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12 डिब्बे पलटे, कई घायल: हावड़ा से दिल्ली आ रही पूर्वा एक्सप्रेस का कानुपर में Accident, हेल्पलाइन नंबर जारी

शुक्रवार (अप्रैल 20, 2019) की देर रात हावड़ा से नई दिल्ली आते हुए पूर्वा एक्सप्रेस (ट्रेन संख्या: 12303) एक दुर्घटना की शिकार हो गई। खबरों की मानें तो ट्रेन दो हिस्सों में बँटने के कारण देर रात बेपटरी हो गई थी। जिसके कारण ट्रेन के 12 डिब्बे पलट गए। इस घटना में कुछ यात्रियों के घायल होने की भी खबर है।

रेलवे की मानें तो इस घटना में एक आदमी को छोड़कर किसी यात्री को गंभीर चोट नहीं आई है। रेलवे ने पूछताछ और सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर (033) 26402241, 26402242, 26402243, 26413660 जारी किए हैं।

गौरतलब है कि यह ट्रेन कानपुर से 15 किलोमीटर दूर रूमा कस्बे के पास दुर्घटनाग्रस्त हुई। रात के 2:30 बजे जिलाधिकारी, 30 एंबुलेंस, एसएसपी, फायर ब्रिगेड और पुलिस मौके पर पहुँची और राहत बचाव कार्य शुरू हुआ।

घायलों को वहाँ के करीबी काँशीराम ट्रॉमा सेंटर और हैलट अस्पताल में इलाज के लिए भेजा गया। इस हादसे के कारण 11 अन्य ट्रेनों को रद्द किया गया है और कई ट्रेनों को डायवर्ट किया गया है। घटना में 14 लोगों के घायल होने की खबर सामने आ रही है।

बताया जा रहा है कि रात के 1:00 बजे ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार से दिल्ली की ओर आ रही थे, तभी कानपुर से करीब 15 किलोमीटर पहले ही ट्रेन रूमा इंडस्ट्रियल एस्टेट के पास अचानक से दो हिस्सों में बँट गई। जिसके कारण जोरदार आवाज आई और ट्रेन के यात्रियों में हड़कंप मच गया।

रेलवे का कहना है कि जाँच के बाद हादसे की वजह पता चलेगी। फिलहाल कानपुर सेंट्रल से एक स्पेशल ट्रेन के जरिए करीब 900 यात्रियों को नई दिल्ली के लिए भेजा गया है।

सेना से सबूत माँगने वाले जब हेमंत करकरे के लिए बिलबिलाते हैं तो क्यूट लगते हैं

कई बार हमने हॉलीवुड और बॉलीवुड की फ़िल्मों में देखा है कि पूरे डिपार्टमेंट की इज़्ज़त बचाने के लिए एक गंदे अफसर को डिपार्टमेंट स्वयं ही मार देती है, और उसे शहीद का दर्जा दे दिया जाता है। इससे दोनों समस्याएँ सुलझ जाती हैं कि पब्लिक में पुलिस या सेना जैसी संस्था पर विश्वास बना रहता है, और डिपार्टमेंट से एक भ्रष्ट या सड़ा सेव बाहर कर दिया जाता है।

साध्वी प्रज्ञा की बहन और कर्नल पुरोहित की पत्नी का इंटरव्यू पढ़िएगा या देखिएगा कहीं से खोज कर। सेना के एक डेकोरेटेड अफसर पर हिन्दू टेरर का टर्म पोलिटिकल मास्टर्स को खुश करने के लिए ही गढ़ा गया था। उसका और कोई औचित्य नहीं था। इसके लिए सबूत चाहिए थे, धाराओं को संतुष्ट करने के लिए घटनाएँ चाहिए थीं, और उसके लिए लोग चाहिए थे।

आरवीएस मणि जो उस समय सरकारी अफसर थे, उन्होंने बताया है कि हेमंत करकरे की इसमें कितनी इन्वॉल्वमेंट थी और वो दिग्विजय सिंह के साथ गृहमंत्री पाटिल के साथ क्या करते थे। करकरे को सरकार और डिपार्टमेंट ने सम्मान दिया क्योंकि करकरे की असामयिक मृत्यु हो गई। अगर करकरे ज़िंदा होते तो शायद उन पर हिन्दू टेरर गढ़ने और झूठे केस बनाने के आरोप पर मामले चल रहे होते। या, करकरे कॉन्ग्रेस की योजना को सफल करके इस्लामी आतंक में मज़हब के न होने और चार लोगों के ब्लास्ट में संलिप्त होने की कहानी के आधार पर पूरा हिन्दू समाज भगवा आतंक का धब्बा लिए जी रहा होता।

मैं इस बात से इनकार नहीं कर रहा कि समुदाय विशेष को भी गलत आरोप और अपराध के नाम फँसाया गया है लेकिन न्याय का एक सीधा दर्शन है कि हजार गुनहगार छूट जाएँ लेकिन किसी भी बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए। आप जब उन यातनाओं के बारे में सुनिएगा तो शायद समझ में आएगा कि आज अगर साध्वी प्रज्ञा ने हेमंत करकरे को शाप देने की बात कही, तो वो किसी भी रूप में ज़्यादती नहीं।

ज़्यादती इसलिए नहीं कि इसी देश के वही बुद्धिजीवी सेना द्वारा मारे आतंकियों के भाई द्वारा हथियार उठा लेने को जस्टिफाय करते हैं, सेना के अफसर द्वारा डाँटे जाने के बाद पुलवामा जैसी घटना करने वाले को जस्टिफाय करते हैं, आतंकी के बाप का हेडमास्टर होना और आतंकी के बेटे का दसवीं एग्ज़ाम पास करना ऐसे शेयर करते हैं जैसे उनका आतंकी होना मामूली बात थी, और आतंकी भाई या आतंकी बाप के मारे जाने के बाद, बदले की भावना में कोई बेटा या भाई आतंकी बन जाए तो उसके पास पर्याप्त कारण हैं, ऐसा मानते हैं, उनके लिए यह सोचना दुखप्रद है कि एक आम नागरिक को लगभग दस सालों तक यातनाएँ दी गईं, और वो उन लोगों के खिलाफ कुछ कहे!

साध्वी प्रज्ञा पर जो बीती है, वो हम या आप महसूस भी नहीं कर सकते। हेमंत करकरे एक भ्रष्ट अफसर थे या नहीं, यह तो बाद की बात है, लेकिन क्या किसी की रीढ़ की हड्डी तोड़ देना, उसे अश्लील फ़िल्में दिखाना, लगातार पीटना, गोमांस खिलाना, यह जान कर कि वो एक धार्मिक महिला है, उस यातना को झेलने वाली स्त्री को वैसे अफसर के खिलाफ बोलने का भी हक़ नहीं?

