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The Tashkent Files: मीडिया गिरोह वालों… यह प्रोपेगेंडा नहीं, अपने ‘लाल’ का सच जानने का हक है

पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमय मौत के बारे में सवाल उठाने वाली फिल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ रिलीज के लिए तैयार है। ऐसे में लिबरल मीडिया ने कॉन्ग्रेस के झूठ का नक़ाब उतर जाने और लोकसभा चुनावों में संभावित क्षति को देखते हुए इसे भी प्रोपेगेंडा फिल्म कहना शुरू कर दिया है। ये धुरंधर बहुत तेज हैं, ये हर तरह के सच को प्रोपेगेंडा कह उसे ख़ारिज करने में लग जाते हैं। ये भूल जाते हैं कि प्रोपेगंडा सच दिखाना नहीं, बल्कि छिपा कर नाहक गाल बजाना है।

जानकारी के लिए बता दें कि वामपंथी मीडिया गिरोह ने ठाकरे, द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर, मणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ झाँसी और उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक जैसी फिल्मों को प्रोपेगेंडा फिल्म कह कर खूब दुष्प्रचार किया। लेकिन फिर भी दाल गलती न देख, कहीं से ढूँढ के कंगना का काठ का घोड़ा उठा लाए। ये साबित करने के लिए कि देखो ये नकली राष्ट्रवाद है।

अब वामपंथियों, लिबरल मीडिया का खतरनाक प्रश्न ये है कि ये फिल्में लोकसभा चुनाव वाले साल में क्यों रिलीज हो रही हैं? जैसे निर्माता-निर्देशकों को फिल्म बनाने से पहले इनसे परमिशन लेना चाहिए? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रबल पक्षकार यहाँ स्वघोषित सेंसर बोर्ड बने बैठे हैं। लेकिन इनकी एक नहीं चल रही। इनका हर झूठ अगले ही पल चिन्दी-चिन्दी हो जा रहा है।

खैर, इस बार निर्माता विवेक अग्निहोत्री ने प्रोपेगेंडा फिल्म के आरोप का जवाब देते हुए कहा कि केवल एक ‘बेवकूफ या दोषी व्यक्ति’ ही इसे प्रोपेगेंडा कह सकता है, यह फिल्म तो ‘सच जानने का नागरिक अधिकार’ है। यह उस महान नेता की बहुत बड़ी सेवा है, जिसकी रहस्यमय मौत की पिछले 53 वर्षों में कभी जाँच नहीं की गई। फिल्म एक नागरिक के अधिकार के बारे में है। उस सच के बारे में, जिसे जान बूझकर छिपाया गया।

अग्निहोत्री ने उन पत्रकारों से ही सवाल पूछ लिया कि यह प्रोपेगेंडा फिल्म कैसे हो सकती है? शास्त्री कॉन्ग्रेस के पीएम थे, तो क्या मैं कॉन्ग्रेस के एजेंडे का प्रचार कर रहा हूँ? पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने ऐसे समय में देश का नेतृत्व किया जब भारत नेहरू की ही नीतियों के कारण 1962 में चीन के साथ युद्ध में अपमानजनक हार का सामना कर चुका था। वहाँ से उन्होंने देश को निकालकर पाकिस्तान के साथ 1965 के युद्ध में न सिर्फ हमें जीत दिलाई बल्कि भारत का मान भी बढ़ाया। अग्निहोत्री ने उनके लिए कहा, “शास्त्री भारत के पहले आर्थिक सुधारक और एक सैन्य पीएम थे। उन्होंने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बीच भी हार नहीं मानी। जय जवान,जय किसान का नारा दे देश को सम्बल दिया था।”

वैसे सार्थक और रियलिस्टिक सिनेमा का बढ़िया दौर चल रहा है। 2019 की शुरुआत पॉलिटिकल ड्रामा फिल्म ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ के जरिए हुई। इसके बाद ठाकरे, ‘मणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ झाँसी’ और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बन रही बॉयोपिक ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ 5 अप्रैल को रिलीज होने जा रही। जिसका ट्रेलर रिलीज़ हो चुका है और दर्शकों ने ज़बरदस्त उत्साह दिखाया है।

इसी कड़ी में 12 अप्रैल को एक और बायोपिक फिल्म रिलीज को तैयार है। यह फिल्म भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बाहदुर शास्त्री की ‘डेथ मिस्ट्री’ पर बनाई गई है। फिल्म का नाम ‘द ताशकंद फाइल्स’ है। इसका ट्रेलर 25 मार्च को रिलीज होगा।

‘द ताशकंद फाइल्स’ भारत के चर्चित और दूसरे प्रधानमंत्री लाल बाहदुर शास्त्री की डेथ मिस्ट्री पर लगभग 3 साल के रिसर्च के बाद बनाई गई है। फिल्म का नाम ‘द ताशकंद फाइल्स’ रखा गया है क्योंकि लाल बाहदुर शास्त्री की मौत ताशकंद में ही हुई थी। शास्त्री जी, उस समय ताशकंद के राजनीतिक दौरे पर थे। दरअसल, 10 जनवरी 1966 को उज्बेकिस्तान के ताशकंद शहर में भारत और पाकिस्तान के बीच शांति समझौता हुआ था। इस समझौते के एक दिन बाद यानि 11 जनवरी 1966 को शास्त्री जी की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई थी। यह कहा जाता है कि उनकी मृत्यु कार्डियक अरेस्ट से हुई लेकिन उनके परिवार ने हत्या का आरोप लगाया था।

