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चर्च यौन शोषण: पोप का चुप्पी तोड़ना उनके मौन से भी ख़तरनाक है क्योंकि…

ईसाइयों के सबसे बड़े पादरी पोप फ्रांसिस और इस्लाम के सर्वोच्च मौलवियों में से एक इमाम शेख़ अहमद अल-तैयब ने चुम्मा-चाटी कर सांप्रदायिक सौहार्दता का कथित सन्देश तो दे दिया, लेकिन इस से ज़मीनी हालात में कुछ सुधार नज़र नहीं आ रहे। बलात्कार, यौन शोषण के आरोपित पादरी अब भी खुले घूम रहे हैं, ननों को प्रताड़ित करने वाले बिशप अब भी अपने पद पर बेशर्मी से कार्यरत हैं, चर्च प्रशासन के अन्याय से तंग नन्स आज भी सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करने को मज़बूर है, और वेटिकन आज भी इस संबंध में कोई कार्रवाई करने से हिचक रहा है।

हमने अपने पिछले लेख में बताया था कि कैसे जब पोप और इमाम एक-दूसरे की चुम्मी ले कर धार्मिक स्थलों की सुरक्षा का प्रण ले रहे थे, तभी पाकिस्तान और अमेरिका में मंदिरों को जलाने और उनमे तोड़-फोड़ करने की ख़बर आई। अब पोप ने चर्च यौन शोषण पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए काफी बेढंगी प्रतिक्रया दी है। जैसे किसी देश के संविधान में लिखे एक-एक शब्दों की अदालतें व्याख्या करती आईं हैं, ठीक उसी तरह पोप के भी बयानों की व्याख्या करने के लिए वेटिकन मुँह फाड़े खड़ा रहता है।

पोप का ताज़ा बेढंगा बयान और वेटिकन की अज़ीबो-ग़रीब व्याख्या

पोप से जब एक रिपोर्टर ने चर्चों में हो रहे यौन शोषण के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा:

“यह सच है…कई ऐसे पादरी हैं, और बिशप भी- जिन्होंने ये (यौन शोषण) किया है। मुझे लगता है कि यह अभी भी चल रहा है क्योंकि कुछ सिर्फ़ इसलिए नहीं रुकता क्योंकि आप इसके बारे में जागरूक हो गए हैं। हम इस पर लम्बे समय से कार्य कर रहे हैं, और हमने इन आरोपों के कारण कुछ पादरियों को निलंबित भी किया है।”

इसके बाद पोप ने ख़ुद से ही सवाल-जवाब करना शुरू कर दिया। “क्या और अधिक किया जाना चाहिए?” पोप ने पोप से पूछा। “हाँ” पोप ने ज़वाब दिया। “क्या हमारे पास इच्छाशक्ति है?” पोप ने पोप से फिर सवाल दागा। “यह एक रास्ता है जिस पर हम पहले ही चलना शुरू कर चुके हैं।”- पोप ने पोप को निरुत्तर कर दिया। इस सवाल-जवाब में मीडिया, आम जनता और पीड़ित नन्स- सबकी समस्याओं का समाधान हो गया।

बिशप फ्रांको मुलक्कल के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाली ननों के साथ क्या किया गया, यह जगज़ाहिर है। बलात्कार के आरोप में गिरफ़्तार होकर ज़मानत पर बाहर आए उस बिशप का जिस तरह से स्वागत किया गया, इसकी ख़बर पोप तक जरूर पहुँची होगी। द एसोसिएट प्रेस सहित अन्य मीडिया पोर्टल्स ने ऐसी अनगिनत कहानियों की चर्चा की, जहाँ ननों को पादरियों द्वारा ‘सेक्स टॉयज’ की तरह इस्तेमाल किया गया।

सबसे पहले पोप के बयान पर ध्यान देते हैं। उनके अनुसार, कार्रवाई की जा रही है। इस पर हर एक व्यक्ति उनसे पूछना चाहेगा कि बिशप मुलक्कल पर क्या कार्रवाई की गई? सड़क पर तख़्तियाँ लेकर खड़े ननों को न्याय दिलाने के लिए वेटिकन ने क्या किया? ऐसी सूरत में, जब ख़बर स्थानीय से लेकर अंतर्राष्ट्रीय मीडिया तक में चली और चर्च की किरकिरी हुई, वेटिकन ने इस बारे में एक बयान तक जारी करना क्यों ज़रूरी नहीं समझा? महिलाओं के बारे में बात करते हुए पोप ने कहा:

“पूर्व पोप बेनेडिक्ट ने 2005 में अपने चुनाव के बाद शीघ्र ही महिलाओं के धार्मिक क्रम (Religious Order) को भंग कर दिया “क्योंकि दासता इसका हिस्सा बन गई थी (धार्मिक आदेश), यहाँ तक कि पादरियों और संस्थापकों की ओर से भी यौन दासता जैसे कृत्य किए जा रहे थे।”

वेटिकन ने पोप के बयान की जो व्याख्या की, वो और भी अज़ीबो-ग़रीब है। वेटिकन ने पोप के बयान को लेकर कहा:

“जब होली फादर ने एक संघटन के विघटन का ज़िक्र किया, तो ‘यौन दासता’ की बात की, जिसका अर्थ था ‘हेरफेर (Manipulation),’ शक्ति का दुरुपयोग- जो कि यौन शोषण में भी परिलक्षित होता है।”

वेटिकन का यह रवैया उसके भीतर चल रहे विरोधाभाषों को दिखता है। ‘महिलाओं के यौन शोषण’ की तुलना ‘शक्ति के दुरूपयोग’ से नहीं की जा सकती। पहला वाला कहीं अधिक घृणित और वीभत्स कार्य है। वो भी ऐसी महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार करना, जो ईश्वर की सेवा करने की पवित्र भावना के साथ चर्च में आती हैं।

फ़िल्मों से लेकर सोशल मीडिया तक छाया है मुद्दा

द बोस्टन ग्लोब नामक अख़बार की खोजी पत्रकारिता पर बनी ऑस्कर विजेता फ़िल्मस्पॉटलाइट‘ में पादरियों द्वारा किए जाने वाले बाल यौन शोषण को उजागर किया गया है। अख़बार द्वारा गठित स्पॉटलाइट टीम की खोजी पत्रकारिता की मदद से इस सच को सामने लाया गया था। द बोस्टन ग्लोब की स्पॉटलाइट टीम को पुलित्जर सम्मान मिला था। लेकिन, तब भी वेटिकन की आँखें नहीं खुलीं। इस फ़िल्म के पहले और बाद में कैथोलिक चर्च सिर्फ़ यौन शोषण के मामलों में करोड़ों का जुर्माना भर चुका है।

हमने भी अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में आई यौन शोषण की कई स्टोरीज़ प्रकाशित की थी, जिसमे ननों ने अपने साथ हुए अत्याचार को उजागर किया था। हाल ही में अमेरिका के इलिलोईस प्रांत में करीब 700 पादरियों पर बच्चों के यौन शोषण का आरोप लगा था। इलिनोइस के अटॉर्नी जनरल ने अपनी एक रिपोर्ट में इस बात पर चिंता जताई है कि चर्च इन आरोपों से निपटने में अक्षम रहा है। ज्ञात हो कि चर्च ने यौन शोषण के आरोपित पादरियों की संख्या 185 बताई थी लेकिन अटॉर्नी जनरल लीसा मैडिगन के अनुसार ऐसे पादरियों की संख्या इस से कहीं बहुत ज़्यादा है।

