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चश्मा भूल गए थे रॉबर्ट वाड्रा इसलिए पैसों की हेराफेरी के मामले में पूछताछ में हुई देरी

बुधवार (फरवरी 06, 2019) को सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा की मनी लांड्रिग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) दफ्तर में पूछताछ चलती रही। इस दौरान रॉबर्ट वाड्रा को ईडी दफ्तर छोड़ने के लिए प्रियंका गाँधी वाड्रा स्वयं गई थी। राजनीति में जिस परसेप्शन का महत्व होता है शायद कॉन्ग्रेस पार्टी उसे ही भुनाने में जुट गई है।

प्रियंका गाँधी वाड्रा ने इसके बाद कॉन्ग्रेस दफ्तर जाकर महासचिव का पद ग्रहण किया। उन्‍होंने पत्रकारों से बातचीत में कहा, “रॉबर्ट वाड्रा से क्‍यों पूछताछ हो रही है, यह पूरी दुनिया जानती है, मैं अपने पति के साथ खड़ी हूँ। राहुल जी ने जो कार्यभार सौंपा है, उसके लिए मैं उनकी आभारी हूँ।”

यह पहला मौका है जब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के जीजा रॉबर्ट वाड्रा संदिग्ध वित्तीय लेन-देन के आपराधिक आरोपों के सिलसिले में किसी जाँच एजेंसी के समक्ष पेश हुए हैं। वाड्रा ने पहले इन आरोपों से इनकार किया था और कहा था कि राजनीतिक बदले के लिए उनके खिलाफ यह कार्रवाई की जा रही है। इसी दौरान, रॉबर्ट वाड्रा अपना चश्मा भूल गए थे, जिस वजह से पूछताछ देर से शुरू हो पाई।

ईडी का आरोप है कि फ्लैट अरोड़ा का नहीं, बल्कि वाड्रा का है।

रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ ये केस लंदन के 12 ब्रायंस्टन स्क्वायर पर स्थित एक संपत्ति की खरीद में धन शोधन से जुड़ा है। बताया जाता है कि 19 लाख पाउंड में ये संपत्ति खरीदी गई थी। जाँच एजेंसी ने अदालत को बताया था कि संजय भंडारी (हथियारों का व्यापारी, इस समय भगोड़ा) के खिलाफ आयकर विभाग काला धन अधिनियम एवं कर कानून के तहत जाँच कर रहा है। इसी कड़ी में मनोज अरोड़ा का नाम भी सामने आया।

हालाँकि, रॉबर्ट वाड्रा का कहना है कि उनका संजय भंडारी या उनके चचेरे भाई सुमित चढ्ढा-भावतोष से किसी तरह का लेना देना नहीं है, ये बात जरूर है कि वो मनोज अरोरा को जानते हैं। मनोज अरोड़ा उनका कर्मचारी रह चुका है। वाड्रा ने कहा कि ये गलत है कि उन्होंने या उनकी तरफ से मनोज अरोड़ा के लिए ईमेल लिखे गए थे।

क्‍या है पूरा मामला

वर्ष 2009 में एक पेट्रोलियम सौदे में रॉबर्ट वाड्रा की अहम भूमिका बताई जा रही है। इसकी जाँच की जा रही है। वहीं, एजेंसी को यह भी सूचना मिली है कि लंदन में कई प्रॉपर्टी रॉबर्ट वाड्रा से संबंधित हैं। इनमें 2 घर और 6 फ्लैट शामिल हैं। ईडी चाहती है कि वाड्रा आएँ और अपनी प्रॉपर्टी के बारे में जानकारी दें।

रॉबर्ट वाड्रा ने अपनी अग्रिम जमानत याचिका में आरोप लगाया है कि उनके खिलाफ अनुचित, दुर्भावनापूर्ण और अन्यायपूर्ण तरीके से कार्रवाई की जा रही है, जो राजनीति से प्रेरित है। वहीं, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने अदालत में सवाल उठाया कि क्या एजेंसी को किसी राजनीतिक ब्रिगेड की जांच नहीं करनी चाहिए? क्या ऐसा करना राजनीतिक प्रतिशोध कहलाएगा?

प्रियंका गाँधी वाड्रा की भूमिका

माना जा रहा है कि रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ जो माहौल बना था, प्रियंका गाँधी के इस कदम ने उस माहौल को खत्‍म करने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्तमान में मीडिया का सारा केंद्र अब प्रियंका गाँधी वाड्रा पर केंद्रित हो गया है। अगर वह रॉबर्ट वाड्रा के साथ नहीं जातीं, उसके अलग निहितार्थ निकाले जाते। कहा जाता कि रॉबर्ट वाड्रा के साथ उनका परिवार नहीं है, जबकि भारतीय समाज में परिवार को काफी महत्‍व दिया जाता है। भारतीय परम्परा में अक्सर देखा जाता है कि पत्नी हर हाल में पति का साथ देती है। प्रियंका गाँधी वाड्रा ने रॉबर्ट वाड्रा को ईडी तक छोड़ और ये कहकर राजनीतिक संदेश दिया है कि “मैं अपने पति के साथ खड़ी हूँ।”

आज सुबह कॉन्ग्रेस कार्यालय से हटाए गए थे रॉबर्ट वाड्रा के पोस्‍टर

आज सुबह ही कॉन्ग्रेस कार्यालय के बाहर लगे प्रियंका-रॉबर्ट के पोस्टर को एनडीएमसी द्वारा हटवाया गया। कुछ लोगों का मानना है कि कॉन्ग्रेस ने ही बदनामी के डर से पोस्‍टरों को हटवाया, क्योंकि ईडी दफ्तर में आज ही वाड्रा से पूछताछ होनी तय थी।

अब देखना यह है कि प्रवर्तन निदेशालय अगली बार रॉबर्ट वाड्रा को पूछताछ के लिए कब बुलाता है। क्या ये तारीख 2019 के चुनावों के बाद आएगी या, तब आएगी, जब प्रियंका गाँधी वाड्रा उत्तर प्रदेश के दौरे पर हों।

