सोशल मीडिया पर एक खबर आग की तरह फैली कि न्यूज़ीलैंड में गत सप्ताह हुए नरसंहार के बाद 350 न्यूज़ीलैंड निवासियों ने कलमा पढ़ इस्लाम कबूल लिया है। सबूत के तौर पर ढाई मिनट का एक वीडियो भी प्रसारित हो रहा था। इसे कई व्हाट्सप्प ग्रुप और सोशल मीडिया में यह कहकर प्रचारित किया गया कि इस्लाम को लोग पसंद कर रहे हैं और हमले के बाद लोगों की रुचि इसमें बढ़ी है।
पर मीडिया में जल्दी ही इसका खण्डन भी प्रसारित होने लगा। थोड़ी सी पड़ताल के बाद ही पता चल गया कि न्यूज़ीलैंड में ऐसे किसी सामूहिक मज़हब-परिवर्तन की खबर नहीं है। यही नहीं, जिस वीडियो का सहारा लिया जा रहा है, वह भी कहीं और का और बहुत पुराना है।
संख्या, तारीख, देश: सब कुछ फ़ेक
उस वीडियो के उद्गम का पीछा करते-करते मीडिया जब यूट्यूब खँगालने लगा तो पता चला कि वह वीडियो न्यूज़ीलैंड नहीं जर्मनी का है और वह भी 12 साल पुराना (वीडियो की अपलोड की तारीख यूट्यूब पर 25 अगस्त, 2007 पड़ी हुई थी)।
यही नहीं, प्रोपेगैंडा वीडियो में जहाँ 350 लोगों के कलमा पढ़ने की बात थी, वहीं असली वीडियो में केवल 5 जर्मन नागरिकों के इस्लाम कबूल करने का दावा किया गया था।
मूल वीडियो का स्क्रीनशॉट जहाँ इसकी पुरानी तारीख बताई गई है। अब इस पेज से ओरिजिनल वीडियो को हटा दिया गया है।
शाहिद सिद्दीकी ने किया रीट्वीट, फिर डिलीट
उस फ़ेक न्यूज पर आधारित एक ट्वीट को वरिष्ठ पत्रकार, उर्दू साप्ताहिक ‘नई दुनिया’ के संपादक, व पूर्व राज्यसभा सदस्य शाहिद सिद्दीकी ने भी रीट्वीट कर खबर पर खुशी जाहिर की। बाद में हमने उनका वह ट्वीट ढूँढ़ने का प्रयास किया तो वह कहीं मिला नहीं, यानी उन्होंने उसे बाद में डिलीट कर दिया था।
उस वीडियो का उद्गम मीडिया रिपोर्ट्स में जिस यूट्यूब चैनल ‘DedicatedMoslem’ को बताया जा रहा था (चैनल की पहचान गाजा-समर्थक प्रोफ़ाइल पिक्चर से हुई), उसके यूट्यूब प्लेलिस्ट से भी फिलहाल वह वीडियो गायब है। सरसरी निगाह डालने पर ये चैनल इस्लाम के प्रचार से जुड़ा प्रतीत होता है।
जब भाजपा और कॉन्ग्रेस के बीच तुलना की बात आती है तो दोनों ही दलों के मुखिया की बात की जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूप में जहाँ राजग सरकार के पास एक ऐसा चेहरा है जिसने चाय बेचने से शुरू कर प्रधानमंत्री तक का सफर तय किया। वहीं अमित शाह के रूप में उनके पास एक ऐसा व्यक्ति है जिसने पोस्टर चिपकाने से शुरू कर दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष तक का सफर तय किया। उधर कॉन्ग्रेस के मुखिया की बात आती है तो 1978-2019 के बीच गुजरे चार दशकों में अगर नरसिंह राव और सीताराम केसरी को छोड़ दिया जाए तो गाँधी परिवार के लोग ही अध्यक्ष रहे हैं। सोनिया गाँधी तो लगातार 19 वर्षों तक अध्यक्ष बनी रहीं। भाजपा की बात करें तो पार्टी के अब तक के 10 अध्यक्षों में से एक भी ऐसे नहीं रहे हैं, जिसके पिता पार्टी में किसी पद पर रहें हों।
अमित शाह 49 वर्ष की उम्र में भाजपा के अध्यक्ष बने थे। नितिन गडकरी जब भाजपा अध्यक्ष बने थे, तब उनकी उम्र 50 वर्ष थी। अब बात भाजपा के मुख्यमंत्रियों की करते हैं। यहाँ आपको बताना ज़रूरी है कि जनसंख्या के मामले में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश और जीडीपी के मामले में देश के सबसे अमीर राज्य महाराष्ट्र के मुख्यमंत्रियों की उम्र 50 से कम है। इन दोनों में से किसी के भी पिता या परिवार का कोई व्यक्ति भाजपा संगठन या सरकार में किसी बड़े पद पर नहीं रहा है। जहाँ योगी आदित्यनाथ ने गोरखनाथ पीठ से अपने आध्यात्मिक एवं राजनीतिक सफर की शुरुआत की, देवेंद्र फडणवीस ने बहुत कम उम्र में नागपुर का मेयर बन इतिहास रचा था।
हरियाणा के मुख्यमंत्री 64 वर्षीय मनोहर खट्टर भाजपा के सबसे उम्रदराज मुख्यमंत्री हैं। वहीं अरुणाचल प्रदेश के 39 वर्षीय प्रेमा खांडू भाजपा के सबसे युवा मुख्यमंत्री हैं। कुल मिला कर देखें तो भाजपा के 12 मुख्यमंत्रियों में से 5 ऐसे हैं, जिनकी उम्र 48 वर्षीय चिरयुवा राहुल गाँधी से कम है। योगी आदित्यनाथ और देवेंद्र फडणवीस- ये गाँधी से छोटे हैं। दोनों का ही लंबा प्रशासनिक अनुभव रहा और और वे एक कुशल प्रशासक के रूप में प्रख्यात हैं। 75 ज़िलों वाले उत्तर प्रदेश को संभाल रहे योगी आदित्यनाथ ने कड़ी कार्रवाई करते हुए राज्य के अपराधियों में भारी हड़कंप मचा दिया है। वहीं देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र जैसे जटिल राज्य और शिवसेना जैसे हंगामेबाज गठबंधन साथी को संभाल रहे हैं। गोवा के नए मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत की उम्र भी 45 वर्ष है।
Out of BJP’s 12 incumbent chief ministers, five are below 50 years of age: Yogi Adityanath (46), Devendra Fadnavis (48), Pema Khandu (39), Biplab Deb (47) and Pramod Sawant (46). BJP definitely grooming young leadership in the states and giving them right exposure.
