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हिन्दुओं की मौत में अख़लाक़ वाला सोफ़िस्टिकेशन नहीं है

देश एक ओर जहाँ सहिष्णुता और असहिष्णुता के विवाद में मशगूल है, उसी समय धर्मान्तरण का कारोबार देशभर में तेजी से पैर पसार रहा है। एक सम्प्रदाय विशेष, जिसके इतिहास में जबरन धर्म परिवर्तन, कट्टरता, बर्बरता और हिंसा के पन्ने जुड़े हुए हैं, 21वीं सदी में भी इसी लीक पर काम कर रहा है यह कोई चौंकाने वाली बात नहीं है। लेकिन ये चौंकाने वाली बात ज़रूर है कि देश का ‘बुद्दिजीवी वर्ग’ अपनी नींद से सिर्फ खास मौकों पर ही आगे आता है, तख्तियाँ बनाता है, सत्संग करता है।

बुधवार को ही तमिलनाडु के तिरूभुवनम में एक ‘समुदाय विशेष’ के सदस्यों द्वारा रामलिंगम की हत्या कर दी गई और इसका कारण है कि रामलिंगम दलित बस्तियों में मुस्लिमों को जबरन धर्म परिवर्तन करने के लिए उकसाने से रोक रहे थे। नतीजा ये हुआ कि रामलिंगम को क्रूरता से जख़्मी किया गया, उनके हाथ काट दिए गए और अस्पताल पहुँचाने से पहले ही उनकी मौत हो गई।

भारत देश वर्तमान में बड़े स्तर पर धर्मपरिवर्तन की मार से गुजर रहा है। मुस्लिम हों या फिर ईसाई हों, इनका सबसे आसान और सबसे पहला लक्ष्य हिन्दू धर्म के आर्थिक रूप से वंचित, निचली जातियों के लोगों का धर्म परिवर्तन करना रहता है। स्वयं को सबसे पुरानी, उन्नत, यहाँ तक कि स्वयं को सभ्यता सूर्य मानने का दावा करने वाले ईसाई भी आज के समय पर धर्म परिवर्तन कर संख्या जुटाने के लिए इतने संवेदनशील हैं।

इस तरह से एक हिन्दू ही है जिसका धर्म के प्रचार-प्रसार को लेकर कोई लक्ष्य नहीं है। वो मात्र पूजा-पाठ करना चाहता है, गाय की सेवा करना चाहता है, और तिलक लगाकर एक गौरवपूर्ण जीवन जीने का प्रयास करता है और यह आज़ादी उसे इस लोकतंत्र का संविधान देता है। लेकिन ‘आदर्श लिबरल’ गिरोह द्वारा उसके इस दैनिक जीवन को भी ‘ओल्ड स्कूल थिंग’ कहा जाता है, उसके तिलक लगाने को सांप्रदायिकता को बढ़ावा देना हो जाता है और इन सब कामों को कट्टरता से जोड़ दिया जाता है। साथ ही, अब पत्रकारिता का भी एक समुदाय विशेष तेजी से उभर कर सामने आया है जिसके अनुसार ये सब ‘घृणित ब्राह्मणवाद’ का प्रतीक है।

मैंने किसी भी विद्यालय, शिक्षण संस्थान और ऑर्गनाइजेशन में काम कर रहे किसी हिन्दू को पूजा-पाठ के लिए दिन में 3 बार तो क्या, सप्ताह और महीने में भी एक बार अवकाश लेते या देते नहीं देखा है और शायद यह पढ़ते हुए भी आपको हँसी आएगी। आप खुद विचार कीजिये कि क्या ऐसा प्रश्न आप अब तक सोचते भी आए हैं? जवाब है नहीं।

क्योंकि हमारा मस्तिष्क धारण कर चुका है कि उपहास और घृणित रूप से देखे जाने के भय से हमें ऐसा सोचने तक की आजादी नहीं है। जबकि, कोई विशेष समुदाय का व्यक्ति शुक्रवार को अपनी इबादत के लिए अवकाश लेता है और इसमें शायद मना करने तक की गुंजाइश नहीं होती है। छुट्टी देने वाला भी इसमें बहुत गौरवान्वित और ‘हल्का’ महसूस करता है। वहीं हिन्दुओं के टीका धारण करने पर भी सवाल उठा लिए जाते हैं कि यह हमारे संस्थान का ‘कल्चर’ नहीं है और जाहिर सी बात है कि ऐसा कहने वाले भी हिन्दू ही हुआ करते हैं।

असल में सब मामला ‘सोफ़िस्टिकेशन’ का है। अगर आप धर्म परिवर्तन को ‘कन्वर्ज़न’ कह दें तो सोफ़िस्टिकेशन कहकर ‘इग्नॉर’ किया जा सकता है और यदि घर-वापसी कह दें, तो ‘कट्टर हिन्दू सोच’ कहकर इसे ‘राष्ट्रवादी ताकतों का षड्यंत्र’ कहा जा सकता है। हिन्दू पुनर्जागरण की अग्रणी स्वामी दयानन्द सरस्वती ने ‘घर वापसी’ शब्द दिया था, जिसका उद्देश्य ऐसे लोगों को हिन्दू धर्म में वापस जोड़ना था जिन्हें जबरन इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया गया था।

सवाल ये है कि अपनी आस्थाओं को सिर्फ सुरक्षित रखने का प्रयास करने वाले लोग सांप्रदायिक हिन्दू कैसे हो जाते हैं? जबकि प्रताड़ित कर, जबरदस्ती दबाव बनाकर और तरह-तरह के लालच देकर हिन्दुओं को मुस्लिम और ईसाई बना देना की तरह से एक मानवता के कल्याण की योजना मान लिया जाता है?

