आख़िरकार, 17 सालों बाद दिवंगत पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के परिवार को न्याय मिला। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम (Gurmeet Ram Rahim) सहित सभी चारों आरोपितों को पत्रकार मर्डर केस में उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई है और सज़ा के साथ-साथ सभी दोषियों पर 50-50 हज़ार रुपए का ज़ुर्माना भी लगाया गया है।
पत्रकार रामचंद्र छत्रपति जिनकी 2002 में हत्या कर दी गई थी
अदालत में राम रहीम की पेशी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए सम्पन्न हुई थी क्योंकि उसे अदालत तक लाना पुलिस के लिए चुनौतियों भरा हो सकता था। पुलिस ने ऐसा करना तभी कर लिया था जब उसकी गिरफ़्तारी हुई थी। उस दौरान कई राज्यों में भड़की हिंसा के दौरान 38 लोग मारे गए थे और 250 से भी अधिक लोग घायल हुए थे। आज पूरी सुनवाई के दौरान राम रहीम जस्टिस जगदीप सिंह के सामने हाथ जोड़े खड़ा रहा।
बताया जाता है कि दो महिलाओं ने 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पत्र लिख कर राम रहीम के ख़िलाफ़ बलात्कार के आरोप लगाए थे और अपनी जान जाने के डर से नाम, पता नहीं लिखा था। पीएमओ (प्रधानमंत्री कार्यालय) ने इसे गंभीरता से लेते हुए सीबीआई को इसकी जाँच सौंप दी थी। पत्रकार छत्रपति ने इस गुमनाम चिट्ठी को अपने अख़बार ‘पूरा सच’ में छाप दिया और यही उनकी हत्या का कारण भी बना। राम रहीम के ख़िलाफ़ लिखने के लिए उसके गुर्गों ने छत्रपति को कई बार धमकियाँ भी दी थी।
हरियाणा के रहने वाले जगदीप सिंह मृदुभाषी हैं और जमीन से जुड़े हुए हैं। अतिरिक्त ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश रह चुके सिंह को 2018 में सीबीआई कोर्ट का जज नियुक्त किया गया था। इस से पहले साध्वी बलात्कार मामले में भी राम रहीम के ख़िलाफ़ इनके द्वारा ही फ़ैसला सुनाया गया था। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के वकील रह चुके जगदीप सिंह तब सुर्ख़ियों में आए थे जब उन्होंने सड़क दुर्घटना में घायल चार लोगों को समय पर अस्पताल पहुँचा कर उनकी जान बचाई थी।
फ़िलहाल 51 वर्षीय राम रहीम रोहतक के एक जेल में 20 साल कारावास की सज़ा काट रहा है। उस पर उसके दो महिला अनुयायियों के साथ बलात्कार करने का आरोप है। 2002 में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के आरोप में अदालत ने उसके सहित तीन अन्य लोगों को दोषी ठहराया था। सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए उस समय भी उसे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए ही अदालत में पेश किया गया था। आज उसकी सुनवाई से पहले ही पंचकूला अदालत परिसर से लेकर पूरे इलाक़े तक सुरक्षा काफी कड़ी कर दी गई थी।
देश के संविधान में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को एक तरह से अंतिम सत्य माना गया है। लेकिन जब अंतिम सत्य पर ही संदेह के साथ सवाल खड़ा किया जाने लगेगा तो इस देश का क्या होगा?
इस तरह के दुष्प्रचार से कोर्ट के सम्मान को भी धक्का लगेगा। लेकिन यह अफ़सोस की बात है कि प्रशांत भूषण जैसे वरिष्ठ वकील सर्वोच्च न्यायालय के फै़सले पर संदेह करते हुए बेबुनियादी सवाल उठाते रहे हैं।
कोर्ट में कईयों बार जजों द्वारा फ़टकार लगाए जाने के बावजूद प्रशांत भूषण के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं देखने को मिला है। कोर्ट में प्रशांत भूषण इस तरह व्यवहार क्यों करते हैं? इस सवाल का सबसे बेहतर जवाब में मुझे एक कहावत याद आती है कि बच्चे और बूढ़े एक जैसे होते हैं।
दरअसल 16 जनवरी को लोकपाल मामले में बहस के दौरान चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया ने प्रशांत भूषण को जमकर फटकार लगाई। चीफ जस्टिस ने प्रशांत भूषण नसीहत देते हुए चीजों को सकारात्मक तरीके से देखने की बात कही। लोकपाल मामले पर बहस के दौरान कोर्ट में जब प्रशांत भूषण ने सर्च कमिटी के उपर सवाल खड़ा किया तो चीफ़ जस्टिस ने तल्ख अंदाज में प्रशांत भूषण को ये जवाब दिया- “ऐसा लगता है आप जजों से भी ज्यादा जानते हैं।”
यह पहली बार नहीं हुआ जब कोर्ट में जजों से डाँट सुनने के बाद प्रशांत भूषण शांति से जाकर अपने सीट पर बैठ गए। ठीक उसी तरह जैसे डाँट पड़ने के बाद बच्चे शांत होकर घर के किसी कोने में दुबक जाते हैं।
इससे पहले भी नवंबर 2018 में जब राफ़ेल मामले पर कोर्ट में बहस चल रही थी, तो बीच में ही बच्चे की तरह बोलने के लिए खड़े होकर भूषण ने तीखी भाषा में जस्टिस से पूछा कि राफ़ेल की कीमत बताने से देश की सुरक्षा को आख़िर क्या नुकसान होगा?