चुनावी सीजन में कुछ भी कहा जाना और पर्याय निकालना आम बात होती है इसलिए अभी यह देखना बाकी है कि रॉबर्ट वाड्रा के केस में प्रियंका गाँधी वाड्रा की भूमिका क्या रहने वाली है।

CBI की गिरती साख: कब तक होती रहेगी केंद्रीय एजेंसियों की फ़ज़ीहत

कुछ दिन पहले पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पुलिस ने कोलकाता पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार को बचाने के लिए सीबीआई अधिकारियों को बंधक बनाने की शर्मनाक हरकत की। इस घटना से न केवल केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो जैसी उच्च स्तरीय जाँच एजेंसी की छवि धूमिल करने का प्रयास किया गया बल्कि राज्य और केंद्र के मध्य अविश्वास की स्थिति उत्पन्न हुई। किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए ऐसी परिस्थिति उसके संघीय ढाँचे के लिए बेहद ख़तरनाक साबित हो सकती है।

राजीव कुमार को कई बार समन भेजा जा चुका था जिसके बाद सीबीआई की टीम उनसे पूछताछ करने गई थी लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार ने सारी लोकतांत्रिक शुचिता को दरकिनार कर सीबीआई का मजाक बना कर रख दिया। ध्यातव्य है कि सीबीआई को तीन प्रकार से केस सुपुर्द किए जाते हैं।

एक तो तब जब राज्य सरकार की पुलिस किसी केस को सुलझाने में असफल होती है तब राज्य सरकार केंद्र से सीबीआई जाँच करवाने का आग्रह करती है। दूसरा तरीका है कि केंद्र सरकार स्वयं किसी महत्वपूर्ण केस की जाँच सीबीआई से करवाना चाहे तो करवा सकती है। इन दोनों परिस्थितियों के अतिरिक्त हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट सीबीआई जाँच के आदेश दे सकते हैं।   

जब सीबीआई को राज्य से किसी केस की जाँच की अनुमति मिल जाती है तब उसे उस राज्य में पुलिस के अधिकार मिल जाते हैं। इसी अधिकार के चलते सीबीआई राजीव कुमार से पूछताछ करने गई थी। संविधान केंद्र सरकार को यह अधिकार भी देता है कि यदि किसी राज्य में संकट उत्पन्न हो तो केंद्र हस्तक्षेप कर सकता है।

कानून व्यवस्था मुख्य रूप से राज्य के जिम्मे है किंतु यदि राज्य की स्थिति बिगड़ जाए और कोर्ट सीबीआई जाँच का आदेश दे तो सीबीआई कोर्ट का आदेश मानने को बाध्य है। इस दृष्टि से हज़ारों करोड़ों रुपए के चिट फंड घोटाले (जिनसे लाखों लोग प्रभावित हुए) से संबंधित केस की छानबीन सीबीआई से करवाना केंद्र सरकार का दायित्व है। इस कार्य में बाधा उत्पन्न करना या तो भ्रष्टाचार को समर्थन देने जैसा है, या फिर राज्य का अपनी जनता की पीड़ा से मुँह मोड़ने जैसा।

हालाँकि, सीबीआई की छवि पहली बार धूमिल नहीं हुई है। कुछ महीने पहले सीबीआई के दो वरिष्ठ अधिकारियों के बीच चली तनातनी का तमाशा देश ने देखा। एक दूसरे के ऊपर आरोप प्रत्यारोप करते हुए निदेशक आलोक वर्मा और सेकंड इन कमांड राकेश अस्थाना ने सीबीआई जैसे संस्थान की अच्छी खासी फ़ज़ीहत करवाई। सरकार ने दोनों को छुट्टी पर भेजा जिसके बाद मामला कोर्ट में गया। इन सबके बीच 25 अक्टूबर 2018 को एक विचित्र खबर आई कि इंटेलिजेंस ब्यूरो के 4 अधिकारी आलोक वर्मा के घर के बाहर ‘पकड़े’ गए।

अर्थात अभी तक तो एक ही एजेंसी ‘तोता’ उपनाम लेकर बदनाम थी लेकिन आईबी के अधिकारियों को जिस प्रकार सड़क पर घसीटा गया था उससे यह स्पष्ट हो गया कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के अधीन काम करने वाली केंद्रीय एजेंसियों की वास्तव में क्या स्थिति है।

आंतरिक और बाह्य सुरक्षा

एजेंसियों का कार्यक्षेत्र समझने के लिए देश के सुरक्षा ढाँचे को समझना ज़रूरी है। सुरक्षा के मुख्यतः दो प्रकार हैं- आंतरिक और बाह्य। बाह्य सुरक्षा सशस्त्र सेनाओं के जिम्मे है जबकि आंतरिक सुरक्षा का दायित्व गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करने वाली एजेंसियाँ संभालती हैं जिनमें सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फ़ोर्स कहलाने वाले बल भी सम्मिलित हैं।  

यदि संपूर्ण सुरक्षा ढाँचे की कल्पना एक मनुष्य के रूप में की जाए तो हम देखेंगे की सशस्त्र सेनाएँ इस मनुष्य के पाँव हैं जो सीमाएँ लाँघने में सक्षम हैं, राज्य सरकारों की पुलिस और केंद्रीय पुलिस बल इस मनुष्य के हाथ हैं जो एक दायरे के अंदर ही काम कर सकते हैं लेकिन इंटेलिजेंस या गुप्तचर विभाग इस सुरक्षा रूपी मनुष्य का दिमाग है जो दूर तक सोच सकता है और भविष्य के खतरों को भाँप सकता है।