पिछले कुछ सालों में इस देश में हिन्दुओं की हिंसात्मक तरीके से हत्या और मार-काट एक आम बात बनकर रह गई है। वामपंथी समुदाय का इन अवसरों पर एक ख़ास मौन धारण कर लेना समझ में आता है लेकिन सत्ता में होने के बावजूद भाजपा सरकार ने भी इन हत्याओं पर कभी कोई विशेष रूचि नहीं दिखाई है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह रही कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हिन्दू धर्मपरिवर्तन के विरोध में आवाज उठाने वालों की हत्या पर कभी कोई राय नहीं रखी।

तमाम अखबार और न्यूज़ वेबसाइट्स केरल, बंगलुरू, मेरठ, लुधियाना, उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल तक RSS कार्यकर्ताओं की हत्या की ख़बरों से भरे रहे हैं, लेकिन इस पर वामपंथी मीडिया गिरोह ने कभी कोई ‘ऑनलाइन पिटीशन’ और आंदोलन नहीं चलाया।

प्रश्न फिर खड़ा होता है कि आखिर 2 लोगों की हत्या में संवेदनशीलता, विलाप और उग्रता के मीटर में परिवर्तन क्या सिर्फ इसलिए आ जाता है, क्योंकि वो आपके जैसी विचारधारा से ताल्लुक नहीं रखता है? किसी हिन्दू की निर्मम हत्या किसी समुदाय विशेष की मृत्यु से किस तरह अलग हो जाती है? क्या उसे सिर्फ इसलिए न्याय नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि उसका नाम अख़लाक़ नहीं बल्कि रामलिंगम है?

रामलिंगम की निर्मम हत्या भी ऐसे ही बाकी सभी पुराने प्रकरणों की तरह ही एक ‘बीत गई बात’ बनकर रह जाएगी। ख़बरों का टेस्ट तैमूर की क्यूट तस्वीरों और प्रियंका गाँधी के खाने और सोने के समय द्वारा तय कर लिया जाएगा और न्याय की बात अगली ऐसी ही किसी घटना के बाद फिर उठाई जाएगी। जनता का रोष उस चाइनीज़ प्रॉडक्ट की तरह बन चुका है, जिसकी सुबह और शाम तक चलने की कोई गेरेंटी नहीं होती है।

गुर्जर आरक्षण: गहलोत-पायलट के गले की फाँस, हो सकता है उग्र आंदोलन

राजस्थान विधानसभा चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस पार्टी ने गुर्जरों से आरक्षण का वादा किया था। ऐसे में आरक्षण के लोभ से गुर्जर समाज के लोगों ने कॉन्ग्रेस के पक्ष में मतदान किया। यही वजह है कि प्रदेश में कॉन्ग्रेस की सरकार बनने के बाद गुर्जर आरक्षण की माँग को लेकर उग्र हो गए हैं।

सत्ता में आने के लिए कॉन्ग्रेस ने आरक्षण का कार्ड खेला था, जो अब कॉन्ग्रेस सरकार के लिए ही मुसीबत बन गई है। गुर्जरों ने राजस्थान सरकार को अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि यदि 8 फरवरी तक सरकार ने गुर्जर आरक्षण की घोषणा नहीं की तो गुर्जर समुदाय के लोग रोड और रेल जाम करेंगे।

जब कॉन्ग्रेस कार्यालय में आरक्षण के मामले पर मुख्यमंत्री गहलोत से पत्रकारों ने सवाल पूछा तो गहलोत ने माइक सचिन पायलट की तरफ खिसका दिया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक गहलोत के इस व्यवहार पर सभी पत्रकार ठहाके लगाकर हँसने लगे।

इसके बाद राजस्थान के प्रदेश अध्यक्ष पायलट ने मुख्यमंत्री से कहा कि सवाल का जवाब मैं क्यों दूँ, आप क्यों नहीं ? इसके बाद पायलट ने पत्रकारों से पूछा कि आप लोग यह सवाल सरकार से पूछ रहे हैं या कॉन्ग्रेस पार्टी से पूछ रहे हैं।

प्रेस कॉन्फ्रेन्स में सचिन पायलट के गुस्सा को भांपते हुए मुख्यमंत्री गहलोत ने कहा कि अरे नहीं आप ही बोलो आप भी सरकार के हिस्सा हो। इसके बाद सचिन पायलट ने पत्रकारों से बात की। पायलट ने पत्रकारों से कहा कि हमारी सरकार गुर्जर आरक्षण को लेकर गंभीर है, लेकिन केंद्र सरकार की सहमती के बग़ैर यह संभव नहीं है। इस तरह प्रेस कॉन्फ्रेन्स से साफ़ हो गया कि आरक्षण के मामले पर कॉन्ग्रेस पार्टी घिर गई है।

दरअसल, पायलट राजस्थान के गुर्जर समाज से ही आते हैं। यही वजह है कि चुनाव में इस जाति की वोट भी कॉन्ग्रेस के पक्ष में पड़ी थी। लेकिन आरक्षण के मामले पर सरकार को घिरते देख गहलोत ने अचानक से गेंद पायलट के पाले में डाल दी। पायलट इस बात को बख़ूबी समझ रहे थे कि यह कितना अहम मुद्दा है जो आगे चलकर कॉन्ग्रेस सरकार और पायलट के राजनीतिक करियर के लिए ख़तरनाक साबित हो सकता है।

जानकारी के लिए बता दें कि आरक्षण के मामले में गुर्जर समाज के लोगों ने राजस्थान सरकार के ख़िलाफ़ 27 जनवरी से खंडार नाम की जगह पर पंचायत की, इसके बाद यह पंचायत राज्य भर में इस तरह की पंचायतें किए जाने की घोषणा की गई।

1 फरवरी को नैनवा और 5 फरवरी को अजमेर में भी पंचायत हुई। इसके बाद 13 फरवरी को दौसा में पंचायत होगी। गुर्जर समुदाय के लोगों ने राज्य सरकार के लोगों को अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि राज्य के अलग-अलग ज़िले में होने वाले इस पंचायत के बाद इस जाति के लोग रोड और रेल बंद करेंगे।

अम्मा को मिली आँखें, सीमा को मिला नया जीवन: सरकार की वो योजना, जिसने बदली दी ज़िंदगियाँ