अब सवाल यह उठता है कि मामले के इतने बड़े स्तर पर जाने के बावजूद शक्तिशाली वेटिकन और पोप ने किसी भी प्रकार के बयान देने, इस घटनाओं की निंदा करने, और दोषी पादरियों पर कार्रवाई करने की ज़हमत क्यों नहीं उठाई। पोप ने आख़िरकार अपना मौन तो तोड़ा, लेकिन इस बयान से अच्छी तो उनकी चुप्पी थी। उनकी चुप्पी से कम से कम तरह-तरह के क़यास तो लगाए जा सकते थे, लेकिन उनके इस बयान ने दुनियाभर की हज़ारों पीड़ित ननों को निराशा के अलावा और कुछ नहीं दिया है।

अगर वेटिकन चर्च में हो रही इन वारदातों को सँभालने में नाकाम रहा है, तो उसे यह घोषणा कर देनी चाहिए कि उसने दुनियाभर के पादरियों का ठेका नहीं ले रखा है, और वो उसके जुरिडिक्शन में नहीं आते। खुल्ले साँड की तरह घूम रहे दोषी पादरी और बिशप फ़िलहाल आश्वस्त हैं- उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा।

पाकिस्तान का अमानवीय चेहरा: लाखों गदहों की बलि चढ़ा कर भरेगा ख़जाना

पाकिस्तान का एक बहुत ही अमानवीय चेहरा सामने आया है। इसके मज़ाकिया पक्ष की तो ख़ूब बात हो रही है, लेकिन इसका एक ऐसा दर्दनाक पक्ष भी है, जिसे जान कर आपके रोंगटे खड़े हो जाएँगे। इस विषय पर हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर लिखा जा चुका है। इसमें बताया गया है कि कैसे गदहों की कमी से जूझ रहे चीन की पकिस्तान सहायता करेगा। दरअसल, ख़बर आई है कि क़र्ज़ में डूबा पाकिस्तान अपने ख़जाने को भरने के लिए गदहों का निर्यात करेगा। पाकिस्तान इस योजना से अपने विदेशी मुद्रा भंडार को भरना चाह रहा है।

आगे बढ़ने से पहले जान लेते हैं कि मामला क्या है। दरअसल, पाकिस्तान में गदहों की जनसँख्या काफ़ी तेज़ी से बढ़ रही है। इस मामले में पाकिस्तान विश्व में तीसरे नंबर पर आता है। अब उसने निर्णय लिया है कि इन गदहों को चीन को निर्यात किया जाएगा ताकि हर वर्ष करोड़ों डॉलर बनाए जा सके। ख़ैबर पख़्तूनख़्वा प्रान्त ने इस बारे में कार्य योजना भी तैयार कर ली है। पाकिस्तान में 50 लाख से भी ज्यादा गदहे हैं। अकेले लाहौर में 41,000 से ज्यादा गदहे हैं।

चीन में क्या होगा इन गदहों का

जो लोग दीपावली के पटाखों से कुत्तों को डर लगने की बात कह कर खुद को पशुप्रेमी जताते हैं पर न जाने क्यों गौपालन का विरोध कर जाते हैं। उन लोगों के लिए यह जानना भी ज़रूरी हो जाता है कि विश्व का सबसे बड़ा देश (जनसंख्या के हिसाब से) पाकिस्तान से गदहे क्यों चाहता है भला! पाकिस्तान द्वारा निर्यात किए गए गदहों का चीन में क्या किया जाएगा, इसके बारे में जान कर आपके होश उड़ जाएँगे। दरअसल, चीन में गदहों की चमड़ी व अन्य उत्पादों की काफ़ी बड़ी माँग है, जिसके कारण विश्व में गदहों की जनसँख्या घटती जा रही है।

चीन में गदहों की चमड़ी को छील कर उनसे तरह-तरह की दवाइयाँ और क्रीम बनाई जाती है, जो चेहरे से झुर्रियाँ हटाने में मदद करती है। अब यह व्यापार धीरे-धीरे ही सही लेकिन पाकिस्तान के बाजार में भी अपनी पैठ बना रहा है। अंध-आधुनिकता के इस दौर में कुछ लोगों को हमेशा जवान दिखने की लोलुप चाहत ने एक निरीह जानवर की सामूहिक हत्या को व्यवसाय बना कर रख दिया है। 2011-15 के बीच पाकिस्तान ने अकेले चार वर्षों में 1,41,000 से ज़्यादा गदहों की चमड़ियाँ निर्यात की

उन दवाइयों के लिए गदहों को चीन में कैसे मौत के घाट उतारा जाता है, ये जान कर आप सिहर उठेंगे। 5 वर्ष का गदहा हो या फिर 5 महीने का बच्चा, किसी को भी नहीं बख़्शा जाता। उन सब की निर्ममता से सामूहिक हत्या कर दी जाती है। Ejiao नामक दवा बनाने के लिए गदहों को धरती पर सुला कर उनके सिर पर हथौड़ों से जोर-जोर से प्रहार किया जाता है, जिससे कि वो एक धीमी और दर्दनाक मौत मरते हैं

इतना ही नहीं, गदहों को उनके ही मल-मूत्र के बीच मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। चीन में ऐसी भी मान्यता है कि गदहों की चमड़ी से बनी दवा के सेवन से व्यक्ति की आयु भी लम्बी होती है।

अफ्रीकन देश भुगत रहे हैं ख़ामियाजा

अपने प्राकृतिक संसाधनों व जानवरों के लिए मशहूर अफ्रीकन प्रायद्वीप पर जब चीन की नज़र पड़ी, तो उसने इसे अपने लिए एक मौके के समान लिया। उसने अफ्रीका से गदहों को ख़रीदना शुरू कर दिया। चीन में गदहों की माँग इतनी थी कि अफ्रीका से लाए जाने वाले गदहे भी कम पड़ने लगे। इसके बाद चीनियों ने अफ्रीका के गावों से गदहों की चोरी शुरू कर दी। तंग आकर कई अफ्रीकन देशों ने गदहों के निर्यात पर प्रतिबन्ध लगा दिया। उन्होंने कहा कि चीन की इस माँग को पूरी करना उनके वश की बात नहीं।

इसे जानने के लिए एक वाक़ये का उदाहरण लेते हैं। केन्या के रहने वाले एंथोनी मौपे पानी की डिलीवरी कर अपना गुज़र-बसर चलाते हैं। इसके लिए वो एक गाड़ी और गदहे का प्रयोग करते हैं। उनके गदहे का नाम था- ‘कार्लोस’, जो उनके काम में उनकी मदद करता था। उस गदहे पर उनका पूरा व्यवसाय और जीवनयापन जुड़ा हुआ था। लेकिन एक सुबह यह सब कुछ बदल गया। जब वह सो कर उठे, तब उनका कार्लोस गायब था।

जब उन्होंने उसकी ख़ोजबीन शुरू की, तो उन्हें उनका प्यारा जानवर मरा हुआ मिला। जब वो उसके क़रीब गए तो उन्होंने जो देखा, वो काफ़ी वीभत्स था। गदहे की चमड़ी को छील कर निकाल लिया गया था और उसके अधकटे शरीर को वहीं छोड़ दिया गया था

सीएनएन के आँकड़ों के अनुसार, चीन में पिछले 20 वर्षों में 50 लाख से भी अधिक गदहों को मार डाला गया है। अफ्रीका में इस घृणित व्यवसाय के फैलने से वहाँ के स्थानीय लोगों को भी ख़ासी परेशानी हुई। उनके नालों में अक्सर गदहों के ख़ून बहते हुए पाए जाते थे, जो कई तरह की बीमारियों को जन्म दे सकते हैं। केन्या, मिस्र से लेकर नाइजीरिया तक- चीनी दलालों ने हर जगह पाँव पसारे और इस व्यापार को फैलाने में पूरी मदद की।

आख़िर पकिस्तान क्यों इस नीचता पर उतर आया?