जहाँ जाँच एजेंसियाँ वारदात होने के बाद काम करती हैं वहीं इंटेलिजेंस एजेंसियाँ अपराध होने से पहले उसके घटित होने की संभावनाओं पर निगरानी रखती हैं। सीबीआई और आईबी के कार्यक्षेत्र में यह मूल अंतर है। आईबी को पब्लिक आर्डर और आंतरिक सुरक्षा संबंधी सूचनाएँ गुप्त रूप से इकट्ठा करने की ज़िम्मेदारी दी गई है जिसके अंतर्गत उसे संवेदनशील स्थानों पर निगरानी रखनी होती है। किंतु आलोक वर्मा प्रकरण में आईबी की कार्यशैली पर ही सवाल खड़े किए गए।

सीबीआई और आईबी दोनों की फ़ज़ीहत होने का एक ही कारण है। वह यह कि दोनों एजेंसियों को संवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं हैं और इन दोनों की वैधानिक स्थिति भी स्पष्ट नहीं है। जहाँ सीबीआई अपनी उत्पत्ति का स्रोत दिल्ली पुलिस स्पेशल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट (1946) बताती है वहीं आईबी किसी भी कानून द्वारा स्थापित एजेंसी नहीं है। नवंबर 2013 में गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने सीबीआई को ‘असंवैधानिक’ घोषित कर दिया था। इससे पहले 2012 में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने आईबी के वैधानिक दर्ज़े पर सवाल खड़े किए थे।

हालाँकि द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट में यह सुझाव दिया गया था कि सीबीआई को DSPE एक्ट से मुक्त कर एक पृथक सीबीआई एक्ट के अंतर्गत स्थापित किया जाना चाहिए लेकिन अभी तक इस पर अमल नहीं किया गया है।

अमरीका और हमारे सुरक्षा प्रणाली में यही मौलिक भेद है। अमरीका ने 1947 में National Security Act पास कर एक्सटर्नल इंटेलिजेंस एजेंसी सीआईए बनाई और आंतरिक सुरक्षा के लिए एफबीआई को तमाम ऐसे वैधानिक अधिकार दिए जिससे वह कॉउंटर इंटेलीजेंस और आपराधिक जाँच दोनों कार्य करती है।

हमें भी स्वतंत्रता के बाद ऐसी ही स्वायत्तता प्राप्त आंतरिक सुरक्षा एजेंसी बनानी थी जो इंटेलिजेंस एकत्र करना और आपराधिक जाँच दोनों कर सके क्योंकि इंटेलिजेंस और ‘इन्वेस्टिगेशन’ एक दूसरे से गहराई तक जुड़े हुए पहलू हैं। भ्रष्टाचार और संगठित अपराध से लेकर आतंकवाद तक आज सभी प्रकार के अपराधों के तार आपस में जुड़े होते हैं। कई बार एजेंसियों में बेहतर तालमेल न होने के कारण जाँच प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न होती है।

एक समय सीबीआई का निदेशक केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) नियुक्त करता था। भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच करने में आज भी CVC को सीबीआई से अधिक अधिकार प्राप्त हैं। लेकिन CVC के पास फुल टाइम चीफ़ विजिलेंस अफसर नहीं हैं जो सीबीआई की तरह जाँच कर सकें। और सीबीआई को राज्य में पुलिस के अधिकार देने के बावजूद हथियार नहीं दिए जाते। इससे यह पता चलता है कि जिस एजेंसी के पास अधिकार हैं उसके पास दायित्व नहीं है और जिसके पास दायित्व है उसे अधिकार नहीं दिए गए।

देश की अन्य एजेंसियों की वैधानिकता की बात करें तो 2017 में एक मजेदार बात हुई थी। देश के किसी भी कानून में एक इंटेलिजेंस एजेंसी का कार्यक्षेत्र परिभाषित नहीं है फिर भी 2017 में नेशनल टेक्निकल रिसर्च आर्गेनाइजेशन (NTRO) के कर्मचारियों को Intelligence Organisations (Restriction of Rights) Act, 1985 के अधीन लाकर यूनियन बनाने से रोक दिया गया था।

आतंकवाद से लड़ने के लिए हड़बड़ी में कानून लाकर बनाई गई जाँच एजेंसी एनआईए का दायरा भी सीमित ही है। आज आवश्यकता है एक ऐसी एजेंसी की जो आंतरिक सुरक्षा, भ्रष्टाचार की जाँच, इंटेलिजेंस एकत्र करना और आतंकवाद इन सभी ज़िम्मेदारियों को पूर्ण स्वायत्ता के साथ संभाल सके।   

मीडिया ने प्रियंका गाँधी को बनाया तैमूर

जब कॉन्ग्रेस की तरफ़ से प्रियंका गाँधी के राजनीति में आने की बात का ऐलान हुआ था, तब सारी मीडिया ने उनके नाक की सीधाई से लेकर बालों के पेंचोखम तक पर लेख लिखे। उस समय का समझ में आता है क्योंकि उस समय प्रियंका गाँधी कॉन्ग्रेस के अंतिम तीर की तरह तरकश से बाहर निकाली गई थी। लेकिन, कल शाम जो हुआ, और आज जो होता रहा, वो भारतीय मीडिया के ‘स्वर्णिम दौर’ की अलग गाथा है।

काफ़ी दुःखद है कि तैमूर अली खान को भरे बाल्यावस्था में मीडिया ने, एक तरह से इस्तेमाल कर, छोड़ दिया। जब वो हाथ हिलाकर अभिवादन करना सीख ही रहा था कि मीडिया राम मंदिर, कन्हैया, बजट, सीबीआई और ममता जैसे बेकार के मुद्दों पर ध्यान लगाने लगी। वो तो अच्छा है कि तैमूर अभी बहुत छोटा है वरना वो इस उपेक्षा को बर्दाश्त कर पाता या नहीं, ये कहना मुश्किल है। 