पूरण कौर हरियाणा की रहने वाली महिला हैं। गरीब हैं। पति भी मेहनत-मजदूरी करने वाले हैं। लेकिन आमदनी इतनी ही कि घर चल जाता है किसी तरह से। सीमित आय के इस परिवार में किसी को सर्जरी/ऑपरेशन की जरूरत पड़ जाए तो सोचिए कहाँ जाएगा परिवार! पूरण कौर के साथ भी ऐसा ही हुआ। लेकिन उन्हें दिक्कत नहीं हुई। कारण है ‘आयुष्मान भारत योजना’।

‘आयुष्मान भारत योजना’ की वजह से ही पूरण कौर आज ढंग से देख पा रही हैं। वो भी बिना किसी ख़र्चे के। आइए जानते हैं उनकी कहानी, उन्हीं की जुबानी।

वीडियो में आप सुन सकते हैं कि कैसे एक परिवार अपनी आपबीती बता रहा है। वो बता रहा है कि कैसे ‘आयुष्मान भारत योजना’ से उसकी जिंदगी बदल गई। वीडियो से यह भी स्पष्ट है कि आम आदमी को दलगत राजनीति से कोई मतलब नहीं है। और यह भी कि कैसे मोदी सरकार की योजनाओं से आम आदमी को लाभ हुआ है जबकि कॉन्ग्रेस ने वादों के अलावा कुछ नहीं किया।

अब कहानी सीमा की। यह बिहार से हैं। प्रेगनेंसी में दर्द से कराह रही सीमा को गहने बेचने की नौबत आ गई थी क्योंकि पति के पास पर्याप्त पैसे नहीं थे। यहाँ भी ‘आयुष्मान भारत योजना’ ने अपना काम किया। सीमा का मुफ़्त में इलाज़ हुआ और उसने एक नया जीवन दिया।

यह दोनों उदाहरण उस प्रचलित कहावत के मिथक को तोड़ता है कि केंद्र से चला एक रुपया गरीब तक पहुँचते-पहुँचते 10 पैसा रह जाता है। आम आदमी के हितों और उसके कल्याण के लिए चलाई जा रही ‘आयुष्मान भारत’ जैसी केंद्रीय योजनाएँ न सिर्फ चलाई जा रही है, बल्कि आम आदमी तक पहुँचाई भी जा रही है।

CUSAT के कुलपति को झुकना पड़ा: पहले कहा ‘हम सेक्युलर संस्थान हैं’, फिर सरस्वती पूजा करने की अनुमति प्रदान की

केरल की कोचीन यूनिवर्सिटी ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (CUSAT) से मान्यता प्राप्त कोचीन यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग (कुट्टनाड) के कैंपस में छात्रों द्वारा सरस्वती पूजा करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। यूनिवर्सिटी के कुलपति की ओर से बाकायदा आधिकारिक नोटिस जारी कर कहा था कि CUSAT एक ‘सेक्युलर’ संस्थान है इसलिए वहाँ किसी रिलिजन विशेष का समारोह आयोजित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

विश्वविद्यालय द्वारा जारी आधिकारिक पत्र में CUSAT में पढ़ने वाले ‘उत्तर भारतीय’ छात्रों के सरस्वती पूजा करने के अनुरोध को ठुकरा दिया गया था। पत्र में यह लिखा गया था कि ‘उत्तर भारतीय’ छात्रों को सरस्वती पूजा करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

हालाँकि यूनिवर्सिटी द्वारा हाल ही में इस प्रतिबंध को हटा लिया गया और कुछ शर्तों के साथ सरस्वती पूजा करने की अनुमति दे दी गई है लेकिन जिस प्रकार की भाषा CUSAT प्रशासन द्वारा प्रयोग की गई उससे यही पता चलता है कि कुलपति द्वारा उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय छात्रों में भेदभाव करने का प्रयास किया गया। यह शुद्ध रूप से क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने और नॉर्थ वर्सेज़ साउथ के झगड़े वाली मानसिकता को बढ़ावा देने जैसा है।  

CUSAT के छात्रों द्वारा सरस्वती पूजा करने की मांगी गई अनुमति जिसे बाद में स्वीकार किया गया

ध्यातव्य है कि दक्षिण भारत में वसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा करने की परंपरा नहीं है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि तमिल, तेलुगु या मलयालम संस्कृति में देवी सरस्वती की पूजा ही नहीं होती। देवी का स्वरूप वही है बस पूजन के दिन का अंतर है।

ऐसे में विश्वविद्यालय के कुलपति द्वारा पूर्व में जारी किए गए पत्र में यह दलील देना कि CUSAT में उत्तर भारतीय छात्र सरस्वती पूजा नहीं कर सकते, निहायत ही हास्यास्पद है। दक्षिण भारत में वसन्त पंचमी को सरस्वती पूजन नहीं होता लेकिन शारदीय नवरात्र में अष्टमी से दशमी तक पूजन होता है।

तेलंगाना में गोदावरी नदी के तट पर बासर नामक स्थान पर ज्ञान सरस्वती देवी का प्रसिद्ध मन्दिर है जहां शिशुओं को अक्षरपूजा हेतु ले जाया जाता है। दक्षिण भारत में नवरात्र में सप्तमी के दिन देवी सरस्वती का आह्वान और दशमी को विसर्जन होता है।  

तमिल और अन्य भाषाओं में देवी सरस्वती को कलैमगल, कलैवाणी, शारदा, भारती, वरदनायकी इत्यादि नामों से जाना जाता है। कश्मीर में स्थित शारदा पीठ से लेकर दक्षिण में कांची और शृंगेरी की शारदा माँ भी सरस्वती का ही रूप हैं।

CUSAT के कुलपति द्वारा पूर्व में जारी किए गए निर्देश के अनुसार ‘सेक्युलर’ कैंपस में सरस्वती पूजा नहीं हो सकती। शायद कुलपति महोदय को ज्ञान नहीं था कि केरल में विजयादशमी के दिन ज्ञान और कला की देवी सरस्वती का पूजन किया जाता है। इसे विद्यारम्भं परंपरा कहा जाता है और यह केरल के हिन्दुओं तक ही सीमित नहीं है। केरल के ग़ैर हिन्दू ईसाई भी विजयादशमी के दिन ही बच्चों की अक्षरपूजा करवाते हैं।

