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ध्रुव राठी के वीडियो से केजरी हुए एक्सपोज़, हड़बड़ी में YouTube से किया वीडियो डिलीट, यहाँ देखें

इस साल 19 जनवरी को, AAP समर्थक प्रोपेगेंडा वीडियो ब्लॉगर ध्रुव राठी ने अपने Youtube चैनल पर एक वीडियो अपलोड किया था जिसमें बताया गया था कि कैसे राजनेता टीवी बहस में पूछे गए कठिन सवालों को दरकिनार करते हैं। राजनेताओं के इस व्यवहार को समझाने के लिए, राठी के साथ एक और बहरूपिया व्यक्ति राजनेता की भूमिका में था। नेता के नाम पर इस अभिनेता के माथे पर एक बड़ा भगवा तिलक था और गले में एक मोतियों की माला थी जो रुद्राक्ष की तरह दिखती है।

हालाँकि, अभिनेता की कल्पना ने उस राजनेता का रूप ले लिया था जिसे आमतौर पर राठी द्वारा टारगेट किया जाता है। राजनेताओं की ‘लॉजिकल फ़ैलेसी’ को समझाते हुए राजनेता का परिचय अंध भक्त बनर्जी नामक एक बड़े मोदी समर्थक के रूप में कराया गया। एजेण्डाधारी ध्रुव राठी द्वारा लिए गए संघी राजनेता के साक्षात्कार की कई क्लिपें, एक मोनोलॉग के फॉर्म में डाली गई थीं, जो राजनेताओं के विभिन्न तार्किक फ़ैलेसी की व्याख्या करने के लिए इस्तेमाल किया गया था।

वैसे तो लगभग सभी विचारधाराओं और दलों के राजनेता लॉजिकल फ़ैलेसी अर्थात विभिन्न विरोधाभाष या कुतर्क का उपयोग करते हैं जैसे कि स्ट्रोमैन तर्क (strawman argument), स्लिपरी स्लोप (slippery slope), सर्कुलर तर्क (circular argument), लाल हेरिंग (red herring) आदि, लेकिन वीडियो में यह समझाने की कोशिश की गई कि जैसे केवल भाजपा के राजनेता ही ऐसी रणनीति में लिप्त हैं।

अन्य पार्टियों के राजनेताओं द्वारा भी इस तरह की रणनीति का उपयोग किया जाता है, यही दिखाने के लिए एक अन्य यूट्यूब चैनल ने उस वीडियो को एडिट किया और Youtube पर अपलोड किया। इस वीडियो में, ध्रुव राठी के मोनोलॉग को बरकरार रखा गया था, लेकिन वीडियो में इस्तेमाल किए गए नकली साक्षात्कार के उदाहरण को हटाकर, उन्हें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के वास्तविक साक्षात्कार और भाषणों के साथ बदल दिया गया था।

कमाल की बात ये है कि क्लिप को इस तरह बदल दिया गया था कि वीडियो का कथानक बिलकुल वैसा ही रहे। केजरीवाल की क्लिप ध्रुव राठी द्वारा अपने वीडियो में किए गए तर्कों से बिल्कुल मेल खाती थी। संपादित वीडियो में उपयोग किए गए क्लिप केजरीवाल को उसी रणनीति का उपयोग करते हुए दिखाते हैं, जो वीडियो में इस तरह से दिखाया गया था कि जैसे केवल भाजपा नेताओं द्वारा उपयोग किया जाता हो।

संपादित वीडियो से ऐसा लग रहा है कि ध्रुव राठी लॉजिकल फ़ैलेसी को समझाते हुए AAP सुप्रीमो का पर्दाफाश कर रहे हैं और आप समर्थक ध्रुव राठी के लिए यह एक बड़ी शर्मिंदगी वाली बात है। इसलिए उसने कॉपीराइट उल्लंघन का हवाला देते हुए YouTube से वीडियो को हटा दिया है। जिसे हटाने से पहले 50 हजार से अधिक बार देखा गया था।

चैनल के मालिक ने यह भी बताया कि कॉपीराइट उल्लंघन के लिए चैनल को YouTube द्वारा निलंबित कर दिया गया था। इसलिए उन्होंने अन्य वेबसाइटों पर वीडियो अपलोड किया है। वीडियो नीचे देखा जा सकता है।

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यह साफ देखा जा सकता है कि वीडियो को राठी के प्रोपेगेंडा को आईना दिखाने के लिए, एक व्यंग्य के रूप में संपादित किया गया था, यह साबित करने के लिए कि अरविंद केरीवाल भी मूल वीडियो में बताए गए रणनीति का ही उपयोग करते हैं। संपादित वीडियो वास्तव में यह साबित करता है कि ध्रुव राठी सही है, क्योंकि अब इस वीडियो में उनके स्पष्टीकरण के सन्दर्भ में वास्तविक जीवन के उदाहरण थे। चलते-चलते एक और बात, विश्लेषण, समीक्षा या व्यंग्यात्मक उद्देश्यों के लिए मूल कार्य का उपयोग अवैध नहीं है, लेकिन फिर भी प्रोपेगेंडा चलाने वालों की वजह से वह वीडियो हटा दिया गया।

‘आयुष्मान’ ने नहीं बिकने दी हमारी जमीन, गरीबों के मुख से निकला मोदी जी के लिए आयुष्मान भवः

आयुष्मान योजना ने किस कदर लोगों की मदद की है, इसे जानने के लिए गाँवों की तरफ रुख करना होगा। ग्रामीण, गरीब, किसानों से मिलने पर पता चलता है कि किस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना ‘आयुष्मान भारत’ न सिर्फ ज़िंदगियाँ बचा रही बल्कि उन्हें जीने का सम्बल भी दे रही है। लोकसभा चुनाव की रिपोर्टिंग के दौरान जब पत्रकार विभिन्न लोकसभा क्षेत्रों में कवरेज के लिए गए हैं तो वहाँ किस तरह से विभिन्न सरकारी योजनाओं ने कितना लाभ पहुँचाया, कहाँ-कहाँ अभी भी सुधार की जरुरत है, ये सब बाहर आ रहा है।

दैनिक जागरण ने एक ग्रॉउंड रिपोर्ट पब्लिश की है पलामू का, बताता चलूँ कि पलामू लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र झारखंड के 14 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है। दो जिलों के कुछ हिस्सों को मिलाकर इस संसदीय क्षेत्र का गठन किया गया है।