प्रशांत भूषण के सवाल पूछने के इस अंदाज़ को देखकर सीजेआई ने चेतावनी देते हुए भूषण से कहा कि आपको जितना ज़रूरी हो, उतना ही बोलिए। सीजाआई के इस चेतावनी के बाद प्रशांत भूषण जाकर अपने सीट पर बैठ गए थे।
अपने संवैधानिक दायरे से बाहर जाकर कोर्ट के फैसले व न्यायपालिका के बारे में अनाप शनाप बयान देने की वजह से कई बार प्रशांत भूषण के ख़िलाफ़ कटेंप्ट ऑफ़ कोर्ट की याचिका भी दायर की गई है।
यही नहीं कोर्ट में प्रशांत भूषण के व्यवहार को देखते हुए वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने एक बार कहा था कि प्रशांत भूषण के ख़िलाफ़ अवमानना के केस चलना चाहिए। साल्वे ने अपने बयान में यह भी कहा था कि कोर्ट के वरिष्ठ जजों को भूषण को धक्के देकर कोर्ट से बाहर कर देना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल काउंसिल ब्राइबरी केस में प्रशांत भूषण के एनजीओ द्वारा दायर की गई याचिका को ख़ारिज करते हुए कहा था कि आपके ऊपर अवमानना का केस चलना चहिए। लेकिन कोर्ट अवमानना की केस नहीं चलाएगी क्योंकि आप इस लायक हैं ही नहीं। इसके बाद कोर्ट ने प्रशांत भूषण के एनजीओ पर झूठे मामले को हवा देने के लिए ₹25 लाख का जुर्माना लगाया था।
मोदी सरकार को लेकर शुरुआती समय से ही आलोचनाओं का हिस्सा बनाकर घेरा जाता रहा है, फिर चाहे वो देश के हित में ही क्यों न काम का रही हो। भारत में कुछ समय पहले तूल पकड़ने वाला रोहिंग्या लोगों से जुड़ा मामला भी इसी संगठित आलोचना का शिकार हो रहा है।
साल 2017 में अपने म्यांमार के दौरे के समय ही प्रधानमंत्री ने इस बात की घोषणा की थी कि वो रोहिंग्याओं के निर्वासन पर विचार कर रही है। इस बात पर विचार करने के दौरान ये नहीं तय किया गया था कि इन लोगों को म्यांमार भेजा जाएगा या फिर बांग्लादेश भेजा जाएगा, क्योंकि उस समय बांग्लादेश में पहले से ही लाखों की तादाद में रोहिंग्या शरणार्थी रह रहे थे और म्यांमार इन्हें स्वीकारने के लिए किसी भी हाल में तैयार नहीं था।
ऐसे में अब 2019 के शुरुआती महीने में निर्वासन के डर से क़रीब 1300 रोहिंग्या लोगों ने बांग्लादेश में पलायन किया है, जिसकी वजह से नई दिल्ली को और केंद्रीय सरकार को काफ़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। कई बुद्धिजीवियों ने मोदी सरकार द्वारा इस मामले पर विचार किए जाने को नकारात्मकता के साथ पेश करने का भी प्रयास किया है, अलज़लजीरा की वेबसाइट पर हाल ही में आई रिपोर्ट में SAHRDC के रवि नैय्यर ने बताया कि भारत में पिछले साल से रोहिंग्या वासियों के लिए रहना बेहद मुश्किल होता जा रहा है।
भारत मे लगातार औपचारिक गतिविधियों के नाम पर उनपर काग़ज़ी कार्रवाई से शोषण किया जा रहा है। उनका कहना है कि आँकड़ों के अनुसार जम्मू से त्रिपुरा और असम से पश्चिम बंगाल तक मे 200 से ज्यादा रोहिंग्या लोग ऐसे हैं जिन्हें पकड़ कर गिरफ़्तार किया गया है और सज़ा दी गई है। उनके अनुसार निर्वासन के डर से ही रोहिंग्या लोग बांग्लादेश की तरफ रुख़ कर रहे हैं, जहाँ पर पहले से ही लाखों के तादाद में शरणार्थी बसे हुए हैं।
अब सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत में अवैध ढंग से आए अप्रवासियों के लिए इतनी सहानुभूति दिखाने की उम्मीद आख़िर भारत से ही क्यों की जा रही है? जहाँ उत्तर-पूर्व में रह रहे 40 लाख अप्रवासियों के लिए पहले से ही नागरिकता क़ानून पर प्रक्रिया चालू हो, वहाँ पर और अलग से रोहिंग्या अप्रवासियों को देश मे रहने की अनुमति आख़िर क्यों दी जाए? 2017 के आँकड़ों के अनुसार भारत की जनसंख्या 1.339 बिलियन है, उस पर भी उनकी ज़रूरतों को न पूरा कर पाने का इल्ज़ाम अक्सर सरकार पर मढ़ दिया जाता है।
एक ओर तो भारत सरकार से नागरिकों के उत्थान की प्रक्रिया को और तेज़ करने की उम्मीद लगाई जाती है और वहीं दूसरी ही तरफ देशहित में सरकार के कड़े फ़ैसलों का विरोध भी जमकर किया जाता है। सवाल यह है कि भारत उन्हें क्यों रखे, किस आधार पर? बांग्लादेशियों के घुसपैठ से परेशान देश अभी भी नार्थ ईस्ट में स्थानीय नागरिकों से लगातार विरोध झेल रहा है। वहाँ एक तय योजना के अनुसार कुछ पार्टियों ने उन्हें वोट बैंक बनाने के लिए राशन और आधार कार्ड देकर बस्तियों में बसा दिया था, अब एक सरकार इन ग़ैरक़ानूनी लोगों को बाहर क्यों न करे?