क्यों? क्योंकि वो चुनाव लड़ रही है? उसके तो चुनाव लड़ने पर भी आपको आपत्ति है कि चूँकि उस पर आरोप है, तो वो आतंकी हो गई। इस हिसाब से तो आधे नेता चोर, बलात्कारी, या हत्यारे हैं क्योंकि सब पर केस तो हैं ही। फिर आप किस पार्टी या नेता को समर्थन दे रहे हैं? आपको कोई हक़ ही नहीं है साध्वी प्रज्ञा के निजी अनुभवों के आधार पर यातना देने वाले अधिकारी को शापित करने पर उन्हें कोसने का।

आपकी समस्या है कि आपको आपके विरोधी में आदर्शवाद देखना है। आपको सेना के जवानों से सबूत माँगते वक्त लज्जा नहीं आई, आपको एयर स्ट्राइक पर यह कहते शर्म नहीं आई कि वहाँ हमारी वायु सेना ने पेड़ के पत्ते और टहनियाँ तोड़ीं, आपको बटला हाउस एनकाउंटर वाले अफसर पर कीचड़ उछालते हुए हया नहीं आई, लेकिन किसी पीड़िता के निजी अनुभव सुनकर आपको मिर्ची लगी कि ये जो बोल रही है, वो तो पूरी पुलिस की वर्दी पर सवाल कर रही है।

इस देश का संविधान और कानून साध्वी प्रज्ञा को चुनाव लड़ने की भी आज़ादी देता है, और उसे अपनी अभिव्यक्ति का भी मौलिक अधिकार है। बात यह नहीं है कि कल को वो अपराधी साबित हो गई तो? बात यह है कि अभी वो अपराधी नहीं है, और हेमंत करकरे भले ही अपना पक्ष रखने के लिए ज़िंदा न हों, पर इतने सालों की यातना झेलने के बाद, एनआईए द्वारा चार्ज हटा लिए जाने और राहत पाकर बाहर आई इस महिला को कड़वे वचन कहने का हक़ है।

डिपार्टमेंट हेमंत करकरे को सम्मानित मानता रहे, देश भी माने लेकिन खोजी प्रवृत्ति के पत्रकार इस विषय पर शोध करना मुनासिब नहीं समझते क्योंकि ये उनकी विचारधारा को सूट नहीं करता। मेरा तो बस यही कहना है, जैसे कि बड़े पत्रकार अकसर हर बात पर कह देते हैं, कि जाँच करवाने में क्या है। करवा लीजिए जाँच करकरे की भी और साध्वी प्रज्ञा की भी। करवाते रहिए जाँच कि किसने आरडीएक्स रखवाए थे और क्यों।

मृतक का सम्मान करना ठीक है, समझदारी भी इसी में है कि अगर पुलिस नामक संस्था की इज़्ज़त बचाने के लिए किसी घटिया पुलिसकर्मी को मेडल भी देना पड़े तो दे दिया जाना चाहिए, लेकिन किसी के जीवन के दस-दस साल बर्बाद करने, उन्हें लगातार टॉर्चर करने वालों के खिलाफ पीड़िता अपना दुःख भी न बाँटे?

और हाँ, जैसा कि ऊपर लिखा, राजनीति है यह। राजनीति में शब्दों से सत्ता पलटी जा सकती है। हिन्दू टेरर भी शब्द ही थे। यहाँ आदर्शवाद को बाहर रखिए। यहाँ हर शब्द तौल कर बोले जाएँगे और हर तरफ से बोले जाएँगे। आपको किसी पीड़िता के द्वारा किसी आततायी को शाप देने पर आपत्ति है कि वो लोकसभा चुनाव लड़ रही है, फिर ‘ज़हर की खेती’, ‘मौत का सौदागर’, ‘भड़वा’, ‘दल्ला’, ‘दरिंदा’, ‘आतंकवादी’ पर आपको आपत्ति क्यों नहीं होती?

या तो आपने हर सच को परख लिया है, आपने हर बयान का सच जान लिया है, या फिर आप अपनी विचारधारा से संबंध रखने वालों के लिए सहानुभूति रखते हैं, और विरोधी विचारों के लिए आप असहिष्णुता दिखाते हैं। साध्वी प्रज्ञा ने भले ही अपने बयान पर खेद व्यक्त किया हो, लेकिन वो एक राजनैतिक निर्णय है, निजी नहीं। इतने समझदार तो आप भी हैं।

कॉन्ग्रेस शासन के अधिकारी RVS मणि ने बयान किया हेमंत करकरे और ‘भगवा आतंक’ के झूठ का सच

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को ‘भगवा आतंक’ के एक भयावह सिद्धांत को मूर्त रूप देने के लिए कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा मकोका के तहत जेल में बंद, प्रताड़ित और भयंकर रूप से तोड़ देने के लिए निर्ममता की सारी हदें पार करते हुए टॉर्चर किया गया था। उनके ऊपर की गई बर्बरता की कहानी वह कई बार सुना चुकी हैं। फिलहाल, वह औपचारिक रूप से बीजेपी में शामिल होकर दिग्विजय सिंह के खिलाफ मध्य प्रदेश के भोपाल से चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं। दिग्विजय सिंह, वह शख़्स हैं जो ‘भगवा आतंक’ सिद्धांत के प्रमुख प्रस्तावक हैं। जबकि ऐसा उन्होंने बिना किसी अधिकृत पोस्ट पर रहते हुए किया था। इससे पता चलता है कि कॉन्ग्रेस का हाथ विनाश और देश की मूल आत्मा को खोखला करने की हर लीला के पीछे कितनी गहराई से शामिल रहा है। इतिहास को जितना कुरेदा जाएगा कॉन्ग्रेस का उतना ही वीभत्स चेहरा सामने आएगा।

अब जबकि साध्वी प्रज्ञा की उम्मीदवारी और राजनीति में उनके कदमों ने कॉन्ग्रेस ही नहीं बल्कि दिग्विजय सिंह की भी नीदें उड़ा चुकी है। इस बात को और बल तब मिला जब भोपाल में बीजेपी प्रवक्ता ने कहा, “हम भोपाल से यह चुनाव हिन्दू धर्म को आतंकवाद से जोड़कर उसे अपमानित करने की कॉन्ग्रेसी साजिश के खिलाफ लड़ रहे हैं और दिग्विजय सिंह इस साजिश का चेहरा हैं।”

साध्वी प्रज्ञा की उम्मीदवारी की घोषणा के साथ ही कुछ मीडिया गिरोह के ‘तटस्थ’ टिप्पणीकार उन पर नफरत की बारिश करने के लिए लकड़बग्घे के रूप में बाहर आ चुके हैं, जिन्हे सिर्फ आतंकियों, समुदाय विशेष के मानवाधिकार दिखते हैं, हिन्दुओं के नहीं। इन्हें बर्बर आतंकियों में स्कूल मास्टर का मासूम बेटा नज़र आ जाएगा लेकिन एक साध्वी महिला में इस गिरोह को बिना एक भी सबूत के दुर्दांत आतंकी दिखने लगता है और उसके नाम की आड़ में ये पूरे हिन्दू और सन्यासी समाज को ही ‘भगवा आतंक’ का नाम दे देंगे लेकिन आज तक ये ‘मुस्लिम आतंक/आतंकी’ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाए हैं। वहाँ इन्हें भटके हुए नौजवान दिखते हैं जिनका कोई मज़हब नहीं है।

साध्वी प्रज्ञा ने अपने एक बयान में उस पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे को दोषी ठहराया, जो ‘भगवा आतंकी’ कथा को गढ़ने और आगे बढ़ाने और उन पर झूठे आरोप मढ़कर अवैध रूप से कैद में रखने की साजिश का सूत्रधार था। जो 26/11 के मुंबई आतंकवादी हमले के दौरान मारा गया था। उन्होंने कहा कि जब करकरे को जाँच एजेंसी में किसी ने कहा था कि साध्वी को बिना सबूत के नहीं रखा जाना चाहिए और इस प्रकार उनको टॉर्चर करना और उनकी नजरबंदी गैरकानूनी है, तो करकरे ने कहा कि उसे कहीं से भी सबूत जुगाड़ना पड़े या भले ही उसे गढ़ना पड़े, साध्वी प्रज्ञा को जेल में रखने के लिए, वो किसी भी हद तक जाएगा। अपने इसी बयान में साध्वी प्रज्ञा ने यह भी कहा कि करकरे को मार दिया गया क्योंकि उन्होंने उसे शाप दिया था।