पलामू की ही एक कहानी है विनोद की, कि किस तरह से एक बदहवास-सा मजदूर पिता अपनी सतमासी बेटी को लेकर दौड़ता हुआ अस्पताल पहुँचा। बिटिया के जन्म के साथ ही डॉक्टर ने जवाब दे दिया था। बड़े अस्पताल के लिए रेफर तो कर दिया गया पर पैसा न विनोद के पास और न ही उनके रिक्शा चलाने वाले पिताजी शिवनारायण चौधरी के पास, बेटी के जन्म के समय ही नीजि डॉक्टर के यहाँ नौ हजार रुपए खर्च करने के बाद, जमीन बेचने का मन बना चुके विनोद के अस्पताल पहुँचते ही उनका गोल्डन कार्ड बन गया। पता लगा आयुष्मान योजना के तहत बेटी का इलाज शुरू हो गया। बिना एक पैसा खर्च किए। यह उनके लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था। आज विनोद की बेटी अच्छी है। जमीन बेचने की नौबत नहीं आई। आयुष्मान योजना ने उसकी जमीन बचा दी और बच्ची भी।

जागरण की रिपोर्ट में ही एक और घटना जिक्र है कि पांकी के पगार खुर्द के सलोक का, सलोक एक बीघा जमीन के मालिक हैं, माँ-बेटी की जान बचाने के लिए डॉक्टर ने बड़े अस्पताल के लिए रेफर तो कर दिया। पिताजी छठू साव राँची में रिक्शा चलाते हैं। माली हालत ऐसी नहीं थी कि जमा पैसे से इलाज करा पाते। सलोक ने जमीन बेचकर भी इलाज कराने का फैसला किया और पहुँच गया पलामू। 42 दिनों से एनआइसीयू में भर्ती बेटी का, रोजाना तीन-चार हजार रुपए के हिसाब से कोई डेढ़ लाख रुपए का बिल बन गया लेकिन आयुष्मान भारत योजना से पूरा इलाज हुआ, उसकी भी जमीन बिकने से बच गई।

गाँव में एक कहावत है कि ‘जिसे अस्पताल और अदालत का चक्कर लगा वह बर्बाद हो गया।’ सोचिये फिर उन गरीबों पर क्या बीतती होगी जिन्हें खाने के लाले पड़े हैं या बस किसी तरह से गुज़ारा कर रहे हैं।

आयुष्मान भारत योजना ने किसी तरह मजदूरी का जीवन यापन करने वाले गरीबों के लिए, किसानों के लिए, यह योजना बहुत बड़ा सहारा है। पाँच साल के बीजेपी के शासन काल में जहाँ उनकी बाकी ज़रूरतें उज्ज्वला, अन्त्योदय सहित विभिन्न योजनाओं से पूरी हो रही थी। आयुष्मान योजना ने सबसे बड़ी समस्या स्वास्थ्य सुरक्षा को भी सुनिश्चित कर दिया।

जागरण के रिपोर्ट के अनुसार ही बता दें कि पलामू के अस्पतालों में विनोद और सलोक जैसे कोई 6200 मरीज थे जिनका एक साल के भीतर इलाज हुआ। इस मद में करीब साढ़े छह करोड़ रुपए खर्च हुए। अनेक गरीबों की जमीन बिकने से बची तो अनेक सूदखोरों के चंगुल में फँसने से बचे।

रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ पलामू में ही 65 हजार से अधिक लोगों के गोल्डन कार्ड बन चुके हैं। ये सभी सूचीबद्ध 37 सरकारी गैर सरकारी अस्पतालों में इलाज करा सकते हैं। पाँच लाख तक का मुफ्त इलाज सेवा का लाभ लेने वालों के दिल से योजना चलाने वाले के लिए आयुष्मान भव: का आशीर्वाद निकलना अस्वभाविक नहीं है।

ये आँकड़े तो सिर्फ एक लोकसभा क्षेत्र के हैं। आज देश में इस योजना ने गरीबों, वंचितों, किसानों को उस बेबसी और लाचारी से बाहर लाने में बड़ी मददगार सिद्ध हुई है। अब उन्हें पैसों की किल्लत की वजह से अपनों को नहीं खोना पड़ेगा। हालिया संशोधनों के बाद आयुष्मान भारत योजना के तहत देश के सभी बड़े विशेषज्ञ चिकित्सकों को इससे जोड़ा जा रहा है, ताकि देश का कोई भी गरीब, वंचित वर्ग बीमारी की लाचारी में अपने जमीन और जीवन भर की कमाई से वंचित न हो।

CBI ने किए भ्रष्टाचार संबंधी आँकड़े जारी, 2018 में 1468 दोषी साबित

केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) के 57वें वार्षिक दिवस पर सीबीआई निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला ने कहा कि सीबीआई को लोगों, संसद, न्यायपालिका और सरकार के भरोसे का से खुशी मिल रही है। जब भी कोई बड़ा अपराध होता है या एक विश्वसनीय जाँच की आवश्यकता होती है, तो हमेशा सीबीआई जाँच की माँग होती है। इस दौरान सीबीआई ने भ्रष्टाचार से संबंधित आँकड़े जारी किए। इन आँकड़ों से पता चलता है कि पिछले साल सीबीआई के जाँच के अनुसार 1,468 लोगों को भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी ठहराया गया। इन आँकड़ों के अनुसार एंटी-ग्राफ्ट एजेंसी ने 2018 से अब तक 8,999 केस और प्रारंभिक पूछताछ के मामले दर्ज किए गए थे, जिनमें से 544 मामलों में दोष साबित करने में सफलता हासिल हुई। जिसके बाद अदालतों के निर्देश पर इनमें से 209 मामले उठाए गए।

एजेंसी का दावा है कि उसने रिश्वत के आरोपों का पता लगाने के लिए 156 ट्रैप ऑपरेशन किए थे और बैंक धोखाधड़ी से संबंधित 211 मामले दर्ज किए थे। सीबीआई के एक प्रवक्ता ने पुष्टि करते हुए कहा कि कई संवेदनशील मामलों में भी सजाएँ दी गई हैं,। उन्होंने कहा कि सीबीआई ने शिमला में एक नाबालिग लड़की के बलात्कार और हत्या के मामले की जांच करते हुए भारत में पहली बार डीएनए और वंश मिलान के प्रतिशत मिलान की तकनीक का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया।

सीबीआई के निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला ने 14 जांच अधिकारियों, 6 कानून अधिकारियों, 46 कार्यकारी और 46 कार्यकारी और मंत्रालयिक कर्मचारियों और 2 तकनीकी अधिकारियों को निदेशक सीबीआई के प्रशस्ति पत्र और उनके अनुकरणीय कार्य के लिए नकद पुरस्कार से सम्मानित किया है। इस दौरान सीबीआई अधिकारियों को दिए अपने संबोधन में, शुक्ला ने शिकायत निवारण के महत्व पर भी जोर दिया और इस संबंध में संगठन के सभी अधिकारियों के लिए ‘ओपन डोर पॉलिसी ’का उल्लेख किया।