फिल्म-मेकर और फिल्म से जुड़ी टीम पिछले 3 साल से इस घटना पर रिसर्च कर रही है और दुनिया भर से तथ्य जमा किए गए हैं। ऐसा इसलिए भी करना पड़ा कि उस समय कॉन्ग्रेस की सरकार ने उनकी मौत से जुड़ा कोई फाइल नहीं बनाया, न पोस्टमॉर्टम हुआ और न ही इस पर कोई जाँच समिति बैठाई गई। तभी तो सरकार के पास अपने एक पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत से जुड़ा कोई डॉक्यूमेंट्स ही नहीं है।

पिछले साल फिल्म के ऑफिशियल ट्विटर हैंडल पर फिल्म की टीम ने दर्शकों के साथ ही देश-विदेश के तमाम विद्वानों से शास्त्री जी की मौत से जुड़े तथ्य माँगे थे। उन्होंने लिखा था, “शास्त्री की मौत आज भी रहस्य है अगर आपके पास इससे जुड़ा कोई भी तथ्य है तो हमारे साथ शेयर करिए।”

फ़िलहाल, फिल्म का नया पोस्टर रिलीज हो चुका है जो एक अखबार के कटिंग की तरह दिखाई देता है, जिसमें लिखा है, “पाकिस्तान को हराने के बाद, भारत के प्रधानमंत्री रहस्यमय तरीके से मृत पाए गए।” इसमें शास्त्री जी की तस्वीरों वाला एक डाक टिकट भी है।

निर्माता-निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की यह फिल्म तमाम नेशनल अवॉर्ड विनर कलाकारों से सजी है जिसमें नसीरुद्दीन शाह, मिथुन चक्रवर्ती, श्वेता बासु, पंकज त्रिपाठी, विनय पाठक, मंदिरा बेदी, पल्लवी जोशी, अंकुर राठी और प्रकाश बेलावाड़ी प्रमुख हैं।

न्यूजीलैंड के बाद अब इंग्लैंड की 5 मस्जिदों पर हमला: आतंकवाद-रोधी पुलिस कर रही जाँच

इंग्लैंड में एक ही रात में पाँच मस्जिदों पर हमला किया गया। इन हमलों में स्लेजहैमर (लंबे हत्थे वाला हथौड़ा) का इस्तेमाल कर मस्जिद को नुकसान पहुँचाया गया। जिन मस्जिदों पर हमला किया गया, वो सभी बर्मिंघम में ही हैं। वेस्ट मिडलैंड्स की आतंकवाद-रोधी पुलिस मामले की जाँच कर रही है।

स्थानीय पुलिस को सबसे पहले बर्चफील्ड रोड स्थित जामा मस्जिद से किसी व्यक्ति द्वारा स्लेजहैमर से खिड़कियों को तोड़ने की शिकायत मिली। इसी मामले की जाँच के दौरान पता चला कि बर्मिंघम इलाके में स्थित अन्य चार मस्जिदों पर भी एकसमान रूप से हमला करके क्षति पहुँचाई गई है।

बर्चफील्ड रोड स्थित जामा मस्जिद के अलावे एर्डिंगटन के स्लेड रोड, विटॉन रोड, एस्टन और पेरी बैर में ब्रॉडवे स्थित मस्जिद में स्लेजहैमर से ही हमला करके नुकसान पहुँचाया गया। हमलों के पीछे का मकसद अज्ञात है लेकिन वेस्ट मिडलैंड्स पुलिस ऐसा मान रही है कि सारे हमले एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

आपको बता दें कि 15 मार्च को न्यूज़ीलैंड के क्राइस्टचर्च शहर के अल नूर मस्जिद में की गई गोलीबारी में लगभग 50 लोगों की मौत हो गई थी। इस हमले के पीछे की वजह ‘इस्लामोफोबिया’ था, जिसे हमलावर ने बताया भी था।

पढ़ें : ‘इस्लामोफोबिया’ और मल्टीकल्चरलिज़्म के मुखौटे के पीछे छिपी कड़वी सच्चाई है न्यूज़ीलैंड का नरसंहार

शब्बीर बरखा को भेजता है अश्लील फोटो, आरफ़ा को ‘होली बिस्मिल्ला’ पर अशरफ़ी कहता है ‘डर्टी लेडी’

ट्विटर पर इस्लाम के रखवालों का विरोधाभास लगभग दैनिक स्तर पर दिखता रहता है। एक तरफ बरखा दत्त को अश्लील तस्वीर भेजने वाला शब्बीर है, वहीं दूसरी ओर ‘द वायर’ की पत्रकार आरफ़ा खानम हैं जिन्होंने होली मुबारक कहते हुए ‘बिस्मिल्ला’ शब्द लिखा तो ‘सच्चे’ मजहबी भड़क उठे। वायर की पत्रकार आरफ़ा ख़ानम शेरवानी ने होली के अवसर पर कहा, “होली खेलूँगी कहके बिस्मिल्ला। होली मुबारक दोस्तों। जमकर रंग बरसे।”