अब एक नज़र कॉन्ग्रेस के मुख्यमंत्रियों पर डाल लेते हैं। अभी हाल ही में तीन बड़े राज्यों में पार्टी की सरकार बनी। इसमें मध्य प्रदेश में 72 वर्षीय कमलनाथ और राजस्थान में 67 वर्षीय अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाया गया। ऐसा नहीं था कि कॉन्ग्रेस के पास विकल्पों का अभाव था। एमपी में ज्योतिरादित्य सिंधिया और राजस्थान में सचिन पायलट के रूप में उनके पास दो अनुभवी युवा नेता थे। दोनों ने ही चुनावों में ख़ासी मेहनत की थी और अंदेशा लगाया जा रहा था कि राहुल गाँधी जिस तरह से हर एक कार्यक्रम में ‘युवा-युवा’ रटते रहते हैं, उस हिसाब से इन दोनों को ही कमान दी जाएगी। लेकिन, हुआ इसके एकदम उलट। वैसे सिंधिया और पायलट- दोनों ही दिग्गज कॉन्ग्रेसी नेताओं के परिवारों से आते हैं। अगर इतने वर्चस्व वाले खानदानी युवाओं का पार्टी में ये हाल है तो संघर्ष कर आगे बढ़ने वालों की तो बात ही छोड़ दीजिए।
अगर भाजपा के सभी 12 मुख्यमंत्रियों की औसत उम्र की बात करें तो वो 53.5 आता है जबकि कॉन्ग्रेस के सभी 5 मुख्यमंत्रियों की औसत उम्र निकल कर 68.8 आता है। यानी दोनों पार्टियों के मुख्यमंत्रियों की औसत उम्र में क़रीब डेढ़ दशक का अंतर आ जाता है। ऐसा नहीं है कि उम्रदराज नेतागण कार्य नहीं करते। हमने अटल बिहारी वाजपेयी और नरसिंहा राव को उम्र के आखिरी पड़ाव पर भी एक कुशल प्रशासक की भूमिका निभाते हुए देखा है। लेकिन, अगर कोई पार्टी दिन-रात युवावर्ग की बातें करती है, दूसरी पार्टियों पर युवाओं को नज़रअंदाज़ करने के आरोप मढ़ती है, तो उस पार्टी को तो कम से कम उदाहरण पेश करना बनता है। राहुल अपनी हर रैली में युवाओं को रोजगार देने की बात करते हैं, उनके राजनीति में आने की बात करते हैं लेकिन ख़ुद की पार्टी में वह इसे लेकर गंभीर नहीं हैं।
पंजाब, मध्य प्रदेश और पुडुचेरी के कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्रियों की उम्र 70 पार है जबकि भाजपा के किसी भी मुख्यमंत्री ने अब तक 65 वर्ष की उम्र का दहलीज पार नहीं किया है। सबसे बड़ी बात तो यह कि भाजपा के सभी मुख्यमंत्रियों में से कोई भी खानदानी परिवार से नहीं आते हैं। पार्टी ने त्रिपुरा में 47 वर्षीय बिप्लव देब को मुख्यमंत्री बनाया। हिमाचल प्रदेश में 54 वर्षीय जयराम ठाकुर को मुख्यमंत्री बनाया गया। भाजपा के मुख्यमंत्रियों में से अधिकतर की उम्मीदवारी चुनाव से पहले घोषित नहीं की गई थी। अर्थात यह, कि इन्हे मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय पार्टी आलाकमान ने लिया। भाजपा के 12 में से 3 मुख्यमंत्री ही ऐसे हैं, जिनकी उम्र 60 के पार है। अब मुद्दे पर आते हैं ताकि आपको पता चले की हम ये आँकड़ें क्यों गिना रहे हैं?
इन आँकड़ों का मक़सद क्या है?
CMs picked by BJP
Devendra Fadnavis: 48 years old Bilpab Deb: 47 yo Yogi Adityanath: 46 yo P Sawant: 45 yo P Khandu: 39 yo
CMs picked by RG:
Kamal Nath over Scindia Gehlot over Pilot
While BJP empowers young leaders, Congress is empowering only one ‘young’ ineligible ‘dealer’
— Chowkidar Tejasvi Surya (@Tejasvi_Surya) March 19, 2019
भाजपा को अक्सर युवा विरोधी पार्टी बताया जाता है। बार-बार यह दिखाने की कोशिश की जाती है कि भाजपा और उसका हिंदुत्ववादी अजेंडा- दोनों ही युवाओं से कोसो दूर हैं। यही बोल कर भाजपा को एक रूढ़िवादी (Conservative) पार्टी के रूप में प्रचारित करने की कोशिश की जाती रही है। बताया जाता है कि आज का युवा ‘यो टाइप’ है और वो अपनी संस्कृति, परम्परा और धर्म को याद नहीं करना चाहता। वास्तविकता में भाजपा ने इस भ्रामक धारणा को तोड़ दिया है। विरोधियों के इस दुष्प्रचार पर भाजपा ने अपने एक्शन से वार किया। मोदी को तानाशाह कहने वाले आलोचकों को पता होना चाहिए कि उत्तर प्रदेश में कड़े छवि वाले योगी को मुख्यमंत्री बनाना भी पार्टी आलाकमान का ही निर्णय था।
राजनीति और खेल में बहुत अंतर है। जहाँ खेल में 35 की उम्र आते-आते खिलाड़ी के रिटायरमेंट की बारें शुरू हो जाती है, वहीं राजनीति में 35 के बाद पारी ही शुरू होती है। ऐसे में, मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री बनते-बनते ज़िंदगी खप जाती है, बशर्ते कि आप किसी बड़े नेता के परिवार से न आते हों। अगर आज की राजनीति में ऐसे युवाओं की खोज करनी है जो वंशवाद की उपज न हों तो भाजपा से बाहर शायद ही कोई नाम सूझे। बिहार में तेजस्वी यादव, यूपी में अखिलेश यादव, तेलंगाना में केटीआर, कश्मीर में उमर अब्दुल्लाह, मध्य प्रदेश में ,ज्योतिरादित्य सिंधिया, राजस्थान में सचिन पायलट, तमिलनाडु में उदयनिधि स्टालिन और हरियाणा में दीपेंद्र सिंह हुडा, ये सभी किसी न किसी दिग्गज नेता के बेटे हैं। वहीं भाजपा में लिस्ट ढूँढ़नी हो तो बस उनके मुख्यमंत्रियों पर एक नज़र दौड़ा लीजिए, आपको फ़र्क़ साफ़ पता चल जाएगा।
गोवा के दिवंगत मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर ने जब राज्य की जिम्मेदारी संभाली थी, तब उनकी उम्र मात्र 45 वर्ष थी। उनके पास क्षमता थी, योग्यता थी, पार्टी ने उन पर भरोसा जताया। इसी तरह जब शिवराज सिंह चौहान जब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे, तब उनकी उम्र 46 वर्ष थी। भाजपा के सबसे लम्बे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री डॉक्टर रमण सिंह ने भी 50 वर्ष की उम्र में पहली बार यह पद सम्भाला था। सार यह कि भाजपा में युवाओं की भूमिका पहले से ही प्रबल रही है और जब भी एक पीढ़ी के नेता रिटायर होने को आते हैं, दूसरी पीढ़ी उनका स्थान ग्रहण करने के लिए तैयार बैठी होती है, ये पीढ़ी उन नेताओं के परिवारों से नहीं होती। संघ और भाजपा को युवाओं से दूर बता कर कोसने वाले वास्तविकता जान कर बेहोश जाएँगे लेकिन सच यही है कि भारतीय जनता पार्टी में लम्बा अनुभव और युवा जोश का समुचित सम्मिश्रण है।