शुक्ला ने कहा कि सीबीआई एक भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसी से बहुआयामी, बहु-विषयक केंद्रीय पुलिस कानून प्रवर्तन निकाय के रूप में विकसित हुई है, जिसमें देश भर में अपराधों की जाँच और मुकदमा चलाने की क्षमता, विश्वसनीयता और कानूनी जनादेश है। हाल ही में, एक नियुक्ति समिति में आईपीएस ऋषि कुमार शुक्ला को नए सीबीआई निदेशक के रूप में नियुक्त किया। इसमें पीएम मोदी, सीजेआई राजन गोगोई और लोकसभा में कॉन्ग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल थे।

भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बाद सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा के पद से हटने के बाद सीबीआई प्रमुख का पद 10 जनवरी से खाली पड़ा हुआ था। सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा के इस्तीफा देने के बाद एम नागेश्वर राय ने कार्यभार संभाला था।

ऋषि कुमार शुक्ला को नव निर्वाचित कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा मध्य प्रदेश में डीआईजी के रूप में अपने पद से हटा दिया गया था, जिसकी वजह से सरकार और विपक्ष के बीच जुबानी जंग छिड़ गई थी। सीबीआई के पूर्व निदेशक आलोक वर्मा और एजेंसी के पूर्व उप प्रमुख राकेश स्थाना के बीच भी कुछ ठीक नहीं था। दोनों अधिकारियों ने एक-दूसरे के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए और एजेंसी की प्रतिष्ठा पर एक गंभीर प्रहार किया।

बिग बी ने की व्हाट्सप्प वाले ‘चाणक्य’ की पंक्तियाँ ‘पूज्य बाबूजी’ के नाम, साहित्यप्रेमी दुखी

सोशल मीडिया पर अक्सर हम देखते हैं कि मोटिवेशनल कोट्स और पंक्तियों को किसी भी शायर या बड़े लेखक के नाम से ‘वायरल’ कर दिया जाता है। इस प्रचलन के सबसे बड़े शिकार अब तक सबसे ज्यादा गाँधी, ग़ालिब, रूमी और चाणक्य हुए हैं। लेकिन इस बार जो दुर्घटना घटी है उसमें शिकार और शिकारी दोनों ही लोगों को स्तब्ध कर देने वाले नाम हैं। ये ताजा प्रकरण जुड़ा है अमिताभ बच्चन और उनके पिता स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी की एक ‘कविता’ से।

अप्रैल फूल के नाम से मनाए जाने वाले 1 अप्रैल के दिन बॉलीवुड के वरिष्ठ अभिनेता अमिताभ बच्चन ने ट्विटर पर एक ऐसी कविता पोस्ट कर डाली, जो सोशल मीडिया और व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी पर खूब चलाई जाती हैं। लेकिन दुखद बात ये थी कि खुद अमिताभ बच्चन ये बात नहीं समझ पाए कि ये कविता के नाम पर एक धब्बा है और उनके पिता हरिवंशराय बच्चन जी ने ये नहीं लिखी है। ‘पूज्य बाबू जी का लेखन’ के साथ दो हाथ जोड़ती इमोजी बनाकर अमिताभ बच्चन ने ये ऐतिहासिक भूल कर डाली, लेकिन ट्विटर यूज़र्स की आपत्ति के बावजूद भी उन्होंने ये कविता अभी तक डिलीट भी नहीं की है।

इस कविता के लिरिक्स कुछ इस तरह हैं (हमने इसमें एडिटिंग नहीं की है)

*हारना तब आवश्यक हो जाता है ,*
*जब लड़ाई ” अपनों ” से हो ,* 
*और ,* 
*जीतना तब आवश्यक हो जाता* 
*जब लड़ाई ‘ अपने आप ‘ से हो* ….. 
*मंजिल मिले ना मिले ये* 
*मुकदर की बात है ,* 
*हम कोशिश ना करें , यह तो गलत बात है !* 
*किसी ने बर्फ से पूछा कि-* 
*आप इतने ठडे क्यो हो?* 
*बर्फ ने बडा सुन्दर उत्तर दिया-* 
*मेरा आतीत भी पानी* 
*मेरा भविष्य भी पानी* 
*फिर गर्मी किस बात की रखूं !*

हिन्दीनामा (Hindinama2) ने चाणक्य की एक रैंडम तस्वीर पर लिखी गई इन्हीं पंक्तियों के साथ आपत्ति जताते हुए लिखा है कि ये चाणक्य ने लिखा है ना कि हरिवंशराय बच्चन जी ने।

हालाँकि, ये बच्चन साहब का पारिवारिक मामला है लेकिन यह एक बड़ा सन्देश है कि जब अमिताभ बच्चन जैसी जागरूक हस्ती भी इंटरनेट पर चलने वाली अफवाहों के सही और गलत होने का निर्णय नहीं ले पाते हैं तो फिर आम नागरिक इन सूचनाओं से किस स्तर तक प्रभावित हो सकता है, वो भी ऐसे समय में, जब लोग सोशल मीडिया के माध्यम से और सस्ते कॉमेडियंस द्वारा दी गई जानकारियों को ही ब्रह्म सत्य मान बैठते हैं और हर दूसरे मनचले व्यक्ति के आँकड़ों को ही सही मानकर सरकार को कोसना चालू कर देते हैं।

क्या कनेक्शन है केजरीवाल का टैक्स-हेवन देशों और हेम प्रकाश शर्मा से?

कल ही ऑपइंडिया ने यह खुलासा किया कि आप सुप्रीमो और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल मध्य-पूर्व के मुस्लिम-बहुल देशों से चंदा माँग रहे हैं, और उसके लिए आम आदमी पार्टी के विज्ञापन इन देशों में चल रहे हैं। आज यह पता चला कि यह खबर बाहर आने के बाद भी आम आदमी पार्टी का संदिग्ध चंदा-उगाही अभियान थमा नहीं है बल्कि और फैल गया है। और इस फेहरिस्त में टैक्स-चोरी आसान करने के लिए बदनाम (लेकिन टैक्स-चोरों में ‘हेवन’ के रूप में मशहूर) देशों में भी अब आम आदमी पार्टी के विज्ञापन भेजे जा रहे हैं।

जिन 62 देशों में आप के विज्ञापन चिह्नित हैं, उनमें भारत, ऑपइंडिया द्वारा पहले ही खुलासा किए गए चार देशों सऊदी अरब, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात, और क़तर, के अलावा ऑलैंड आइलैंड्स, मखदूनिया (Macedonia, आक्रान्ता सिकंदर का देश), मॉलडोवा जैसे देश भी शामिल हैं।


टैक्स-हेवन देशों का नाम निकल कर आता है सामने

ऑलैंड आइलैंड्स की कुल आबादी 2017 की जनगणना के हिसाब से 30,000 है। अप्रवासी हिन्दुस्तानी भी यहाँ केवल 38 ही हैं। केजरीवाल यहाँ से कितने चंदे की उम्मीद कर रहे थे?