देवी सरस्वती किसी क्षेत्र विशेष अथवा पंथ से बंधी नहीं हैं। ईरान के पारसी समुदाय के लोग देवी सरस्वती को ‘अनाहिता’ के नाम से पूजते हैं। म्यांमार की बौद्ध संस्कृति में यही सरस्वती ‘थुराथडी’ के नाम से जानी जाती हैं। बच्चे परीक्षा देने जाने से पहले इन्हीं देवी की आराधना करते हैं। जापान में देवी को बेंज़ाईतेन कहा जाता है। कंबोडिया के प्राचीन ख्मेर साहित्य में देवी को भारती और वागीश्वरी कहा गया है। इसी प्रकार थाई, इंडोनेशियाई और तिब्बती संस्कृति में भी सरस्वती को विभिन्न नामों से पूजा जाता है। इसलिए यह कहना कि CUSAT एक सेक्युलर कैंपस है इसलिए वहाँ सरस्वती पूजा नहीं हो सकती, एक निराधार तर्क था।

वैसे यह पहली बार नहीं है जब CUSAT ने हिन्दू धर्म में आस्था रखने वाले छात्रों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया। पहले भी एक बार छात्रों को बीफ वाला कटलेट खिलाने पर बवाल हुआ था।

ख़ामोश बाबू से ही ख़ामोश ना रहा गया…

फ़िल्म इंडस्ट्री में अच्छा ख़ासा नाम कमा चुके अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा (ख़ामोश बाबू) के सुर आजकल कुछ अलग ही लय पकड़ते नज़र आ रहे हैं। आजकल सार्वजनिक तौर पर महिलाओं को पुरुषों के पतन तक के लिए ज़िम्मेदार ठहरा देने जैसी बेतुकी बात भी कह बैठते हैं। ये बात और है कि बाद में उस बात को ज़बरदस्ती हँसी-ठिठोली का ज़रिया मात्र बना दिया गया।

मौक़ा था मुंबई में नवोदित लेखक ध्रुव सोमानी की किताब ‘A Touch of Evil’ के विमोचन का जहाँ ख़ामोश बाबू से ख़ामोश नहीं रहा गया और महिलाओं पर ही बोल बैठे कि किसी आदमी के पतन, बदनामी और नाक़ामयाबी का कारण महिलाएँ ही होती हैं। माने ये कि अगर पुरुष समाज कोई ग़लती करें और उसकी सज़ा उन्हें दी जाए तो उसकी ज़िम्मेदार केवल और केवल महिलाएँ ही होंगी। हाँ… अगर महिलाएँ चुप्पी साधे रहें तो उनकी सफलता के द्वार कभी बंद ही नहीं होंगे।

इसके बाद वो #MeeToo पर भी बोले कि तमाम हरक़तों के बावजूद अब तक किसी महिला ने उन पर केस नहीं किया है। भई क्या बात है… वाह-वाह… ये तो बड़ी ही बहादुरी का काम कर दिखाया शत्रुग्न सिन्हा ने, अपने इक़बाल-ए-जुर्म को हँसी-हंँसी में ही बयाँ कर गए जनाब। अब इन्हें अपने इस क़ारनामे पर वाकई घमंड होना चाहिए क्योंकि उन्हें उन महिलाओं ने क्षमा दान दे दिया जिनकी बदौलत आज वो मंच पर सरेआम अपनी हरक़तों का बखान भी कर गए और वहाँ मौजूद लोगों की वाह-वाही भी लूट गए। इसे कहते हैं एक तीर से दो निशाने।

हैरानी तो इस बात पर है कि शत्रुघ्न की यह पूरी गतिविधि कई मेनस्ट्रीम मीडिया की सुर्ख़ी बना जहाँ उनके द्वारा महिलाओं के प्रति इस विचार को नदारद रखा गया, जहाँ वो हँस-हँस कर अपने कृत्यों का बखान बड़े ही निराले अंदाज़ में कर रहे थे।

उदाहरण के तौर पर ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की ही बात करें तो उनकी भावनाओं को कुछ इस तरह पेश किया, जिसमें उन्हें बड़ा ही सौभाग्यशाली दर्शाया गया कि उनका नाम #MeToo  में शामिल नहीं है। हैरानी होती है कि इतने बड़े मीडिया हाउस ने भी इस तरह के वक्तव्य को हँसी-ठिठोली का जामा पहनाया।

बढ़ते हैं आगे, और बताते हैं कि ‘द क्विंट’ ने भी शत्रुघ्न सिन्हा के भाग्यशाली होने को ही अपनी सुर्ख़ी बनाया।

इसके बाद बात एनडीटीवी की, जिसने अपनी इंग्लिश और हिंदी वेबसाइट पर भाग्यशाली वाली लाइन को अपनी हेडलानन बनाया।


ये तो कहना पड़ेगा कि वाकई शत्रुघ्न सिन्हा बहुत भाग्यशाली हैं और इसकी वजह यह है कि ये उनका भाग्य ही है जो मज़ाक में किए गए इक़रार को बड़े स्तर के मीडिया हाउस हल्के में ले रहे हैं। क्योंकि न तो कहीं कोई हल्ला-गुल्ला होता दिख रहा है और न ही कोई #MeeToo पर उनके द्वारा बोली बातों पर कहीं कोई आपत्ति ही दर्ज हुई। ऐसा सौभाग्य बड़ा ही विरलय होता है, जो यदा-कदा ही किसी-किसी की झोली में गिरता है।

पंजाब केसरी ने भी ख़ामोश बाबू को सौभाग्यशाली हेडलाइन से ही संबोधित किया है।

बता दें कि शत्रुघ्न सिन्हा, ख़ुद एक बेटी (सोनाक्षी सिन्हा) के पिता हैं, ऐसे में इस तरह का मज़ाक तो उन्हें बिल्कुल भी शोभा नहीं देता। उन्हेंं तो शुक्रगुज़ार होना चाहिए अपनी देवी स्वरूपा पत्नी का, जो उनकी ग़लत हरक़तों और उसके इक़रार पर भी चुप्पी साधे हैं। अब ये तो भगवान जाने उनकी देवी स्वरूपा पत्नी ने अपनी चुप्पी को कब से साधे रखा होगा। शायद अपनी पत्नी की इसी अनोखी और दिव्य शक्ति के बलबूते ही वे इस तरह का साहसिक कार्य करने में सक्षम हो जाते होंगे।