शाप देने की बात पर मीडिया के तमाम गिरोहों ने साध्वी प्रज्ञा के बयान पर नाराजगी जाहिर की है। क्योंकि अब उन्हें हेमंत में सिर्फ एक कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी नज़र आ रहा है। उसकी तमाम कारस्तानियाँ भुला दी गई हैं।

हालाँकि, बीजेपी ने भी प्रज्ञा ठाकुर के हेमंत करकरे की मृत्यु वाले बयान से दूरी बना ली है। बीजेपी ने उसे उनकी निजी राय कहा है। बीजेपी ने कहा है कि वह हेमंत करकरे को हुतात्मा मानती है। दूसरी तरफ साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने भी अपना बयान वापस ले लिया है और इसके लिए माफी माँगते हुए कहा है कि यह उनका व्यक्तिगत दर्द है।

अब जब इतना कुछ सामने है तो इन मीडिया गिरोहों के छद्म आक्रोश से परे, किसी को यह मूल्यांकन करने की आवश्यकता है कि करकरे के खिलाफ जो आरोप लगाया गया है। उसमें कितनी सच्चाई है। उसके लिए, हम एक अंदरूनी सूत्र पर भरोसा कर सकते हैं। आरवीएस मणि एक पूर्व नौकरशाह हैं जिन्होंने कॉन्ग्रेस के दौर में गृह मंत्रालय में एक अंडर-सेक्रेटरी के रूप में काम किया था। अपनी पुस्तक ‘हिंदू टेरर’ में, मणि ने संपूर्ण मिलीभगत का वर्णन किया है और बताया है कि किन-किन खिलाड़ियों ने ‘भगवा आतंक’ की कहानी गढ़ने के लिए मिलीभगत की और कैसे, कई वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी नेता से लेकर कई अन्य लोग इस साजिश में शामिल थे।

हेमंत करकरे के संदर्भ में भी, आरवीएस मणि ने अपनी पुस्तक में कुछ चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। आरवीएस मणि ने अपनी पुस्तक ‘हिंदू टेरर’ में हेमंत करकरे के साथ अपनी पहली मुठभेड़ का भी वर्णन किया है।

आरवीएस मणि नागपुर में आरएसएस मुख्यालय में 2006 बम विस्फोट के बाद हेमंत करकरे के साथ अपनी बैठक के बारे में बात करते हैं। उन्होंने कहा कि वह उस समय आंतरिक सुरक्षा में काम कर रहे थे और उन्हें गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने बुलाया था। जब उन्हें अंदर ले जाया गया, तो उन्होंने शिवराज पाटिल के कक्ष में दिग्विजय सिंह और हेमंत करकरे को देखा। वह लिखते हैं कि हेमंत करकरे और दिग्विजय सिंह उनसे पूछताछ कर रहे थे, जबकि शिवराज पाटिल थोड़े असंबद्ध दिख रहे थे। उन्होंने उनसे विस्फोट के बारे में कई सवाल पूछे। आरवीएस मणि लिखते हैं कि हेमंत करकरे और दिग्विजय सिंह आरवीएस मणि की जानकारी से बहुत खुश नहीं थे कि एक विशेष मज़हबी समूह अधिकांश आतंकवादी हमलों में शामिल था।

वह लिखते हैं कि कमरे में बातचीत से, वे खुश नहीं थे कि खुफिया सूचनाओं के अनुसार, कट्टरपंथी आतंकवादियों का समर्थन कर रहे थे। उनका कहना है कि उनकी बातचीत में नांदेड़, बजरंग दल आदि के बार-बार संदर्भ थे।

वह नांदेड़ विस्फोट के बारे में आगे बात करते हैं और कहते हैं कि यह पहला मामला था जिसमें ’हिंदू आतंक’ शब्द का पहली बार इस्तेमाल किया गया था।

आरवीएस मणि कई सवाल उठाते हैं कि दिग्विजय सिंह और हेमंत करकरे इतने करीब क्यों थे? जैसा कि दिग्विजय सिंह ने खुद भी दावा किया था। इनकी करीबी खुद ही कई सवाल खड़े करती है।

आरवीएस मणि लिखते हैं, “यह याद रखना दिलचस्प हो सकता है कि दिग्विजय सिंह ने एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया था कि वह उस समय के एक पुलिस अधिकारी के साथ व्यक्तिगत संपर्क में थे, जो उनके साथ केंद्रीय गृह मंत्री के कमरे में थे और जिन्हे नांदेड़ हमले की जानकारी थी। जिससे दिग्विजय सिंह ने कुछ विशेष सूचनाएँ हासिल करने का दावा भी किया था। सिंह ने मीडिया में इस पुलिस अधिकारी का निजी मोबाइल नंबर भी जारी कर दिया था। यह उस समय के मीडिया रिपोर्टों से सत्यापित किया जा सकता है।”

वे आगे लिखते हैं, “जो पेचीदा था, जिसे मीडिया में से किसी ने भी उस समय या फिर बाद में नहीं पूछा था कि एक राजनीतिक नेता और पड़ोसी राज्य कैडर के आईपीएस अधिकारी के बीच क्या संबंध था? दरअसल, एक राज्य का मुख्यमंत्री रहने के बाद, सिंह को अपने राज्य के कई पुलिस अधिकारी जानते होंगे। लेकिन पड़ोसी राज्य के एक सेवारत IPS अधिकारी के साथ इतना दोस्ताना व्यवहार?, एक ऐसी बात है जिसका जवाब दिया जाना चाहिए। बिना किसी विशेष मकसद के एक आईपीएस अधिकारी एक पड़ोसी राज्य के राजनेता के साथ क्या कर रहा था?

ऑल इंडिया सर्विसेज (एआईएस) आचरण नियम स्पष्ट रूप से अधिकारियों के कार्यों के निर्वहन को छोड़कर अन्य किसी साजिश या विशेष मक़सद के तहत राजनीतिक नेताओं के साथ अखिल भारतीय सेवा कर्मियों का इस तरह का व्यवहार नियमों का उल्लंघन हैं।

आरवीएस मणि अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि इसके तुरंत बाद का घटनाक्रम यह था कि “हिंदू आतंक” रिकॉर्ड में आ गया था, जहाँ यह दावा किया गया था कि नांदेड़ के समीर कुलकर्णी कथित रूप से अपनी कार्यशाला में विस्फोटक का भंडारण कर रहे थे, जिसमें 20.4.2006 को विस्फोट हो गया।

पुस्तक के एक अन्य भाग में, आरवीएस मणि कहते हैं कि जब हेमंत करकरे एटीएस प्रमुख थे, तो अहले-ए-हदीथ/हदीस जो मालेगाँव विस्फोट में शामिल थे, इसका सबूत होने के बाद भी उसे एक साइड कर दिया गया था और इस नैरेटिव को पूरी तरह से बदल दिया गया था। मणि कहते हैं कि यह पहली बार था कि हिंदू संगठनों की भागीदारी की रिपोर्ट मुंबई एटीएस से गृह मंत्रालय को भेजी गई थी और साध्वी प्रज्ञा को मुख्य आरोपी बनाया गया था। वह कहते हैं कि उन्हें पता नहीं है कि मोटरसाइकिल, जो एटीएस के अनुसार प्रमुख साक्ष्य था (जिसकी बाद में व्याख्या हुई कि साध्वी प्रज्ञा द्वारा बेच दी गई थी) को प्लांट किया गया था या नहीं, लेकिन एटीएस द्वारा लगाए गए समय ने कई सवाल खड़े कर दिए थे। उनका कहना है कि मुंबई धमाकों के दौरान एटीएस को गिरफ्तारी करने में 5 महीने से अधिक का समय लगा जबकि मालेगाँव मामले में लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित की गिरफ्तारी में केवल 35 दिन लगे।