ऐसा ही एक और देश गर्न्सी भी इस सूची में है जहाँ 2016 की जनगणना 63,000 की आबादी बताती है। इसके अलावा यह देश टैक्स-हेवन के रूप में भी विख्यात/कुख्यात है। एंडोरा भी एक और देश है जो आप की विज्ञापन सूची और आंशिक टैक्स-हेवन देशों की सूची, दोनों में मौजूद है।

मखदूनिया, अल्बेनिया, कोसोवो- तीनों के तीनों टैक्स-हेवन देशों की सूची में हैं, और आम आदमी पार्टी की संभावित दानदाता-लक्ष्य की सूची में भी हैं। मॉलडोवा भी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई से अपनी राजनीति शुरू करने वाले अरविन्द केजरीवाल के चंदा-अभियान के लक्ष्य पर है, और सावर्जनिक भ्रष्टाचार पर नज़र रखने वाली संस्था CiFAR इस देश को ‘यूरोप का बिसराया भ्रष्टाचार का स्वर्ग’ कहती है।

केजरीवाल वेटिकेन सिटी में भी चंदे के लिए विज्ञापन लगाए हैं, और यहाँ कुल 1000 ही लोग रहते हैं, जिनमें शायद ही कोई हिंदुस्तान का नागरिक या गैर-ईसाई होगा!

केजरीवाल और चंदा- दाल में काला, या फिर…?

2017 में आम आदमी पार्टी पर यह आरोप लगा था कि उसने हवाला के जरिए शेल कम्पनियों से चंदे के पैसे लिए। उसके पहले केजरीवाल के ‘गुरु’ अन्ना हजारे भी उन्हें पत्र लिखकर पार्टी को मिल रहे चंदे के बारे में स्थिति स्पष्ट करने के लिए कह चुके थे।

यही नहीं, केजरीवाल पर 2014 के आम चुनावों के पहले भी संदिग्ध स्रोतों से चंदा लेने का आरोप है। आप के बागी विधायक कपिल मिश्रा ने यह आरोप लगाया था कि उनके (केजरीवाल के) वाराणसी से लोकसभा चुनावों का पर्चा भरने के एक सप्ताह पूर्व 5 अप्रैल 2014 को आम आदमी पार्टी के खाते में 4 शेल कम्पनियों से ₹2 करोड़ जमा किए गए। उन तीन कम्पनियों में एक डायरेक्टर समान था- हेम प्रकाश शर्मा।  नोटबंदी के दौरान प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने दिल्ली के ग्रेटर कैलाश में छापा मारकर ₹13 करोड़ से अधिक की नकदी बरामद की थी। इस मामले में फँसी कम्पनी में भी हेम प्रकाश शर्मा के डायरेक्टर होने की बात निकल कर सामने आई थी।

कपिल मिश्रा इस हेम प्रकाश शर्मा को ही नोटबंदी के समय की केजरीवाल की विवादास्पद प्रेस कांफ्रेंस के पीछे बताते हैं। और कपिल मिश्रा के आरोप यहाँ से और संगीन ही होते गए। उन्होंने न केवल हेम प्रकाश शर्मा के फर्जी डायरेक्टर होने का आरोप लगाया बल्कि यह अंदेशा भी जताया कि शायद हेम प्रकाश शर्मा का कोई अस्तित्व ही नहीं है। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि केजरीवाल को नोटबंदी की वजह से ही चुनाव लड़ने में दिक्कत हो रही है, और नोटबंदी में केजरीवाल का भारी नुकसान हुआ है। केजरीवाल के शुरूआती दिनों में भ्रष्टाचार विरोधी भाषणों को अगर याद करें तो यह आरोप चौंकाने वाले हैं।

DNA की तफ्तीश वेबसाइट से गायब!  

ऑपइंडिया ने जब इस रहस्यमयी हेम प्रकाश शर्मा की तहकीकात करने का प्रयास किया तो हमें इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट मिली जिसमें कई असहज कर देने वाले तथ्य दर्ज थे। इस रिपोर्ट के अनुसार आप को चंदा देने वालीं जिन तीन कम्पनियों का जिक्र ऊपर किया गया है, उनके पास दिखाने के लिए कोई राजस्व नहीं है। इन सभी में तीन लोग डायरेक्टर थे- हेम प्रकाश शर्मा, धरमेंदर कुमार, और मुकेश कुमार। इन कम्पनियों का जो पता रजिस्ट्रार हाउस में दर्ज है वहाँ पर एक डाकखाना, एक शटरबंद किराने की दुकान, और एक छोटा से सिलाई कारखाना है। रिपोर्ट पढ़कर यह कम्पनियाँ निश्चय ही शेल कम्पनियाँ प्रतीत होतीं हैं।

एक और भी चौंकाने वाला वाकया हमारे यह खबर लिखने के बाद हुआ है, जिसके लिए हम इस रिपोर्ट को सम्पादित कर रहे हैं। DNA ने उपरोक्त डायरेक्टरों में से एक मुकेश कुमार को तलाशा और उसके हवाले से यह दावा किया था कि हालाँकि वह इन कागजी कम्पनियों के मालिक जरूर हैं पर उन्होंने कभी आप को चंदा नहीं दिया। DNA ने यह भी लिखा था कि वह हेम प्रकाश शर्मा के आधिकारिक रूप से दर्ज पते पर पहुँचे तो उन्हें वहाँ एक दो-मंजिला घर मिला जहाँ एक अन्य 60-वर्षीया महिला और अपने परिवार के साथ रह रहीं दीपिका शर्मा ने हेम प्रकाश शर्मा की कोई भी जानकारी होने से इंकार किया है।

पर यह खबर लिखे जाने के बाद ऑपइंडिया को यह जानकारी मिली कि यह रिपोर्ट DNA के पोर्टल से हट चुकी है, और वहाँ अब केवल एक error message आ रहा है।

आखिर हेम प्रकाश शर्मा का ऐसा कौन सा सच है, जिसे छिपाने के लिए इस रिपोर्ट को हटाया गया है?? और हेम प्रकाश शर्मा का अरविन्द केजरीवाल से असली connection क्या है?