क़िस्मत हो तो ऐसी जहाँ इक़बाल-ए-जुर्म भी हो और उसका आनंद भी हो इस पर उनका आत्मविश्वास तो देखते ही बनता था। अपनी पत्नी को अपना कवच बताने वाले सोनाक्षी के पिता उन महिलाओं के योगदान को भुला बैठे जिनके साथ उन्होंने ग़लत हरक़तें करने का दंभ भरा। क्या होता अगर वो महिलाएँ जाग उठतीं और और उनकी हरक़तों से पर्दा उठा देतीं तो, आज वो या तो कहीं मुँह छिपा रहे होते या अपने बचाव के लिए अपनी कवचरूपी पत्नी को आगे कर रहे होते।

हद है भई, जब सांसद स्तर के लोग ही इस तरह का मखौल सरेआम उड़ाएंगे तो #MeeToo जैसा अभियान तो धरा का धरा ही रह जाएगा और ऐसे अभियान तो कभी रफ़्तार पकड़ ही नहीं पाएँगे। ख़ैर, तमाम बातों का लब्बोलुआब फ़िलहाल तो यही रहा कि कैसे भी सही लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा ने अपनी ग़लत हरक़तों को एक मंच पर खुलेआम स्वीकारा तो सही, वो बात अलग है कि लोगों ने इसे हँसी का रास्ता दिखा दिया, जो एक गंभीर प्रश्न है?

माता-पिता को कोर्ट तक लेकर जाना चाहता है मुंबई का एक शख़्स, वजह- ‘मुझे पैदा क्यों किया?’

एक बार अमिताभ बच्चन ने अपनी नाक़ामयाबियों से परेशान होकर अपने पिता और कवि हरिवंश राय बच्चन से सवाल किया कि उन्होंने अमिताभ को क्यों पैदा किया? जिसे सुनने के बाद उनके पिता काफ़ी परेशान हुए, उन्हें समझ नहीं आया कि आख़िर अमिताभ की बात का वो किस तरह जवाब दें। लेकिन, फिर उन्होंने अमिताभ की इसी बात पर ‘नई लीक’ नाम से एक कविता लिखी।

उस कविता की आख़िर की कुछ लाइनें इस तरह थी, ‘जिंदगी और ज़माने की कशमकश पहले भी थी, आज भी है शायद ज़्यादा कल भी होगी, शायद और ज़्यादा…तुम ही नई लीक रखना, अपने बेटों से पूछकर उन्हें पैदा करना।’

‘नयी लीक’

हरिवंश बच्चन द्वारा लिखी गई यह कविता भले ही उन्होंने अमिताभ के सवाल पर लिखी हो। लेकिन इस कविता की प्रसांगिकता आज भी उतनी ही है। क्योंकि आज भी बच्चों ने अपने संघर्षों और नाक़ामयाबी को छुपाने के लिए नए-नए तर्कों को जन्म देना शुरू कर दिया है

जी हाँ, अभी तक आप सुनते आएँ होंगे कि लोग डिप्रेशन में जाने के बाद अक़्सर अपनी ज़िदगी को कोसते हैं। कुछ चुप रहना शुरू कर देते हैं तो कुछ अकेले रहना शुरू कर देते हैं। लेकिन क्या आपने कभी कोई ऐसा शख़्स देखा है जो बिन बात के ही अपने पैदा होने पर नाराज़ हो कि वो कोर्ट तक अपने माँ-बाप की शिक़ायत लेकर पहुँचने की सोचे।

अगर आपका जवाब नहीं है, तो मुंबई में रहने वाले (Raphael Samuel) के बारे में आपके लिए जानना बेहद ज़रूरी है। रैफेल एक एंटी नैटालिस्ट हैं। इनका कहना है कि वो अपने माता-पिता पर कोर्ट में मुक़दमा चलवाने की माँग करने की सोच रहे हैं क्योंकि उन्होंने बिना रैफेल की सहमति जाने उसे जन्म दिया।

बता दें एंटि नैटालिस्म विचारों की एक ऐसी धरातल है जहाँ तर्क दिया जाता है कि नैतिक रूप से लोगों को पैदा करना बेहद गलत है। इसके दिए जाने वाले तर्क में माना जाता है कि बच्चे के जन्म से न केवल उसकी मुसीबतें बढ़ती हैं बल्कि धरती के संसाधनों पर भी भार बढ़ता है। इसलिए, इंसानों को मेहरबानी करके बच्चे पैदा करने बंद कर देने चाहिए।

सैम्यूल ने फेसबुक पर लिखते हुए कहा है कि वो अपने माता-पिता को बहुत प्रेम करते हैं लेकिन वो उसे इस दुनिया में सिर्फ़ अपने सुख और खुशी के लिए लेकर आए हैं। हालाँकि इस पोस्ट को फेसबुक से डिलीट कर दिया गया है लेकिन एंटीनैटालिस्म से जुड़े बाकी के पोस्ट उनकी टाइमलाइन पर है? जिसमें उन्होंने सवाल किया है कि why must i suffer? Why must i work?

सोशल मीडिया पर सैम्यूल द्वारा किए जा रहे यह सवाल कई लोगों को मज़ाक जैसे भी लग रहे हैं और कई लोग इसे बेवकूफ़ी भी कह रहे हैं। लेकिन इस पर उनकी माँ द्वारा भी प्रतिक्रिया आई है। वो कहती हैं कि अगर उनका बेटा वाज़िब तर्क़ों के साथ कोर्ट में उनसे सवाल करेगा कि हम उसके पैदा होने से पहले उसकी सहमति कैसे जान सकते थे तो वो अपनी ग़लती को ज़रूर मान लेंगी।

धरती के प्रति अपनी फ़िक्र दिखाना एक बेहद जायज़ बात है। लेकिन, इसे आधार बनाते हुए जन-विरोधी हो जाना बिलकुल भी ठीक नहीं है। प्रजनन एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे दुनिया निरंतर आगे चलती रहती है। यह बेहद बेफकूफ़ाना तर्क़ है कि बिना मेरी मर्ज़ी के जाने मुझे जन्म क्यों दिया गया। जो व्यक्ति ख़ुद को एंटी नैटालिस्ट बताकर धरती की और उसके संसाधनों के प्रति फ़िक्र दिखा सकता है। उसे इतनी समझ नहीं होगी क्या कि जन्म से पहले किसी की मर्ज़ी के बारे में कैसे जाना जा सकता है?