सचिन पायलट के ऊपर अशोक गहलोत को तरजीह दी गई
राहुल गाँधी ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बनते ही पार्टी में युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने की बात कही थी। क्या राहुल गाँधी बताएँगे कि उसके बाद हुए चुनावों में किन युवाओं को मुख्यमंत्री उम्मीदवार या मुख्यमंत्री बनाया गया? दिल्ली में फिर से 80 वर्षीय शीला दीक्षित को ही वापस लाया गया है। इन सबसे पता चलता है कि आगे भी इस बात के आसार कम ही हैं कि युवावर्ग को कॉन्ग्रेस पार्टी में कोई प्रतिनिधित्व मिले। हमें अनुभवी नेताओं की ज़रूरत है, वयोवृद्ध नेतागण हर मौसम को झेल कर आगे बढ़ने के कारण सही निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं लेकिन अगर युवाओं को मौक़ा ही न मिले तो ऐसा अनुभव किस काम का। अटल-अडवाणी-जोशी की छाया में ख़ुद को स्थापित कर के मोदी-राजनाथ-शिवराज जैसे नेता ऊपर तक पहुँच सकते हैं तो वैसे ही उनकी छाया में योगी-फडणवीस-विप्लब जैसे नेता भी सत्ता की जिम्मेदारी संभाल सकते हैं। शायद यही कारण है कि कॉन्ग्रेस दिन पर दिन गर्त में चली जा रही है और भाजपा दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है।
लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र राजनीतिक पार्टियों ने घोषणापत्र का ऐलान करना शुरू कर दिया है। इसी सिलसिले में तमिलनाडु की सियासत में लंबे वक्त तक राज करने वाली और वर्तमान में राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) ने मंगलवार को लोकसभा चुनाव के लिए अपनी पार्टी के चुनावी घोषणापत्र को जारी किया।
बता दें कि पार्टी के प्रमुख एमके स्टालिन ने मंगलवार को चेन्नई में पार्टी का घोषणापत्र जारी किया। डीएमके ने इस चुनावी घोषणापत्र में एक तरफ जहाँ लोकलुभावन घोषणाओं की झड़ी लगाकर वोटरों को साधने की कोशिश की है, वहीं दूसरी तरफ इस घोषणापत्र में पूर्व पीएम राजीव गांधी के हत्यारों को रिहा कराने का वादा भी किया है। इसके अलावा नोटबंदी पीड़ितों के परिवार को मुआवजा देने की बात भी कही गई है।
गौरतलब है कि डीएमके इससे पहले भी कई बार राज्य सरकार और राज्यपाल से राजीव गाँधी केस के दोषियों को रिहा करने की माँग कर चुकी है। वहीं मंगलवार को पार्टी के मैनिफेस्टो में इसका जिक्र किए जाने के बाद दक्षिण भारत की सियासत में विवाद शुरू हो गया है।
डीएमके ने अपने घोषणापत्र में पुडुचेरी को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने, श्रीलंका से आए शरणार्थियों को नागरिकता दिलाने, मनरेगा के तहत 150 दिन रोजगार की गारंटी देने, प्रदेश के छात्रों का एजुकेशन लोन माफ करने, राज्य को नीट (सामान्य चिकित्सा परीक्षा) से छूट दिलाने जैसे तमाम वादे किए गए हैं। बता दें कि राज्य में DMK का कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन हुआ है। DMK 20 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और शेष 19 पर इसके सहयोगी दल लड़ेंगे।
“भाजपा कभी मोदी को पीएम कैंडिडेट नहीं बनाएगी।” “… बना दिया तो गठबंधन नहीं मानेगा।” “एनडीए मान गया तो जनता नहीं चुनेगी।” “… चुन लिया तो 5 साल सरकार नहीं चलेगी।”
5 साल पूरे कर नरेंद्र मोदी जनता के बीच दोबारा जनादेश लेने के लिए खड़े हैं और विपक्ष यही नहीं तय कर पा रहा कि अफसाना क्या बुनना है। हर वार्ड की हार ‘मोदी के लिए झटका’ और हर पंचायत चुनाव ‘मोदी सरकार पर जनमत संग्रह’ करते-करते ‘भेड़िया आया’ वाली स्थिति बन गई है।
इसी शृंखला की अगली कड़ी है ‘#मैंभीचौकीदार कैम्पेन का अर्थ है कि मोदी राहुल गाँधी से डर गए हैं।’ छापने वाला है एनडीटीवी (जिसे किसी परिचय की आवश्यकता नहीं) और लिखने वाले हैं श्री मिहिर स्वरूप शर्मा (जिनका अघोषित आग्रह उनके द्वारा लिखे गए लेखों से साफ पता चलता है)।
‘सुधारों को रोक लेना राहुल गाँधी की उपलब्धि’
मिहिर लिखते हैं कि मोदी द्वारा ‘चौकीदार चोर है’ की काट ‘मैं भी चौकीदार’ से करना प्रधानमंत्री को बैकफुट पर धकेल दिए जाने का साक्ष्य है। इसे वह 2015 के ‘सूट-बूट की सरकार’ से जोड़ते हैं और (प्रसन्नतापूर्वक) बताते हैं कि उसके बाद मोदी की आर्थिक सुधार करने की हिम्मत जवाब दे गई, जो कि राहुल गाँधी की ’उपलब्धि’ है।
जो देश पुरानी प्रणालियों के बोझ तले दशकों से कराह रहा हो, उस देश में देश को बंधक बनाकर सुधारों के कदम रोक लिए जाने के श्रेय से ज़्यादा शोचनीय उपलब्धि किसी नेता के लिए हो नहीं सकती।
इसके अलावा मोदी के राहुल गाँधी से डरकर सुधार रोक देने से ज़्यादा गलतबयानी हो ही नहीं सकती। नोटबंदी, जीएसटी, इन्सॉल्वेंसी व बैंकरप्सी कोड, बीमे के क्षेत्र में एफडीआई में बढ़त को मंजूरी, यह सब उसके बाद के ही कदम हैं। क्या यह आक्रामकता- खासकर नोटबंदी और जीएसटी को लेकर- किसी डरे हुए इंसान के कदमों की छाप दिखते हैं?
‘सूट-बूट की सरकार’ का मोदी पर कुल असर इतना ही पड़ा कि मोदी सतर्क हो गए और अपनी छवि को लेकर उनमें वह सजगता आ गई जो गुजरात से आते समय नहीं थी। लेकिन गलतियों से सीखकर, और बदलते समय और हालातों को देखकर, अपनी नीति को समायोजित करना बुद्धिमत्ता है, कायरता नहीं।
उल्टा ही पड़ा है अब तक ‘सूट-बूट की सरकार’
मिहिर शर्मा को यह समझाना चाहिए कि अगर राहुल गाँधी का ‘सूट-बूट की सरकार’ लोगों को मोदी के खिलाफ समझा पाने में इतना ही सफल रहा तो ऐसा क्यों है कि 2015 में यह जुमला उछालने के बाद से कॉन्ग्रेस चुनाव-दर-चुनाव सिमटती क्यों जा रही है। आखिर ऐसी क्या बात है कि उसे छोटे दल भी गठबंधन से नकार रहे हैं?