बेहतर होगा केजरीवाल खुद स्थिति स्पष्ट करें   

केजरीवाल के राजनीतिक उद्गम, और नैतिक श्रेष्ठता के उनके ऊँचे होते जा रहे दावे, दोनों का तकाजा यही है कि केजरीवाल खुद आगे आकर अपने और हेम प्रकाश शर्मा के संबंधों का खुलासा करें, और यह साफ़ करें कि उनके विज्ञापन इतने सारे टैक्स-हेवन देशों में क्यों चल रहे हैं।

अगर वह ऐसा नहीं करते हैं तो वे अपने ऊपर उँगलियाँ उठने से नहीं रोक सकते।

हार्दिक पटेल के चुनावी सपने को झटका, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर तुरंत सुनवाई से किया इंकार

कॉन्ग्रेस नेता और पाटीदार आंदोलन के अगुआ रहे हार्दिक पटेल के लोकसभा चुनाव लड़ने की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। सुप्रीम कोर्ट ने हार्दिक पटेल को  झटका देते हुए लोकसभा चुनाव लड़ने की अनुमति देने वली याचिका पर जल्द सुनवाई करने से इंकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि याचिका पर नियमित क्रम में ही सुनवाई होगी।

कोर्ट के इस फैसले के बाद ये साफ हो गया है कि हार्दिक आगामी चुनाव में हिस्सा नहीं ले पाएँगे। बता दें कि, हार्दिक ने गुजरात हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ अपील की थी, जिसमें उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गई थी। हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाने के लिए उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय से गुहार लगाई है। हार्दिक ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की थी कि उनकी सजा को निलंबित रखा जाए और साथ ही अदालत इस याचिका पर जल्द से जल्द सुनवाई करे, ताकि वो चुनाव लड़ सकें। मगर हार्दिक को यहाँ भी राहत नहीं मिली। ‘रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट 1951’ के मुताबिक अगर किसी शख्स को दो साल की सजा मिली है तो वो चुनाव नहीं लड़ सकता है।

नामांकन की आखिरी तारीख 4 अप्रैल है। इस फैसले से हार्दिक के साथ-साथ कॉन्ग्रेस पार्टी को भी झटका लगा है, क्योंकि 12 मार्च को कॉन्ग्रेस में शामिल हुए हार्दिक पटेल को पार्टी जामनगर से चुनाव लड़ाने की तैयारी में थी और हार्दिक ने भी जामनगर से कॉन्ग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर दी थी।

गौरतलब है कि हार्दिक को राज्य के महेसाणा जिले के विसनगर में 23 जुलाई 2015 को एक आरक्षण रैली के दौरान हुई हिंसा और तत्कालीन स्थानीय भाजपा विधायक ऋषिकेश पटेल के कार्यालय पर हमले और तोड़फोड़ के मामले में पिछले साल 25 जुलाई को एक स्थानीय अदालत ने 2 साल के साधारण कारवास की सजा सुनाई थी। उन पर जुर्माना भी लगाया गया था।

ऐसा लगता है राहुल के टुकड़े-टुकड़े गैंग वाले दोस्तों ने तैयार किया है घोषणापत्र: जेटली

कॉन्ग्रेस ने आज अपना चुनावी घोषणापत्र जारी किया। घोषणा पत्र को पार्टी ने ‘जन आवाज’ का नाम दिया। इस घोषणा पत्र में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी। इस घोषणा पत्र को पढ़ने के बाद वित्त मंत्री ने इसमें मौजूद कई बातों को खतरनाक बताया। अरुण जेटली ने देशद्रोह के अपराध को खत्म कर देने वाली बात पर अपना मत रखा।

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी के घोषणा पत्र में कई बातें ऐसी हैं जिन्हें देखकर ऐसा लगता कि घोषणापत्र के कुछ बिंदु राहुल गाँधी के टुकड़े-टुकड़े गैंग वाले दोस्तों द्वारा तैयार किए गए हैं।

उन्होंने कॉन्ग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि वे एकता के ख़िलाफ़ और देश को तोड़ने वाला काम करते हैं। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर को लेकर गाँधी-नेहरू परिवार द्वारा जो ऐतिहासिक भूल हुई उसके लिए देश उन्हें कभी माफ़ नहीं कर सकता है।

जेटली ने देशद्रोह को अपराध श्रेणी से खत्म करने वाली बात पर कहा कि जो पार्टी इस तरह की बातें करती है वो देश के एक भी वोट पाने की हकदार नहीं हैं। कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र को जेटली कहा कि इसमें माओवादियों और जेहादियों की रक्षा करने के लिए सीआरपीसी में बदलाव की बात हुई।

जेटली की माने तो कॉन्ग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में जम्मू-कश्मीर के लिए पूरा पेज लिख दिया है। लेकिन कश्मीरी पंडित के लिए एक जिक्र भी नहीं है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के सेक्युलेरिज्म में कश्मीरी पंडितों के लिए आँसू नहीं है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस का घोषणापत्र AFSPA को कमजोर करने की बात कर रहा है। बता दें इस घोषणा पत्र में सेना के अधिकारियों पर किसी सरकारी अनुमति के बिना मामला दर्ज़ होने की भी बात है। जिसपर वित्त मंत्री का तर्क है कि अगर ऐसा होता है तो किसी आतंकवादी को पकड़ने पर भी उनका संगठन बदसलूकी के आरोप लगाता है।

अरुण जेटली ने कॉन्ग्रेस पार्टी की न्याय योजना को एक धोखा बताया, क्योंकि घोषणा पत्र में साफ नहीं किया गया है कि इसके लिए बजट कहाँ से आएगा। वित्त मंत्री ने कहा कि उन्होंने राहुल गाँधी से ज्यादा बार कॉन्ग्रेस का घोषणा पत्र पढ़ा है। उनका कहना है कि इस घोषणा पत्र के साथ कॉन्ग्रेस पार्टी राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ नई नीतियाँ लेकर आई है जिसका मकसद सिर्फ़ देश को कमज़ोर बनाना है।

कॉन्ग्रेस ने घोषणा पत्र में सुरक्षा बलों पर लगाए यौन-शोषण सहित कई गंभीर आरोप

कॉन्ग्रेस पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए अपना चुनावी घोषणापत्र 2 अप्रैल 2019 मंगलवार को जारी किया, जिसमें NYAY जैसे कई लुभावने वादों के साथ, जो अपने आप में संदिग्ध कि कैसे पूरा होगा और सम्भावना इस बात की ज़्यादा है कि उनकी यह योजना अर्थव्यवस्था को पंगु बना देगा, राहुल गाँधी की दृष्टि से जम्मू और कश्मीर शायद सबसे अस्थिर है, यह देखते हुए कि उन्होंने काफी हद तक अलगाववादियों के साथ कदमताल करने का फैसला किया है।