आरफ़ा को तमाम तरह की हिदायतें दी गईं, जहाँ उसे ‘शराब भी पी ले’ से लेकर ‘यही लोग इस्लाम को बदनाम करते हैं’ तक कहते हुए उसके मरने की दुआएँ माँग ली गईं कि इसी हालत में आरफ़ा को अल्लाह उठा ले। एक ने यहाँ तक लिखा कि ‘जय श्री राम’ बोलकर फ़्लैट का दरवाजा भी खोल देना। किसी ने यह कहा कि बिस्मिल्ला कहके ‘मुजरा’ शुरु कर दे, ‘धंधा भी शुरु कर दे’।

ज्ञान देने वालों के कुछ ट्वीट पढ़िए और सोचिए कि क्या ये वाक़ई में मज़हब के रखवाले हैं या फिर थोक के भाव से अपनी नफ़रत और मूर्खता बाँटते हुए अपनी असहिष्णुता का प्रदर्शन कर रहे हैं कि नाम ‘मजहब’ वाला है, तो हमारे हिसाब से ही चलो।

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‘जिना’ का अर्थ है: व्यभिचार, परायी स्त्री या पराये पुरुष के पास जाना

ट्रम्प ने दी इमरान को सख्त चेतावनी, अब भारत पर हमले हुए तो पाकिस्तान के लिए अच्छा नहीं होगा

अमेरिका ने पाकिस्तान को आतंकवाद पर पूरी तरह लगाम लगाने के लिए सख्त हिदायत दी है। अमेरिका ने पाकिस्तान से स्पष्ट कहा है कि वह आतंक के सरगनाओं के खिलाफ ठोस, सटीक एवं निर्णायक कार्रवाई करे और अब अगर भारत पर कोई और आतंकी हमला हुआ तो फिर इस्लामाबाद के लिए ‘बहुत मुश्किल’ हो जाएगी।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने बुधवार को व्हाइट हाउस में संवाददाताओं से कहा, “यह जरूरी है कि पाकिस्तान जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठनों पर काबू करने के लिए ठोस एवं निर्णायक कार्रवाई करे ताकि क्षेत्र में फिर से तनाव नहीं बढ़े।”

रिपोर्ट के अनुसार, इस अधिकारी ने नाम नहीं जाहिर करने की शर्त पर कहा, “अगर पाकिस्तान की ओर से इन संगठनों के खिलाफ कोई ठोस एवं गंभीर प्रयास नहीं होते हैं तो कोई भी अन्य हमला पाकिस्तान के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी कर सकता है और यह क्षेत्र में फिर से तनाव बढ़ने का कारण भी बन जाएगा।”

बालाकोट में भारतीय वायुसेना द्वारा की एयर स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान की ओर से उठाए गए कदमों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय देखना चाहता है कि आतंकी संगठनों के खिलाफ ठोस और निर्णायक कार्रवाई हो।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार,  अधिकारी ने आगे कहा, “अभी पाकिस्तान की ओर से उठाए गए कदमों को लेकर पूर्ण आकलन करना जल्दबाजी होगी। उन्होंने कहा कि हाल के दिनों में पाकिस्तान ने कुछ ‘शुरुआती’ कदम उठाए हैं। मसलन, कुछ आतंकी संगठनों के सम्पत्तियाँ जब्त की गई हैं और कुछ की गिरफ्तारी भी हुई है और जैश के कुछ ठिकानों को प्रशासन ने अपने कब्जे में लिया है।

अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि इन कदमों के अलावा अभी पाकिस्तान की ओर से बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। इसे भारतीय कूटनीति की सफलता माना जा रहा है।

होली पर आतंकियों की नापाक हरकत, सोपोर में किया ग्रेनेड हमला, दो पुलिसकर्मी घायल

होली के अवसर पर भी आतंकी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। आज गुरुवार (मार्च 21, 2019) को आतंकियों ने जम्मू-कश्मीर के सोपोर में ग्रेनेड से हमला किया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस हमले में डांगीवाचा थाना के प्रभारी एक अधिकारी सहित दो पुलिसकर्मी घायल हो गए हैं। दोनों घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। हमले के बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस के जवानों और सुरक्षाबलों ने पूरे इलाके की घेराबंदी कर, हमलावरों की तलाश कर रही है।

मालूम हो कि बुधवार ( मार्च 20, 2019) को अलगाववादियों की ओर से यहाँ एक युवक की मौत के विरोध में बुलाए गए बंद से कश्मीर घाटी में आम जनजीवन बाधित रहा। बता दें कि युवक की पुलिस हिरासत में सोमवार को मौत हो गई थी। दक्षिण कश्मीर के अवंतीपोरा से गिरफ्तार किए जाने के तीन दिन बाद श्रीनगर में पुलिस हिरासत में रिजवान असद पंडित की मौत हो गई थी।