बता दें कि भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रोहिंग्याओं को अवैध अप्रवासी बताते हुए उन्हें देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा बताया था। इस बात के पीछे सरकार का ये तर्क था कि म्यांमार के रोहिंग्या लोगों को भारत देश में रहने की अनुमति देने से हमारे अपने नागरिकों के हित काफी प्रभावित होंगे और देश में तनाव भी पैदा होगा।
इस मामले पर गृह मंत्रालय के अधिकारी मुकेश मित्तल ने अदालत को सौंपे गए जवाब में कहा था कि अदालत द्वारा सरकार को देश के व्यापक हितों में निर्णय लेने की अनुमति दी जानी चाहिए। उनका मत था कि कुछ रोहिंग्या, आंतकवादी समूहों से जुड़े हैं, जो जम्मू, दिल्ली, हैदराबाद और मेवात क्षेत्र में ज्यादा एक्टिव है, इन क्षेत्रों में इन लोगों की पहचान भी की गई है। इस मामले पर सरकार ने आशंका जताई थी कि कट्टरपंथी रोहिंग्या भारत में बौद्धों के ख़िलाफ़ भी हिंसा फैला सकते हैं।
ऐसी स्थिति में जब सरकार को रोहिंग्या घुसपैठियों पर संदेह हो, वह उन्हें भारत में रहने की अनुमति कैसे दे सकती है? क्या किसी और देश से इस प्रकार की उम्मीद की जा सकती है कि जहाँ आए दिन आतंकी हमलों की धमकी दी जा रही हो और फिर भी वह अपनी तरफ से कदम उठाने में सिर्फ इसलिए रुके क्योंकि राष्ट्रीय स्तर के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनके फ़ैसलों की आलोचना की जा रही है।
भारतीय सेना के लिए साल 2018 उपलब्धियों से भरा रहा। टाइम्स नाउ के ट्विटर हैंडल से एक वीडियो शेयर किया गया है। इस वीडियो के माध्यम से उत्तरी सैन्य कमांडर रनबीर सिंह ने एक समारोह के आयोजन के दौरान पत्रकारों से मुख़ातिब होते हुए जानकारी दी कि साल 2018 भारतीय सेना के लिए उपलब्धियों भरा रहा क्योंकि पिछले साल हमारी सेना ने 250 आतंकवादियों को मार गिराया, 54 आतंकियों को ज़िंदा पकड़ा गया और 4 आतंकियों नें आत्मसमर्पण किया। आतंकवाद पर विराम लगाती यह सभी भारतीय गतिविधियाँ हमारी सेना के अदम्य साहस और क्षमता का परिचय है।
इसके अलावा उन्होंने कहा कि जो आतंकवादी हमारे देश में घुसपैठ की कोशिश करते थे और देश की जनता को डराने के लिए आतंक फैलाने की कोशिश करते थे, उनके नापाक इरादों को हमने पूरी तरह से तहस-नहस किया है।
2018 was a great year for armed forces. We caught 54 terrorists alive: Lt Gen Ranbir Singh, Northern Army Commander #OmarVsArmypic.twitter.com/mxvqb2lCJt
देश की सरहद से जुड़ी इस जानकारी
को साझा करते हुए कमांडर रनबीर सिंह ने पाकिस्तान की उन हरक़तों का भी ज़िक्र किया
जिसका मुँहतोड़ जवाब भारत की ओर से दिया गया। जानकारी के मुताबिक यह समारोह जम्मू
के पुंछ में आयोजित किया गया था।
आज भारतीय सीमा पर जो हालात हैं उसमें सेना के जवानों के बलिदान का भी योगदान है जिसे भुलाया नहीं जा सकता। इसके अलावा कमांडर सिंह ने बीते दो दिन पहले हुई पाकिस्तान की ओर से हुई आतंकी गतिविधि का भी ज़िक्र किया जिसमें भारतीय जवानों द्वारा 5 पाक सैनिकों को मार गिराया गया था।
सरहद पर आतंकी गतिविधियों पर विराम लगाने पर कमांडर सिंह ने कहा कि वर्ष 2018 सुरक्षाकर्मियों और भारतीय सेना के लिए बेहद शानदार रहा है। अपनी बात में उन्होंने पाकिस्तान को चेताने की भी भरपूर कोशिश की कि अब भारत पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देगा और आगे भी पाक हरक़तों को सबक सिखाते रहने की चेतावनी भी दी।
अरूण जेटली इन दिनों इलाज के लिए अमेरिका गए हुए हैं। अमेरिका में गंभीर बीमारी के ईलाज के दौरान भी जेटली राजनीतिक रूप से बेहद सक्रिय हैं। अमेरिका से ही अरूण जेटली ने विपक्ष पर ब्लॉग वार किया है। अपने ब्लॉग में जेटली ने लिखा, “सकारात्मक मानसिकता वाले लोगों से ही कोई राष्ट्र आगे बढ़ता है। बात-बात पर विरोध करने वालों से कोई राष्ट्र आगे नहीं बढ़ता है।”