इंटरनेट पर आई आज इस ख़बर को पढ़कर ऐसा लगा कि वाकई इंसान उसी लीक पर चलने की ठाने बैठा है, जहाँ पर इस तर्क़ पर ज़ोर दिया जाता है, कि जब कुछ कर न पाओ तो सवाल खड़े कर दो… आज रैफेल ने अपने माँ-बाप को लेकर ऐसी बात सोशल मीडिया पर शेयर की है कल को उनसे प्रभावित होकर चार बच्चे और कोर्ट का रास्ता अपना लेंगे। कुछ दिन बाद यह स्थिति आ जाएगी कि बच्चे अपनी नाक़ामयाबियों पर माँ-बाप को कोर्ट तक ले जाएँगे और अपराधियों की जगह सिर्फ़ माँ-बाप ही कठघरे में नज़र आएँगे।

तलाक़ क़ानून करेंगे ख़त्म; मोदी है डरपोक, नहीं करता डिबेट: कॉन्ग्रेस

मुस्लिम महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर बनाए गए तीन तलाक़ क़ानून को लेकर कॉन्ग्रेस की ओर से बड़ा बयान सामने आया है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने कहा कि अगर केंद्र में उनकी सरकार बनती है तो तीन तलाक़ क़ानून को ख़त्म कर दिया जाएगा। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में कॉन्ग्रेस अल्पसंख्यक सम्मेलन को संबोधित करते हुए राहुल ने राहुल गाँधी ने केंद्र की मोदी सरकार पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि अगर प्रधानमंत्री में हिम्मत है तो मुझसे बस 15 मिनट डिबेट करके दिखाएँ। लेकिन मैं जानता हूँ कि वह डरपोक हैं।

इसके अलावा अल्पसंख्यक मोर्चा सम्मेलन में महिला कॉन्ग्रेस अध्यक्ष और लोकसभा सांसद सुष्मिता देव ने भी तीन तलाक़ क़ानून को ख़त्म करने की बात कही है। सुष्मिता ने कहा कि अगर केंद्र में हमारी सरकार बनती है, तो हम तीन तलाक़ क़ानून को ख़त्म कर देंगे। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस एक बार में तीन तलाक़ देने के खिलाफ़ है, लेकिन इसके खिलाफ़ बने क़ानून का वह समर्थन नहीं करती।

बता दें कि इस दौरान भी राहुल गाँधी मौजूद रहे। कॉन्ग्रेस के इस बयान से यह बात स्पष्ट हो रही है कि वह मुस्लिम महिलाओं को इंसाफ़ दिलाने के उद्देश्य से बनाए गए तीन तलाक़ क़ानून के ख़िलाफ़ है।

बीते दिनों महिला को हलाला करने के लिए किया गया था मजबूर

उत्तर प्रदेश के बरेली से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। एक मुस्लिम महिला को उसके पति ने ‘तीन तलाक़’ देने के बाद हलाला करवाने पर मज़बूर किया। आरोपित ने अपनी पत्नी को अपने पिता (पीड़िता के ससुर) के साथ ज़बरन हलाला करवाया। पीड़िता की बहन ने अदालत में अर्ज़ी देकर न्याय की गुहार लगाई है। पीड़िता ने अपनी शिकायत में कहा:

“पहले मेरे शौहर ने मुझे तलाक़ दे दिया और दुबारा निकाह करने के लिए ससुर के साथ हलाला करवाया। अब वह फिर से तलाक़ देने के बाद देवर से हलाला कराने की ज़िद कर रहा है।”

बरेली के बानखाना निवासी पीड़ित महिला ने आला हजरत हेल्पिंग सोसायटी की अध्यक्ष निदा खान के साथ संयुक्त रूप से संवाददाता सम्मेलन करते हुए बताया कि वर्ष 2009 में उसका निकाह गढ़ी-चौकी निवासी वसीम से हुआ था। निकाह के 2 वर्ष बाद ही वसीम ने ‘तीन तलाक़’ देकर उसे घर से बाहर निकाल दिया। काफ़ी मिन्नतों के बाद वह फिर से पीड़िता को अपने घर में रखने को तैयार हुआ, लेकिन उसने एक शर्मनाक शर्त रख दी।

पीड़िता की बहन ने वसीम और उसके परिवार द्वारा किए गए अत्याचार के बारे में बताते हुए कहा:

“जब मेरी बहन ने ‘हलाला’ की प्रक्रिया से गुजरने से इनकार कर दिया, तो उसके ससुराल वालों ने उसे जबरन इंजेक्शन लगा कर, उसके ससुर के साथ हलाला की ‘रस्म’ पूरी करवाई। अगले 10 दिनों तक, बुजुर्ग व्यक्ति ने मेरी बहन के साथ लगातार बलात्कार किया और फिर उसे ‘तीन तलाक़’ दे दिया ताकि वह अपने पति से दोबारा शादी कर सके। लेकिन, जनवरी 2017 में, उसने फिर से मेरी बहन को तलाक़ दे दिया और फिर परिवार ने उसे उसके पति के छोटे भाई के साथ ‘हलाला’ से गुज़रने के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया।”

इतना ही नहीं, आरोपितों ने पीड़िता को ₹15 लाख लेकर मामला ख़त्म करने की भी पेशकश की। लेकिन, पीड़िता ने कहा की वह इंसाफ़ चाहती है और उसने रुपए लेने से इनकार कर दिया। उसने कहा कि वह दोषियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दिलाना चाहती है। अपनी बहन के घर रह रही पीड़िता ने कहा कि रोज़-रोज़ कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाना उसके वश की बात नहीं है।