आपको बता दें, हालाँकि बाद में मीडिया द्वारा यह रिपोर्ट भी किया गया था कि एनआईए इस नतीजे पर पहुँची थी कि कर्नल पुरोहित को फँसाने के लिए महाराष्ट्र एटीएस द्वारा आरडीएक्स लगाया गया था।

यह वास्तव में एक तथ्य है कि हेमंत करकरे मुंबई हमलों के दौरान अनुकरणीय साहस दिखाते हुए बलिदान हो गए। यह भी उतना ही सच है कि कई सवाल न केवल अंदरूनी सूत्र आरवीएस मणि और पीड़िता साध्वी प्रज्ञा द्वारा उठाए गए, बल्कि कई अन्य लोगों ने भी आईपीएस अधिकारी हेमंत करकरे के आचरण और उनकी कॉन्ग्रेसी नेताओं से मिलीभगत के बारे में और खासतौर से ‘भगवा आतंक’ का झूठ गढ़ने के लिए उठाए हैं।

सच्चाई शायद बीच में कहीं है। जो भी हो एक दिन ज़रूर सामने आएगा। साध्वी प्रज्ञा को मकोका के तहत आरोपों से बरी कर दिया गया है। कुछ और आरोपों में भी बरी हो चुकीं हैं। फ़र्ज़ी सबूतों के आधार पर आखिर किसी को कब तक फँसाया जा सकता है। एक न एक दिन न्याय की विजय होगी। लेकिन आज भी अधिकांश मामलों में बरी होने के बाद भी मीडिया गिरोहों के स्वघोषित जज उन्हें आरोपित और अपराधी साबित करने में दिन-रात एक किए हुए हैं आखिर इन्हे नमक का क़र्ज़ जो अदा करना है। खैर, साध्वी प्रज्ञा की आवाज़ को चुप कराने की कोशिश करने वाले, इन तमाम मीडिया गिरोहों से कोई भी उम्मीद करना भी बेमानी है। ये खुद ही वकील हैं और जज भी, फैसला अगर इनके अजेंडे के हिसाब का न हो तो ये स्वायत्त संवैधानिक संस्थाओं को भी बदनाम करने से पीछे नहीं हटते।

पश्चिम बंगाल में निर्वाचन अधिकारी लापता, चुनाव आयोग ने की रिपोर्ट तलब

पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के राणाघाट संसदीय क्षेत्र के कृष्णानगर में तैनात ईवीएम-वीवीपैट प्रभारी नोडल अधिकारी पिछले 24 घंटे से लापता हैं। एक अधिकारी ने शुक्रवार (अप्रैल 19, 2019) को इसकी जानकारी दी। राज्य प्रशासनिक सेवा के 2010 बैच के अधिकारी राय राणाघाट लोकसभा क्षेत्र के कृष्णानगर में बतौर नोडल अधिकारी के रूप में ईवीएम एवं वीवीपैट प्रभारी की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

ख़बर के अनुसार, नदिया के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि 30 वर्षीय अर्णब रॉय नामक अधिकारी चुनाव ड्यूटी के लिए अपने सरकारी आवास से बृहस्पतिवार (18 अप्रैल) की सुबह बिप्रदास चौधरी पॉलिटेक्निक कॉलेज के लिए निकले लेकिन दोपहर बाद से उन्हें नहीं देखा गया। अधिकारी ने बताया कि अर्णब का वाहन कॉलेज के बाहर पार्क किया हुआ पाया गया।

जिला पुलिस के सूत्रों ने बताया कि उनके दोनों मोबाइल फोन बंद हैं और उनकी अंतिम लोकेशन नदिया जिले में शांतिपुर के पास की बताई जा रही है। एक अन्य पुलिस अधिकारी ने कहा कि शांतिपुर के बाद उनकी लोकेशन का पता नहीं चल पाया है क्योंकि वहाँ से उनका फोन बंद आ रहा है।

जिला मजिस्ट्रेट के साथ भी हुआ था कुछ दिन पहले झगड़ा

प्रारंभिक जाँच में यह पता चला है कि रॉय का नदिया के जिला मजिस्ट्रेट सुमित गुप्ता के साथ कुछ दिनों पहले कथित रूप से झगड़ा हुआ था। गुप्ता और रॉय का झगड़ा निर्वाचन के सिलसिले में ड्यूटी को लेकर हुआ था। इस बीच आयोग ने रॉय की जगह नए अधिकारी को तैनात कर दिया है। उल्लेखनीय है कि राणाघाट संसदीय क्षेत्र को तृणमूल कॉन्ग्रेस का गढ़ माना जाता है और वहाँ चौथे चरण में 29 अप्रैल को मतदान होगा।

गुप्ता ने झगड़े की बात से किया मना

गुप्ता से जब इस संबंध में संपर्क किया गया तो उन्होंने रॉय के साथ किसी प्रकार का झगड़ा होने से इनकार किया। गुप्ता ने पीटीआई को बताया, “जिस किसी ने आपको यह सूचना दी है उसने झूठी जानकारी दी है। हमारे बीच कुछ नहीं हुआ था। हमने उनकी तलाश के लिए पहल की है।” विफल खोज अभियान के बाद जिला प्रशासन ने कृष्णानगर कोतवाली में शिकायत दर्ज कराई है। रॉय की पत्नी ने भी शिकायत दर्ज कराई है।

साध्वी प्रज्ञा को गोमाँस खिलाने वाले, ब्लू फिल्म दिखाने वाले लोग कौन थे?

साध्वी प्रज्ञा को भाजपा द्वारा टिकट दिए जाने के बाद लोकसभा चुनावों की दिशा बदलती हुई नजर आ रही है। भोपाल सीट से साध्वी प्रज्ञा का नाम हर किसी के लिए चौंकाने वाला साबित हुआ है। साध्वी प्रज्ञा मालेगाँव धमाकों में शामिल होने के आरोपों में अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मात्र शक के आधार पर जेल, साजिश और सियासत की यातनाओं में गँवा चुकी हैं। इस बीच अगर कोई चीज लिबरल्स बुद्धिजीवीयों के बीच नदारद मिली है तो वो है साध्वी प्रज्ञा के मानवाधिकार! क्या हिन्दुओं के मानवाधिकार इस सेक्युलर देश में चर्चा का विषय नहीं हैं?

मोदी सरकार के दौरान वॉशरूम के नल में पानी ना होने पर भी नेहरुवियन सभ्यता के दौरान मिले हुए अवार्ड वापस कर देने वाले लोग तब क्यों सोते रहे जब मात्र शक (संभवतया साजिश) के आधार पर एक महिला की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी गई, उसे लगातार 14 दिन तक पीटा जाता रहा, उसकी ऑक्सीजन सप्लाई बंद कर दी गई और उसे अपने मृतक पिता तक से नहीं मिलने दिया गया?