इसके आलावा अपने ब्लॉग में किसी का नाम लिए बगैर जेटली ने लिखा है कि देश के पॉलिटिकल सिस्टम में कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनको लगता है, वो पैदा ही देश में राज करने के लिए हुए हैं।
अपने ब्लॉग के ज़रिए जेटली ने विरोधी मानसिकता वाले लोगों पर लोकतंत्र को बर्बाद करने का आरोप भी लगाया। अरूण जेटली ने भले ही अपने ब्लॉग में राहुल गाँधी या कॉन्ग्रेस पार्टी का नाम नहीं लिखा हो, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से जेटली ने अपने ब्लॉग के ज़रिए विपक्ष पर ही हमला किया है।
यहीं नहीं इस ब्लॉग के ज़रिए जेटली ने लेफ़्ट या अल्ट्रा लेफ़्ट विचारधारा से प्रभावित लोगों के बारे में लिखा कि यह लोग भाजपा सरकार के किसी अच्छे काम को भी स्वीकारना नहीं चाहते हैं। इसी तरह कुछ लोगों का समूह है जो सिर्फ सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार करने में लगे हुए हैं।
जब संसद में जेटली ने विपक्ष को दिया करारा जवाब
पिछले दिनों संसद की कार्यवाही के दौरान देश के वित्त मंत्री अरुण जेटली पूरी रौ में दिखे थे। राफेल मुद्दे पर चर्चा के दौरान उन्होंने राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस के हर एक आरोपों और सवालों का जवाब तो दिया ही था, साथ ही विपक्षी पार्टी पर करारा हमला बोला था।
राफेल सौदे में विमानों की खरीद से लेकर ऑफ़सेट पार्टनर चुनने और जेपीसी की माँग तक, जेटली ने हर एक मुद्दे पर कई बातों को स्पष्ट किया और साथ ही कॉन्ग्रेस पर पलटवार भी करते रहे। पूरी बहस के दौरान कॉन्ग्रेस के सांसद कागज़ के हवाई जहाज उड़ाते रहे जिस से लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन काफी नाराज़ दिखी थी।
जब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी केंद्र सरकार पर आरोपों की झड़ी लगा रहे थे तब श्रीमती महाजन ने उन्हें टोकते हुए अनिल अम्बानी का नाम न लेने की सलाह दी और कहा कि जो सदन में नहीं हैं उनका नाम न लें।
कॉन्ग्रेस द्वारा राफेल की जांच के लिए जेपीसी के गठन की मांग को ठुकराते हुए जेटली ने कहा था:
“कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें स्वभाविक रूप से सच्चाई नापसंद होती है। उन्हें सिर्फ पैसे का गणित समझ में आता है, देश की सुरक्षा का नहीं। जेपीसी में संयुक्त संसदीय समिति नहीं हो सकती है, यह नीतिगत विषय नहीं है। यह मामला सौदे के सही होने के संबंध में है। उच्चतम न्यायलय में यह सही साबित हुआ है।”
कॉन्ग्रेस ने किसानों की कर्ज़ माफ़ी के अपने चुनावी जुमले को जनता के बीच जमकर भुनाया, चुनाव से पहले भी और चुनाव के बाद भी। अब इसे कॉन्ग्रेस का चुनावी पैतरा कह लीजिए या फिर एक सोची-समझी रणनीति। इस रणनीति के तहत कॉन्ग्रेस ने भले ही तीन राज्यों (राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़) की सत्ता अपने हाथों ले ली हो, लेकिन उसकी असलियत अब धीरे-धीरे जगजाहिर हो रही है।
हाल ही में राजस्थान में फ़र्ज़ी कर्ज़ माफ़ी के आँकड़े सामने आए थे। जिससे यह साफ़ हो गया था कि कॉन्ग्रेस पार्टी का कर्ज़ माफ़ी का झूठ पकड़ा गया। जारी की गई सूची में उन किसानों के नाम शामिल थे जिन्होंने कभी बैंक से लोन लिया ही नहीं था।
ऐसा ही एक मामला मध्यप्रदेश सरकार में भी देखने को मिला है जिसका असर कॉन्ग्रेस सरकार पर यक़ीनन देखने को मिलेगा। ख़बरों के मुताबिक मध्यप्रदेश में कर्ज़ माफ़ी की घोषणा के बाद वहाँ के किसानों ने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि जब कर्ज़ लिया ही नहीं तो माफ़ी कैसी।
मध्यप्रदेश के ग्वालियर में किसानों का कर्ज़ माफ़ी की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही विवादों में छा गई है। दरअसल हुआ यूँ कि कर्ज़ माफ़ी के लिए जब समितियों की तरफ से पंचायत पर कर्ज़दारों की सूची लिस्ट जारी की तो उनमें जिन किसानों के नाम शामिल थे, उन्होंने ऐसा कोई कर्ज़ लिया ही नहीं था जिसकी माफ़ी से वे ख़ुश हो सकें।