घोषणापत्र का एक हिस्सा देखिए, जो उनकी कश्मीर दृष्टि के बारे में है।

कॉन्ग्रेस के लोकसभा चुनाव घोषणा पत्र -2019 में कश्मीर के प्रति दृष्टिकोण

जहाँ तक कश्मीर का संबंध है। तमाम तरह के फैंसी शब्दों के बीच, कॉन्ग्रेस अपने घोषणापत्र में कुछ खतरनाक वादे करती है।

कश्मीर में सभी ‘हितधारकों’ के साथ संवाद

अपने घोषणापत्र में, कॉन्ग्रेस का कहना है कि उसका मानना है कि केवल संवाद ही आगे बढ़ने का रास्ता है और यह सभी स्टेक होल्डर्स के साथ बिना शर्त वार्ता की सुविधा के लिए 3 वार्ताकारों को नियुक्त करने का वादा करता है। इसने अपने घोषणापत्र में यह स्पष्ट किया है कि ये प्रस्तावित वार्ता हुर्रियत के अलगाववादियों के साथ नहीं की जाएगी जो इस समय जाँच के दायरे में हैं या यहाँ तक कि यासीन मलिक जैसे अलगाववादियों के साथ भी।

कॉन्ग्रेस की यह वार्ता बिना किसी “पूर्व शर्त” के होने जा रही है, जो ज़्यादा चिंताजनक है। इस दृष्टिकोण से तो कॉन्ग्रेस घाटी में आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले तत्वों से भी बातचीत करने को तैयार है।

घाटी में सुरक्षा बलों की तैनाती की समीक्षा की जाएगी

कॉन्ग्रेस ने घाटी में सुरक्षा बलों की तैनाती की समीक्षा करने का वादा किया है। कॉन्ग्रेस घाटी में सशस्त्र बलों की तैनाती को कम कर, उन्हें सीमाओं की तरफ ले जाएगी।

अब यह कोई रहस्य नहीं है कि कश्मीर घाटी आतंकवाद से कराह रही है और सेना का ‘ऑपरेशन क्लीन’ अभियान ने घाटी में आतंकवाद पर अंकुश लगाने में बहुत हद तक सफल रही है। इस कदम के साथ, कॉन्ग्रेस पार्टी यह सुनिश्चित कर रही है कि अब तक उदाहरण के लिए, बुरहान वानी और अहमद डार जैसे आतंकियों को बाहर निकालने और उन्हें उनके अंजाम तक पहुँचाने के रूप में हुई प्रगति पर अंकुश लगाया जाएगा। और एक तरह से कॉन्ग्रेस तुष्टिकरण की नीति को बढ़ावा देते हुए आतंकवादियों को नए सिरे से ऊर्जा हासिल करने और आतंकी हमला कर देश को लहूलुहान करने के लिए उन आतंकियों को पूरा समय देने जा  रही है।

अफस्पा (AFSPA) में संशोधन का प्रावधान

कॉन्ग्रेस ने सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम में संशोधन करने का भी वादा किया है जो कश्मीर जैसे अशांत क्षेत्रों में लागू है। कॉन्ग्रेस की मंशा है कि वह सिर्फ इसलिए यह कानून बदल देगा ताकि तथाकथित सुरक्षा और मानवाधिकार संतुलित रहे। इसका मतलब तो यही है कि कॉन्ग्रेस ने आसानी से यह साबित करने की कोशिश कर रही है कि सेना मानव अधिकारों के उल्लंघन में शामिल है। AFSPA की शक्ति और पहुँच को कम करना भी घाटी के लिए आने वाले समय में एक अप्रत्याशित आपदा को निमंत्रण ही है। कॉन्ग्रेस यहाँ यह भूल रही है कि आतंकी बहुल घाटी में असाधारण परिस्थितियों से निपटने में, सेना को असाधारण शक्तियों की ज़रूरत है। पर देश के शांतिपूर्ण माहौल से कॉन्ग्रेस को क्या? कॉन्ग्रेस का कश्मीर केंद्रित घोषणापत्र देखकर तो यही लगता है कि घाटी में आतंकवाद और आतंकवादियों को फिर से हवा देने की घोषणा कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र में की गई है।

कॉन्ग्रेस ने भारतीय सशस्त्र बलों पर यौन-हिंसा का आरोप लगाया

कॉन्ग्रेस के कश्मीर में AFSPA में संशोधन के वादे के साथ ही, घोषणापत्र के अगले हिस्से में, कॉन्ग्रेस ने भारतीय सेना पर घाटी में यौन हिंसा जैसे जघन्य अपराधों का आरोप लगाकर, अलगाववादियों के सुर-में-सुर मिलाने की घोषणा कर दी है।

कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र में कहा गया है कि सुरक्षा और मानवाधिकारों के बीच संतुलन बनाने के लिए AFSPA में संशोधन किया जाएगा। कॉन्ग्रेस सत्ता में आते ही AFSPA के तहत सुरक्षा बलों को मिलने वाली ‘यौन हिंसा और यातना के लिए प्रतिरक्षा’ को हटा देगा।

इस तरह से कॉन्ग्रेस का तात्पर्य है कि भारतीय सेना कश्मीर घाटी में निर्दोषों पर अत्याचार, महिलाओं का बलात्कार करती है। यह ठीक वही बात है जो पाकिस्तान द्वारा भारत के प्रति कश्मीरी आबादी में असहमति बढ़ाने एवं उन्हें भारत के खिलाफ उकसाने के लिए फैलाया जाता रहा है। यहाँ तक कि कश्मीरी आतंकवादियों और अलगाववादियों द्वारा आतंकवाद का औचित्य साबित करने के लिए भी यही लाइन इस्तेमाल की जाती है।