सोशल मीडिया पर इसके बाद से लगातार साध्वी प्रज्ञा से जुड़े कुछ ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं, जिन पर बात करना और ‘प्राइम टाइम’ करना मेनस्ट्रीम मीडिया ने कभी शायद अपनी जिम्मेदारी नहीं समझा। प्रश्न उठता है कि पत्रकारिता के स्वघोषित ऐसे बड़े नाम भी इस इकतरफी यातना के मुद्दे पर चुप किन कारणों से रहे? क्या यही उन पत्रकारों की निष्पक्षता की परिभाषा है, जो उन्हें अपने प्रोपेगेंडा के नाम पर सुबह शाम प्राइम टाइम करवाती है, लेकिन जिन विषयों पर उन्हें ‘बड़ा नाम’ बनाने वाले राज परिवारों पर प्रश्नचिन्ह लगता हो, उन पर वो एकदम खामोश रहने का फैसला लेते हैं?

2014-2015 के दौरान सुदर्शन टीवी द्वारा एक ऑडियो-वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है। इस वीडियो में बताया गया है कि पुलिस ने किस प्रकार बिना किसी सबूत प्रज्ञा को हिरासत में लेकर उन पर अमानवीय जुर्म किए। उनके सामने ‘भागवत गीता’ के पन्ने फाड़कर उड़ाए जाते, हिन्दुओं के इस पवित्र ग्रन्थ को पैरों तले कुचला जाता था और साध्वी प्रज्ञा से पूछा जाता था, “क्या तुम्हारे राम तुम्हे बचाने आएँगे?”

साध्वी प्रज्ञा के पिता एक RSS कार्यकर्ता थे, उनकी मृत्यु पर साध्वी प्रज्ञा को उनसे मिलने और आखिरी बार देखने तक की इजाजत नहीं दी गई। पुलिस दल, जिसमें कि हेमंत करकरे भी थे, प्रज्ञा को टॉर्चर करते थे। उन्हें फुटबॉल की गेंद की तरह पीटा जाता था, जिससे उनके फेफड़ों में घाव हो गए।

वीडियो में बताया गया है कि साध्वी प्रज्ञा को इसी हालात में अस्पताल में 3-4 फ्लोर तक चढ़ाया जाता था। उन्हें तरह-तरह के इंजेक्शन दिए जाते रहे, ऑक्सीजन सप्लाई बंद कर दी जाती थी और उन्हें तड़पने के लिए छोड़ दिया जाता था। लगातार 14 दिन की प्रताड़नाओं के बीच साध्वी प्रज्ञा की रीढ़ की हड्डी भी टूट गई थी, इसी बीच उन पर एक और केस फाइल कर दिया गया। ये सब इतनी आसानी से होता रहा, मीडिया की गैरमौजूदगी और सियासत की साजिशों के बीच कोई इस मामले में बात करने वाला नहीं था।  

“पहले मेरा इलाज करो, मैं उसके बाद जेल जाऊँगी”, सुदर्शन टीवी द्वारा जारी वीडियो में टूटी हुई रीढ़ की हड्डी के कारण भोपाल एयरपोर्ट पर साध्वी प्रज्ञा यह कहते हुए सुनी जा सकती हैं। इस वीडियो क्लिप में साध्वी प्रज्ञा की बहन प्रतिभा और उनके पति भगवान झा को इस प्रकरण पर बात करते देखा जा सकता है।

यातनाओं के दौरान पुलिस घेरा बनाकर साध्वी प्रज्ञा को मारती थी, एक के थक जाने पर दूसरा उन्हें मारता था। इतना ही नहीं, हिन्दू होने के कारण उनकी आस्थाओं को आहत करने के लिए पवित्र ग्रंथ गीता को उनके सामने लाकर फाड़ा और पैरों से कुचला जाता था। जब इतने से भी टॉर्चर करने वालों को तसल्ली नहीं हुई तब उन्होंने गाय का माँस साध्वी प्रज्ञा को खिलाया और उन्हें अश्लील फिल्में दिखाईं।

ये सोचने की बात है कि गाय का माँस खिलाकर आस्थाओं को आहत करने की बात 2014-2015 से पहले की हैं, मीडिया द्वारा तब कभी इस तरह का प्रकरण ‘मेनस्ट्रीम’ नहीं किया गया था। आप सोचिए कि 2019 में एक पाकिस्तानी जिहादी 40 भारतीय सैनिकों को मारने से पहले सन्देश देता है कि उसे गाय का पेशाब पीने वाले हिन्दुओं से नफरत है। इसी विचारधारा की झलक हमें साध्वी प्रज्ञा की यातनाओं में भी देखने को मिलती है, क्या ये मात्र एक संयोग ही हो सकता है?

खास बात ये भी है कि इस दौरान समाचार पत्र और मीडिया चैनल्स में कोई अन्य डाटा उपलब्ध नहीं है। ये भी हो सकता है कि आज के समय पर अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई देने वाले पत्रकारों को इस पर लिखने और बोलने की उनके ‘अन्नदाताओं’ द्वारा इजाजत नहीं दी गई थी, या फिर किसी ने भी इस मामले पर बात करना आवश्यक नहीं समझा होगा। जाहिर सी बात है कि यह प्रकरण ‘हिन्दू/भगवा आतंकवाद’ जैसे शब्द रचने वाले दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं की विचारधारा के अनुरूप चल रहा था और भविष्य में उनके राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप उनके काम आ सकता था।

साध्वी प्रज्ञा पर की गई हर यातना एक प्रपंच का हिस्सा नजर आता है। इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि जो लोग पुलवामा आतंकी हमले को इस्लामिक जिहाद से जोड़ने में हिचकिचाते रहे वही लोग आज साध्वी प्रज्ञा को एक घोषित आतंकवादी बना देने की हर कोशिश कर रहे हैं। ये संस्थाओं का उपहास उड़ाते हैं। अदालत और न्यायिक प्रक्रियाओं में अपने एजेंडा के अनुसार विश्वास करते हैं और नहीं करते हैं और ऐसा करते वक्त वो ये भी भूल जाना पसंद करते हैं कि इन संस्थाओं में उनके नेहरू जी भी विश्वास करते थे, खुलेआम संविधान से छेड़छाड़ करने वाली इंदिरा गाँधी भी।

न्याय समय के गर्भ में है। साध्वी प्रज्ञा के प्रकरण को इकतरफा होकर नहीं देखा जा सकता है, लेकिन अफजल गुरु, बुरहान वानी, यहाँ तक की मसूद अजहर जैसे आतंकवादियों और कश्मीरी पत्थरबाजों से संवेदना दिखाने वाले नेता, पत्रकार और सामाजिक विचारकों को साध्वी प्रज्ञा से भी सहानुभूति होनी चाहिए। मानवाधिकारों और व्यक्तिगत मामलों का सम्मान होता नहीं दिख रहा है। सेक्युलर राष्ट्र होने की वजह से हम सब नकारना चाहते हैं, लेकिन इन सबके पीछे का कारण साध्वी प्रज्ञा का हिन्दू होना ही है।

बाबर की औलाद को देश सौंपना चाहते हैं क्या: योगी आदित्यनाथ

पिछले दिनों आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में चुनाव आयोग ने योगी आदित्यनाथ पर 72 घंटे का प्रतिबन्ध लगा दिया था। यह अवधि समाप्त होते ही योगी फिर से चुनाव प्रचार में सक्रीय हो गए हैं। हालाँकि, रिपोर्ट के अनुसार, वह संभल में एक जनसभा को संबोधित करते हुए फिर कुछ ऐसा बोल गए जिस पर नया विवाद खड़ा हो सकता है। जनसभा में योगी ने कहा, “एक तरफ देश को राम कृष्ण की परम्परा को आगे बढ़ने वाले लोग हैं दूसरी तरफ वो हैं जो खुद को बाबर की औलाद कहते हैं। आप ‘बाबर की औलाद को देश सौंपना चाहते हैं क्या?’ कानून की उन्नति की वजह से आज कोई प्रदेश में दंगा करने का प्रयास नहीं कर सकता। अखिलेश राज में मंदिरों का बुरा हाल था।”