पाकिस्तान में 2018 में हुए चुनावों में इमरान ख़ान की पार्टी तहरीक़-ए-इंसाफ़ को बड़ी जीत मिली और वो ‘नया पाकिस्तान’ का नारा देकर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचे। चुनाव के दौरान उन्होंने पाकिस्तान द्वारा विदेशी देशों से आर्थिक मदद माँगे जाने को मुद्दा बनाया था। उन्होंने इसे ‘कटोरा लेकर भीख माँगने’ तक की संज्ञा दी थी। लेकिन, उनके सत्ता संभालने के बाद पाकिस्तान के हालात और बदतर ही हुए हैं।

हाल ही में चीन ने पकिस्तान को 2.5 बिलियन डॉलर का क़र्ज़ देने का निर्णय लिया। इसके अलावा पकिस्तान ने सऊदी अरब के सामने भी झोली फैलाई, जिसके बाद उसे वहाँ से भी 3 बिलियन डॉलर की सहायता मिली। अब पकिस्तान वर्ल्ड बैंक से 400 मिलियन डॉलर माँग रहा हैक़र्ज़ में डूबे पकिस्तान की हालत इतनी खस्ती हो गई है कि उसे अन्य देशों के सामने झोली फैला कर घूमना पड़ रहा है। यही कारण है कि वो अब अपने मुद्रा भंडार को मज़बूत करने के लिए तरह-तरह के उपायों पर विचार कर रहा है।

अभी हाल ही में पकिस्तान ने चीन को 1,00,000 किलोग्राम बाल (Human Hairs) निर्यात किए थे। चीन में मेक-अप इंडस्ट्री काफ़ी फल-फूल रही है, जिसके कारण वहाँ मनुष्य के केशों की माँग बढ़ती जा रही है। यहाँ तक तो ठीक था, लेकिन गदहों की निर्मम हत्या के लिए उनका निर्यात करने का निर्णय लेकर आतंकवाद का पोषण करने वाले पाकिस्तान ने अपने अमानवीय, क्रूर और निष्ठुर चेहरा फिर से दिखा दिया है।

डियर सोसायटी, लड़की को आप ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ पर आँक लेते हैं… लड़कों के लिए भी ऐसा ही कुछ किया जाए?

कुछ समय पहले पुणे के कुछ युवकों ने समाज की एक भद्दी कुरीति ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ को ख़त्म करने के लिए ऑनलाइन मुहिम की शुरूआत की थी। जिसके मद्देनज़र महाराष्ट्र सरकार द्वारा महिलाओं के हित में बुधवार (फरवरी 6, 2019) को बेहद सराहनीय फ़ैसला लिया गया। इस फ़ैसले में महाराष्ट्र सरकार ने कहा कि किसी भी महिला को उसके ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ के लिए बाध्य करने को जल्द ही सरकार एक दंडनीय अपराध बनाएगी।

ये क़दम उठाने के पीछे महाराष्ट्र सरकार का उद्देश्य साफ़ था कि राज्य के कुछ समुदायों में आज भी यह परंपरा है कि शादी के बाद महिला ख़ुद को ‘वर्जिन’ साबित करे। ज़ाहिर है ये कार्य स्वेच्छा से जुड़ा हुआ तो बिल्कुल भी नहीं हैं, इसलिए समुदाय से संबंधित लोग उस नवविवाहिता को ऐसा करने के लिए बाध्य करते थे।

इस बाध्यता को कभी ‘परंपरा’ मानकर तो कभी ‘संस्कार’ मानकर समुदाय विशेष से जुड़ी अधिकतम लड़कियाँ ख़ुद को इस कुरीति की भेंट बनाकर चढ़ा देती हैं। ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ को लेकर कई समुदायों में मान्यता है कि इससे लड़की की पवित्रता और अपवित्रता के बारे में पता चलता है।

हालाँकि बढ़ते हुए भारत की तस्वीर में यह चीज़ें थोड़ी पिछड़ी हुई बातें लगती हैं। लेकिन थोडा जूम इन करके देखा जाए तो पता चलेगा कि यह आज भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में और विशेष जाति में नवविवाहिताओं के साथ बीतने वाली कड़वी हकीकत है।

वर्जिनिटी टेस्ट के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करती महाराष्ट्र की महिलाएँ

देर-सवेर सही लेकिन इस मामले को संजीदगी से लेते हुए गृह राज्य मंत्री रंजीत पाटिल ने बुधवार संवाददाताओं के सामने कहा है कि वर्जिनिटी टेस्ट को यौन हमले का एक प्रकार समझा जाएगा। उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले में विधि एवं न्याय विभाग के साथ सलाह के बाद परिपत्र जारी होगा, जिसमें इसे दंडनीय अपराध के रूप में घोषित किया जाएगा।

हमारे समाज में आज से ही नहीं बल्कि पौराणिक काल से कभी सती के नाम पर तो कभी वर्जिनिटी टेस्ट के नाम पर महिलाओं का शोषण किसी न किसी कुरीति के रूप में होता आया है। ऐसी ढकोसलों से भरी परंपराओं की शुरूआत करने वालों की सबसे विशेष बात होती है कि वो लड़कियों को शुरू से ही इस प्रकार प्रशिक्षित करते हैं कि महिलाओं की श्रेणी में आते-आते उनके लिए यह सब जीवन का एक हिस्सा हो जाए। वे न कभी ख़ुद पर कोई बात करें और न ही कभी अपने अधिकारों पर।

क्षेत्रों से लेकर समुदायों और देश से लेकर समाज तक यह कुरीति सिर्फ़ महाराष्ट्र के चुनिंदा समुदायों की हक़ीकत नहीं हैं। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हर बार अधिकतर जगहों पर आज भी लड़की के वर्जिन होने का प्रमाण हर कोई माँगता ही रहता है।

अपने तय किए मानदंडों पर महिलाओं की पवित्रता को आँका और पहचाना जाता है। अगर कहीं पर भी महिला उन मानदंडो पर किन्हीं कारणों से असफल हो जाए तो उसे हीन नज़र से देखा जाता है और वैवाहिक जीवन तक पर खतरा बन ही जाता है। महाराष्ट्र में कंजरभाट समुदाय में आज भी दूल्हे की इच्छा पर दुल्हन को अपने वर्जिन होने का सबूत देना पड़ता है।

सोचने वाली बातें हैं कि अगर किसी समुदाय में वर्जिन होना ही परंपरा और संस्कार का आईना हैं तो फिर यह सब सिर्फ़ महिलाओं तक ही क्यों सीमित है? लड़की के वर्जिनिटी टेस्ट पर सवाल खड़ा करने वाले लोग लड़के के वर्जिन होने पर कभी भूले-बिसरे भी उँगली नहीं उठाते। इसे कुरीति का नाम न मिले तो और किसका मिलेगा जिसमें सिर्फ़ लड़की को ऐसी परीक्षाएँ भी देनी है और असफल होने पर सबके आगे शर्मसार भी होना है।

अभी हाल ही में कंजरभाट समुदाय के नवविवाहित जोड़े का ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ से जुड़ा मामला सामने आया। इस ख़बर में सबसे दुखद बात थी कि लड़का और लड़की दोनों ने उच्च शिक्षा ग्रहण की हुई है। साथ ही परिवार भी शिक्षित है। लड़का पढ़ाई करके इंग्लैंड से लौटा था। लेकिन फिर भी लड़के ने लड़की के वर्जिनिटी टेस्ट की माँग की थी जैसे यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार हो। ऐसे पढ़े-लिखे लोगों का इन गिरे मुद्दों को लेकर खबरों में आना हमें बताता है कि आज भी शिक्षा के प्रभाव से ज्यादा समुदाय के माहौल का फर्क हम पर पड़ता है।

यहीं कारण है कि पितृसत्ता से जकड़ा हुआ समाज शिक्षित होने के बाद भी इन कुरीतियों को विकल्प के तौर पर अधिकार मानकर चलता है और सोचता है कि वो जब चाहें समुदाय विशेष द्वारा मिले इन अधिकारों का इस्तेमाल करके महिलाओं के दमन को बढ़ावा दे सकते हैं।

याद दिला दूँ अभी हाल ही में जाधवपुर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर का आपत्तिजनक बयान सुर्खियों का हिस्सा बना था जिसमें उन्होंने अपने छात्रों को वर्जिनिटी की महत्वता बताते हुए फेसबुक पोस्ट में कहा था कि क्या आप टूटी सील के साथ कोल्ड ड्रिंक की बोतल या बिस्किट के पैकेट ख़रीदना चाहेंगे?