बिहार में कॉन्ग्रेस राजद और जदयू के बाद तीसरे नंबर का दल बन कर सत्ता से चिपक भर पाई। दिल्ली में सूपड़ा साफ हो गया। असम, बंगाल, और तमिलनाडु भी हारी। केरला को चलिए माना जा सकता है कि वहाँ तो हर 5 साल में सरकार बदलती ही है, पर वहाँ भी भाजपा ने उनके वोटों में सेंध लगाते हुए अपना जनाधार दुगने से ज्यादा कर लिया।
पंजाब में आम आदमी पार्टी की वोटकटवा भूमिका और दस साल की सरकार के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर में किसी तरह एक राज्य जीत पाई कॉन्ग्रेस को यूपी, उत्तराखण्ड, मणिपुर, गोवा, गुजरात, और हिमाचल में सरकार बनाने में असफलता ही हाथ लगी। हालिया 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी कॉन्ग्रेस केवल छत्तीसगढ़ में मोदी को स्पष्ट तौर पर हरा कर सरकार बना पाई।
मणिशंकर अय्यर वाला काम किया है कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने
याद करिए मणिशंकर अय्यर ने कैसे 2014 में कहा था, “नतीजों के बाद मोदी हमारे कॉन्ग्रेस कार्यालय के बाहर ही चाय बेचेंगे”, और इस बयान ने छोटे-मोटे काम कर अपना पेट पालने वाले तबके को मोदी से ऐसा जोड़ा कि बनारस में एक पानवाले और वड़ोदरा में चायवाले को मोदी ने अपना प्रस्तावक बना दिया। इस बार भी आश्चर्य नहीं अगर राहुल गाँधी ने मोदी को चौकीदारों का एक वोटबैंक बैठे-बिठाए पकड़ा दिया हो!
मिहिर ज़ाहिर तौर पर 23 मई की रात तक नकार की मुद्रा में रहेंगे पर जैसे-जैसे मतदान के दिन पास आ रहे हैं, नतीजे दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ होते जा रहे हैं। राहुल गाँधी यदि देश में एक वैकल्पिक राजनीति करना चाहते हैं (जो बहुत अच्छी बात है) तो बेहतर होगा कि मोदी के सूट, चौकीदारी, डिग्री जैसे हास्यास्पद मुद्दों के दम पर चुनाव जीतने का ख्याल छोड़कर एक स्पष्ट वैकल्पिक एजेण्डा देश के सामने पेश करें।
भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यान्वयन मंत्रालय (Ministry of Statistics and Programme Implementation) के अंतर्गत नेशनल सैम्पल सर्वे कार्यालय द्वारा जारी किए गए डेटा को 108 अर्थशास्त्रियों ने सरकार द्वारा छेड़छाड़ किया हुआ बताया है। नेशनल सैम्पल सर्वे कार्यालय (NSSO) के प्रमुख एक महानिदेशक होते हैं, जो अखिल भारतीय आधार पर विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण करने के लिए जिम्मेदार होते हैं। प्रारंभिक डेटा विभिन्न सामाजिक-आर्थिक विषयों पर राष्ट्रव्यापी स्तर पर घरों का सर्वेक्षण, वार्षिक औद्योगिक सर्वेक्षण (एएसआई) आदि करके एकत्र किया जाता है। इन सर्वेक्षणों के अलावा, एनएसएसओ गाँव और शहरों में क़ीमतों से संबंधित डेटा एकत्र करता है।
अर्थशास्त्रियों ने इस डेटा को नकारते हुए सरकार पर सांख्यिकी संस्थाओं पर हमले करने का आरोप लगाया था। अपने अपील में उन्होंने सभी पेशेवर अर्थशास्त्रियों, सांख्यिकीविदों और स्वतंत्र शोधकर्ताओं से अनुरोध किया था कि वे सरकार द्वारा ‘असहज डेटा को दबाने’ की प्रवृत्ति के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए एक साथ आएँ। और सरकार पर सार्वजनिक आँकड़ों की पहुँच और अखंडता को बहाल करने और संस्थागत आज़ादी को फिर से स्थापित करने का प्रयास करें।
इस बयान में कहा गया है, “हाल ही में, भारतीय आँकड़े और इससे जुड़े संस्थानों को राजनीतिक रूप से प्रभावित किया जा रहा है। वक्तव्य में एनएसएसओ के समय-समय पर जारी होने वाले श्रम बल सर्वेक्षण के आँकड़ों को रोकने और 2017- 18 के इन आँकड़ों को सरकार द्वारा निरस्त किए जाने संबंधी समाचार रिपोर्ट पर भी चिंता जताई गई है।”
इसके जवाब में 131 चार्टर्ड अकॉउन्टेंट्स के समूह ने उनकी चिंता को ख़ारिज कर दिया और उनके आरोपों को बेबुनियाद और राजनीति से प्रेरित बताया। चार्टर्ड अकॉउन्टेंट्स ने इसकी तुलना अवॉर्ड वापसी से की। अर्थशास्त्रियों की इस चिंता का जवाब देते हुए अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने फाइनेंसियल एक्सप्रेस में एक लेख लिखा है। इस लेख में सिलसिलेवार ढंग से 108 अर्थशास्त्रियों द्वारा जताई गई चिंताओं का उत्तर दिया गया है। उस लेख के कई ऐसे पहलू हैं, जिनके बारे में आपको जानना ज़रूरी है। यहाँ हम उस लेख में लिखी महत्वपूर्ण बातों पर चर्चा करेंगे।
Amidst editorials & articles about government interference & manipulation of official data, an analysis of ASI data (it comes with 2 year lag) which hasn’t been criticized – yet. Expect it to be targeted in this hot fake news election & ideological season https://t.co/yIAYfvgBAx
2015 में केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने एक नया सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product) सीरीज शुरू किया था, जिसमें 2012-13 और 2013-14 से पहले के मुक़ाबले ज्यादा विकास दर की बात कही गई थी। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय देश में सांख्यिकीय क्रियाकलापों में समन्वय करता है और सांख्यिकीय मानक तैयार करता है।
नए जीडीपी सीरीज ने सीएसओ के डेटा को रिप्लेस किया है, जो 2006 से पहले उपलब्ध नहीं था। इसे ‘Annual Survey Of Industries (ASI)’ के नाम से जारी किया जाता था। इस कारण पिछले डेटा से इसकी तुलना कैसे की जाए, इसी को लेकर विवाद हो रहा है। अब कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय द्वारा जारी किए गए इंडस्ट्री बैलेंस शीट को लेकर विवाद हो रहा है। आपको बता दें कि विवाद शुरू होने से एक दिन पहले ही एएसआई का 2016-17 सीएसओ की वेबसाइट पर जारी किया गया। याद रखिए कि अभी तक एएसआई के डेटा की आलोचना नहीं की गई है। इसीलिए यहाँ उसी के आँकड़ों का जिक्र किया जा रहा है।
