंकि चुनाव आयोग ने विवेक ओबेरॉय द्वारा मोदी पर बनाई जा रही बायोपिक को लेकर निर्माताओं से कमेंट माँगा है। लेकिन, शुक्ला ने कहा कि चूँकि वेब सीरीज थिएटर में और बॉक्स ऑफिस पर रिलीज नहीं होती, इसीलिए इस पर आचार संहिता लागू नहीं होगी।

अपनी फिल्म ‘ओ माय गॉड’ के बारे में बात करते हुए शुक्ला ने कहा कि उस दौरान भी उन्हें काफ़ी धमकियाँ मिली थीं और पूछा गया था कि वह ऐसी फ़िल्में भारत में कैसे बना सकते हैं? उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी पर बन रही सीरीज पर एक वर्ष पहले ही कार्य शुरू कर दिया गया था। उन्होंने बताया कि इसकी शूटिंग पूरी की जा चुकी है और ये अब एडिटिंग की प्रक्रिया में है। सभी एपिसोड आधे से लेकर पौन घंटे तक के होंगे। उन्होंने कहा कि इसे जल्द से जल्द रिलीज़ करने की कोशिश की जा रही है।

इस सीरीज की शूटिंग गुजरात के सिद्धपुर और वडनगर में की गई है। यही वो जगहें हैं, जहाँ पीएम मोदी का बचपन गुजरा था। इस सीरीज में मोदी चायवाला से प्रधानमंत्री बनने तक के सफर को उकेरा गया है। इसमें उनके सन्यासी के रूप में कुछ वर्ष बिताने से लेकर आपातकाल के दौरान उनके द्वारा किए गए कार्यों को भी दिखाया जाएगा। विवेक ओबेरॉय की फ़िल्म और उमेश शुक्ल की सीरीज के अलावा अभिनेता परेश रावल भी मोदी की बायोपिक बनाने तैयारी में हैं। वो कई बार कह भी चुके हैं कि सिल्वर स्क्रीन पर नरेंद्र मोदी की भूमिका उनसे अच्छी कोई नहीं निभा सकता।

‘आतंकवाद से लड़ने’ के बजाय फलाने दिन-तारीख-समय पर फलाने व्यक्ति को मारना है: अजित डोभाल

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार श्री अजित डोवाल ने हाल ही में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के चीफ इनोवेशन ऑफिसर डॉ.अभय जेरे को एक साक्षात्कार दिया। लोकसभा टीवी द्वारा प्रसारित यह साक्षात्कार डोवाल का एनएसए बनने के बाद संभवतः पहला विस्तृत साक्षात्कार था। इसे हम दो हिस्सों में प्रकाशित कर रहे हैं।

प्रथम हिस्से के महत्वपूर्ण अंश:

‘बहुत महीन फर्क होता है सही निर्णय और गलत निर्णय में’

सवाल था कि बालाकोट के समय किसी भी मौके पर क्या उन्हें यह लगा कि इस निर्णय को लेना सही न रहा हो। डोवाल ने कहा कि सामान्यतः निर्णय का सही या गलत होना उसे ले लिए जाने और परिणाम आने के बाद ही समझ में आता है। और सही-गलत निर्णय लेने वालों की मानसिकता और क्षमता में कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं होता। अतः ‘सही निर्णय’ लेने के लिए जरूरी मानसिक स्थिति को समझ कर उसका विकास करना सही निर्णय लेने की चिंता करने से अधिक आवश्यक है।

अपनी व्यक्तिगत निर्णय-प्रक्रिया के बारे में बात करते हुए अजित डोवाल ने कहा कि वे सबसे बुरी स्थिति को सबसे पहले दिमाग में स्पष्ट तौर पर कल्पित करते हैं। उसकी ‘कीमत’ के बारे में सोचते हैं- यहाँ तक कि लोगों की मृत्यु के खतरे को भी कीमत-बनाम-परिणाम के रूप में।

फिर वे उस worst-case-scenario के छोटे-छोटे हिस्सों में छोटे-छोटे सुधार करने के तरीके ढूँढ़ते हैं- (मसलन यदि 35 लोग  worst-case-scenario में मर रहे हैं तो इसे कम-से-कम कैसे किया जाए – यह सिर्फ उदाहरण के तौर पर दिया गया है, ताकि बात समझने में आसानी हो, डोवाल ने खुद नहीं कहा है।)

इस प्रक्रिया को करते हुए वह worst-case-scenario को उस स्तर पर ले आने की कोशिश करते हैं जहाँ निर्णय को लेने से होने वाला नुकसान, या उस निर्णय की ‘कीमत’, उससे होने वाले संभावित फायदे से कम हो जाए- यह उस निर्णय पर अमल करने की न्यूनतम शर्त होती है। बाद में वह इसमें और भी सुधार की जहाँ कहीं गुंजाईश हो, उसे करते रहते हैं।