होली के अवसर पर अधिकारियों ने घाटी में कानून व व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पुलिस व अर्धसैनिक बलों की भारी संख्या में तैनाती की है। दक्षिण कश्मीर के जिलों में मोबाइल व इंटरनेट सुविधाएँ निलंबित की गई है, जबकि घाटी के अन्य हिस्सों में सामान्य है।

स्वामी असीमानंद और कर्नल पुरोहित के बहाने: ‘सैफ्रन टेरर’ की याद में

कल दो घटनाएँ हुईं, और दोनों ही पर मीडिया का एक गिरोह चुप है। अगर यही बात उल्टी हो जाती तो अभी तक चुनावों के मौसम में होली की पूर्व संध्या पर देश को बताया जा रहा होता कि भगवा आतंकवाद कैसे काम करता है। चैनलों पर एनिमेशन और नाट्य रूपांतरण के ज़रिए बताया जाता कि कैसे एक हिन्दू ने ट्रेन में बम रखे और दुसरे समुदाय वालों को अपनी घृणा का शिकार बनाया। 

फिर दूसरे हिस्से में बताया जाता कि कैसे एक निर्दोष व्यक्ति को, जो पाँच वक्त का नमाज़ी था, मोदी और अमित शाह ने दस सालों तक प्रताड़ित किया कि गोधरा में रुकी साबरमती एक्सप्रेस में आग उसी ने लगाई ताकि भीतर के हिन्दू जल कर मर जाएँ। बताया जाता कि अल्पसंख्यक कैसे एक सरकारी तंत्र की घृणा का शिकार हो रहा है क्योंकि हिन्दू वोटों का चुनावों के समय ध्रुवीकरण करना है। 

लेकिन हुआ इसके उलट कि असीमानंद को बरी किया गया और याकूब को सोलह साल बाद आजीवन क़ैद की सजा मिली। मैं साम्प्रदायिक बात नहीं कर रहा, मैं तो वो कर रहा हूँ जो सबको करना चाहिए। ऐसे मौक़ों पर उन तमाम लोगों से सवाल पूछा जाना चाहिए कि भगवा आतंकवाद कहाँ है? सैफ्रन टेरर के जिस तर्क पर ‘आतंक का कोई मज़हब नहीं होता’ से ‘हिन्दू भी आतंकवाद में संलिप्त हैं’ कहकर, इस्लामी आतंक के समकक्ष हिन्दू आतंकवाद की बात को मेनस्ट्रीम करने की कोशिश की गई थी, वो फुस्स हो चुकी है।

ऐसे में ही कर्नल पुरोहित याद आते हैं। उनको याद करना ज़रूरी है, क्योंकि वो भी चिदम्बरम की शैतानी खोपड़ी से उपजे इन शब्दों के घेरे में काफी समय तक रहे। उनकी वेदना उनके और उनके परिवार के अलावा कोई समझ भी नहीं सकता। असीमानंद को भी यूपीए के कार्यकाल में, कर्नल पुरोहित ही की तरह टॉर्चर किया जाता रहा। वहीं साबरमती ट्रेन में आग लगाकर 59 हिन्दुओं की जान लेने में शामिल याकूब को अल्पसंख्यक होने का सुरक्षा कवच हासिल था। 

कर्नल पुरोहित सेना के बेहतरीन अफ़सरों में से एक थे जिन्हें कॉन्ग्रेस के धूर्त नेताओं ने कथित अल्पसंख्यकों के वोटों के लिए ‘सैफ्रन टेरर’ के नाम पर एक उदाहरण बनाने के लिए इस्तेमाल किया। उनकी कहानी जाननी ज़रूरी है, अगर आप नहीं जानते हैं। 

मराठा लाइट इन्फैन्ट्री के एक अफसर को साठ किलो आरडीएक्स चुराकर मालेगाँव ब्लास्ट का दोषी बनाया जाता है जिसमें कॉन्ग्रेस की सरकार होने के बावजूद छः सालों तक चार्जशीट दायर नहीं की जा सकी। अफसर का नाम है कर्नल श्रीकांत पुरोहित। नाम तो सबने सुना ही होगा।

एक और टर्म चला था यूपीए के शासनकाल में जब कर्नल पुरोहित को मकोका के अंतर्गत बंद किया गया था: सैफ्रन टेरर, यानि भगवा आतंकवाद। ये टर्म सिर्फ एक, वो भी कल्पनाशक्ति के आधार पर, हिन्दू संगठन द्वारा तथाकथित ब्लास्ट के नाम पर दे दिया गया। जबकि वही व्यक्ति हमेशा ये कहता रहा कि हालाँकि हर आतंकी हमला मजहब विशेष के नाम वाले लोग कर रहे हैं, फिर भी हम उसे इस्लामी आतंक नहीं कहेंगे। भगवा आतंक कहेंगे, हिन्दू आतंकी संगठन कहेंगे, लेकिन समुदाय विशेष वाले हमले में वही विवेचना नहीं होगी।