सुरजीत भल्ला लिखते हैं कि उन्होंने इस प्रकार की आलोचना पहले कभी नहीं देखी। फैक्ट और फिक्शन की बात करते हुए उन्होंने अपने लेख में लिखा है कि महंगाई दर का कम होना सरकार अपनी बड़ी उपलब्धियों में से एक बताती रही है। यूपीए कार्यकाल के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था ऊँची महंगाई दर की मार झेल रही थी। सुरजीत ने 108 अर्थशास्त्रियों के दावों पर करारा प्रहार करते हुए लिखा है कि ये अर्थशास्त्री वैश्विक बाजार में तेल के घटते दामों का मोदी सरकार को फ़ायदे पहुँचाने की बात तो करते हैं लेकिन वे यह नहीं बताते कि यूपीए के पहले कार्यकाल के दौरान मनमोहन सरकार को ‘विस्फोटक ग्लोबल ग्रोथ’ का फ़ायदा मिला था। यही कारण था कि भारत की जीडीपी ऊँचे स्तर पर पहुँची थी।
मुद्रास्फीति डेटा, CPI और WPI (ग्राफ़िक्स साभार: फाइनेंसियल एक्सप्रेस)
ये अर्थशास्त्री 2008 के बाद आए वित्तीय संकट के दौरान ऊँची महंगाई दर का विशाल भारतीय अर्थव्यवस्था पर गलत प्रभाव पड़ने की चर्चा करने से भी बचते हैं। आलोचकों का मानना है कि नोटेबंदी के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था गड़बड़ अवस्था में चली गई थी। नोटेबंदी के आलोचकों ने इसे एक बड़ा ब्लंडर बताया था। लेकिन, एएसआई का डेटा क्या कहता है? आँकड़े कहते हैं कि महंगाई दर में स्पष्ट रूप से कमी आई। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Customer Price Index) मुद्रास्फीति में 400bps (बेस पॉइंट्स) की कमी दर्ज की गई। यह 9% के औसत से घटकर 5% की औसत पर पहुँच गया।
थोक मूल्य सूचकांक (WPI) की गणना थोक बाजार में उत्पादकों और बड़े व्यापारियों द्वारा किए गए भुगतान के आधार पर की जाती है। इसमें उत्पादन के प्रथम चरण में अदा किए गए मूल्यों की गणना की जाती है। इसी तरह थोक मूल्य सूचकांक (Wholesale Price Index) में 420bps की औसत से कमी दर्ज की गई। अर्थात यह कि CPI मुद्रास्फीति में और WPI मुद्रास्फीति से तेज़ गिरावट दर्ज की गई।
Fact vs fiction — ASI data sheds light on job growth – The Financial Express. Exposing the politically and ideologically motivated attack by 108 economists https://t.co/rGcZbT55aK
एएसआई के पुराने विश्वसनीय डेटा भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि मोदी के कार्यकाल में आउटपुट ग्रोथ भी अच्छा रहा है। हाँ, नॉमिनल वेज ग्रोथ में ज़रूर छोटी सी कमी दर्ज की गई है, लेकिन महंगाई काफी नीचे गिरी है। अतः, यह रियल वेजेज में तेज़ वृद्धि की ओर इशारा करता है। रोजगार की बात करें तो एएसआई के डेटा के मुताबिक़ उसमे भी वृद्धि दर्ज की गई है। रोजगार के मामले में अगर NDA के तीन वर्ष के शासनकाल और UPA-2 के पीछे तीन वर्षों के कार्यकाल की तुलना करें तो पता चलता है कि मोदी के शासनकाल में रोजगार में दोगुनी दर से वृद्धि दर्ज की गई है।
वो 3 टर्म जिन्हें जानना जरूरी
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI)
ग्रामीण मूल्य संग्रह (RPC)
थोक मूल्य सूचकांक (WPI)
शहरी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI-U): यह पूरे देश भर की शहरी आबादी के लिए प्रासंगिक खुदरा कीमतों के सामान्य स्तर में समय के साथ बदलाव को मापने के लिए बनाया गया है। शहरी क्षेत्रों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के संकलन का आधार वर्ष 2010 रखा गया है। इन कीमतों का संग्रह NSSO के द्वारा 310 चुनिंदा शहरों के 1114 कोटेशन से किया जाता है। CPI-U जनसंख्या के तीन व्यापक खंडों (संपन्न, मध्यम-वर्गीय और गरीब) के आधार पर वस्तुओं की कीमतों का संकलन करती है।
ग्रामीण मूल्य संग्रह (RPC): ग्रामीण खुदरा मूल्य पर एकत्र किए गए डेटा का उपयोग कृषि श्रमिकों/ग्रामीण मजदूरों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के संकलन के लिए किया जाता है। वर्तमान में, श्रम ब्यूरो, श्रम और रोजगार मंत्रालय, कृषि श्रमिकों/ग्रामीण मजदूरों के लिए CPI का संकलन और प्रकाशन करता है। इसके लिए 1986 में 260 कमोडिटिज़ की लिस्ट बनाई गई थी। कृषि श्रमिकों/ग्रामीण मजदूरों के उपभोग पैटर्न के संबंध में कीमतों में हो रहे परिवर्तन के आँकड़ों को इन्हीं 260 कमोडिटिज़ के आधार पर लिखा जाता है। देश के सभी राज्यों में फैले चुनिंदा 603 गाँवों/बाजारों से यह आँकड़ा हर महीने एकत्र किया जाता है। इसके अलावा कृषि-आधारित 12 जबकि 13 गैर-कृषि व्यवसायों से संबंधित दैनिक मजदूरी के आँकड़े भी जमा किए जाते हैं।
थोक मूल्य सूचकांक (WPI): वर्तमान में WPI की मौजूदा सीरीज के लिए कीमतों के डेटा संग्रहण की सुविधा NSSO ही प्रदान करती है। इसे आर्थिक सलाहकार, औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग के साथ-साथ वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा संकलित किया जाता है। वर्तमान में इसके लिए हर सप्ताह 3813 यूनिटों से 4548 कोटेशनों का संग्रह किया जाता है। यानी पूरे देश में एक महीने में 18192 कोटेशन। यह भी जानें कि WPI की यह मौजूदा सीरीज का आधार वर्ष 2004-05 है।