इसके बाद उन किसानों ने ज़िले की सहकारी केंद्रीय बैंक की शाखा व समितियों पर जाकर कर्ज़ लेने संबंधी आपत्ति दर्ज़ कराई, साथ ही इस बात पर भी ज़ोर दिया कि जब उन्होंने बैंक से कोई कर्ज़ ही नहीं लिया तो फिर उनका नाम ऐसी किसी सूची में कैसे शामिल हो सकता है, जिसके लिए कर्ज़ माफ़ी का प्रावधान किया जा रहा है। बता दें कि किसानों को फसल के लिए ऋण साख सहकारी समीतियों द्वारा ही दिया जाता है।
जानकारी के मुताबिक़, ज़िला सहकारी बैंक की चीनौर शाखा उर्वा सोसायटी का घोटाला सबसे अधिक चर्चित रहा। क़रीब 1,143 किसानों के नाम फ़र्ज़ी ऋण वितरित किया गया जिससे बैंक को लगभग साढ़े पांच करोड़ रुपए का चूना लगा। इस संबंध में जब पूर्व विधायक बृजेंद्र तिवारी ने एक किसान की जाँच कराई तो पता चला कि ऐसे 300 किसानों के पते ही फर्ज़ी थे। बाक़ी किसानों के पास जाकर पाया कि उन्होंने किसान संबंधी कोई कर्ज़ लिया ही नहीं।
ऐसे में यही सवाल उठता है कि कर्ज़ माफ़ी से जुड़ा यह विवाद अभी और कितने फ़र्ज़ी घोटाले को सामने लाएगा। यह देखना तो फ़िलहाल बाक़ी है, लेकिन उम्मीद यह की जा सकती है कि जल्द ही इस तरह के कर्ज़ माफ़ी के सभी प्रकरणों का जल्द ही पर्दाफ़ाश होगा।
गुरुवार को NIA ने उत्तर प्रदेश और पंजाब में सात स्थानों पर छापेमारी की। एजेंसी को शक था कि जहाँ रेड की गई उन स्थानों का लिंक ISIS के आतंकी मॉड्यूल से हो सकता है। कुछ दिन पहले ही एजेंसी ने हापुड़ से 24 वर्षीय मोहम्मद अबसार को गिरफ्तार किया था।
NIA ने कहा कि यह जाँच हरकत-उल-हरब-ए-इस्लाम नामक आतंकी संगठन के गिरफ्तार आतंकियों से पूछताछ के बाद की गई। एजेंसी का मानना है कि यह संगठन ISIS से प्रेरित है।
आपको याद होना चाहिए कि 26 दिसम्बर को एक बड़ी सफलता हासिल करते हुए एनआईए ने आतंकी संगठन आईएस से जुड़े एक रैकेट का पर्दाफाश कर दस लोगों को दिल्ली और यूपी से गिरफ्तार किया था। गिरफ्तार आतंकियों में एक मौलवी भी शामिल था। इस छापेमारी में बड़ी तादाद में गोला-बारूद और सिम कार्ड्स जब्त किये गए थे। ये सभी जगह-जगह बम विस्फोट और बड़े नेताओं को निशाना बनाने की तैयारी कर रहे थे। इस सफल ऑपरेशन के बाद एनआईए ने बयान देते हुए कहा था:
“10 संदिग्ध आतंकियों को गिरफ्तार किया गया है। वो सभी आतंकी हमले की साजिश रचने के उन्नत चरण में थे। जो चीजें जब्त की है उसमे देश में बने राकेट लांचर और 12 पिस्तौल शामिल हैं। उनकी योजना 100 से ज्यादा बम तैयार करने की थी जिसका आतंकी हमलों में इस्तेमाल किया जा सके।”
‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ या फिर Freedom Of Expression (FOE) एक ऐसा अस्त्र बन गया है, जिसका इस्तेमाल कश्मीर के अलगाववादी कर रहे हैं, वर्जिन लड़कियों को सीलबंद बोतल बताने वाले कर रहे हैं, भारत के टुकड़े होने का नारा लगाने वाले कर रहे हैं और हिन्दू देवी-देवताओं पर अश्लील फ़िल्म बनाने वाले कर रहे हैं। इस ज़मात ने इसे एक ऐसे हथियार के तौर पर प्रयोग करना सीख लिया है जिस से वो अपने साथ-साथ अपने देश का भी नुकसान कर रहे हैं। अब इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने किसी के मरने की दुआ करने को भी FOE से जोड़ा है।
इस गैंग की असंवेदनशीलता और मानसिक बीमारी के बारे में जानना हो तो उन्होंने कई बार इसे प्रदर्शित किया है। अगर हम उन सब की बात करने लगें तो ये ‘शेष सहस मुख सकहि न गाई’ वाली कहानी हो जाएगी, इसीलिए हमारा फ़ोकस यहाँ ताजा मानसिक रोगी स्तुति मिश्रा पर ही होगा।
The Quint की पत्रकार स्तुति मिश्रा ने अगर भाजपाध्यक्ष अमित शाह का मज़ाक बनाया होता तो शायद चल जाता। अगर उन्होंने अमित शाह की राजनीति की आलोचना की होती तो वह भी स्वीकार्य था। लेकिन उन्होंने अमित शाह की बीमारी का सिर्फ़ मजाक ही नहीं बनाया, अपितु उनके मरने की दुआ भी माँगी है। इस से पहले कि हम FOE के इन तथाकथित ठेकेदारों की मानसिक बीमारी का विश्लेषण करें, आइए एक नज़र पूरे घटनाक्रम पर डालते हैं और समझते हैं कि आख़िर हुआ क्या?