योगी आदित्यनाथ ने कहा कि उनके लिए राजनीति अपनी जगह है और आस्था अपनी जगह। यही वजह है कि 72 घंटे के बैन के बीच भी उन्होंने आस्था के लिए जगह निकाल ली। इस दौरान वो लखनऊ, अयोध्या और वाराणसी के मंदिरों में दर्शन-पूजन के लिए गए।

बता दें कि इससे पहले उनके बयान, “उनके साथ अली हैं तो हमारे साथ बजरंग बली हैं” चुनाव आयोग ने इस बयान को आचार संहिता का उल्लंघन मानते हुए उन पर 72 घंटों का प्रतिबन्ध लगा चुका है।

अब जब योगी आदित्यनाथ प्रतिबन्ध के बाद पहली जनसभा को संबोधित कर रहे थे तो इस दौरान उन्होंने अपने भाषण में कहा, सपा-बसपा परिवारवाद को बढ़ावा देने वाली पार्टियाँ हैं। योगी ने यह भी कहा कि जनता बजरंग बली के विरोधियों को हराएगी।  

बता दें कि संभल से बीजेपी ने परमेश्वर लाल सैनी को टिकट दिया है। वहीं सपा-बसपा-रालोद गठबंधन से शफिकुर रहमान बर्क को चुनाव मैदान में उतरा गया है, कॉन्ग्रेस की तरफ से जेपी सिंह चुनाव मैदान में हैं।

टुकड़े-टुकड़े गैंग को समर्थन देकर कॉन्ग्रेस अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच गई: जावड़ेकर

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कॉन्ग्रेस पार्टी पर हमला करते हुए कहा कि वह मुख्यधारा की पार्टी से हाशिए पर यानी कि अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच गई है, जिसे अब टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थन करने के बावजूद अपना भविष्य नहीं दिखाई दे रहा है। जावड़ेकर ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के इस बयान को ख़ारिज कर दिया कि मोदी के शासन में लोकतंत्र और संविधान ख़तरे में हैं और मोदी के सत्ता में आने पर कोई चुनाव नहीं होगा, क्योंकि यह ग़लत और आधारहीन है।

गहलोत की टिप्पणी पर पलटवार करते हुए जावड़ेकर ने कहा कि मोदी ने 2014 का चुनाव जीता था और अब 2019 के लोकसभा चुनाव हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि 2024, 2029 में भी चुनाव होंगे लेकिन कॉन्ग्रेस के पास इन चुनावों में कोई मौक़ा नहीं रहेगा।

जावड़ेकर ने कहा, “कॉन्ग्रेस मुख्यधारा की पार्टी थी और अब वह ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का समर्थन करके एक हाशिए पर जाने वाली पार्टी बन गई है। कॉन्ग्रेस इस बात का प्रमाण ख़ुद दे रही है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, और वो इस तरह से इनका (टुकड़े-टुकड़े गैंग) बचाव करती है।”

बता दें कि केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर राजस्थान के चुनाव प्रभारी हैं। उन्होंने दावा किया कि 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा को 2014 के मुक़ाबले शानदार जीत मिलेगी और चुनाव में NDA को दो-तिहाई बहुमत मिलेगा।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि दो चरणों के चुनावों के बाद, भाजपा अपनी प्रचंड जीत को लेकर आश्वस्त है। हम 2014 के अपने टैली में सुधार करेंगे, अपने दम पर 300 का आंकड़ा पार करेंगे और NDA के पास दो तिहाई बहुमत होगा। हम देश भर में सभी राज्यों में लोगों का समर्थन प्राप्त कर रहे हैं और इससे विपक्ष पूरी तरह से घबराया हुआ है। कॉन्ग्रेस हार का सामना कर रही है और इसलिए वो इस तरह की प्रतिक्रिया दे रही है।

विपक्षी पाटीदारों की निंदा करते हुए जावड़ेकर ने कहा कि वे जानते हैं कि वे हारने वाले हैं और इसलिए वे EVM के इस्तेमाल के बहाने भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस जानती है कि वो हारने वाले हैं और इसलिए वो अपनी हार का कोई न कोई बहाना ढूँढने में व्यस्त है। जावड़ेकर ने कहा कि हम अपनी जीत को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त हैं कि लोग मोदी के नेतृत्व का जवाब दे रहे हैं और वे चाहते हैं कि मोदी ही फिर से प्रधानमंत्री बनें।

रोहित शेखर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चौकाने वाले खुलासे, मौत को अप्राकृतिक बताया गया

बीते दिनों उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय एनडी तिवारी के बेटे रोहित शेखर की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत में एक सनसनीखेज़ खुलासा हुआ है। मीडिया रिपोर्टों की मानें तो रोहित की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद पुलिस अधिकारी अंदाजा लगा रहे हैं कि उनकी मौत छाती और गले पर दवाब पड़ने से हुई है।

रोहित की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उनकी मौत को आप्राकृतिक बताया गया है। जिसके बाद दिल्ली पुलिस ने इस मामले की जाँच क्राइम ब्रांच को सौंप दी है। आईपीसी की धारा 302 के तहत इस मामले को अज्ञात के ख़िलाफ़ दर्ज किया गया है।

खबरों की मानें तो आज (अप्रैल 19, 2019) दिन में क्राइम ब्रांच की टीम और वरिष्ठ अधिकारी डिफेंस कॉलोनी स्थित रोहित के निवास स्थान पर पहुँचे थे। क्राइम ब्रांच की टीम रोहित के घर से उनकी मौत की वज़ह पता लगाने की कोशिशों में जुटी हुई है।

बता दें कि रोहित शेखर तिवारी की संदिग्ध परिस्थितियों में मंगलवार (अप्रैल 16, 2019) को मौत हुई थी। तबीयत खराब होने पर शाम करीब 4 बजकर 41 मिनट पर साकेत स्थित मैक्स अस्पताल ले जाया गया था। जाँच के बाद डॉक्टरों ने रोहित को मृत घोषित कर दिया।

गौरतलब है कि रोहित की मौत पर उनके घर में मौजूद नौकरों ने बताया था कि रोहित की नाक से खून बह रहा था जबकि रोहित की माँ का दावा था कि उनके बेटे की मौत नैचुरल है। लेकिन पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने के बाद अब देखना है कि क्राइम ब्रांच के पास पहुँच चुका ये मामला कैसे अनसुलझी गुत्थी को सुलझाता है।

बलात्कार का आरोपी ‘अतानासियो मोंसेरेट’ कॉन्ग्रेस में शामिल, उत्पल पर्रिकर के ख़िलाफ़ लड़ने की संभावना

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के अनुसार, गुरुवार को नाबालिग के साथ बलात्कार के आरोपी पूर्व शिक्षा मंत्री अतानासियो मोंसेरेट को कॉन्ग्रेस पार्टी में शामिल कर लिया गया। ऐसा अनुमान है कि पणजी निर्वाचन क्षेत्र से विधानसभा उपचुनाव के लिए उसे उम्मीदवार बनाया जाएगा। राज्य में उपचुनाव 19 मई को निर्धारित किया गया है।