ऐसा प्रतीत होता है कि कोई भी प्रमुख क्षेत्रीय दल कॉन्ग्रेस से गठबंधन में दिलचस्पी नहीं दिखा रहा है या पार्टी की माँगों को मानने के लिए तैयार नहीं है। बिहार में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने कॉन्ग्रेस को अल्टीमेटम देते हुए 8 सीटों पर मान जाने को कहा है। इस से ज्यादा सीटों की माँग को नकारते हुए उन्होंने कॉन्ग्रेस को अकेले चुनाव लड़ने को भी कहा। बता दें कि बिहार में राजग का गठबंधन फाइनल हो चुका है और पार्टियों ने सीटों का बँटवारा भी तय कर लिया है। जदयू और भाजपा 17-17 सीटों पर चुनावी समर में उतरेंगे जबकि लोजपा के खाते में 7 सीटें गई हैं। एक तरफ राजग ने नितीश और मोदी के चेहरे के साथ चुनावी प्रचार अभियान का श्रीगणेश कर दिया है तो वहीं दूसरी तरफ विपक्षी गठबंधन का पेंच है कि सुलझता ही नहीं।
सीट शेयरिंग के मुद्दे पर कॉन्ग्रेस की लगातार आनाकानी से परेशान राष्ट्रीय जनता दल ने पार्टी को मंगलवार (मार्च 19, 2019) तक स्थिति साफ़ करने को कहा है। बता दें कि बिहार की कुल 40 लोकसभा सीटों में से कॉन्ग्रेस 11 पर लड़ना चाह रही है जबकि लालू यादव की पार्टी उसे 8 से ज्यादा सीटें नहीं देना चाहती। राजद ने साफ़-साफ़ कर दिया है कि या तो कॉन्ग्रेस 11 से 8 सीटों पर आए या बिहार में अकेले लोकसभा चुनाव लड़ने को तैयार रहे। अगर ऐसा नहीं होता है तो राजद महागठबंधन के बाकी सहयोगियों के साथ सीटों का बँटवारा कर लेगी। तेजस्वी के 15 मार्च के ट्वीट से भी इस बात का अंदेशा लगाया जा रहा था।
संविधान और देश पर अभूतपूर्व संकट है। अगर अबकी बार विपक्ष से कोई रणनीतिक चुक हुई तो फिर देश में आम चुनाव होंगे या नहीं, कोई नहीं जानता? अगर अपनी चंद सीटें बढ़ाने और सहयोगियों की घटाने के लिए अहंकार नहीं छोड़ा तो संविधान में आस्था रखने वाले न्यायप्रिय देशवासी माफ़ नहीं करेंगे।
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार, आरजेडी सूत्रों के मुताबिक, तेजस्वी ने पटना स्थित एक होटल में प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए हॉल भी बुक कर लिया है जहाँ वह संभवत: आरएलएसपी के उपेंद्र कुशवाहा, एचएएम-एस के जीतन राम माँझी और मुकेश साहनी (विकासशील इनसान पार्टी) के साथ मंगलवार को सीटों का ऐलान कर सकते हैं। तेजस्वी ने कॉन्ग्रेस पर दबाव डालने के लिए कुछ वामदलों के नेताओं को आमंत्रित किया है। हमने एक रिपोर्ट में बताया था कि राजद सुप्रीमो लालू यादव राँची स्थित बिरसा मुंडा जेल से ही सारे निर्णय ले रहे हैं। फिलहाल वह राजेंद्र इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (RIMS) में दाख़िल हैं, जहाँ उनसे मिलने के लिए रोज नेताओं की कतार लग रही है।
शुरुआत में पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव ने कॉन्ग्रेस को 7 सीटों का ऑफर दिया था लेकिन कॉन्ग्रेस की 15 सीटों की माँग के कारण वह 1 सीट और देने को राजी हो गए। बिहार कॉन्ग्रेस प्रचार समिति के अध्यक्ष डॉक्टर अखिलेश प्रसाद सिंह के 11 सीटों पर चुनाव लड़ने के बयान के बाद दोनों दलों में तल्ख़ी बढ़ गई। बिहार में सातों चरणों में मतदान होने हैं। कॉन्ग्रेस ने दावा किया है कि मंगलवार तक मुद्दे को सुलझा लिया जाएगा।
कांग्रेस यूपी में भी पूरी तरह से स्वतंत्र है कि वह यहाँ की सभी 80 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा करके अकेले चुनाव लड़े आर्थात हमारा यहाँ बना गठबंधन अकेले बीजेपी को पराजित करने में पूरी तरह से सक्षम है। कांग्रेस जबर्दस्ती यूपी में गठबंधन हेतु 7 सीटें छोड़ने की भ्रान्ति ना फैलाये।
उत्तर प्रदेश में अखिलेश-माया की पार्टी ने महागठबंधन कर कॉन्ग्रेस को दरकिनार कर दिया। कॉन्ग्रेस ने ‘त्याग’ का परिचय देते हुए महागठबंधन के नेताओं के लिए 7 सीटें छोड़ी ने मायावती ने कॉन्ग्रेस की इस दरियादिली को ठुकराते हुए बसपा से कोई उम्मीद न रखने की सलाह दी। उधर पश्चिम बंगाल में ही वामदलों ने कॉन्ग्रेस को धता बताते हुए गठबंधन कर लिया। पश्चिम बंगाल कॉन्ग्रेस ने वाम मोर्चे के साथ गठबंधन की अपनी सभी संभावनाओं को समाप्त करने की घोषणा कर दी। बता दें कि पश्चिम बंगाल कॉन्ग्रेस की यह घोषणा तब की गई जब वाम मोर्चे ने 42 संसदीय सीटों में से 25 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा दो दिन पहले ही कर दी थी।
अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के साथ-साथ मोदी सरकार ने कर चोरी रोकने में भी बड़ी सफलता हासिल की है, जिसका नतीजा है कि आयकर के मामले में वर्तमान केंद्र सरकार यह काम कर पाई। मोदी सरकार ने महज 4 साल में आयकर रिटर्न भरने वालों की संख्या दोगुनी कर दी है। कॉन्ग्रेस सरकार के कार्यकाल में 3 करोड़ के आस-पास रहने वाली रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्या अब 7 करोड़ का आँकड़ा छूने के करीब पहुँच गई है। खास बात यह है कि पिछले वित्त वर्ष में लगभग 1 करोड़ नए करदाताओं ने आयकर रिटर्न दाखिल किया है। वहीं परोक्ष कर के तहत पंजीकृत संख्या में भी GST लागू होने के बाद बड़ी संख्या में वृद्धि हुई है।
नवीनतम सरकारी आँकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष (FY2019) में 16 मार्च 2019 को आयकर कलेक्शन ने ₹10 लाख करोड़ का रिकॉर्ड आँकड़ा पार कर लिया है। बता दें कि यह आँकड़ा अस्थायी है क्योंकि देश भर से पूरे अग्रिम कर के आँकड़े अभी तक नहीं आए हैं। जबकि अप्रैल-जनवरी की अवधि के दौरान शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह ₹7.89 लाख करोड़ रहा। हालाँकि, मार्च के मध्य तक का प्रारंभिक मूल्याँकन ₹10 लाख करोड़ आँकड़े को पार कर गया है।
चालू वित्त वर्ष के लिए प्रत्यक्ष कर संग्रह का लक्ष्य ₹12 लाख करोड़ रखा गया है। यह लक्ष्य पहले के ₹11.5 लाख करोड़ के अनुमान से अधिक है, जिसे 2019-20 के अंतरिम बजट में ₹50,000 करोड़ से संशोधित किया गया था। इस विषय पर आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने भी कहा था,“हम प्रत्यक्ष करों पर लक्ष्य को पूरा करने का विश्वास रखते हैं। लेकिन, अप्रत्यक्ष कर के मामले में कुछ कमी हो सकती है।”