24 घंटे चलने वाले चैनलों और लाइव ब्लॉग चलाने वाले वेबसाइटों के सामने भी कंटेंट के न होने पर बड़ी दिक्कत हो जाती है। ऐसे में प्रियंका से जुड़ी काम की ख़बर मिल नहीं रही थी तो न्यूज़-18 की पल्लवी घोष कॉन्ग्रेस मुख्यालय पहुँच गई और उभरते हुए तमाम पत्रकारों के लिए एक मिसाल के तौर पर प्रियंका गाँधी के नए ऑफिस के दरवाज़े और नेम प्लेट की रिपोर्टिंग करने लगीं। 

पल्लवी घोष जी ने जानकारी दी कि दीवार पर लगा ‘गाँधी’ वाला नेमप्लेट बाक़ी नेमप्लेटों से कैसे अलग है

इसमें बहुत कुछ सीखने लायक है। जैसे कि, खलिहर होने पर खुद को कैसे व्यस्त रखा जाए; पार्टी में अपनी पहुँच बनाने के लिए किस स्तर तक जाया जाए; जहाँ ख़बर न हो, लेकिन एक्सक्लूसिव का आदेश हो तो क्या किया जाए आदि। इससे नए पत्रकार ये सीख ले सकते हैं कि जब प्रियंका के बाल, साड़ी, नाक और मुस्कुराहट से लेकर उनके दुर्गावतार और मोदी-मर्दनी की बातें खप चुकी हों तो आप एक दीवार पर लगे नेमप्लेट पर भी कैमरा ले जा सकते हैं। 

उसके बाद प्रियंका ने कार्यभार संभाला, गेट खोला, कुर्सी पर बैठीं, फिर हाथ बढ़ाकर क़लम निकाला, किसी को देखकर मुस्कुराई (मुस्कुराते हुए दाँत दिखे जो कि इंदिरा गाँधी जैसे थे), दो लोगों से बात की, फिर सर झुकाकर काम करने लगीं, जैसी खबरें चलीं जो कि तैमूर से मीडिया के प्रेम से 19-20 ही है। 

‘फिरौती के लिए अपहरण’ का बाज़ार ध्वस्त करने के लिए शुक्रिया नीतीश जी, लेकिन दंगे और रेप का क्या?

बिहार का युवा आज भी किसी मेट्रो सिटी के दफ्तर में बैठ कर लालू राज को याद करता होगा तो सिहर जाता होगा, औरों का पता नहीं लेकिन मैं तो सिहर ही जाता हूँ। नब्बे के दशक में जन्मा लड़का कभी नहीं चाहेगा कि लालू का वो समय दोबारा बिहार देखे, कल्पना मात्र ही मुझे भयभीत कर देती है।

बिहार ने वो समय देखा है जब माँ-बाप बच्चों को शाम के बाद घर से नहीं निकलने देते थे, हर वक़्त ये चिंता रहती थी कि पता नहीं कब कौन किडनैप हो जाएगा, लालू के समय अपहरण का ऐसा बाज़ार बना जिसने बहुतों के घर से चिराग छीन लिए और जिनके बचे उनको उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी थी।

बिहारियों ने फिर 2005 में लालू राज के सूरज को अस्त किया और नीतीश कुमार के हाथों में कमान सौंपी, वो नीतीश कुमार जो कभी लालू के साथ हुआ करते थे, वो नीतीश जो लालू के साथ बाद में भी आए और वो नीतीश जो अभी फिर से लालू के विरोधी हैं।

सत्ता और राजनीति के खेल में समीकरण बनते-बिगड़ते रहे लेकिन नीतीश जब से सत्ता में आए हैं, बिहार में क़ानून को सख़्ती से लागू करने में कामयाब रहे। लालू के राज में आपराधिक उगाही के बाज़ार और अपहरण एक इंडस्ट्री का रूप अख़्तियार कर चुकी थी, उसको नीतीश ने सत्ता हाथ में आते ही जड़ से खत्म कर दिया।

बिहार पुलिस के आँकडों के हिसाब से बिहार में क्राइम की स्थिति वर्तमान समय में और लालू राज के आख़िरी के पाँच सालों में कैसी थी, इसी को लेकर यह रिपोर्ट लिखी गई है। आँकड़ों के हिसाब से बिहार में, लालू के राज की तुलना में अभी अपराध पर बहुत हद तक लगाम लगी है, 2001-05 के बीच कुल मिलाकर जहाँ 18,189 हत्याएँ बिहार में हुई थी, वहीं 2014-18 के बीच हत्याओं के आँकड़ों में 25% की गिरावट देखी गई है।

इसी तरह लूट और रोड डकैती के मामले में नीतीश सरकार में क्रमशः 55% और 43% की गिरावट आई है। सरकारी आँकड़ों की मदद से लालू राज और वर्तमान समय में जो तुलना की गई है उसे आप नीचे ग्राफ में देख सकते हैं।

अपराध

लालू राज 

(2001-05)

नीतीश राज

(2014-18)

% बदलाव

हत्या 

18189

14697

-24%

डकैती 

12124 7812 -55%

दंगे 

42387

59888

29%

फिरौती के लिए अपहरण 1778 240

-641%

बलात्कार 

4461 5774 23%
रोड पर डकैती  1267 888

-43%

लालू के समय में फिरौती के लिए अपहरण राज्य भर में सबसे बड़े आतंक का रुप ले चुका था। नीतीश के हाथ में सत्ता आने के बाद अपहरण के मामलों में अप्रत्याशित कमी देखने को मिली।

 2001-05 में जहाँ 1778 अपहरण हुए, यानी हर साल 356 , मतलब हर दिन एक अपहरण, वहीं इस सरकार में 2014-18 के बीच, अपहरण के आँकड़ों में 641% की कमी आई है। पिछले पाँच सालों में बिहार में ‘फिरौती के लिए अपहरण’ के सिर्फ़ 240 मामले प्रकाश में आए हैं।

लालू राज V नितीश राज

इससे पहले कि आप नीतीश सरकार की पीठ थपथपाएँ, आँकड़े आपका हाथ पकड़ लेंगे क्योंकि आँकड़ों के हिसाब से नीतीश सरकार बलात्कार और दंगे जैसे अपराधों पर लगाम लगाने में पूरी तरह से विफल साबित हुई है।