कथित तौर पर, बलात्कार के आरोपी अतानासियो मोंसेरेट को कॉन्ग्रेस द्वारा पणजी से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भावी उम्मीदवार उत्पल पर्रिकर (दिवंगत मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के बेटे) के ख़िलाफ़ मैदान में उतारने की तैयारी है।

बता दें कि मोंसेरेट को राजनीतिक दल बदलने की आदत है। उसने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत यूनाइटेड गोअन डेमोक्रेटिक पार्टी (UGDP) के सदस्य के रूप में की, फिर 2004 में भाजपा में शामिल हुआ और 2007 में UGDP में वापस आ गया।

इसके बाद वो कॉन्ग्रेस का सदस्य बन गया, लेकिन बाद में पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए 2015 में उसे पार्टी से निकाल दिया गया। तब से वह गोवा फॉरवर्ड (GF) में था।

माना जाता है कि 2018 में एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार और मानव तस्करी के आरोप में मोंसेरेट के ख़िलाफ़ चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद वो राज्य की राजधानी में एक प्रमुख नेता है। अधिकारियों ने पहले भी उसके ख़िलाफ़ जबरन वसूली का एक मामला दर्ज किया था।

कॉन्ग्रेस में शामिल होने के बाद मोंसेरेट ने मीडियाकर्मियों से कहा, “आप इसे विलक्षण पुत्र की वापसी कह सकते हैं, बेटे ने हर जगह घूमते हुए सबक सीखा है। यह घर वापसी जैसा है। मैं यहाँ भाजपा को हराने के लिए हूँ।”

यह अनुमान लगाया जा रहा है कि मोंसेरेट की राजनीतिक पकड़ और उनके प्रभाव के साथ, कॉन्ग्रेस अब पणजी विधानसभा सीट जीतने की उम्मीद कर सकती है और राज्य की दो लोकसभा सीटों पर भी लाभ प्राप्त कर सकती है।

रवीश जी, साध्वी प्रज्ञा पर प्राइम टाइम में आपकी नग्नता चमकती हुई बाहर आ गई (भाग 4)

कुछ समय पहले की बात है एक नवयुवक को 1994 में पुलिस ने पकड़ा था और 2016 में उसे कोर्ट ने रिहा किया क्योंकि वो बेगुनाह था, और सबूत नहीं मिले। नाम जानना ज़रूरी नहीं है, क्योंकि रवीश कुमार के प्राइम टाइम का यह इंट्रो आप आँख मूँद कर सुनेंगे तो भी आपको नाम और मज़हब का अंदाज़ा हो जाएगा। रवीश ने सालों को 365 से गुणा करके दिन निकाले और बताया कि वो संख्या कितनी बड़ी है।

सामान्य आदमी इसे देख कर दुःखी हो जाएगा कि कई बार निर्दोष लोग जेल पहुँच जाते हैं, और उन्हें न्याय के लिए कितना इंतजार करना पड़ जाता है। ये जानना ज़रूरी नहीं है कि किस सरकार के कार्यकाल में वो व्यक्ति पकड़ा गया था, और किस सरकार के कार्यकाल में रिहा हुआ। वो बताने पर दोनों का क्रेडिट गलत सरकारों को चला जाएगा। हें, हें, हें…

अब नया प्राइम टाइम आया साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर। असीमानंद और कर्नल पुरोहित को कोर्ट से राहत मिल चुकी है, और हिन्दू टेरर, या भगवा आतंकवाद की लॉबी और कोरस का सच बाहर आ चुका है। चिदम्बरम और कॉन्ग्रेस ने कथित अल्पसंख्यकों को लुभाने के लिए जिस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया था, और मकोका जैसी धाराएँ लगा कर, भाजपा, संघ और यहाँ तक सेना से जुड़े डेकोरेटेड अफसर को इसमें लपेटा था, उसे कोर्ट और एजेंसियों ने बारी-बारी से या तो रिहा किया या चार्ज हटा लिए।

रवीश कुमार एक ज्ञानी व्यक्ति हैं। ज्ञानी व्यक्ति के साथ एक समस्या होती है। चूँकि, उसके पास शब्द होते हैं, तो वो प्रोपेगेंडा करने में महारत हासिल कर लेता है। वो समुदाय विशेष के व्यक्ति पर केस साबित न होने पर आपको इस तरह के शब्द सुनाएगा कि आप रो देंगे। वो बताएगा कि जब वो जेल गया था, तब उसकी उम्र क्या थी, और बाहर आने पर कितने हजार दिन बीत गए।

मैं यह नहीं कह रहा कि ऐसा कहना गलत है। लेकिन प्रपंच तब बाहर आता है, और क्लीन, स्मूथ तरीके से चमकता हुआ बाहर आता है जब साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को, जिस पर हिन्दू आतंक की मुहर लगाकर, पुलिस ने कॉन्ग्रेस के आकाओं को संतुष्ट करने के लिए मकोका लगाया था, और उसे आतंकवादी बनाने की सारी क़वायद पूरी की, भाजपा उसे चुनाव लड़ने के लिए टिकट देती है।

यहीं पर ज्ञानी आदमी धूर्त हो जाता है। यहाँ पर वो यह भूल जाता है कि जो संवेदना उसने विशेष समुदाय के आरोपित पर दिखाई थी, जैसे 365 को सालों से गुणा करके दिनों की संख्या निकाली थी, वही संवेदना उसे उस लड़की के लिए भी दिखानी थी जिसे युवावस्था में आतंक के आरोप में जेल में जाला गया। सबूत के नाम पर एक स्कूटर जो उसने सालों पहले बेच दिया था, और उसके काग़ज़ात पुलिस को दे दिए। फिर टॉर्चर का एक निर्मम दौर जिसमें मार-पीट से लेकर अश्लील ऑडियो और विडियो दिखाने और पुरुषों के साथ जेल में रखना तक शामिल है।

यहाँ पर रवीश ने गम्भीर चेहरा बना यह नहीं कहा कि यहाँ दो तस्वीरें हैं, एक युवती की जो अपने जीवन को सही तरीके से जी रही थी, जो साधना और ईश्वर को समर्पित थी, और एक दिन पुलिस उसे उठा कर ले जाती है, उस पर भगवा आतंक का ठप्पा लग जाता है। दूसरी तस्वीर सालों बाद की है जब वो बाहर आती है, और उस पर लगे इल्जाम हटा लिए जाते हैं क्योंकि पुलिस के सबूत बेकार और कोर्ट में नकारे जाने योग्य साबित हुए।

रवीश और भी गम्भीर होकर कहते कि सोचिए उसने अपने परिवार के साथ बिताए कितने लाख सेकेंड खोए, सोचिए कि एक युवती जिसके सामने अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण और रचनात्मक साल थे, उसे पुलिस ने सिर्फ इसलिए नोंच लिया क्योंकि उसका कपड़ा भगवा था, और वो ईश्वर की साधना करती थी, और सबसे बड़ी बात कि वो सनातन थी, वो हिन्दू थी।

लेकिन रवीश ने ऐसा कहना नहीं चुना। रवीश भूल गए कि संविधान, कानून और चुनाव आयोग हर उस व्यक्ति को चुनाव लड़ने की आज़ादी देता है जिस पर अपराध साबित न हुए हों। रवीश का दोहरापन तब सामने आ जाता है जब वो बेगूसराय जाकर कन्हैया को लगभग माउथ-टू-माउथ फ़्रेंच किस विद टंग एक्शन दे देते हैं, लेकिन चूँकि साध्वी प्रज्ञा पर कभी आतंक के इल्जाम लगे थे तो इल्ज़ाम लगने मात्रा से आतंकी हो जाती है।

जब-जब मैं सोचता हूँ कि ये व्यक्ति और कितना गिरेगा, तब-तब यह मुझे आश्चर्य में डाल देते हैं कि अजीत भाई, ये तो इब्तिदा है, रोता है क्या, आगे-आगे देख, होता है क्या!