प्रत्यक्ष कर में हुई है बढ़ोत्तरी
NDA सरकार के दौरान प्रत्यक्ष कर संग्रह (Direct Tax Collections) में वृद्धि हुई है। अंतरिम बजट प्रस्तुत करते हुए तत्कालीन वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि भारत का कर आधार (Tax Base), जो कर दाताओं (Tax payers) की कुल संख्या को इंगित करता है, पिछले कुछ वर्षों में 3.79 करोड़ से 6.85 करोड़ तक बढ़ गया है। इसके अलावा, पिछले वित्त वर्ष (FY18) में भारत का tax-to-GDP अनुपात 5.98% था, जो एक दशक में सबसे अच्छा प्रदर्शन था।
मोदी सरकार में दोगुनी हुई आयकर रिटर्न भरने वालों की संख्या
GST जैसे मुद्दों पर विपक्ष द्वारा फैलाये गए तमाम झूठ के बावजूद सरकारी आँकड़े बताते हैं कि आयकर विभाग ने पिछले 5 वर्षों में ₹977 करोड़ बचाए हैं, जिसमें GST का सबसे बड़ा योगदान रहा है। वित्त वर्ष 2013-14 में कुल मिलाकर 3.79 करोड़ रिटर्न दाखिल किए गए थे। जबकि, वर्ष 2017-18 में 6.86 करोड़ आयकर रिटर्न दाखिल किए गए, जो कि लगभग 80.5% की वृद्धि दर्शाता है।
तेजाब हमले का नाम सुनते ही हमारी रूह काँप जाती है, रोंगटे खड़े हो जाते हैं। तो जरा उन लोगों के बारे में सोचिए, जिन्होंने इस दर्द को झेला है, इसे जिया है। कभी एकतरफा प्यार, तो कभी आपसी दुश्मनी की वजह से सैकड़ों लड़कियों के ऊपर तेजाब से हमला होता आ रहा है। ये हमला उन्हें ना सिर्फ शारीरिक तौर पर बल्कि मानसिक तौर पर भी गहरा आघात पहुँचाता है। इससे शरीर तो झुलसता ही है साथ ही आत्मा भी झुलस जाती है।
तेजाब हमला निर्मम अपराध
अभी ताजा मामले में उच्चतम न्यायालय ने भी तेजाब हमले को ‘असभ्य व निर्मम’ करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये एक असभ्य व निर्मम अपराध है, जिसके लिए किसी तरह की कोई नरमी नहीं बरती जा सकती। बता दें कि शीर्ष अदालत ने करीब 15 साल पहले 2004 में 19 वर्षीय लड़की पर तेजाब फेंकने के अपराध में 5 साल जेल में गुजारने वाले दो दोषियों को आदेश दिया कि वे पीड़ित लड़की को डेढ़ डेढ़ लाख रूपए का अतिरिक्त मुआवजा भी दें। इस मामले पर न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की पीठ ने कहा कि न्यायालय इस स्थिति से बेखबर नहीं है कि पीड़िता को इस हमले से जो भावनात्मक आघात पहुँचा है, उसकी भरपाई दोषियों को सजा देने या फिर किसी भी मुआवजे से नहीं की जा सकती। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने दोनों दोषियों को सुनाई गई 10 वर्ष की सजा को घटाकर 5 वर्ष कर दिया था। राज्य सरकार हाईकोर्ट की इसी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला सुनाया।
तेजाब हमले के बाद करना पड़ता है अंतहीन मुसीबतों का सामना
तेजाब हमले को लेकर आम तौर पर लोग यही सोचते हैं कि सिर्फ चेहरा ही या फिर शरीर का कोई एक अंग ही तो जला या खराब हुआ है, मगर वो नहीं जानते कि जो लड़कियाँ इसकी शिकार होती हैं, उन्हें अंतहीन मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। लोगों को ऐसा लगता है कि ये दर्द सिर्फ जले हुए भाग के ठीक होने तक ही रहता है, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि इसका असर अंदरूनी टिश्यू पर भी होता है, क्योंकि जो तेजाब डाला जाता है, वो सिर्फ शरीर के ऊपरी भाग पर ही नहीं, बल्कि अंदरुनी टिश्यू में भी चला जाता है। जिसका असर बाद में पता चलता है। इसकी वजह से लीवर, फेफड़े वगैरह भी डैमेज हो जाते हैं, जिससे पीड़िता की मौत भी हो सकती है।
तेजाब हमले की पीड़ित महिलाओं को होने वाली परेशानियों को लेकर बीबीसी ने इसके विशेषज्ञ सर्जन से बात की है। जिसमें ये बताया गया है कि इस दौरान पीड़िता किन किन परिस्थितियों से गुजरती है। इसका इलाज अलग-अलग चरणों में होता है। पहले तो इसे दवाओं की मदद से ठीक करने की कोशिश की जाती है, मगर जब घाव दो से तीन हफ्तों में ठीक नहीं होता, तो दूसरे चरण में ‘स्किन ग्राफटिंग’ करनी पड़ती है। इसमें पीड़ित के शरीर से त्वचा की एक पतली परत ली जाती है और जले हुए हिस्से पर नई त्वचा की परत लगा दी जाती है और अगर जले हुए हिस्से में खून की सप्लाई सही होता है वो हिस्सा धीरे धीरे ठीक हो जाता है। अमूमन ऐसी स्थिति में पीड़ित के शरीर के ही किसी हिस्से की त्वचा की परत लेकर लगाया जाता है, लेकिन जब पीड़ित इस स्थिति में नहीं होता है कि उसके शरीर के किसी हिस्से से त्वचा ली जा सके, तो फिर ऐसे में अस्थाई तौर पर किसी दूसरे व्यक्ति के शरीर के किसी हिस्से की त्वचा लेकर लगा दिया जाता है, मगर ये ज्यादा दिन के लिए काम नहीं करता है, जल्द ही पीड़ित को अपनी स्किन देनी पड़ती है।
तेजाब पीड़िता प्रज्ञा ने की मिसाल कायम
अक्सर ऐसा देखा जाता है कि तेजाब हमले के बाद पीड़िता टूट जाती है, उनका आत्मविश्वास खत्म हो जाता है, उनके अंदर हीन-भावना घर कर जाती है, लेकिन कुछ ऐसी भी लड़कियाँ हैं, जो कि हौसला दिखाते हुए मिसाल कायम करती है और दूसरों को भी प्रेरित करती है। इन्हीं में से एक हैं- वाराणसी की प्रज्ञा सिंह। प्रज्ञा बताती हैं कि साल 2006 में उनके ऊपर तेजाब से हमला किया गया था, जिसमें उनका चेहरा बुरी तरह से जल गया था। इसे ठीक होने में लगभग दो साल लग गए। हालाँकि उनके सामने तेजाब हमले से उबरने के लिए कॉस्मेटिक सर्जरी का विकल्प था, जिससे उनके घाव के निशान खत्म हो सकते थे और उनका चेहरा पहले की तरह बन सकता था, लेकिन उन्होंने हिम्मत और आत्मविश्वास का परिचय देते हुए अपने इसी चेहरे के साथ आगे की ज़िंदगी को जीना स्वीकार किया। प्रज्ञा ने पीड़ित बने रहने की बजाए ऐसे जघन्य अपराधों की शिकार हुई पीड़िताओं के लिए बदलाव लाने की ठान ली और साल 2013 में उन्होंने अतिजीवन फाउंडेशन की स्थापना की। इसके तहत वो अपने जैसी पीड़िताओं की मदद करने के साथ ही उनकी मुफ्त सर्जरी भी करवाती है। उनकी ज़िंदगी संवारने के लिए उन्हें नौकरी भी दिलवाती है।