इसके लिए वे जरूरी समय और तैयारी को आवश्यक मानते हैं। इसके अलावा उनके हिसाब से गुप्तचरों की दुनिया में तकनीकी और गुप्त सूचनाओं का भी आवश्यक स्तर पर होना महत्वपूर्ण होता है।

निर्णय लेने में होने वाले भय को लेकर उनका मानना है कि इस भय को भगाने का सबसे अच्छा तरीका अपने भय को विस्तारपूर्वक, स्पष्ट शब्दों में उल्लिखित करना होता है। उनके हिसाब से अधिकांश मामलों में ऐसा करने से हमें यह अहसास होता है कि हमारे भय का कारण असल में भय से बहुत छोटा है। जिन मामलों में ऐसा नहीं भी होता, वहाँ स्पष्ट रूप से भय को व्यक्त कर देने से उस स्थिति के बारे में क्या किया जा सकता है, यह समझ में आ सकता है।

बहुत महत्वपूर्ण निर्णयों- जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा, में वह इस पर भी जोर देते हैं कि किसी एक योजना पर पूरी तरह निर्भर न रहा जाए, बल्कि वैकल्पिक योजनाएँ तैयार रखीं जाएँ। इसके अलावा वे हर बदलती परिस्थिति से निपटने के लिए लचीलेपन का होना जरूरी मानते हैं।

‘कठिन निर्णय लेने के लिए जरूरी है…’

डोवाल की ‘कठिन निर्णय’ की परिभाषा है – ऐसा निर्णय जिसके परिणाम एक बड़ी संख्या के लोगों को एक लम्बे समय के लिए प्रभावित करें। ऐसे निर्णयों में वह बताते हैं कि छोटी-सी चूक कई बार इतिहास की पूरी धारा पलट देती है।

ऐसे महत्वपूर्ण निर्णय के लिए उदाहरण वे प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित नेहरू के कश्मीर के मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने का देते हैं। उनके अनुसार उस निर्णय के कारण ही पीओके को पाकिस्तान के चंगुल से मुक्त नहीं कराया जा सका और कश्मीर ही भारत की सभी आतंकवादी समस्याओं के मूल में है। अतः पण्डित नेहरू का वह निर्णय संयुक्त राष्ट्र के कश्मीर पर निर्णय के चलते भारत के दीर्घकालीन हितों के साथ साम्य में नहीं साबित हुआ।

इस उदाहरण को पकड़कर वे आगे समझाते हैं कि दीर्घकालीन, महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए लक्ष्य की स्पष्टता अति आवश्यक है। इसके लिए वे एक ‘टेक्नीक’ भी बताते हैं, जो कि नेताओं से लेकर आम आदमी तक हर किसी के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती है।

डोवाल लक्ष्य को एक कथन में परिवर्तित करने की सलाह देते हैं। और उस कथन से सभी विशेषण और क्रियाविशेषण हटा देने को कहते हैं। यानि केवल संज्ञा और क्रिया बचे। यानि आप का लक्ष्य कथन यह बताए कि क्या करना है, और किन चीज़ों के साथ करना है। किन चीज़ों की भूमिका है।

उसे वे यथासंभव सरल और लघु बनाने को कहते हैं, और व्यर्थ की दार्शनिकता हटाने को कहते हैं।

“यह मत कहिए कि ‘हमें आतंकवाद से लड़ना है’।” वह उदाहरण देते हैं, “यह एक अस्पष्ट और बहुत ही सामान्यीकृत कथन है- यह लक्ष्य नहीं हो सकता। यह तय करिए कि फलाने दिन-तारीख-समय पर फलाने व्यक्ति या गुट को मार गिराना है।”

वह लक्ष्य की स्पष्टता पर जोर देते हुए यह भी इंगित करते हैं सामान्यतः भारतीयों में यह बीमारी होती है कि हम अति दार्शनिकता, तर्क, चिंतन आदि में लक्ष्य को अस्पष्ट और निर्णय को कमजोर कर देते हैं।

‘निर्णय कब नहीं लेना चाहिए’

आगे डोवाल यह समझाते हैं कि निर्णय लेने के लिए क्या-क्या आवश्यकताएँ निर्णय लेने से पहले पूरी होनी चाहिए। सबसे पहले निष्पक्ष भाव से अपनी शक्तियों, दुर्बलताओं, परिस्थितियों, संसाधनों और संभावनाओं की ईमानदार विवेचना आवश्यक है।