रवीश इतने घटिया स्तर के पत्रकार हो चुके हैं कि लालू तक के फ़ेवर में बोल लेते हैं, और ममता के बंगाल की तस्वीर बताने में उन्हें शर्म आती है, लेकिन किसी पर महज़ आरोप लगने को, अगर वो उनकी विचारधारा से अलग हो, उसे अपराधी मान लेते हैं। ये जो भी हो, पत्रकारिता तो नहीं है। रवीश को अपने दर्शकों में यह ज़हर भरने का कोई अधिकार नहीं है।

रवीश एक घोर साम्प्रदायिक और घृणा में डूबे व्यक्ति हैं जो आज भी स्टूडियो में बैठकर मजहबी उन्माद बेचते रहते हैं। साम्प्रदायिक हैं इसलिए उन्हें मजहबी व्यक्ति की रिहाई पर रुलाई आती है, और हिन्दू साध्वी के कानूनी दायरे में रह कर चुनाव लड़ने पर यह याद आता है कि भाजपा नफ़रत का संदेश बाँट रही है।

अवसादग्रस्त रवीश के लिए उनका स्टूडियो ही लोकतंत्र के तीनों पिलर पर ब्रासो मारने वाली अकेली जगह है जहाँ वो हर सुबह इन तीनों पिलर की जड़ों में पानी डालते हैं, फिर उसके आस-पास झाड़ू लगाते हैं, और फिर ध्यान में बैठकर कहते हैं कि हे पिलरो! मैंने सालों से तुम्हारा ख़्याल रखा है, अब मैं चाहता हूँ कि मैं ही लोकतंत्र बन जाऊँ, मैं ही न्यायाधीश, मैं ही संविधान, मैं ही विधायिका, मैं ही सब कुछ हो जाऊँ। अतः, आप मेरे अंदर समाहित हो कर मुझे ऊर्जा प्रदान करें।

फिर रवीश स्वयं ही संविधान को अपने हिसाब से देखते हैं, न्यायपालिका जब उनके हिसाब की जजमेंट देती है, तो लोकतंत्र की जीत बताते हैं, वायर पर मानहानि का दावा करती है तो उसे डाँटते हैं कि आखिर जज नेताओं को कैसे एंटरटेन कर लेते हैं। वो बताते हैं कि चुनाव आयोग, या रीप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट तब ही सही होगा जब उनके द्वारा सत्यापित लोग चुनाव लड़ें। अन्यथा, बाकी किसी पर आरोप भी लगे हैं, तो भी वो चुनाव नहीं लड़ सकता।

रवीश कुमार पत्रकार हैं, और फेसबुकिया बुद्धिजीवी भी। वो जो कर रहे हैं, उसे अभिव्यक्ति कहते हैं। लेकिन वो जो कर बैठते हैं, और स्वयं को सर्वेसर्वा मान कर ज्ञान बाँच देते हैं, कि दाग़ी और ऐसे आरोप वाले लोगों को चुनाव लड़ाना गलत है, तो फिर रवीश कुमार के बौद्धिक आतंकवाद का क्या इलाज है?

स्वयं पूरी दुनिया को टीवी देखना छोड़ने से लेकर मोबाइल बंद कर लीजिए, और टीवी फोड़ लीजिए बताने वाले, स्वयं टीवी पर क्या घास छीलने आते हैं? ज़ाहिर है कि इनका प्रपंच और प्रोपेगेंडा उसी दुकान से चलेगा जहाँ हर दिन इनके चेहरे की चमक, मोदी सरकार द्वारा तमाम एलईडी बाँटने के बाद भी, मंद पड़ती जाती है।

आखिर रवीश कुमार अपने ही टाइमलाइन पर पड़ने वाली गालियों का संज्ञान लेकर, स्वयं ही इसे अपनी घटिया पत्रकारिता पर जनता की वृहद् राय मानते हुए, इसे ऑनररी (अर्थात मानद) आरोप मान कर, पत्रकारिता की दुनिया से निकल कर कहीं किसी पार्टी में क्यों नहीं चले जाते? क्योंकि इनका मालिक तो पैसों की हेराफेरी में भीतर जाएगा ही, नौकरी भी बहुत दिन नहीं कर पाएँगे।

लेकिन रवीश ऐसा नहीं करेगा। रवीश एक घाघ व्यक्ति हैं। रवीश कोर्ट पहनते हैं, और अब टाई नहीं लगाते। रवीश अब मज़े नहीं ले पाते। रवीश पूरे पाँच साल से स्टूडियो से कैम्पेनिंग कर रहे हैं। रवीश को राहुल गाँधी द्वारा ‘हम बीस लाख सरकारी नौकरियाँ देंगे’ विजनरी बात लगती है, लेकिन वो पूछ नहीं पाते कि कैसे दोगे? लेकिन रवीश मोदी जी से रात के चार बजे भी फेसबुक पर कुछ भी पूछ लेते हैं।

फ़िलहाल, रवीश की धूर्तता आती रहनी ज़रूरी है ताकि ऐसे नकली पत्रकारों पर से लोगों का विश्वास उठे जो कि समाज में घृणा और भय के अलावा कुछ नहीं पहुँचा रहा। ये वो व्यक्ति है जो शांत समुदायों को यह कह कर भड़काता रहता है कि मोदी और उसके नेता उन्हें सताते हैं, डराते हैं, उनके खिलाफ माहौल बनाते हैं। इस व्यक्ति को लोकतंत्र में कोई विश्वास नहीं क्योंकि इस लोकतंत्र ने मोदी को चुना है, और वो उस मोदी को जिसे बहुमत प्राप्त है, सुप्रीम लीडर, यानी तानाशाह कहता रहता है।

खैर जो भी हो, रवीश जैसों के अजेंडे को बाहर लाने के लिए उसकी हर बात पर लेख लिखना ज़रूरी है। उनकी हर धूर्तता पर यह कहना ज़रूरी है कि सर आपने दो बार में, एक ही तरह की बात पर दो अलग बात कही थी क्योंकि एक हिन्दू था, एक दूसरे समुदाय का। रवीश जैसे लोग पत्रकारिता के नाम पर कलंक हैं, और इस बात का अच्छा उदाहरण हैं कि पक्षपाती पत्रकारिता आपको किस गर्त में ले जा सकती है।

साध्वी प्रज्ञा चुनाव लड़ेगी क्योंकि आज ही चुनाव आयोग ने उन पर उठाए जा रहे प्रश्नों को निरस्त करते हुए कहा है कि जब तक आरोप सिद्ध नहीं हो जाते, कोई भी व्यक्ति चुनाव लड़ने को स्वतंत्र हैं। ये बात और है कि रवीश कुमार स्वयं को हर बात का सबसे बड़ा विशेषज्ञ मान कर चलते हैं, और गाँव की कहावत की तरह विष्ठा को देखने के बाद, छू कर पहचानने की कोशिश करते हैं, तब भी मन नहीं भरता तो नाक तक लाकर सूँघते हैं, और कहते हैं, ‘अरे! ये तो टट्टी है!’

हें… हें… हें…

यह रविश शृंखला पर चौथा लेख है, बाकी के तीन लेख यहाँ, यहाँ, और यहाँ पढ़ें।