बुधवार (जनवरी 16, 2019) को अमित शाह ने एक ट्वीट के माध्यम से अपनी बीमारी की जानकारी दी। भाजपा अध्यक्ष अभी स्वाइन फ़्लू से जूझ रहे हैं और AIIMS में उनका उपचार चल रहा है। उन्होंने अपने ट्वीट में लोगों से प्रेम और शुभकामनाओं की अपेक्षा करते हुए ईश्वर को भी याद किया।
मुझे स्वाइन फ्लू हुआ है, जिसका उपचार चल रहा है। ईश्वर की कृपा, आप सभी के प्रेम और शुभकामनाओं से शीघ्र ही स्वस्थ हो जाऊंगा।
इस सरल और सौम्य भाषा पर भी जो ज़हर की उलटी करे- वो लिबरल। असंवेदनशीलता की सारी हदें पार करते हुए जनता द्वारा चुने गए राजनेता के मरने की कामना करे- वो लिबरल। वैचारिक मतभेद के नाम पर राष्ट्रद्रोह पर उतर आए- वो लिबरल। और इसी लिबरलपना का नया मानदंड स्थापित किया है The Quint की पत्रकार स्तुति मिश्रा ने। उन्होंने अमित शाह की बीमारी पर चुटकी लेते हुए कहा:
“लोग स्वाइन फ़्लू होने से मर जाते हैं, है ना?“
The Quint के पत्रकार का असंवेदनशील ट्वीट
ये सवाल नहीं है। ये कटाक्ष भी नहीं है। ये मज़ाक तो निश्चित ही नहीं है। ये मानसिक असंतुलन की निशानी है। ये एक ऐसी बीमारी की निशानी है जिसका उपचार किसी अस्पताल या डॉक्टर के पास नही है। स्तुति मिश्रा महिला हैं, पत्रकार हैं, ट्विटर पर उनके हज़ारों फॉलोवर्स हैं- इसका अर्थ ये हुआ कि सार्वजनिक तौर पर उनसे एक ऐसे व्यवहार की अपेक्षा की जाती है जिस से दूसरे भी कुछ सीख सकें। लेकिन उन्होंने एक बीमारी को लेकर दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पार्टी के अध्यक्ष के मरने की कामना की। क्या स्तुति मिश्रा और उनके गैंग के लोग लोकतंत्र का अर्थ भी समझते हैं?
क़रीब नौ करोड़ सदस्यों वाली पार्टी का जो मुखिया है- उसका सम्मान करना है लोकतंत्र। अपने विचारों को दूसरों पर जबरदस्ती थोपने की बजाए अपने राजनीतिक और वैचारिक प्रतिद्वंदियों के विचारों का सम्मान करना है लोकतंत्र। जिसने सत्ताधारी पार्टी को वोट भी न दिया हो उसके भी भलाई के लिए काम करना है लोकतंत्र। लेकिन स्तुति और उनके गैंग को लोकतंत्र की समझ कहाँ? अरे, कम से कम अमित शाह की मरने की दुआ कर ही रहीं हैं तो अपने घर में करें, अपने ख़ुदा से करें। सार्वजनिक तौर पर अपनी घिनौनी सोच, बीमार मानसिकता और घोर असंवेदनशीलता का प्रदर्शन करने से मिलता क्या है इन्हें? पब्लिसिटी?
अगर इस गैंग को पब्लिसिटी ही पानी है तो उनसे अच्छे तो ओम प्रकाश मिश्रा और ढिनचक पूजा हैं जिन्होंने उलटे-सीधे गाने गा कर करोड़ों व्यूज़ बटोरें और पब्लिसिटी पाई लेकिन स्तुति की तरह किसी बीमारी का मज़ाक नहीं उड़ाया, किसी के मरने की कामना नहीं की। कल ही एक ख़बर आई थी जिस में कहा गया था कि अकेले राजस्थान में इस साल स्वाइन फ़्लू के हजार से अधिक केस आ चुके हैं, क्या स्तुति तब भी यही सोचेंगी कि स्वाइन फ़्लू से तो लोग मर जाते हैं न? तो फिर क्या राजस्थान के हज़ार लोग मर जाएँ स्तुति और उनके गैंग को खुश करने के लिए?
पूरे भारत में स्वाइन फ़्लू के सात हज़ार के क़रीब केस आ चुके हैं। क्या स्तुति की क्षुधा तब बुझेगी जब सारे मारे जाएँ? सात हजार मौतों से स्तुति की भूख-प्यास शांत होगी या उनकी मानसिक रोग में सुधार आएगा? उनका मानना है कि स्वाइन फ़्लू में लोगों को मरना ही चाहिए, तो क्या कभी उनके अपने परिवार में किसी को ये बीमारी हो जाए (हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि ऐसा कभी न हो), तो भी क्या स्तुति तब भी यही सोचेंगी कि स्वाइन फ़्लू से तो लोग मर जाते हैं न?
बात फिर रह-सह कर वहीं आ जाती है- अमित शाह की बीमारी ठीक हो जाएगी क्योंकि उनकी पार्टी के करोड़ों लोगों के साथ-साथ देश के अन्य लोगों की दुआएँ भी उनके साथ है, सिवाए स्तुति गैंग के मानसिक रोगियों के। जमानत पर बाहर सोनिया गाँधी और भ्रष्टाचार की सजा भुगत रहे लालू की भी अच्छी स्वास्थ्य की कामना करते हुए, हम भारत सरकार से यह अनुरोध करेंगे कि शारीरिक रोगियों के साथ-साथ स्तुति जैसे मानसिक रोगियों के लिए भी कोई अस्पताल खोला जाए ताकि उनका सही उपचार हो सके। न हो सके तो कम से कम CIP, काँके (रांची) में ही इनके लिए एक अलग सेल की व्यवस्था की जाए।
असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने भोगाली बिहु नाम से आयोजित होने वाले एक त्योहार के दौरान कहा कि उनकी सरकार राज्य की जनता के समुदाय, जमीन और आधार की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। इस कार्यक्रम के दौरान अपने बयान में मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि आम लोगों की सुरक्षा से किसी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा।
उन्होंने कहा, “मिट्टी के लाल होने के नाते लोगों को आश्वस्त करता हूँ कि लोगों को डरने की कोई ज़रूरत नहीं है।” जानकारी के लिए बता दें कि घुसपैठियों को देश से बाहर करने के लिए संसद में भाजपा सरकार द्वारा लाए गए नागरिकता संशोधन बिल के ख़िलाफ़ कई सारे समाजिक संगठन असम में विरोध कर रहे हैं।
नागरिकता बिल 2016 क्या है?