बलात्कार के मामलों में जहाँ 23% की वृद्धि देखी गयी है, वहीं दंगों की घटनाओं में 29% की वृद्धि सरकार के लिए चिंता का सबब बन सकती है। इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता है कि दंगो में विपक्षी दलों की भूमिका भी रहती है, लेकिन जब प्रशासन आपके पास है तो ये तर्क बहुत कमजोर लगते हैं।

नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के 2016 के आँकड़ों की माने तो पूरे देश में महिलाओं के प्रति अपराधों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है, आँकड़ों के मुताबिक, प्रति घंटे देश में 39 महिलाओं पर अत्याचार हो रहे है, जो कि एक चिंताजनक स्थिति है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2015 में जहाँ 34,651 बलात्कार के मामले रिपोर्ट हुए वहीं 2016 में ये आँकड़ा बढ़ कर 38,947 तक पहुँच गया।

NCRB Data

नीचे के ग्राफ्स के माध्यम से दोनों सरकारों के कार्यकाल को क्राइम के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। इससे आपको ये बात साफ़ हो जाएगी कि बिहार में कितनी बहार है?

भाजपा कार्यकर्ता ममता सरकार की ईंट से ईंट बजा देंगे: अमित शाह; 23 सीट जीतने का दावा

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने मिलकर अलीगढ़ और बुलंदशहर में रैली की। सभा को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कॉन्ग्रेस और ममता बनर्जी दोनों पर जोरदार हमला किया है।

अमित शाह ने कहा “ममता दीदी, आपको क्या लगता है कि आप ऐसे भाजपा कार्यकर्ताओं को रोक लोगी, हमारी सरकार बनने से रोक लोगी। हम भी भाजपा के कार्यकर्ता हैं, आपकी सरकार की ईंट से ईंट बजा देंगे।”

इसके अलावा अमित शाह ने जनसभा को संबोधित करते हुए यह भी कहा कि बंगाल में मोदी जी के नेतृत्व में में 23 सीटों पर कमल खिलना तय है। बुलंदशहर और अलीगढ़ में जनसभा को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कुछ महत्वपूर्ण बातें कहीं –

सबका साथ-सबका विकास’ के मंत्र के साथ मोदी सरकार देश को आगे बढ़ाने का काम कर रही है।

नरेन्द्र मोदी जी की सरकार द्वारा लाए बजट में 5 लाख तक की सालाना आय वालों को इनकम टैक्स में पूरी छूट देने का काम किया गया है।

मैं आज साफ कहना चाहता हूँ कि भाजपा उसी स्थान पर जल्द से जल्द भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए पूर्ण रूप से कटिबद्ध है।

आज महिलाओं से छेड़छाड़ करने वालों को उल्टा लटकाकर सीधा करने का काम योगी जी की सरकार ने किया है।

योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद प्रदेश में 50 हजार करोड़ रुपए से अधिक गन्ने का भुगतान किया गया है।

लोकतंत्र में अगर प्रतिभा हो, क्षमता हो, देश को आगे ले जाने की ललक हो तो हर एक को अपना स्थान ऊपर ले जाने का अधिकार है और उसका जीता जागता उदाहरण हमारे प्रधानमंत्री मोदी हैं।

मोदी जी की सरकार ने देश को सुरक्षीत करने के साथ ही साथ 129 जन कल्याणकारी योजनाओं से गरीबों का कल्याण किया है।

BJP के संकटमोचक: बड़ी से बड़ी समस्याओं को यूँ काबू में कर लेते हैं मृदुभाषी फडणवीस

भारतीय राज्यों में कई ऐसे मुख्यमंत्री हुए हैं, जो अपनी प्रशासनिक क्षमता और जनता से सीधा संवाद के लिए जाने जाते हैं। आज के समय में जब कई मुख्यमंत्रियों और पूर्व मुख्यमंत्रियों पर भ्रष्टाचार सहित कई मामले चल रहे हैं, ऐसे में एक ऐसे सीएम भी हैं जो चुप-चाप, बिना पब्लिसिटी के अपना कार्य कर रहे हैं। यूँ तो राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी में कई बड़े नेता हैं, लेकिन एक चेहरा ऐसा भी है जो देश के सबसे अमीर राज्य (सर्वाधिक GDP) के शासन को संभाल कर अपनी कुशल प्रशासनिक क्षमता का परिचय दे रहा है।

ये हैं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस। जब महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव हो रहे थे, तब भाजपा ने अपने मुख्यमंत्री उम्मीदवार का नाम घोषित नहीं किया था। लेकिन एक नारा ख़ूब चल रहा था जिसने महाराष्ट्र का मूड पहले ही बता दिया था। वो नारा था- ‘दिल्ली में नरेंद्र, मुंबई में देवेंद्र’। मृदुभाषी देवेंद्र फडणवीस अपने सहज व्यवहार से किसी का भी दिल जीत लेते हैं। राहुल गाँधी से एक महीने छोटे फडणवीस ने राजनीति की सीढ़ियाँ एक-एक कर चढ़ी है, अपने बलबूते।

कभी नागपुर के मेयर रहे फडणवीस भारतीय इतिहास में दूसरे सबसे युवा मेयर थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने जिस तरह से अपनी क्षमता का परिचय दिया है, उस से सभी नेताओं को सीखना चाहिए। महाराष्ट्र एक ऐसा राज्य रहा है जहाँ ‘बाहरी बनाम स्थानीय’ के नाम पर तरह-तरह के बवाल फैलाए जाते रहे हैं। मुंबई आतंकवाद का निशाना रहा है। ऐसे में, फडणवीस ने बिना कोई सख्त कार्रवाई किए राज्य में हुए सभी बवालों, आन्दोलनों, विरोध प्रदर्शनों और हिंसा की अन्य वारदातों को चुटकी में काबू किया है।