हिटलर के समय में गोएबल्स ने कहा था कि एक झूठ बोलो, उसे सीधा रखो, उसे बार-बार बोलते रहो, और अंततः लोग उसे सच मान लेंगे। कर्नल पुरोहित और सैफ्रन टेरर का वही हुआ। चिदंबरम जैसे नामी चोर ने ये शब्द बोले, और फिर उसे चाटुकार पत्रकारों ने, जिनकी ज़िंदगी लुट्यन पत्रकारिता की प्रेस्यावृति में बीती, लगातार चलाया। और फिर वो समय भी आया कि भगवा आतंकवाद एक स्थापित वाक्याँश हो गया।

आपको शायद पता नहीं हो, लेकिन आज भी कर्नल पर कोई चार्ज नहीं लगा। कोर्ट को कोई सबूत नहीं मिला। इसके उलट महाराष्ट्र के एटीएस के ऊपर ये आरोप है कि उनके अफ़सर हेमंत करकरे (जो मुंबई हमले में आतंकियों की गोली का शिकार हुए) ने कर्नल पुरोहित को फँसाने के लिए आरडीएक्स ख़ुद रखा था और फिर कर्नल को उसी आधार पर गिरफ़्तार किया गया। 

कर्नल पुरोहित सेना के एक बेहतरीन अफ़सर माने जाते हैं। लेकिन उनकी ज़िंदगी का एक बहुत बड़ा हिस्सा उन्हें देशद्रोही बनाने की कोशिश में तात्कालिक सरकार ने तबाह कर दिया। कभी समय मिले तो कर्नल पुरोहित की पत्नी अपर्णा जी का इंटरव्यू सुनिएगा कि करकरे ने किस-किस तरह की प्रताड़नाएँ दी जेल में। उनके चारों हाथ-पाँव को हर तरफ खींचा जाता था, बेतहाशा पीटा जाता था, और अंततः उनकी स्थिति ये बना दी गई कि उन्हें खड़े होने में परेशानी होती है। उन्हें लगातार धमकी दी जाती रही कि वो क़बूल करे कि वो गुनहगार है वरना उसकी माँ, बहन और पत्नी को उसके सामने नंगा करके परेड कराया जाएगा।

ये सब किस लिए? समुदाय विशेष का वोट लेने के लिए? ये साबित करने के लिए कि हिन्दुओं की एक तथाकथित संस्था समुदाय विशेष के सिमी की समकक्ष है? हिन्दुओं के ख़िलाफ़ एक साज़िश रचने के लिए और अपनी राजनैतिक पहचान बचाए रखने के लिए? तुष्टीकरण की राजनीति और पक्षपाती पत्रकारिता के दौर में याकूब मेमन के ख़िलाफ़ सबूत होने के बावजूद, 22 साल तक ट्रायल चलने के बावजूद सुबह के चार बजे सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खुलवाया जाता है। लेख लिखे जाते हैं कि ये एक्स्ट्राजुडियशियल किलिंग है, और प्रबुद्ध वर्ग मान लेता है कि ऐसा ही है।

आज ये सारे दोगले पत्रकार, नंगे नेता, और छद्मबुद्धिजीवियों की पूरी जमात इस विषय पर कुछ नहीं बोल रही। आज सैफ्रन टेरर नामक परिभाषा को ढोते-ढोते पत्रकारिता चमकाने वाले, डिबेटों की महफ़िल लूटने वाले, प्राइम टाइम शो में बवाल काट देने वाले सब गायब हैं?

असीमानंद, कर्नल पुरोहित, सैफ्रन टेरर आदि इस बात के परिचायक हैं कि कॉन्ग्रेस पार्टी वोट पाने के लिए किस हद तक गिर सकती है। आमतौर पर पार्टियाँ विपक्ष के नेताओं का अपना निशाना बनाती रही हैं, लेकिन कॉन्ग्रेस के नाम थोड़े अलग तरह की बातें हैं। ये पहली पार्टी होगी जिसने सेना के अफ़सर को, राजनैतिक महात्वाकांक्षा की बलि चढ़ाया। ये पहली पार्टी थी जिसने इस देश में दंगे किए, कराए और एक धर्म विशेष के लोगों की सामूहिक हत्याएँ की। दंगे दो समुदायों में होते हैं, यहाँ एक सत्ताधारी पार्टी ने किया था।

कर्नल पुरोहित और असीमानंद जैसों को फँसाना, उसे चर्चा का विषय बनाकर, भगवा आतंक, हिन्दू टेरर जैसे शब्दों को बोलचाल में लाना, सिर्फ एकेडमिक एक्सरसाइज़ नहीं था। इस पूरे प्रक्रिया में सेना की छवि ख़राब हुई कि एक अफ़सर ही देश में आतंकवादी गतिविधि कर रहा है। इस पूरे प्रक्रिया में पूरे धर्म को, जिसका इतिहास और वर्तमान सहिष्णुता का पैमाना रहा है, आतंकवादी बताने की कोशिश की। जबकि सबको पता है कि आतंक का ठप्पा कहाँ लगा है, और क्यों। 

कर्नल पुरोहित को याद रखिए। उन्हें इसलिए याद रखिए कि हमारे-आपके जीवन काल में ही फिर कोई सत्ताधारी पार्टी वोट के लिए नीचे गिरेगी। उन्हें इसलिए याद रखिए ताकि याद रहे कि इस देश की मीडिया, पूरी दुनिया की तरह ही, बिकी हुई है और सत्ता की गोद में पलती है। उन्हें इसलिए याद रखिए ताकि याद रहे कि प्राइम टाइम एंकरों के डिबेटों में कितनी खोखली बातें होती हैं। उन्हें याद रखिए क्योंकि वो फ़ौज के बेहतरीन अफ़सर हैं।