2016 में नागरिकता अधिनियम 1955 में बदलाव किया गया है। इस विधेयक का नाम नागरिकता अधिनियम 2016 दिया गया है। इस बिल के मुताबिक भारत के पड़ोसी देश अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैन, पारसियों और ईसाइयों को बिना वैध दस्तावेज के भारतीय नागरिकता देने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके साथ ही 24 मार्च 1971 के बाद देश में प्रवेश करने वाले घुसपैठियों को देश से बाहर कर दिया जाएगा। इस कानून को बनाने का मुख्य उद्देश्य यह है कि बिना सरकारी वैध कागज के कोई पड़ोसी मुल्क के लोग भारत में नहीं रह सकते हैं।
विवाद की वजह
सदन में इस बिल को पास होते ही एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स) अपने आप ही प्रभावहीन हो जाएगा। कांग्रेस ने इस बिल को 1985 के असम समझौते के ख़िलाफ़ बताकर ख़ारिज किया है। इस समय एनआरसी बनने की प्रक्रिया जारी है। ऐसे में यदि सदन में यह बिल पास हो जाता है, तो देश के सुरक्षा के ख्याल से बेहतर होगा।
आम चुनाव जल्द ही आने वाले हैं और जो पहली बार वोट देंगे उन्हें वोटर्स लिस्ट में अपना नाम दर्ज़ कराना होता है। अगर वोटर्स लिस्ट में आपका नाम नहीं है तो आप मतदान में हिस्सा नहीं ले सकते। अगर आप किसी दूसरे शहर में शिफ्ट हो गए हैं, तब भी आपको वहाँ की वोटर्स सूची में अपना नाम दर्ज़ कराना पड़ेगा ताकि आप वहाँ मतदान कर सकें। सबसे ज्यादा ख़ुशी की बात तो यह है कि अब आपको इस कार्य के लिए सरकारी दफ़्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। अब आप अपने घर में बैठे-बैठे ये प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं।
डिजिटल इंडिया के सपने को साकार करने के क्रम में राष्ट्रीय मतदाता सेवा पोर्टल (NSVP) की वेबसाइट पर जाकर आप वोटर्स लिस्ट में अपना नाम जोड़ने या उसमे बदलाव करने की प्रक्रिया ऑनलाइन पूरी कर सकते हैं। इसकी प्रक्रिया बहुत ही सरल है और आप इसका इस्तेमाल कर वोटर्स लिस्ट में अपना नाम जोड़ सकते हैं ताकि आप भी अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें। नीचे हम आपको इसकी पूरी प्रक्रिया बिलकुल ही सरल शब्दों में समझने जा रहे हैं। बीएस हर एक स्टेप को पूरा करते जाएँ आपका नाम मतदाता सूची में होगा।
रजिस्टर्ड वोटर्स के लिए
स्टेप 1– NSVP (National Voters’ Service Portal) की वेबसाइट पर जाऍं (https://www.nvsp.in/)
NSVP का होमपेज आपको कुछ तरह का दिखेगा:
NSVP का होमपेज
स्टेप 2– वोटर्स लिस्ट में अपना नाम चेक करें।
बायीं तरफ दिख रहे सर्च आइकॉन पर क्लिक करें।
पहले से ही वोटर्स लिस्ट में है तो आप वेबसाइट के होमपेज में जाकर ऊपर हाईलाइट किए गए ब्लॉक में क्लिक करें। सर्च वाले आइकॉन पर क्लिक करते ही एक दूसरा पेज खुल जाएगा जो कुछ इस तरह का होगा:
सर्च पर क्लिक करने के बाद यह पेज खुलेगा।
जैसा कि आप ऊपर देख सकते हैं, आप अपना नाम, जन्मतिथि, पिता का नाम, राज्य, जिला इत्यादि विवरण दे कर अपना एपिक (Electoral Photo ID Card) नंबर प्राप्त कर सकते हैं। साथ ही पोलिंग स्टेशन सहित अन्य जानकारियाँ भी आपको मिल जाएगी।
अगर आपका EPIC नंबर आपके पास है तब आप सीधे उसे नीचे दिखाए गए बॉक्स में दर्ज करें और बाकी विवरण आपके सामने खुल जाएगा:
अपना EPIC नंबर दर्ज़ यहाँ करें।
अगर आप पहली बार वोट डालने जा रहे हैं या अपने निर्वाचन क्षेत्र में बदलाव करना चाहते हैं
स्टेप 3– अगर अआप पहली बार मतदान करने जा रहे हैं या फिर आपको आने निर्वाचन-क्षेत्र में बदलाव करना है तो आप नीचे हाईलाइट किए गए ब्लॉक पर क्लिक करें:
न्यू वोटर रजिस्ट्रेशन
स्टेप 3.1– अपनी भाषा चुनें:
अपनी भाषा चुनें।
अभी NSVP की वेबसाइट पर वोटर रजिस्ट्रेशन फॉर्म तीन भाषाओं में उपलब्ध है- हिंदी, अंग्रेजी और मलयालम। आप जिस भी भाषा को चुनेंगे, उसी भाषा में फॉर्म आपके सामने खुलेगा।
स्टेप 3.2– अगर आप पहली बार वोट करने जाए रहे हैं या अपना निर्वाचन क्षेत्र में बदलाव करना चाहते हैं तो उचित रेडियो बटन चुनें।