शेष भारत में कश्मीरियों के साथ दुर्व्यवहार करने के बारे में झूठ

पुलवामा हमले के बाद, वामपंथी-लिबरल नेटवर्क ने, ये झूठ फैलाने की पूरी कोशिश की थी कि कश्मीरियों पर शेष भारत द्वारा हमला किया जा रहा था। इस तरह के कई झूठ न केवल पुलिस बल्कि नागरिकों द्वारा भी खारिज किए गए थे। इस कहानी को लगभग उन आतंकवादियों को कवर देने के लिए तैयार किया गया था जिन्होंने 40 सीआरपीएफ सैनिकों के आत्मघाती हमले को अंजाम दिया था। अपने वीडियो में, अहमद डार ने भी “गौ-मूत्र पीने वालों” को मारने की कसम खाई थी, जिसका मूल अर्थ है कि वह हिंदुओं का सफाया करना चाहता था। कॉन्ग्रेस का यह घोषणा पत्र यह सुनिश्चित कर रहा है कि 40 सीआरपीएफ जवानों की हत्या पीड़ित कश्मीरियों द्वारा की गई थी।

कश्मीरी पंडितों का कोई जिक्र तक नहीं

पूरे घोषणापत्र में कॉन्ग्रेस ने इस बात का कहीं उल्लेख नहीं किया है कि कश्मीरी पंडित घाटी में लौट सकते हैं या नहीं। 1990 में, घाटी के कट्टरपंथियों ने जिनका बलात्कार किया, हत्या की और बचे-खुचे हिंदुओं को घाटी से निकाल बाहर किया था।

कॉन्ग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में सेना को बदनाम करने, जवानों पर आरोप लगाने के लिए अलगाववादी सुर अपना लिया, लेकिन कश्मीरी पंडितों के निष्काषन और उन पर अत्याचार के रूप में हुए एक ऐतिहासिक बर्बरता को ठीक करने के बारे में बात नहीं की है। कॉन्ग्रेस को याद होगा कि किस घाटी के मुस्लिम चरमपंथियों ने हिंदुओं का नरसंहार किया था, यह घोषणा पत्र अपने आप में कॉन्ग्रेस के कश्मीर के प्रति छिपे मंसूबों का खतरनाक दस्तावेज है।

हिन्दुओं का अपहरण और लव जिहाद: बंगाल बन रहा है पाकिस्तान की सस्ती फोटोकॉपी

पश्चिम बंगाल लोकतंत्र का खुला उपहास बन चुका है। लोकतंत्र का प्रहरी वहाँ डरा हुआ है, राज्य पुलिस हिन्दुओं पर होने वाली बदसलूकी पर FIR दर्ज करने से मना करने लगी है। क्या उसे अल्पसंख्यकों से डर लगने लगा है? अगर हाँ, तो फिर लोकतंत्र क्या धरना देने गया है? ममता बनर्जी को अपने नेता और व्यक्तिगत अधिकारियों को इनकम टैक्स की रेड से बचाने के लिए केजरीवाल मॉडल आधारित धरना प्रदर्शन से समय निकालकर अल्पसंख्यकों द्वारा चलाए जा रहे इस व्यापक धर्म परिवर्तन अभियान के खिलाफ सख्त कदम उठाने चाहिए, यह संविधान की सेक्युलर छवि पर प्रश्नचिन्ह है।

भारतीय पत्रकार चाहे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को शांति को नोबेल पुरस्कार दिलाए जाने की कितनी भी वकालत कर लें, लेकिन पाकिस्तान में हिन्दुओं के साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार और जबरन धर्म परिवर्तन जैसी घटनाओं का कोई समाधान नहीं है। पाकिस्तान एक आतंकवादी मिजाज की सेना और मज़हब संचालित मशीनरी पर काम करता है, इसलिए उस देश से लोकतान्त्रिक मूल्यों की उम्मीद करना एक चुटकुले से ज्यादा कुछ नहीं है। लेकिन, भारत जैसे देशों में भी हिन्दुओं के साथ अक्सर बदसलूकी और जबरदस्ती धर्म परिवर्तन की घटनाएँ देखने को मिलती हैं। चिंता का विषय ये है कि इस देश में हिन्दुओं के साथ बदसलूकी, जबरन धर्म परिवर्तन और नाबालिग लड़कियों का निकाह करवा देना ऐसे समुदाय के लोगों द्वारा करवाया जाता है, जो अल्पसंख्यक माने जाते हैं। कहीं पश्चिम बंगाल पाकिस्तान की कियोस्क ब्रांच तो नहीं बनती जा रही है?

लड़कियों का अपहरण के बाद धर्म परिवर्तन करवाकर निकाह

अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा इस तरह का सबसे ताजा उदाहरण पश्चिम बंगाल से आया है, जिसकी ममता बनर्जी हर दूसरे दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लोकतंत्र की हत्या करने का आरोप लगाती हैं। कोलकाता में एक व्यक्ति का आरोप है कि उसकी 2 बेटियों का जबरन हिन्दू से मुस्लिम मज़हब में मतांतरण कराने के बाद शादी करा दी गई है। इनमें से एक लड़की नाबालिग है।

अब यह पीड़ित पिता अपनी बेटियों के लिए न्याय माँग रहा है, लेकिन सवाल ये है कि न्याय दिलाए कौन? पीड़ित व्यक्ति ने बताया कि 31 मार्च को इस मामले में दूसरी बार उसने शिकायत दर्ज कराई है, लेकिन पुलिस की ओर से अभी तक इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की गई है। लड़कियों के पिता का दावा है कि पुलिस ने अभी तक FIR दर्ज नहीं की है। आखिर एक लोकतान्त्रिक देश में पुलिस को किसका डर हो सकता है?

पिता की ओर से पुलिस को दी गई शिकायत के अनुसार, “मेरी दो बेटियाँ हैं। हाल ही में मुझे पता चला कि हमारे इलाके में कुछ मुस्लिम लड़के बालिग और नाबालिग दोनों तरह की लड़कियों को फँसाने की कोशिश कर रहे हैं। इसमें मेरी बेटियाँ भी शामिल हैं। शुरुआत में उन्होंने हिंदू बनकर मेरी बेटियों से मेलजोल बढ़ाने की कोशिश की। लेकिन जब मेरी बेटियों को आरोपित शहबाज और अहमद खान की असलियत का पता चला तो उन्होंने कोई भी संबंध रखने से इनकार कर दिया।”

अपनी नाबालिग लड़की का जिक्र करते हुए पीड़ित पिता ने कहा, “आरोपित युवक और उसके दोस्तों ने मेरी नाबालिग लड़की को धमकाना शुरू कर दिया। उसने धमकी दी कि वह मुझे, मेरी पत्नी और बेटे समेत परिवार के दूसरे को सदस्यों को जान से मार देगा। उसने मेरी नाबालिग बेटी पर इस्लाम अपनाने और शादी करने के लिए दबाव बनाया। जब उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया तो आरोपित बार-बार उसे ऐसा करने की धमकी देता रहा।”