सैफ्रन टेरर को भी याद रखिएगा। वो इसलिए कि इन दो शब्दों से एक पार्टी उस धर्म को बदनाम कर रही थी जिसने हर क़िस्म के लुटेरों को, मंदिर गिराने वालों को, बलात्कारियों की औलादों को, राजा बन गए लुटेरों की सन्तानों और उनकी पीढ़ियों के आतंक को सहा है। सहिष्णुता अगर हिन्दुओं में नहीं है, और हिन्दुस्तानियों में नहीं है तो फिर वो धरती पर कहीं हो ही नहीं सकती। इसलिए हिन्दू टेरर, भगवा आतंकवाद को याद रखिएगा। ये शब्द सिर्फ अक्षरों के झुंड नहीं, ये पूरी राजनीति का वो गंदा चेहरा हैं जो हमारे नेता बार-बार दिखाते रहते हैं।  

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होली का उपहार: UP के 18 लाख कर्मचारियों के लिए महंगाई भत्ते में 3% की बढ़ोतरी, होगा नकद भुगतान

योगी सरकार ने राज्य के कर्मचारियों को होली का उपहार दे दिया है। राज्य सरकार ने कर्मचारियों को मिलने वाले महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी का ऐलान किया है। सबसे खुशी की बात यह है कि महंगाई भत्ता 9 प्रतिशत से बढ़ाकर 12 प्रतिशत कर इसका भुगतान नकद करने का निर्देश दिया गया है।

महंगाई भत्ते में यह बढ़ोतरी 1 जनवरी 2019 से लागू हो गई है। राज्य के करीब 18 लाख सरकारी कर्मचारियों को इस फैसले से फायदा होगा। वित्त विभाग के अपर मुख्य सचिव संजीव मित्तल ने इस बारे में आदेश जारी कर दिया है। आदेश के अनुसार जनवरी और फरवरी का बढ़ा हुआ भत्ता 31 मार्च से पहले नकद देना है। जबकि मार्च का भत्ता अप्रैल में (मार्च के वेतन के साथ) दिया जाएगा।

आपको बता दें कि आचार संहिता लागू होने से पहले ही महंगाई भत्ता 9 प्रतिशत से बढ़ा कर 12 प्रतिशत कराने का आदेश पास करा लिया गया था। लेकिन इसे जारी करने के लिए योगी सरकार को चुनाव आयोग से अनुमति लेनी पड़ी। चुनाव आयोग से अनुमति मिलने के बाद बुधवार को इसे जारी कर दिया गया।

एन राव US में बनीं संघीय न्यायाधीश: शपथ ग्रहण में खुद ट्रंप हुए शामिल, अमेरिका में बढ़ी भारतीयों की धाक

अमेरिका में भारतीयों की धाक बढ़ती जा रही है। अमेरिका में भारतीय मूल की प्रख्यात वकील नेओमी जहाँगीर राव (45 वर्षीय) ने ‘डिस्ट्रिक ऑफ कोलंबिया सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स’ के अमेरिकी सर्किट जज के रूप में शपथ ग्रहण लिया। बता दें कि नेओमी ने विवादों से घिरे ब्रेट केवनॉग का स्थान लिया है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश क्लेरेंस थॉमस ने मंगलवार को व्हाइट हाउस के रूजवेल्ट रूम में राव को शपथ दिलाई।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए। बता दें कि भारत के पारसी डॉक्टर जेरीन राव और जहाँगीर नरिओशांग राव के घर डेट्रॉयट में जन्मीं नेओमी राव, श्रीनिवासन के बाद दूसरी भारतीय अमेरिकी हैं, जो अमेरिका के शक्तिशाली अदालत का हिस्सा बनीं हैं। इस अदालत से अधिक शक्तिशाली केवल अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ही है।

लड़के-लड़कियों को एक साथ फ्रेशर पार्टी, गैर इस्लामी बता मुस्लिम छात्र ने की प्रोफेसर की हत्या

पाकिस्तान में एक छात्र ने अपने प्रोफेसर की हत्या कर दी। प्रोफ़ेसर साहब का गुनाह बस इतना था कि उन्होंने लड़के-लड़कियों को एक साथ फ्रेशर पार्टी की इजाज़त दे दी। यह बहावलपुर के सादिक एगर्टन कॉलेज की घटना है। आज ही 21 मार्च को पार्टी का आयोजन होना था। लड़के और लड़कियों की एक साथ पार्टी को गुनाहे अज़ीम समझ लिया छात्र खतीब हुसैन ने। खतीब ने पार्टी को गैर इस्लामी भी बताया। और इसी बात पर प्रोफेसर खालिद हमीद से बहस हो गई थी।

20 मार्च को जब प्रोफेसर साहब कॉलेज जा रहे थे, तो खतीब ने उन पर चाकुओं से हमला कर दिया। उन्हें हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया पर बचाया नहीं जा सका। आरोपित छात्र को गिरफ्तार कर लिया गया है।