इस बात पर हालाँकि बवाल बहुत हुआ लेकिन सोचने वाला विषय यह है कि फेसबुक पोस्ट पर लिखी यह बात भले ही चर्चाओं में आ गई हो, लेकिन क्लासरूम के भीतर ऐसे शिक्षक का होना आने वाली लड़कियों के लिए किसी ख़तरे से कम नहीं हैं। शिक्षा के नाम पर लड़की के वर्जिन होने की महत्तवता पर बात करना कुंठित मानसिकता की न सिर्फ़ पहचान है बल्कि उसे बढ़ावा देना भी दर्शाता है।

इसके अलावा कुछ समय पहले ख़बर आई थी कि कुवैत में एक शख़्स ने अपनी बीवी की वर्जिनिटी पर शक़ करते हुए फॉरेंसिक जाँच माँगी थी। इस मामले का इतना तूल पकड़ना बताता है कि आज महिलाओं की वर्जिनिटी का यह मुद्दा सिर्फ़ देश, राज्यों और क्षेत्रों तक सिमटा हुआ नहीं हैं बल्कि अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी महिलाएँ इस पीड़ा से गुज़र रही हैं।

आज न केवल समाज और समुदायों द्वारा इसे बढ़ावा दिया जा रहा है बल्कि बाज़ार भी इसे ढाल बनाने से नहीं पीछे हट रहा। लगातार बाज़ार में ऐसे प्रोडक्ट उतारे जाते रहे हैं जो महिलाओं की वर्जिनिटी को टारगेट करके अपनी ज़मीन तैयार करते हैं। साल 2012 में ऐसा ही मुद्दा गर्माया था जिसमें ऐसी क्रीम के विज्ञापन विवाद का हिस्सा बने थे। इनमें ख़ासियत यह थी कि यह उत्पाद महिलाओं की योनि को गोरा करने से लेकर उन्हें दुबारा वर्जिन बनाने का दावा करते थे।

सोचिए, बढ़ते हुए भारत की तस्वीर में जहाँ पर लड़कियाँ घर से लेकर नौकरियों में, व्यापार में, सिने-जगत, खेलजगत में लगातार अपनी उपस्थितियाँ दर्ज करा रही हैं। भागदौड़ भरी ज़िंदगियों में वो हर प्रकार का संघर्ष कर रही हैं और खुद को स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम से लेकर योग कर रही हैं। और, इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ लड़कियाँ साइकिल चलाने से लेकर पेड़ पर चढ़ते हुए कार्यों को करने से पीछे नहीं हटती हैं।

वहाँ ऐसी स्थितियों में अगर एक हाइमन के ब्रेक हो जाने से उसके चरित्र पर ही उँगलियाँ उठें और शर्मसार हो जाना पड़े तो जरूरी है कि न केवल महाराष्ट्र की सरकार बल्कि पूरे देश में इस ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ को अपराध घोषित कर दिया जाए। ताकि, पितृसत्ता से जकड़ा हुआ समाज आज ख़ुद ऐसे रीति-रिवाज़ों को गढ़ने से पहले क़ानूनी रूप से अपराधी बन जाए।

राइफ़लमैन औरंगजेब की हत्या: आतंकियों से मिलकर कश्मीर के जवानों ने ही दिया था धोखा?

पिछले साल (2018) जून में कश्मीर के पुलवामा में आतंकवादियों द्वारा राइफ़लमैन औरंगज़ेब के अपहरण और हत्या करने की घटना के संबंध में सेना ने सुरक्षा बलों के तीन जवानों को संदिग्ध माना है और उनसे पूछताछ कर रही है।

जानकारी के मुताबिक, 44 राष्ट्रीय राइफ़ल्स के तीन जवानों को हिरासत में लिया गया है और उनसे पूछताछ की जा रही है। सेना को संदेह है कि राष्ट्रीय राइफ़ल्स के जवानों ने राइफ़लमैन औरंगजेब से जुड़ी जानकारी आतंकवादियों से साझा की थी।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ख़बर के अनुसार, जिन तीन जवानों से पूछताछ की जा रही है, वो सभी दक्षिण कश्मीर से हैं। आबिद वानी, तजामुल अहमद और आदिल वानी – ये उन तीन जवानों के नाम हैं। रक्षा प्रवक्ता कर्नल राजेश कालिया के अनुसार सेना उन परिस्थितियों की जाँच कर रही है, जिनके कारण औरंगज़ेब का अपहरण और फिर हत्या की गई।

बता दें कि राष्ट्रीय राइफ़ल्स के जवानों से पूछताछ संबंधी जानकारी तब उजागर हुई, जब बीते सोमवार (4 फ़रवरी 2019) को पुलवामा के जवान आबिद वानी (तीनों संदिग्ध जवानों में से एक) के भाई तौसीफ़ अहमद वानी को राष्ट्रीय राइफ़ल्स के द्वारा पूछताछ के लिए बुलाया गया।

औरंगज़ेब 4 जम्मू-कश्मीर लाइट इन्फैंट्री के साथ थे लेकिन उन्हें 44 राष्ट्रीय राइफ़ल्स में तैनात किया गया था। वह सैन्य अधिकारी मेजर शुक्ला के निजी गार्ड थे, जिन्होंने आतंकवादी समीर टाइगर को मारा था। मेजर शुक्ला 30 अप्रैल, 2018 को पुलवामा ज़िले के द्रुबगम गाँव में समीर टाइगर से हुई मुठभेड़ में घायल हो गए थे।

मारे गए राइफ़लमैन औरंगज़ेब ने पिछले साल जून में अपने परिवार के साथ ईद मनाने की योजना बनाई थी। घर जाने के लिए वह बस पकड़ने को कार से पुलवामा बस स्टैंड की ओर जा रहे थे। तभी आतंकवादियों ने उनकी कार को कुछ किलोमीटर पहले ही रोक लिया और अपहरण कर उन्हें मार डाला। उनका शव पुलवामा ज़िले के कलामपोरा में अपहरण के स्थल से लगभग 10 किलोमीटर दूर बरामद किया गया था। पोस्टमॉर्टम से पता चला था कि उनकी गर्दन और सिर पर गोलियाँ दागी गईं थी।

औरंगज़ेब जिस कार से जा रहे थे, उसके ड्राइवर की पहचान एक स्थानीय सरकारी स्वास्थ्य केंद्र के फार्मासिस्ट फ़ारूक अहमद अल्लई के रूप में हुई है। अल्लई के अनुसार, पुलवामा ज़िले के कलामपोरा इलाक़े में आतंकवादियों द्वारा उनकी कार रोक ली गई थी। अल्लाई ने बताया कि आतंकवादियों ने उन्हें भी पीटा था। बाद में अल्लई ने घटना की विस्तृत जानकारी पुलवामा के राजपोरा पुलिस स्टेशन में दी थी।

प्रभारी प्राचार्य अफ़जल हुसैन ने ‘वन्दे मातरम्’ और राष्ट्रगान गाने से किया इनकार, Video वायरल