वे साथ में यह भी आगाह करते हैं कि भय या क्रोध के वशीभूत होकर निर्णय लेना हमेशा हानिकारक होता है क्योंकि इनके प्रभाव में व्यक्ति तटस्थ नहीं रहता। भयभीत व्यक्ति को ‘मिशन’ की सफलता से अधिक चिंता अपने भय की वस्तु (मसलन अपनी जान) की होती है; वहीं गुस्से में अँधा इंसान अपने अहम् की पूर्ति के लिए मिशन की सफलता के लिए जरूरी संसाधन (मसलन अपनी जान) को दाँव पर लगा बैठता है। यानी कि दोनों ही, क्रोध और भय, लक्ष्य आधारित निर्णय के शत्रु हैं।

डोवाल बताते हैं कि कोई भी निर्णय लेने के पूर्व वे खुद से यह जरूर पूछते हैं कि क्या वे भयभीत या क्रुद्ध तो नहीं हैं। यदि उत्तर हाँ में होता है तो वे निर्णय लेने को तब तक के लिए टाल देते हैं जब तक वे इन भावों पर जय न प्राप्त कर लें।

‘निर्णय ही नहीं, सही विकल्प का चयन भी है जरूरी’

अपने लक्ष्य को तय कर लेने के बाद डोवाल का अगला कदम होता है अपने सामने मौजूद विकल्पों की समीक्षा, और सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चुनाव। वह बताते हैं कि हालाँकि कठिन निर्णयों में विकल्प बहुत सीमित होते हैं, पर सर्वथा अभाव कभी नहीं होता। कई बार अपने अनुभव और ज्ञान से आप नए विकल्पों का ‘निर्माण’ भी कर सकते हैं।

गुप्तचरी में, डोवाल के अनुसार, हर विकल्प के साथ समय, मूल्य (आर्थिक व अन्य, यहाँ तक कि सैनिकों की जान के रूप में भी), और अवसर- यह तीन बाध्यताएँ या बंधन (constraints) होते हैं। हर विकल्प को इन तीन कसौटियों पर विश्लेषित कर यह तय करना होता है कि कम-से-कम कीमत पर लक्ष्य को पूरा करने के सबसे करीब कौन सा विकल्प है।

वे आगे बताते हैं कि अधिकांश समय निर्णय और लक्ष्य-निर्धारण भली-भांति कर लेने के बावजूद उस पर अमल करने के लिए गलत विकल्प का चुनाव असफलता का कारण बनता है। इसके अलावा कई बार असफलता का कारण यह भी हो जाता है कि सभी तरह के चुनाव सही कर लेने के बाद तैयारियों में मानवीय कमी रह जाती है- यानि हम अपना शत-प्रतिशत (100%) अपने लक्ष्य को नहीं देते। बाद में अहसास होता है कि यदि इसी चीज़ में अपना सौ फीसदी लगाते तो सफलता मिल सकती थी!

अंत में अजित डोवाल यह भी जोड़ते हैं कि कई बार लक्ष्य-निर्धारण और विकल्प का चुनाव सही होने पर भी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं, और उस स्थिति में अपने निर्णय के साथ दृढ़ता के साथ खड़े होकर जो भी परिस्थिति आए, उसमें अपने निर्णय को सही साबित भी करना पड़ता है। वह ऐसी स्थिति की मिसाल के तौर पर शादी को देखते हैं। जैसे कई बार सही इन्सान से शादी करने पर भी जीवन में हर परिस्थिति सही नहीं बीतती, और कई बार हर परिस्थिति में अपने शादी के निर्णय को ही सही साबित करना पड़ता है, अपने अनुकूल परिणाम लाकर।

‘अजित डोवाल में अलग क्या है?’

सवाल था कि अजित डोवाल के बारे में उन्हें जानने वाले कई सारी चीजें कहते हैं, कई सारी विशिष्टताएँ बताते हैं, जिनमें उनका तथाकथित एकाकीपन और टीम की बजाय अकेले गुप्तचर के तौर पर काम करना पसंद करना सबसे ज्यादा उभर कर सामने आता है।

जवाब में छद्म विनम्रता का नाटक न करते हुए डोवाल यह बिना लाग-लपेट के मान लेते हैं कि उनके गुप्तचर करियर से पहले के जीवन ने उनमें निश्चय ही कुछ विशिष्ट गुणों का विकास किया है, जिनका उनके करियर की सफलता में बड़ा योगदान रहा।

अपनी सबसे विशिष्ट चीज़ वह अकेले काम करने की प्रवृत्ति को मानते हैं। उन्होंने बताया कि उनके एकाकी स्वभाव और अकेले काम करने की ओर झुकाव को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही तरीकों से देखा गया है। एकाकी इकाई के तौर पर काम करने के पीछे वह कारण यह बताते हैं कि एक गुप्तचर की तौर पर वह पूरी टीम की सभी परिस्थितियों को समझ पाने के बजाय अपनी खुद की सभी परिस्थितियों को समझ पाना और उनके अनुसार काम कर पाना और निर्णय ले पाना, ज्यादा आसान मानते थे।