पुलिस में दर्ज शिकायत के मुताबिक, छात्र इस बात के खिलाफ था कि लड़के-लड़कियों की एक साथ पार्टी हो। वह इस तरह के कार्यक्रम को गैर इस्लामी मानता है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस को आरोपित ने बताया, “इस तरह की पार्टी इस्लामी शिक्षा के खिलाफ है। मैंने उनको ऐसा नहीं करने की चेतावनी दी थी।”

बता दें कि हमला करने के बाद छात्र खतीब चिल्लाने लगा कि मैंने उसे मार दिया है, मैंने उसे बताया था कि ख़वातीन और मर्द का एक साथ कार्यक्रम में शामिल होना इस्लाम के खिलाफ है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के शैक्षिक संस्थानों में इस तरह के कार्यक्रम आम हैं लेकिन वहाँ छात्राओं पर काफी पाबंदी है। हाल ही में पंजाब की एक यूनिवर्सिटी ने ड्रेस कोड का सर्कुलर जारी किया था। उस सर्कुलर के माध्यम से छात्राओं को टॉप, जींस, बगैर आस्तीन वाली कमीज और टाइट पैंट पहनने पर रोक लगा दी गई थी। यहाँ तक कि कई सरकारी यूनिवर्सिटी में लड़के-लड़कियों के साथ बैठने पर भी रोक है। उनके बीच बातचीत की भी अनुमति नहीं है।

कोहिनूर धारण करने वाला सिख सम्राट जिसकी होली से लाहौर में आते थे रंगीन तूफ़ान, अंग्रेज भी थे कायल

जिन्होंने भारत का इतिहास पढ़ा है, उनके सामने एक न एक बार सिख सम्राट महाराजा रणजीत सिंह का नाम आया ही होगा। और होली के बारे में कौन नहीं जानता? रंग-अबीर का यह त्यौहार अब भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी फ़ैल चुका है। यहाँ हम भारतीय एवं सिख इतिहास के एक ऐसे अध्याय की तरफ ले जाना चाह रहे हैं, जो दोनों के ही स्वर्णिम युग की याद दिलाता है। महाराजा रणजीत सिंह कोहिनूर धारण किया करते थे। कई हिन्दू, तुर्क और मुस्लिम राजाओं से होते हुए इतिहास के उस काल में कोहिनूर हीरा रणजीत सिंह के पास पहुँचा और क्यों नहीं? रणजीत सिंह की शोभा कोहिनूर से नहीं थी बल्कि कोहिनूर उनके मस्तक पर चढ़ कर इतराया करता था। उनके निधन के बाद धोखेबाज़ अंग्रेजों ने कोहिनूर को जब्त कर लिया और ईस्ट इंडिया कम्पनी ने उसे अपने कब्ज़े में ले लिया।

लाहौर के महल में सबसे भव्य तरीके से मनाए जाने वाले त्योहारों में होली भी शामिल था। होली की तैयारी काफ़ी दिनों पहले से शुरू हो जाया करती थी। उस होली का स्तर कितना भव्य हुआ करता था और उसका ऐश्वर्य और वैभव इतना विशाल था कि रंगों और गुलालों के 300 से भी अधिक टीले खड़े कर दिए जाते थे। होली के दिन इन सबका प्रयोग किया जाता था। शाह बिलावल के बगीचे में महाराजा को होली मनाना अच्छा लगता था। ये उनके पसंददीदा स्थलों में से एक था। बाग में बड़े-बड़े टेंट लगाए जाते थे, इन टेंट्स को काफ़ी अच्छे से सजाया जाता था और दोनों तरफ से सैनिकों से सुसज्जित रखा जाता था। उस दिन बाग की शोभा देखते ही बनती थी। रणजीत सिंह अंग्रेज अधिकारी सर हेनरी के टकले पर गुलाल मल दिया करते थे।

इस होली में महाराजा रणजीत सिंह के दरबारीगण, परिवार के लोग, अंग्रेज, स्थानीय जनता सहित बाहर से आए अतिथि भी होली खेला करते थे। 22 मार्च 1837 में ब्रिटिश आर्मी के कमांडर-इन-चीफ सर हेनरी फेम ने भी इस होली समारोह में शिरकत की, जिसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लोग महाराजा रणजीत सिंह की होली के कायल हो गए। उस दिन माहौल कुछ ऐसा हुआ करता था कि पूरा लाहौर रंगों से लाल हो जाया करता था। कहते हैं कि हवा में गुलाल और गुलाबजल का ऐसा सम्मिश्रण घुला होता था कि उस समय रंगीन तूफ़ान आया करते थे। ये सिख सम्राट का ही वैभव था कि उन्होंने सिर्फ़ अंग्रेज अधिकारीयों को ही नहीं रंगा बल्कि प्रकृति के हर एक आयाम को भी रंगीन बना दिया। वातावरण को बदल देने की क्षमता थी महायोद्धा रणजीत सिंह में!