बिहार के कटिहार से एक बड़ी ख़बर सामने आई है। मामला मनिहार प्रखंड के अब्दुल्लापुर प्राथमिक विद्यालय से जुड़ा है। यहाँ के प्रभारी प्राचार्य अफ़जल हुसैन ने ‘वन्दे मातरम्’ गाने से इनकार कर दिया, जिसके बाद नाराज़ ग्रामीण स्कूल परिसर में पहुँच गए। मामले ने विवाद का रूप ले लिया। अफ़जल हुसैन पर स्थानीय लोगों से हाथापाई करने का भी आरोप है। किसी ने इस पूरी घटना का वीडियो बना लिया जो सोशल मीडिया पर काफ़ी वायरल हो रहा है। इसमें आरोपित शिक्षक हुसैन ‘वन्दे मातरम्’ गाने से मना कर रहा है। शिक्षक ने संविधान का हवाला देते हुए कहा कि कहीं ऐसा नहीं लिखा हुआ है कि ‘वन्दे मातरम्’ गाना अनिवार्य है।

राष्ट्रगीत के सवाल पर शिक्षक ने कहा कि वह सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह के सामने सर झुका सकता है, और कहीं नहीं। यही नहीं, झंडारोहण के बाद अन्य शिक्षक, छात्र-छात्राएँ और ग्रामीणों ने तो राष्ट्रगान (जन-गण-मन) गाया, लेकिन उस शिक्षक ने इससे भी साफ़ इनकार कर दिया। उसने कहा कि वह धार्मिक मान्यताओं को देखते हुए राष्ट्रगान नहीं गाएगा। उसने कहा कि राष्ट्रगान भारत माता की पूजा है, जो कि इस्लाम के ख़िलाफ़ है।

वीडियो साभार: (Zee Bihar Jharkhand)

वहीं ज़िला शिक्षा पदाधिकारी ने कहा कि उनके पास इस मामले को लेकर कोई शिकायत नहीं आई है। अगर शिकायत आती है तो कार्रवाई की जाएगी। आरोपित शिक्षक अपने बयान पर क़ायम है और उसने कहा है कि वह न तो राष्ट्रगान गाएगा और न ही ‘वन्दे मातरम्’।

तीन तलाक़: ससुर के बाद अब देवर से ‘हलाला’ का दबाव, पहली बार इंजेक्शन देकर किया था ‘कुकर्म’

उत्तर प्रदेश के बरेली से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। एक मुस्लिम महिला को उसके पति ने ‘तीन तलाक़’ देने के बाद हलाला करवाने पर मज़बूर किया। आरोपित ने अपनी पत्नी को अपने पिता (पीड़िता के ससुर) के साथ ज़बरन हलाला करवाया। पीड़िता की बहन ने अदालत में अर्ज़ी देकर न्याय की गुहार लगाई है। पीड़िता ने अपनी शिकायत में कहा:

“पहले मेरे शौहर ने मुझे तलाक़ दे दिया और दुबारा निकाह करने के लिए ससुर के साथ हलाला करवाया। अब वह फिर से तलाक़ देने के बाद देवर से हलाला कराने की ज़िद कर रहा है।”

बरेली के बानखाना निवासी पीड़ित महिला ने आला हजरत हेल्पिंग सोसायटी की अध्यक्ष निदा खान के साथ संयुक्त रूप से संवाददाता सम्मेलन करते हुए बताया कि वर्ष 2009 में उसका निकाह गढ़ी-चौकी निवासी वसीम से हुआ था। निकाह के 2 वर्ष बाद ही वसीम ने ‘तीन तलाक़’ देकर उसे घर से बाहर निकाल दिया। काफ़ी मिन्नतों के बाद वह फिर से पीड़िता को अपने घर में रखने को तैयार हुआ, लेकिन उसने एक शर्मनाक शर्त रख दी।

पीड़िता की बहन ने वसीम और उसके परिवार द्वारा किए गए अत्याचार के बारे में बताते हुए कहा:

“जब मेरी बहन ने ‘हलाला’ की प्रक्रिया से गुजरने से इनकार कर दिया, तो उसके ससुराल वालों ने उसे जबरन इंजेक्शन लगा कर, उसके ससुर के साथ हलाला की ‘रस्म’ पूरी करवाई। अगले 10 दिनों तक, बुजुर्ग व्यक्ति ने मेरी बहन के साथ लगातार बलात्कार किया और फिर उसे ‘तीन तलाक़’ दे दिया ताकि वह अपने पति से दोबारा शादी कर सके। लेकिन, जनवरी 2017 में, उसने फिर से मेरी बहन को तलाक़ दे दिया और फिर परिवार ने उसे उसके पति के छोटे भाई के साथ ‘हलाला’ से गुज़रने के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया।”

इतना ही नहीं, आरोपितों ने पीड़िता को ₹15 लाख लेकर मामला ख़त्म करने की भी पेशकश की। लेकिन, पीड़िता ने कहा की वह इंसाफ़ चाहती है और उसने रुपए लेने से इनकार कर दिया। उसने कहा कि वह दोषियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दिलाना चाहती है। अपनी बहन के घर रह रही पीड़िता ने कहा कि रोज़-रोज़ कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाना उसके वश की बात नहीं है।

पीड़िता ने बताया कि पहली बार हलाला के बाद उसे अपनाने के बावज़ूद उसका पति उसके साथ काफी मारपीट और गाली-गलौज करता था। पीड़िता ने सरकार से तीन तलाक़, बहुविवाह और हलाला पर कड़े क़ानून बनाने की माँग की। उसने कहा कि सख़्त क़ानून बनाने से महिलाओं पर अत्याचार कम होगा। पीड़िता ने कहा कि वह नहीं चाहतीं कि अन्य महिलाएँ उस दर्द से गुज़रे, जो उसे मिला है।

वहीं जनसत्ता में प्रकाशित ख़बर के अनुसार मुफ़्ती खुर्शीद ने कहा कि अपने ससुर से हलाला करवाने के बाद वह महिला अपने पति के लिए ‘हराम’ हो गई है। मुफ़्ती ने कहा:

“ससुर के साथ हलाला होने पर वह महिला अपने शौहर के लिए हराम हो गई। वह दोबारा अपने शौहर के साथ नहीं रह सकती है। ऐसा करना एक बड़ा गुनाह है। यह देखना होगा कि आखिर ऐसा कैसे हुआ।”

वहीं हजरत हेल्पिंग सोसायटी की अध्यक्ष निदा खान ने कहा कि शरिया अदालतों में अब महिलाओं को भी काज़ी बनाने की व्यवस्था लागू होनी चाहिए।

वैरागी जीवन जीते हुए वीतरागी हो जाना है नागा संन्यासी होना

भारत त्याग और तितिक्षा की भूमि है। भारतीय सनातन परम्परा स्वतः स्फूर्त जीवन का विज्ञान है। फिर भी भारत की सनातन भूमि पर जब भी साधु, संत, संन्यासी, गृहत्यागी अध्यात्म के पथिकों की बात होती है तो लोग तपाक से कह देते हैं कि जिन्हें कोई काम नहीं वो ही ये सब बनते हैं, या ऐसे मार्गों का अनुसरण करते हैं। अपने पिछले लेखों में भी मैंने जिक्र किया और आज फिर आपसे निवेदन है कि हो आइये कुम्भ आपके कई पूर्वग्रह भी वहीं गंगा मइया में डुबकी के साथ धुल जाएँगे। गर मुक़्त हो गए अपनी जड़ता से तो कुम्भ आपको ऐसे साधकों से भी मिलावाएगा, जिन्होंने चरम भौतिकता का आस्वाद लेने के बाद उसकी निरर्थकता को समझ सत्य की ख़ोज एवं जीवन के रहस्यों की तलाश व उससे परिचित होने के लिए जंगलों, पर्वतों की ख़ाक छान रहें हैं, या निर्जन से निर्जन जगहों पर भी धुनि रमाए बैठे हैं।