डिफ़ॉल्ट के तौर पर यहाँ पहली बार वोटिंग वाला फॉर्म ही खुला रहता है, इसीलिए आपको कुछ और करने की जरूरत नहीं है और आप फॉर्म में विवरण भरा ज़ारी रख सकते हैं। अगर आप निर्वाचन-क्षेत्र में बदलाव करना चाहते हैं तो नीचे दिखाए गए विकल्प पर क्लिक करें:
अगर आप अपने निर्वाचन-क्षेत्र में बदलाव करना चाहते हैं।
स्टेप 3.3– अपने ज़रूरी विवरण डालें।
ज़रूरी विवरण जो माँगे जाते हैं वो हैं- नाम, सम्बन्धी के नाम, सम्बन्धी के साथ आपका रिश्ता, जन्मतिथि और लिंग। आप जो भी विवरण डालेंगे उसे दाहिनी तरफ़ हिंदी भाषा में दिखाया जाएगा। विवरण भर कर आगे बढ़ते समय यह जाँच लें कि हिंदी में सारे विवरण सही तरीके से लिखे गए हैं।
वोटर रजिस्ट्रेशन फ़ॉर्म
ऊपर दिखे गए फ़ॉर्म का अलावा आपसे आपका स्थाई पता भी माँगा जाएगा और साथ ही आपके स्थायी पते का विवरण भी माँगा जाएगा। दोनों को सही-सही भरें।
अपना पता दर्ज़ करें।
स्टेप 3.4– वैकल्पिक विवरण: अगर आप दिव्यांग हैं तो यहाँ उसकी जानकारी दे सकते हैं। साथ ही आप अपना ईमेल और फोन नंबर दर्ज़ कर सकते हैं ताकि आपने एप्लीकेशन फॉर्म की स्थिति के बारे में आपको अपडेट मिलता रहे।
अपना ईमेल और फोन नंबर दर्ज़ करें।
स्टेप 3.5– अपने डॉक्युमेंट्स अपलोड करें:
अब आपसे कुछ जरूरी कागज़ात माँगे जाएंगे जिसे आपको डिजिटल रूप में अपलोड करना है। यहाँ आपके वेरिफिकेशन के लिए ये विवरण लिया जाता है। यहाँ आपसे अपनी फोटो, एज प्रूफ, एड्रेस प्रूफ इत्यादि से सम्बंधित डॉक्युमेंट्स अपलोड करने को कहा जाएगा। कृपया फॉर्म भरना शुरू करने से पहले ही अपने फोटो और डॉक्युमेंट्स की स्कैन की हुई कॉपी को अपने कंप्यूटर में सेव कर लें ताकि आप उन्हें तुरंत अपलोड कर सकें।
यहाँ अपने डाक्यूमेंट्स अपलोड करें।
कृपया Choose File वाले ऑप्शन पर क्लिक करें जिसके बाद आप डॉक्यूमेंट अपलोड कर सकते हैं। इसके बाद एक डायलाग बॉक्स खुलेगा जिसके द्वारा आप अपने कंप्यूटर के उस फोल्डर में जा सकते हैं जहाँ अपनी फोटो और अपने डाक्यूमेंट्स सेव कर रखे हैं। यहाँ डॉक्यूमेंट के प्रकार (Type Of Document) का भी ध्यान रखें जो आपको दाहिनी तरफ़ के ड्राप डाउन मेनू में मिलेगा। इसमें जिस प्रकार के डाक्यूमेंट्स दिखे गए हैं, आपको उन्ही में से किसी एक को अपलोड करना है।
इसमें जन्म प्रमाण पत्र, पाँचवीं, आठवीं या दसवीं कक्षा के अंकपत्र, भारतीय पासपोर्ट, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, आधार कार्ड इत्यादि को अपने एज प्रूफ के रूप में अपलोड कर सकते हैं। एड्रेस प्रूफ के रूप में आप पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस, बैंक/किसान/डाकघर का पासबुक, राशन कार्ड, रेंटएग्रीमेंट, टैक्स असेसमेंट आर्डर, पानी/बिजली/टेलीफोन/गैस का बिल या फिर भारतीय डाक द्वारा प्राप्त पोस्ट अपलोड कर सकते हैं।
स्टेप 3.6– Declaration (पहली बार मत डालने वालों के लिए)
ये अंतिम ब्लॉक है जिसमे आपके द्वारा डाले गए सारे विवरण की पुष्टि की जाएगी। इसके बाद आप सबमिट बटन पर क्लिक कर सकते हैं।
Declaration वाले सेक्शन को भरें।
स्टेप 3.6– Declaration (अपना निर्वाचन-क्षेत्र बदलने वालों के लिए)
जो अपने निर्वाचन-क्षेत्र में बदलाव करना चाहते हैं, उन्हें कुछ अतिरिक्त विवरण भी भरना होता है। इनमे आपको अपने पहले वाले पते को भरना पड़ेगा। आपसे राज्य, जिला, पिन कोड इत्यादि माँगे जाएँगे।
Declaration वाले सेक्शन में अतिरिक्त विवरण।
स्टेप 3.7– आपके द्वारा फॉर्म भरे जाने का Acknowledgement
यहाँ आपको फॉर्म भरने की प्रक्रिया पूरी करने के साथ ही एक ख़ास Acknowledgement number दिया जाएगा जिसके द्वारा आप अपने फॉर्म की स्थिति को ट्रैक कर सकते हैं। इस नंबर को नोट कर लें और संभाल कर रखें।
अपना Acknowledgement नंबर नोट कर लें।
अगर आपने गलती से कुछ गलत जानकारियाँ भर दी है तो आप होमपेज पर जाकर फॉर्म 8 को भर सकते हैं ताकि उसे सुधार सकें।