शाहजहाँ द्वारा बनवाए गए लाहौर के किले को लेकर भले ही पाकिस्तान आज इतराता हो लेकिन उस किले की शानो-शौकत महाराजा रणजीत सिंह की देन है। उन्होंने किले के ऊपर कुछ और नए स्ट्रक्चर भी बनवाए। शाह बुर्ज ब्लॉक में स्थित शीश महल ही वह स्थान था, जो महाराजा का सबसे फेवरिट जगह हुआ करता था। शीश महल के ऊपर निर्माण करा कर वे वहाँ पर कोहिनूर हीरा रखा करते थे। जहाँ सालों भर भव्यता और त्यौहार का मौसम रहता था, सोचिए वहाँ होली के समय क्या स्थिति होती होगी? महाराजा ने उस किले को अपने अधिकार में लेने के बाद उसमे राधा-कृष्णा की एक पेंटिंग करवाई। वहाँ की दीवारों पर करवाई गई इस पेंटिंग को महाराजा के दरबारी पेंटरों ने ही बनाया था। कला के भी शौक़ीन थे वो, और धार्मिक आस्थाओं का सम्मान करने में सबसे अग्रणी।

और आपको पता है कि उस पेंटिंग में क्या था? उस पेंटिंग में श्रीकृष्ण और गोपियाँ आपस में होली खेल रहे थे। पेंटिंग में भी रंग और रंगों के त्यौहार का ऐसा समावेश। होली के प्रति महाराजा के प्रेम को इस पेंटिंग को देख कर ही समझा जा सकता है। महाराजा की मृत्यु के बाद भी होली की भव्यता कम नहीं हुई। कहा जाता है कि उस समय भी इस पर एक लाख रुपए के क़रीब ख़र्च हुआ करते थे। महाराजा की मृत्यु के बाद अंग्रेज लोग को भी अवसर दिखने लगा। सत्ता पाने की लालच में उन्होंने लाहौर को अशांत कर डाला। यह रणजीत सिंह का ही प्रभाव था कि होली का ये भव्य आयोजन लाहौर पार कर जम्मू-कश्मीर पहुँचा। उस समय वहाँ ऐसे हालात नहीं थे। रणजीत सिंह का ऐसा प्रभाव था कि कश्मीरी प्यार से होली खेलते और एक-दूसरे पर रंगों की बौछाड़ किया करते थे।

राधा कृष्णा की होली वाली पेंटिंग

20वीं सदी में सिखों के बीच होला मोहल्ला त्यौहार का अच्छा-ख़ासा प्रचलन था, जो कि होली का ही एक रूप है। अंतरराष्ट्रीय लेखकों द्वारा दक्षिण भारत के इतिहास पर लिखी गई एक पुस्तक से पता चलता है कि उस दिन सिख सैनिकों के बीच तरह-तरह की प्रतियोगिताएँ हुआ करती थीं, जैसे कि घुड़सवारी, पहलवानी, धनुर्विद्या इत्यादि। तीन दिन तक चलने वाले इस त्यौहार में स्वयं गुरु गोविन्द सिंह संगीत और कवी सम्मेलनों का आयोजन करवाया करते थे। कई सारे खेल, गायकी प्रतियोगिता इत्यादि को गुरु काफ़ी बढ़-चढ़ कर बढ़ावा दिया करते थे। पुस्तक में वर्णन है कि आनंदपुर साहिब से शुरू होने वाले इस त्यौहार के दौरान क्या मित्र और क्या अपरिचित, सभी आपस में होली खेला करते थे।

इसका बहुत बड़ा महत्व है। सिखों के इतिहास पर लिखी गई एक अन्य पुस्तक के अनुसार, अगर हम गुरु गोविन्द सिंह की होली को समझें तो पता चलता है कि यह आज भी प्रासंगिक है। एक तरफ जहाँ युद्धकला की प्रतियोगिताएँ होती थीं तो दूसरी तरफ खेल सम्बंधित प्रतियोगिताएँ हुआ करती थीं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि व्यक्ति को अपने शरीर पर तो ध्यान देना ही चाहिए, साथ ही किसी भी प्रकार के आक्रमण के प्रतिघात के लिए स्वयं को तैयार रखना चाहिए। यही बात किसी राष्ट्र को लेकर भी लागू होती है। इसके अलावा शांति का सन्देश देने और शांति को बढ़ावा देने के लिए कवि सम्मलेन और गायिकी जैसी प्रतियोगिताओं का सहारा लिया जाता था। शक्ति प्रदर्शन और शांति सिख गुरुओं के काल में एक ही सिक्के के दो पहलू थे, जो आज भी प्रासंगिक है।

शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह के निधन के बाद अंग्रेज हावी हो गए। 21 वर्ष की उम्र में ही पंजाब के महाराजा बने रणजीत सिंह शाह महमूद और दोस्त मोहम्मद ख़ान जैसे अफ़ग़ान शासकों को उनकी जगह दिखाई। काबुल नदी के किनारे उन्होंने पश्तूनों के शासक युसूफजई को नाकों चने चबवाया। उनकी शासकीय क्षमता और युद्धकला के आगे उनका होली समारोह कहीं छिप जाया करता था, जिसे हमने आज उभारने की कोशिश की है। तो ये थी महाराजा रणजीत सिंह की होली!