मेरी नज़र में कुम्भ मानव सभ्यता का एक जीवंत दस्तावेज़ है। जिसे जीवन को समझना हो, तो कहीं और भटकने के बजाय कुम्भ देख आए। वहाँ जानने, समझने और महसूस करने के लिए बहुत कुछ है। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि कुम्भ की जान अखाड़े हैं और अखाड़े नागा साधुओं से चलते हैं। अखाड़ों का अपना एक पूरा तंत्र है। अगर कुम्भ में हैं या गए तो अखाड़ों को समझे बिना आपकी यात्रा अधूरी होगी।

नागा साधु होना कोई मजाक नहीं है, संयम और साधना की कठिन परीक्षा के बाद ही किसी को नागा साधु की उपाधि दी जाती है। नागा साधु होने का मतलब है सर्वस्व त्याग कर, यहाँ तक कि अपनी सात पीढ़ियों का पिण्डदान कर इस पथ पर आगे बढ़ना।

चलिए आज आपको विस्तार से बताते हैं कि अखाड़ों में शामिल नागा साधु क्या-क्या हैं? उनकी एजुकेशनल बैकग्राउंड क्या है। क्या वो जीवन से ऊबे हुए हैं या आनंद से सराबोर? आज तमाम उच्च शिक्षित युवा भी आख़िर क्यों शामिल होना चाहते हैं अखाड़ों में? भौतिक सुख सुविधाओं को छोड़कर नागा साधु बन इतना कठिन जीवन जीने के निर्णय के पीछे आख़िर क्या है रहस्य?

नागा साधुओं का इतिहास

सबसे पहले, नागा साधुओं की परंपरा की बात करें तो ये हजारों साल पुरानी है। कई प्राचीन वैदिक ग्रंथों में भी दिगंबर नागा साधुओं के संदर्भ मिलते हैं। हिंदू धार्मिक परंपराओं के अध्येता हरिद्वार के लेखक विष्णु दत्त राकेश के अनुसार, “नागा साधुओं को पहली बार 8 वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा सनातन धर्म की रक्षा और आध्यात्मिक उन्नति के लिए समूहों में संगठित किया गया था। आदि शंकराचार्य ने ही दशनामी संन्यासी परम्परा की स्थापना की थी। इसमें उस समय सात अखाड़े शामिल थे। अखाड़ा – निरंजनी, जूना, महानिर्वाणी, अटल, अग्नि, आनंद और आवाहन।”

वर्तमान में कुल 13 प्रमुख अखाड़े हैं, जिनमे से 7 की स्थापना ख़ुद शंकराचार्य ने की थी। इनकी स्थापना का शुरूआती उद्देश्य आध्यात्मिक साधना के साथ, शस्त्र संचालन में भी प्रवीण हो, हिंदू मंदिरों और आम लोगों को मुग़ल आक्रमणकारियों से बचाना था।

शस्त्र और शास्त्र दोनों में प्रवीण

राकेश कहते हैं, “अखाड़े के सदस्य शास्त्रों के साथ शस्त्र विद्या में भी निपुण होते थे ताकि अपने देश और धर्म की रक्षा के लिए ज़रूरत पड़ने पर यज्ञ की समिधा के साथ अपने प्राणों की आहुति देने के लिए भी तैयार रहें।”

शस्त्रों में भाले को अखाड़ों के प्रतीक के रूप में अपनाया गया था। अभी भी नागा साधुओं द्वारा उन शस्त्रों की पूजा की जाती है, साथ ही अखाड़े अपनी सुरक्षा के लिए भी रखते हैं। अखाड़े अपनी शस्त्र प्रवीणता का परिचय कुम्भ के शाही स्नान के समय प्रदर्शित भी करते हैं। हालाँकि, अब किसी मुग़ल आक्रमणकारी का ख़तरा नहीं है। फिर भी शस्त्र और शास्त्र दोनों की जुगलबंदी आत्मनिर्भरता के प्रतीक के रूप में आज भी अखाड़ों की शान है।

संन्यासी स्वमेव शौर्य का प्रतिक भी है

सनातन धर्म की रक्षार्थ की मंदिरों की रक्षा

बता दें कि नगा साधुओं ने सनातन धर्म के रक्षार्थ योद्धाओं के रूप में कई लड़ाइयों में भाग लिया। ऐसा ही एक वाकया है, 1664 में जब औरंगजेब के सेनापति मिर्जा अली तुरंग ने काशी (वाराणसी) पर हमला किया, तो हजारों नागाओं ने सैनिकों की भाँति युद्ध किया और काशी विश्वनाथ मंदिर की सुरक्षा में मदद की। 1666 में जब औरंगजेब की सेना ने हरिद्वार पर हमला किया तो भी नागा साधु उनका विरोध करने के लिए योद्धाओं के रूप में आगे आए। आज ऐसे कई मंदिर जो औरंगजेब के समय ध्वस्त हो मस्जिद बनने से रह गए। उसमें तत्कालीन शासकों के साथ नागा साधुओं का बड़ा योगदान है।

प्राचीन काल में जिस उद्देश्य से अखाड़ों की स्थापना की गई थी, अखाड़ों ने उसे पूरा करने में ख़ुद को समर्पित कर दिया। विदेशी आक्रांताओं से जीवन के रक्षार्थ लड़ना भी जीवन साधना ही है। हालाँकि, अब अखाड़ों का प्रमुख कार्य धार्मिक, आध्यात्मिक साधना ही है। साथ ही समाज के भलाई के लिए भी अखाड़े कई कार्यक्रम संचालित कर रहे हैं। जिसकी चर्चा आगे आएगी।

सबसे प्रसिद्ध निरंजनी अखाड़ा

वर्तमान अखाड़ों में सबसे बड़ा अखाड़ा जूना अखाड़ा है। इसके बाद निरंजनी और महानिर्वाणी अखाड़ा हैं। इनके अध्यक्ष श्री महंत और अखाड़ों के प्रमुख आचार्य महामंडलेश्वर के रूप में जाने जाते हैं।

सभी अखाड़ों में निरंजनी अखाड़ा सबसे प्रसिद्ध है। इतना ही नहीं, दुनियावी पैमाने पर भी इसमें सबसे ज्यादा क्वालिफाइड साधु-संत हैं, जो शैव परंपरा के मानने वाले हैं। जटा रखते हैं। इस अखाड़े के इष्टदेव कार्तिकेय हैं। जो देव सेनापति हैं। निरंजनी अखाड़े का प्रमुख स्थान दारागंज है। हरिद्वार, काशी, त्र्यंबक, ओंकारेश्वर, उज्जैन, उदयपुर, बगलामुखी जैसी जगहों पर इस अखाड़े के आश्रम हैं।

दीक्षा प्रक्रिया: कैसे शामिल होते हैं अखाड़ों में

जूना अखाड़ा के मुख्य प्रशासक और एबीएपी के जनरल सेक्रेटरी महंत हरि गिरी का कहना है कि दीक्षा समारोह केवल कुम्भ के दौरान ही होता है और हर बार इसमें शामिल होने वाले लोगों की संख्या हजारों में होती है।

दीक्षा प्रक्रिया का अनुष्ठान

साधकों को दीक्षा की प्रक्रिया पूर्ण करने के लिए सर्वप्रथम अपने शरीर और मन की स्थिरता के लिए कठिन साधनाओं से गुजरकर ख़ुद को ब्रह्मचर्य के पालन के लिए तैयार करना पड़ता है। इस प्रक्रिया के प्रारम्भ में एक ’पंच संस्कार’ समारोह का आयोजन किया जाता है। जिसमें पाँच गुरु उसके लिए अलग-अलग अनुष्ठान करते हैं। इनमें प्रमुख गुरु शिखा (बाल) काटते हैं, भगवा गुरु उन्हें भगवा वस्त्र और रुद्राक्ष गुरु उन्हें रुद्राक्ष की माला भेंट करते हैं, विभूति गुरु शरीर पर भश्म लगाते हैं जबकि लंगोट गुरु उनके शरीर से आख़िरी कपड़ा भी उतरवाते हैं।