योगी सरकार ने अल्पसंख्यक युवाओं को दिया तोहफ़ा, जानिए UP Budget से जुड़ी ख़ास बातें

उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार के वित्त मंत्री राजेश अग्रवाल ने विधानसभा में आम बजट पेश किया। सरकार की तरफ़ से बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री ने ₹4.28 लाख करोड़ का बजट पेश किया।

यूपी सरकार द्वारा पेश किए गए बजट का आकार पिछले साल की तुलना में लगभग 11.4% अधिक है। यूपी सरकार के मुताबिक़ यह अभी तक का सबसे बड़ा बजट है। इस बार के बजट में सरकार ने कृषि, शिक्षा, रोज़गार और गौ-रक्षा से जुड़े कई मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया गया। आइए जानते हैं योगी सरकार द्वारा पेश किए गए बजट की ख़ात बातें-

  • उत्तर प्रदेश सरकार ने अल्पसंख्यक समुदाय के छात्र व छात्राओं के छात्रवृत्ति योजना के लिए सरकार ने ₹942 करोड़ ख़र्च करने की घोषणा की है, जबकि अरबी और फ़ारसी मदरसों के आधुनिकरण के लिए ₹459 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं।
  • सरकार द्वारा पेश किए गए बजट में उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ में अवस्थापना सुविधाओं के लिए
    ₹125 करोड़ , अयोध्या में प्रमुख पर्यटन स्थलों के समेकित विकास हेतु ₹101 करोड़, गढ़मुक्तेश्वर के पर्यटक स्थलों की समेकित विकास के लिए 27 करोड़, पर्यटन नीति 2018 के क्रियान्वयन के लिए ₹70 करोड़ और पर्यटकों के लिए ₹50 करोड़ की व्यवस्था की गई है।
  • सरकार ने संरचनात्मक विकास के लिए भी सही से बजट उपलब्ध कराया है। योगी सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना शहरी के लिए ₹5156 करोड़, अमृत योजना के लिए ₹2200 करोड़, स्मार्ट सिटी मिशन योजना के लिए दो हजार करोड़ रुपए, स्वच्छ भारत मिशन शहरी योजना हेतु ₹1500 करोड़ , मुख्यमंत्री नगरी अल्प विकसित व मलिन बस्ती विकास के लिए
    ₹426 करोड़, पंडित दीनदयाल उपाध्याय आदर्श नगर पंचायत योजना के लिए ₹200 करोड़ के बजट की व्यवस्था की है।
  • राज्य के विकास में बिजली की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे में योगी सरकार ने अपने बजट में बिजली के लिए भी ₹29883.05 करोड़ ख़र्च करने की घोषणा की है, जो कि पिछले साल की तुलना में 54 फ़ीसदी ज़्यादा है।
  • उत्तर प्रदेश सरकार ने कृषि के आधुनिकीकरण पर भी ज़ोर दिया है। यही वजह है कि सरकार ने प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों के कम्प्यूटरीकरण हेतु ₹31 करोड़ की बजट व्यवस्था की है। किसानों को कम ब्याज़ दर पर फसली ऋण उपलब्ध कराने हेतु सब्सिडी योजना के तहत
    ₹200 करोड़ ख़र्च करने की बात कही है।
  • कृषि के क्षेत्र में सिंचाई की परियोजनाओं के विकास पर भी सरकार ने ज़ोर दिया है। बुंदेलखंड की 8 ज़रूरी सिंचाई परियोजनाओं, बाढ़ नियंत्रण और जल निकासी की अच्छी व्यवस्था के लिए
    ₹ 10938.19 करोड़ ख़र्च करने की बात सरकार ने कही है। यह बजट पिछली बार की तुलना में 54 फ़ीसदी ज़्यादा है।
  • उत्तर प्रदेश सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में भी पिछले साल की तुलना में ज़्यादा बजट का ऐलान किया है। यूपी बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा संचालित विद्यालयों में कक्षा 1 से 8 तक के छात्र छात्राओं को नि:शुल्क 1 जोड़ी जूते, 2 जोड़ी मोजे, एक स्वेटर उपलब्ध कराए जाने हेतु ₹300 करोड़, प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों के छात्र छात्राओं को नि;शुल्क यूनीफॉर्म वितरण हेतु ₹40करोड़, वन टांगिया ग्रामों में प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना हेतु ₹5 करोड़ की व्यवस्था की गई है। वित्तीय वर्ष 2019- 20 में स्कूल बैग वितरण हेतु ₹110 करोड़ की व्यवस्था योगी सरकार ने कर दी है।
  • आम आदमी बीमा योजना हेतु ₹10 करोड़ , ‘प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना’ हेतु
    ₹130 करोड़ 60 लाख तथा प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना के लिये ₹4 करोड़ 75 लाख ख़र्च करने की बात कही है।

BBC का फै़क्ट चेक या फोटो चेक? गंगा साफ़ हो रही है, लेकिन वो न्यूज़ रूम से नहीं दिखेगी

फ़ैक्ट चेक का जमाना है। सब खुद को पाक़-साफ़ दिखाना चाहते हैं, दूसरों की पोल-पट्टी खोलकर। दिक्कत तब होती है जब मीडिया के बड़े-बड़े मठाधीश करने ‘बैठते’ हैं फ़ैक्ट चेक और खोल बैठते हैं अपनी ही पोल-पट्टी! बैठते पर जोर इसलिए क्योंकि दिल्ली में बैठे-बैठे ये मठाधीश कर लेते हैं बनारस का फै़क्ट चेक!