फडणवीस के व्यवहार के आगे हारे अन्ना

अन्ना हजारे 2015 से लेकर अब तक महाराष्ट्र में कई बार अनशन का ऐलान कर चुके हैं। कभी भूमि अधिग्रहण बिल को लेकर तो कभी ‘वन रैंक वन पेंशन (OROP)’ को लेकर लेकिन जब-जब उनके अनशन की ख़बर आई, मुख्यमंत्री फडणवीस ने व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप कर उनका अनशन पर पानी फेर दिया। अन्ना को हमेशा झुकना पड़ा और अपने अनशन की योजना को त्यागना पड़ा। हाल ही में अन्ना लोकपाल की माँग लेकर फिर से अनशन पर बैठे। शिवसेना ने मुख्यमंत्री फडणवीस से अनुरोध किया कि वह अन्ना की स्वास्थ्य की चिंता करें।

दिन-रात अपने एसी दफ़्तर में बैठ कर फाइलों पर हस्ताक्षर करने वाले और वाले मुख्यमंत्रियों की लिस्ट में फडणवीस का नाम नहीं आता है। न ही वे अपने राज्य को छोड़ कर दूसरे-तीसरे राज्यों में घूमते रहते हैं। उन्हें उनके राज्य में हो रही हलचल की ख़बर रहती है, तभी स्थिति की गंभीरता को भाँपते हुए वे पहुँच गए रालेगण सिद्धि। उनके साथ कुछ केंद्रीय एवं राज्यमंत्री भी थे। न सिर्फ उनके आश्वासन के बाद अन्ना ने सात दिनों का अपना अनशन तोड़ा, बल्कि यह भी कहा कि वो सरकार से पूरी तरह संतुष्ट हैं।

रालेगण सिद्धि पहुँच सीएम ने अन्ना का अनशन तुड़वाया।

अन्ना ने सीएम फडणवीस के साथ 6 घंटे तक गहन बैठक की। उनकी हर एक बात को ध्यान से सुना, उन्हें स्थितियों से अवगत कराया और उनकी माँगों पर विचार भी किया। मृदुभाषी फडणवीस ने अनशन स्थल पर पहुँच अपने हाथों से जूस पिला कर अन्ना का अनशन तुड़वाया।

इसकी तुलना अगर हम यूपीए काल से करें तो बाबा रामदेव के साथ हुआ वाक़या याद आ जाता है। जिस तरह से कॉन्ग्रेस सरकार ने आधी रात को बाबा और उनके अनुयायियों को प्रताड़ित किया, उन्हें गिरफ़्तार किया, मारा-पीटा। इसी तरह अन्ना के अनशन को भी 2011 में कुचलने की कोशिश की। अन्ना को जेल में डाल दिया गया। लेकिन फडणवीस यूपीए काल के बड़े-बड़े मंत्रियों से कहीं ज़्यादा क़ाबिल हैं। उन्हें अन्ना को वश में करने का तरीका पता है। इसके लिए बल और छल नहीं, अच्छे व्यवहार और कुशल क्षमता की ज़रूरत होती है।

मराठा आंदोलन को सरलता से नियंत्रित किया

जुलाई 2018 में जब मराठा आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा तब महाराष्ट्र के कई इलाक़ों में जबरदस्त हिंसा भड़क गई। ये आंदोलन हाथ से बहार जा सकता था, जैसा पहले भी कई बार हो चुका है। लेकिन, समय रहते फडणवीस ने महारष्ट्र स्टेट बैकवर्ड क्लास आयोग की बैठक बुलाई और आरक्षण संबंधी माँगों पर विचार-विमर्श किया। एक स्पेशल पैनल की रिपोर्ट के बाद सीएम ने कुछ शर्तों के साथ शिक्षा एवं नौकरियों में मराठों के लिए आरक्षण की घोषणा कर पूरे राज्य का दिल जीत लिया।

मराठा आरक्षण आंदोलन काफ़ी व्यापक था

इसके बाद एससी, एसटी कोटे के मुद्दे को उठा कर उन्हें घेरने की कोशिश की गई लेकिन अपने आरक्षण वाले निर्णय में वर्तमान कोटा सिस्टम से छेड़छाड़ न करने की बात कह उन्होंने अपने विरोधियों को चारों खाने चित कर दिया। मुख्यमंत्री ने अहमदनगर की एक रैली में जैसे ही कहा– ‘आप 1 दिसंबर की तैयारी कीजिए’, जनता ख़ुशी से झूम उठी। फडणवीस का आरक्षण अलग था, क्योंकि 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने भी आरक्षण की घोषणा की थी, लेकिन फिर भी स्थिति जस की तस रही।

भले ही फडणवीस बाल ठाकरे, राज ठाकरे, शरद पवार, विलासराव देशमुख, प्रमोद महाजन या गोपीनाथ मुंडे जैसे दिग्गज महाराष्ट्रीय नेताओं के बराबर प्रसिद्धि नहीं रखते हों, लेकिन उनके हर एक महत्वपूर्ण निर्णय के बाद उनकी लोकप्रियता का ग्राफ बढ़ता ही चला जा रहा है।

हंगामेबाज़ गठबंधन साथी के साथ एक स्थिर सरकार

शिवसेना और उसके नेताओं का व्यवहार किसी से छुपा नहीं है। पार्टी कहने को तो महाराष्ट्र में सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा है, लेकिन कोई भी ऐसा दिन नहीं जाता है, जब उसके नेता भाजपा के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी न करते हों। एक भी ऐसा सप्ताह नहीं जाता, जब सामना में मोदी और भाजपा के विरोध में लेख नहीं छापते हों। लेकिन फडणवीस के पास शिवसेना को भी क़ाबू में करने का मंत्र है, एक कुशल प्रशासक होने के साथ ही वह एक कुशल राजनीतिज्ञ भी हैं।