अंततः ‘विराज होम संस्कार’ अर्थात गृह त्याग संस्कार अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर द्वारा संचालित किया जाता है। आकांक्षी को माता और पिता दोनों पक्षों से अपने पूर्वजों की सात पीढ़ियों के साथ स्वयं का भी पिंड दान करना होता है। नागा दीक्षा नामक अंतिम अनुष्ठान का आयोजन उनके छठे गुरु द्वारा अखाड़े के ध्वज के सानिध्य में किया जाता है, जिसके बाद उन्हें नागा घोषित किया जाता है।

कई वर्षों की कठिन परीक्षाओं और आध्यात्मिक साधनाओं में प्रगति के बाद, नागा साधु अपने अखाड़ों में महंत और उसके बाद महामण्डलेश्वर और अंत में आचार्य महामण्डलेश्वर की उपाधि धारण करते हैं, जो कि अखाड़ों के पदानुक्रम में सर्वोच्च स्थान है।

नागा साधु बनने में कम से कम 6 वर्ष का समय लगता है, इस दौरान सन्यासी एक लँगोट के आलावा कुछ नहीं पहनते और कुम्भ में अंतिम दीक्षा के बाद उन्हें लंगोट भी त्यागना होता है। कौन किस कुम्भ में नागा साधु बना है। इसकी पहचान की प्रक्रिया भी है जैसे जिसने प्रयाग में उपाधि धारण की उसे नागा, जिसने उज्जैन में धारण की उसे ख़ूनी नागा, जो हरिद्वार में सन्यासी हुआ उसे बर्फ़ानी नागा तथा नासिक कुम्भ में बने नागा को खिचड़िया नागा कहते हैं।

कितने संपन्न और शिक्षित हैं नागा संन्यासी

अखाड़ों में शिक्षा और सम्पन्नता की बात हो तो सर्वप्रथम बात करते हैं निरंजनी अखाड़ा की, जिसमें क़रीब 70% नागा साधुओं ने हायर एजुकेशन हासिल की है। अखाड़ों के पदाधिकारियों में 100 से ज्यादा महामंडलेश्वर और 1100 से ज़्यादा संत-महंत उच्चशिक्षित हैं। इनमें डॉक्टर, लॉ एक्सपर्ट, प्रोफेसर, संस्कृत के विद्वान और आचार्य भी शामिल हैं।

इस अखाड़े के महेशानंद गिरि ज्योग्राफी के प्रोफेसर हैं तो वहीं बालकानंद जी डॉक्टर और पूर्णानंद गिरि लॉ एक्सपर्ट और संस्कृत के विद्वान हैं। संत स्वामी आनंदगिरि नेट क्वालिफाइड हैं। वे आईआईटी खड़गपुर, आईआईएम शिलांग में लेक्चर दे चुके हैं। फ़िलहाल, बनारस से पीएचडी कर रहे हैं। संत आशुतोष पुरी भी नेट क्वालिफाइड और पीएचडी कर चुके हैं।

हाल ही में प्रयागराज कुम्भ में कई युवा नागा साधु भी बने हैं। बीते सप्ताह हुए दीक्षा समारोह में हजारों युवाओं ने अपने बाल त्यागे और पिंड दान कर रातभर चली साधना के बाद ये सभी प्राचीन परंपरा के अनुसार नागा साधु बने। शायद आपको हैरानी हो कि इनमें भी बड़ी संख्या में इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट के ग्रेजुएट शामिल हैं।

नागा साधु बनने आए 27 वर्षीय रजत कुमार राय का कहना है, “उन्होंने कच्छ से मरीन इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल किया है। नागा साधु बने 29 वर्षीय शंभु गिरी यूक्रेन से मैनेजमेंट ग्रेजुएट हैं। 18 वर्षीय घनश्याम गिरी उज्जैन से 12वीं बोर्ड के टॉपर हैं।

घनश्याम गिरी का कहना है कि उसे बोर्ड की परीक्षाएँ पास करने के बाद अपने उद्देश्य का अहसास हुआ। उस वक्त उसकी उम्र 16 साल थी, जब वह अपने गुरु महंत जयराम गिरी के आश्रम गया। उसका कहना है कि वह अपने गुरु की कृपा के कारण दो साल बाद नागा बनने के लिए दीक्षा लेने कुम्भ समारोह में आया है।

नागा सन्यासी बनने के लिए कोई भेदभाव या बंधन नहीं है

जब उनसे पूछा गया कि नागा बनने के लिए बैकग्राउंड कैसा होना चाहिए तो उन्होंने कहा कि जाति, धर्म, रंग चाहे जो हो लेकिन जो व्यक्ति वैराग्य की तीव्र इच्छा रखता है वह नागा साधु बनने के योग्य है। कई मुस्लिम, ईसाई और बाकी धर्मों के लोग भी नागा संन्यासी के रूप में स्वीकार किए गए हैं। इनमें वो लोग भी शामिल हैं जो पहले डॉक्टर और इंजीनियर रह चुके हैं।

अखाड़ों में भी कोतवाल होते हैं जिनकी ज़िम्मेदारी अखाड़े की देखभाल के साथ नागा संन्यासियों की पहचान करना होता है। निरंजनी अखाड़े के कोतवाल ने बताया कि एक बार जब संन्यासी अखाड़े का हिस्सा बन जाते हैं तो रास्ता बेहद कठिन हो जाता है। कुछ सालों तक उम्मीदवारों की जाँच की जाती है कि वह अपनी इच्छा से संन्यासी बन यहाँ रह रहे हैं या फिर किसी संकट से बचने के लिए यहाँ आए हैं। जब वह सभी परीक्षाएँ पास कर लेते हैं और हमें संतुष्ट करते हैं, तभी वह असली नागा संन्यासी ठहराए जाते हैं।

सामाजिक सरोकार

अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरि कहते हैं कि निरंजनी अखाड़ा प्रयागराज-हरिद्वार में पाँच स्कूल-कॉलेज संचालित कर रहा है। हरिद्वार में एक संस्कृत कॉलेज भी है। इनका मैनेजमेंट और व्यवस्थाएँ स्वेच्छा से संत संभालते हैं। यहाँ पर छात्रों की पढ़ाई के साथ, उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास पर ध्यान दिया जाता है।

अंतिम लक्ष्य

वैरागी जीवन जीते हुए वीतरागी हो जाने की यात्रा है संन्यासी होना। अंततः नागा संन्यासियों के जीवन का प्रमुख उद्देश्य और अंतिम लक्ष्य धार्मिक, आध्यात्मिक साधना सिद्धि से जीवन के अनुभवों को सघन करते हुए उसके पार निकल जाना है। बाहरी प्रलोभनों से ख़ुद को काटकर अस्तित्व की गहराई को समझना ही उनका एकमात्र साध्य रह जाता बाकि भौतिक सुविधाएँ मात्र जीवन संचालन के लिए युक्तियुक्त साधन।

इस्लामी धर्मान्तरण का विरोध करनेवाले व्यक्ति की क्रूर हत्या, दंगों के आसार, पुलिस तैनात

अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों द्वारा ‘पट्टली मक्कल काची’ (पीएमके) के एक अधिकारी की हत्या कर दी गई। स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है और किसी भी अनहोनी से निपटने के लिए तंजावुर जिले में कुंभकोणम के पास लगभग 250 पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है।

घटना मंगलवार रात तिरुभुवनम में हुई। अज्ञात लोगों के एक समूह ने पीएमके के एक अधिकारी 42-वर्षीय रामलिंगम पर, जो उस समय घर वापस जा रहे थे, उन पर हमला कर हाथ काट दिया। गंभीर रूप से घायल रामलिंगम को कुंभकोणम के एक निजी अस्पताल में ले जाया गया। अस्पताल के डॉक्टरों ने रामलिंगम को शहर के सरकारी मेडिकल कॉलेज के अस्पताल में रेफर कर दिया। हालाँकि, अस्पताल ले जाते समय अत्यधिक रक्तस्राव के कारण रामलिंगम की मृत्यु हो गई।