मामला सोशल मीडिया पर शेयर हुई तस्वीरें हैं। विषय राजनीतिक है। जगह बनारस है। फ़ैक्ट चेक बीबीसी हिंदी ने किया है।

पहले वो फोटो ही देख ली जाए, जिसके आधार पर बीबीसी ने फै़क्ट चेक (असल में फोटो चेक) कर डाला।

बीबीसी की ‘फोटो चेक’ रिपोर्ट के अनुसार ऊपर की फोटो को दक्षिण भारत के कई सोशल मीडिया ग्रुप्स में शेयर किया गया। शेयर करने वालों ने यह दावा भी किया है कि बीजेपी ने गंगा सफ़ाई पर शानदार काम किया है जबकि यूपीए सरकार के दौरान इस नदी का हाल बुरा था। #5YearChallenge या #10YearChallenege हैशटैग के साथ इन दावों को चलाया गया। बीजेपी के कुछ नेताओं ने भी इसे अपने-अपने ढंग से शेयर किया।

फ़ेक का फैलाव

फे़क ख़बरें फैलती तेजी से हैं। बीबीसी ने अपनी ‘फोटो चेक’ रिपोर्ट में इस बात का सबूत भी दिया है। आँकड़ों के साथ कि किस ग्रुप से कितना शेयर हुआ यह फोटो। एक आँकड़ा यहाँ भी है – खब़र के शीर्षक में ही अगर झूठ हो तो वो कितनी बिकती है। नीचे रहा उसका सबूत।

क्लिकबेट शीर्षक से पेज़व्यू आपको भी खूब मिला होगा BBC

बात फ़ैक्ट चेक की

बीबीसी गंगा सफ़ाई की फै़क्ट चेक कर रही है या फोटो की, यह स्पष्ट नहीं। जरा इस वाक्य को पढ़िए – “वाराणसी शहर की जिस तस्वीर को ‘गंगा की सफ़ाई का सबूत’ बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट किया गया, वो ग़लत है” – इस वाक्य में तीन बातें छिपी हैं:

  • तस्वीर गलत है – तस्वीर ग़लत नहीं है बीबीसी! रिवर्स इमेज सर्च और फोटोग्राफर से बात के जरिए इसके खींचे जाने का साल आपने बता दिया है। तस्वीर से जुड़ा साल ग़लत है।
  • ‘गंगा की सफ़ाई का सबूत’ ग़लत है – लेकिन सिर्फ फोटो देखकर किसी सबूत को ग़लत या सही कैसे ठहराया जा सकता है? फिर आप में और सोशल मीडिया-वीरों में क्या अंतर रह जाएगा?
  • ग़लत है, तो सही तस्वीर क्या है? – यह आपने बताया ही नहीं। फ़ैक्ट चेक के नाम पर आप यह कहकर नहीं बच सकते कि ऐसी जानकारी लेख या ब्लॉग में। बच इसलिए नहीं सकते क्योंकि आपका शीर्षक भ्रामक है। और वेब के पाठक इसमें फंसते है, आर्टिकल का रीच बढ़ता है।

क्या होता है फैक्ट चेक

गंगा सफ़ाई पर बीजेपी नेताओं के दावों का ही अगर फै़क्ट चेक करना है तो आपको रिपोर्टिंग करनी चाहिए बीबीसी। जैसे अनुराग ने की। स्थानीय लोगों से लेकर अधिकारियों और तकनीक तक – हर पहलू पर रिपोर्टिंग के दौरान नज़र रखी। पढ़िए, मज़ा आएगा, ज्ञान तो ख़ैर मिलेगा ही।

ग्राउंड रिपोर्ट #1: मोदी सरकार के काम-काज के बारे में क्या सोचते हैं बनारसी लोग?

ग्राउंड रिपोर्ट #2: नमामि गंगे योजना से लौटी काशी की रौनक – सिर्फ अभी का नहीं, 2035 तक का है प्लान

ग्राउंड रिपोर्ट #3: दिल्ली की बीमार यमुना कैसे और क्यों प्रयागराज में दिखने लगी साफ?

दिल्ली के एसी ऑफिस में डेस्क पर बैठ कर और रिवर्स इमेज सर्च के सहारे ही अगर फै़क्ट चेक का धंधा चलाना है तो कृपया इसे फोटो चेक का नाम दीजिए। या फिर शीर्षक में “गंगा सफ़ाई पर बीजेपी नेताओं के दावे का सच: फ़ैक्ट चेक” मत लिखिए। स्पष्ट लिखिए – “गंगा सफ़ाई पर बीजेपी नेताओं द्वारा शेयर हुए फोटो 2019 के नहीं हैं: फोटो चेक”।

वो क्या है कि आप BBC हैं। मेरे बचपन-किशोरावस्था के उन 14 साल के प्यार का वास्ता (क्योंकि जहाँ मैं रहता था, वहाँ TV नहीं था इसलिए आपको या विविध भारती या ऑल इंडिया रेडियो ही सुन पाता था), पत्रकारिता को बचने दीजिए। इसे इतना मत बदबूदार बना डालिए कि एक समय लोग सोशल मीडिया पर ज्यादा भरोसा करने लगें और न्यूज़-मीडिया पर कम। विनती है, करबद्ध विनती!

छत्तीसगढ़ में STF और DRG को बड़ी कामयाबी 10 नक्सली आतंकी ढेर

छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में नक्सलियों के साथ एसटीएफ और डीआरजी के जवानों द्वारा की गई मुठभेड़ में 10 नक्सलियों के ढेर किया गया। ख़बरों की मानें तो इंद्रावती नदी के पास सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हुई, जिसमें नक्सलियों को मार गिराया गया। बता दें कि पुलिस ने मारे गए नक्सलियों के पास से 11 हथियार भी बरामद किए हैं।

बीजापुर के SP मोहित गर्ग ने मुठभेड़ की जानकारी देते हुए कहा कि जवानों और नक्सलियों के बीच काफ़ी समय तक मुठभेड़ हुई है, जिसमें दोनों ओर से फ़ायरिंग की गई। उन्होंने कहा कि विशेष कार्य बल (एसटीएफ) और जिला रिजर्व गार्ड (डीआरजी) की संयुक्त टीम नक्सलवाद विरोधी अभियान चला रही थी, जिसमें नक्सलियों को मार गिराया गाया है।

गर्ग ने बताया कि अभी तक नक्सलवादियों के 10 शव के साथ मौके से 11 हथियार बरामद किए गए हैं। उन्होंने कहा कि नक्सलियों का सर्च अभी अभियान अभी जारी है।