तेजाब हमले से नहीं रुकती ज़िंदगी
प्रज्ञा जैसी महिलाओं को देखकर प्रेरणा मिलती है कि तेजाब हमले के जख्मों से ज़िंदगी रूकती नहीं है, बस हौसलों की कमी होती है। अगर वो हौसला दिखा दिया जाए तो ज़िंदगी थोड़ी सी आसान हो जाती है। वहीं हिमाचल प्रदेश की 19 वर्षीय तेजाब पीड़िता के मामले में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से सुनाया गया फैसला सराहनीय है।
ओडिशा के कालाहांडी में सोमवार (मार्च 18, 2019) को देश की सबसे बड़ी एल्यूमिनियम कंपनी वेदांता लिमिटेड रिफाइनरी प्लांट को जलाने का प्रयास किया गया। इस बीच वहाँ प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों की झड़प में दो लोगों को अपनी जिंदगी से हाथ धोना पड़ा।
पुलिस के मुताबिक ओडिशा औद्योगिक सुरक्षाबल के सुरक्षाकर्मी और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़प में एक सुरक्षाकर्मी को जिंदा जला दिया गया और 20 लोग घायल भी हुए हैं। जनसत्ता में छपी रिपोर्ट के मुताबिक वहाँ (कालाहांडी) के एसपी बी गंगाधर ने बताया कि रेंगोपाली और उसके आसपास के गाँवों के निवासी लांजीगढ़ में रिफाइनरी के पास कंपनी में युवकों के लिए नौकरी की माँग कर रहे थे।
इसी बीच कुछ प्रदर्शनकारियों ने मुख्य गेट से प्लांट में घुसने का प्रयास किया, लेकिन सुरक्षा में तैनात ओआईएसएफ के सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें वहीं रोक दिया, जिसके बाद झगड़ा बढ़ा और पत्थरबाज़ी शुरू हो गई। कंपनी द्वारा जारी बयान में बताया गया कि इस झड़प में दो लोग की मौत हो गई है और एक सुरक्षाकर्मी समेत कुछ प्रदर्शनकारी घायल हो गए, जिन्हें अस्पताल ले जाया गया है।
अस्पताल प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि शरीर पर गंभीर चोटें लगने के कारण एक सुरक्षाकर्मी और एक प्रदर्शनकारी की मौत हुई है। मरने वाले प्रदर्शनकारी की पहचान दानी पात्रा के रूप में की गई है। दानी लाजीगढ़ का मूल निवासी था।
वेदांता कंपनी के बारे में बता दें कि भारत की सबसे बड़ी एल्यूमिनियम उत्पादक कंपनी है। इस कंपनी से हर साल 2.3 मिलियन टन एल्यूमिनियम का उत्पादन होता है। यह कंपनी भारत के एल्यूमिनियम उद्योग में 40 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखती है।
जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव की तारीखें नज़दीक आ रही है, वैसे-वैसे सियासी हलचल भी तेज हो रही है। सभी पार्टियाँ चुनाव जीतने की भरपूर कोशिशों में जुटी हुई हैं। इसी कड़ी में कॉन्ग्रेस ने सोमवार (मार्च 18, 2019) की रात अपने उम्मीदवारों की पाँचवीं सूची जारी कर दी। जिसमें उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और लक्षद्वीप की 56 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम शामिल हैं।
Congress party releases fifth list of 56 candidates for upcoming #LokSabhaElections2019 . Madhu Yashki Goud to contest from Nizamabad, Telangana, N Uttam Kumar Reddy from Nalgonda. Abhijit Mukherjee to contest from Jangirpur, West Bengal & Adhir Ranjan Chowdhary from Berhampore. pic.twitter.com/CwhKfRerGi
पार्टी ने आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए 132 और ओडिशा विधानसभा सीटों के लिए 36 सीटों पर भी उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। पार्टी महासचिव मुकुल वासनिक की तरफ से जारी किए गए बयान के मुताबिक उत्तर प्रदेश की 3, आंध्र प्रदेश की 22, असम की 5, ओडिशा की 6, तेलंगाना की 8, पश्चिम बंगाल की 11 और लक्षद्वीप की एक लोकसभा सीट पर उम्मीदवार घोषित किए गए हैं।
उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद से डॉली शर्मा, बुलन्दशहर से बंशीलाल पहाड़िया और मेरठ से हरेंद्र अग्रवाल को टिकट दिया गया है। आपको बता दें कि मेरठ से पहले ओमप्रकाश शर्मा को उम्मीदवार बनाया गया था, जिसे अब बदल दिया गया है। वहीं, पश्चिम बंगाल में जांगीपुर से पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पुत्र अभिजीत मुखर्जी, बहरामपुर से अधीर रंजन चौधरी और रायगंज से दीपा दास मुंशी को उम्मीदवार बनाया गया है। इससे पहले कॉन्ग्रेस उत्तर प्रदेश एवं कुछ अन्य राज्यों के लिए चार बार में कुल 81 उम्मीदवारों की घोषणा कर चुकी है, जिनमें सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के नाम भी शामिल हैं।
Congress party releases list of 36 candidates for elections to the Odisha legislative assembly. pic.twitter.com/HixKZ0AmSH
आपको बता दें कि दो दिन पहले ही लोकसभा चुनाव को मद्देनजर रखते हुए कॉन्ग्रेस ने अपने उम्मीदवारों के नामों की चौथी सूची जारी की थी। इस सूची में कुल 27 उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की गई थी। जिसमें 7 नाम उत्तर प्रदेश से, 2 नाम अरुणाचल प्रदेश से, 5 नाम छत्तीसगढ़ से, 1 नाम अंडमान निकोबार और 12 नाम केरल से थे। इसमें शशि थरूर समेत कई दिग्गजों का नाम शामिल था। इस लिस्ट के तहत वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री शशि थरूर को तिरुवनंतपुरम से चुनाव मैदान में उतारा गया है। वहीं अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नबम टुकी को अरुणाचल प्रदेश पश्चिम से टिकट दिया गया है।