तिरुविदाईमारुधुर पुलिस स्टेशन में तैनात एक पुलिस अधिकारी ने द न्यूज मिनट के संवाददाता को बताया कि इससे पहले भी कई बार रामलिंगम पर हमला हो चुका है। पुलिस अधिकारी ने यह भी बताया कि पहली नजर में इस बात की संभावना लगाई जा रही है कि रामलिंगम की हत्या अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों से बहस के बाद की गई है। पुलिस अधिकारी ने संवाददाता को यह भी बताया कि शहर के मुस्लिम लोग अक्सर अपने समुदाय बाहुल्य के क्षेत्र में जाते हैं। इन क्षेत्रों में मुस्लिम धर्म प्रचार को लेकर काम किया जाता है। यही नहीं इस क्षेत्र में दूसरे समुदाय के लोगों के आने पर भी रोक लगाई गई थी। जिस दिन घटना हुई उस दिन दलित समुदाय के कुछ लोग इस क्षेत्र में आए थे।

इस घटना के बाद इलाके में सांप्रदायिक तनाव की आशंका के तहत कुंभकोणम में और उसके आसपास के इलाके में लगभग 250 पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है। रामलिंगम के शव को उनके परिवार को सौंप दिया गया है, पुलिस अभी आरोपितों को पकड़ने के प्रयास कर रही है, साथ ही आईपीसी की धारा 302 (मर्डर) के तहत एक FIR भी दर्ज की गई है।

रामलिंगम अपने खानपान के व्यवसाय में काम करने वाले कुछ लोगों को लेने के लिए गली में चले गए थे और वहीं पर उन्होंने समुदाय विशेष के समूह को वहाँ इस्लाम के बारे में बोलते देखा, जिस पर उन्होंने सवाल उठाए।

हालाँकि, इस मुद्दे को दोपहर में मुस्लिम मौलवियों ने सुलझा लिया था। पुलिस को अभी संदेह है कि इन लोगों ने मामले को दबाने के लिए के लिए रामलिंगम के हाथों को काट दिया।

पुलिस अधिकारी के अनुसार, “आमतौर पर गाँवों का दौरा करने वाले लोग खुद को मुस्लिम बहुल इलाकों तक ही सीमित रखते हैं, लेकिन मंगलवार को जो समूह प्रचार करने के लिए आया था, उसने कथित तौर पर एक ऐसी गली का दौरा किया था, जिसमें दलित समुदाय से संबंधित निवासियों की एक बड़ी संख्या थी।”

कर्नाटक में बढ़ी कॉन्ग्रेस सरकार की मुश्किलें, 9 विधायकों ने बजट सत्र से बनाई दूरी

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस पार्टी की मुसीबत कम होने का नाम नहीं ले रही है। पिछले दिनों कर्नाटक में गठबंधन दल के सभी विधायकों को व्हिप जारी करके बजट सत्र के दौरान विधानसभा में उपस्थित रहने के लिए कहा गया था।

पार्टी द्वारा व्हिप जारी होने के बावजूद बजट सत्र के पहले ही दिन कॉन्ग्रेस पार्टी के नौ विधायक विधान सभा में अनुस्थित रहे। इन नौ विधायकों में कॉन्ग्रेस पार्टी के वे चार विधायक भी शामिल हैं, जिन्होंने 18 जनवरी को कॉन्ग्रेस पार्टी के विधायकों की मीटिंग से दूरी बनाई था।

इन चार विधायकों में रमेश जरकिहोली, महेश कुमतल्ली, उमेश जाधव और नागेन्द्र ने सत्र की पहले दिन कार्यवाही में भाग नहीं लिया। हालाँकि, इन चारों विधायकों ने सत्र में हिस्सा नहीं लेने की कोई भी वजह नहीं बताई है।

जानकारी के लिए बता दें कि पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस विधायक दल के नेता सिद्धारमैया ने विधायक दल की बैठक में शामिल नहीं होने वाले विधायकों को एक दूसरा नोटिस दिया है। पहला नोटिस जनवरी के आखिरी सप्ताह में, जबकि दूसरा नोटिस बीते सोमवार को दिया है।

पिछले दिनों 13 विधायकों के समर्थन वापस लेने की आई थी ख़बर

पिछले दिनों ज़ी न्यूज़ ने अपने एक रिपोर्ट में इस बात का दावा किया गया था कि कर्नाटक की सियासत में एक बड़ा परिवर्तन आने की सुगबुगाहट है। कुछ दिन पहले कुमारस्वामी ने ख़ुद काम के अत्यधिक बोझ का हवाला दिया था और कहा था, “गठबन्धन की मजबूरी की वज़ह से क्लर्क बन गया हूँ।” शायद अब उनका बोझ हल्का होने वाला हो।

रिपोर्ट के अनुसार, कॉन्ग्रेस के 10 और जेडीएस के 3 विधायक बीजेपी के संपर्क में थे। बीजेपी की कोशिश थी कि जल्दी ही ये 13 विधायक इस्तीफ़ा दे दें। मीडिया में ख़बर यह भी थी कि अगर सब कुछ सही रहा तो बीजेपी कर्नाटक में कुमारस्वामी सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव भी ला सकती थी। हालाँकि, काँग्रेस ने बीजेपी पर विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त का आरोप लगाया था।  उधर, बीजेपी ने भी काँग्रेस पर पलटवार करते हुए इससे इनकार किया था। लेकिन अब एक बार फिर से विधान सभा में बजट सत्र के दौरान नौ विधायकों की अनुपस्थिति से प्रदेश की राजनीति में सियासत गर्म होना स्वाभाविक है।

वाड्रा को ED के सम्मन से बौखलाई कॉन्ग्रेस की धमकी, कहा ‘कल PM मोदी भी पेश हो सकते हैं’

प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) की ओर से रॉबर्ट वाड्रा को मनी लॉन्ड्रिंग केस में सम्मन किए जाने के बाद बीजेपी ने कॉन्ग्रेस पर निशाना साधा। जिसके फौरन बाद कॉन्ग्रेस ने पलटवार करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हमला बोला है।

कॉन्ग्रेस ने कहा कि बीजेपी ने रॉबर्ट वाड्रा पर कई मुद्दों को लेकर आरोप लगाया है, लेकिन आज तक कुछ भी साबित नहीं हो पाया। सीनियर कॉन्ग्रेस नेता संजय सिंह ने कहा, “आज ईडी के सामने रॉबर्ट वाड्रा पेश हुए, कल उनकी जगह मोदी हो सकते हैं।”

बता दें कि रॉबर्ट वाड्रा की ओर से अंतरिम जमानत के लिए कोर्ट जाने के बाद दिल्ली के एक कोर्ट ने उन्हें ईडी की जाँच में सहयोग करने को कहा है। यह केस लंदन में 12, ब्रायन्स्ट स्क्वायर में संपत्ति की ख़रीद में मनी लॉन्ड्रिंग के केस से जुड़ा हुआ है।

ईडी ने कोर्ट को यह बताया कि उन्हें इस बात की जानकारी है कि लंदन में वाड्रा की कई सम्पत्तियाँ हैं। इनमें शामिल दो घर पाँच और चार मिलियन के हैं जबकि छह अन्य फ्लैट्स और अन्य सम्पत्तियाँ भी हैं।

बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने यह आरोप लगाया कि वाड्रा को यूपी सरकार के दौरान 2008-09 के समय  पेट्रोलियम और डिफेंस डील में मोटा फ़ायद हुआ। उन्होंने यह भी कहा “ वाड्रा ने रिश्वत के तौर पर मिले काले धन से करोड़ों संपत्ति बनाई है।”