शिवसेना भी उनकी बढ़ती लोकप्रियता को समझती है। इसीलिए शिवसेना राष्ट्रीय स्तर पर तो मोदी के ख़िलाफ़ ख़ूब बोलती है, लेकिन महाराष्ट्र में फडणवीस पर सीधे हमले नहीं करती। मुख्यमंत्री देवेंद्र ने शिवसेना का ऐसा तोड़ ढूंढा, जिस से हर कोई उनकी बुद्धि का कायल हो जाए। जनवरी 2019 में हुई एक कैबिनेट बैठक में शिवसेना के संस्थापक स्वर्गीय बाल ठाकरे की याद में एक मेमोरियल बनाने का निर्णय लिया गया। इतना ही नहीं, उसके लिए तुरंत ₹100 करोड़ का बजट भी ज़ारी कर दिया गया।

बकल ठाकरे मेमोरियल की घोषणा कर देवेंद्र ने उद्धव को चित कर दिया

मुंबई के दादर स्थित शिवजी पार्क में जब मेमोरियल के लिए ‘गणेश पूजन’ और ‘भूमि पूजन’ हुआ, तब शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और मुख्यमंत्री फडणवीस ने एक मंच से जनता का अभिवादन किया। फडणवीस के इस दाँव से चित शिवसेना के पास उनका समर्थन करने के अलावा और कोई चारा न बचा।

किसान आंदोलन को एक झटके में किया क़ाबू

महाराष्ट्र के किसान आंदोलन ने इतना बड़ा रूप ले लिया था कि राष्ट्रीय मीडिया ने भी उसे ख़ूब कवर किया। जब 35,000 गुस्साए किसान 200 किलोमीटर की पदयात्रा के बाद झंडा लेकर प्रदर्शन करते हुए मुंबई के आज़ाद मैदान पहुँचे, तब बड़े-बड़े पंडितों को भी लगा था कि हालात अब बेक़ाबू हो चुके हैं। लेकिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बिना बल प्रयोग के इस आंदोलन को ऐसे क़ाबू में किया, जिस ने बड़े-बड़ों को अचंभित कर दिया।

सीएम ने बस भेज कर किसानों को चढ़ने का अनुरोध किया लेकिन वे नहीं माने। उसके बाद मुख्यमंत्री स्वयं किसानों के बीच गए और उन्होंने उनकी माँगों को सुना। 20,000 किसानों से मुलाक़ात करने के बाद फडणवीस ने उन्हें उनकी माँगो को पूरा करने का सिर्फ़ लिखित आश्वासन ही नहीं दिया, बल्कि इसके लिए समय-सीमा भी तय कर दी। क़र्ज़माफ़ी और सूखे के कारण रहत पैकेज की माँग कर रहे किसानों ने उनसे मिलने के बाद अपने प्रदर्शन को विराम दे दिया।

ऐसा नहीं था कि फडणवीस अचानक उनसे मिले और सबकुछ ठीक हो गया। दरअसल, फडणवीस की नज़र पहले से ही इस आंदोलन के जड़ पर थी। किसानों को अपने ही ख़िलाफ़ आंदोलन के लिए सरकारी बस मुहैया करना, एक मंत्री को पहले ही भेज कर स्थिति को नियंत्रित करना- बिना पब्लिसिटी के फडणवीस ने एक बार में एक क़दम चलते हुए सबकुछ सही कर दिया, बिना क़र्ज़माफ़ी की घोषणा किए।

कहा जा सकता है कि भाजपा में एक ऐसे नए संकटमोचक का उदय हुआ है, जो ढोल पीटना नहीं जानता, अपने गुणगानों का बखान करना नहीं जानता, तेज़ आवाज में नहीं बोलता, लेकिन फिर भी जनता उसकी भाषा समझती है और वो जनता की। वो राष्ट्रीय मीडिया में ज़्यादा नहीं आते और न ही उनके बयान चर्चा का विषय बनते हैं- उनका व्यक्तित्व ही उन्हें लोकप्रियता दिलाता है।

CBI मामले में SC के फैसले पर सवाल करना प्रशांत भूषण को पड़ा महँगा, कोर्ट ने माँगा जवाब

देश के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण अक्सर कोर्ट के फैसलों पर सवाल खड़े करते रहते हैं। भूषण के इसी व्यवहार की वजह से कई बार कोर्ट के अंदर भी न्यायाधीशों ने डाँट कर उन्हें कम बोलने की हिदायत दी है। इसके अलावा कई मामलों में कोर्ट द्वारा उन्हें अवमानना नोटिस भी भेजा गया है।

एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई मामले में कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी करने की वजह से प्रशांत भूषण को तीन हफ्ते में जवाब देने के लिए कहा है। दरअसल एम. नागेश्वर राव को सीबीआई के अंतरिम निदेशक बनाए जाने के मामले को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज दिया गया था।

इस मामले में कोर्ट ने राव की नियुक्ति को बरकरार रखते हुए कहा था कि नीतिगत मामले में राव कोई फैसला नहीं ले पाएँगे। सीबीआई के अंतरिम निदेशक मामले में कोर्ट के इस फैसले पर ट्वीट करके प्रशांत भूषण ने अपनी नराजगी जताई थी।

इसके बाद केंद्र सरकार और अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने प्रशांत भूषण के खिलाफ़ अवमानना की याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दायर की थी। कोर्ट ने इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रशांत भूषण को तीन सप्ताह के अंदर मामले में जवाब देने के लिए कहा है।

उत्तराखंड बना सामान्य वर्ग के गरीब लोगों को नौकरी में आरक्षण देने वाला दूसरा राज्य