उन्होंने बताया कि इसके अलावा एक और कारण था उनके अकेले काम करने का- गुप्तचरों के काम में खतरा बहुत ज्यादा होता है। और उन्हें यह पसंद नहीं था कि उनके कहने पर कोई खतरा मोल ले। अपने खतरे वह स्वयं उठाना पसंद करते थे। दूसरों को उनकी पसंद और इच्छा के हिसाब से क्या करना चाहिए, क्या खतरा उठाना चाहिए, ऐसा निर्णय लेने देना उन्हें ज्यादा सही लगता था।

डोवाल ने साथ में यह भी जोड़ा कि गुप्तचरी के क्षेत्र में हल्के से भी संशय के साथ काम करने वाले को असफलता का ही मुँह देखना पड़ता है- और वह अपने लिए तो पक्का पता कर सकते हैं कि उनके मन में लेशमात्र भी संशय न हो (वह गीता के श्लोक “संशयात्मा विनश्यति” को उद्धृत करते हैं) पर वह अपने साथ काम कर रहे किसी गुप्तचर के मन में संशय न होने को लेकर आश्वस्त नहीं हो सकते।

वह ऑपरेशन ब्लैक थंडर का उदाहरण देते हैं कि कैसे जब किसी-न-किसी को ऑपरेशन शुरू होने के पहले अन्दर जाकर आतंकियों की स्थिति के बारे में जानकारी एकत्र करनी थी तो उन्होंने अकेले ही जाना पसंद किया। (बता दें कि इस ऑपरेशन से पहले अजित डोवाल रिक्शा चालक बनकर स्वर्ण मंदिर के अन्दर घुसे थे और दो दिन में आतंकियों की संख्या और पोजीशन के विषय में अहम जानकारी जुटाई थी)

डोवाल ने बताया कि उस दौरान वे अकेले ज्यादा महफूज़ महसूस कर रहे थे। उनके अनुसार गुप्तचरी में अकेले होने का एक फ़ायदा यह भी होता है कि अगर आप गलती से पकड़े गए तो आपके झूठ को काट कर उससे अलग कह देने वाला कोई नहीं होता। इसलिए अगर अकेला गुप्तचर बहुत चालाक है तो वह पकड़े जाने पर भी गुप्त जानकारियाँ ज्यादा आसानी से दुश्मन के हाथ लगने से रोक सकता है और मौका मिलने पर दुश्मन को यथासंभव धोखा दे स्थिति अपने हक़ में पलट सकता है।

अपनी अगली खूबी वह अप्रत्याशित होना बताते हैं। उनके अनुसार उनके 75 वर्षीय जीवन में कभी भी काम करने का तय तरीका नहीं रहा, जिसे तड़ कर दुश्मन उनकी अगली चाल को भाँप जाए। वह हमेशा किसी भी कार्य को करने के लिए हमेशा नौसिखिए के अंदाज में जाते’ हैं। इससे उन्हें दो फायदे होते हैं- एक तो वह पहले से कुछ भी मान कर नहीं चलते, और दूसरा हर बार काम को करने का नया तरीका तलाशते रहते हैं। यहाँ वह कुछ पलों के लिए दार्शनिक हो कहते हैं, “जीवन का हर एक क्षण बचे हुए जीवन का पहला क्षण होता है और इसीलिए उसे बची हुई ज़िन्दगी की एक ताज़ा शुरुआत के तौर पर लेना चाहिए।”

अपनी गति को भी वह अपने गुप्तचर करियर की सफलता का श्रेय देते हैं- उनके अनुसार बेहतर होगा कि हमेशा तेजी से या तो हमला करो या पीछे हट जाओ। इससे सामने वाले को संभलने या पलटवार करने का मौका नहीं मिलता। वह यह भी बताते हैं कि कई बार द्रुत गति गुप्त सूचना लीक हो जाने या प्रक्रियात्मक गलती की भी भरपाई कर सकती है, बशर्ते आप दुश्मन से हमेशा एक कदम आगे चलने लायक तेज़ हों। उस स्थिति में हालाँकि आपकी जीत का अंतर भले ही सामान्य परिस्थिति के मुकाबले बहुत कम हो जाता है, पर कम से कम विजय मिल जाती है।

अंत में वह यह भी जोड़ते हैं कि ‘हर गुप्तचर के लिए वाक्पटु होना’ और ‘गुप्त सूचनाओं को गुप्त रख पाने में सक्षम होना’- दोनों ही अति आवश्यक हैं।

अभी के लिए इतना ही । इस साक्षात्कार का अगला भाग शीघ्र प्रकाशित होगा।