नाबालिग की करवाई गई शादी

FIR लिखवाने गए पिता का कहना है कि 11 मार्च को उनकी दोनों लड़कियाँ लापता हो गई थीं। काफी खोजबीन करने के बावजूद लड़कियों का पता नहीं चला। इसके बाद जोरबागान पुलिस स्टेशन के अधिकारियों ने उनकी एक बेटी को खोज निकाला। 12 मार्च को पीड़ित पिता ने एक और शिकायत (GD नंबर 935) दर्ज कराई। इसमें बेटी के लापता होने की गुहार लगाते हुए पुलिस से मदद माँगी गई। अब प्रश्न ये उठता है कि इतने संवेदनशील मामले में कोलकाता पुलिस ने इतने संवेदनशील मामले में FIR दर्ज क्यों नहीं की? क्या बंगाल में कोई महिला आयोग जैसी संस्था है, जो इस घटना पर तत्परता दिखाए? क्या उन्होंने प्रयास किया? अगर महिला आयोग को इसकी जानकारी है, तो उन्होंने इस मामले में अब तक क्या कदम उठाए हैं?

लड़कियों के पिता का कहना है कि उनकी एक बेटी के बरामद होने के बाद इस पूरे गिरोह का खुलासा हो गया है। उसे शहबाज अहमद खान के साथ शादी करने के लिए बाध्य किया गया। यहाँ तक कि उसका नाम भी बदल दिया गया। मुस्लिम निकाहनामे में उसकी उम्र 19 साल लिखी गई है, जबकि वह महज 17 साल के करीब है।

भले ही पुलिस ने नाबालिग लड़की को बरामद कर लिया हो लेकिन उसकी बड़ी बहन अभी तक घर नहीं लौटी है। पीड़ित पिता ने का कहना है कि छोटी बेटी ने घर लौटने के बाद सारी कहानी उन्हें बताई। उसने बताया कि दोनों बहनों को शादी करने के लिए धमकाया गया था। साथ ही उनसे कहा गया था कि अगर शादी नहीं की तो माता-पिता समेत परिवार के सदस्यों को मार देंगे और दोनों के चेहरे पर तेजाब फेंक देंगे। इससे दोनों घबरा गईं थीं। पिता का कहना है कि निकाह को कोलकाता के बुर्रा बाजार इलाके की ‘बड़ी मस्जिद’ में कराया गया।

नाबालिग का नहीं कराया मेडिकल

पश्चिम बंगाल में भरे धर्म निरपेक्ष लोकतंत्र के बीच अपनी दोनों बेटियों के लिए न्याय की लड़ाई अकेले लड़ रहे पिता की शिकायत है कि नाबालिग लड़की के बरामद होने के बाद उसका कोई मेडिकल चेकअप नहीं कराया गया। उसके साथ यौन उत्पीड़न किया गया है यह मेडिकल से स्पष्ट हो सकता है, लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा है।

धर्म परिवर्तन करवाने वाले गिरोहों पर राज्य सरकार को संज्ञान लेना चाहिए। अगर इस तरह की घटनाओं पर ममता बनर्जी अभी भी कोई सख्त कदम नहीं उठाती हैं तो हर दूसरे दिन होने वाली RSS कार्यकर्ताओं की हत्या, अल्पसंख्यकों की मनमानी और हिंसा ही पश्चिम बंगाल की पहचान बनकर रह जाएँगे। मीडिया को इन मुद्दों पर चुप नहीं रहना चाहिए, सवाल पूछने के शौकीनों को आज प्राइम टाइम बैठा कर ममता बनर्जी से पूछना चाहिए कि इस बड़ी तादाद में हिन्दुओं पर उनके राज्य में जुर्म क्यों हो रहे हैं और ये सब कब तक रुकने वाला है? ममता बनर्जी को इस मामले में डेडलाइन भी देनी चाहिए, ताकि देश में अल्पसंख्यकों के प्रति लोगों का नजरिया बदलने से बचाया जा सके और लोकतंत्र जीवित रहे।

पाकिस्तान को बड़ा झटका, विश्व बैंक ने रोका 20 करोड़ डॉलर का प्रोजेक्ट

पाकिस्तान इन दिनों लगातार आर्थिक संकट से जूझ रहा है। वो इन परिस्थितियों से उबरने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इन बीच उस देश को एक और झटका लगा है। दरअसल, पाकिस्तान ने विश्व बैंक से बलूचिस्तान में जल संसाधन परियोजना के लिए 20 करोड़ अमेरिकी डॉलर कर्ज की माँग की थी, जिसके लिए विश्व बैंक ने मना कर दिया है।

बता दें कि पाकिस्तान में बलूचिस्तान का हाल बहुत ही खराब है। यहाँ पर रहने वाली 62 प्रतिशत आबादी को पीने का साफ जल उपलब्ध नहीं है। इसी के मद्देनज़र इस परियोजना की शुरुआत की गई, जिससे कि यहाँ के लोगों के पानी पीने की सुविधा उपलब्ध हो सके और साथ ही सिंचाई के लिए भी जल का भी प्रबंध हो सके। इसके जरिए लगभग 42,800 फार्म हाउस परियोजना को लाभ मिलने वाला है और साथ ही प्रांत की हाइड्रो-मौसम संबंधी निगरानी और नदी बेसिन सूचना प्रणाली को भी मजबूत किए जाने का प्रावधान है।

इस परियोजना के लिए विश्व बैंक ने तीन साल पहले एक समझौते पर दस्तखत किया था, जिसके तहत परियोजना की 20 करोड़ 97 लाख डॉलर की अनुमानित लागत में से विश्व बैंक ने 20 करोड़ डॉलर देने की बात कही थी। मगर किसी ने राष्ट्रीय जवाबदेही ब्यूरो (एनएबी) को इस परियोजना में होने वाले घोटाले की जानकारी दी। जिसके बाद एनएबी ने जाँच शुरू की और इसमें होने वाले भ्रष्टाचार के बारे में विश्व बैंक को बाताया। जिसके बाद विश्व बैंक ने कर्ज देने से फिलहाल मना कर दिया है।

विश्व बैंक के प्रवक्ता का कहना है कि बलूचिस्तान के लिए जल प्रबंधन एक प्राथमिकता है और विश्व बैंक प्रांत के लोगों के लिए इस महत्वपूर्ण संसाधन को विकसित करने के लिए सरकार के साथ काम करना चाहता है। इसलिए अगले 30 दिनों तक बलूचिस्तान सरकार के साथ काम करने की बात की गई है, ताकि इस पर नज़र रखी जा सके और परियोजना को बेहतर तरीके से संपादित करते हुए प्रांत में जल की व्यवस्था करवाई जा सके।