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने बुधवार (फरवरी 06, 2019) को अपने ट्विटर हैंडल द्वारा ट्वीट कर के बताया कि उत्तराखंड राज्य में सामान्य श्रेणी के गरीबों के लिए शिक्षण संस्थानों व नौकरियों में 10% आरक्षण लागू कर दिया जा चुका है। इसी के साथ उत्तराखंड गुजरात राज्य के बाद इस आरक्षण को लागू करने वाला दूसरा राज्य बन गया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद व्यक्त करते हुए CM त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपने ट्वीट में लिखा है, “सामाजिक वर्गों के आरक्षण से छेड़छाड़ किए बिना उत्तराखंड में सामान्य गरीबों के लिए शिक्षण संस्थानों व नौकरियों में 10% आरक्षण लागू कर दिया गया है। उत्तराखंड ऐसे प्रावधान वाला दूसरा राज्य बना है। सभी वर्गों के गरीबों का ख्याल रखने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का धन्यवाद।”

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने पिछले माह ही प्रदेश में सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए 10% आरक्षण लागू करने के संदर्भ में निर्देश जारी कर दिए थे।

खुलासा: 2012 में तख़्तापलट की ख़बर को कॉन्ग्रेस के चार मंत्रियों ने गलत तरह से छपवाई

यूपीए-2 सरकार के चार मंत्रियों ने देश में आर्मी के खिलाफ़ गलत ख़बरों को छपवाने की साजिश रची थी। संडे गार्डियन नाम के अंग्रेजी अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया है। यूपीए-2 सरकार के इन चार मंत्रियों ने सैन्य तख़्तापलट के इस झूठी ख़बर के जरिए देश की सेना को बदनाम करने की कोशिश की। रिपोर्ट में इन चार मंत्रियों का नाम नहीं बताया गया है।

अंग्रेजी अख़बार में एक रिपोर्ट के जरिए इस बात का खुलासा होने के बाद भाजपा कॉन्ग्रेस पार्टी पर हमलावर हो गई है। भाजपा नेताओं ने प्रेस कॉफ्रेंस के जरिए कॉन्ग्रेसी नेताओं पर सवाल खड़े किए हैं। यही नहीं भाजपा ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष से इस मामले में जवाब माँगने के साथ ही संसदीय कमिटी से इस मामले की जाँच की मांग की है।

जानकारी के लिए बता दें कि संडे गार्डियन ने अपने रिपोर्ट में इस बात का दावा किया है कि तख्तापलट की खबर अखबार में छपने के बाद खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आइबी अधिकारियों को बुलाकर इस मामले में जानकारी माँगी थी।

इंडियन एक्सप्रेस की उस ख़बर का स्क्रीनशॉट

आईबी अधिकारी ने प्रधानमंत्री को आश्वस्त किया था कि भारतीय सेना द्वारा तख्तापलट जैसी कोई भी कोशिश नहीं की जा रही है। हलाँकि, रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि प्रधानमंत्री इस खबर को छपने के बाद काफी दवाब में आ गए थे।

यूपीए सरकार के खिलाफ़ लोगों में गुस्सा को देखकर मनमोहन सिंह को लगा कि सरकार को बेदखल किया जा सकता है। इसी वजह से उन्होंने इस ख़बर को छपने के तुरंत बाद आईबी अधिकोरियों के साथ बैठक की थी।

भाजपा की तरफ़ से नरसिम्हा ने कहा, “कांग्रेस ने तख्तापलट की साजिश की खबरें प्लांट करवाई। भारत की सेना को जलील करने का षडयंत्र रचा गया। आईबी ने मनमोहन सिंह को बताया कि यह कोरी कल्पना है।”

सबरीमाला मंदिर मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रखा अपना फ़ैसला

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामलों पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया है। सबरीमाला मंदिर के संरक्षक त्रावणकोर देवासम बोर्ड (टीडीबी) ने कहा है कि अदालत का जो भी निर्णय होगा, उसका सम्मान किया जाएगा। केरल सरकार ने पुनर्विचार याचिकाओं का विरोध करते हुए अदालत में कहा कि इन याचिकाओं पर सुनवाई के लिए कोई आधार ही नहीं है।

सुनवाई के दौरान अपनी दलीलें देते हुए सबरीमाला मंदिर पक्ष के वकीलों ने मजबूती से अपनी बात रखी। सबरीमाला मंदिर के मुख्य पुजारी की तरफ से सीनियर काउंसल वी गिरी ने कहा कि कोई भी व्यक्ति जो अनुच्छेद 25 (2) (बी) के तहत पूजा करने का अधिकार रखता है, उसे देवता की प्रकृति के अनुरूप करना होगा। उन्होंने कहा- “महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने के मामले में स्थायी ब्रह्मचर्य चरित्र नष्ट हो जाता है। हर भक्त जो मंदिर जाता है, मंदिर की आवश्यक प्रथाओं पर सवाल नहीं उठा सकता है।”

वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नफाड़े ने अदालत से कहा- “यह आस्था का विषय है। जब तक कि एक आपराधिक कानून नहीं है जो एक विशेष धार्मिक प्रथा को प्रतिबंधित करता है (जैसे सती), अदालतें हस्तक्षेप नहीं कर सकती हैं।” उन्होंने आगे कहा- “अकेले समुदाय ही यह तय कर सकता है कि सदियों पुरानी मान्यता को बदला जाए या नहीं। कुछ एक्टिविस्ट्स को यह तय करने के लिए नहीं दिया जा सकता है। एक आवश्यक धार्मिक अभ्यास क्या है, यह तय करने का अधिकार उस विशेष समुदाय के सदस्यों को होना चाहिए।”

ज्ञात हो कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में पाँच सदस्यीय पीठ ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश करने की इजाज़त दे दी थी। 4-1 के बहुमत वाले निर्णय में जस्टिस इंदु मल्होत्रा एकमात्र सदस्य थीं, जिन्होंने बहुमत के ख़िलाफ़ निर्णय (Dissenting Voice) दिया था। इसके बाद श्रद्धालुओं ने केरल की वामपंथी सरकार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया, जिसके बाद हजारों श्रद्धालुओं को गिरफ़्तार किया गया था।